दीपावली के दूसरे दिन से दिल्ली व मुंबई से छठ पूजा के लिए बिहार जाने वालों की भीड़ मैं दशकों से देख रहा हूं पर हर वर्ष इस पर सत्ता और विपक्ष के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों का जो सिलसिला चलता है वो हास्यास्पद है। इस बार भी दीपावाली के एक दो दिन बाद की मुंबई रेलवे स्टेशन से बिहार की ओर जाने वाली ट्रेनों में भेड़-बकरियों की तरह ठूस कर जाने वाली भीड़ को पोस्ट करते हुए राष्ट्रीय जनता दल की तेजतर्रार प्रवक्ता प्रियंका भारती ने यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि एनडीए सरकार में बिहार के लोगों के प्रति उदासीनता के कारण ऐसी स्थिति आई है। वहीं दूसरी ओर एनडीए के प्रवक्ता यह दिखाने में लगे थे कि दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों से छठ पूजा के पर्व पर जाने वालों के लिए 1400 से अधिक ट्रेनें चलाई जा रही हैं और जो लोग यही रहकर छठ पूजन करना चाहते हैं उनके लिए उपयुक्त व्यवस्था की गई है और तो और यमुना सहित अन्य नदियों के घाटों पर सफाई लाइट आदि की व्यवस्था की गई है। इससे पहले दिल्ली में समुचित व्यवस्था का ढोल आम आदमी पार्टी पीटती थी और भाजपा उसकी खामियां गिनाती थी।
आरजेडी की प्रवक्ता मुंबई से बिहार की ओर जानी वाली
ट्रेनों की हालत दिखाते समय यह भूल गई कि यूपीए शासन के दौरान उनकी पार्टी के
राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव देश के रेल मंत्री थे और उस समय बिहार की
मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी का छठ के पर्व पर अर्घ्य देने का दृश्य टेलीविजन
पर लाइव दिखाया जाता था पर उस समय भी बिहार की ओर छठ पूजा पर जाने वाले यात्रियों
का यही हाल होता था और कैसा दुर्भाग्य है कि देश के दर्जनों भर नेता देश के रेल
मंत्री के उत्तरदायित्व का निर्वाह कर चुके हैं जिसमें बाबू जगजीवन राम, ललित नारायण मिश्र, एबीए घनी खान चौधरी, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार आदि सभी इस पद को सुशोभित कर चुके
है पर सिर्फ बाबू जगजीवन राम और ललित नारायण मिश्र के कार्यकाल को छोड़कर सबके समय
में छठ के समय पूर्वांचलियों को ऐसे ही भेड़-बकरियों की तरह जाना पड़ता है। ऐसा
लगता है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सारे युवक सब छोड़छाड़ कर दिल्ली
मुंबई कमाने आ गए हैं। आखिर क्या कारण हैं कि आज इन प्रदेशों में छप्पर उठाने के
लिए भी युवा नहीं मिलते और अब तो एनडीए और इंडिया गठबन्धन सत्ता में आने के बाद
करोड़ों लोगों को रोजगार देने की बात कर रहे हैं जिसके वहां से युवकों का पलायन
रुक जाए।
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के युवाओं का बड़े
शहरों की ओर पलायन का मुख्य कारण है वहां पर व्याप्त बेरोजगारी। इसी बेरोजगारी के
कारण युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई, दिल्ली, पंजाब या अन्य शहरों की ओर भागते हैं और वहां जाकर फैक्ट्रियों में मजदूरों का
काम करते हैं या फिर सिक्योरिटी गार्ड्स का काम करते है और देश के सबसे बड़े कृषि
प्रदेश पंजाब में भी खेतों के मालिक तो पंजाब के किसान होते हैं पर खेतों की देखभाल
करने वाला और खेतों में काम करने वाला मजदूर या तो उत्तर प्रदेश का होता है या फिर
बिहार का होता है। अभी हाल में बिहार में बड़े औद्योगिक घराने न लग पाने के कारण पर
देश के गृहमंत्री अमित शाह ने यह कहा कि जमीन ने मिल पाने के कारण यहां पर बड़े
उद्योग नहीं लग रहे हैं। पर यह याद दिला दूं जब बिहार में अडानी समूह को अपना
प्रोजेक्ट लगाने के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन दी जा सकती है तो अन्य उद्योगों के लिए
जमीन का न मिलना गले नहीं उतरती। माननीय गृह मंत्री जी को बिहार और पूर्वी उत्तर
प्रदेश के बारे में यह बात पता नहीं है कि यहां पर कुछ परिवारों के पास इतनी अधिक
जमीन है कि उन्हें खुद नहीं पता कि उनके पास कितनी जमीन है और 90% परिवारों के पास इतनी
भी जमीन नहीं है कि वो रहने के लिए घर बना लें और कुछ के पास इतनी भी जमीन नहीं है
कि वे सरकार द्वारा दिए गए शौचालय भी बनवा लें। दिल्ली की सब्जी मंडी और सदर बाजार
में अधिकांश लेबर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं और दूसरी विडम्बना है कि
राजधानी में 30-40% ब्यूरोक्रेट्स, नेता और मीडिया में काम करने वाले पत्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के
सम्पन्न घराने के लोग हैं पर हमारे समाने छठ के समय ट्रेनों का जो दृश्य दिखाया
जाता है वह फैक्ट्रियों, दुकानों और मंडी में काम करने
वालों का होता है।
किसी भी राज्य की बेरोजगारी दूर करने में राज्य में
चालू कल कारखानों का विशेष योगदान रहता है और बिहार इस मामले में सर्वाधिक पिछड़ा
राज्य है। देश में रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले युवाओं की सर्वाधिक संख्या
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से है। आश्चर्यजनक है कि युवाओं की संख्या के आधार
पर जनसांख्यिक लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंट) लेने में बिहार अन्य प्रदेशों के
विकाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, पर स्वयं बिहार को बीमारू राज्य की
श्रेणी से बाहर निकालने के लिए बिहार पर एक औद्योगिक नीति की आवश्यकता है। बिहार
सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण प्रदेश की औद्योगिक क्षेत्र की मंदी की कहानी कहता है।
बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण 2024- 25 के अनुसार ग्रास स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) में इसकी हिस्सेदारी 2021-22 में 9.9% से गिरकर वर्ष 2023-24 में 7.6 रह गई है।
मैन्यूफेक्चरिंग में गिरावट कमजोर औद्योगिक बुनियादी ढांचे, कम निवेश और बड़े
पैमाने पर उद्योगों की कमी को दर्शाता है।
सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के पंजीकरण
पोर्टल पर आंकड़े देखे तो भारत में एमएसएमई उद्योगों की संख्या की तुलना में बिहार
का योगदान मात्र 5.47% है। बिहार में कुल एमएसएमई उद्योगों की संख्या 14,23,380 है जबकि उत्तर प्रदेश
में यह संख्या 10.69% योगदान के साथ 34,03, 834 है। यदि हम सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यमों में अलग-अलग कर के देखे तो सूक्ष्म
उद्यमों में बिहार की हिस्सेदारी 4.11% और उत्तर प्रदेश की की हिस्सेदारी 9.25% है। लघु उद्यमों में बिहार की हिस्सेदारी 2.64% है जबकि इस क्षेत्र
में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 8.25% है। मध्यम उद्यम क्षेत्र में बिहार क्षेत्र की हिस्सेदारी 1.49% है और उत्तर प्रदेश का
हिस्सा 7.04% है। देश में बिहार का श्रम बल हिस्सा 30.7% है और बेरोजगारी दर 8.7% है। इसका अभिप्राय यह
है कि बिहार के युवा अन्य प्रदेशों में श्रम करके उनके विकास में योगदान कर रहे
हैं पर उनका अपना राज्य विकास के नाम पर फिसड्डी बना हुआ है। मजे की बात यह है कि
देश के एमएसएमई मंत्री महादलित मुसहर समुदाय से आते हैं और बिहार से आते हैं और
इसके मंत्रालय के सचिव चाहे उड़ीसा कैडर के आईएएस है पर वे भी बिहार के हैं फिर भी
एमएसएमई सेक्टर की बिहार में स्थिति इतनी दयनीय क्यों है।
जब अटल बिहारी वाजपाई जी देश के प्रधानमंत्री बने तो
देश में बेरोजगारी दूर करने के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई), मंत्रालय की अवधारणा लेकर आए जिससे घर-घर में छोटे उद्योग लगे और प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी जी भी इस मंत्रालय को अपना विजन मंत्रालय कहते हैं और इस मंत्रालय का
प्रभार इस क्षेत्र के लोगों के मिला- 1. महावीर प्रसाद - गोरखपुर(बांसगांव), 2. कालराज मिश्र – देवरिया, 3. गिरिराज सिंह -बिहार, 4. भानु प्रताप सिंहवर्मा - जालौन(उप्र), 5. जीतन राम मांझी -बिहार।
इतने सारे एमएसएमई मंत्री होने के बावजूद उद्यमिता के
क्षेत्र में बिहार देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में है। इस पिछड़ेपन के लिए एनडीए, यूपीए (इंडिया गठबन्धन) सभी जिम्मेदार हैं। यहां बस चुनाव जीतने के लिए जाति
का गुणा-भाग चल रहा है और कुछ नहीं। कुछ दल वोट लेने के लिए मुसहर जाति के माउंटेन
मैंन के नाम से मशहूर दशरथ मांझी के परिवारों वालों को घर बनाकर दे रहे हैं पर इस
जाति के अधिकांश भूमिहीनों को घर बनाने के लिए 3 डिसमिल जमीन देने की जो घोषणा हुई
थी उसको इंप्लीमेंट करने के लिए जोर नहीं दे रहे हैं और इस आदिम जाति के लोगों को
एसटी कैटेगरी में डलवाने हेतु कोई भी एलायंस बात नहीं कर रहा है तो आप सोच सकते
हैं कि यहां के युवाओं का पलायन कैसे रुकेगा।
यदि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से नौकरी की तलाश
में युवाओं का पलायन रोकना है तो प्रदेश को जाति पर आधारित राजनीति से ऊपर उठना
होगा, जिस दिन यह जनप्रतिनिधि जातिय आंकड़ों के बजाय योग्यता, शिक्षा और कर्मठता के बल पर चुने जाने लगेंगे उस दिन से बिहार देश के आर्थिक
नक्शे पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देगा, पर प्रश्न यह है कि महात्मा बुद्ध और सम्राट अशोक की कर्मभूमि माने जाने वाला
बिहार जातीय दलदल से कब बाहर निकलेगा।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें