गुरुवार, 8 जनवरी 2026

जी रामजी तथा इसके विरोध के मायने

अवधेश कुमार

भाजपा की राज्य सरकारें या प्रदेश इकाइयां हर जगह जी राम जी पर पत्रकार वार्तायें आयोजित कर रही हैं तथा पार्टी के स्तर पर इसे अभियान के रूप में लिया गया है। सरकारी कार्यक्रमों में ऐसा सामान्यतया कम होता है। विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने दृढ़ता के साथ संसद में पारित कराकर संदेश दे दिया था कि इसे हर हाल में क्रियान्वित किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। कई अन्य दल भी इसके विरुद्ध मोर्चाबंदी कर रहे हैं। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगीं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध और इसके समानांतर भाजपा के द्वारा इसके समर्थन का अभियान चलेगा। सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 2005 में नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परंपरा न पहले थी न आगे स्थापित हो सकती है। देश , काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होतीं हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नयी आरंभ भी होतीं हैं। विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यूपीए सरकार ने भी महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग सेविशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी इसलिए जारी योजना में नाम जोड़ा  गया। विपक्ष की ओर उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है? क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्युलर चरित्र समाप्त होता है?  कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि की सनातन और हिंदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम परिचित हैं। इसलिए यह भी जी राम जी के साथ महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो जाता है।

वर्तमान कार्यक्रम मनरेगा है ही नहीं। मनरेगा समाप्त कर जी राम जी नया कानून बना है। इसलिए यह आलोचना गलत है कि महात्मा गांधी का नाम हटाकर जी राम जी कर दिया गया है। नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के ऐसे कृतिमान बनाये जिनको रोक पाना मनरेगा ढांचे में संभव नहीं हो पाया। केंद्र से राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एनजीओ के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूर्ति हो रही है। जी राम जी में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण , डिजिटल मॉनिटरिंग,सशक्त सोशल ऑडिट साप्ताहिक पब्लिक डिस्क्लोजर आदि के प्रावधान से भ्रष्टाचार की संभावनाएं क्षीण होती हैं। किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता। यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ उनमें और आज में अनेक मायनों में बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होते समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आर्थिक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023 24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज के गांवों की स्थिति वैसी ही नहीं है। गांव की डिजिटल पहुंच बढ़ी है , बिजली आपूर्ति काफी हद तक सुनिश्चित है, यातायात संपर्क की सुविधा बेहतर हुई है और सामाजिक सुरक्षा आज ज्यादा सशक्त है।  भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिए।

 इसमें केवल 100 की जगह 125 दिनों के रोजगार की ही बात नहीं है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ग्रामीण क्षेत्र को ऐसे सशक्त और टिकाऊ आधारभूत ढांचा देना है जिनसे वे सक्षमता की ओर बढ़ें। इसमें बने निर्मित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना स्ट्रेट में शामिल किया जाएगा। इससे ग्रामीण विकास से जुड़े सारे काम एक ही व्यवस्था से जुड़ेंगे। जी राम जी में चार मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं। जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। बाढ़ और सुखार के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे शामिल है। जीरामजी का स्वरुप और संस्कार मनरेगा से अलग है। तब काम अलग-अलग श्रेणियों में फैले हुए थे। यहां रोजगार पर फोकस होते हुए भी गांव के लिए स्थिर उत्पादक क्षमता पैदा करने और बढ़ाने यानी आत्मनिर्भरता का भाव है। मनरेगा या पहले के ग्रामीण रोजगार योजनाओं का फोकस ऐसा नहीं था। इसमें ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। इन योजनाओं को प्रधानमंत्री गति शक्ति जैसे राष्ट्रीय प्रणालियों से भी संबद्ध किया जाएगा।

मिशन अमृत सरोवर के तहत 68, 000 से ज्यादा जल निकाय बने या पुनर्जीवित हुए हैं । इससे खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन , बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका सुरक्षित होगी। सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी।

जी राम जी के व्यय की 40% जिम्मेवारी राज्यों पर डालने का विरोध हो रहा है। जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है वहां के लिए विचार करना चाहिए। वैसे भारतीय स्टेट बैंक ने एक रिपोर्ट में इस आलोचना को निराधार बताते हुए कहा है कि राज्य इसमें नेट गेनर होंगे। केंद्र सरकार द्वारा राजस्व साझा करने की प्रणाली में राज्यों को 17,000 करोड रुपए का अतिरिक्त आवंटन होगा। आवंटन के आधार पर आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु को थोड़ा नुकसान दिख रहा है जबकि शेष राज्यों में ज्यादा आवंटन का आंकड़ा सामने आता है। राज्यों को भी अपनी वित्तीय स्थिति सशक्त करने की नीतियां अपनानी पड़ेगी। फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी की योजनाओं की जगह ऐसी योजना से लोगों का ज्यादा भला होगा। मुख्य बात है इस व्यवहारिक तथा गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने वाले कार्यों का कल्पना के अनुरूप क्रियान्वयन। यह जिम्मेवारी अंततः राज्यों , स्थानीय प्रशासन, पंचायत तथा सामाजिक -सांस्कृतिक -धार्मिक संगठनों के साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर आती है। इस कार्यक्रम में गांव के लोगों की रुचि बढ़ेगी क्योंकि मनरेगा सीमांत और सामान्य मध्यम किसानों के लिए अनर्थकारी बनकर सामने आया था। मुख्य कृषि कार्य के समय कृषि श्रमिकों की उपलब्धता अत्यंत कम हो गई थी। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों ने मूल अनाज उत्पादन वाली खेती छोड़ दी। बुवाई से कटाई तक किसानों के लिए कष्टकर स्थिति रही है। मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे या गुस्से में आ जाते थे। जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई ,कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं थी। अब काम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। हालांकि मनरेगा ने पूरी व्यवस्था में जैसा उथल-पुथल मचाया उसमें कृषि को पुनर्स्थापित करना आसान नहीं है फिर भी इसका सकारात्मक असर होगा।

कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन, परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन या  संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगी। किंतु अगर कुछ नेताओं, एक्टिविस्टों आदि को जी रामजी नाम रखने से समस्या है तो इसका उपचार नहीं। सभी देवी-देवता केवल मनुष्य से परे शक्ति संपन्नता के ही नहीं सात्विकता, नैतिकता ,समाज के लिए आत्मोत्सर्ग तथा सर्व कल्याणकारी चरित्र वाले हैं। उनके नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्यूलर चरित्र प्रभावित नहीं होता। इसमें आध्यात्मिकता एवं आम लोगों के लिए योजना की पवित्रता बनाए रखने की जो भावना पैदा हो सकती है उससे व्यापक सेक्यूलर भाव क्या हो सकता है?

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

प्रसिद्ध फिल्मकार दिलीप विरेंद्र सूद ने अपनी पुस्तक लाइफ हग मी टाइट के विमोचन की घोषणा की

संवाददाता

नई दिल्ली। प्रतिष्ठित फिल्मकार दिलीप विरेंद्र सूद ने अपनी नई पुस्तक लाइफ हग मी टाइटः आशा, हास्य और संकल्प की कहानीका विमोचन किया है। यह पुस्तक व्हाइट फाल्कन पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशिल की गई है। लेखक के जीवन अनुभवों से प्रेरित यह पुस्तक एक संवेदनशील और प्रेरक कथा प्रस्तुत करती है, जिसमें रचनात्मक महत्वाकांक्षाओं, पारिवारिक दायित्वों और जीवन की अनिश्थित सीखों के बीच संतुलन को सशक्त रूप से दर्शाया गया है।

200 से अधिक पृष्ठों में विस्तृत लाइफ हग भी टाइट चुनौतियों और उपलब्धियों के क्षणों को गर्मजोशी, दृढ़ता और सौम्य हास्य के साथ पिरोती है। यह पुस्तक आशा और निरंतर प्रयास की शक्ति को रेखांकित करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव पर एक सकारात्मक और प्रेरणादायी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

साहित्यिक विमोचन के साथ-साथ, इस पुस्तक को एक प्रमुख फीचर फिल्म के रूप में रुपांतरित करने की योजना भी विकसित की जा रही है, जिससे इसकी भवनात्मक गहराई काग़ज़ से परदे तक विस्तार पा सके।

दिलीप विरेंद्र सूद एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित लेखक, निर्देशक और निर्माता है, जिनके कार्यों को अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहना और पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वे भारत सरकार द्वारा आयोजित 68वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के प्रतिष्ठित जूरी सदस्य भी रह चुके हैं। वर्तमान में वे प्रसार भारती, भारत सरकार के राष्ट्रीय नेटवर्क के लिए भारत का पहला साइबर अपराध जागरुकता कार्यक्रम साइबर क्राइम की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं।

लाइफ हग मी टाइट दिलीप विरेंद्र सूद की रचनात्मक यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो व्यक्तिगत अनुभूतियों, कलात्मक चिंतन और आशा के सार्वभौमिक अनुभव को सशक्त रूप से प्रस्तुत करती है।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

वामपंथियों ने जवहारलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छवि ख़राब की है

 डॉ. प्रवेश कुमार

दुनिया में अपने शैक्षिण गतिविधि, उत्कृष्टता के लिये जाने-जाना वाला जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय गाहे-बगाहे चर्चा में आ ही जाता है। इस बार चर्चा का कारण है वामपन्थी संगठनों के द्वारा भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जी एवं देश के गृहमंत्री अमित शाह जी एवं देश के दो बड़े उद्योगपति अंबानी और अडानी एवं भारत के सनातन हिंदू धर्म को लेकर अभद्र टिप्पणी की गई। अंबानी-अदानी की कब्र खुदेगी जेएनयू के धरती पर, अंबानी-शाह की कब्र खुदेगी जेएनयू की धरती पर,मोदी-शाह की कब्र खुदेगी जेएनयू की धरती पर,जेएनयू की लाल मंडी में भगवा आतंक, भगवा जलेगा,बीजेपी आरएसएस एबीवीपी। हम इसकी एक स्वर में इसकी निन्दा करते है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक मंच (जेएनयूटीएफ) ने भी वामपन्थी छात्रो के इस कृत की निंदा एक प्रेस स्टेटमेंट के माध्यम से की है।  विदित हो कि वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा यह कार्यक्रम कथित रूप से उस निर्णय के विरोधस्वरूप आयोजित किया गया, जिसमें भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा देशविरोधी गतिविधियों के मामलों में संलिप्त आरोपियों शरजिल इमाम एवं उमर खालिद को जमानत प्रदान न किये जाने का निर्णय बरकरार रखा गया। हमारा मानना है कि न्यायालय के निर्णयों के विरोध में वैचारिक बहस लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा अवश्य हो सकती है, किंतु न्यायपालिका के सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली, हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली या राष्ट्र-विरोधी संदर्भों में प्रयुक्त भाषा किसी भी प्रकार स्वीकार्य नहीं हो सकती। 

जेएनयू परिसर के साबरमती छात्रावास क्षेत्र में आयोजित “गुरिल्ला ढाबा” जैसे आयोजन के माध्यम से उग्र वामपंथी हिंसा, नक्सलवादी सोच और “वार-फेयर” कल्चर को सामान्य बनाने का प्रयास किया जाना अत्यंत चिंताजनक है। परिषद के अनुसार, यह प्रवृत्ति सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों-युवाओं को वैचारिक भटकाव, उग्रवाद और शत्रुतापूर्ण राजनीतिक संस्कारों की ओर धकेलने का माध्यम बन सकती है, जिसका प्रभाव समाज और राष्ट्र दोनों के लिए घातक है। इससे पूर्व भी परिसर में उग्र-वामपंथी समूहों द्वारा सुरक्षा बलों के विरुद्ध हिंसा करने वाले तत्वों, नक्सलवाद से जुड़े कुख्यात नामों हिडमा एवं बसवा राजू तथा अफजल गुरु जैसे आतंकवाद के दोषसिद्ध मामलों में शामिल व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति और महिमामंडन जैसी प्रवृत्तियाँ सामने आती रही हैं। हम मानते है कि ऐसी घटनाएँ शैक्षणिक संस्थानों के चिन्तन-परिवेश को प्रदूषित करती हैं और विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण की मूल भावना से विचलन का कारण बनती हैं।  यह सही है कि जे. एन. यू. की पहचान एक उन्मुकत वातावरण में डिबेड, चर्चा-परिचर्चा रही है, अपनी स्थापना से ही व्यवस्था बदलाव को लेकर यहाँ का छात्र समाज में अपनी आवाज़ को बुलन्द  करता  रहा है। 

ये वही जे. एन. यू. है जिसने देश की सबसे मज़बूत प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी तक को काले झंडे दिखा दिये  थे सत्ता और सरकार से दो-दो  हाथ करने का  मादा इस विश्वविद्यालय में बहुत ख़ूब रहा है। देश के तमाम नेताओ एवं कई देशों में भारत के प्रशासनिक  राजदूत एवं मंत्री इस विश्वविद्यालय ने दिए है वही इसी विश्वविद्यालय में “भारत तेरे टुकड़े होंगे ईँसा अल्लाह”, “अफ़ज़ल हम शर्मिंदा है तेरे कातिल ज़िंदा है”  के नारे भी लगाए गये है। वही इस विश्वविद्यालय के भीतर वामपन्थी धड़े के शिक्षकों के  द्वारा छात्रों के मन में भारत की सनातन संस्कृति, देशज ज्ञान परम्परा के विरुद्ध बोले-जाने वाले शैक्षिक भाषणो ने एवं कुछ चुनिंदा लेखक, इतिहासकारों के लेखों को ही कोर्स स्ट्रक्चर का हिस्सा बनाना यह के छात्रों को एकांगी भी बनाता है । वही छात्रों की  शिक्षकों के प्रति निर्भरता ने छात्रों को शिक्षक का ग़ुलाम ही बनाया है, जो शिक्षक पढ़ाता  है वही पेपर भी बनता है अंत में पेपर भी वही जाँचता  है, बी.. से लेकर पी. एच. डी. तक शिक्षक की निर्भरता छात्रों को अधिकतर शिक्षक के विचार से जोड़े रखता है। वही कई बार ये भी देखने में आता है की शिक्षकों के मुद्दे पर छात्र भी रैलियाँ निकलते है। हम अगर जे एन यू में वामपंथी उपद्रव का इतिहास लिखे तो कितना ही कुछ लिखा जा सकता है जो की भारत और उसके सनातनी संस्कृति के ख़िलाफ़ है। हमें ये मालूम हो जहाँ  विश्वविद्यालय में वामपन्थी छात्र संगठनो का दबदबा है तो वही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे सनातनी,भारत के देशज चिंतन में आस्था रखने वाले छात्र संगठन भी है।

यही कारण है की जब वामपंथी भारत के भाव, भारत की हिंदू आस्था से जुड़े प्रतीकों के ख़िलाफ़ कुछ करते व लिखते है तो परिषद इसकी मुख़ालफ़त करता  है। यही कारण है जब वर्ष 2013 में “गाय माँस पार्टी” का आयोजन वामपंथी छात्र संगठनो द्वारा किया जाता है तो परिषद खुल के इसका विरोध करती है और प्रशासन को इस आयोजन को रद्द करना पड़ता है। वही इसी वर्ष 2013 सितम्बर में महिषासुर शाहदत दिवस का आयोजन भी इसी जे. एन.  यू. में किया जाता है माँ  दुर्गा को वैश्य तक भी कहा जाता है। कल रामनवमी के दिन वामपन्थी  छात्र संगठनो द्वारा फिर से 2013 को दोहराया गया है, कावेरी हासटल के रेज़िडेंट छात्रों  के द्वारा रामनवमी  पूजा एवं हवन का आयोजन किया गया इसके पोस्टर भी लगे थे ये सब देख वामपन्थी संगठनो ने कावेरी छात्रावास के छात्रों को धमकाते हुए इसे रद्द करने को कहा।  इस पर तमाम रेज़िडेंट छात्रों ने इसकी सूचना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़े छात्रों की दी, जब पूजा प्रारम्भ हुई तो पहले वामपन्थी संगठनो द्वारा इसका विरोध किया गया जिस कारण ये पूजा कई घंटे विलम्ब से हुई। जब पूजा शुरू हुई तो वामपन्थी संगठनो द्वारा पूजा में बैठे छात्रों पर पत्थर से हमला किया गया वही पूजा के ध्वज को भी फाड़ा दिया गया इसके बाद  क्रिया की प्रतिक्रिया हुई जो बड़ी स्वाभाविक ही थी। इसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद  के 8 छात्रों को गम्भीर चोट आयी  जो अभी होसपिटल  में ही है वही दर्जनो को हल्की चोटे  भी आयी है इसी में कुछ वामपन्थी छात्रों को भी  चोट आयी है। ये हमला कुछ ऐसा ही था जैसा की 5 जनवरी 2020 को वामपन्थी संगठनो द्वारा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों को चिन्हित करके मारा पीटा गया वही राष्ट्रवादी विचार के शिक्षकों को भी इसमें टार्गेट किया गया। 

वही कैम्पस स्थित “स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा” को भी छतिग्रस्त किया  गया वही इंटर्नेट सर्वर रूम को भी छतिग्रस्त किया गया था। ये वही जे. एन. यू.  है जहाँ  वामपंथियो ने 2010 में दन्तेवाड़ा छत्तीसगढ़ में हमारे 70 से अधिक केंद्रीय पुलिस बल जवानो के शाहिद होने पर वामपन्थी संगठन जिसमें डी. एस. यू. की मुख्य भूमिका थी। इस नक्सली जघन्यता पर जशन मानने हेतु “संगीतमयी रात्रि” का आयोजन किया जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इसका विरोध किया तो सभी वामपन्थी संगठन एक हो गए। इसी जे एन  यू में वर्ष 2016 फ़रवरी में भारत के टुकड़े होने की बात हो रही थी वही वामपन्थी शिक्षकों के द्वारा “ राष्ट्रवाद पर भाषण” की एक शृंखला प्रारम्भ की जिसमें  जम्मू कश्मीर  को भारत  का हिस्सा नही माना गया, वही नागालेंड, मणिपुर  पर क़ब्ज़े की बात की गई। ये सब इसी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ है और हो रहा है। वामपन्थी ऐसा नही की विश्वविद्यालयो में ही ऐसा कर रहे है जहाँ पर भी ये थोड़ा भी मज़बूत है वहाँ  अपने विरोधी विचार को इसी तरह का बर्ताव करते है। केरल में कितने ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  के कार्यकर्ताओं को इन वामपन्थी गुंडो ने मारा है, क्या इसे केरल की धरती भूल सकती है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में इन्होंने कितना आतंक किया किसी से नही छुपा है नक्सलवाद के नाम पर विकास को रोकना और मासूम जनता को प्रताड़ित करना इनका काम ही है। ये ही है विषैला वामपंथ जिसने छात्रों  मानस  को ख़राब कर इस देश की संस्कृति एवं भारत के विरुद्ध विचार को पैदा किया है। 

 

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

प्राकृतिक से छेड़छाड़, आपदा को निमंत्रण

विकास खितौलिया

भारत आज जिस विकास के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से वह प्रकृति से दूरी भी बना रहा है। जंगल कट रहे हैं, पहाड़ तोड़े जा रहे हैं, नदियां सूख रही हैं और हवा ज़हर बनती जा रही है। यह सब किसी एक राज्य या क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जब जब हम प्राकृतिक से छेड़छाड़ करते है तो आपदा को निमंत्रण देना मुनासिब है। इस संदर्भ में अरावली पर्वत श्रृंखला का मुद्दा केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक, स्वास्थ्य और अस्तित्व का मुद्दा बन चुका है। इस पर्वत श्रृंखला के साथ हो रही छेड़छाड़ और देशभर में तेज़ी से होती पेड़ों की कटाई है। यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का प्रश्न है। जब भी मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़ने की कोशिश की है, प्रकृति ने उसे चेतावनी दी है। बाढ़, सूखा, भूकंप, हीटवेव, प्रदूषण और महामारी ये सभी उसी चेतावनी के रूप हैं। 

अरावली पर्वत माला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जिसकी उम्र लगभग 250 करोड़ वर्ष मानी जाती है। जब पृथ्वी का स्वरूप आकार ले रहा था, तब से अरावली अस्तित्व में है। पहले अरावली बहुत विशाल थी लेकिन बाद में यह पहाड़ घिसते चले गए और हवा, पानी व समय और अवैध खनन माफियों ने इन्हें धीरे-धीरे काट दिया। अरावली पर्वत श्रृंखला को अक्सर राजस्थान की हीट शील्ड कहा जाता है। यह गर्म हवाओं को रोकती है, तापमान को संतुलित रखती है और धूल भरी आंधियों से बचाव करती है। यदि यह शील्ड कमजोर हुई, तो 50 डिग्री या उससे अधिक तापमान, भीषण लू और धूल के तूफान सामान्य हो जाएंगे। इतना अधिक तापमान केवल असुविधा नहीं, बल्कि मानव जीवन, खेती और जल स्रोतों के लिए घातक है। खेती प्रभावित होगी, पानी की कमी बढ़ेगी और ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन तेज़ होगा। साथ ही यह राजस्थान के थार मरुस्थल की रेत को दिल्ली, हरियाणा, अलवर, जयपुर एनसीआर तक पहुंचने से रोकती है और उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। यह राजस्थान की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या के लिए जल, जंगल और जीवन का आधार है। वर्ष 2017 की एक रिपोर्ट बताती है कि अरावली में खाली जगह बनने से रेगिस्तान फैलने का खतरा बढ़ रहा है। अरावली की पहाडिया भारी मात्रा में पानी को जमा करती हैं और उसे धीरे-धीरे छोड़ती है। इस तरह अरावली चंबल, साबरमती और लूणी जैसी नदियों को जीवन देकर एक बड़े इलाके को रेगिस्तान बनने से बचाती है। इसलिए अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि रेगिस्तान और आबादी के बीच एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यदि यह कवच कमजोर हुआ या समाप्त  हुआ, तो हवा में हमेशा धूल तैरती रहेगी और सांस लेना भी संघर्ष बन जाएगा।

आज मास्क हमें कोरोना महामारी की याद दिलाता है, लेकिन यदि अरावली का क्षरण यूं ही चलता रहा, तो आने वाला समय ऐसा होगा जब मास्क बीमारी से बचने के लिए नहीं, बल्कि जिंदा रहने के लिए पहनना पड़ेगा। हवा में धूल, सिलिका कण और प्रदूषण इतना अधिक होगा कि अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और एलर्जी तेजी से बढ़ेंगी कि अस्पताल और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा। सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ेगा। दिल्ली और एनसीआर पहले ही प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, और अरावली के क्षरण से यह संकट कई गुना बढ़ सकता है। हम क्यों भूल जाते है कि पेड़ केवल ऑक्सीजन का स्रोत नहीं हैं बल्कि वे जल संरक्षण, मिट्टी की मजबूती, तापमान संतुलन और जैव विविधता के आधार हैं। जब जंगल खत्म होते हैं, तो बाढ़, सूखा और भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ जाती हैं। इसलिए प्रकृति का हर संतुलन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। उसके बावजूद अरावली को सबसे बड़ा खतरा अवैध खनन और अंधाधुंध पेड़ कटाई से ही है। यह समस्या केवल अरावली तक सीमित नहीं है। पूरे देश में विकास के नाम पर जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं। सड़कें, इमारतें, उद्योग और खनन के लिए इन सबके लिए सबसे पहले पेड़ काटे जाते हैं। हम सब अच्छी तरह से जानते है कि उनकी भरपाई केवल आंकड़ों में होती है, ज़मीन पर नहीं।

वर्तमान समय में आज बहस इस बात पर हो रही है कि पहाड़ों की ऊंचाई 100 मीटर तय की जाए या नहीं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि ऊंचाई कितनी हो, बल्कि यह है कि यह फैसला किसके फायदे के लिए लिया जा रहा है और किस कीमत पर। भारत जैसे देश में यह किसी से छिपा नहीं है कि संबंधित अधिकारी के पास सही समय पर पैसा पहुंच जाए तो कागजों पर 200 मीटर को 90 मीटर दिखाना असंभव नहीं है । पहाड़ों की नपाई, अनुमति और खनन सब कुछ कागज और हस्ताक्षर से तय होता है यदि यह फैसला लागू हो जाता है तो पहाड़ नहीं टूटेंगे, पेड़ नहीं काटेंगे बल्कि राजस्थान का भविष्य टूटेगा जनाब। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने पर्वत श्रृंखला की संशोधित परिभाषा को लेकर दिए गए अपने ही फैसले पर अस्थायी रोक लगा दी है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कई पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने चिंता जताई थी कि इस आदेश से संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों के बड़े हिस्से अवैध और अनियंत्रित खनन के लिए खुल सकते हैं। मामले की सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि समिति की सिफारिशों और अदालत के पूर्व निर्देशों को फिलहाल स्थगित रखना आवश्यक है। यह रोक नई समिति के गठन तक लागू रहेगी। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित चार राज्यों को नोटिस जारी किया। साथ ही, विशेषज्ञों की एक नई समिति बनाने का आदेश दिया गया और मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को तय की गई। इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार ने बुधवार राज्यों को अरावली पर्वत माला में नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी कर दिए हैं। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) को पूरे अरावली क्षेत्र में अतिरिक्त क्षेत्रों और जोन की पहचान करने का निर्देश दिया है। इन निर्देशों का लक्ष्य गुजरात से लेकर दिल्ली एनसीआर तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है। 

सरकार का पक्ष भी समझना जरूरी है। भारत एक विकासशील देश है, जहां आर्थिक विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और आवास की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। सरकार का तर्क है कि निर्माण और औद्योगिक गतिविधियां विकास के लिए जरूरी हैं और इनके बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। यह भी सच है कि सिर्फ एक राज्य राजस्थान से अरावली की पहाड़ियों का खनन करने से हर साल साढ़े चार हजार करोड़ की आमदनी होती है । सरकार यह भी कहती है कि नियम, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), वृक्षारोपण और पुनर्वास योजनाएं मौजूद हैं, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। कई जगह हरित परियोजनाएं, सौर ऊर्जा और वैकल्पिक विकास मॉडल अपनाने की कोशिश भी की जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये व्यवस्थाएं ज़मीन पर प्रभावी हैं? क्या कोई विकास का मॉडल ऐसा है जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सके? विकास और विनाश के बीच फर्क करना अब अनिवार्य हो चुका है। विकास वह है जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले, न कि उसे खत्म करके। पेड़ लगाए जा सकते हैं, लेकिन 250 करोड़ साल पुरानी पर्वत श्रृंखला दोबारा नहीं बनाई जा सकती। यदि आज हमने इसे नहीं बचाया, तो कल पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। आज अरावली का मुद्दा हमें एक स्पष्ट संदेश देता है प्राकृतिक से छेड़छाड़, आपदा को निमंत्रण है। यह कोई दूर का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी है। यदि आज हमने नहीं सुना, तो कल पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। अब समय है कि सरकार, समाज और नागरिक मिलकर यह तय करें कि हमें किस तरह का विकास चाहिए, कंक्रीट का जंगल या हरा-भरा जीवन। क्योंकि यदि पहाड़ नहीं टूटेंगे, पेड़ नहीं कटेंगे, तभी भारत का भविष्य सुरक्षित रहेगा क्योंकि भारत गांव में बसता है।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक) 9818270202

शनिवार, 3 जनवरी 2026

डॉ. प्रवेश कुमार की पुस्तक “विश्व हिन्दू परिषद: एक परिचय” का हुआ लोकार्पण

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार एवं सुरुचि प्रकाशन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘शब्दोत्सव समारोह में विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. प्रवेश कुमार जी द्वारा लिखित पुस्तक “विश्व हिन्दू परिषद: एक परिचय” का विधिवत लोकार्पण हुआ। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार जी ने अपने संबोधन में बांग्लादेश सहित विभिन्न देशों में हिंदू समाज पर हो रहे अत्याचारों का संदर्भ देते हुए विश्वभर के हिंदुओं के संगठन और सांस्कृतिक एकजुटता की आवश्यकता पर बल दिया।

पुस्तक के प्रकाशक एवं सुरुचि प्रकाशन के प्रबंधक श्रीमान राजीव तुली जी ने पुस्तक की सराहना करते हुए इसे हिंदू समाज के संगठनात्मक इतिहास और वैचारिक यात्रा को समझने हेतु महत्वपूर्ण ग्रंथ बताया और लेखक डॉ. प्रवेश कुमार के प्रति आभार व्यक्त किया।

वीएचपी के प्रांत अध्यक्ष श्री कपिल खन्ना जी ने अपने वक्तव्य में सामाजिक एकजुटता और संगठनात्मक प्रतिबद्धता को समय की आवश्यकता बताते हुए पुस्तक को समसामयिक संदर्भों में प्रासंगिक बताया। इस अवसर पर महामंडलेश्वर महंत नवल किशोर दास जी महाराज ने कहा कि प्रवेश जी ने इस पुस्तक के माध्यम से करोड़ों हिंदुओं को वीएचपी में प्रवेश के लिए उद्गत किया है। 

कार्यक्रम का संचालन श्री विकास कौशिक जी द्वारा अत्यंत गरिमामय एवं संक्षिप्त शैली में किया गया। इस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय एवं जेएनयू के सैकड़ों प्राध्यापक, शोधार्थी एवं गणमान्य उपस्थित रहें।

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