सोमवार, 11 नवंबर 2013

थूकना जन्मसिद्ध अधिकार!

श्याम कुमार

हमारे देश का राष्ट्रीय चरित्र क्या है, पूछा जाय तो भ्रष्टाचार से भी अधिक अंक थूकने को प्राप्त होंगे। थूकने की यह क्रिया ऐसी है, जो यत्र-तत्र-सर्वत्र कहीं भी देखी जा सकती है। जैसे, जीवन के लिए सांस लेना आवश्यक है, वैसे ही कहीं भी थूक देना हमारे यहां स्वाभाविक प्रवृत्ति में शुमार हो गया है। थूकने की स्टाइलें भी अजीब-अजीब हुआ करती हैं। कुछ लोग चाय की दुकान पर बैठे-बैठे दूर तक पिचकारी मार देते हैं। कुछ लोगों के होंठ हिलते नहीं दिखाई देते, लेकिन उनके मुंह से जाने कैसे थूक का गोला बाहर निकलकर दूर जा गिरता है। पैदल चलने वाले तो सड़क पर इच्छानुसार कहीं भी थूकते हुए चलते ही हैं, दुपहिया या चारपहिया वाहनों पर चल रहे लोग भी आराम से इधर-उधर पीक मार दिया करते हैं। उन्हें इसकी चिन्ता नहीं होती कि उनकी पीक पीछे आ रहे किसी व्यक्ति को रंग सकती है। गौर करें, पैदल या वाहन पर सड़क के किनारे जा रहे लोग भी अपनी बांईं ओर मौजूद नाली में नहीं थूकते, बल्कि दाहिनी ओर सड़क के बीच में पिचकारी छोड़ते हैं।

पान और गुटखे का ताण्डव सड़कों पर ही नहीं, किसी भी भवन या कार्यालय में हर तरफ देखा जा सकता है। कुछ समय पूर्व की घटना है, आई.ए.एस. अधिकारी दीपक कुमार जब उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिशद में आयुक्त पद पर तैनात हुए तो एक दिन अचानक उन्होंने कार्यालय का निरीक्षण कर लिया। वह देखकर हैरान रह गए कि कर्मचारियों ने न केवल बरामदों में, बल्कि सीढ़ियों पर, कमरों की फर्श पर, यहां तक कि कमरों में रखी अलमारियों के पीछे भी जमकर थूक रखा था। पीक की रंगीनी चारों ओर व्याप्त थी। दीपक कुमार ने पान-गुटखा खाने एवं धूम्रपान करने पर दो सौ रुपए जुर्माने का आदेश निकाला था, किन्तु उनका स्थानान्तरण होते ही वह आदेश फुर्र हो गया। इस व्यापक रंगीनी की छटा किसी भी कार्यालय में देखी जा सकती है। लोग सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते, गलियारों में चलते-चलते अथवा कमरों में कुरसियों पर बैठे-बैठे, हर दशा में निसंकोच भाव से इधर-उधर पीक-अभियान चलाते रहते हैं।

आवासीय भवनों की सीढ़ियों व गलियारों में भी पीक की यह ‘होली’ देखी जा सकती है। एक बहुमंजिले आवासीय भवन में निवास करने वाले सज्जन थूकने वालों से जब बहुत परेशान हो गए तो उन्होंने सीढ़ी पर तख्तियां लगाईं, जिन पर लिखा था- ‘कृपया थूककर गन्दा न करें’। फिर भी लोगों ने थूकना बन्द नहीं किया। तब उन्होंने तख्तियों पर थूकने की मनाही कड़े शब्दों में लिखी। इस पर भी थूकने वाले नहीं माने तो उन्होंने इन शब्दों में चेतावनी लिखकर तख्तियां लगाईं-‘जो कोई थूककर इस सीढ़ी को गन्दा करेगा, उसके घर में नाश हो जाएगा’। इसके बावजूद कुछ ‘हुनर’ दिखाने वाले अपनी आदत से बाज नहीं आए।

विश्वविद्यालय के किसी भी छात्रावास में जाने पर वहां की सीढ़ियों व गलियारों को देखकर यह निर्णय कर पाना कठिन होता है कि वहां पर पीक की पिचकारियां चलाई गई हैं अथवा लाल रंग से पेन्ट किया गया है। ऐसा लगता है, जैसे वहां रहने वाले विद्यार्थी पढ़ने में नहीं, पीक मारने में योग्यता हासिल कर रहे हैं! सच तो यह है कि कभी भी और कहीं भी थूक देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है।

(श्याम कुमार)

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