गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

बहुविवाह और इस्लाम

 अफ़ीफ़ अहसन

असम की विधानसभा ने एक ऐसा कानून पारित किया है जो कथित तौर पर वैवाहिक ज़िम्मेदारी को मज़बूत करने और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किया गया है। सरकार इसे भारत में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) के ख़िलाफ़ सबसे सख़्त क़ानूनी ढाँचों में से एक बता रही है।

असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 का मूल उद्देश्य पहली शादी को कानूनी तौर पर समाप्त किए बिना दूसरी शादी करने को सजा योग्य अपराध घोषित करना है। यह कानून विभिन्न उल्लंघनों के लिए कड़ी सज़ाएँ लागू करता है। यह बहुविवाह के अपराध को संज्ञेय (Cognisable) (बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति) और गैर-जमानती (Non-bailable) (जहाँ ज़मानत हक़ के तौर पर सुनिश्चित नहीं है) के रूप में वर्गीकृत करता है।

इस कानून में जो व्यक्ति नई शादी करने के लिए अपनी पिछली शादी को छिपाते हैं, उन्हें 10 साल तक की कैद हो सकती है। इस कानून में पहली शादी को भंग किए बिना अवैध दूसरी शादी करने पर 7 साल तक की कैद की सज़ा है। और जो भी व्यक्ति बार-बार यह अपराध करता पाया गया, उसे कानून के तहत निर्धारित सज़ा से दुगुनी सज़ा मिलेगी। इस शादी को करने में मदद देने वाले धार्मिक पुजारियों या मौलवियों को जो ऐसी शादियाँ कराते हैं, 1.5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके साथ ही साथ जो व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शादियों के बारे में अधिकारियों से जानकारी छिपाते या इसमें देरी करते हैं, उन्हें 2 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा, यह कानून नागरिक अयोग्यताएँ भी लगाता है। इस कानून के तहत दोषी ठहराया जाने वाला व्यक्ति राज्य से वित्तीय सहायता प्राप्त सार्वजनिक रोज़गार के लिए पात्र नहीं होगा और उसे असम में कोई भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा।

भारत में बहुविवाह की राष्ट्रीय दर लगभग 1.4 प्रतिशत है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और अलग-अलग समुदायों में अंतर पाया जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आँकड़ों के अनुसार, ईसाइयों में यह दर मुसलमानों से अधिक 2.1 प्रतिशत है, इसके बाद मुसलमानों में 1.9 प्रतिशत और हिंदुओं में 1.3 प्रतिशत है। यह दर अनुसूचित जनजातियों में सबसे अधिक है। कुल दर समय के साथ कम हो रही है, जो 2005-06 में 1.9 प्रतिशत थी और 2019-21 में कम होकर 1.4 प्रतिशत हो गई है।

हालाँकि इस कानून को यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर एक कदम माना जा रहा है, मगर यह कानून राज्य की पूरी आबादी पर समान रूप से लागू नहीं होता है। इस कानून में जनजातियों को इससे स्पष्ट रूप से छूट दी गई है। असम के अंदर विशिष्ट जनजातीय समूह। छठे शेड्यूल के तहत राज्य के अंदर संवैधानिक रूप से स्व-शासित क्षेत्र इन प्रावधानों से मुक्त हैं। भारत में बहुविवाह के आँकड़े बताते हैं कि आदिवासियों में यह सबसे ज़्यादा 2.4 प्रतिशत है।

असम और उत्तराखंड में की जाने वाली कानून के निर्माण को इन राज्यों के अंदर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अपवाद को खत्म करने की कोशिश के तौर पर दिखाने की कोशिश की जा रही है। मगर कांग्रेस के इसकी मुख़ालफ़त से हट जाने के बाद इस बात में कोई वज़न नहीं रह गया है और कांग्रेस के ऐसा करने को अपने महिला वोट बैंक को बचाने की एक कोशिश के तोर पर देखा जा रहा है।

इस बिल को शुरूआत में विपक्षी पार्टियों के विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें कांग्रेस, एआईयूडीएफ, सीपीआई (एम) और राइजोर दल शामिल थे। इन पार्टियों ने शुरू में मांग की कि बिल को आगे की जाँच के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए और कई संशोधन पेश किए। मगर मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद कांग्रेस और राइजोर दल ने संशोधनों के अपने दावे वापस ले लिए। मगर एआईयूडीएफ और सीपीआई (एम) ने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया और अपनी मौजूदा शक्ल में बिल का विरोध जारी रखा।

बहुविवाह को अवैध घोषित करने वाला अगला राज्य गुजरात हो सकता है। राज्य सरकार ने फरवरी में एक समान नागरिक संहिता (UCC) की ज़रूरत की समीक्षा करने और UCC का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति गठित की थी। समिति की अगुआई जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं, जिन्होंने उत्तराखंड में भी इसी तरह के एक पैनल की अगुआई की थी जिसने वहाँ UCC का मसौदा तैयार किया था। 2015 में, गुजरात हाई कोर्ट ने मुसलमानों में बहुविवाह के ख़ात्मे की बात की थी। एक आदेश में, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जो इस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, ने इस प्रथा को संविधान के ख़िलाफ़ और "पित्तंत्रात्‍मक तौर पर निरंकुश" बताया था।

देशभर में मुस्लिम अधिकार संगठन बहुविवाह को सज़ा योग्य अपराध बनाने की माँग कर रहे हैं। मुंबई मैं तीन सौ से अधिक नागरिकों, जिनमें महिलाओं के अधिकारों के कार्यकर्ता, फ़िल्मकार, नाटककार, सामाजिक सुधारक, कलाकार, शिक्षाविद् और अन्य शामिल हैं, ने मुस्लिम बहुविवाह (polygamy) पर क़ानूनी प्रतिबंध की माँग करने वाली एक याचिका का समर्थन किया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें यह पाया गया कि मुस्लिम बहुविवाह की शिकार 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ चाहती हैं कि मुस्लिम पुरुषों के लिए बहुविवाह को एक फ़ौजदारी अपराध घोषित किया जाए। हालाँकि भारतीय न्याय संहिता बहुविवाह को अपराध घोषित करती है, लेकिन भारतीय मुस्लिम पुरुषों को व्यक्तिगत कानूनों के तहत इससे छूट मिली हुई है।

इस्लाम और बहूपति (एक से ज़्यादा पति) को इस्लाम पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है, जैसा कि हिमाचल प्रदेश की कुछ जनजातियों में प्रचलित है, लेकिन बहुविवाह (एक से ज़्यादा पत्नियाँ) को आम तौर पर इस्लाम से जोड़ा जाता है। इस्लाम धर्म को बदनाम करने की कोशिश में, कुछ तत्व यह प्रचार करने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम पुरुषों के लिए कई पत्नियों को अनिवार्य बनाता है, जो एक स्पष्ट झूठ है। दूसरे ग़लती से दावा करते हैं कि मुस्लिम पुरुषों को कई महिलाओं से शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया हैजो कि इस्लाम की सतही व्याख्या पर आधारित है।

हालाँकि इस्लाम पुरुषों को चार महिलाओं तक शादी करने की अनुमति देता है, जो कुछ शर्तों के अधीन है जैसे कि पत्नियों के बीच पूर्ण समानता सुनिश्चित करना, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता। दरअसल, इस्लाम के मूलभूत ग्रंथों क़ुरान और सहीह हदीसका अध्ययन दर्शाता है कि इस्लाम वास्तव में पुरुषों को एक ही समय में एक से अधिक महिलाओं से शादी करने से हतोत्साहित करता है।

क़ुरान के अवतरण के समय मानव इतिहास के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ होता कि बहुविवाह को पूरी तरह से त्याग दिया जाता। इसलिए, इस्लाम ने बहुविवाह को अवैध घोषित नहीं किया, बल्कि इस पर चार की सीमा लगाई और यह कहते हुए कि "एक ही बेहतर है अगर तुम्हें लगे कि तुम इंसाफ़ न कर सकोगे" वक़्त गुज़रने के साथ-साथ इसको व्यवस्थित करने और इसकी हतोत्साहित करने की कोशिश की, जिससे मुसलमानों को नए सामाजिक ढाँचों के अनुरूप ढलने का लचीलापन प्रदान किया गया, जबकि वे शरीयत की सीमाओं में भी रहे। क़ुरान मजीद में अल्लाह का फ़रमान है:

और अगर तुम्हें ख़ौफ़ है कि तुम इन्साफ़ ना कर सकोगे यतीमों के बारे में, तो औरतों में से जो तुम्हें पसंद हों तो निकाह करो, दो, तीन और चार, पस अगर तुम्हें ख़ौफ़ हो कि तुम अदल ना करसकोगे तो सिर्फ एक,...'' सूरह अन-निसा (4:3)

बहुविवाह अब ज़्यादातर समाजों में सामान्य नहीं रहा। सामाजिक व्यवस्था और कल्याणकारी प्रणालियों में बदलाव की वजह से विधवा और तलाक़शुदा महिलाएँ अब ज़िंदा रहने के लिए दूसरे पुरुषों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं हैं। लंबी दूरी का सफ़र पहले के मुकाबले बहुत शांतिपूर्ण और तेज़ है। प्राचीन काल में युद्ध पुरुषों के बीच लड़े जाते थे जिनमें काफ़ी संख्या में औरतें विधवा और बच्चे यतीम हो जाते थे, मगर आज युद्ध कायरता से लड़े जाते हैं जिनमें हवाई हमले और ड्रोन हमले शामिल होते हैं जो अंधाधुंध मर्दों, औरतों और बच्चों को एकसमान निशाना बनाते हैं।

आज ज़्यादातर मुस्लिम देशों में बहुविवाह बहुत दुर्लभ है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान और मिस्र में एक प्रतिशत से भी कम मुस्लिम पुरुष एक से ज़्यादा जीवनसाथी के साथ रहते हैंये सब ऐसे देश हैं जहाँ कम से कम मुसलमानों के लिए यह प्रथा कानूनी है। ये देश करोड़ों मुसलमानों का घर हैं, जिनकी संस्कृतियाँ और भाषाएँ विविध हैं। हक़ीक़त यह है कि ऐसे समाजों में बहुविवाह सामान्य के क़रीब भी नहीं है, यह शरीयत के संदर्भ में इसकी हतोत्साहन की नापसंदगी की तरफ़ इशारा करती है।

वसुधा की बेटी : वैचारिक सौंदर्य बोध

डॉ. वीणा गौतम

नारी एक ऊर्जा का सागर, सूर्य का दिव्य प्रकाश, निरंतर बहती हुई सदानीरा और कर्म के चाक की धुरी है। वह जीवन के सुन्दर समतल में बहने वाली पीयूष-स्रोत मात्र नहीं है। वह तो चिरन्तन काल से स्वयं-सिद्धा है। केवल उसके नाम बदल जाते हैं। नए नाम, नए रूप और नई शैली में नारी की कथा व्यथा कही जाती है। सीता ने तो अग्नि-द्वार लाँघा था, सती तो अग्नि में ही भस्म हो गई थी और पांचाली ने अपमान का ऐसा विष ग्रहण किया कि वह उसकी चूड़ामणि और सुन्दर श्यामल केशों में ही एकत्र हो रूक गया था। परिवर्तित होते युग की आवश्यकता है कि कहानी कोई भी हो, परन्तु उसका सम्प्रेषण और प्रस्तुतिकरण बदल जाएगा।

वसुधा की बेटी की कथा भी हरि-कथा की भांति विभिन्न आयामी है, लेखिका स्वयं मातृ-शक्ति है। माँ, सासु-माँ, चाची, भगिनी और सुपुत्री जैसी मातृ शक्ति को विभिन्न कठिनाइयों और समस्याओं से संघर्ष करते हुए, उसी से शक्ति ग्रहण करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते देखा व अनुभूत किया है। सम्भवतः इसीलिए सभी भावों को शब्दों में बाँधते समय जगत जननी सीता ही एक बीज बनकर मन के भीतर विचरण कर रही थी वैसे ही जैसे पंचभूत में प्राण-चेतना। सीता का भाव रक्त-मज्जा के साथ मन, हृदय और आत्मा में बहना कोई हँसी-खेल नहीं, यह सात समन्दर की गहराइयों में डूब कर नारी शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने का जोखिम भरा कार्य है। लेखिका मानती हैं कि "प्रकृति ने नर और नारी को समान बनाया है, यदि पुरुष शारीरिक रुप से सशक्त है तो स्त्री भावना में, यदि पुरुष में रक्षक भाव होता है तो स्त्री में सहनशक्ति अधिक होती है। सृष्टि का विस्तार दोनों के संयोग के बिना हो ही नहीं सकता।"

उपन्यास की धुरी है राम-सीता की कथा। पहले अथ से इति तक राम या उनसे जुड़े सन्दर्भ और प्रसंग होते थे परन्तु नारी सशक्तिकरण के युग में जहाँ एक ओर *सिया के राम धारावाहिक बनता है वहीं इस उपन्यास की धुरी भी सामान्य स्त्री तो नहीं हो सकती थी, वह जो नारियों में श्रेष्ठ थी सर्वगुण सम्पन्न धैर्य की मूर्ति साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा थी। भूमि के गर्भ से उत्पन्न वह भूमिजा कहलाती है। विदेहराज जनक की कथा से ही मूल कथा का ताना-बाना है। अकाल की भयावह स्थिति से जूझते जूझते समाधान पाने हेतु स्वर्ण से निर्मित हल चलाते हुए सन्दूकची में एक नन्हीं लक्ष्मी-सरस्वती स्वरूपा जैसी कन्या की प्राप्ति, पति-पत्नी का उसे गोद में उठाना और इधर वर्षा का आना- भले ही संयोग हो परन्तु प्रजा के कल्याणार्थ राजा की निष्ठा का निदर्शन भी है। इसी कथा-सूत्र को प्रासंगिक कथाओं के साथ बढ़ाया गया है।

समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी, कामधेनु और उच्चैश्रवा अश्व भी निकले थे। इस उपन्यास में राजा का हल चलाना भी समुद्र-मंथन से कम न था। सीता जैसी लक्ष्मी के साथ-साथ गौरी गाय का बछिया देना और अरबी व्यापारियों से ख़रीदे गये अश्व वीर और वीरा की सन्तान का जन्म हुआ जिसका नाम था बादल। लेखिका ने इस प्रसंग को बहुत खूबसूरती से सागर-मन्थन से जोड़ा है। इसी प्रकार गज और ग्राह की और मिथिला का नाम की कथा भी मूल कथा को आगे बढ़ाती है। ऐसी कथाओं से मूल कथा रोचक और सरसता के साथ-साथ पाठक की जिज्ञासु वृत्ति को भी कौतुहलता से भर देती है। लेखिका पाठक के रसानन्द की पूर्ण रक्षा करती है। राजा जनक की पुष्प-वाटिका की संकल्पना अद्भुत थी कि कभी पतझर न हो, पुष्प सदैव खिले रहें, निर्झरिणी जल से सदैव परिपूर्ण हो और महादेव का धनुष भी सुरक्षित रहे। अग्नि तत्व के रूप में अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित हो जो सूर्य की किरणों से ज्योतिर्मय हो। और विश्वकर्मा और उसके साथियों ने जड़ चेतन को समरस कर ऐसी निर्मिति की कि इस सृष्टि के सभी जीवों का महत्त्व है, सभी की उपयोगिता है। लेखिका के न केवल प्रकृति-प्रेम की झलक मिलती है बल्कि छायावादी कवियों की तरह प्रकृति का यहाँ मानवीकरण भी है। इससे कथा की रोचकता और उत्सुकता को चार चाँद लग जाते हैं।

उपन्यास का फ़लक विस्तृत है। जनकराज और सुनयना के संवाद दो धारी हैं एक ओर प्रश्न उठते हैं तो साथ ही समाधान आ जाता है। पुत्र के न होने से वंश कैसे चलेगा? हमारी मुक्ति कैसे होगी? राजा जनक उत्तर में एक ओर कन्या-रत्न की प्रतिष्ठापना तो दूसरी ओर दार्शनिक, अध्यात्मिक और कर्म पर बल देते हुए कहते हैं कि" जहाँ तक मेरी जहाँ तक मेरा ज्ञान और दृष्टि देख रही है इन पुत्रियों के कारण ही हम और हमारा वंश जाना जाएगा- ये काल के पद पर कुछ ऐसा लिख कर जाएंगी जो अकल्पनीय होगा आज जहाँ तक मुक्ति का प्रश्न है, तुम निर्भय और और निर्विकल्प होकर कर्म करती रहो, कोई किसी को मुक्ति नहीं दिलवाता, यह तो जीव का ब्रह्म के मध्य का रिश्ता है जितना वह घनिष्ठ होगा उतना ही जगत् से मुक्ति प्रदान करने वाला होगा। इस प्रकार के आध्यात्मिक संवादों से कथा में प्रभावान्विति का गुण सहज ही व्याप्त हो जाता है।

भारतीय संस्कृति सृजनात्मक और सत्य है। सत्य जीवन-सापेक्ष है। इस तथ्य को लेखिका ने समझा और गुणा भी है। इसी लिए सुनयना के माध्यम से विवाह पूर्व ही अपनी बेटियों को वह बताती हैं कि जीवन मात्र भोग और ऐश्वर्य का नहीं धैर्य, त्याग और समर्पण का नाम है। मनुष्य के लिए जीवन सहज और सरल नहीं होता, हर क्षण उसे कुछ कसौटियों से और कुछ अग्नि-द्वारों से गुज़र कर ही विकास पाता है। उपन्यासकार की विशेषता यह है कि विवाह सम्बन्धित सभी छोटे बड़े रीति-रिवाजों को सामाजिक रीतियों से सम्पन्न किया गया। बेटियों की विदाई से पूर्व दहलीज़ का पूजना, दीवारों पर छापे लगाना, चावलों को उछालना आदि। जीवन के नए अध्याय के प्रारम्भ में ही लेखिका ने नव दम्पत्तियों के लिए जीवन के चारों पुरूषार्थों का ज़िक्र कर बताया कि मानव सभ्यता को नए अर्थ और आदर्शों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए नए प्रतिमान गढ़ना अनिवार्य होता है।

संस्कृति सामाजिक त्यौहार और पर्वों से सजती है। इसीलिए नीलमजी ने पर्व-त्यौहारों का भी खूब चित्रण किया है। दीपावली पर सागर-मन्थन से निकली लक्ष्मी का पूजन, धन्वन्तरि के आगमन से धन तेरस राम-राज्याभिषेक से भाई-दूज, छठ-पूजा, रंग-पंचमी, नवरात्र और रक्षा-बन्धन जैसे त्यौहार हमारे मन को ऊर्जस्वित करते हैं। सम्पूर्ण उपन्यास में न किसी का किसी से मनमुटाव है न कोई झगड़ा परन्तु जब राजा दशरथ ने उत्तराधिकारी की घोषणा करने पर विचार किया, उसी क्षण शंका हुई, कि राम के राज्याभिषेक की गोपनीयता आवश्यक है क्योंकि आन्तरिक राजनीति बहुत गम्भीर है। कैकये का राजवंश राम को राजा बनते नहीं देखना चाहेगा। उनके गुप्तचर महल के भीतर भी हैं जो पल-पल की सूचना पहुँचाते हैं। यहाँ से डर, भय, सन्देह, अविश्वास का वातावरण बना और राम के वनगमन तक बना ही रहा।

उपन्यास लेखिका की लेखनी की विशेषता यह रही कि खड़ी बोली और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ मुहावरों का सटीक प्रयोग किया है जो कथ्य को रोचक और सरस बनाते हैं। पृष्ठ ८४ से लेकर९० तक मन्थरा और कैकेयी के संवादों में लगभग तीस मुहावरे हैं जो कथा में अपनी सटीकता के कारण रोचकता, कौतूहल और उत्सुकता की त्रिगुणात्मक शक्ति भर देते हैं। उपन्यास के अन्त में जब प्रचेता वाल्मीकि अपने आराध्य महादेव की सौगन्ध लेकर बताते हैं कि सीता गंगा जैसी पावन है। ऐसी महान नारी ना संसार में हुई है और न होगी। युगों-युगों तक सीता के पावन चरित्र का उदाहरण दिया जाएगा। ऐसे शब्दों से एक ओर प्रजा भाव-विभोर होकर सिया राम के नारे लगाती है और दूसरी ओर मर्यादा पुरूषोतम राम सीता को पवित्रता सिद्ध करने के लिए शपथ के लिए कहते हैं। यह सुन कर सीता अबला बन कर न रोई न चिल्लाई, न करुणामयी होकर किसी पर दया दिखाई। उसने आज की स्थिति को प्रतिबिम्बित कर दिया कि नारी पर मिथ्या आरोपण करने वालों को कोई दण्ड नहीं, नारी का अपमान करने वाले समाज में मुक्त भाव से घूमते हैं अब नहीं कह कर नारी सशक्तीकरण का ठोस स्तम्भ बन कर ही नहीं साक्षात् दुर्गा का, महिषामर्दिनी का रूप धारण कर नारी की गरिमा को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित कर धरती से आश्रय माँगती है। और 'भूमिजा' भूमि में ही विलीन हो जाती है। 'वसुधा की बेटी उपन्यास का उद्देश्य अत्यन्त प्रभावशाली है जब पाठक की शिराओं में भी बहता हुआ रक्त उबलने लगता है।

कुल मिला कर लेखिका ने सीता की कथा कह कर नारी के लिए "स्वयं सिद्धा" बनने का मार्ग प्रशस्त किया है। एक सुगठित, सशक्त, उत्कृष्ट कथा को विभिन्न छोटी-बड़ी प्रासंगिक कथाओं और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को संरक्षित रखते हुए संस्कृतनिष्ठ शब्दों और प्रचलित मुहावरो में पिरो कर एक भव्य और उदात्त सन्देश देते हुए नारी की गरिमा को स्थापित किया है।

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