गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का...

संजीव शर्मा

मोबाइल फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग महसूस कीजिए..क्या आप हम इस बार ऐसे ही किसी व्यक्तिया परिवार के घर में उम्मीदों का दिया नहीं जला सकते?

हमें करना ही क्या है…बस,इस बार स्थानीय और खासतौर पर पटरी पर बाज़ार सजाने वालों से खरीददारी करनी है और अपने बच्चों में भी यही आदत डालनी है। जाहिर सी बात है रोशनी, खुशहाली, समृद्धि और सामूहिकता का पर्व दीपावली क़रीब है। घर घर में सफाई,रंगाई पुताई और दीप पर्व से जुड़ी तैयारियों का दौर जारी है इसलिए सामान खरीदने का दौर भी शुरू हो गया है।

दीप पर्व केवल रोशनी और खुशियों का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सहयोग का भी अवसर है। इसलिए,इस दीवाली जब हम बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, मिठाइयों, और सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए निकलें, तो अपनी आदत में क्यों न एक छोटा सा बदलाव लाएं ? इस बार, बिना मोलभाव के लोकल और पटरी विक्रेताओं से खरीदारी करें और त्योहार के असली मायने को और गहरा करें।

बिना मोलभाव के खरीदारी करना न केवल आपके त्योहार को खास बनाएगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। पटरी बाजार के लिए हर बिक्री न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई, और त्योहार की तैयारी का आधार भी है। एक छोटे विक्रेता के लिए, 10-20 रुपये की कीमत कम करना भी उनके दिन के कुल मुनाफे को प्रभावित कर सकता है। दीवाली जैसे व्यस्त मौसम में, जब उनकी बिक्री साल भर की कमाई का बड़ा हिस्सा होती है, मोलभाव उनके लिए बोझ बन सकता है। बिना मोलभाव के खरीदारी करके आप उनकी मेहनत का सम्मान करते हैं और उन्हें त्योहार की असली खुशी देते हैं।

हम सात सौ रुपए का पिज़्ज़ा, दो सौ का बर्गर और तीन सौ रुपए की कॉफी बिना मोलभाव के खा पी लेते हैं लेकिन साल में एक बार मिट्टी के दर्जन भर दिए खरीदने के लिए मोलभाव में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम मल्टीप्लेक्स में चार सौ रुपए का पॉपकॉर्न चुपचाप ले लेते हैं लेकिन कागज़ की झालर,तोरण और बिजली का लड़ी खरीदते समय इतना भाव ताव करते हैं जैसे अमेरिका चीन से कोई व्यापारिक समझौता कर रहे हों।

हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश में बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी स्थानीय बाजारों मसलन किराना दुकानें, पटरी विक्रेता और छोटे रिटेलर पर गहरा प्रभाव डाल रही है। 2025 तक, ई-कॉमर्स बाजार का मूल्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जो 2024 की तुलना में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत का कुल रिटेल बाजार 2024 में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है, जिसमें ई-कॉमर्स का योगदान 8 फीसदी है और 2028 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी, जिससे ऑफलाइन रिटेल का शेयर 92 प्रतिशत से घटकर 86 फीसदी रह जाएगा।

हमारे मोबाइल में घुसकर खरीददारी करने और बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी के कारण छोटे रिटेलरों की बिक्री में 15-20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है । एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022-2024 के बीच 1-2 लाख छोटे स्टोर्स बंद हो चुके हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में बदल गए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल सेक्टर भारत में 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ई-कॉमर्स की वृद्धि से 5-7 लाख नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से पटरी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों से जुड़ी नौकरी शामिल हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते रहे हैं और इसे वे आत्मनिर्भरता का जरिया मानते थे। वैसे भी, लोकल और पटरी विक्रेता भारतीय बाजारों की रीढ़ हैं। ये वे लोग हैं जो सुबह जल्दी उठकर अपने स्टॉल सजाते हैं, मिट्टी के दीये बनाते हैं, हस्तनिर्मित सजावटी सामान तैयार करते हैं, और स्थानीय स्वाद वाली मिठाइयां बेचते हैं। इनके उत्पाद न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। इन विक्रेताओं से खरीदारी करके आप हम न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता को भी कम करते हैं।

आइए,इस दीवाली रोशनी के साथ-साथ अपने करीबी बाजार को भी रोशन करें। बिना मोलभाव के खरीदारी करें एवं त्योहार की असली खुशियों को फैलाकर सभी के लिए दीवाली शुभ बनाए और घर घर में जलाएं एक दिया उम्मीदों का। (विनायक फीचर्स)

त्यौहारी सीजन का मारा....एक बेचारा

व्यंग्य

सुधाकर आशावादी

कहने को समाज आजकल नारी पुरुष एक समान की नीति पर चल रहा है। अधिकारों के नाम पर श्रीमतियों की डिमांड अपने अपने श्रीमान जी से बढ़ती जा रही है। करवा चौथ पर्व पर जब श्रीमती जी ने श्रीमान जी के दीर्घायु होने की कामना में व्रत रखा, तो अपनी डिमांड की लम्बी फ़ेहरिस्त श्रीमान जी के हाथ में थमा दी। महंगी साड़ी के साथ महंगाई की ऊँची कूद लगाते स्वर्ण आभूषणों की डिमांड कर डाली। साथ ही धमकी भी दीं, कि चाहे जो मजबूरी हो, डिमांड श्रीमती जी की पूरी हो। श्रीमान जी मरते क्या न करते, श्रीमती जी की डिमांड पूरी करने के लिए बैंक के कर्जे की किश्त बढ़ाने के लिए विवश हो गए।

गृहस्थ जीवन में शांति पाठ का महत्व केवल श्रीमान जी ही जानते हैं, श्रीमती जी तो आपदा में अवसर ढूँढने की फिराक में ही रहती हैं, कि जैसे भी हो, त्यौहार के नाम पर कैकेयी बनकर कोप भवन में अनशन की धमकी देती रहे और श्रीमान जी को समझौता वार्ता के लिए विवश करती रहे। बहरहाल करवा चौथ के समापन के उपरांत श्रीमती जी यदि श्रीमान जी से प्राप्त उपहारों से संतुष्ट हों, तो बड़ी बात है, अन्यथा श्रीमान जी भले ही अपनी जेब का अतिक्रमण करके कितना ही महँगा उपहार श्रीमती जी की सेवा में प्रस्तुत कर दें । श्रीमती जी को प्रसन्न करना आसान काम नही होता। त्यौहारी सीजन आता तो है, मगर सामान्य श्रीमान जी के सम्मुख मुसीबतों का पहाड़ खड़ा करने में पीछे नहीं रहता। करवा चौथ के उपरांत धन तेरस भी श्रीमान जी की जेब पर क्रूर प्रहार करने से नहीं चूकता। श्रीमती जी की सुविधा प्राप्त करने वाली फ़ेहरिस्त का आकार प्रतिवर्ष बढ़ता ही जाता है। अब पीतल के बर्तनों की डिमांड नही होती। डायमंड के गहनों की डिमांड अधिक होती है। साइकिल आज भी कुछ श्रीमानों के लिए सपना होगी, किंतु सुविधा भोगी श्रीमतियों की नजर किसी दोपहिया पर नहीं पड़ती। सामान्य चौपहिया भी उन्हें आराम दायक नहीं लगते। चौपहिया में भी उन्हें ऊँचे कद और तेज गति से दौडऩे वाली गाडिय़ां ही पसंद आती हैं।

ऐसा नहीं है कि श्रीमती जी श्रीमान जी की जेब की सीमाएँ न जानती हो, किंतु श्रीमती जी अपने अड़ोस पड़ोस, अपनी सहेलियों और रिश्तेदारों की समृद्धि को कैसे पचाएँ जो भौतिक संसाधनों से घर के ड्रॉइंग रूम में महँगे झूमर की रोशनी से नहा रहे हों तथा श्रीमती जी की महत्वकांक्षा के परों को उड़ान भरने के लिए उकसा रहे हों। ख़ैर जो भी हो, भले ही व्यापार घाटे में जाए या श्रीमान जी की नौकरी छूट जाए? त्योहारी सीजन श्रीमतियों के लिए ख्वाहिश बुनने और उन्हें पूरा कराने के लिए एक अदद श्रीमान जी पर दवाब बनाने का सीजन ज़रूर बन जाता है। (विभूति फीचर्स)

धन तेरस के दिन यमराज के निमित्त घर के मुख्य द्वार पर सायंकाल दीपदान किया जाता है

धनतेरस पर विशेष

सोमेश्वर सिंह सोलंकी

हर त्यौहार समय के महत्व को प्रदर्शित करते हुये अपना एक विशेष स्थान रखता है। यह स्वत: एक ऐसा अवसर है जब इनमें विज्ञान की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है। त्यौहार मनाना प्राचीन लकीर पर चलना अथवा अंध परंपरा है, ऐसा सोच इनके महत्व की अनभिज्ञता का द्योतक है। त्यौहार समाज में समरसता, भाईचारा एवं सौहार्द बढ़ाने हेतु मिलजुलकर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
यह खुशी का एक ऐसा अवसर है जो हमें उदासीनता का परित्याग करके सभी से गले मिलकर भेदभाव की नीति से दूर होकर लौकिक जीवन को सुखमय बनाने की ओर अग्रसर करता है। कार्तिक मास के शुभांकों में दीपावली का त्यौहार धनतेरस (त्रयोदशी) से प्रारंभ होकर नरक चतुर्दशी (रूपचौदस), दीपावली- अमावस्या (लक्ष्मी पूजन), तथा द्वितीय पक्ष (शुक्ल पक्ष) की प्रतिपदा (प्रथमा) को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट का दिन, यम द्वितीया को भैय्या दूज को लेखनी पूजन के पश्चात इस त्यौहार का समापन माना जाता है। इन दिवसों में प्रत्येक दिन से धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। यह पर्व यमराज से संबंध रखता है और त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन सायंकाल ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि देवताओं का पूजन कर दीपदान करने की परंपरा है। दीपदान के लिये गुप्त गृहों, रसोई व निवास स्थान, देव स्थान, वृक्षों के तले, जलाशयों, गौशाला, बगीचा-पार्क में तथा भवन की चारदीवारी के सभी प्रमुख स्थानों पर जलते दीप रखे जाते हैं और इससे हम आशा प्रकट करते हैं कि यमराज के पास जाने से मुक्ति मिले तथा श्री महालक्ष्मी सदैव हमारे घर पर अक्षय निवास करती रहे।
धन तेरस के दिन यमराज के निमित्त घर के मुख्य द्वार पर सायंकाल दीपदान किया जाता है। इसके साथ यह धारणा है कि असामायिक मृत्यु कदापि न हो। इसी दिन धनवंतरि भगवान की जयंती मनायी जाती है। इस पवित्र दिन व्रत करके सूर्यवंशी राजा दिलीप को कामधेनु (गौ) की पुत्री नंदिनी की सेवा से पुत्र की प्राप्ति हुई थी। आज के दिन मुख्य रूप से सौभाग्यवर्धन हेतु घर के टूटे-फूटे बर्तनों के बदले नवीन बर्तन क्रय किया जाना अत्यंत शुभ माना जाता है। धनतेरस के सूर्योदय से पूर्व यमुना में स्नान करने का महात्म्य माना गया है। पौराणिक कथानुसार धर्मराज यम की बहिन यमुना ने यम से वरदान प्राप्त किया था कि जो मुझ यमुना के जल में इस दिन स्नान करे उसे उनका (यम का) भय प्राप्त न हो। प्राचीन त्यौहारों में दीपावली पंच दिवसीय त्यौहार है, जिसका सामाजिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक महत्व है। यह ऐसा समय है जब हमारे कृषि प्रधान देश में फसल खलिहानों से घरों पर लायी जाती है। नवान्न की प्राप्ति में खरीफ के अन्न-दाल मुख्य धन (लक्ष्मी) के आने पर प्रसन्नता का होना स्वाभाविक है। इस त्यौहार पर अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों का बनाना और परस्पर वितरण करना सामाजिक दृष्टि से न केवल धार्मिक प्रदर्शन है, अपितु समानता व प्रेमभाव उत्पन्न करने वाला है। धर्म शास्त्री सनत्सुजात ऋषि का कथन है कि प्रमादी और आसुरी संपत्ति वाले मनुष्य मृत्यु (यमराज) से पराजित है, परंतु अप्रमादी, दैवी संपदा वाले महात्मा ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। प्रमाद से भिन्न यम को मृत्यु कहते हैं और हृदय से दृढ़तापूर्वक पालन किये हुये ब्रह्मïचर्य को अमृत मानते हैं। यह देवता पितृ-लोक में शासन करते हैं। वह पुण्य कर्म वालों के लिये सुखदायक और पाप कर्म वालों के लिये भयंकर हैं। आगे यह भी कहा है कि त्यौहार वाली त्रयोदशी शुभाचरण की देहरी हैं जो जीवन में आगे बढऩे का मार्ग प्रशस्त करती हैं। हमें यह जानने का अवसर मिलता है कि पुण्य व पाप जो स्वर्ग-नरक के रूप में दो अस्थिर फल हैं। उनका भोग करके मनुष्य जगत में जन्म लेता हुआ तद्नुसार कर्मो में लग जाता है। फिर भी धर्म की गति अति बलवान है। धर्माचरण कर्ता को समयानुसार अवश्य ही सिद्धि प्राप्त होती है। इस त्यौहार को मनाने से जीवन के सार्थक भाव का दर्शन होता है। लोक में ऐश्वर्य रूपी लक्ष्मी सुख का घर मानी गई हैं। उनका समुद्र मंथन से इसी दिन प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। इस मंथन से चौदह रत्न समुद्र में से निकाले गये थे।
हमें इससे शिक्षा मिलती है कि परिश्रम से क्या नहीं मिल सकता। धन, वैभव की तो बात ही क्या, मनुष्य अमरत्व भी प्राप्त कर सकता है। इसी के साथ पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। धन-धान्य की वृद्धि हो ताकि जीवन सुखी बने। (विभूति फीचर्स)

ब्यूरोक्रेसी के सामने मुख्यमंत्री या मंत्री इतने मजबूर क्यों?

बसंत कुमार 

वर्ष 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और कल्याण सिंह जी उस सरकार के मुख्यमंत्री बने और शपथ लेने के बाद उन्होंने घोषणा कर दी कि प्रदेश में जो गुंडे माफिया हैं या तो उत्तर प्रदेश की सीमाओं से बाहर चले जाएं या गोलियां खाने को तैयार रहें। उनकी घोषणा का यह असर रहा कि सारे गुंडे माफिया प्रदेश की सीमाओं से बाहर हो गए और उत्तर प्रदेश में तब तक नहीं लौटे जब तक कल्याण सिंह जी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पर आज उन्हीं की पार्टी की हरियाणा में सरकार है और वहां के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी ने एक आईपीएस अधिकारी के आत्महत्या के मामले में यह कहते हुए अपनी लाचारी व्यक्त की कि हम एक चपरासी तक को सस्पेंड नहीं कर सकते। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश में लॉ एंड ऑर्डर के मामले में विरोधी भी कुमारी मायावाती के कार्यकाल बहुत बेहतर मानते थे और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द सहित भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेता भी यह मानते हैं कि मायावती के कार्यकाल में अधिकारी कांपते थे पर अब यह प्रश्न उठने लगा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत में जनता द्वारा चुने गए मंत्री या मुख्यमंत्री ब्यूरोक्रेसी के सामने मजबूर क्यों हैं।

जहां तक संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में होता यह है कि जनता अपने मताधिकार से अपने प्रतिनिधियों सांसदों, विधायकों को चुनती है और ये चुने हुए लोग अपने नेता के रूप में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव करते हैं और ये लोग अपने मंत्रिमंडल के साथ सरकार चलाते हैं। कैबिनेट द्वारा लिए गए फैसलों को नौकरशाही इंप्लिमेंट करतीं हैं। पर उधर कुछ वर्षों से ब्यूरोक्रेसी इतना मजबूत हो चुका है कि मंत्री असहाय महसूस करते हैं। मेरे जानने वाले कई मंत्री यह ऑफ द रिकॉर्ड कई बार कह चुके हैं कि हमारी यह स्थिति कुमारी मायावाती के मंत्रियों से बदतर है। बस फक्र ये है कि मायावती के मंत्री उनके सामने दरियों पर बैठते हैं और हमें कुर्सी मिल जाती है पर नेतृत्व द्वारा चुने गए ब्यूरोक्रेट्स के अलावा हमारी और कुमारी मायावाती के मंत्रियों की हालत एक सी है। 1990 में देश में चन्द्रशेखर जी के नेतृत्व में जनता दल की सरकार थी और औद्योगिक विकास विभाग का प्रभार बिहार के दलित नेता दसई चौधरी को दिया गया पर वे इतने कमजोर मंत्री साबित हुए कि उनके बुलाने पर सचिव तो दूर संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी नहीं आते थे कुछ ऐसी ही स्थिति हरियाणा के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी के हालिया बयान से लगती हैं।

वर्ष 2024 के आम चुनाव के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने विजन मंत्रालय एमएसएमई का मंत्री अपने वरिष्ठतम मंत्री जीतन राम मांझी को बनाया। वे सदियों से उपेक्षित तिरस्कृत मुसहर समाज से हैं और स्वतंत्र भारत के इतिहास में मुसहर समाज से इकलौते मंत्री हैं। उनको इस विभाग का मंत्री बनाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एक ही उद्देश्य था कि मांझी जी मुसहर समाज को उद्यमिता के माध्यम से उनको समाज की मुख्यधारा में जोड़ सकेंगे। अनपढ़ मुसहर समाज को जागरूक करने के लिए मांझी जी की सहमति से मुसहर समाज का इतिहास नामक पुस्तक लिखी गई और उसका लोकार्पण दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 24-9-2025 को सायं 5 बजे से रखा गया जिसमें मांझी जी मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम की सूचना एमएसएमई के उपक्रम एनएसआईसी के सीएमडी श्री संभ्रांत शेखर आचार्य को दे दी गई और उनसे इस कार्यक्रम के लिए सीएसआर फंड से आर्थिक मदद के लिए भी अनुरोध किया गया पर श्री शेखर ने आर्थिक मदद तो दूर कार्यक्रम को असफल बनाने के उद्देश्य से ठीक उसी समय एक उड़ीसा के प्रो सत्पथी का कार्यक्रम जिसका शीर्षक था एमएसएमई सेक्टर में गुरु द्रोणाचार्य रख दिया। इसके लिए 23-9-2025 को शाम को सर्कुलर जारी कर दिया कि एनएसआईसी का कोई भी कर्मचारी इस कार्यक्रम को छोड़कर कही नहीं जाएगा जिसका परिणाम यह हुआ कि अपने ही विभाग के मंत्री के उसी के समाज के कार्यक्रम में एनएसआईसी का कोई कर्मचारी नहीं जा सका।  इन लोगों के इसी एटीट्यूड के कारण मांझी जी जैसा वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री गरीबों और उपेक्षितों के उठान के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं इसकी ब्यूरोक्रेसी के सामने मंत्री की बेबसी न कहे तो और क्या कहें?

जबकि एनडीए-2 के कार्यकाल में जब नारायण राणे देश के एमएसएमई मंत्री थे तो उसी एनएसआईसी में मंत्री के लोकसभा क्षेत्र में एससी/एसटी हब का पैसा जॉब मेले तथा अन्य कार्यक्रमों को मंत्री को खुश करने के लिए डायवर्ट किया गया जब कि एक आदिम जनजाति जो सदियों से उपेक्षित और शोषित हैं उसको विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के आयोजन के लिए सहभागिता तो दूर उसमें रोड़े अटकाए गए उससे पहले वर्ष 2014 में तत्कालीन एम एस एम ई मंत्री कलराज मिश्र के जीवन पर आधारित पुस्तक राष्ट्रवादी कर्मयोगी के लोकार्पण में मंत्रालय के काफी लोग वहां पहुंचे अपितु वह पुस्तक खादी ग्रामोद्योग के विक्रय केंद्रों और एनएसआईसी के पुस्तकालयों में पढ़ने के लिए रखी गई फिर शादियों से उपेक्षित तिरस्कृत मुसहर समाज के साथ इतनी उपेक्षा क्यों?

आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की आत्महत्या के मामले में पुलिस और प्रशासन की लापरवाही से स्थिति खराब हो गई है। मौत के सात दिन बीत जाने के बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है और परिवार के लोगों को समझाने के लिए केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले का भेजा गया। वे विद्वान और बड़े शरीफ इंसान हैं पर एक सदस्य वाले रिपब्लिकन पार्टी के नेता के रूप में उनकी हैसियत नहीं है कि वे इस मामले में लीपापोती करने वाले अधिकारियों के विरूद्ध कुछ कह सकें या उनकी शिकायत केंद्र सरकार से कर सकें। श्री अठावले पूरन कुमार कि आईएएस पत्नी समेत परिवार के अन्य सदस्यों से मिले फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी से मिले और फिर दुबारा मृतक की पत्नी अमनीत कौर से बात की। उसके बाद भी कोई हल नहीं निकला और मौत के सात दिन बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है और प्रधानमंत्री की 17 अक्टूबर को रोहतक में होने वाली रैली स्थगित कर दी गई है।

बढ़ते दबाव के बाद चंडीगढ़ पुलिस ने इस मामले में उन सभी अधिकारियों के बारे में जानकारी मांगे हैं जिनके नाम आत्महत्या से पहले पूरन कुमार द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट में लिखे गए हैं या एफआईआर में आए हैं। सरकार द्वारा गठित एसआईटी इन सबसे पूछताछ की तैयारी में है। वहीं जांच दल रोहतक के एक पुलिस अधिकारी के घर से सबूत इकठ्ठा कर रहा है। कैसी विडंबना है कि आत्महत्या के सात दिन बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है। मृतक की पत्नी जो खुद भी एक आईएएस अधिकारी हैं ने पोस्टमॉर्टम से पहले सुसाइड नोट में दर्ज आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है। सुसाइड नोट में हरियाणा के पुलिस महानिदेशक व रोहतक के एसपी सहित 15 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आरोपी लगे हैं। मृतक की पत्नी के दबाव में पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली है पर आरोपियों का नाम वाले कॉलम को खाली छोड़ दिया गया है।

अगर हरियाणा सरकार मामले की गंभीरता को समझते हुए सुसाइड नोट में लिखे गए 15 अधिकारियों को तुरंत निलम्बित कर देती और मामले की निष्पक्ष जांच कराकर समय से निपटा लेती तो यह मामला इतना बड़ा राजनैतिक विवाद का मुद्दा न बनता। वहीं हरियाणा सरकार को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के शासन के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में होने वाली 17 अक्टूबर को प्रधानमंत्री की रैली को स्थगित न करना पड़ता और मुख्यमंत्री को अपनी मजबूरी बताते हुए यह न करना पड़ता कि मैं तो एक चपरासी को भी निलम्बित नहीं कर सकता तो अधिकारी को कैसे निलम्बित कर सकता हूं अर्थात मुख्यमंत्री जी ब्यूरोक्रेसी के सामने मजबूर है। आखिरकार इतनी फजीहत के बाद पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर को छुट्टी पर भेजा गया। यदि यही काम समय से पहले कर दिया गया होता इतनी समस्या न होती। अब समस्या यह है कि बेलगाम होती हुई ब्यूरोक्रेसी पर लगाम कैसे लगाए जाए।

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