बसंत कुमार
पिछले सप्ताह 8 नवंबर को भाजपा को फर्श से अर्श
तक पहुंचाने वाले एक अनुकरणीय व्यक्तित्व के धनी लाल कृष्ण आडवाणी जी का 98वां जन्म दिन था। आज वे सक्रिय राजनीति
से संन्यास ले चुके हैं शायद ही कोई नेता अब उनसे मिलने जाते हो। यद्यपि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम को अपने व्यस्त समय से समय निकालकर उनको जन्मदिन की
शुभकामनाएं देने उनके घर गए पर मेरी राय में भाजपा द्वारा उनके जन्मदिन पर पार्टी
के केंद्रीय कार्यालय से लेकर स्थानीय कार्यालयों में उनका जन्मदिन भाजपा संगठन को
मजबूत करने और उसे ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाली उनकी संगठन क्षमता के सम्मानार्थ एक
त्यौहार के रूप में मनाया जाना चाहिए था। आज हम आडवाणी जी के व्यक्तित्व राम जन्म
भूमि आंदोलन के नायक के रूप में और पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर
जाने वाले खलनायक के रूप में देखते हैं लेकिन उनके 60 साल के अधिक के बेदाग छवि वाले
सिद्धांतों की राजनीति करने वाले व्यक्तित्व की चर्चा नहीं करते।
कुछ लोग उन पर यह तंज कसते हैं कि वे देश के
प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन पाए। इसका उन्हें दुख तो है पर ऐसा सोचने वालों
को यह याद होना चाहिए कि जब राम मंदिर आंदोलन उफान पर था और लालकृष्ण आडवाणी उसके
अगुवा के रूप में उभर चुके थे और लोकप्रियता के शिखर पर थे, तब पार्टी में उनके कद को चुनौती देने वाला कोई व्यक्ति नहीं था। उस समय आने वाले
चुनावों में अटल बिहारी वाजपाई जी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का
उम्मीदवार घोषित करके अपने लिए पार्टी के संगठन को मजबूत करने का दायित्व चुना। वे कई बार कह चुके हैं
कि भाजपा एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक संस्कृति है और इसका सदस्य होना मेरे लिए
गर्व की बात है और पार्टी ने मुझे मेरी आकांक्षाओं से अधिक दिया। ऐसे वटवृक्ष के
व्यक्तित्व की हर छोटे बड़े कार्यकर्ता के सामने चर्चा होना जरूरी है। आज हम कुछ स्वार्थी
नेताओं के कारण हिंदू राष्ट्र बनाने की होड़ में अगड़ा-पिछड़े, सवर्ण-दलित की बहस में
पड़े हुए हैं पर आडवाणी जी नेतृत्व में चल रहे राम मंदिर आंदोलन में सभी जातियों
के लोग एक सैलाब की तरह उनके साथ थे और उन्होंने भाजपा को सवर्णों और व्यापारियों
की पार्टी की छवि से निकाल कर सर्व समाज की पार्टी बनाने में अभूतपूर्व सफलता पाई।
देश में 1993-94 के आस-पास हवाला कांड हुआ जिसमें जैन डायरी में कुछ
नेताओं का नाम होने के वजह से पूरा राजनैतिक माहौल खराब हो गया और कई नेताओं को
अपने अपने पदों से त्याग पत्र देना पड़ा। दिल्ली के सबसे लोकप्रिय नेता और प्रदेश के मुख्यमंत्री मदन लाल खुरान का नाम
उछलने से उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। यद्यपि बाद में वे बेदाग निकले पर उन्हें
दुबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली और दिल्ली का दुर्भाग्य रहा कि
मदन लाल खुराना के बाद दिल्ली को वैसा कर्मठ मुख्यमंत्री नहीं मिला। हवाला कांड
में लाल कृष्ण आडवाणी जी का भी नाम सामने आया और उन्होंने अपने पद से त्याग पत्र
दे दिया और सार्वजनिक जीवन में तभी लौटे जब वे पूरी तरह से बरी हो गए। यह है उनकी नैतिकता की
राजनीति जिसका उन्होंने जीवन पर्यंत पालन किया और पार्टी में इसका पालन करने पर
जोर दिया। वो लालकृष्ण आडवाणी जी ही थे जिनके कारण भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे
कर्नाटक के शक्तिशाली व कद्दावरों नेता येदुरप्पा को त्याग पत्र देना पड़ा, जब नितिन गडकरी जी को
दुबारा भाजपा का अध्यक्ष बनाने की बात आई। उसी समय उनके ऊपर उनकी कंपनियों को लेकर वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर कुछ खबरें
आई और आडवाणी जी के विरोध के कारण गडकरी जी भाजपा के दुबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए। यह थी आडवाणी जी की
स्वच्छ राजनीति के प्रति आस्था और संकल्प, इसके लिए उन्हें कितनी बड़ी कीमत
चुकानी पड़ी उन्होंने उसकी परवाह नहीं की।
वर्ष 1989 में राजीव गांधी सरकार पर बोफोर्स तोप खरीद में दलाली के आरोपों लगे और यह
चुनाव इसी मुद्दे पर लड़े गए और चुनाव के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के
प्रधानमंत्री बने और भाजपा ने उन्हें बाहर से समर्थन दिया और देश में पहली बार
मुफ्ती मुहम्मद सईद के रूप में मुसलमान गृह मंत्री मिले पर कुछ ही माह में घाटी से
कश्मीरी पंडितों को आतंकी संगठनों की धमकी के बाद घर द्वार छोड़कर भागना पड़ा और
चार दशक बाद भी वह कश्मीर से बाहर शरणार्थियों की तरह जीने को मजबूर हैं। उसके बाद विश्वनाथ
प्रताप सिंह जी ने वर्षों से लंबित पड़ी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर ओबीसी
वर्गों के लिए 27% आरक्षण का मार्ग प्रशस्त कर दिया और बोफोर्स दलालों के नाम समाने लाने के बजाय
मुस्लिम तुष्टिकरण और पिछड़ा वर्ग जाति की राजनीति शुरू कर दी। 27 सितंबर 1990 को आडवाणी जी ने
सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकालकर हिन्दू जागरण की नींव रखी और इसके लिए उन्हें
कट्टर हिंदू की उपाधि मिली और भाजपा 2 सीट से बढ़कर 188 सांसद वाली पार्टी बन गई। यह उनका ही परिश्रम रहा की आज भाजपा दुनिया की सबसे
बड़ी पार्टी बन गई है। उसके बाद वे 2006 में पाकिस्तान यात्रा पर गए और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की
मजार पर गए और उनके एक भाषण के आधार पर उन्होंने जिन्ना को सेकुलर कह दिया और यह
उनका इतना बड़ा अपराध रहा कि उन्हें नेता विपक्ष पद से भी हाथ धोना पड़ा। अपने इस दर्द को
उन्होंने अपनी पुस्तक राष्ट्र सर्वोपरि के लोकार्पण पर सरसंघचालक मोहन भागवत जी की
उपस्थिति में ही प्रकट किया कि रथ यात्रा के समय मुझे कट्टर हिन्दू कहा गया और
जिन्ना की मजार पर जाने और उन्हें सेकुलर कहने पर हिंदू विरोधी मान लिया गया। लेकिन यह माना जाना
चाहिए कि वे ऐसे राजनेता हैं जिसके लिए राष्ट्रहित सदैव सर्वोपरि रहा है।
एक जमीनी कार्यकर्ताओं के रूप में अपनी राजनीतिक
यात्रा शुरूकर के देश के उप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री के रूप में
उनकी विशिष्ट उपलब्धियां रही हैं पर उनमें अहम का भाव लेशमात्र नहीं दिखाई देता।
वे छोटे से छोटे कार्यकर्ता का सम्मान करते रहे हैं और उसकी भावनाओं की कद्र करते
रहे हैं। बात 2013 की है मैं अपनी पुस्तक "राष्ट्रवादी कर्मयोगी (कलराज मिश्र) लिख रहा था। यह मेरी पहली पुस्तक
थी। मैं उनके संदेश के लिए
एक प्रार्थना पत्र लेकर उनके आवास पृथ्वीराज रोड पर गया और देकर अपने घर आ गया। पत्र देकर मैं अपने घर
पहुंचा ही था कि उनके आवास से टेलीफ़ोन आ गया कि आपका पत्र तैयार है आकर ले जाएं। वहां
मैं गया वे मिले और पुस्तक के सफल प्रकाशन का आशीर्वाद दिया और यही नहीं मेरे
पुस्तक के लोकार्पण में आए, जबकि आजकल के छूटभैये नेता पुस्तक में सन्देश देने के लिए कई चक्कर लगवा देते
हैं और लोकार्पण कार्यक्रम में समय देकर भी नहीं आते। आज के नेताओं को आडवाणी जी
के इस प्रकार के दृष्टिकोण और कार्यकर्ताओं के प्रति स्नेह की आदत से सीखना चाहिए।
आज कल देश में एक राष्ट्र एक चुनाव की चर्चा जोरों पर
है। पूर्व राष्ट्रपति राम
नाथ कोविन्द की अध्यक्षता में बनीं समिति अपनी रिपोर्ट दे चुकी हैं, पर उन्होंने पहली बार
इसकी मांग प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से अनौपचारिक मुलाकात में कही थी। इसका वर्णन उनकी
पुस्तक राष्ट्र सर्वोपरि में मिलता है और इससे प्रेरणा लेकर मैने 18-6-2014 में एक आर्टिकल लिखा
था जो दैनिक वीर अर्जुन में प्रकाशित हुआ था। पर कैसा दुर्भाग्य है कि जगह-जगह एक
देश एक चुनाव की चर्चा होती है पर इन परिचर्चाओं में लालकृष्ण आडवाणी जी का नाम
नहीं लिया जाता।
उनके इस सुझाव के पीछे यह तर्क था कि 1969 के बाद से लोक सभा और
विधानसभा चुनाव अलग-अलग होने लगे हैं और हर समय कहीं न कहीं विधानसभा के चुनाव
होते रहते हैं और इन चुनावों के अलग-अलग आयोजन से बहुत पैसा खर्च होता है। इसके
अलावा प्रदेश के चुनाव जीतने के लिए प्रधानमंत्री सहित मंत्री भी चुनावी में
प्रचार में लगे रहते हैं और परिणाम यह होता हैं कि प्रधानमंत्री और मंत्रियों की
मेज पर फाइल महीनों तक पड़ी रहती हैं और सरकार का काम अवरुद्ध होता है। आडवाणी जी
की यह आशंका आज के युग में शत-प्रतिशत सही साबित हो रही है, आडवाणी जी को सच्चा
सम्मान यही होगा कि देश में एक राष्ट्र एक चुनाव की प्रणाली को लागू किया जाए और
उनके समय में विभिन्न राजनैतिक दलों के बीच स्वस्थ संवाद की परंपरा पुनः शुरू की
जाए।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ
के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
