गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

यह कैसी राजनीतिक भाषा है

अवधेश कुमार

संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। हमारी आपकी पूरे देश की नियति इनके हाथों हैं। जाहिर है, नेताओं से उनके महत्वपूर्ण दायित्व के अनुरुप ही गरिमामय, संतुलित और सम्पूर्ण विवेक के साथ अपनी भूमिका निभाने की अपेक्षा की जातीं हैं। लेकिन चुनाव के समय जिस तरह के बयान हमारे नेता दे रहे हैं उनसे पूरे देश को धक्का लग रहा है। यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि सारे दलों के सारे नेताओं ने अपने ंबयानों से गरिमा को गिराया है, पर समग्र परिदृश्य शर्मसार अवश्य कर रहा है।  गंदे, असभ्य, घृणा, हिंसा.....सांप्रदायिकता...यानी हर प्रकार की आपराधिक भाषा का प्रयोग अभी तक हमारे सामने आ चुका है। अवाम सन्न है, देश का सोचने समझने वाला समूह चिंतित है, लगातार आलोचनाएं हो रहीं हैं......थू-थू किया जा रहा है, पर लगता है जैसे कुछ नेताओं को राजनीति की सभ्यता, मर्यादा, गरिमा का अहसास ही नहीं हैं। वे मानते हैं कि हम कहीं गैंगवार में कूदे हैं और सामने वाले पर उसी रुप में हमला करना है। यह संयोग है या इस चुनाव की तासीर कि इनमें से ज्यादातर अमर्यादित शब्दों का प्रयोग भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ हुए हैं। 

आइए पहले कुछ बयानों को देखिए। उत्तर प्रदेश में केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी को आरएसस का गुंडा तथा राजनाथ सिंह को उनका गुलाम कहा है तो प्रदेश के ंमंत्री आजम खान ने मोदी को कुत्ते के पिल्ले का भाई एवं शाबिर अली को ईमान फरामोश। वहीं मुरादाबाद में बसपा के उम्मीदवार हाजी याकूब कुरैशी ने नरेंद्र मोदी को देश का सबसे बड़ा दुश्मन, सबसे जालिम शख्स, हैवान और दरिंदा कहा। जब उनसे असंसदीय टिप्पणी को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि कुछ भी असंसदीय नहीं है, संसद में भी ऐसी ही भाषा बोली जाती है। इस तरह के बयान देना कुरैशी के लिए कोई नई बात नहीं है। 2006 में डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का सर कलम करने पर कुरैशी ने 51 करोड़ देने का एलान किया था। कैराना से सपा के लोकसभा प्रत्याशी नाहिद हसन ने तो मायावती एवं मोदी दोनों को कुंवारा कहते हुए ऐसी अश्लील टिप्पणी की जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकतीं। उन्होंने कहा कि मायावती तीन-तीन बार मोदी की गोद में जाकर बैठ गईं। मत भूलों की दोनों कुंवारे हैं। उन्होंने कहा कि पहले मायावती को उनके बाबा ने हराया था, उसके बाद में उनके पिता से एक बार उनका पाला पड़ा था और अब यदि उनसे उसका पाला पड़ा तो आप खुद ही देख लो। मानो खानदानी दुश्मनी हो। लखनउ के गेस्ट हाउस कांड में उनके पिता मुनव्वर हसन का नाम भी उछला था। सपा के राज्समंत्री चौधरी साहब सिंह ने तो मोदी को बंदर बता दिया। उन्होंने कहा कि बंदर को भगाने के लिए लंगूर की जरूरत होती है। मोदी नाम के इस बंदर को भगाने के लिए अखिलेश लंगूर की जरूरत है। हालांकि अखिलेश को जैसे ही उन्होंने लंगूर बताया, उपस्थित लोग हंसने लगे, उन्हें लगा कि अखिलेश का नाम लंगूर के रुप में लेना शायद उचित नहीं था, पर तब तक जुबान तो फिसल चुकी थी। बसपा के नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने तो कहा कि नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश पहुंच ही नहीं सकता। यदि आप सब इकट्टा हो जाओ तो रास्ते में ही उसका काम तमाम हो जाएगा। यानी मार डाला जाएगा।  

इन सबमें सबसे ज्यादा सुर्खियों में सहारनपुर से कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद का बयान था। एक वीडियो में इमरान कह रहे हैं कि मोदी उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाना चाहता है। गुजरात में चार फीसद मुसलमान हैं और इस इलाके में 42 फीसद मुसलमान है,यहां उनकी बोटी-बोटी काट देंगे। यानी मोदी को टुकड़े-टुकड़े काट देंगे मुसलमान। बाद में पुलिस ने मसूद को गिरफ्तार किया एवं देवबंद न्यायालय ने उनको 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अब वे जमानत पर बाहर हैं। कांग्रेस ने यह कहते हुए उनका बचाव किया है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ जो इमरान मसूद का बयान है वो उन्होंने 18 सितंबर 2013 को दिया था। उस समय इमरान मसूद समाजवादी पार्टी में थे। इमरान मसूद ने आठ मार्च 2014 को कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की है। उसका आरोप है कि सपा ने यह वीडियो जारी किया है। इसे मान लें तो प्रश्न है कि छः महीना पहले बोले जाने से वह सही कैसे हो गया?  मामला सामने आने के बाद मसूद ने कहा कि उन्होंने जो अपशब्द कहे उनपर उन्हें खेद है। लेकिन उनका कहने का अर्थ वह नहीं था जो निकाला जा रहा है। मेरे बयान का आशय नरेंद्र मोदी को राजनीतिक सबक सिखाने से है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आम बोलचाल की भाषा में इस तरह कह दिया जाता है। इस सूची में राकांपा प्रमुख शरद पवार का भी नाम आ गया है। हालांकि वह ज्यादा आपत्तिजनक नहीं है। उन्होंने कहा है कि नरेंद्र मोदी का दिमाग खराब हो गया है। इस बार भी हमारी सरकार बनेगी और इसके बाद हम मोदी का अच्छे डॉक्टर से इलाज कराएंगे। ऐसा नहीं है कि इसमें केवल भाजपा इतर पार्टियां ही सुर्खियां पा रहीं हैं। भाजपा के एक सांसद हीरालाल रेगर ने राजस्थान के टोंक में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आ गई तो सोनिया और राहुल के कपड़े उतार कर उन्हें फिर से इटली वापस भेज देंगे। बाद में हीरालाल रेगर ने अपने बयान पर माफी भी मांग ली लेकिन तब तक उनके इस बयान से हंगामा मच चुका था। 

ये तो कुछ बानगियां हैं जो संयोग से कैमरे की पकड़ में आ गईं। न जाने कहां कहां ऐसे अपराधियों की तरह  हिंसा और भय पैदा करने वाले बयान दिए जा रहे होंगे। हमने अपनी राजनीति में एक दूसरे को कुत्ता से लेकर संसद में एक दूसरे का बहनोई और साला कहते सुना है। जब हमारी राजनीति का स्तर इतना गिर गया हो तो फिर शब्दानुशासन, सोच और अभिव्यक्ति में मर्यादा का पालन करने वाले कितने बचेंगे। लेकिन ऐसे बयानों पर नेताओं को जनता की तालियां मिलतीं हैं। इससे पता चलता है कि हमने जनमत को कितना विकृत कर दिया है। जनता के अंदर सकारात्मक सोच, राजनीति और सत्ता के प्रति विवेकशील विचार पैदा करने का दायित्व राजनीतिक दल, सामाजिक-धार्मिक संगठन और मीडिया का है। निस्संदेह, इसमें चूक हुई है और जन मनोविज्ञान विकृत हो रहा है, अन्यथा ऐसे नेताओं को जनता का समर्थन कतई नहीं मिलता और ये नकार दिए जाते। ऐसा हो नहीं रहा है इसलिए ये इस तरह लोकतंत्र में आम राजनीति को इस तरह अपनी हिंसक, अश्लील, आपराधिक बयानों से विकृत करते हुए भी राजनीति में जमे हुए हैं।

संसदीय लोकतंत्र की कल्पना करते हुए यह माना गया था कि नेता और दल मिलकर तंत्र में लोक की महत्ता स्थापित करने की प्रतिबद्धता से काम करेंगे। इसमें चुनावी प्रतिद्वंद्विता को वैसे ही माना गया था जैसे एक ही लक्ष्य के लिए सारे प्रतिस्पर्धी लगे हैं, केवल सोच यह है कि हम जनता की सेवा उनसे बेहतर कर सकेंगे। धीरे-धीरे यह भाव विलुप्त हो गया है और राजनीति का मूल सरोकार सत्ता पाना तथा ज्यादातर नेताओं का सत्ता के माध्यम से अपनी शक्ति और संपदा विस्तार हो गया है। इस सोच के कारण विकृत राजनीति में ऐसे नेताओं की बहुतायत होती जा रही है जो येन केन प्रकारेण केवल चुनाव जीतने के लिए ही आते हैं। इसके लिए चाहे जातिवाद को उभारना हो, संप्रदायवाद को, चाहे धन से किसी को खरीदना हो या भय से दबाव में लाना हो या फिर हर व्यक्ति के अंदर की नकारात्मकता को उभारना हो......वे सारे हथियार आजमा रहे हैं। इसमें स्वयं को सामने वाले से ज्यादा बाहुबली, धनबली, निडर, हिंसक टकराव की हिम्मत रखने वाला........जो भी साबित करना हो वे करते हैं। 

हालांकि इन सबके बावजूद यह निष्कर्ष उचित नहीं होगा कि राजनीति में सब कुछ खत्म हो गया है। ऐसे बयानों की निंदा भी हो रही है इसका विरोध भी हो रहा है। दूसरे, यह भूलें कि प्रतिस्पर्धी राजनीति में विरोधी की तीखी आलोचना, तीखा व्यंग्य आदि राजनीति के लिए अपरिहार्य हैं। ये अलंकार भी हैं। इनको बिल्कुल खत्म नहीं करना चाहिए। जैसे किसी को व्यंग्य में मानसिक असंतुलन का शिकार, गुब्बार फूटना या गुब्बारा बना ही नहीं......ऐसे शब्द प्रयोगों से आपत्ति नहीं होनी चाहिए। फिर यदि कोई भ्रष्ट है, उसने कदाचार किया है तो वहां केवल शब्द प्रयोग आपराधिक न हो, अन्यथा वैसे व्यक्ति या समूह पर हमला बिल्कुल जायज है। ऐसा नहीं होने से ही हमारी राजनीति में पक्ष और विपक्ष का स्वाभाविक भेद मिटने लगा है। हां, आवश्यक और उचित हमला, आलोचना, निंदा तथा असभ्य, हिसंक, अशालीन टिप्पणियों के बीच भेद अवश्य करना होगा।  

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


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