गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

वसुधा की बेटी : वैचारिक सौंदर्य बोध

डॉ. वीणा गौतम

नारी एक ऊर्जा का सागर, सूर्य का दिव्य प्रकाश, निरंतर बहती हुई सदानीरा और कर्म के चाक की धुरी है। वह जीवन के सुन्दर समतल में बहने वाली पीयूष-स्रोत मात्र नहीं है। वह तो चिरन्तन काल से स्वयं-सिद्धा है। केवल उसके नाम बदल जाते हैं। नए नाम, नए रूप और नई शैली में नारी की कथा व्यथा कही जाती है। सीता ने तो अग्नि-द्वार लाँघा था, सती तो अग्नि में ही भस्म हो गई थी और पांचाली ने अपमान का ऐसा विष ग्रहण किया कि वह उसकी चूड़ामणि और सुन्दर श्यामल केशों में ही एकत्र हो रूक गया था। परिवर्तित होते युग की आवश्यकता है कि कहानी कोई भी हो, परन्तु उसका सम्प्रेषण और प्रस्तुतिकरण बदल जाएगा।

वसुधा की बेटी की कथा भी हरि-कथा की भांति विभिन्न आयामी है, लेखिका स्वयं मातृ-शक्ति है। माँ, सासु-माँ, चाची, भगिनी और सुपुत्री जैसी मातृ शक्ति को विभिन्न कठिनाइयों और समस्याओं से संघर्ष करते हुए, उसी से शक्ति ग्रहण करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते देखा व अनुभूत किया है। सम्भवतः इसीलिए सभी भावों को शब्दों में बाँधते समय जगत जननी सीता ही एक बीज बनकर मन के भीतर विचरण कर रही थी वैसे ही जैसे पंचभूत में प्राण-चेतना। सीता का भाव रक्त-मज्जा के साथ मन, हृदय और आत्मा में बहना कोई हँसी-खेल नहीं, यह सात समन्दर की गहराइयों में डूब कर नारी शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने का जोखिम भरा कार्य है। लेखिका मानती हैं कि "प्रकृति ने नर और नारी को समान बनाया है, यदि पुरुष शारीरिक रुप से सशक्त है तो स्त्री भावना में, यदि पुरुष में रक्षक भाव होता है तो स्त्री में सहनशक्ति अधिक होती है। सृष्टि का विस्तार दोनों के संयोग के बिना हो ही नहीं सकता।"

उपन्यास की धुरी है राम-सीता की कथा। पहले अथ से इति तक राम या उनसे जुड़े सन्दर्भ और प्रसंग होते थे परन्तु नारी सशक्तिकरण के युग में जहाँ एक ओर *सिया के राम धारावाहिक बनता है वहीं इस उपन्यास की धुरी भी सामान्य स्त्री तो नहीं हो सकती थी, वह जो नारियों में श्रेष्ठ थी सर्वगुण सम्पन्न धैर्य की मूर्ति साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा थी। भूमि के गर्भ से उत्पन्न वह भूमिजा कहलाती है। विदेहराज जनक की कथा से ही मूल कथा का ताना-बाना है। अकाल की भयावह स्थिति से जूझते जूझते समाधान पाने हेतु स्वर्ण से निर्मित हल चलाते हुए सन्दूकची में एक नन्हीं लक्ष्मी-सरस्वती स्वरूपा जैसी कन्या की प्राप्ति, पति-पत्नी का उसे गोद में उठाना और इधर वर्षा का आना- भले ही संयोग हो परन्तु प्रजा के कल्याणार्थ राजा की निष्ठा का निदर्शन भी है। इसी कथा-सूत्र को प्रासंगिक कथाओं के साथ बढ़ाया गया है।

समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी, कामधेनु और उच्चैश्रवा अश्व भी निकले थे। इस उपन्यास में राजा का हल चलाना भी समुद्र-मंथन से कम न था। सीता जैसी लक्ष्मी के साथ-साथ गौरी गाय का बछिया देना और अरबी व्यापारियों से ख़रीदे गये अश्व वीर और वीरा की सन्तान का जन्म हुआ जिसका नाम था बादल। लेखिका ने इस प्रसंग को बहुत खूबसूरती से सागर-मन्थन से जोड़ा है। इसी प्रकार गज और ग्राह की और मिथिला का नाम की कथा भी मूल कथा को आगे बढ़ाती है। ऐसी कथाओं से मूल कथा रोचक और सरसता के साथ-साथ पाठक की जिज्ञासु वृत्ति को भी कौतुहलता से भर देती है। लेखिका पाठक के रसानन्द की पूर्ण रक्षा करती है। राजा जनक की पुष्प-वाटिका की संकल्पना अद्भुत थी कि कभी पतझर न हो, पुष्प सदैव खिले रहें, निर्झरिणी जल से सदैव परिपूर्ण हो और महादेव का धनुष भी सुरक्षित रहे। अग्नि तत्व के रूप में अखण्ड ज्योति प्रज्ज्वलित हो जो सूर्य की किरणों से ज्योतिर्मय हो। और विश्वकर्मा और उसके साथियों ने जड़ चेतन को समरस कर ऐसी निर्मिति की कि इस सृष्टि के सभी जीवों का महत्त्व है, सभी की उपयोगिता है। लेखिका के न केवल प्रकृति-प्रेम की झलक मिलती है बल्कि छायावादी कवियों की तरह प्रकृति का यहाँ मानवीकरण भी है। इससे कथा की रोचकता और उत्सुकता को चार चाँद लग जाते हैं।

उपन्यास का फ़लक विस्तृत है। जनकराज और सुनयना के संवाद दो धारी हैं एक ओर प्रश्न उठते हैं तो साथ ही समाधान आ जाता है। पुत्र के न होने से वंश कैसे चलेगा? हमारी मुक्ति कैसे होगी? राजा जनक उत्तर में एक ओर कन्या-रत्न की प्रतिष्ठापना तो दूसरी ओर दार्शनिक, अध्यात्मिक और कर्म पर बल देते हुए कहते हैं कि" जहाँ तक मेरी जहाँ तक मेरा ज्ञान और दृष्टि देख रही है इन पुत्रियों के कारण ही हम और हमारा वंश जाना जाएगा- ये काल के पद पर कुछ ऐसा लिख कर जाएंगी जो अकल्पनीय होगा आज जहाँ तक मुक्ति का प्रश्न है, तुम निर्भय और और निर्विकल्प होकर कर्म करती रहो, कोई किसी को मुक्ति नहीं दिलवाता, यह तो जीव का ब्रह्म के मध्य का रिश्ता है जितना वह घनिष्ठ होगा उतना ही जगत् से मुक्ति प्रदान करने वाला होगा। इस प्रकार के आध्यात्मिक संवादों से कथा में प्रभावान्विति का गुण सहज ही व्याप्त हो जाता है।

भारतीय संस्कृति सृजनात्मक और सत्य है। सत्य जीवन-सापेक्ष है। इस तथ्य को लेखिका ने समझा और गुणा भी है। इसी लिए सुनयना के माध्यम से विवाह पूर्व ही अपनी बेटियों को वह बताती हैं कि जीवन मात्र भोग और ऐश्वर्य का नहीं धैर्य, त्याग और समर्पण का नाम है। मनुष्य के लिए जीवन सहज और सरल नहीं होता, हर क्षण उसे कुछ कसौटियों से और कुछ अग्नि-द्वारों से गुज़र कर ही विकास पाता है। उपन्यासकार की विशेषता यह है कि विवाह सम्बन्धित सभी छोटे बड़े रीति-रिवाजों को सामाजिक रीतियों से सम्पन्न किया गया। बेटियों की विदाई से पूर्व दहलीज़ का पूजना, दीवारों पर छापे लगाना, चावलों को उछालना आदि। जीवन के नए अध्याय के प्रारम्भ में ही लेखिका ने नव दम्पत्तियों के लिए जीवन के चारों पुरूषार्थों का ज़िक्र कर बताया कि मानव सभ्यता को नए अर्थ और आदर्शों के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए नए प्रतिमान गढ़ना अनिवार्य होता है।

संस्कृति सामाजिक त्यौहार और पर्वों से सजती है। इसीलिए नीलमजी ने पर्व-त्यौहारों का भी खूब चित्रण किया है। दीपावली पर सागर-मन्थन से निकली लक्ष्मी का पूजन, धन्वन्तरि के आगमन से धन तेरस राम-राज्याभिषेक से भाई-दूज, छठ-पूजा, रंग-पंचमी, नवरात्र और रक्षा-बन्धन जैसे त्यौहार हमारे मन को ऊर्जस्वित करते हैं। सम्पूर्ण उपन्यास में न किसी का किसी से मनमुटाव है न कोई झगड़ा परन्तु जब राजा दशरथ ने उत्तराधिकारी की घोषणा करने पर विचार किया, उसी क्षण शंका हुई, कि राम के राज्याभिषेक की गोपनीयता आवश्यक है क्योंकि आन्तरिक राजनीति बहुत गम्भीर है। कैकये का राजवंश राम को राजा बनते नहीं देखना चाहेगा। उनके गुप्तचर महल के भीतर भी हैं जो पल-पल की सूचना पहुँचाते हैं। यहाँ से डर, भय, सन्देह, अविश्वास का वातावरण बना और राम के वनगमन तक बना ही रहा।

उपन्यास लेखिका की लेखनी की विशेषता यह रही कि खड़ी बोली और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ मुहावरों का सटीक प्रयोग किया है जो कथ्य को रोचक और सरस बनाते हैं। पृष्ठ ८४ से लेकर९० तक मन्थरा और कैकेयी के संवादों में लगभग तीस मुहावरे हैं जो कथा में अपनी सटीकता के कारण रोचकता, कौतूहल और उत्सुकता की त्रिगुणात्मक शक्ति भर देते हैं। उपन्यास के अन्त में जब प्रचेता वाल्मीकि अपने आराध्य महादेव की सौगन्ध लेकर बताते हैं कि सीता गंगा जैसी पावन है। ऐसी महान नारी ना संसार में हुई है और न होगी। युगों-युगों तक सीता के पावन चरित्र का उदाहरण दिया जाएगा। ऐसे शब्दों से एक ओर प्रजा भाव-विभोर होकर सिया राम के नारे लगाती है और दूसरी ओर मर्यादा पुरूषोतम राम सीता को पवित्रता सिद्ध करने के लिए शपथ के लिए कहते हैं। यह सुन कर सीता अबला बन कर न रोई न चिल्लाई, न करुणामयी होकर किसी पर दया दिखाई। उसने आज की स्थिति को प्रतिबिम्बित कर दिया कि नारी पर मिथ्या आरोपण करने वालों को कोई दण्ड नहीं, नारी का अपमान करने वाले समाज में मुक्त भाव से घूमते हैं अब नहीं कह कर नारी सशक्तीकरण का ठोस स्तम्भ बन कर ही नहीं साक्षात् दुर्गा का, महिषामर्दिनी का रूप धारण कर नारी की गरिमा को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित कर धरती से आश्रय माँगती है। और 'भूमिजा' भूमि में ही विलीन हो जाती है। 'वसुधा की बेटी उपन्यास का उद्देश्य अत्यन्त प्रभावशाली है जब पाठक की शिराओं में भी बहता हुआ रक्त उबलने लगता है।

कुल मिला कर लेखिका ने सीता की कथा कह कर नारी के लिए "स्वयं सिद्धा" बनने का मार्ग प्रशस्त किया है। एक सुगठित, सशक्त, उत्कृष्ट कथा को विभिन्न छोटी-बड़ी प्रासंगिक कथाओं और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को संरक्षित रखते हुए संस्कृतनिष्ठ शब्दों और प्रचलित मुहावरो में पिरो कर एक भव्य और उदात्त सन्देश देते हुए नारी की गरिमा को स्थापित किया है।

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