तहसीन मुनव्वर
बिहार विधानसभा के चुनावी
नतीजों ने सब ही को चौंका दिया है। इन परिणामों ने एक नई सोच रखने वाले वोटर को
हमारे सामने लाने का काम किया है। ये वोटर वो है जो शांत रहता है। इस का अंदाज़ा भी
नहीं लगने देता कि वो क्या सोच रहा है किंतु वो अंतिम निर्णय का अपना पहले सी ही
मन बना चुका होता है कि उसे क्या करना है। लेकिन वो यह अंत तक दर्शाता नहीं है और
ना ही कानों-कान किसी को ख़बर होने देता है। वो गोदी मीडीया (सरकार की ओर झुकाव
रखने वाली मीडीया के लिए उपयोग होने वाला संबोधन) और यूट्यूब मीडीया (सरकार विरोधी
समर्पण रखने वाले यूट्यूबर का संबोधन) दोनों को ही अंधेरे में रखता है और मतदान के
समय अपना फ़ैसला सुना देता है।
बिहार चुनाव के परिणाम
हमें क्यों हैरान कर रहे हैं? क्यों कि हमारी
मीडीया और हम सत्य से दूर होते जा रहे हैं। हमें दोनों ओर की मीडीया जो कुछ भी
परोस रही है वो सच्चाई से भागना जैसा लगता है क्योंकि ये हम सब भी समझने लगे हैं
कि दोनों ओर आग बराबर लगी हुई है। यानी दोनों ही सत्य परोसने में चूक रहे हैं। इस लिए जब सत्य हमारे
सामने आता है तो हमें हैरान कर देता है।
अगर हम एग्ज़िट पोल भी
देखें तो उनमें अधिकतर राजग की जीत तो दिखा रहे थे किंतु किसी में भी इतनी भारी
जीत को छूने की हिम्मत नहीं थी जो ये बताती है कि मतदाता जो है मतदान करने के बाद
भी सावधान रहता है और अपने दिल का राज़ किसी से साझा करते में संयम अपना सकता है।
मैं 17 अक्तूबर को सर सय्यद पर होने वाला एकल नाटक करने पटना गया
था। बिहार के कई क्षेत्रों से आए मुस्लिम बुद्धजीवियों से मेरी वहां चुनाव को लेकर
चर्चा भी हुई थी। जिसमें लगभग सभी का कहना था कि विधानसभा में राजग की वापसी होगी।
मुझे यह देख कर अचरज भी हुआ कि ऐसा कहते हुए उनमें किसी भी प्रकार का दुख या भय
प्रतीत नहीं हो रहा था। जैसे कि वो अब नीतीश सरकार के आदी हो चुके हों। अगले दिन
हम राज भवन भी गए जहां राज्यपाल माननीय आरिफ़ मुहम्मद ख़ां जी से भेंट भी हुई। हमने
उन्हें सर सय्यद डे और दीवाली की बधाई दी। दिवाली की मिठाई भी खाई। लेकिन वहां भी
ऐसा ही महसूस हुआ कि जैसे कुछ भी बदलने वाला नहीं है क्योंकि उन से चर्चा में
अलीगढ़, सनातन परंपरा और भारत की
ऐतिहासिक शांति की परम्पराओं पर ही चर्चा हुई। उस में कहीं राजनीति को लेकर एक
शब्द भी नहीं आया। जिससे ये अंदाज़ा भली भांति हो रहा था कि कुछ भी बदलने वाला नहीं
है। वैसे तो राज्यपाल राजनीतिक हलचल पर कुछ कभी नहीं कहते लेकिन फिर भी किसी न
किसी बात से कुछ तो इशारा मिल ही सकता था मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यही नहीं
बाज़ारों में भी घूमने पर कहीं पर भी ऐसा महसूस नहीं हो रहा था कि जैसे कुछ बदलाव
होने जा रहा हो। सब कुछ नॉर्मल ही लग रहा था।
मैंने दिल्ली में 2012 मैं आम आदमी पार्टी जैसे बदलाव का शोर देखा हुआ है। पंजाब
में जब आम आदमी पार्टी आने वाली थी तो मैं ख़ुद चंडीगढ़ में लोगों से बात करके
हैरान हो रहा था जो कि अरविंद केजरीवाल के गुण गाने में लगे थे। मेरे जैसे दिल्ली
वाले की बात सुनने को भी तैयार नहीं थे लेकिन पटना में ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा था।
हाँ राजनीतिक पार्टीयां ये अब जान चुकी हैं कि बाहर से आने वाले का पहला संपर्क
टैक्सी या रिक्शा ड्राईवर से होता है तो उन पर ये अब मेहनत करने लगी हैं लेकिन जब
ये किसी राजनीतिक पार्टी की तारीफ़ के पुल बाँधने लगते हैं तो साफ़ खुल जाता है कि
उनका सारा खेल क्या है।
सच्च तो ये है कि बिहार
में अभी भी हिंदू मुस्लिम का शोर चुनाव तक ही सीमित है और इस का असर आम लोगों के
अंदर दैनिक दिनचर्या तक अभी नहीं पहुंचा है। आप चाय के होटलों और सैलून में भी
उनके बीच के आपसी जोड़ को महसूस कर सकते हैं लेकिन चुनाव में कोशिश सबकी यही होती
है कि अपने नाम और जाति वाले की तरफ़दारी ज़रूर करें। ये सच् है कि विपक्ष ने मेहनत
ख़ूब की लेकिन वो जिन मुद्दों को लेकर चल रहा था वो जनता को अपने जैसे से नहीं लगे।
खासतौर से नतीश कुमार का दस हज़ार रुपए महिलाओं के एकाऊंट में ट्रांसफ़र करने का
पासा भी ज़बरदस्त काम कर गया।
अगर हम बिहार चुनाव
परिणामों का आंकलन करें तो हम कह सकते हैं कि सब कुछ अपनी ओर होते हुए भी अंतिम
कुछ दिनों में कमज़ोरी दिखाने से भी महागठबंधन की गांठ ढीली पड़ी और उसको भारी भरकम
हार का बोझ अपने कंधों पर उठाना पड़ गया। जबकि एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय
जनता दल को भाजपा और जदयू दोनों से ही अधिक वोट मिले हैं लेकिन भाजपा और जदयू के
वोट मिला दें तो फिर राजद कहीं नज़र नहीं आती। इस का मतलब है राजद को गठबंधन के
साथियों से वह शक्ति नहीं मिली जैसा कि भाजपा और जदयू एक दूसरे को शक्ति देती नज़र
आती हैं। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार राजद को मिला 23 प्रतिशत मत भाजपा से 2.92 प्रतिशत और जदयू से 3.75 प्रतिशत अधिक रहा है।
अगर देखा जाये तो जन
सुराज पार्टी का कांग्रेस का शोर कम करना कांग्रेस को नुक़्सान पहुंचा रहा था जबकि
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का शोर अचानक चुनाव के आख़िरी दिनों में मीडीया
में ज़्यादा रहा लेकिन ज़मीन पर ऐसा कुछ ख़ास असर उसका नज़र नहीं आ रहा था। कांग्रेस
का हर बार की तरह इस बार भी जीतने वाले उम्मीदवारों के अकाल के बावजूद गठबंधन में
अधिक सीटें अपने लिए खींच लेना, मुस्लिम वोटर को
किनारे लगा देना और वीआईपी के सेहनी के साथ पानी में ग़ोते लगा कर उन्हें डिप्टी
सीऐम बनाये जाने का ऐलान कर देना, बाद में
मुस्लमानों को सिर्फ ज़बानी जमा ख़र्च से ख़ुश रखने की कोशिश करना भी इस हार के
कारणों में से है।
आप चाहे जैसा भी माहौल
क्यों ना बना लें लेकिन अगर आप प्रतियाशियों के चयन को लेकर आख़िर तक उलझन का
शिकार रहेंगे तो ये उलझन आपके वोटर तक भी पहुंच ही जाती है। भाजपा और जदयू अपने
मतदाताओं को ये विश्वाश दिलाने में सफ़ल रहे कि पूरी खींचतान के उपरांत भी नतीश
कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे। महागठबंधन ने उवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ
गठबंधन न करके भी अपना बहुत नुक़्सान किया है हालाँकि एमआईएम ने अपनी पुरानी सीटें
जीती हैं लेकिन उसने महागठबंधन को कई सीटों पर नुक़्सान पहुंचाने का भी काम किया
है। एसआईआर पर शोर मचाने के बाद पीछे हट जाना भी इंडिया गठबंधन के काम नहीं आया
है। लोग तो अब ये भी कह रहे हैं कि इन नतीजों से अच्छा तो ये रहता कि वोट चोरी को
बुनियाद बनाकर चुनाव ही नहीं लड़ते।
सच तो ये है कि मुस्लिम वोटर अब भाजपा से इतना दूर हो
नहीं रहा है जैसा कि पहले समझा जाता था। उसे अगर ये यक़ीन हो जाता है कि हुकूमत
भाजपा की ही आने वाली है तो फिर वो सरकार के विरुद्ध खुल कर नहीं जाता और अपना वोट
भी भाजपा को दे देता है। उसे जहां भाजपा का साथ देते नीतिश कुमार जैसे मुख्यमंत्री
मिल रहे हैं तो फिर उसे इस गठबंधन से परहेज़ भी नहीं रहता है। मुस्लिम वोटर चाहता
है कि जो भी पार्टीयां उस का साथ देने का शोर करती रहती हैं उनको खुल कर उसका साथ
देना होगा। वो एमआईएम को पसंद नहीं करता लेकिन जब उस को लगता है कि वो खुल कर उसके
लिए बोल रही है तो उसे वोट कर देता है। उसे भी वीआईपी के सहनी जैसी राहुल गांधी की
डुबकी चाहिए। इमरान प्रतापगढ़ी की शायरी अच्छी हो सकती है लेकिन वो मुशायरे तक ठीक
है। वोट में वाह वाह नहीं आह आह चलती है। अगर आप मुस्लमान को छूते हुए भी डरेंगे
तो वो भी आपको वोट देते हुए कई बार सोचेगा। ऐसा नहीं होगा उसकी हिस्सेदारी ज़्यादा
है तो उसे उसका हिस्सा भी उसे चाहीए। अगर नहीं देंगे तो वो पाला बदल लेगा। उसने
ऐसा ही किया है। ये यूपी में अखिलेश के लिए भी ख़तरे की घंटी है। मुस्लिम वोटर को
किसी गिनती में न लेना उनके लिए भी ख़तरे की घंटी बन सकता है। उम्मीद है विपक्ष
अपनी कमियों से सीखेगा और सबसे पहले अपने घर में सब कुछ ठीक ठाक करेगा तब ही आगे
चुनाव में उतरेगा।