बुधवार, 24 दिसंबर 2025

राष्ट्र का चरित्र गढ़ती छोटे साहिबजादों की शहादत

आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता की कुछेक घटनाएँ केवल अतीत का वृत्तांत नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना को दीर्घकाल तक दिशा देने वाली मानक बन जाती हैं। ऐसी घटनाएँ समय के प्रवाह में कभी विस्मृत नहीं होतीं, क्योंकि उनमें सत्य, धर्म-रक्षा, नैतिक साहस, आध्यात्मिक दृढ़ता और राष्ट्रीय चेतना का ऐसा समन्वय होता है, जो हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बना रहता है। दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों, बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (6 वर्ष) की शहादत ऐसी ही अद्वितीय घटना है। अल्पायु में उन्होंने जो साहस, धैर्य और आत्मबल प्रदर्शित किया है, उससे स्पष्ट होता है कि धर्म, सत्य और राष्ट्र की रक्षा आयु या सामर्थ्य पर नहीं, बल्कि चेतना और चरित्र पर निर्भर करती है।

वर्ष 1705 में आनंदपुर से बिछुड़कर माता गुजरी जी के साथ छोटे साहिबजादों का सरहिंद पहुँचना केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह उस ऐतिहासिक क्षण की भूमिका बनी, जहाँ सत्ता और विवेक आमने-सामने खड़े थे। सरहिंद के सूबेदार वज़ीर ख़ान द्वारा किया गया धर्म परिवर्तन का दबाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस समय की सत्ता की मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ आस्था को बलपूर्वक बदला जा सकता है। किंतु छोटे साहिबजादों के साहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्म कोई बाहरी आवरण नहीं, बल्कि अंतःकरण की प्रतिबद्धता है। “हम अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे”, यह कथन केवल साहस का उद्घोष नहीं, बल्कि उस सोच की घोषणा थी कि सत्य को किसी भी प्रकार के दमन या प्रलोभन से कुचला नहीं जा सकता।

उनका जीवित दीवार में चिनवाया जाना सत्ता की क्रूरता का चरम उदाहरण था परंतु इस अमानवीय कृत्य के बावजूद साहिबजादों की नैतिक विजय अक्षुण्ण रही। इतिहास में अनेक युद्ध हुए, अनेक विजेता बने किंतु नैतिक दृष्टि से वही विजयी माने गए जिन्होंने अन्याय के समक्ष कभी समर्पण नहीं किया। छोटे साहिबजादों की शहादत इसी नैतिक विजय का सर्वोच्च उदाहरण है। यह घटना उस सामान्य धारणा को भी चुनौती देती है कि नैतिक विवेक और आध्यात्मिक साहस केवल परिपक्व आयु में ही विकसित होते हैं। वस्तुत: बाल मन भी यदि उचित संस्कारों से दीक्षित हो, तो वह असाधारण नैतिक दृढ़ता प्रदर्शित कर सकता है। छोटे साहिबजादों ने यह सिद्ध किया कि सच्ची वीरता शारीरिक बल या अस्त्र-शस्त्र में नहीं, बल्कि सत्य एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण में निहित होती है।

सिख दर्शन का मूल सिद्धांत है कि आत्मा अजर-अमर है और सत्य ईश्वरानुकूल आचरण में निहित है। छोटे साहिबजादों का आचरण इसी दर्शन की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थी। उनका साहस किसी तात्कालिक भावावेश का परिणाम नहीं, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा प्रदत्त संस्कारों, गुरमत शिक्षा तथा आंतरिक आध्यात्मिक अनुशासन से उत्पन्न हुआ था। मृत्यु उनके लिए भय का कारण नहीं बनी, क्योंकि सिख परंपरा में धर्म और कर्तव्य की रक्षा सर्वोच्च जीवन मूल्य हैं। इस दृष्टि से उनकी शहादत नकारात्मक अर्थ में ‘मृत्यु’ नहीं, बल्कि सकारात्मक अर्थ में ‘कर्तव्य की पूर्णता’ थी।

निरभऊ–निरवैर’ का गुरमत सिद्धांत उनके आचरण में पूर्णतः साकार दिखाई देता है। नाम-सिमरन और शबद से उत्पन्न आंतरिक शक्ति ने उन्हें बाहरी भय से मुक्त रखा। सिख आध्यात्मिकता में ‘हुकुम’ अर्थात ईश्वरीय इच्छा को स्वीकारना मनुष्य को मानसिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। यही कारण था कि कठोरतम शारीरिक उत्पीड़न  के वाबजूद भी उनका मन स्वतंत्र और अडिग रहा। यही आंतरिक शक्ति ही किसी समाज की वास्तविक शक्ति होती है। इन संस्कारों का प्रतिफल उनके चरित्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। छोटे साहिबजादों ने यह सिखाया कि अनुकूल परिस्थितियों में विनम्रता और प्रतिकूल परिस्थितियों में साहस ही सच्चे चरित्र की पहचान है। यह शिक्षा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी समान रूप से प्रासंगिक है।

छोटे साहिबजादों की शहादत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धार्मिक साहस का परिचय भर नहीं देती, बल्कि राष्ट्रभक्ति, सत्यनिष्ठा और नैतिकता का समग्र संदेश देती है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र की आत्मा केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र की दृढ़ता से सुरक्षित रहती है। इसी कारण उनकी शहादत आज भी बच्चों, युवाओं और राष्ट्रचिंतक नागरिकों के लिए प्रेरणा का अक्षय एवं स्थायी स्रोत है।

जान जोखिम में डालकर बाबा मोती राम मेहरा द्वारा साहिबजादों और माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में गर्म दूध पिलाना सिद्ध करता है कि सत्य एवं करुणा से प्रेरित नि:स्वार्थ कर्म ही राष्ट्र-प्रेम का सर्वोच्च रूप है। शहादत के उपरांत दीवान टोडरमल द्वारा सोने की अशर्फ़ियाँ बिछाकर भूमि क्रय करना और छोटे साहिबजादों तथा माता गुजरी जी का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराना,  इस शहादत को और अधिक व्यापक मानवीय संदर्भ प्रदान करता है। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जब सत्ता भय पैदा करती है, तब समाज के विवेकशील एवं साहसी नागरिक ही मानवता की रक्षा करते हैं। फ़तेहगढ़ साहिब स्थित गुरुद्वारा ज्योति स्वरूप आज भी इसी सामूहिक नैतिक चेतना और मानवीय साहस का सजीव प्रतीक है।

आज, जब हम युवा पीढ़ी में संस्कार, नैतिकता, धर्मानुकूल आचरण एवं राष्ट्रबोध के क्षरण पर चिंतित होते हैं, छोटे साहिबजादों की पवित्र शहादत हमें स्मरण कराती है कि वास्तविक वीरता बाहरी आडम्बरों एवं सुख-साधनों में नहीं, बल्कि अंतःकरण की दृढ़ता में निहित होती है। धर्म, सत्य और राष्ट्र के प्रति अडिग रहना, कर्तव्य को ईश्वरीय इच्छा मानकर निभाना, यही सच्चा बलिदान है, और यही शहादत का शाश्वत अर्थ भी।

(यह विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दुष्परिणाम दिल्ली के लिए घातक: बलविंदर सिंह

संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) ने अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है, जिसमें 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर करने की व्याख्या की जा रही है। पार्टी का मानना है कि इस फैसले के वर्तमान स्वरूप से अरावली के संरक्षण को भारी नुकसान पहुँचेगा और दिल्ली का प्रदूषण व जल संकट और गहराएगा।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) के दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बलविंदर सिंह ने कहा कि हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन यह कहना ज़रूरी है कि इस फैसले की व्याख्या और उसके ज़मीनी प्रभाव अत्यंत खतरनाक हैं। 

बलविंदर सिंह ने कहा इस निर्णय के बाद अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा, जो 100 मीटर से कम ऊँचाई का है, संरक्षण से बाहर हो जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उपलब्ध भौगोलिक और पर्यावरणीय तथ्यों के अनुसार अरावली की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँचाई की हैं, केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही 100 मीटर से अधिक ऊँचाई का है। ऐसे में इस फैसले का सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि अरावली का बड़ा हिस्सा अब अरावली ही नहीं माना जाएगा, और यही व्याख्या अवैध खनन, ब्लास्टिंग और कंक्रीटीकरण का रास्ता खोल देगी।

उन्होंने चेतावनी दी कि इस फैसले के बाद अरावली क्षेत्र में अवैध माइनिंग को वैध बनाने की कोशिशें शुरू हो जाएंगी, भू-माफिया और बिल्डर इस निर्णय की आड़ में पहाड़ियों को खत्म करेंगे और इसका सीधा असर दिल्ली की हवा, पानी और तापमान पर पड़ेगा।

बलविंदर सिंह ने कहा कि अरावली की ऊँचाई नहीं, उसका पर्यावरणीय चरित्र महत्वपूर्ण है। 100 मीटर से कम ऊँचाई की पहाड़ियाँ भी उतनी ही जरूरी हैं जितनी ऊँची पहाड़ियाँ। उन्हें अरावली न मानना विज्ञान और पर्यावरण दोनों के खिलाफ है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्पष्ट मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की पर्यावरणीय पुनर्व्याख्या की जाए।अरावली की पहचान ऊँचाई के बजाय उसके पारिस्थितिक महत्व के आधार पर तय की जाए। इस फैसले की आड़ में किसी भी प्रकार की अवैध माइनिंग या निर्माण की अनुमति न दी जाए। केंद्र और दिल्ली सरकार तत्काल स्पष्ट करें कि वे अरावली के 90 प्रतिशत हिस्से को कैसे बचाएंगी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) स्पष्ट करती है कि यह लड़ाई किसी संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि दिल्ली की सांस, पानी और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए है। पार्टी अरावली की रक्षा के लिए हर लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ता अपनाएगी। “अरावली बचेगी तभी दिल्ली बचेगी” –

‘वीर अर्जुन’ और अटल बिहारी वाजपेयी में वैचारिक संवाद और लोकतांत्रिक संबंध

विकास खितौलिया

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों के संकलन और प्रसारण का इतिहास नहीं है, बल्कि यह विचारों, मूल्यों और राष्ट्रनिर्माण की चेतना का भी इतिहास है। इस परंपरा में हिंदी पत्रकारिता की एक विशिष्ट भूमिका रही है। दैनिक समाचार पत्र वीर अर्जुन इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। वहीं दूसरी ओर, अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं, जिन्होंने राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता तीनों क्षेत्रों को गहराई से प्रभावित किया। वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंध केवल औपचारिक नहीं थे, बल्कि वैचारिक सामंजस्य, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित थे। अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी भाषा के सशक्त समर्थक थे। उन्होंने हिंदी को केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति और विचार की भाषा के रूप में देखा। वीर अर्जुन भी हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से जनमानस से संवाद करने वाला पत्र रहा है। यह भाषाई और सांस्कृतिक समानता दोनों के संबंधों को और मजबूत करती है। वीर अर्जुन ने वाजपेयी जी के कवि-रूप, उनके साहित्यिक पक्ष और मानवीय संवेदनाओं को भी अपने पाठकों के सामने रखा, जिससे उनकी छवि एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में उभरी।

दैनिक वीर अर्जुन की पहचान एक ऐसे हिंदी समाचार पत्र के रूप में रही है, जिसने राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक चेतना को अपने लेखन का आधार बनाया। यह पत्र केवल खबरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संपादकीय और विचार लेखों के माध्यम से पाठकों को सोचने और सवाल करने की प्रेरणा देता रहा। उस समय में वीर अर्जुन ने सत्ता के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखते हुए भी राष्ट्रीय हित और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को सर्वोपरि रखा। यही वैचारिक संतुलन अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच से भी मेल खाता था। वे ऐसे नेता थे जो विरोध और समर्थन दोनों को लोकतंत्र का आवश्यक अंग मानते थे। अटल बिहारी वाजपेयी को अक्सर एक संवेदनशील राजनेता, प्रखर वक्ता और कवि के रूप में याद किया जाता है।  लेकिन उनका पत्रकारिता से भी गहरा संबंध रहा। उन्होंने राजनीति में आने से पहले और उसके साथ-साथ लेखन को कभी नहीं छोड़ा। उनके भाषणों और लेखों में भाषा की गरिमा, विचारों की स्पष्टता और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती थी। यही कारण था कि हिंदी पत्रकारिता, विशेष रूप से वीर अर्जुन जैसे समाचारपत्र, उनके विचारों को गंभीरता से लेते थे। वाजपेयी जी भी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानते थे और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करते थे।

वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों के केंद्र में लोकतंत्र रहा। वाजपेयी जी का मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवाद, सहमति और असहमति की प्रक्रिया है। वहीं वीर अर्जुन ने भी पाठकों को विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत कराते हुए लोकतांत्रिक सोच को मजबूत किया। आपातकाल के बाद का दौर हो या गठबंधन राजनीति का समय इन सभी चरणों में वीर अर्जुन ने वाजपेयी जी की भूमिका को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। इससे पाठकों को घटनाओं को केवल तत्काल प्रभाव में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दृष्टि से समझने का अवसर मिला। वीर अर्जुन में अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े समाचार, साक्षात्कार और विचार अक्सर प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे। यह कवरेज केवल राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके विचारों, वक्तव्यों और दृष्टिकोण को व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता था। जब वे विपक्ष में थे, तब भी वीर अर्जुन ने उनके विचारों को गंभीरता से स्थान दिया। उनके संसदीय भाषणों, राष्ट्रीय मुद्दों पर दिए गए वक्तव्यों और सांस्कृतिक विषयों पर उनके विचारों को पाठकों तक पहुँचाया गया। इससे पाठकों को यह समझने में मदद मिली कि वे केवल एक दल के नेता नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय सोच वाले व्यक्तित्व हैं।

जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने, तब मीडिया और सत्ता के संबंधों की कसौटी और भी महत्वपूर्ण हो गई। वीर अर्जुन ने इस दौर में भी संतुलित पत्रकारिता का परिचय दिया। सरकार की नीतियों की सराहना के साथ-साथ आवश्यक आलोचना भी की गई।  यह आलोचना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि नीतिगत और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होती थी। वाजपेयी जी भी ऐसी आलोचना को लोकतंत्र की शक्ति मानते थे। यही कारण था कि उनके और वीर अर्जुन के बीच संवाद का रिश्ता बना रहा, न कि टकराव का।

दैनिक समाचार पत्र वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंध किसी औपचारिक राजनीतिक समीकरण तक सीमित नहीं थे। यह संबंध विचारों, भाषा, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित की साझा समझ पर आधारित था। वीर अर्जुन ने अटल बिहारी वाजपेयी को केवल सत्ता में बैठे नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक विचारशील राष्ट्रपुरुष के रूप में प्रस्तुत किया। वहीं वाजपेयी जी ने भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता और उसकी भूमिका का सम्मान किया। आज जब पत्रकारिता और राजनीति के संबंधों पर अक्सर प्रश्न उठते हैं, तब वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच का यह वैचारिक और संतुलित रिश्ता एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ संवाद, सम्मान और लोकतंत्र सर्वोपरि रहे।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक)

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