भारत आज जिस विकास के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से वह प्रकृति से दूरी भी बना रहा है। जंगल कट रहे हैं, पहाड़ तोड़े जा रहे हैं, नदियां सूख रही हैं और हवा ज़हर बनती जा रही है। यह सब किसी एक राज्य या क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जब जब हम प्राकृतिक से छेड़छाड़ करते है तो आपदा को निमंत्रण देना मुनासिब है। इस संदर्भ में अरावली पर्वत श्रृंखला का मुद्दा केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक, स्वास्थ्य और अस्तित्व का मुद्दा बन चुका है। इस पर्वत श्रृंखला के साथ हो रही छेड़छाड़ और देशभर में तेज़ी से होती पेड़ों की कटाई है। यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का प्रश्न है। जब भी मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़ने की कोशिश की है, प्रकृति ने उसे चेतावनी दी है। बाढ़, सूखा, भूकंप, हीटवेव, प्रदूषण और महामारी ये सभी उसी चेतावनी के रूप हैं।
अरावली पर्वत माला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जिसकी उम्र लगभग 250 करोड़ वर्ष मानी जाती है। जब पृथ्वी का स्वरूप आकार ले रहा था, तब से अरावली अस्तित्व में है। पहले अरावली बहुत विशाल थी लेकिन बाद में यह पहाड़ घिसते चले गए और हवा, पानी व समय और अवैध खनन माफियों ने इन्हें धीरे-धीरे काट दिया। अरावली पर्वत श्रृंखला को अक्सर राजस्थान की हीट शील्ड कहा जाता है। यह गर्म हवाओं को रोकती है, तापमान को संतुलित रखती है और धूल भरी आंधियों से बचाव करती है। यदि यह शील्ड कमजोर हुई, तो 50 डिग्री या उससे अधिक तापमान, भीषण लू और धूल के तूफान सामान्य हो जाएंगे। इतना अधिक तापमान केवल असुविधा नहीं, बल्कि मानव जीवन, खेती और जल स्रोतों के लिए घातक है। खेती प्रभावित होगी, पानी की कमी बढ़ेगी और ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन तेज़ होगा। साथ ही यह राजस्थान के थार मरुस्थल की रेत को दिल्ली, हरियाणा, अलवर, जयपुर एनसीआर तक पहुंचने से रोकती है और उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। यह राजस्थान की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या के लिए जल, जंगल और जीवन का आधार है। वर्ष 2017 की एक रिपोर्ट बताती है कि अरावली में खाली जगह बनने से रेगिस्तान फैलने का खतरा बढ़ रहा है। अरावली की पहाडिया भारी मात्रा में पानी को जमा करती हैं और उसे धीरे-धीरे छोड़ती है। इस तरह अरावली चंबल, साबरमती और लूणी जैसी नदियों को जीवन देकर एक बड़े इलाके को रेगिस्तान बनने से बचाती है। इसलिए अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि रेगिस्तान और आबादी के बीच एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यदि यह कवच कमजोर हुआ या समाप्त हुआ, तो हवा में हमेशा धूल तैरती रहेगी और सांस लेना भी संघर्ष बन जाएगा।
आज मास्क हमें कोरोना महामारी की याद दिलाता है, लेकिन यदि अरावली का क्षरण यूं ही चलता रहा, तो आने वाला समय ऐसा होगा जब मास्क बीमारी से बचने के लिए नहीं, बल्कि जिंदा रहने के लिए पहनना पड़ेगा। हवा में धूल, सिलिका कण और प्रदूषण इतना अधिक होगा कि अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और एलर्जी तेजी से बढ़ेंगी कि अस्पताल और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा। सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ेगा। दिल्ली और एनसीआर पहले ही प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, और अरावली के क्षरण से यह संकट कई गुना बढ़ सकता है। हम क्यों भूल जाते है कि पेड़ केवल ऑक्सीजन का स्रोत नहीं हैं बल्कि वे जल संरक्षण, मिट्टी की मजबूती, तापमान संतुलन और जैव विविधता के आधार हैं। जब जंगल खत्म होते हैं, तो बाढ़, सूखा और भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ जाती हैं। इसलिए प्रकृति का हर संतुलन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। उसके बावजूद अरावली को सबसे बड़ा खतरा अवैध खनन और अंधाधुंध पेड़ कटाई से ही है। यह समस्या केवल अरावली तक सीमित नहीं है। पूरे देश में विकास के नाम पर जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं। सड़कें, इमारतें, उद्योग और खनन के लिए इन सबके लिए सबसे पहले पेड़ काटे जाते हैं। हम सब अच्छी तरह से जानते है कि उनकी भरपाई केवल आंकड़ों में होती है, ज़मीन पर नहीं।
वर्तमान समय में आज बहस इस बात पर हो रही है कि पहाड़ों की ऊंचाई 100 मीटर तय की जाए या नहीं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि ऊंचाई कितनी हो, बल्कि यह है कि यह फैसला किसके फायदे के लिए लिया जा रहा है और किस कीमत पर। भारत जैसे देश में यह किसी से छिपा नहीं है कि संबंधित अधिकारी के पास सही समय पर पैसा पहुंच जाए तो कागजों पर 200 मीटर को 90 मीटर दिखाना असंभव नहीं है । पहाड़ों की नपाई, अनुमति और खनन सब कुछ कागज और हस्ताक्षर से तय होता है यदि यह फैसला लागू हो जाता है तो पहाड़ नहीं टूटेंगे, पेड़ नहीं काटेंगे बल्कि राजस्थान का भविष्य टूटेगा जनाब। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने पर्वत श्रृंखला की संशोधित परिभाषा को लेकर दिए गए अपने ही फैसले पर अस्थायी रोक लगा दी है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कई पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने चिंता जताई थी कि इस आदेश से संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों के बड़े हिस्से अवैध और अनियंत्रित खनन के लिए खुल सकते हैं। मामले की सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि समिति की सिफारिशों और अदालत के पूर्व निर्देशों को फिलहाल स्थगित रखना आवश्यक है। यह रोक नई समिति के गठन तक लागू रहेगी। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित चार राज्यों को नोटिस जारी किया। साथ ही, विशेषज्ञों की एक नई समिति बनाने का आदेश दिया गया और मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को तय की गई। इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार ने बुधवार राज्यों को अरावली पर्वत माला में नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी कर दिए हैं। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) को पूरे अरावली क्षेत्र में अतिरिक्त क्षेत्रों और जोन की पहचान करने का निर्देश दिया है। इन निर्देशों का लक्ष्य गुजरात से लेकर दिल्ली एनसीआर तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है।
सरकार का पक्ष भी समझना जरूरी है। भारत एक विकासशील देश है, जहां आर्थिक विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और आवास की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। सरकार का तर्क है कि निर्माण और औद्योगिक गतिविधियां विकास के लिए जरूरी हैं और इनके बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। यह भी सच है कि सिर्फ एक राज्य राजस्थान से अरावली की पहाड़ियों का खनन करने से हर साल साढ़े चार हजार करोड़ की आमदनी होती है । सरकार यह भी कहती है कि नियम, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), वृक्षारोपण और पुनर्वास योजनाएं मौजूद हैं, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। कई जगह हरित परियोजनाएं, सौर ऊर्जा और वैकल्पिक विकास मॉडल अपनाने की कोशिश भी की जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये व्यवस्थाएं ज़मीन पर प्रभावी हैं? क्या कोई विकास का मॉडल ऐसा है जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सके? विकास और विनाश के बीच फर्क करना अब अनिवार्य हो चुका है। विकास वह है जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले, न कि उसे खत्म करके। पेड़ लगाए जा सकते हैं, लेकिन 250 करोड़ साल पुरानी पर्वत श्रृंखला दोबारा नहीं बनाई जा सकती। यदि आज हमने इसे नहीं बचाया, तो कल पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। आज अरावली का मुद्दा हमें एक स्पष्ट संदेश देता है प्राकृतिक से छेड़छाड़, आपदा को निमंत्रण है। यह कोई दूर का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी है। यदि आज हमने नहीं सुना, तो कल पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। अब समय है कि सरकार, समाज और नागरिक मिलकर यह तय करें कि हमें किस तरह का विकास चाहिए, कंक्रीट का जंगल या हरा-भरा जीवन। क्योंकि यदि पहाड़ नहीं टूटेंगे, पेड़ नहीं कटेंगे, तभी भारत का भविष्य सुरक्षित रहेगा क्योंकि भारत गांव में बसता है।
(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक) 9818270202
