गुरुवार, 27 नवंबर 2025

सिमटते गांव चिंता का विषय

बसंत कुमार

पहले यह कहा जाता था कि भारत देश गांवों में बसता है और यदि हम भारत देश की संस्कृति और परम्परा को जानना चहते हैं तो गांवों में जाकर देखें पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और गांव सिकुड़ते जा रहे हैं। आज के चार दशक पहले तक गांवों में गन्ना की बुवाई से लेकर छप्पर उठाने तक के कार्य बिना मजदूरी दिए सहकारिता के आधार पर हो जाते थे पर जब से लोगों का शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है तब से गांव में आदमी न मिलने के कारण गन्ना बोना और छप्पर बनाना ही छोड़ दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 81% आबादी अब शहरों में रहने लगी है और केवल 19% आबादी विशुद्ध रूप से गांवों में बची है।

यह आंकड़ा इस कारण भी चौंकाने वाला इसलिए है कि वर्ष 2018 यानि सात वर्ष पूर्व यह आंकड़ा मात्र 55% था, यूएस की वर्ल्ड आर्गोनाइजेशन प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल शहरी आबादी में से 45% लोग बड़े शहरों में रहते हैं और 36% आबादी कस्बों में रहती है। इस पलायन और विकास के कारण गांवों में मात्र 19% लोग रह गए हैं। अनुमान है कि 2050 तक 83% लोग शहरों में पहुंच जाएंगे। शहरीकरण की यह रफ्तार दर्शाती है कि लोग गांवों की मेहनतकश जिन्दगी को छोड़कर शहरों की आरामतलब जिंदगी जीना चाहते हैं जहां शारीरिक श्रम कम से कम हो और बहुराष्ट्रीय कंपनियां की वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने इस बीमारी को और बढ़ा दिया है। जहां युवा प्रातः उठकर तैयार होकर 5-10 किलोमीटर की दूरी तय करके अपने कार्य स्थल पर जाते थे पर अब तो वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने सुबह उठना तैयार होना सब कुछ बंद कर दिया है। युवाओं की सारी दिनचर्या एक कमरे में कम्प्यूटर के सामने कैद होकर बन्द हो गई है। आर्थिक सुधार युग के पहले यानि 1970 और 1980 के दशक की गांवों की जिंदगी पर निगाह डाले तो पता लगता है कि इस शहरीकरण से जहां हमने सुख-सुविधा के नाम पर बहुत कुछ पाया है वहीं स्वास्थ पर्यावरण और सामाजिकता के मामले में हमने खोया बहुत है, जहां गाय-बैल और अन्य पालतू जानवर हमारे लिए पूंजी होते थे आज मशीन पर आधारित खेती शुरू हो जाने के कारण ये हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। इनके खुला लावारिश घूमने के कारण अब किसान खरीफ और जायद कि फसलें बोना छोड़ चुके हैं और खेती के नाम पर गेहूं और धान की फसल बो रहे हैं और राज्य सरकारों को गौशाला के रखरखाव पर बहुत मोटा फंड देना पड़ रहा है। जो पैसा देश के विकास के लिए लगना चाहिए़ था वो इन चीजों पर लग रहा है।

यदि हम आज के चालीस पचास के गांवों की जिन्दगी देखें तो वहां कृषि स्वाबलंबन पर होती थी। कृषि का मुख्य आधार पशु और श्रम होते थे यदि घर में कोई चीज घट जाए तो बाज़ार भागने के बजाय पड़ोस से मांगकर काम चला लिए जाता था। यद्यपि उस समय माचिस प्रयोग में आ गई थी उसका प्रयोग मन्दिर में दिया जलाने में होने लगा था पर घर का चूल्हे जलाने के लिए बोरसी में 24 घंटे सुलगती आग को ही शुभ माना जाता था और शाम के समय महिलाओं का पड़ोस के घर आग मांगने जाना आम दिन का कार्य होता था। उस बहाने वे 10-15 मिनट बैठकर सारा हाल चाल जान लेती थी और पड़ोस में क्या हो रहा है यह सब पता कर लेती थी। शाम को सारे बड़े लोग एक घर पर अलाव के पास बैठकर रामायण महाभारत के कथानकों के संबंधित कहानियां सुनाया करते और बच्चों का काम बुजुर्गों के लिए तम्बाकू की चिलम भरना होता था उसके बदले में उन्हें किस्से और कहानियां सुनने को मिल जाती थी। आज की तरह मैरिज ब्यूरो नहीं होते थे। लोगों को लड़की-लड़कों की शादी के लिए खोज उनके अलावा या गांव की चौपाल पर पूरी हो जाती थी। अगर गांव में किसी की लड़की की शादी होती थी तो बर्तन और चरपाई के लिए टेंट हाउस के चक्कर लगाने के बजाय गांव में ही आपसी सहयोग से हो जाता था। बारात की स्वागत से लेकर बिदाई तक गांव के युवा एक पैर पर खड़े रहते थे पर आज ये चीजें नदारत हो गई है। आज गांव में भी शहरों की ओर भागने की लालसा ने ये सब छीन लिया है, सामाजिकता का स्थान घर-घर फैले मोबाइल ने छीन लिया है। आज सभी युवा और बड़े शाम होते ही या तो शराब के ठेकों पर मिलते हैं या फिर घरों में कैद होकर मोबाइल पर आंखे गड़ाए रहते हैं। आस-पड़ोस में क्या हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

जब बोर्ड के दसवीं कक्षा के परिणाम आते थे तो गांवों में एक उत्सव का माहौल होता था जब रिजल्ट अखबार में आ जाता था तो कस्बे में रहने वाले अखबार वाले के पास रिजल्ट देखने की लाइन लगाती थी और जो पास हुए वे अड़ोस पड़ोस में लड्डू या बताशे जरूर बांटता था। गांव की अशिक्षित महिलाओं को भी पता लग जाते था कि फलां का बेटा 10वीं पास हो गया है पर आज-कल की चकाचौंध की दुनिया में लोग अपने घर के बच्चों के बारे में भूल जाते हैं कि किस कक्षा में है। बस बच्चों को जुगाड़ लगाकर अच्छे स्कूल में पढ़ा दिया और ट्यूशन लगा दिया जिम्मेदारी खत्म। गांव में किसी के यहां कोई मेहमान आ जाता था तो अड़ोस-पड़ोस इस बात का ध्यान रखते थे कि मेहमान अकेले ही बैठा है पर आज कल यह सामाजिकता गायब है।

आखिर क्या कारण है कि लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं इसका आत्मावलोकन आवश्यक है। आर्थिक सुधार युग और मशीनीकरण के कारण गांवों में परम्परागत रोजगार समाप्त हो गए हैं। आधुनिक मशीनों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले दोना पत्तल, मिट्टी के बर्तन, कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले हल, फावड़ा, कुदाल सभी का उपयोग समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव में बसने वाले लोहार, कोहार, बढ़ई, सुनार, मुसहर, डोम धीमर सभी बेरोजगार हो गए तो उनके लिए शहरों में भागकर लेबर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्पों नहीं बचा था। यद्यपि महानगरों में उनकी जिंदगी नर्क से बेहतर नहीं है। एक-एक कमरे में 10-10 लोगों का रहना। पानी के लिए और नित्य कर्म के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना और 10-12 घंटे की ड्यूटी करना पड़ता है फिर भी वे अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते। इसके अतिरिक्त गांवों में व्याप्त जाति वादी मानसिकता और ऊंच-नीच का भाव भी गांवों से पलायन का कारण है। दलित व उपेक्षित समाज के पढ़े-लिखे युवा गांव की सड़ी गली जाति वादी मानसिकता से पीछा छुड़ाने के लिए शहरों में जाकर अपनी जाति छुपाकर काम करते हैं और इज्जत के साथ गुजर-बसर करते हैं। महानगरों में उनका दलित या पिछड़ा होना उन्हें तंग नहीं करता पर ज्यों वे साल दो साल बाद गांव जाते हैं तो स्टेशन से उतरते ही उनकी जाति उनके पीछे चिपक जाती है और वे गांव वापस जाने के बजाय शहर की नरकीय जिंदगी में वापस चले जाते हैं। यह ऐसी समस्या है जिसके विषय में सरकार और समाज को सोचना होगा।

यदि सरकार शहरों में इस तरह की बढ़ती हुई भीड़ को रोकने का प्रयास नहीं करेगी तो निकट भविष्य में महानगरों सहित अन्य शहर रहने लायक नहीं रह पाएंगे और ये गैस चैंबर के रूप में बदल जाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि गावों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसी चीजें उपलब्ध कराई जाएं। गांवों में महिलाओं की स्वास्थ्य-चिकित्सा एक बड़ी समस्या है, इसके अलावा गांवों में रोजगार की समस्या भी है, सरकार ने गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया पर उसमें भी अभी वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है क्योंकि एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहा है पर भारत में मंडल और कमंडल की राजनीति के चक्कर में युवाओं के रोजगार का मामला गौड़ हो गया है और हर राजनीतिक दल को पार्टी लाइन से हटकर इस समस्या के विषय में सोचना चाहिए।

यदि इस प्रकार से शहरों की ओर पलायन को नहीं रोका गया तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। वहां वायु गुणवत्ता (AQI) 300 से 450 तक पहुंच गया है, जहां लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष करते हैं वहीं प्रशासन को एक्यूआई स्तर को नीचे लाने के लिए सुबह शाम गाड़ियों से पानी का छिड़काव करना पड़ रहा है और लोग सांस संबंधित बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। अब सरकार और सामाजिक संस्थाओं को प्रयास करना होगा कि लोग गांवों की ओर वापस जाएं विशेषकर काम धंधे से रिटायर होने के बाद शहरों में बोझ बनकर जीने के बजाय अपनी मांटी में वापस जाएं और सम्मानपूर्वक अपना बचा खुचा जीवन बिताएं।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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