मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

राजवंशी देवी : भारत के प्रथम राष्ट्रपति की शक्ति और सादगी

विवेक शुक्ला

डॉ राजेंद्र प्रसाद 1946-50 तक संविधान सभा के अध्यक्ष और फिर 1950 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, तब भी उनकी पत्नी राजवंशी देवी ने कभी राष्ट्रपति भवन की चकाचौंध में रुचि नहीं दिखाई। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में कई परंपराओं को शुरू किया जिन पर अब भी अमल हो रहा है। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में महत्वपूर्ण त्योहारों को मनाने की परंपरा शुरू की। इनमें राष्ट्रपति भवन में रहने वाले स्टाफ की भी भागेदारी रहती। राजवंशी देवी दिवाली, होली, रक्षाबंधन और ईद पर आगंतुकों और स्टाफ के साथ वक्त बिताती। उनके साथ भोजन करतीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद तो कुछ देर के बाद वहां से निकल जाया करते थे, पर राजवंशी देवी वहीं रहती। राष्ट्रपति भवन में सभी उन्हें 'मां जी' कहते थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद को देश के राष्ट्रपति के कार्यकाल (1950-1962) के दौरान रक्षाबंधन राष्ट्रपति भवन के मुलाजिमों की बेटियां राखी बांधती। बदले में, राजवंशी देवी सबको उपहार देती। राजवंशी देवी बेटियों और उनके अभिभावकों के साथ काफी देर तक बातचीत करती। उनका मार्गदर्शन करतीं। दरअसल डॉ राजेंद्र प्रसाद के दौर में रक्षाबंधन राष्ट्रपति भवन में एक सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन के रूप में स्थापित किया गया। राखी का आयोजन सादगीपूर्ण होता था, जिसमें गोल मार्केट  या बंगाली मार्केट की पारंपरिक मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था। राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन का आयोजन अब एक स्थायी उत्सव बन चुका है। इसका यहा पर रहने वाली बेटियों को इंतजार रहता है।

राजधानी दिल्ली में आयोजित छठ महापर्व के पहले आयोजन को राजवंशी देवी का आशीर्वाद मिला। पहला छठ का आयोजन 1956 केन्द्र सरकार के कर्मियों की कॉलोनी सरोजनी नगर के निवासी श्रीकांत दुबे की पहल पर आयोजित हो रहा था। वे तब राजधानी के कुछ भोजपुरी समाज के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति भवन में साइकिल पर सवार होकर पहुंचे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को छठ उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दिया। उस जमाने में आज की तरह की सुरक्षा व्यवस्था कहीं भी नहीं होती थी। हालांकि, विभिन्न कारणों से वे शामिल नहीं हो सके, लेकिन उनकी पत्नी राजवंशी देवी ने सरोजिनी नगर में आयोजित छठ महापर्व में शिरकत की। अगले कुछ वर्षों तक वे इस आयोजन में शामिल होती रहीं और सभी के साथ आत्मीयता से मिलती-जुलती। राजवंशी देवी  कुछ समय अपने सरोजिनी नगर में रहने वाले रिश्तेदार विश्वेश्वर नारायण के फ्लैट पर भी आया करती थीं।  राजवंशी देवी सरलता और सादगी की मिसाल थीं।

राजवंशी देवी राष्ट्रपति भवन के अंदर चलने वाले स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में भाग लेते हुए मेधावी बच्चों को पुरस्कृत भी करती थीं। अब इसका स्कूल का नाम राजेन्द्र प्रासद केन्द्रीय विद्लाय है। हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। राजवंशी देवी इस दिन पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के साथ रहा करती थीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद 1 फरवरी, 1950 को राष्ट्रपति भवन में सपरिवार रहना शुरू कर दिया था। 26 जनवरी, 1950 से इसे राष्ट्रपति भवन कहा ही जाने लगा। इसी उपलक्ष्य में यहां हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के बीच खेल कूद प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। इनके विजेताओं को राष्ट्रपति पुरस्कृत करते हैं।राजवंशी देवी ने कभी राष्ट्रपति भवन के स्टाफ को यह महसूस नहीं होने दिया था कि वे देश के राष्ट्रपति की पत्नी हैं।

राष्ट्रपति भवन में भारत के पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटब़ॉल खिलाड़ी अनादि बरूआ का परिवार करीब चालीस साल रहा। उनके पिता राष्ट्रपति भवन में काम करते थे। वे बताते हैं कि राजवंशी देवी कभी-कभी खुद अपनी पौत्रियों को राजा बाजार (कनॉट प्लेस) के ऱघुमल कन्या विद्लाय में सुबह छोड़ने जाती थीं। ईद पर राष्ट्रपति भवन मस्जिद में उत्सव का माहौल होता है। राष्ट्रपति की ओर से सभी कर्मचारियों को मिठाई बांटी जाती है। राष्ट्रपति भवन मस्जिद के इमाम के लिए अपने परिवार के साथ यहाँ रहने का भी प्रावधान है। हालाँकि, सुरक्षा कारणों से उनके विवाहित बच्चों को यहाँ रहने की अनुमति नहीं है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पहल पर ही राष्ट्रपति भवन परिसर के भीतर एक मंदिर और एक मस्जिद दोनों का निर्माण किया गया था। कुछ जानकार कहते हैं कि उन्होंने  अपनी पत्नी राजवंशी देवी की सलाह पर इस तरह का कदम उठाया था। चूंकि राष्ट्रपति भवन के ठीक बाहर चर्च और गुरुद्वारा पहले से ही मौजूद हैं, इसलिए शायद उन्हें बनाने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस की गई हो।  सहज, सरल, धैर्यवान और अत्यंत त्यागमयी – यही राजवंशी देवी का व्यक्तित्व था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा आत्मकथा (प्रथम प्रकाशन 1946, बाद में राजपाल एंड सन्ज़ से पूर्ण संस्करण 2013-14 में) में अपनी पत्नी श्रीमती राजवंशी देवी के बारे में  अत्यंत भावपूर्ण और सम्मानपूर्ण ढंग से उल्लेख किया है। उनकी आत्मकथा में निजी जीवन का वर्णन बहुत कम है, क्योंकि उन्होंने इसे जानबूझकर सार्वजनिक जीवन और स्वाधीनता संग्राम पर केंद्रित रखा था। फिर भी जो थोड़ा-बहुत लिखा है, वह उनकी पत्नी के प्रति गहन कृतज्ञता और आदर को दर्शाता है।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद लिखते हैं कि उनका विवाह बहुत कम उम्र में (लगभग 13 वर्ष की आयु में, सन् 1897 में) हो गया था।मेरा विवाह बहुत छोटी अवस्था में हो गया था। मेरी पत्नी का नाम राजवंशी देवी था। वे मेरी माँ के समान थीं।

स्वाधीनता आंदोलन में जेल जाने पर उन्होंने अपनी पत्नी के धैर्य और त्याग की प्रशंसा की है।जब मैं जेल जाता था, घर की सारी जिम्मेदारी मेरी पत्नी पर होती थी। वे कभी शिकायत नहीं करती थीं। बच्चों को पढ़ाना-लिखाना, घर चलाना, गाँव की देखभाल – सब कुछ वे अकेले संभालती थीं। मैं जब बाहर निकलता तो देखता कि सब कुछ व्यवस्थित है। उनके त्याग और सहनशीलता का मैं सदैव ऋणी रहूँगा।

राजवंशी देवी का देहांत 9 सितंबर 1962 को हुआ।  डॉ.  राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा:मेरी जीवन-संगिनी मेरे से पहले चली गई। सारा जीवन उन्होंने मेरे लिए समर्पित कर दिया। मैं अकेला रह गया।

राजवंशी देवी की मृत्यु के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद पूरी तरह टूट गए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन छोड़कर पटना में सादा जीवन बिताया और 28 फरवरी 1963 को उनका भी देहांत हो गया। दोनों का अंतिम संस्कार पटना के गांधी घाट पर हुआ।

राजवंशी देवी उस दौर की उन अनगिनत भारतीय महिलाओं की प्रतीक हैं जिन्होंने बिना कोई नाम या पुरस्कार लिए अपने पति के बड़े सपनों को साकार करने में अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। वे कभी अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बनीं, न कोई भाषण दिया, पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान व्यक्ति के पीछे उनकी त्यागमयी छवि ही भारत के प्रथम राष्ट्रपति-दंपति की गरिमा को और ऊँचा करती है। आज जब हम भारत के प्रथम राष्ट्रपति को याद करते हैं, तो उनके साथ राजवंशी देवी का मौन लेकिन अटूट सहयोग भी स्वतः ही याद आता है।

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