गुरुवार, 27 नवंबर 2025

सिमटते गांव चिंता का विषय

बसंत कुमार

पहले यह कहा जाता था कि भारत देश गांवों में बसता है और यदि हम भारत देश की संस्कृति और परम्परा को जानना चहते हैं तो गांवों में जाकर देखें पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और गांव सिकुड़ते जा रहे हैं। आज के चार दशक पहले तक गांवों में गन्ना की बुवाई से लेकर छप्पर उठाने तक के कार्य बिना मजदूरी दिए सहकारिता के आधार पर हो जाते थे पर जब से लोगों का शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है तब से गांव में आदमी न मिलने के कारण गन्ना बोना और छप्पर बनाना ही छोड़ दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 81% आबादी अब शहरों में रहने लगी है और केवल 19% आबादी विशुद्ध रूप से गांवों में बची है।

यह आंकड़ा इस कारण भी चौंकाने वाला इसलिए है कि वर्ष 2018 यानि सात वर्ष पूर्व यह आंकड़ा मात्र 55% था, यूएस की वर्ल्ड आर्गोनाइजेशन प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल शहरी आबादी में से 45% लोग बड़े शहरों में रहते हैं और 36% आबादी कस्बों में रहती है। इस पलायन और विकास के कारण गांवों में मात्र 19% लोग रह गए हैं। अनुमान है कि 2050 तक 83% लोग शहरों में पहुंच जाएंगे। शहरीकरण की यह रफ्तार दर्शाती है कि लोग गांवों की मेहनतकश जिन्दगी को छोड़कर शहरों की आरामतलब जिंदगी जीना चाहते हैं जहां शारीरिक श्रम कम से कम हो और बहुराष्ट्रीय कंपनियां की वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने इस बीमारी को और बढ़ा दिया है। जहां युवा प्रातः उठकर तैयार होकर 5-10 किलोमीटर की दूरी तय करके अपने कार्य स्थल पर जाते थे पर अब तो वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने सुबह उठना तैयार होना सब कुछ बंद कर दिया है। युवाओं की सारी दिनचर्या एक कमरे में कम्प्यूटर के सामने कैद होकर बन्द हो गई है। आर्थिक सुधार युग के पहले यानि 1970 और 1980 के दशक की गांवों की जिंदगी पर निगाह डाले तो पता लगता है कि इस शहरीकरण से जहां हमने सुख-सुविधा के नाम पर बहुत कुछ पाया है वहीं स्वास्थ पर्यावरण और सामाजिकता के मामले में हमने खोया बहुत है, जहां गाय-बैल और अन्य पालतू जानवर हमारे लिए पूंजी होते थे आज मशीन पर आधारित खेती शुरू हो जाने के कारण ये हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। इनके खुला लावारिश घूमने के कारण अब किसान खरीफ और जायद कि फसलें बोना छोड़ चुके हैं और खेती के नाम पर गेहूं और धान की फसल बो रहे हैं और राज्य सरकारों को गौशाला के रखरखाव पर बहुत मोटा फंड देना पड़ रहा है। जो पैसा देश के विकास के लिए लगना चाहिए़ था वो इन चीजों पर लग रहा है।

यदि हम आज के चालीस पचास के गांवों की जिन्दगी देखें तो वहां कृषि स्वाबलंबन पर होती थी। कृषि का मुख्य आधार पशु और श्रम होते थे यदि घर में कोई चीज घट जाए तो बाज़ार भागने के बजाय पड़ोस से मांगकर काम चला लिए जाता था। यद्यपि उस समय माचिस प्रयोग में आ गई थी उसका प्रयोग मन्दिर में दिया जलाने में होने लगा था पर घर का चूल्हे जलाने के लिए बोरसी में 24 घंटे सुलगती आग को ही शुभ माना जाता था और शाम के समय महिलाओं का पड़ोस के घर आग मांगने जाना आम दिन का कार्य होता था। उस बहाने वे 10-15 मिनट बैठकर सारा हाल चाल जान लेती थी और पड़ोस में क्या हो रहा है यह सब पता कर लेती थी। शाम को सारे बड़े लोग एक घर पर अलाव के पास बैठकर रामायण महाभारत के कथानकों के संबंधित कहानियां सुनाया करते और बच्चों का काम बुजुर्गों के लिए तम्बाकू की चिलम भरना होता था उसके बदले में उन्हें किस्से और कहानियां सुनने को मिल जाती थी। आज की तरह मैरिज ब्यूरो नहीं होते थे। लोगों को लड़की-लड़कों की शादी के लिए खोज उनके अलावा या गांव की चौपाल पर पूरी हो जाती थी। अगर गांव में किसी की लड़की की शादी होती थी तो बर्तन और चरपाई के लिए टेंट हाउस के चक्कर लगाने के बजाय गांव में ही आपसी सहयोग से हो जाता था। बारात की स्वागत से लेकर बिदाई तक गांव के युवा एक पैर पर खड़े रहते थे पर आज ये चीजें नदारत हो गई है। आज गांव में भी शहरों की ओर भागने की लालसा ने ये सब छीन लिया है, सामाजिकता का स्थान घर-घर फैले मोबाइल ने छीन लिया है। आज सभी युवा और बड़े शाम होते ही या तो शराब के ठेकों पर मिलते हैं या फिर घरों में कैद होकर मोबाइल पर आंखे गड़ाए रहते हैं। आस-पड़ोस में क्या हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

जब बोर्ड के दसवीं कक्षा के परिणाम आते थे तो गांवों में एक उत्सव का माहौल होता था जब रिजल्ट अखबार में आ जाता था तो कस्बे में रहने वाले अखबार वाले के पास रिजल्ट देखने की लाइन लगाती थी और जो पास हुए वे अड़ोस पड़ोस में लड्डू या बताशे जरूर बांटता था। गांव की अशिक्षित महिलाओं को भी पता लग जाते था कि फलां का बेटा 10वीं पास हो गया है पर आज-कल की चकाचौंध की दुनिया में लोग अपने घर के बच्चों के बारे में भूल जाते हैं कि किस कक्षा में है। बस बच्चों को जुगाड़ लगाकर अच्छे स्कूल में पढ़ा दिया और ट्यूशन लगा दिया जिम्मेदारी खत्म। गांव में किसी के यहां कोई मेहमान आ जाता था तो अड़ोस-पड़ोस इस बात का ध्यान रखते थे कि मेहमान अकेले ही बैठा है पर आज कल यह सामाजिकता गायब है।

आखिर क्या कारण है कि लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं इसका आत्मावलोकन आवश्यक है। आर्थिक सुधार युग और मशीनीकरण के कारण गांवों में परम्परागत रोजगार समाप्त हो गए हैं। आधुनिक मशीनों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले दोना पत्तल, मिट्टी के बर्तन, कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले हल, फावड़ा, कुदाल सभी का उपयोग समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव में बसने वाले लोहार, कोहार, बढ़ई, सुनार, मुसहर, डोम धीमर सभी बेरोजगार हो गए तो उनके लिए शहरों में भागकर लेबर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्पों नहीं बचा था। यद्यपि महानगरों में उनकी जिंदगी नर्क से बेहतर नहीं है। एक-एक कमरे में 10-10 लोगों का रहना। पानी के लिए और नित्य कर्म के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना और 10-12 घंटे की ड्यूटी करना पड़ता है फिर भी वे अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते। इसके अतिरिक्त गांवों में व्याप्त जाति वादी मानसिकता और ऊंच-नीच का भाव भी गांवों से पलायन का कारण है। दलित व उपेक्षित समाज के पढ़े-लिखे युवा गांव की सड़ी गली जाति वादी मानसिकता से पीछा छुड़ाने के लिए शहरों में जाकर अपनी जाति छुपाकर काम करते हैं और इज्जत के साथ गुजर-बसर करते हैं। महानगरों में उनका दलित या पिछड़ा होना उन्हें तंग नहीं करता पर ज्यों वे साल दो साल बाद गांव जाते हैं तो स्टेशन से उतरते ही उनकी जाति उनके पीछे चिपक जाती है और वे गांव वापस जाने के बजाय शहर की नरकीय जिंदगी में वापस चले जाते हैं। यह ऐसी समस्या है जिसके विषय में सरकार और समाज को सोचना होगा।

यदि सरकार शहरों में इस तरह की बढ़ती हुई भीड़ को रोकने का प्रयास नहीं करेगी तो निकट भविष्य में महानगरों सहित अन्य शहर रहने लायक नहीं रह पाएंगे और ये गैस चैंबर के रूप में बदल जाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि गावों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसी चीजें उपलब्ध कराई जाएं। गांवों में महिलाओं की स्वास्थ्य-चिकित्सा एक बड़ी समस्या है, इसके अलावा गांवों में रोजगार की समस्या भी है, सरकार ने गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया पर उसमें भी अभी वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है क्योंकि एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहा है पर भारत में मंडल और कमंडल की राजनीति के चक्कर में युवाओं के रोजगार का मामला गौड़ हो गया है और हर राजनीतिक दल को पार्टी लाइन से हटकर इस समस्या के विषय में सोचना चाहिए।

यदि इस प्रकार से शहरों की ओर पलायन को नहीं रोका गया तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। वहां वायु गुणवत्ता (AQI) 300 से 450 तक पहुंच गया है, जहां लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष करते हैं वहीं प्रशासन को एक्यूआई स्तर को नीचे लाने के लिए सुबह शाम गाड़ियों से पानी का छिड़काव करना पड़ रहा है और लोग सांस संबंधित बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। अब सरकार और सामाजिक संस्थाओं को प्रयास करना होगा कि लोग गांवों की ओर वापस जाएं विशेषकर काम धंधे से रिटायर होने के बाद शहरों में बोझ बनकर जीने के बजाय अपनी मांटी में वापस जाएं और सम्मानपूर्वक अपना बचा खुचा जीवन बिताएं।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

रविवार, 23 नवंबर 2025

दिव्याग सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान

संवाददाता

नई दिल्ली। आज दिनाक 23-11-2005 को विकलांग कल्याण सह शोध समिति (रजि.) मदनगीर, नई दिल्ली-110042 द्वारा आयोजित दिव्याम सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान नाटी गाईना बारात घर नई दिल्ली-110074 में हुई जिसमें क्षेत्र के कई दिव्यांगजन ने अभियान में भाग लिए। जिसमें दिव्या जनी के रोजगार शिक्षा स्वास्थ शिक्षा पर बल दिया गया। सरकारी प्रयास एवं योजनाएं सन्तोष का विषय है कि सरकार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगतन दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण के लिए लगातार प्रयासरत है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम-2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगताओं की मान्यता दी है और उनके अधिकारों को कानूनी रूप दिया है। सरकारी नौकरी और शिक्षण सस्थानों में आरक्षण सुगम मारत अभियान के अंतर्गत भवनों एवं परिवहन प्रणालियों को सुगम बनाना एवं सहायक अम एव उपक्रम प्रदान करना वे सभी कदम मील के पत्थर है। दिव्याग जनों के UDID Card के बारे में भी जानकारी दी।

सस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बौनु साहु जी जो 75% दिव्याग है. ने ऐसे जागरूकता एब सशक्तिकरण योजनाओं और अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यहाँ मिलने वाली जानकारी एवं मार्गदर्शन से कई  विकलांग नातियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तनसाहुजी ने कहा कि यह एक सकिने सरकार और गैरसरकारीसम निर्माण करे दिव्याजदरता के पात्र हज अपनी क्षमताओं को पूरा धारा में गरिमापूर्ण जीवन जी सके और दिव्यांगों के लिए दिव्याक समूहका निर्माण एवं कौशल प्रशिक्षण पर विस्तृत जानकारीका सशक्तिकरण केवल उनकी नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश और समाज को सशक्तिकर है। वे एक बार फिर उपस्थित सभी दिव्यामजनों एवं सहयोगियों को धन्यवाद देता है। सस्था के कानूनी सलाहकार श्री रमेश कुमार (कोली) ने भी दिव्यान अधिकार अधिनियम पर विस्तृत जानकारी दिये और श्री रमेश कुमार (कोली) जी ने महात्मा गांधी का रूप धारण करके उपस्थित सभी व्यक्तियों को सम्बोधन किया तथा ऐसे आयोजनों का अनवृत रूप से करने का निश्चय किया। शिविर में सरथा सदस्य श्री विजय कुमार दिव्यांग 90%, श्री सुखविन्दर सिंह तथा माटी गाईन्स क्षेत्र के दिव्याज जन में मुख्य रूप से सुश्री सीताजी श्री नन्दलाल जी. श्री किशोरीलाल जी. श्री बलवीर सिंह, श्री बीडो जी. राजेंवाई जी, शीला जी ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।

शनिवार, 22 नवंबर 2025

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करता पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध

कर्नल शिवदान सिंह

जब कोई देश अपने दुश्मन देश सेआमने-सामने के युद्ध में नहीं जीत पता है तो वह फिर परोक्ष युद्ध का सहारा लेता है जैसे कि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध कर रहा है क्योंकि भारत से1947 से लेकर अब तक वह चार युद्ध हार चुका है इसलिए अब उसने परोक्ष युद्ध का सहारा लेने का निर्णय लिया है। यह युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता है बल्कि देश के आंतरिक हिस्सों में आंतरिक सुरक्षा पर हमले के रूप में लड़ा जाता है। देश की सामाजिक, आर्थिक और कानून व्यवस्था आंतरिक सुरक्षा के मुख्य हिस्से होते हैं। इसलिए पाकिस्तान 80 के दशक से ही हमारे देश के विभिन्न राज्यों जैसे पहले पंजाब मेंऔर बाद में कश्मीर राज्य में धार्मिक कट्टरपंथी सोच का प्रचार करके वहां परआतंकवाद को बढ़ावा दिया किया है। इन राज्यों में सांप्रदायिक तनाव के द्वारा वह पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करके कानून व्यवस्था को बर्बाद करना चाह रहा था। इसी क्रम में अभी दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले पर धमाके के पीछे यही मुख्य कारण था। इस धमाके के पीछे के रहस्य की परते खुलने पर पता लग रहा है कि आतंकियों का इरादा दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर और इसी प्रकार के देश के 37 प्रसिद्ध स्थान पर विस्फोट करकेसांप्रदायिक तनाव पैदा करके दंगे करवाना था। जिससे विश्व को दिखाया जा सके की भारत में कितनी अशांति है और इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को गिराया जा सके। परंतु हमारे देश की सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी चौकसी एवं कर्तव्य निष्ठा से इनके इरादों को नाकाम कर दिया।

80 के दशक में रूसी सेना के द्वारा अफगानिस्तान में कब्जे के बाद अमेरिका ने इसे दक्षिण एशिया में अपने लिए चुनौती माना। इसके बाद अमेरिका ने रूसी सेना को वहां से हटाने के लिए पाकिस्तान को अपना मोहरा बनाते हुए उसकेमदरसो में पढ़ने वाले जवानों को तालिबान बनाकर अफगानिस्तान मेंछापा मार युद्ध के लिए भेजना शुरू कर दिया। इसके लिए अमेरिका की सी आइ ए ने पाकिस्तान की आइ ईस आइ को इस प्रकार केऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित किया। अमेरिका के इस ऑपरेशन मेंअफगानिस्तान के लोग भी शामिल थे। जिन्हें अफगानिस्तान में रूसी सेना केहर ठिकाने की पूरी जानकारी थी। इस प्रकार के छापामार युद्ध के आगे रुसी सेना ज्यादा देर टिक नहीं पाई और वह वापस चली गई। इसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान की पीठ थपथपाई और उसे इसी प्रकार चीन के विरुद्ध भी इस्तेमाल किया। इसके लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को बहुत सी आर्थिक सहायता दी। इस प्रकार आतंकवादको कमाई का जरिया बनाते हुए पाकिस्तान ने इसको राष्ट्रीय नीति के रूप में अपना लिया। इस कारण तरह - तरह के आतंकी संगठन जैसे लश्कर ए तोयबा जैसे मोहम्मद इत्यादि वहां पर बन गए। जिन्हें वहां पर खुलेआम अपनी गतिविधि चलाने की पुरी छूट मिल गई। इसलिए पाकिस्तान के जिन नौजवानों को देश की आर्थिक प्रगति में सहयोग करना चाहिए था वह आतंकी बन गए। इस करण पाकिस्तान ना तो औद्योगिक क्षेत्र मेंकोई प्रगति की और ना ही पाकिस्तान में विदेशी निवेश आया इस कारण आज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का यह हाल है।

किसी भी देश में देश विरोधी आतंकी गतिविधि चलाने के लिए पहले वहां पर ऐसे कारण तैयार किए जाते हैं जिनके द्वारा वहां की जनता को दिगभ्रमित किया जा सकेऔर इसके द्वारा वहां के कुछ तत्वों को देश विरोधी गतिविधियों में लगाया जा सके। इसके लिए उसने सर्वप्रथम पाकिस्तान से सीमा लगने वाले पंजाब को अपना निशाना बनाया। पंजाब में सिखों में असंतोष फैलाने के लिए उसने उन्हें अलग खालिस्तान बनाने के लिए प्रेरित करने के लिएअपने रेडियो तथा टेलीविजन द्वारा इसका दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया। उसने पंजाब के सिखों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि भारत में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें अपना अलग देश खालिस्तान बनाना चाहिए। इस सोच को आगे बढ़ाने के लिए उसने पहले कुछ सफेद पोश लोगों को इसके प्रचार के लिए तैयार किया जिनमे संत जरनेलसिंह भिंडर वाले का नाम प्रमुख है  जिन्होंने वहां के कुछ नौजवानों को पंजाब में खालिस्तान के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने के लिए अपने आतंकवादियों के द्वारा हिंसा करवानी शुरू की। इसमें इनका मुख्य निशाना हिंदू आबादी होती थी। इन आतंकियों को ट्रेनिंग देने के लिए उसने पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र में इनके ट्रेनिंग कैंप स्थापित किये। आखिर मेंपंजाब की राष्ट्रवादी जनता के सहयोग से पाकिस्तान के इस नापाक इरादे को भारत ने कुचल दिया तथा पंजाब दोबारा देश का प्रगतिशील प्रदेश बन गया। इसके बाद पाकिस्तान की आइ एस आइ ने यही हरकत 90 के दशक में कश्मीर में शुरू की और वहां परदुष्प्रचार करना शुरू किया कि भारत में मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित नहीं है इसलिए कश्मीर को आजादी चाहिए। इसके लिए उसने वहां के नौजवानों को आतंकवादी बनाने के लिए उनकी सोच को कट्टरवादी बनाने के लिए मुस्लिम कट्टरपन को बढ़ावा वहां के कुछ मौलवियों से दिलवाना शुरू किया तथा वहां के कुछ नौजवानों को पाक अधिकृत कश्मीर में ले जाकर उन्हें आतंकवाद की ट्रेनिंग देकर अपने देश के आतंकियों के साथ कश्मीर में भेजकर उनसे हिंदुओं पर आतंकवादी हमले करवाए। 

इसके फलस्वरूप वहां के तीन लाख कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से विस्थापन पलायन करना पड़ा। इस सबके लिएआतंकवाद को बढ़ावा देने वाले ओवर ग्राउंड काम करने वाले स्थानीय एजेंट को को वहां पर लागू धारा 370 से मदद मिल रही थी। इसके कारण कश्मीर की जनता अपने आप को काफी प्रताड़ित महसूस कर रही थी। इसको देखते हुए भारत सरकार ने कश्मीर में अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए वहां पर लागू धारा 370 को हटाकर वहां पर भारत का संविधान लागू किया जिससे आतंकवाद को समर्थन देने वालेतत्वों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जा सके। इस प्रकार कश्मीर में पंजाब की तरह आतंकवाद को खत्म किया गया। आज जम्मू कश्मीर राज्य विकास के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।देश विरोधीआतंकवाद को देश के अंदर चलाने के लिए तीन तत्व मुख्य भूमिका निभाते हैं। पहले धार्मिक कट्टरपन कोबढ़ावा देने वाले तत्व तथा आतंकवाद के साथ सहानुभूति रखने वाले ,दूसरे उनके लिए धन एकत्रित करने वाले तथा इन आतंकी तत्वों के रहन-सहन का इंतजाम करने वाले तथा कट्टरपन की सोच को बढ़ाने वाले जिन्हें ओवर ग्राउंड वर्कर या सफेद पोश भी कहा जाता है। इस प्रकार इन तीनों तत्वों के सहयोग से आतंकी तैयार होते हैं जो देश में हिंसा फैलाने के लिए बेगुनाह लोगों पर हमले तथा सार्वजनिक स्थानों जैसे लाल किला इत्यादि पर हमला करके देश में आप शिक्षा असुरक्षा कथा सांप्रदायिक तनाव की भावना पैदा करते हैं। इससे देश की देश की आंतरिक सुरक्षा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। परंतु अक्सर वोट बैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारे देशद्रोही तत्वों और उनके द्वारा फैलाई जा रहे हैं दुष्प्रचार की अनदेखी करती हैं जिसके कारणदेश में अस्थिरता फैलती है जैसा की उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के रूप में देखने में आया था।

उपरोक्त को देखते हुए देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति देश के हर नागरिक को भी उतना ही जागरूक रहना चाहिए जितना की सुरक्षा एजेंसी रहती है। फरीदाबाद की यूनिवर्सिटी में पिछले काफी दिनों से उसके अध्यक्ष की मंजूरी और उसके डॉक्टर उमर जैसे देश विरोधी तत्व अपनी गतिविधियां चला रहे थे। परंतु लाल किले के धमाके तक किसी भी सुरक्षा एजेंसी कोइस यूनिवर्सिटी के अंदरचल रही इन देश विरोधी गतिविधियों के बारे में कोई सूचना नहीं मिली। इसको देखते हुए सामरिक दृष्टि से इन जमीन की सतह के ऊपर सफेद पोश देशद्रोहियों और इन गतिविधियों के लिए धन देने वालों केविरुद्ध भी आतंकियों जैसी कार्रवाई करते हुए उन्हें कानून के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जहां से इन्हें कड़ी सजा दिलवानी चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर जिसमें एनआईए, आईबी और राज्यों की एटीएस के प्रतिनिधियों के साथ एक कमेटी स्थापित की जानी चाहिए जिससे पूरे देश में इस प्रकार की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर शीघ्रता से कार्रवाई की जा सके। इसके साथ ही कट्टरपंथी दुष्प्रचार को रोकने के लिए संप्रदाय विशेष के उदारवादी लोगों तथा उनके समाजसेवी और शिक्षा विदों का सहयोग लिया जाना चाहिए जो अपने समाज की सोच को धार्मिक कट्टरपन और देश विरोधी सोच से बदलकर इसे राष्ट्रवादी बना सकें। इसके बाद जिस प्रकार सरकार ने छत्तीसगढ़ में समर्पण किये नक्सली और माओवादियों का पुनर्वास किया हैऔर उन्हें देश की सकारात्मक गतिविधियों में लगाया है उसी प्रकार मुस्लिम समाज के उन युवाओं का पुनर्वास किया जाना चाहिए जो कट्टरपन से दिग्ग्रहित होकर देश विरोधी गतिविधियों मेंलग गए हैं।

जिस प्रकार भारतीय सेना का हर सैनिक सीमाओं की सुरक्षा में तैनात रहता है। उसी प्रकार देश के हर नागरिक को देश की आंतरिक सुरक्षा में तैनात रहना चाहिएम।और जहां भी किसी देश विरोधी गतिविधि की शंका हो उसकी सूचना फौरन सुरक्षा एजेंसी को दी जानी चाहिए जिससे वह समय पर कार्रवाई करके इन तत्वों को समाप्त कर सकें।

 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

अपराध के अनुपात से ज़्यादा सजा अनुचित और अनैतिक

बसंत कुमार

प्रायः हम सुनते रहते हैं कि जस्टिस डिलेयड इस जस्टिस डिनाइड, पर जब एक व्यक्ति को मात्र 100 रूपये की रिश्वत के आरोप में लगातार 39 वर्षों तक यातनाएं झेलनी पड़े और 39 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद 84 वर्ष की आयु में न्याय मिले तो प्रश्न यह उठता है कि क्या अब हमारी न्यायिक प्रणाली पर विचार किया जाना चाहिए। अभी एक मामले में एक सरकारी कर्मचारी को 1986 में 100 रुपए की रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार किया गया। एक साल की सजा हुई, 15 साल निलंबित रहे फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिए गए। समाज में रिश्वतखोर की जिल्लत झेली, दवा के अभाव में पत्नी की मृत्यु हो गई। परिवार बिखर गया और अब बाइज्जत बरी हो गए तो क्या कोई भी न्यायालय उनके 39 वर्ष लौटा पाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे न्यायालयों की कार्य प्रणाली पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है।

अविभाजित मध्य प्रदेश के स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन में लिपिक के रूप में काम करने वाले जागेश्वर प्रसाद अवधिया को 1986 में मात्र 100 रु. रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था, अब उन्हें 39 वर्ष की कानूनी लड़ाई के बाद बाइज्जत बरी कर दिया गया। 84 वर्ष की आयु में न्यायालय से मिली इस राहत पर जागेश्वर प्रसाद अवधिया कहते हैं कि अब मेरे लिए इस फैसले का कोई महत्व नहीं रह गया है। इस केस के कारण मुझे जेल हुई, नौकरी चली गई समाज ने मेरा बहिष्कार कर दिया। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। बच्चों की शादी नहीं कर पाया। इलाज के अभाव में मेरी पत्नी की मौत हो गई। अब बस मैं अकेला बचा हूं। क्या इस फैसले के बाद कोई मेरे बीते हुए दिन लौटा सकता है। जब मैं चिल्ला चिल्लाकर कहता था कि मैं बेकसूर हूं मुझे साजिश के तहत फंसाया गया है पर कोई विश्वास नहीं करता था।

जागेश्वर के 52 वर्षीय बेटे नीरज ने बताया कि उस वक्त मेरी उम्र 13 वर्ष थी हमें यह पता नहीं था कि रिश्वत क्या होती है लेकिन लोग मुझे कहते थे कि रिश्वतखोर का बेटा है। बच्चे चिढ़ाते थे और स्कूल में कोई बच्चा हमसे कोई दोस्ती नहीं करना चाहता था। मोहल्ले में हमारे लिए लोगों के दरवाजे बंद हो गए और रिश्तेदारों ने संपर्क बंद कर दिया था। हमें दुख है कि जब पिताजी गिरफ्तार हुए मैं 13 वर्ष का था पर पिताजी की लड़ाई में हमारा सारा बचपन अदालत की सीढ़ियों में छूट गया।

1986 में जागेश्वर की गिरफ्तारी के दो वर्ष बाद 1988 में अदालत में चार्ज शीट दाखिल होते ही उसे नौकरी से निलंबित कर दिया गया और वे दशकों तक निलंबित रहे और 50% गुजारा भत्ता से उनका गुजारा मुश्किल हो गया था। इलाज के अभाव में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। एक-एक करके उसके चारों बच्चों की पढ़ाई छूट गई। 16 वर्ष के ट्रायल के बाद वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी करार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि ट्रायल कोर्ट के फैसले के विरुद्ध उनकी अपील पर फैसला आने से पहले ही उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया और सरकारी मकान खाली कराने के साथ-साथ सरकारी चिकित्सा सुविधाएं भी बंद कर दी गईं।

यह मामला सिर्फ जगेश्वर का ही नहीं है यह हाल छोटे-मोटे आरोपों में पकड़े गए सभी निम्न कोटि के कर्मचारियों का है। जागेश्वर प्रसाद की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है अपितु यह हमारी न्याय व्यवस्था के उस चेहरे को उजागर करती है जो न्याय की देरी को अन्याय मानता है, किसी की जवानी अदालत में गुजर जाती है और जब फैसला आता है तब तक उसका सब कुछ समाप्त हो चुका होता है। अदालतों में ट्रायल 20 वर्ष और अपीलीय न्यायालय में अगले 20 वर्ष लग जाते हैं तो व्यक्ति के जीवन के कितने वर्ष बचते हैं यह विचारणीय प्रश्न है। कुछ वर्ष पूर्व एक खबर छपी थी कि उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में लखन पासी नाम के व्यक्ति को एक मामले में 48 साल जेल में रहने के बाद 104 वर्ष की आयु में न्यायालय द्वारा बाइज्जत बरी किया गया। इस प्रकार के निर्णय भारत के कछुए की चाल चलने वाले न्यायिक प्रणाली की कहानी कहते हैं।

देश में हर समय चुनाव होते रहते हैं और चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह की लुभावनी घोषणाएं करते हैं कि हम सत्ता में आए तो ये करेंगे। कोई लाडली बहना के नाम पर पैसे बांटता है पर कोई अपनी लाडली बहना की उस तकलीफ की ओर ध्यान नहीं देता जहां उनके शौहर, बेटे बिना कसूर के जेलों में सड़ रहे हैं या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं और महिलाएं ही घर और बच्चों की शिक्षा का बोझ उठा रही हैं। कोई भी राजनीतिक दल इन असहाय गरीबों विषय में कभी आवाज नहीं उठाता। वास्तविकता यह है कि भारत में न्याय पाना तो बड़े धनाढ्य लोगों का ही एकाधिकार रह गया है। अगर किसी गरीब या छोटे व्यक्ति ने अज्ञानतावश या मजबूरी में कोई छोटा-मोटा अपराध कर लिया तो उसकी पूरी उम्र जेल की सलाखों या फिर अदालतों का चक्कर लगाते-लगाते कट जाएगी। पर बड़े लोगों के लिए तो यह कहावत चरितार्थ होती है जहां पैसे के लिए अपराध करो और पकड़े जाओ तो पैसे देकर छूट जाओ। उनके लिए अपराध करना और बेल मिलना मानो रोज की दिनचर्या है पर जब एक गरीब से अपराध हो जाए तो उसका ये जन्म इसी को निपटाने में निकल जायेगा।

सरकार ने सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट बनाया और सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की जांच के लिए सीबीआई जैसी जांच एजेंसी बनाई, पर दुर्भाग्य से दोनों को अस्तित्व में लाने का मकसद पूरा नहीं हुआ। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन की जद में छोटे-मोटे कर्मचारी व अधिकारी आते हैं क्योंकि बड़े अधिकारी तो पैसे के बल पर बड़े से बड़ा वकील करके या फिर जजों से सेटिंग करके छूट जाते हैं, जहां भ्रष्टाचार में आरोपित छोटे कर्मचारी न्याय की आस में तीस-तीस साल तक कोर्ट के चक्कर लगाते-लगाते भगवान को प्यारे हो जाते हैं। वहीं बड़े आरोपियों के सीनियर वकील मेंशन करके घंटों में उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में केस लिस्ट करवा लेते हैं। सबको याद होगा कि फिल्म अभिनेता सलमान खान को ब्लैक बक मामले में हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद मात्र कुछ घंटे में सर्वोच्च न्यायालय में बेल मिल गई थी, जहां तक सीबीआई की बात है तो उसे सर्वोच्च न्यायालय के एक जज ने पैरट इन ए केज कह दिया था। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह ने सीबीआई की जांच के बारे में अपनी किताब में लिखा था कि सीबीआई की जांच में सिर्फ छोटी मछली आती है जब इसमें किसी बड़ी मछली के पकड़े जाने का अंदेशा होता है तो जांच की दिशा दूसरी तरफ मोड़ दी जाती है।

रायपुर के जागेश्वर प्रसाद का मामला यह बताता है कि 100 रुपए की रिश्वत के आरोप में उनका गिरफ्तार होना और उनको साल दो साल की सजा होना तो ठीक है पर उसका 15 साल तक सस्पेंड रहना फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाना और वर्षों तक रिश्वतखोर के विशेषण के साथ समाज के सामने जिल्लत उठाना कहां तक सही है। अब समय आ गया है कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय किसी भी आरोप में पकड़े गए आरोपी के विरूद्ध न्यायिक प्रक्रिया उन धाराओं जिससे उस पर मुकदमा चल रहा है में निर्धारित सजा की अवधि में पूरी न हो तो उसे बरी कर देना चाहिए और ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद उसको अपीलीय न्यायालय द्वारा मामला निपटाए जाने तक उसे सरकारी आवास और स्वास्थ सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो भुखमरी से बचने के लिए उनके बच्चे अपराध की दुनिया में जाएंगे और यह स्थिति भयावह होगी।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

मानवता के रक्षक श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शहीदी एवं आध्यात्मिक दर्शन

आचार्य राघवेंद्र पी. तिवारी

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) भारतीय इतिहास के उथल-पुथल वाले कालखंड में अवतरित हुए। औरंगज़ेब के दमनकारी शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्मांतरण ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को खतरे में डाल दिया था। जहाँ मुग़ल साम्राज्य में हिंदुओं का धर्मांतरण व्यापक पैमाने पर हो रहा था, वहीं कश्मीर का मुग़ल गवर्नर अपने बादशाह का कृपापात्र बनने हेतु, धर्मांतरण की नीति को बड़े उत्साह से लागू कर रहा था। परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार हुए। उनके मंदिर तोड़े गए। उन्हें इस्लाम स्वीकारने पर विवश किया गया। कश्मीरी पंडितों ने आनंदपुर साहिब में गुरु साहिब से भेंटकर अपने धर्म एवं आस्था की रक्षा हेतु प्रार्थना की।

असाधारण साहस, करुणा और अंतःकरण की स्वतंत्रता के सार्वभौमिक समर्थक गुरु साहिब ने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक स्वतन्त्रता की रक्षा करने का निर्णय लिया। उन्होंने पंडितों को आश्वासन दिया कि वे दिल्ली जाकर मुगल सम्राट से चर्चा करेंगे। साथ ही पंडितों से कहा कि वे अपने गवर्नर को सूचित करें कि यदि गुरु जी अपना धर्म परिवर्तित कर इस्लाम अपना लेते हैं, तो हम भी इस्लाम धर्म अपना लेंगे, लेकिन यदि वे इसका विरोध करते हैं, तो हमें धार्मिक रूप से स्वतंत्र रखा जाए।

गुरु साहिब के बढ़ते प्रभाव और जनसमर्थन को देखकर मुगल शासन घबरा उठा। दिल्ली यात्रा के दौरान मुगल शासक ने गुरु साहिब एवं उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ने हेतु उन्हें और उनके अनुयायियों को रास्ते भर यातनाएँ दी एवं अपमानित किया। परन्तु गुरु साहिब ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। काजी द्वारा झूठे मुकदमें के दौरान उन्हें धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया गया, जिसे गुरूजी ने दृढतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनके आँखों के समक्ष उनके तीन अनुयायियों, भाई मती दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी को निर्ममतापूर्वक मार दिया गया, फिर भी गुरू साहिब शांतचित्त होकर नाम-स्मरण में लीन रहे।

24 नवंबर, 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में स्वयं उपस्थित होकर गुरु साहिब ने धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा हेतु अपनी शहीदी दी। दृढ़ संकल्प एवं अटूट साहस के माध्यम से उन्होंने भारत की संप्रभुता की रक्षा की और धर्म के शाश्वत आदर्शों को कायम रखा। उनकी इस शहीदी ने भावी पीढ़ियों को भय और व्यक्तिगत सुरक्षा के बजाय विवेक, साहस और नैतिक कर्तव्य को बनाए रखने हेतु प्रेरित कर रही हैं। गुरु साहिब का जीवन इस आदर्श का प्रमाण है कि सच्ची वीरता अस्त्र-शस्त्र, सत्ता या क्रूरता में नहीं, अपितु आत्मविश्वास, बलिदान, नैतिक साहस, न्याय हेतु निडरता से खड़े होने में भी निहित है। इस सर्वोच्च बलिदान हेतु उन्हें ‘हिंद दी चादर’ अर्थात भारत की ढाल की उपाधि से विभूषित किया गया। युद्धकला में निपुण होने के बावजूद, गुरु साहिब का स्वभाव अत्यंत गंभीर, विचारशील, एवं आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख था। उनका साहस एवं वीरता केवल सांसारिक रक्षा के लिए नहीं बल्कि वैराग्य, ध्यान और धर्म के प्रति निष्ठाजनित नैतिक साहस के उच्चतम आदर्श के रूप में भी थी।

गुरु साहिब की शहादत मनुष्य के स्वतंत्र रूप से जीने के सार्वभौमिक अधिकार हेतु दिया गया सर्वोच्च बलिदान है। यह सिखाता है कि दूसरों के स्वतंत्रता की रक्षा करना आध्यात्मिक कर्तव्य का सर्वोच्च रूप है। अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध इस बात का भी प्रमाण था कि धर्म-पालन का विषय साम्राज्यों के अधिकार से परे है। गुरु साहिब ने बलिदान के माध्यम से उद्घोष किया था कि स्वतंत्रता, समानता और मानवीय गरिमा, मन की पवित्रता में अंतर्निहित हैं। उन्होंने जाति, पंथ, लोभ अथवा धन के आधार पर सभी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार किया और संदेश दिया कि ईश्वरीय प्रकाश सभी में विद्यमान है। उनकी शहादत मानवाधिकारों के वैश्विक इतिहास में मील का पत्थर बनकर भावी पीढ़ी को न्याय और स्वतंत्रता के समर्थन हेतु प्रेरित करती रहेगी।

गुरु साहिब आस्था के नैतिक मूल्यों को पुनर्परिभाषित करने हेतु सिख इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने सिख धर्म को न्याय, मानवीय गरिमा एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता हेतु प्रतिबद्धता के रूप में स्थापित किया। उनके बलिदान ने सामूहिक रूप से सिख धर्म के दायरे को  क्षेत्रीय धार्मिक समुदाय से सार्वभौमिक नैतिक धर्म के रूप में स्थापित किया। उन्होंने गुरु अर्जन देव जी की शहादत को सिख धर्म के सार्वभौमिक अंतरात्मा के जीवंत उदाहरण तथा रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे धार्मिक आस्था की रक्षा को नैतिक साहस एवं मानवाधिकारों के प्रतिमान के रूप में पहचान मिली।

गुरु साहिब के आध्यात्मिक योगदान उनके भजनों में परिलक्षित होते हैं। उदाहरणार्थ, वे कहते हैं, “किसी से डरो मत, किसी को भयभीत मत करो; इस प्रकार तुम ज्ञान प्राप्त करोगे” (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1427), जहाँ वे आध्यात्मिक अनुशासन और नैतिक साहस के समन्वय को स्पष्ट करते हैं, संत-सिपाही (संत-सैनिक) आदर्श की रूपरेखा स्थापित करते हैं, और सभी के कल्याण (सरबत दा भला) के लिए कार्य करते हैं। उनकी विरासत व्यापक मानवतावादी चिंतन को आलोकित करती है। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि सच्चा धर्म सभी सांप्रदायिक सीमाओं से परे है। उनके जीवन का संदेश सरल किन्तु शाश्वत है: “दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा उसी प्रकार करो जैसे तुम अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हो; इसी में ईश्वर का सच्चा मार्ग निहित है।”  साथ ही उनके सबद सांसारिक आसक्तियों की अनित्यता पर ज़ोर देते हैं और मानव को अहंकार, लोभ तथा क्षणिक सुखों से ऊपर उठने का आह्वान करते है। इन भजनों से सीख मिलती है कि हर परिस्थिती में समभाव बनाए रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। गुरु जी की आध्यात्मिक दृष्टि विवेकपूर्ण एवं व्यावहारिक है, जो गहन सिमरन (ध्यान) एवं समर्पण (सेवा) के संयोजन पर आधारित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भक्ति का सार मानवता के प्रति करुणा एवं सेवा में ही निहित है।

गुरु साहिब ने सिख धर्म को आध्यात्मिकता से आलोकित किया जो ध्यान, नैतिक सामर्थ्य तथा सार्वभौमिक करुणा पर आधारित है। उनके अनुसार  सच्ची आध्यात्मिकता किसी कर्मकांड, संन्यास में नहीं, बल्कि निडरता, विनम्रता और सांसारिक चुनौतियों के मध्य ईश्वर के स्मरण में निहित है। उन्होंने सिख धर्म को एक सार्वभौमिक दर्शन के रूप में स्थापित किया, जो आंतरिक जागृति, नैतिकता एवं मानवता की सेवा पर केंद्रित है। उन्होंने सीख दी कि आध्यात्मिक बोध और नैतिक साहस सत्य के दो अविभाज्य आयाम हैं।

गुरु साहिब का जीवन और बलिदान न केवल सिख इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, अपितु समूची मानवता के लिए शाश्वत सीख भी हैं। उनकी सीख सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की है। ये ऐसे जीवन मूल्य है जो अशांत एवं संघर्षग्रस्त विश्व में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा सुख भौतिक संपत्ति अथवा क्षणिक सुखों में नहीं, बल्कि सत्य, नि:स्वार्थता और मानव सेवा में निहित है। उनका जीवन प्रेरणा देता है कि कैसे सभी प्राणियों के प्रति गहरी करुणा रखते हुए भी धर्म पर दृढ़ रहा जा सकता है। यह संदेश संस्कृतियों की सीमाओं से परे मानव समाज को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। गुरु साहिब का जीवन हमें विपत्ति में वीरता, शक्ति में करुणा और सेवा में निस्वार्थता की सीख देता है। उनकी विरासत लोगों को स्वतंत्रता, समानता, न्याय और सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय के आदर्शों के लिए जीने हेतु प्रेरणा देती है। उनका साहस और बलिदान मानव समाज का अमर प्रेरणा स्त्रोत रहेगा।  हमेशा स्मरण कराएगा कि वास्तविक शक्ति सत्य और धर्म की रक्षा में निहित है। यह न्याय और करुणा का सार्वभौमिक संदेश है, जो कालातीत है।

(लेखक कुलपतिपंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालयबठिंडा हैं और यह इनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

मुसहर जाति : बिहार के सबसे वंचित समुदाय की सच्चाई

विकास खितौलिया 

भारत एक विविधताओं वाला देश है जहाँ अनेक जातियाँ, धर्म और समुदाय रहते हैं। इनमें से कुछ जातियाँ ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी रहीं। बिहार जैसे राज्य में जहाँ गरीबी और सामाजिक विषमता लंबे समय से बनी हुई है, वहाँ मुसहर जाति सबसे अधिक वंचित समुदायों में गिनी जाती है। मुसहर जाति को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में रखा गया है, परंतु आज भी यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। अस्पृश्यता के कारण जो लोग इनके हाथ का पानी पीना पसंद नहीं करते है, वह इनके हाथों से शराब भी पी लेते है। अन्य समाज की शादी समारोह आदि कार्यक्रमों में इनका जाना वर्जित है। स्वर्ण समाज को तो छोड़िए, अनुसूचित जाति की कुछ जातियां भी इनसे भेदभाव करती है। गरीबी के कारण इस जाति के अधिकांश लोग अवैध रूप से शराब बेचने का कार्य भी करती है, जबकि बिहार में शराब बंद है।

“मुसहर” शब्द की उत्पत्ति “मूस” (चूहा) से मानी जाती है और इसका मतलब है, मुस+हर यानी की मुस को हरने वाला। पुराने समय में यह जाति खेतों में मजदूरी करती थी और अत्यधिक गरीबी के कारण चूहे पकड़कर भोजन के रूप में उपयोग करती थी, यही उनकी पहचान बन गई। सच मानिए तो यह लोग वर्तमान समय से पूर्व 18वीं सदी में जी रहे है, इनके रहन सहन का तरीका सदियों पुराना है इसलिए यह लोग समाज की मुख्यधारा से बिल्कुल कटे हुए है। ये मुख्यतः कृषि मजदूर तो रहे, पर कभी भी लेबर कार्ड जैसी सरकारी सुविधा का लाभ नहीं ले सके और कभी भी इस जाति के लोग भूमि या संपत्ति के मालिक नहीं बन पाए, इस सामाजिक व्यवस्था के कारण ही इन्हें ग़रीबी, अशिक्षा और भेदभाव की गहरी खाई में धकेल दिया है । मुसहर जाति मुख्य रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ हिस्सों में निवास करती है। कुछ जगह इन्हें ऋषिदेव," "सदा," "माझी," "बनबासी," "भुइयां," और "राजावार" जैसे नामों से भी जाना जाता है । अकेले बिहार में इनकी जनसंख्या लगभग 30 से 40 लाख के बीच मानी जाती है और यह बिहार की अनुसूचित जातियों में एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व भी करती है, इस श्रेणी में आने वाली यह तीसरी बड़ी जाति है। आज भी यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। इस जाति की सामाजिक स्थिति आज भी अत्यंत दयनीय है। यह समुदाय प्रायः ग्रामीण इलाकों में “मुसहरी टोला” या “मुसहरी बस्ती” में रहता है, जो प्रायः गाँव के किनारे स्थित होती हैं, जहाँ सुविधाओं का गंभीर अभाव है। ऐतिहासिक रूप से मुसहर जाति को समाज में “अस्पृश्य” माना गया, आज भी इनसे सामाजिक दूरी बनाई जाती है। इनका रहन-सहन समाज के निचले स्तर पर है। इस जाति का सामाजिक बहिष्कार अब भी बना हुआ है इसलिए मंदिरों में प्रवेश न मिलना या सामूहिक आयोजनों में भेदभाव जैसी समस्याएँ आज भी प्रचलित हैं। इसी कारण इस जाति के गाँवों में अलग टोले में रहने के लिए मजबूर है।

स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण के क्षेत्र में भी इनकी स्थिति बेहद खराब है। अधिकांश मुसहर बस्तियों में शुद्ध पानी, शौचालय और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित मात्रा में है । अधिकतर मुसहर परिवार कुपोषण, बीमारियों और अशुद्ध जल के उपयोग से प्रभावित रहते हैं। नशाखोरी, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ गरीबी और अशिक्षा के कारण अब भी आम हैं। जिससे गरीबी पीढ़ी दर पीढ़ी बनती चली जा है। वैसे समाज के कुछ हिस्सों में भले ही स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन व्यापक रूप से यह जाति अब भी सामाजिक मुख्यधारा से बहुत दूर है।

शिक्षा किसी भी समुदाय, समाज के विकास की कुंजी होती है, इसलिए कहा जाता है कि "शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो पियेगा वहीं दहाड़ेगा।" पर मुसहर समाज का इस विषय में अत्यंत चिंताजनक है। मुसहर जाति के लोगों का कहना है कि "खाने को पैसा नहीं पढ़ाई कहां से करे"। बिहार सरकार की रिपोर्टों के अनुसार, मुसहर समुदाय की साक्षरता दर केवल 10–20 प्रतिशत के बीच है, जो राज्य की औसत दर से बहुत कम है। महिलाओं में साक्षरता दर तो और भी कम, लगभग 5 प्रतिशत है। इसका प्रमुख कारण है गरीबी, अभिभावकों की जागरूकता की कमी, बाल श्रम, और विद्यालयों तक पहुँच की समस्या प्रमुख हैं। बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक इन्हीं में देखी जाती है। मुसहर जाति शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक पिछड़ी हुई है। हालाँकि सरकार की कई योजनाएँ लागू हुई जैसे मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, महादलित शिक्षा कार्यक्रम और विद्यालय भोजन योजना से कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन अभी बहुत कोसों दूर है। शिक्षा की कमी के कारण मुसहर समाज आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से आगे नहीं बढ़ पा रहा।

आर्थिक रूप से मुसहर जाति बिहार की सबसे गरीब जातियों में गिनी जाती है। अधिकतर मुसहर भूमिहीन मजदूर हैं इसलिए वे खेतों में मजदूरी, झाड़ू लगाना ईंट-भट्ठों पर काम या अन्य दिहाड़ी कार्य करते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी ये झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं से आंशिक लाभ हुआ है, परंतु नियमित रोजगार नहीं मिल पाता और सरकार तंत्र द्वारा भ्रष्टाचार के कारण इसका लाभ पूरी तरह इनको नहीं मिल पाता।

वैसे मुसहर जाति के उत्थान के लिए 20 वर्षो से अधिक समय से समाजसेवी भीम सिंह भावेश अच्छा कार्य रहे है, उन्हें 25 जनवरी 2025 को महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू जी द्वारा "पदम श्री" सम्मान प्राप्त हुआ है।  राजनीतिक दृष्टि से मुसहर जाति लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति से वंचित रही, इनको कोई बड़ा नेता या राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं रहा। हालांकि मुसहर जाति को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है, पंचायत स्तर पर अब मुसहर समुदाय के कुछ प्रतिनिधि चुने जाने लगे हैं, परंतु राज्य या राष्ट्रीय राजनीति में अब भी इनकी भागीदारी नगण्य है। एनडीए गठबंधन समर्थित नीतीश सरकार ने इन्हें “महादलित वर्ग” में शामिल किया, जिससे कुछ योजनाओं का लाभ इनको मिलने लगा । जिनमें मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग, महादलित विकास मिशन, मुसहर विशेष शिक्षा कार्यक्रम, महादलित आवास योजना, मुसहर बस्तियों में प्राथमिक विद्यालय और आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना करना भी प्रमुख है । हालांकि इन योजनाओं का प्रभाव अभी सीमित है, क्योंकि ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही बड़ी बाधा हैं। अक्सर योजनाओं का लाभ बिचौलियों या अन्य प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रह जाता है इसलिए वर्तमान समय में मुसहर जाति के समग्र विकास के लिए निम्नलिखित ठोस कदम उठाना आवश्यक हैं।

हालांकि सरकार और समाज के प्रयासों से अब कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं, परंतु उचित विकास के लिए आवश्यक है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मान । इन चारों क्षेत्रों में उन्हें समान अवसर देना आवश्यक है।

जब तक मुसहर समाज मुख्यधारा में नहीं आता, तब तक बिहार का सामाजिक विकास अधूरा रहेगा इसलिए मुसहर जाति बिहार की उस सामाजिक सच्चाई का प्रतीक है, जो बताती है कि विकास योजनाओं के बावजूद समाज के निचले तबके तक समान अवसर नहीं पहुँच पाए हैं।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक)

9818270202

दिव्यांग सशक्तिकरण एवं जागरूकता शिविर दो विदसयी सम्पन्न

संवाददाता

नई दिल्ली। विकलांग कल्याण सह शोध समिति (पंजि.), मदनगीर, नई दिल्ली-110062 द्वारा आयोजित दिव्यांग सशक्तिकरण एवं जागरूकता शिविर - दो दिवसीय, F-II, 13, मदनगीर, नई दिल्ली-110062 में हुई, जिसमें क्षेत्र के कई दिव्यांग जन ने शिविर में भाग लिए। जिसमें दिव्यांग जनों के रोजगकार, शिक्षा, स्वास्थ शिक्षा पर बल दिया गया। सरकारी प्रयास एवं योजनाऐं सन्तोष का विषय है कि सरकार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगठन दिव्यांग जनों के सशक्तिकतरण के लिए लगातार प्रयासरत है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम-2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगताओं को मान्यता दी है और उनके अधिकारों को कानूनी रूप दिया है। सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण सुगम भारत अभियान के अंतर्गत भवनों एवं परिवहन प्रणालियों को सुगम बनाना एवं सहायक अंग एवं उपक्रम प्रदान करना ये सभी कदम मील के पत्थर है।

संस्था के अध्यक्ष श्री बौनु साहु जी जो 75% दिव्यांग हैं, ने ऐसे जागरूकता एव सशक्तिकरण योजनाओं और अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ मिलने वाली जानकारी एवं मार्गदर्शन से कई विकलांग व्यक्तियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं। श्री साहु जी ने कहा कि यह एक सामूहिक पहल है, जिसमें सरकार और गैर सरकारी संस्था एवं आम जनों की सहभागी आवश्यक है। आईए. हम सब मिलकर ऐसे समाज का निर्माण करें, जहाँ दिव्यांग जन दया के नहीं, बल्कि सम्मान और समानता के पात्र हों। जहाँ अपनी क्षमताओं को पूरा उपयोग कर सकें एवं समाज एवं राष्ट्र की मुख्य धारा में गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। उनका सशक्तिकरण केवल उनका ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश और समाज का सशक्तिकरण है। मैं एक बार फिर उपस्थित सभी दिव्यांग जनों एवं सहयोगियों को धन्यवाद देता हूँ। संस्था के कानूनी सलाहकार श्री रमेश कुमार (कोली) एडवोकेट ने भी दिव्यांग अधिकार अधिनियम पर विस्तृत जानकारी दिये और ऐसे आयोजनों का अनवृत रूप से करने का निश्चय किया। शिविर में संस्था सदस्य श्री वेदप्रकाश (दिव्यांग), श्री विजय कुमार दिव्यांग 90%, श्रीमती राधाजी दिव्यांग, श्री सुखविन्दर सिंह ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।


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