शुक्रवार, 24 मार्च 2017

योगी के आने से ‘सेकुलरिये’ सकते में

श्याम कुमार

आजादी के बाद अब तक एक ओर भ्रष्टाचारियों एवं घोटालेबाजों की चांदी रही है तो दूसरी ओर कट्टरपंथी मुसलमानों एवं फर्जी सेकुलरवादियों की। देश में अब तक इन्हीं लोगों का तुश्टीकरण एवं संरक्षण होता रहा है। यह तुष्टीकरण एवं संरक्षण भी भ्रश्टाचार ही था। मजहब के आधार पर नागरिकों में भेदभाव करना व हक मारना अन्याय है तथा यह अन्याय भ्रश्टाचार का दूसरा रूप है। योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से कट्टरपंथी मुसलमान एवं फर्जी सेकुलरिए सकते में हैं। उनमें खलबली मची हुई कि यह क्या हो गया? नेहरू वंश के नेतृत्व में कांग्रेसी षासन हिन्दुओं के लिए काला अध्याय रहा है। उस दौर में हिन्दुओं को दूसरे दर्ज का नागरिक बना दिया गया था। अब तक कट्टरपंथी मुसलमान एवं फर्जी सेकुलरिए ही हावी रहे हैं तथा वे प्रथम श्रेणी के नागरिक बने हुए थे। वे दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं, क्योंकि दोनों की भाशा एवं नीयत एक है-हिन्दुत्व एवं भारतीय संस्कृति का विरोध। फर्जी सेकुलरियों में नकली वामपंथियों, नकली समाजवादियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों आदि की जमातें षामिल हैं। 

हाल में ‘आप की अदालत’ में रजत शर्मा ने योगी आदित्यनाथ पर ‘मुकदमा’ चलाया था, जिसमें योगी से बड़े तीखे सवाल पूछे गए थे। रजत शर्मा ने पूछा था कि गोरखपुर में कतिपय मुहल्लों के मुसलिम नामों को क्यों बदल दिया गया है, जैसे अलीनगर का नाम आर्यनगर, मियां बाजार का नाम माया बाजार आदि। योगी ने उत्तर में कहा था कि ये जो बदले हुए नाम हैं, वे वस्तुतः उन मुहल्लों के मूल एवं असली नाम थे, जिन्हें मुसलिम षासनकाल में बदल दिया गया था। अतः जब उस समय नाम बदले जाने पर आपत्ति नहीं की गई तो अब भी आपत्ति नहीं की जानी चाहिए। इसी प्रकार एक अन्य प्रश्न के उत्तर में योगी आदित्यनाथ ने आंकड़े देकर बताया था कि जो हिन्दू बहुल इलाके हैं, वहां हिन्दुओं से मुसलमानों को किसी प्रकार का कश्ट नहीं मिलता है। लेकिन जिन क्षेत्रों में मुसलमानों का प्रतिशत अधिक होता है, वहां फसाद होते हैं तथा हिन्दुओं का चैन से रहना मुश्किल होता है। जहां मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक होती है, वहां दंगे होते हैं तथा हिन्दुओं को उत्पीडि़त कर वह इलाका छोड़ने को विवश किया जाता है। योगी आदित्यनाथ की बात बिलकुल सही है तथा उत्तर प्रदेश के अनेक हिस्सों में हिन्दू आबादी वाले मुहल्ले धीरे-धीरे मुसलिम आबादी वाले मुहल्ले हो गए हैं। 

हिन्दू को विश्वास नहीं हो रहा है कि अब उसे आजादी मिल गई है। पिछले आठ सौ साल से गुलामी झेलते-झेलते उसकी गुलाम बने रहने की आदत पड़ गई थी। पहले मुसलिम हमलावरों ने गुलाम बनाया। चूंकि हिन्दू स्वभाव से अतिउदार एवं अतिसहिश्णु होता है, इसलिए बार-बार धोखा खाकर भी क्षमा करना उसकी प्रवृत्ति होती है। इसी से क्षमा करने के सिद्धांत के पुरोधा महात्मा गांधी ने भी झुंझलाकर कह दिया था कि हिन्दू कायर कौम है। न्यायमूर्ति अब्दुल करीब छागला हिन्दू को चरित्र से सेकुलर एवं न्यायप्रिय मानते थे। वास्तविकता यही है कि हिन्दू धर्म वास्तविक रूप में सेकुलरवादी, अर्थात पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत का अनुयायी है। सम्पूर्ण हिन्दू दर्शन में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का सिद्धांत निहित है। यह दर्शन ‘न्याय सबके साथ, अन्याय किसी के साथ नहीं’ सिद्धांत का प्रतिपादक है। भारतीय जनता पार्टी ने इसी आदर्श को ग्रहण कर अपना सिद्धांत बनाया है-‘सबका साथ, सबका विकास’। नरेंद्र मोदी षुरू से कह रहे हैं कि उनका लक्ष्य समस्त सवा सौ करोड़ देशवासियों का कल्याण एवं विकास करना है। इन सवा सौ करोड़ में हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि सभी धर्मावावलम्बी शामिल हैं। देश के सभी लोगों का कल्याण एवं समस्त क्षेत्रों का विकास नरेंद्र मोदी का ऐसा लक्ष्य है, जो देश को पुराना गौरव वापस दिलाएगा तथा हमारा देश पुनः ‘सोने की चिडि़या’ बन सकेगा।

अपने उदार स्वभाव के कारण ही हिन्दू भारत ने तमाम विदेशियों को अपने यहां शरण दी और उनका अस्तित्व समाप्त होने से बचाया। यहूदी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। आज विश्व में यहूदियों का जो अस्तित्व बचा हुआ है, वह सिर्फ हिन्दू भारत के कारण है। भारत ने ही उन्हें षरण देकर नश्ट होने से बचाया था। पारसियों के बारे में भी यही बात लागू होती है। षकों व हूणों को भारतीय समाज ने ऐसा आत्मसात किया कि वे अलग नहीं रह गए। लेकिन मुसलिम हमलावरों एवं अंग्रेजों के मामले में भारतीयों की उदारता आत्मघाती सिद्ध हुई। दोनों ने हमारी उदारता एवं सदाशयता का फायदा उठाकर हमें अपना गुलाम बना लिया और लगभग आठ सौ साल तक हमें उनकी गुलामी झेलनी पड़ी। विदेशी मुसलिम हमलावरों के बाद अंग्रेजों की गुलामी झेली और जब उनसे मुक्ति मिली तो हिन्दू नेहरू वंश के नेतृत्व वाले कांग्रेसी राज में कट्टरपंथी मुसलमानों एवं फर्जी सेकुलरियों की गुलामी के चंगुल में फंस गया। इन लोगों की जिद एवं कलह के कारण ही देश का वातावरण स्थायी रूप से अशांत बना हुआ है। ये लोग ‘न्याय सबके साथ, अन्याय किसी के साथ नहीं’ सिद्धांत के बजाय ‘हिन्दू के साथ अन्याय, मुसलमान के साथ पक्षपात’ सिद्धांत चाहते हैं। अयोध्या का ‘रामजन्मभूमि प्रकरण’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। 

हिन्दुओं की मान्यता है कि अयोध्या भगवान राम की अवतार-स्थली है। इलाहाबाद उच्चन्यायालय द्वारा कराई गई जांच से सिद्ध हो गया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर विशाल मंदिर था, जिसे तोड़कर उस पर मस्जिद बना दी गई। किन्तु कट्टरपंथी मुसलमान एवं फर्जी सेकुलरिए वहां जबरदस्ती विवाद खड़ा किए हुए हैं। यदि सामान्य मंदिर की बात होती तो उसे वहां से अन्यत्र हटाया जा सकता था। लेकिन उस स्थल का रामजन्मभूमि होने का महत्व है। इसी प्रकार चूंकि वहां मुसलमानों के लिए मस्जिद का कोई विशिष्ट महत्व नहीं है, इसलिए उसे वहां के बजाय अन्यत्र बनाया जा सकता है। लेकिन कट्टरपंथी मुसलमानों एवं सेकुलरियों ने जानबूझकर ‘बाबरी मसजिद विवाद’ खड़ा कर दिया और देश की शांति नष्ट कर दी। यदि वहां रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण हो जाने दिया जाता तो उससे हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच स्थायी रूप से सौहार्द एवं प्रेमभाव स्थापित किया जा सकता था।         


मेरी पत्रकारिता के छप्पन वर्ष

श्याम कुमार

गत 2 नवम्बर, 2016 को मेरी पत्रकारिता का 57वां वर्ष आरम्भ हो गया। अर्थात आधी षताब्दी से भी अधिक समय हो गया है। इसी प्रकार 10 नवम्बर, 2016 से मेरी उम्र का 76वां साल षुरू हुआ है। मैं बीस वर्ष का था, जब पत्रकारिता में आया था। आज भी मुझे वह दिन याद है, जब 2 नवम्बर, 1961 को मैंने इलाहाबाद के लीडर प्रेस परिसर में पहली बार कदम रखा था। वहां से देश के दो सुविख्यात राष्ट्रªीय समाचारपत्र ‘भारत’ व ‘लीडर’ प्रकाशित होते थे। ‘भारत’ के नित्य कई संस्करण प्रकाशित होते थे तथा अनेक राज्यों में अखबार का व्यापक प्रसार था। लीडर प्रेस परिसर में ‘भारती भंडार’ नामक प्रसिद्ध प्रकाशन-केंद्र भी था, जहां से प्रायः सभी महान साहित्यकारों की पुस्तकें प्रकाशित होती थीं। उस समय इलाहाबाद पूरे देश का केंद्र-विंदु था तथा शिक्षा, विधि, पत्रकारिता, सांस्कृतिक कार्यकलापों, राजनीति आदि का देश का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता था। जिस दिन मैंने पत्रकारिता में कदम रखा, उस दिन से मेरा जीवन अपना नहीं रहा तथा पूरी तरह पत्रकारिता को समर्पित हो गया। मुझे केवल सोने का समय मिल पाता था, शेष कोई भी समय अपना नहीं था। पारिवारिक परम्परा के अनुसार समाजसेवा के कार्याें में भी बहुत रुचि थी। 1961 में ही जनवरी में अखिल भारतीय सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं समाजसेवी संस्था ‘रंगभारती’ की स्थापना की, जिसके कार्यकलापों की लम्बी श्रृंखला बन गई। ‘रंगभारती’ ने 1961 में इलाहाबाद के परीभवन में देश का पहला हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया तथा अन्य अनेकानेक कार्यक्रमों की पहली बार नींव डाली। 

दैनिक ‘भारत’ के प्रधान सम्पादक शंकर दयालु श्रीवास्तव मेरे पिता जी के मित्र थे तथा मेरे यहां उनका आना होता था। लेकिन मेरी उनसे कभी भेंट नहीं हुई थी। मैं जब हाईस्कूल में था, तभी से मेरी भाशा पूर्णरूपेण मंज चुकी थी तथा अर्धविराम तक की त्रुटि नहीं होती थी। मैं दैनिक ‘भारत’ में ‘पाठकों के पत्र’ स्तम्भ में पत्र लिखा करता था, जिससे प्रधान सम्पादक शंकर दयालु श्रीवास्तव प्रभावित थे। अचानक पिताजी का देहावसान होने के बाद उन्होंने मुझे ‘भारत’ में बुला लिया। उसी वर्ष मैंने एमए किया था। ‘भारत’ में मुझे अपने वरिश्ठों से पत्रकारिता का अत्यंत कठोर प्रशिक्षण मिला। मैंने अपने जीवन में डाॅ. धर्मवीर भारती एवं हेरम्ब मिश्र से अधिक योग्य पत्रकार आजतक नहीं देखे। हेरम्ब मिश्र मेरे वरिष्ठ थे। अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी अरविंद नारायण मिश्र के बाबा बाबूराम मिश्र भी मेरे वरिश्ठ सहयोगी थे। शंकर दयालु श्रीवास्तव उच्चकोटि के सम्पादक थे तथा उनका बड़ा नाम था। दैनिक ‘भारत’ में वरिश्ठों ने मुझे सीख दी कि पत्रकार के लिए देशहित सबसे बड़ा होना चाहिए। पत्रकारिता भाव, भाशा एवं अभिव्यक्ति का मिश्रण है, यह मेरा सिद्धांत बन गया। मेरे परिवार के अन्य लोग भी पत्रकार हैं तथा हम सबने हमेशा ईमानदारी, आदर्श एवं उच्चकोटि की पत्रकारिता की।

मैं बहुत सम्पन्न घर का था तथा मैंने अपने माता-पिता को हमेशा देते देखा, कभी लेते नहीं देखा। हमारे घर में अनेक रिश्तेदारों के लड़कों को षरण मिली, जिनका अच्छा भविष्य मेरे माता-पिता ने बनाया। उन्हें पढ़ाया और नौकरी लगवाई। दर्जनों गरीब कन्याओं का विवाह कराया। धीरे-धीरे हमारे घर की सम्पन्नता परोपकार की वेदी पर बलि चढ़ती गई। गांव में करोड़ों की जायदाद थी, जिसकी जानकारी पिताजी को ही थी तथा वही देखभाल के लिए वहां जाया करते थे। चकबंदी नहीं हुई थी, अतः उनका अचानक देहांत हो जाने से उस सम्पत्ति का पता ही नहीं लग पाया। माता-पिता से परोपकार एवं समाजसेवा के संस्कार मुझे भी मिले, जो नशे की तरह मुझमें समा गए तथा ‘घर फूंक तमाशा देख’ सिद्ध हुए। मेरी सारी कमाई उनमें खर्च होती गई। सरकार से मुझे कभी मदद नहीं मिली। मैंने तमाम लड़कों की नष्ट हो रही जिंदगी बचाकर उन्हें अच्छी जिंदगी दी और उज्ज्वल भविष्य बनाया। किन्तु किसी ने एहसान नहीं माना और कुछ ने तो न केवल बहुत क्षति पहुंचाई, बल्कि प्राणलेवा वेदनाएं दीं। केवल एक व्यक्ति ऐसा है, जिसने एहसान माना। वह व्यक्ति एक भिक्षा मांगने वाले का पुत्र था, जो मेरी मदद पाकर डाॅक्टर बन गया और अब अत्यंत वरिश्ठ डाॅक्टर है। 

लीडर प्रेस सुविख्यात उद्योगपति घनश्याम दास बिरला का था तथा उतना विशाल परिसर देश के किसी समाचारपत्र के पास नहीं था। उसमें पत्रकारों के लिए आवासीय बंगले भी बने हुए थे। उस समय मेरा दिल्ली, मुम्बई व अन्य महत्वपूर्ण नगरों में प्रायः जाना होता था तथा सभी जगह अखबारों में पत्रकारों व सम्पादकों से मेरी घनिष्ठता थी। जितने अधिक योग्य पत्रकार ‘भारत’ में थे, उतने कहीं भी नहीं थे। हेरम्ब मिश्र, कुसुम कुलश्रेष्ठ, कृष्ण बिहारी श्रीवास्तव पत्रकारिता के बेजोड़ रत्न थे। वहां विश्वम्भर नाथ जिज्जा थे, जो पत्रकारिता ही नहीं, पुरानी राजनीतिक गतिविधियों के भी जीवंत इतिहास थे। हिन्दी की पहली कहानी उन्होंने लिखी थी। जब मैं ‘भारत’ परिवार में षामिल हुआ, जिज्जा जी 75 वर्ष के थे तथा स्वभाव के बड़े कड़क थे। मजाल नहीं था कि कोई नया पत्रकार टेलीप्रिंटर छू ले। लेकिन ‘भारत’ में अधिकांश पत्रकार घोर अर्थाभाव में थे। मैं सम्पन्न परिवार का था, इसलिए उस गरीबी को देखकर दहल गया था। उस समय अधिकांश समाचार ‘पीटीआई’ व ‘यूएनआई’ से टेलीप्रिंटर पर अंग्रेजी में आते थे। ‘हिन्दुस्थान समाचार’ व ‘नाफेन’ आदि समाचार हिन्दी में भेजते थे, किन्तु उनकी मात्रा नगण्य थी। सम्पादकीय मेज पर हर पत्रकार को नित्य अंग्रेजी से हिन्दी में चार काॅलम समाचार अनुवाद करना होता था। 

‘भारत’ में अधिकांश सहयोगी कठोर परिश्रमी थे। सामान्य ड्यूटी में कठिन परिश्रम करने के बाद आर्थिक लाभ के लिए वे ‘डबल ड्यूटी’ किया करते थे। जब मैं वहां नया था तो एक दिन मेरे वरिष्ठ सहयोगी गणेश भारती मुझे अनुवाद के लिए थोक में समाचार देते जा रहे थे। मैं बोल पड़ा कि इतनी मेहनत करने पर मर जाऊंगा तो भारती जी ने उत्तर दिया-‘मेहनत करने से कोई नहीं मरता’। उनका वह वाक्य मैंने आत्मसात कर लिया और अस्वस्थता में भी जब तक बिलकुल मजबूर न हो जाऊं, मैं सारे कार्य पूर्ववत करता रहता हूं। पत्रकारिता में मेरी लगन, परिश्रम एवं समर्पण का ही फल है कि मुझे निकट से जानने वाले जो थोड़े लोग बचे हैं, वे आज भी मेरे योगदान को अद्भुत मानते हैं और भूरि-भूरि सराहना करते हैं। मैं हमेशा जनजीवन से निकट रूप में जुड़ा रहा, इसीलिए आम जनता में मुझे सदैव भरपूर सराहना मिली तथा मेरी छप्पन-वर्षीय पत्रकारिता में वही सराहना मेरा सबसे बड़ा सम्मान सिद्ध हुई।

रिक्शे वाले ने योगी की भविष्यवाणी की

श्याम कुमार
उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता कल्याण सिंह, जो वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल हैं, जब भी लखनऊ आते हैं तो पूरे उत्तर प्रदेश से उनसे मिलने आने वालों का उनके आवास पर तांता लग जाता है। हर तरह के लोग आते हैं, इसलिए प्रायः रोचक अनुभव भी होते हैं। ऐसा ही एक अनोखा अनुभव गत सात मार्च को हुआ था, जो उस समय अनोखा नहीं लगा था। कल्याण सिंह कक्ष में सोफे पर बैठे थे, जिनके बगल में मैं बैठा हुआ था। बड़ा कक्ष आगंतुकों से भरा हुआ था। बुलंदशहर से आए वहां के पूर्व-विधायक डाॅ. सतीश शर्मा पास के सोफे पर बैठे थे। तभी उन्होंने अपना एक अनुभव सुनाया। उन्होंने बताया कि गत वर्ष जनवरी में कल्याण सिंह के जन्मदिन के अवसर पर वह लखनऊ आए थे। एक दिन जब वह कल्याण सिंह के आवास से लौट रहे थे तो उन्हें उनके आवास के पास माल एवेन्यू में ही एक रिक्शेवाला मिल गया था। रिक्शेवाला हट्टा-कट्टा था और उसने समझ लिया था कि डाॅ. शर्मा कल्याण सिंह से मिलकर आए हैं। रिक्शा चलाते हुए वह रिक्शावाला बातें करने लगा। उसने बताया कि पांच वर्ष पूर्व उसने भविष्यवाणी कर दी थी कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। उस समय जब उसने भविष्यवाणी की थी, लोग उसकी बात पर हंसे थे। लेकिन उसका कथन सच हुआ। रिक्शेवाले ने डाॅ. सतीश शर्मा से कहा कि अब उसकी भविष्यवाणी है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा-चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को तीन सौ से अधिक सीटें मिलेंगी, महंत योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनेंगे तथा कल्याण सिंह देश के राष्ट्रपति होंगे।
डाॅ. सतीश शर्मा ने बताया कि पहले तो उन्होंने रिक्शेवाले की बातों पर अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उसने मोदी के बारे में जो भविष्यवाणीवाणी की, वैसा दावा तो बाद में अन्य लोग भी करने लगे थे। मुझे याद आया, मेरा स्टेनो कई वर्शाें से लगातार मुझसे कहता था कि मोदी प्रधानमंत्री बन जाएं, तभी इस देश का उद्धार होगा। चूंकि उस समय कांग्रेसियों, कट्टरपंथी मुसलमानों एवं फर्जी सेकुलरियों ने देश-विदेश में मोदी के विरुद्ध इतना अधिक दुश्प्रचार कर डाला था कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकेंगे, यह बात किसी के भी गले नहीं उतरती थी।
डाॅ. सतीश शर्मा ने कहा कि भाजपा तीन सौ से अधिक सीटें जीतेगी, रिक्शेवाले की इस बात को भी उन्होंने कोई महत्व नहीं दिया। कारण यह कि उस समय सभी पार्टियां तीन सौ से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थीं तथा बड़ी संख्या में लोगों का यह भी मानना था कि किसी पार्टी को बहुमत नहीं प्राप्त होगा। लेकिन रिक्शे वाले की अन्य दो भविष्यवाणियों पर वह चैंके। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए महंत योगी आदित्यनाथ की चर्चा कभी-कभी उड़ जाती थी, लेकिन उस चर्चा को कोई महत्व नहीं दिया जाता था। मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा में अन्य लोगों के नाम अधिक चर्चित थे। इसी प्रकार राष्ट्रªपति पद के लिए कल्याण सिंह के नाम की दूर-दूर तक कहीं चर्चा नहीं थी। डाॅ. सतीश शर्मा ने बताया कि उन्होंने रिक्शेवाले से कहा कि यदि उसकी कल्याण सिंह वाली भविष्यवाणी सत्य हुई तो वह उसे एक ई-रिक्शा भेंट करेंगे। उन्होंने रिक्शेवाले से उसका नाम व पता पूछा तो उसने बताया कि वह बनारसी के नाम से मशहूर है और ‘सहारा’ के पास रहता है।
कल्याण सिंह की मौजूदगी में गत सात मार्च को जब डाॅ. सतीश शर्मा ने यह बात बताई थी तो वहां मौजूद सभी लोग इस बात से तो सहमत थे कि कल्याण सिंह राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त पात्र हैं, किन्तु यह कथन इसलिए सच होने की संभावना नहीं है कि उस पद के लिए पहले से ही लालकृश्ण आडवाणी, डाॅ. मुरली मनोहर जोशी, सुमित्रा महाजन, वेंकैया नायडू आदि नाम चर्चित हैं। कल्याण सिंह ने भी ऐसी किसी संभावना से इनकार किया। गत दिवस कल्याण सिंह के यहां डाॅ. सतीश शर्मा पुनः मिल गए तो मुझे उनकी बातें याद आ गईं। चुनाव-परिणाम घोशित होने से पहले सात मार्च को कल्याण सिंह के यहां उन्होंने रिक्शेवाले की जो यह भविष्यवाणीी बताई थी कि भाजपा को तीन सौ से अधिक सीटें मिलेंगी, वह पूरी तरह सही निकली। भाजपा को 325 सीटें मिल जाने का चमत्कार हुआ। यदि कल्याण सिंह राष्ट्रªपति न बनें तो भी रिक्शेवाले की योगी एवं भाजपा के बारे में डाॅ. शर्मा के सामने की गई भविष्यवाणी तो सत्य सिद्ध हुई ही। डाॅ. सतीश शर्मा ने गत सात मार्च को जब कल्याण सिंह के सामने रिक्शेवाले की भविष्यवाणी की चर्चा की थी, उस समय तक न तो चुनाव-परिणाम घोषित हुए थे और न मुख्यमंत्री पद के लिए योगी के नाम की चर्चा थी।   
गत दिवस जब मैं कल्याण सिंह के यहां पहुंचा तो वह जयपुर प्रस्थान करने के लिए भीतर तैयार हो रहे थे। अन्य लोगों के साथ मैं भी कक्ष में बैठ गया। कल्याण सिंह का पौत्र संदीप सिंह प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री हो गया है, अतः उससे मिलने वाले भी आ रहे थे। तभी सिटी माॅन्टेसरी स्कूल के संस्थापक जगदीश गांधी एक बड़ा पिटारा लिए हुए अपनी पुत्री एवं नाती के साथ कल्याण सिंह से मिलने आ गए। वे लोग संदीप सिंह से मिले और कल्याण सिंह की प्रतीक्षा करने लगे। जगदीश गांधी की पुत्री जब संदीप सिंह से निरंतर अंग्रेजी में ही बात करने लगी तो लोगों को उसके इस अंग्रेजी-प्रेम का बुरा लगा।
 जगदीश गांधी ने बताया कि उसके बच्चों ने अलग-अलग देश के लोगों से षादी की है। जगदीश गांधी के बारे में अकसर चर्चा हुआ करती है कि उनके स्कूलों में नेता, पत्रकार एवं अधिकारीगण अपने बच्चों को प्रवेश दिलाते हैं, इसलिए जगदीश गांधी उन सभी पर अपना भारी प्रभाव रखते हैं। यह भी चर्चा होती है कि  शिक्षण-संस्थाओं में गरीब बच्चों को प्रवेश दिलाने का सरकार द्वारा जो निर्धारित कोटा है, उस पर जगदीश गांधी ने अपनी शिक्षण-संस्थाओं में अमल नहीं किया और उस आदेश के विरुद्ध सर्वाेच्च न्यायालय तक लड़ने चले गए। लेकिन वहां उन्हें हार मिली। बताया जाता है कि सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद जगदीश गांधी ने अपनी शिक्षण-संस्थाओं में गरीब बच्चों के कोटे वाले आदेश पर अमल नहीं किया है। इस पर लोग तुलसीदास की यह पंक्ति याद करते हैं-‘समरथ को नहि दोश गोसाईं’।

नई स्वास्थ्य नीति का स्वागत कीजिए

 

अवधेश कुमार

नरेन्द्र मोदी सरकार की नई स्वास्थ्य नीति का पहली नजर में स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि इस स्वास्थ्य नीति में कई ऐसी बातें हैं जिनमें ज्यादा स्पष्टता जरुरी है, लेकिन इस नीति में सरकार की यह आत्मस्वीकृति कि लोगों को मुफ्त उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करना तथा लोग बीमार न पड़े ऐसा वातावरण बनाना सरकार की जिम्मेदारी है अपने आपमें महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य किसी भी देश की प्राथमिकता में होनी चाहिए। जिस देश के लोग जितने स्वस्थ होंगे वह देश उतना ही सक्षम होगा। एक रोगमुक्त और स्वस्थ देश ही दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा कर आगे निकल सकता है। बीमार और रोगियों से भरी आबादी वाला देश कहां से प्रतिस्पर्धा कर सकता है। दुर्भाग्य से भारत में स्वास्थ्य कभी प्राथमिकता में नहीं रहा। स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने संसद में नई स्वास्थ्य नीति का मसौदा रखते वक्त जो वक्तव्य दिया तथा मसौदे में जितने विन्दु डाले गए हैं उनकी ध्वनि यही है कि भारत ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता में लेने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। यह एप्रोच महत्वपूर्ण है और शेष पहलू बाद में आते हैं। हालांकि हमारे यहां स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और केन्द्र कोई नीति बनाती है तो उसे लागू करने की अनिवार्यता राज्यों की नहीं होती। इस नीति में यह साफ किया गया है कि राज्यों को इसे स्वीकार करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा। उन्हें एक मॉडल के रुप में इसे दिया जाएगा और यह उन पर निर्भर है कि इसे लागू करें या नहीं।

किंतु एक बार राष्ट्रीय स्तर पर कोई नीति बने और उसे सरकार क्रियान्वित करने लगे तो आलसी और पलायनवादी राज्यों के पास भी इसे या इसी तरह की नीतियां अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। वास्तव में भारत को एक राष्ट्ीय स्वास्थ्य नीति की बड़ी आवश्यकता थी। इसके पूर्व 2002 में एक स्वास्थ्य नीति आई थी। यानी यह नीति 15 वर्षों बाद आई है। इसे मंत्रिमंडल द्वारा हरि झंडी मिलने के पहले सार्वजनिक कर लोगों का सुझाव मांगा गया था। जे. पी. नड्डा की मानें तो जितने सुझाव आए उन सबका अध्ययन कर जितना संभव हुआ इसमें समाहित करने की कोशिश की गई है। इस तरह यह एक प्रकार से राष्ट्रीय सहमति से तैयार नीति है। हालांकि नीति में स्वास्थ्य को सूचना अथवा भोजन के अधिकार की तरह अधिकार बनाने को लेकर चर्चा नहीं है और इससे उन लोगों को निराशा हो सकती है जो इसे मौलिक अधिकार बनाने की मांग कर रहे थे। लेकिन प्रस्ताव में स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने का प्रावधान है और यह उसके निकट जाता है। इस नीति का उद्देश्य सभी लोगों विशेषकर अल्पसेवित और उपेक्षित लोगों को सुनिश्चित स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध कराना है और यह सिद्धांत बिल्कुल उचित है।  इसमें देशभर के सरकारी अस्पतालों में दवाइयां और रोंगों की जांच के सभी साधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में डिजिटलाइजेशन पर भी जोर दिया जाएगा। हमने देखा है कि जिन अस्पतालों का डिजिटलाइजेशन हुआ है वहां मरीजांे के लिए डॉक्टर से समय लेना पहले से ज्यादा आसान हो गया है। सरकार पहले से ही इस नीति पर काम कर रही है तथा अनेक अस्पताल डिजिटलाइजेशन के दायरे में आ रहे हैं। डिजिटलाइजेशन का मतलब है ऐसी स्थिति जिसमें मरीज जहां चाहे अपने जांच व इलाज का पूरा विवरण कम्प्युटर या मोबाइल पर ऑन लाइन देख सके।

नई स्वास्थ्य नीति के तहत कहा गया है कि हर किसी को सरकारी इलाज की सुविधा मिलेगी और मरीज को इलाज के लिए मना नहीं किया जा सकेगा। नीति में मरीजों के लिए बीमा का प्रावधान है। अब मरीजों को विशेषज्ञों से इलाज के लिए सरकारी या निजी अस्पताल में जाने की छूट होगी। स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत निजी अस्पतालों को ऐसे इलाज के लिए तय रकम दी जाएगी। यानी नए अस्पताल बनाने में लगने वाले धन को सीधे इलाज पर खर्च किया जा सकेगा। ध्यान रखिए, इस समय देश में 80 प्रतिशत मरीज इलाज के लिए निजी डॉक्टरों के पास जाते हैं तथा करीब 60 प्रतिशत निजी अस्पताल में ही भर्ती होते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि निजी क्षेत्र भारत मेें स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों से काफी आगे हैं। सरकार का मानना है कि इसे पूरी तरह सरकारी क्षेत्र में ले आने की कल्पना अव्यावहारिक होगा। साथ ही स्वास्थ्य सुविधाओं की जितनी आवश्यकताएं हैं उतना सरकारी ढांचा खड़ा करना भी संभव नहीं है। इसलिए व्यावहारिक विकल्प यही है कि निजी क्षेत्र को भी सरकारी सेवा में शामिल किया जाए एवं उनका भुगतान किया जाए। इस पहलू की भी वे लोग आलोचना कर रहे हैं, जो निजी क्षेत्र के विरोधी हैं। लेकिन कम से कम निजी डॉक्टरों या अस्पतालों में जाने वाले लोगों की जेब पर इसका असर कम होगा और इस नाते यह अच्छा कदम है। जैसा हमने उपर कहा सरकार की योजना बीमा राशि से भुगतान कराने को लेकर है। देखना होगा यह कितना सफल होता है, क्योंकि इसके तहत सभी व्यक्तियों का स्वास्थ्य बीमा कराना होगा।

अगर गहराई से देखें तो यह स्वास्थ्य क्षेत्र मंें आमूल नहीं तो व्यापक बदलाव की नीति अवश्य है। पहला, इस नीति के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) का दायरा बढ़ा दिया गया है। अभी तक पीएचसी के तहत प्रतिरक्षण, जन्म से पूर्व की जांच और कुछ अन्य जांच ही शामिल थीं। नई नीति के अंतर्गत इसमें इसके अलावा अनेक रोगांे की जांच शामिल किया गया है जो गैर संचारी है। वास्तव में एक बड़े नीतिगत परितर्वन के तहत यह नीति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का स्तर एवं दायरे में आने वाले क्षेत्रों के फलक को बढ़ाती है और एक विस्तृत फलक सामने रखती है। दूसरे, इसमें जिला अस्पतालों के उन्नयन पर ज्यादा ध्यान देने की बात है। इसमें जिला अस्पताल और इससे ऊपर के अस्पतालों को सरकारी नियंत्रण से अलग करकेे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) यानी निजी सार्वजनिक भागीदारी से चलाया जाएगा। इस तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र के प्रवेश की नीति को नीचे तक ले जाने का कदम सरकार उठाने जा रही है। इसका परिणाम क्या होगा यह आने वाले समय में पता चलेगा। किंतु सरकार ने इस समय स्वास्थ्य संरचना को देखते हुए यह निर्णय लिया है।

यह काफी विस्तृत नीति है जिसको देखने से ऐसा लगता है इसमें स्वास्थ्य से जुड़े ज्यादातर या कुछ मायनों में सारे पहलुओं को शामिल किया गया है। नड्डा ने संसद में इसे पस्तुत करत समय कहा कि यह नीति बदलते सामाजिक-आर्थिक, प्रौद्योगिकीय और महामारी-विज्ञान परिदृश्य में मौजूदा और उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए अस्तित्व में लाया गया है। वास्तव में थोड़े शब्दों में कहना हो तो    नीति में स्वास्थ्य के सभी आयामों - स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं का प्रबंधन और वित्त-पोषण, विभिन्न क्षेत्रीय कार्रवाई के जरिए रोगों की रोकथाम और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, चिकित्सा प्रौद्योगिकियां उपलब्ध कराने, मानव संसाधन का विकास,चिकित्सा बहुलवाद को प्रोत्साहित करने, बेहतर स्वास्थ्य के लिए अपेक्षित ज्ञान आधार बनाने, वित्तीय सुरक्षा कार्यनीतियां बनाने तथा स्वास्थ्य के विनियमन और  स्वास्थ्य प्रणालियों को आकार देने में सरकार की भूमिका और प्राथमिकताओं को अपने में समेटे हुए है। अगर यह स्वास्थ्य नीति पूरी तरह अमल में आ गया तो हमारे यहां स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 2.5 प्रतिशत हो जाएगा। अभी यह 1.04 प्रतिशत है। तो खर्च के मामले में यह लंबी छलांग होगी। इसमें अनेक बीमारियों के उन्मूलन की समय सीमा तय की गई है। उदाहरण के लिए 2018 तक कुष्ठ रोग, 2017 तक कालाजार तथा 2017 तक लिम्फेटिक फिलारिएसिस का उन्मूलन करना तथा इस स्थिति को स्थायी रुप संे बनाए रखना शामिल है। इसी तरह इसमें टीबी यानी क्षयरोग के रोगियों में 85 प्रतिशत से अधिक की इलाज दर को प्राप्त करना और उसे बनाए रखना तथा नए मामलों की व्याप्तता में कमी लाना ताकि 2025 तक इसके उन्मूलन की स्थिति प्राप्त करने की बात की गई है। यही नहीं 2025 तक दृष्टिहीनता की व्याप्तता को घटाकर 25/1000 करना तथा रोगियों की संख्या को वर्तमान स्तर से घटाकर एक-तिहाई करना भी इसमें शामिल है। इसके अनुसार हृदवाहिका रोग, कैंसर, मधुमेह या सांस के पुराने रोगों से होने वाली अकाल मृत्यु को 2025 तक घटाकर 25 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य निर्धारित है। साथ ही     2025 तक पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर को कम करके 23,नवजात शिशु मृत्यु दर को घटाकर 16 तथा मृत जन्म लेने वाले बच्चों की दर को 2025 तक घटाकर एक अंक में लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।    

इस तरह कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नई स्वास्थ्य नीति एक समग्र नीति है। उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार इस नीति को पूरी तरह अमल में लाएगी तथा इसकी प्रस्तावना के अनुरुप उस वर्ग को इसका सम्पूर्ण लाभ मिलेगा जिनके लिए आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंचना संभव नहीं है। अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208   

 

 

           

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