बुधवार, 5 नवंबर 2025

AIIMAS ने अपनी 5वीं वर्षगांठ पर 5 नवंबर 2025 को स्कोप ऑडिटोरियम में "मध्यस्थता के अग्रदूतों" को सम्मानित किया

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता एवं मध्यस्थता सेवा संघ (AIIMAS) ने 05.11.2025 को अपनी 5वीं वर्षगांठ मनाई, जो भारत में मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा देने की अटूट प्रतिबद्धता के पाँच वर्षों का प्रतीक है। पिछले आधे दशक से, AIIMAS जागरूकता बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण प्रदान करने और शांतिपूर्ण विवाद समाधान की संस्कृति को बढ़ावा देने के अपने मिशन में अडिग रहा है।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर, AIIMAS ने (सम्मान) - मध्यस्थता के पथ-प्रदर्शकों का सम्मान" का आयोजन किया, जो भारत भर के 25 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, पेशेवरों और संगठनों को सम्मानित करने के लिए समर्पित एक कार्यक्रम है, जिन्होंने मध्यस्थता के प्रचार और उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

उनके प्रभावशाली कार्य, चाहे न्यायपालिका, कानूनी अभ्यास, शिक्षा, सामुदायिक नेतृत्व, या संस्थागत विकास के माध्यम से, ने देश में जागरूकता बढ़ाने और मध्यस्थता की संस्कृति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में माननीय न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, न्यायाधीश, भारत के सर्वोच्च न्यायालय और माननीय न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन, अध्यक्ष, सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, प्रधान पीठ, नई दिल्ली; माननीय न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा, न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय; माननीय न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णकांता शर्मा, न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय; माननीय न्यायमूर्ति एस.वी. पिंटो, न्यायाधीश, उच्च न्यायालय; माननीय न्यायमूर्ति  सुधीर कुमार जैन, सदस्य, एनसीडीआरसी; माननीय सुश्री न्यायमूर्ति शालिंदर कौर, पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

पंच वर्ण और मनुवाद की लड़ाई से बिखरता हिन्दू धर्म

बसंत कुमार

इस समय बिहार विधानसभा चुनावों की पूरी राजनीति एनडीए सरकार के विकास और निजीकरण और विपक्ष महागठबन के रोजगार, महंगाई और जिसकी जितनी हो आबादी उसकी उतनी हो हिस्सेदारी के बीच उलझी हुई है। वहीं सोशल मीडिया और अन्य मीडिया पर सनातन के स्वयंभू समर्थकों और भीमवादियों के बीच बाबा साहब आंबेडकर को लेकर तलवारे खिच रही हैं जबकि बाबा साहब आंबेडकर न सिर्फ संविधान निर्माता हैं बल्कि राष्ट्र निर्माता भी हैं। यदि साकार ने दोनों ओर के अतिवादियों पर अंकुश नहीं लगाया तो हजारों वर्षों की प्राचीन हिन्दू संस्कृति जो हजारों वर्षों तक देश में गुलाम वंश, मुगल और अंग्रेजों के शासन काल में भी अपने आप को सुरक्षित रखने में सक्षम रही अब स्वर्ण बनाम पंच वर्ण के तनाव के कारण बर्बाद होती दिखाईं दे रही है। इस समय स्वयंभू सनातनियों के निशाने पर गैर-हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के बजाय हिंदू धर्म के पंच वर्ण (दलित अछूता) है।

पहले के समय में हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था में मुख्यत चार वर्ण थे-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र और ये व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक संचालन के लिए थी। जहां ब्राह्मण अध्ययन, अध्यापन, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों से समाज का नेतृत्व करता था। क्षत्रिय राजा होने के साथ-साथ प्रजा की रक्षा करता था। वैश्य आर्थिक गतिविधियों का संचालन करता था और शूद्र सेवा के कार्यों और टेक्निकल कामों जैसे लोहार, कोहार, बढ़ई, नाई आदि कामों को करता था पर पंच वर्ण जिसे आज दलित अछूत म्लेच्छ कहते हैं कहां से आया। इसे जानने के लिए हमें हिन्दू धर्म के इतिहास का अध्ययन करना पड़ेगा।

मूल वैदिक काल के ग्रंथों में जाति का उल्लेख नहीं मिलता। इसीलिए पुरुष सूक्त जो ऋग्वेद के अंत में प्रकाशित हुआ, को वंशानुगत जाति व्यवस्था के समर्थन हेतु प्रकाशित किया गया। कहने का अभिप्राय यह है कि पुरुष सूक्त के अलावा ऋग्वेद में कहीं भी शूद्र शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। कुछ विद्वानों का मानना है कि पुरुष सूक्त वैदिक काल का एक संयोजन था जो एक दमनकारी और शोषक वर्ग की संरचना वर्ग के पहले से ही अस्तित्व में होने को निरूपित व वैध बनाने हेतु लिखा गया था। यद्यपि पुरुष सूक्त में क्षत्रिय शब्द का प्रयाग नहीं हुआ है परंतु इसमें राजन शब्द का प्रयोग हुआ है, राजन शब्द उस समय के राजा के लिए प्रयोग हुआ जो समाज के विशिष्ठ वर्ग के रूप में स्थापित हो गए थे और वैदिक काल के अंतिम चरण में राजन शब्द को क्षत्रिय शब्द में स्थपित कर दिया गया। शतपथ ब्राह्मण में क्रम में ब्राह्मण, वैश्य, क्षेत्रीय व शूद्र है पर वर्तमान ब्राह्मण वादी परंपरा का वर्ण क्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र है पर बौद्ध कालीन परंपरा में क्षत्रिय उत्कृष्ठ वर्ग माना गया। परन्तु राजपूत काल (आठवी से बारहवीं शताब्दी) में भारतीय उप महादीप में वर्ण व्यवस्था का ऐसा चरण आया जहां राजनीतिक विकेंद्रीकरण के बीच में गहन और बहुआयामी परिवर्तन हुए। इस काल में जातिय संरचना में कठोरता के साथ साथ सामाजिक गतिशीलता देखी गई और ब्राह्मणों की सर्वोच्चता स्थापित हुई। ब्राह्मण वर्ग को राजदरबारों का सहारा मिला और वे धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभाने लगे।

हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अनुसार वैश्य समुदाय वर्णाश्रम का तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस समुदाय को लक्ष्मी पुत्र माना जाता है वैश्य समाज का प्राचीन काल से वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत मेगास्थनीज ने वैश्य समाज की विरासत की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि देश में भरण-पोषण के प्रचुर साधन तथा उच्च जीवन स्तर अद्भुत विकास वैश्यों के कारण है, वणिकों की आश्चर्यजनक प्रतिभा का प्रथम दिग्दर्शन हमें हड़प्पा और मोहन जोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हो गया था। उस काल में वैज्ञानिक ढंग से बनाए गए व्यवस्थित नगर संसार में और कही नहीं है। भारत के वणिकों ने चीन, मिस्र, यूनान तथा दक्षिण अमेरिका आदि देशों में जाकर न केवल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाया बल्कि उन देशों की अर्थव्यवस्था को सुधारा। ईसा से 200 वर्ष पूर्व कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड आदि देशों में जाकर बस गए, वहां उनके द्वारा बनवाए गए उस काल के सैकड़ों मंदिर आज भी विद्यमान हैं। वणिकों ने भारतीय धर्म दर्शन और विज्ञान से संबंधित लाखों ग्रंथों का अनुवाद करवाया जो आज भी वहां उपलब्ध है।

हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था में शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था जिसका कार्य मुख्य रूप से अन्य तीन वर्णों की सेवा करना था। शूद्रों का स्थान और उनके कर्तव्यों का वर्णन शास्त्रों में विशिष्ठ रूप से वर्णित है। शूद्रों का हिन्दू समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था क्योंकि श्रम और सेवा के माध्यम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था। पर भारतीय समाज में एक वर्ण और आया जो अछूत या बहिष्कृत कहा गया। कुछ लोग उसे शूद्र के साथ ही मानते हैं परन्तु हिंदू वर्ण व्यवस्था में शूद्रों और अछूतों में बहुत अंतर है। वे पंच वर्ण के रूप में माने जाते हैं, राजनीतिक तौर पर वे हिंदू धर्म का हिस्सा माने जाते हैं पर सामाजिक तौर पर वे कहीं भी स्वीकार्य नहीं है। उत्तर वैदिक काल में शूद्रों की स्थिति अछूतों से बेहतर थी। शूद्र समाज की सेवा करते हुए समझ के अन्य वर्णों के साथ उठ-बैठ सकते थे पर अछूतों को समाज से बाहर ही माना जाता रहा है और मनु ने चौथे वर्ण शूद्र को तीन वर्णों की सेवा का दायित्व सौंपा और मनु की दंड न्याय प्रकृति आदि के प्रसंगों में शूद्रों के प्रति असमानता पूर्ण व्यवहार को मान्यता दी पर अछूतों से इनकी स्थिति बेहतर थी।

अछूतों की उत्पत्ति के विषय में प्रसिद्ध हिंदू विचारक व अर्थशास्त्री डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व पुनरुत्थान में खुलासा करते हुए कहते हैं कि आज के अछूत/दलित पक्के हिन्दू थे और ब्राह्मण व क्षत्रिय थे पर मुहम्मद गोरी के द्वारा स्थापित सल्तनत काल और मुगल काल में जजिया के न देने और मुसलमानों के धर्म परिवर्तन के दबाव के आगे न झुकने के कारण इन्हें मैला साफ करने और मरे हुए पशुओं को ढोने और उनकी खाल उतारने और उनका मांस खाने को मजबूर कर दिया गया और बाद में वे उन्हीं हिंदुओं द्वारा उपेक्षित और घृणा का शिकार होते रहे और आज भी हो रहे हैं और आज भी हिंदू समाज में चूड़ा चमार गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है। पर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आंबेडकर सहित अनेक समाज सुधारकों द्वारा इनकी मुक्ति के लिए प्रयास किए जाने लगे, वो अलग बात है कि अपनी फूट डालो और राज करो की नीति के तहत ब्रिटिश इंडिया सरकार द्वारा इनके लिए अलग निर्वाचन मंडल की व्यवस्था दी गई और यदि डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच पूना पैक्ट नहीं हुआ होता तो पाकिस्तान की तरह भारत का एक और विभाजन हो गया होता पर दुर्भाग्य से स्वयंभू सनातन के झंडा बरदार समझने वालों द्वारा गांधी और आंबेडकर दोनों का विरोध किया जा रहा है। कहीं बापू को राष्ट्रपिता कहने पर विरोध हो रहा है और कहीं आंबेडकर को संविधान निर्माता कहने पर विरोध किया जा रहा है।

देश के हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है और विभिन्न पंथों को मानने वाले लोगों की अलग-अलग पूजा पद्धति है। हिन्दू देश का राष्ट्रीय धर्म है और विभिन्न पूजा पद्धति मानने वाले पंथ इसकी शाखाएं हैं, इसलिए इन्हें मुसलमानों और अछूतों (पंच वर्ण) को भी हिंदुत्व का हिस्सा मानना होगा और तभी एक स्वस्थ और सुदृढ़ हिंदुस्तान का निर्माण हो सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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