इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता की कुछेक घटनाएँ केवल अतीत का वृत्तांत नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना को दीर्घकाल तक दिशा देने वाली मानक बन जाती हैं। ऐसी घटनाएँ समय के प्रवाह में कभी विस्मृत नहीं होतीं, क्योंकि उनमें सत्य, धर्म-रक्षा, नैतिक साहस, आध्यात्मिक दृढ़ता और राष्ट्रीय चेतना का ऐसा समन्वय होता है, जो हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बना रहता है। दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों, बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (6 वर्ष) की शहादत ऐसी ही अद्वितीय घटना है। अल्पायु में उन्होंने जो साहस, धैर्य और आत्मबल प्रदर्शित किया है, उससे स्पष्ट होता है कि धर्म, सत्य और राष्ट्र की रक्षा आयु या सामर्थ्य पर नहीं, बल्कि चेतना और चरित्र पर निर्भर करती है।
वर्ष 1705 में आनंदपुर से बिछुड़कर माता गुजरी जी के साथ छोटे साहिबजादों का सरहिंद पहुँचना केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह उस ऐतिहासिक क्षण की भूमिका बनी, जहाँ सत्ता और विवेक आमने-सामने खड़े थे। सरहिंद के सूबेदार वज़ीर ख़ान द्वारा किया गया धर्म परिवर्तन का दबाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस समय की सत्ता की मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ आस्था को बलपूर्वक बदला जा सकता है। किंतु छोटे साहिबजादों के साहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्म कोई बाहरी आवरण नहीं, बल्कि अंतःकरण की प्रतिबद्धता है। “हम अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे”, यह कथन केवल साहस का उद्घोष नहीं, बल्कि उस सोच की घोषणा थी कि सत्य को किसी भी प्रकार के दमन या प्रलोभन से कुचला नहीं जा सकता।
उनका जीवित दीवार में चिनवाया जाना
सत्ता की क्रूरता का चरम उदाहरण था
परंतु इस अमानवीय कृत्य के बावजूद साहिबजादों की नैतिक विजय अक्षुण्ण रही।
इतिहास में अनेक युद्ध हुए, अनेक
विजेता बने किंतु नैतिक दृष्टि से वही विजयी
माने गए जिन्होंने अन्याय के समक्ष कभी समर्पण नहीं किया। छोटे साहिबजादों की शहादत
इसी नैतिक विजय का सर्वोच्च उदाहरण है। यह घटना उस सामान्य धारणा को भी चुनौती देती
है कि नैतिक विवेक और आध्यात्मिक साहस केवल परिपक्व आयु में ही विकसित होते हैं। वस्तुत: बाल मन भी यदि उचित संस्कारों से दीक्षित हो, तो वह असाधारण नैतिक दृढ़ता प्रदर्शित कर सकता है।
छोटे साहिबजादों ने यह सिद्ध किया कि सच्ची वीरता शारीरिक बल या अस्त्र-शस्त्र में
नहीं, बल्कि सत्य एवं राष्ट्र
के प्रति समर्पण में निहित होती है।
सिख दर्शन का मूल सिद्धांत है कि
आत्मा अजर-अमर है और सत्य ईश्वरानुकूल आचरण में निहित है। छोटे साहिबजादों का आचरण
इसी दर्शन की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थी। उनका साहस किसी तात्कालिक भावावेश का परिणाम
नहीं, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह
जी द्वारा प्रदत्त संस्कारों, गुरमत
शिक्षा तथा आंतरिक आध्यात्मिक अनुशासन से उत्पन्न हुआ था। मृत्यु उनके लिए भय का कारण
नहीं बनी, क्योंकि सिख परंपरा में
धर्म और कर्तव्य की रक्षा सर्वोच्च जीवन मूल्य हैं। इस दृष्टि से उनकी शहादत नकारात्मक
अर्थ में ‘मृत्यु’ नहीं, बल्कि सकारात्मक अर्थ में
‘कर्तव्य की पूर्णता’ थी।
‘निरभऊ–निरवैर’ का गुरमत
सिद्धांत उनके आचरण में पूर्णतः साकार दिखाई देता है। नाम-सिमरन और शबद से उत्पन्न
आंतरिक शक्ति ने उन्हें बाहरी भय से मुक्त रखा। सिख आध्यात्मिकता में ‘हुकुम’ अर्थात
ईश्वरीय इच्छा को स्वीकारना मनुष्य को मानसिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। यही कारण
था कि कठोरतम शारीरिक उत्पीड़न के वाबजूद भी
उनका मन स्वतंत्र और अडिग रहा। यही आंतरिक शक्ति ही किसी समाज की वास्तविक शक्ति होती
है। इन संस्कारों का प्रतिफल उनके चरित्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। छोटे साहिबजादों
ने यह सिखाया कि अनुकूल परिस्थितियों में विनम्रता और प्रतिकूल परिस्थितियों में साहस
ही सच्चे चरित्र की पहचान है। यह शिक्षा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी समान रूप से
प्रासंगिक है।
छोटे साहिबजादों
की शहादत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धार्मिक साहस का परिचय भर नहीं
देती, बल्कि राष्ट्रभक्ति, सत्यनिष्ठा और नैतिकता का समग्र संदेश देती है। उन्होंने
यह सिद्ध किया कि राष्ट्र की आत्मा केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र की दृढ़ता से सुरक्षित रहती
है। इसी कारण उनकी शहादत आज भी बच्चों,
युवाओं और राष्ट्रचिंतक नागरिकों के लिए प्रेरणा का अक्षय एवं स्थायी स्रोत
है।
जान जोखिम
में डालकर बाबा मोती राम मेहरा द्वारा साहिबजादों और माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में
गर्म दूध पिलाना सिद्ध करता है कि सत्य एवं करुणा से प्रेरित नि:स्वार्थ कर्म ही राष्ट्र-प्रेम
का सर्वोच्च रूप है। शहादत के उपरांत दीवान टोडरमल द्वारा सोने की अशर्फ़ियाँ बिछाकर
भूमि क्रय करना और छोटे साहिबजादों तथा माता गुजरी
जी का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराना,
इस शहादत
को और अधिक व्यापक मानवीय संदर्भ प्रदान करता है। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जब सत्ता
भय पैदा करती है, तब समाज के विवेकशील एवं
साहसी नागरिक ही मानवता की रक्षा करते हैं। फ़तेहगढ़ साहिब स्थित गुरुद्वारा ज्योति
स्वरूप आज भी इसी सामूहिक नैतिक चेतना और मानवीय साहस का सजीव प्रतीक है।
आज, जब हम युवा पीढ़ी में संस्कार, नैतिकता, धर्मानुकूल आचरण एवं राष्ट्रबोध के क्षरण पर चिंतित होते हैं, छोटे साहिबजादों की पवित्र शहादत हमें स्मरण कराती है कि वास्तविक वीरता बाहरी आडम्बरों एवं सुख-साधनों में नहीं, बल्कि अंतःकरण की दृढ़ता में निहित होती है। धर्म, सत्य और राष्ट्र के प्रति अडिग रहना, कर्तव्य को ईश्वरीय इच्छा मानकर निभाना, यही सच्चा बलिदान है, और यही शहादत का शाश्वत अर्थ भी।
(यह विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

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