वर्ष 1969 के लोकसभा चुनावों से पहले सारे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ
होते थे और जनता उस समय पार्टियों द्वारा घोषित किए गए चुनावों घोषणा पत्र पर
भरोसा करके वोट देती और यह मानकर चलती थी कि पार्टी जो भी वायदा अपने चुनावी घोषणा
पत्र में कर रही है वो पूरा करेगी। 1969-70 के चुनावों में कुछ अलग हुआ, कांग्रेस का दो धड़ों में बंटवारा
हुआ एक धड़ा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में आस्था रखने वालों का था
जिसके इंडीकेट कहा गया जिसके अध्यक्ष बाबू जगजीवन राम थे और इस पार्टी का चुनाव
चिन्ह दो बैलों की जोड़ी के बजाय गाय और बछड़ा हो गया और दूसरा धडा सिंडिकेट बना
जिसमे निजलिंगप्पा, के. कामराज, मोरारजी देसाई, चंद्रभानु जैसे लोगों का बना और इन्हें कांग्रेस(ओ) के नाम से मान्यता मिली और
इनका चुनाव चिन्ह चरखा था। पहली बार इन चुनावों में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का
नारा दिया और देश की जनता ने इस नारे पर विश्वास करते हुए इंदिरा गांधी के नेतृत्व
वाली कांग्रेस(आई) को भारी मतों से जितवाया।
इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के गरीबी हटाओ
वाले नारे ने उन्हें लोकसभा में भारी बहुमत से जितवा दिया और लाल बहादुर शास्त्री
जी के निधन के बाद प्रधानमंत्री बनी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहने वाले
कामराज, निजलिंगप्पा, चंद्रभानु गुप्ता, मोरारजी देसाई आदि को उन्हें अपनी औकात दिखा दी। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या
वो सरकार गरीबी हटाओ का नारा चरितार्थ कर पाई या ये ग़रीबी हटाओ का नारा भी चुनावी
जुमला ही साबित हुआ तो उस कार्यकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी बंगलादेश युद्ध में
विजय और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर देने के पश्चात जहां पूरे देश के लिए चंडी-दुर्गा
के रूप में मानी जाने लगी। वहीं जयप्रकाश नारायण के समग्र आंदोलन को दबाने के लिए
आपातकाल की घोषणा के साथ ही एक निरंकुश शासक बन गईं। यद्यपि आपातकाल के दौरान जहां
सरकारी मशीनरी ठीक से काम करने लगी, भूमिहीनों को जमीन बांटी गई और परिवार नियोजन पर बहुत ही बढ़िया काम हुए। वहीं
आपातकाल में प्रेस की आजादी पर रोक, जबरन नसबंदी जैसे कार्यों ने उनकी पॉपुलैरिटी के ग्राफ को एकदम नीचे गिरा दिया
और चुनाव के समय उनका गरीबी हटाओ अभियान कहीं पीछे छूट गया।
प्रेस की आजादी और लोकतंत्र की बहाली के वादे के नाम
पर लगभग 5 दलों को मिलाकर जनता पार्टी की सरकार सत्ता में तो आ गई पर इस सरकार के बनते
ही सरकार में बैठे लोग प्रेस की आजादी और लोकतंत्र की बहाली जैसे मुद्दे तो पीछे
छोड़कर आपस में लड़ने और इंदिरा गांधी को जेल में डालने की जुगत में लगे रहे।
परिणाम यह हुआ कि जनता पार्टी सरकार जयप्रकाश नारायण के सामने ही बिखर गई और जिस
इंदिरा गांधी को जेल में डालने में लगे थे वे उन्हीं इंदिरा गांधी के हाथों शतरंज
की मोहरों जैसे खेलने लगे और उनके सपोर्ट से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बन गए और
देश के इकलौते प्रधानमंत्री बने जो प्रधानमंत्री के रूप में एक दिन भी संसद का
मुंह न देख सके, सत्ता के खेल में माहिर इन्दिरा गांधी ने चौधरी चरण सिंह सरकार से समर्थन खींच
लिया और देश 1980 में मध्यावधि चुनाव झेलने को मजबूर हो गया और प्रेस की आजादी और लोकतंत्र की
बहाली का मुद्दा धरा का धरा रह गया।
1980 में इंदिरा गांधी ने नारा दिया कि
चुने उन्हें जो सरकार चला सके और जिन मतदाताओं ने दो-ढाई साल पूर्व उन्हें बुरी
तरह से पराजित कर दिया था और वे रायबरेली से भी अपनी सीट हार गई थीं। वो पूर्ण
बहुमत से सरकार में आ गई, उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने पर उन्हें अगले चुनाव
में बोफोर्स तोप दलालों के आरोपों का सामना करना पड़ा और वे चुनाव हार गए और सरकार
में भ्रष्टाचार समाप्त करने के वादे पर विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री
बने।
विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बोफोर्स तोप दलाली के
आरोपों की जांच कराने और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के नाम पर सत्ता में आई पर
उनके कार्यकाल में बोफोर्स तोप दलालों के विरुद्ध ने कोई जांच हुई और न ही जो लोग
बोफोर्स दलाली के आरोपों से घिरे थे उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही हुई। हां ये जरूर रहा कि
विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल के सुपुत्र ओम
प्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरते
पाए गए और उनको मुख्यमंत्री के पद से हटाने का फैसला प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप
सिंह को इतना भारी पड़ गया कि उनको अपनी सरकार गंवाने पड़ी। वहीं जो सरकार
भ्रष्टाचार उन्मूलन के नाम पर सत्ता में आई वह भ्रष्टाचार समाप्त करना तो दूर देश
की राजनीति में मंडल और कमंडल का ऐसा मुद्दा छोड़ गई कि आज देश में हिंदू राष्ट्र
निर्माण और जातिवादी जनगणना पर ही एक हो गई। इसकी वजह से देश में विकास के मुद्दे
की जगह हिन्दू राष्ट्र और जितनी जिसकी है आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी पर टिक गई
है।
उसके बाद देश में सरकार से भ्रष्टाचार समाप्त करने के
अन्ना हजारे के आंदोलन के फलस्वरूप एक उम्मीद जगी कि देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो
जायेगा और इस नारे की आड़ में अरविंद केजरीवाल दिल्ली में मुख्यमंत्री बनने में
सफल हो गए और लोगों को उम्मीद थी कि वे अन्ना हजारे के लोकपाल बिल पर कुछ काम
करेंगे और सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की शुरुआत करेंगे पर उन्होंने
भ्रष्टाचार के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए शराब घोटाले में मुख्यमंत्री सहित उनकी
सरकार के तीन-तीन मंत्री महीनों जेल के अंदर रहे और जिस अन्ना हजारे की एक आवाज पर
लाखों लोग रामलीला ग्राउंड पर इकठ्ठा हो जाते थे। अब उन अन्ना हजारे की बातों को
कोई सुनता ही नहीं, आखिर जनता के सामने वादे करके मुकरने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा।
अभी बिहार में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और विपक्षी
महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने हर घर में एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का
वादा किया है और यह भी कहा है कि यह वादा सरकार बनने के बीस दिन के अंदर ही पूरा
किया जाएगा। अब यह समझ में नहीं आता कि यह वादा पूरा करने के लिए प्रदेश के
वर्तमान बजट का चार गुना बजट चाहिए जो संभव नहीं लगता। कहीं तेजस्वी यादव की इस गारंटी का
हॉल वर्ष 2014 में मोदी द्वारा उस घोषणा जैसा न हो जिसमें यह कहा गया था कि हम सत्ता में आए
तो विदेशी बैंकों में नेताओं और जमाखोरों की गैर कानूनी पैसा वापस आए और हर नागरिक
के खाते में 15 लाख रुपए आ जाएंगे या हर वर्ष देश में 2 करोड़ नौकरियां मिलेगी। बाद में ये सब घोषणाएं
चुनावी जुमला ही साबित हुई और जब राजनीतिक दल इस तरह की चुनावी गारंटी देते हैं और
उन पर ध्यान नहीं देते तो जनता ठगा हुआ महसूस करती है अब इस पर रोक लगनी चाहिए।
पहले के समय में मतदाता पार्टी के घोषणा पत्र को
पार्टी द्वारा किए जाने वाले कार्यों की गारंटी मानते थे पर अब तो नेताओं की
गारंटी को भी छलावा मानते हैं और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ
के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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