'भवन संगीत शिखर सम्मान' प्रदान किया गया, ओडिसी और कथक की अद्भुत प्रस्तुतियों से सजी सांस्कृतिक संध्या
संवाददाता
नई दिल्ली। भारतीय विद्या
भवन, दिल्ली केंद्र ने आज अपने 87वें स्थापना दिवस का भव्य आयोजन 17वें संगीत समारोह के रूप में किया। भारतीय शास्त्रीय कला और
संस्कृति के इस उत्सव का आयोजन नई दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता
श्री बनवारीलाल पुरोहित ने की, जो भारतीय विद्या
भवन के उपाध्यक्ष व न्यासी होने के साथ-साथ दिल्ली केंद्र के अध्यक्ष भी हैं। श्री
पुरोहित पंजाब, तमिलनाडु तथा असम एवं
मेघालय के राज्यपाल रह चुके है और एक अनुभवी प्रशासक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण
वाले राजनेता हैं। वे लंबे समय से भारतीय विद्या भवन की उस परंपरा से जुड़े हैं जो
भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक
धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रही है।
अपने संबोधन में श्री बनवारीलाल पुरोहित ने समाज में कला, साहित्य और संस्कृति की भूमिका पर बल देते हुए कहा, "कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू जी से कहा था कि जहाँ-जहाँ राजनीति फिसलती है, वहाँ वहाँ साहित्य उसे संभालता है। उन्होंने डॉ. जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर का उल्लेख करते हुए कहा, ओपेनहाइमर ने कहा था कि कला के बिना विज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि, जी समाज विज्ञान और संस्कृति की उपेक्षा करता है, वह धीरे-धीरे पलन की ओर बढ़ता जाता है। श्री पुरोहित ने यह
घोषणा भी की कि जनवरी से भारतीय विद्या भवन एक नई सदस्यता योजना प्रारंभ करेगा,
जिससे अधिक से अधिक लोग भवन की सांस्कृतिक और
शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ सकेंगे। उन्होंने पह भी कहा कि भारतीय विद्या भवन आज
भी कुलपति के. एम मुंशी द्वारा महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में स्थापित आदर्शों
को आगे बढ़ा रहा है और 'संस्कृत एवं
संस्कृति के संदेश को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोए हुए है।
कार्यक्रम में दिल्ली
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांबरे मुख्य अतिथि के रूप में
उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में भारतीय विद्या भवन के कार्यों की सराहना
करते हुए कहा कि यह संस्था भारतीय कला और परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर
रही है।
संध्या का शुभारंभ
प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना विद्वषी मधुलिता मोहापात्रा की प्रस्तुति "भाव और
भक्तिः सेक्रेड स्टेप्स ऑफ डिवोशन से हुआ, जिनके साथ श्रीमती साहना आर. मैया और श्रीमती पारिधि जोशी थीं। प्रस्तुति की
शुरुआत भगवान जगन्नाथ की वंदना से हुई, जिसमें आशीर्वाद और कृपा की प्रार्थना की गई। इसके पश्चात मल्हारी पल्लीवी
(राग मल्हार, तात्त एकताल) का सुंदर
नृत्य प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में रमते यमुना पुलिन वने एकल प्रस्तुति तथा
गीत गोविंद के 22वें सर्ग की संस्कृत रचना
कल्याण अष्टपदी राधा अदन' युगल रूप में
प्रस्तुत की गई। अंत में हरि स्मरणे माडो (पुरंदर दास की रचना) के साथ यह
प्रस्तुति समाप्त हुई। लगभग एक घंटे की इस नृत्य-यात्रा ने दर्शकों की भक्ति,
सौंदर्य और लपात्मकता के अनोखे संगम से अभिभूत
कर दिया।
इसके पश्चात "भवन
संगीत शिखर सम्मान" एक प्रतिष्ठित कलाकार को भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य
में जीवनपर्यंत योगदान के लिए प्रदान किया गया। इस अवसर पर प्रो. (डा.) गाशिबाला,
अधिष्ठाता, नंदलाल नुवाल सेंटर ऑफ इंडोलॉजी, ने प्रशस्ति-पत्र का वाचन किया और न्यायमूर्ति नितिन
वासुदेव सांबरे ने सम्मान प्रदान किया।
संगीत समारोह के दूसरे
भाग में विदुषी विधा लाल ने अपनी अद्भुत कथक प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध
किया। उनके साथ संगीत संगति में श्री शुहेब हसन (स्वर), श्री हिरेन चाते (तबला), श्री आशीष गंगानी (पखावज) और श्री
आमिर खान (सरंगी) थे। कथक
की तप, नाद और नृत्य सौंदर्य का
यह संगम दर्शकों की जोरदार तालियों से सराहा गया।
कार्यक्रम के अंत में
श्री के. शिव प्रसाद, निदेशक, भारतीय विद्या भवन, दिल्ली केंद्र ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी अतिथियों, कलाकारों तथा दर्शकों का आभार व्यक्त किया।
17वां संगीत समारोह भारतीय
विद्या भवन की उस निरंतर परंपरा का प्रतीक रहा जिसमें भारतीय शास्लीय कलाओं का
संरक्षण, संवर्धन और सम्मान प्रमुख
उद्देश्य रहा है। 1938 में कुलपति के. एम.
मुंशी द्वारा महात्मा गांधी के प्रेरणा-संकेत पर स्थापित भारतीय विद्या भवन आज भी
भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सेतु का कार्य कर रहा है और शिक्षा, कला तथा संस्कृति के माध्यम से पीढ़ियों को जोड़ रहा है।
कार्यक्रम सार्वजनिक रूप
से निःशुल्क प्रवेश हेतु खुला था तथा इसे भारतीय विद्या भवन दिल्ली केंद्र के
आधिकारि YouTube और Facebook पेजों पर प्रत्यक्ष प्रसारित (Live-stream) भी किया गया, जिससे देश-विदेश के दर्शक इस सांस्कृतिक संध्या का आनंद ले सके।