वर्ष 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और कल्याण सिंह जी उस सरकार के मुख्यमंत्री बने और शपथ लेने के बाद उन्होंने घोषणा कर दी कि प्रदेश में जो गुंडे माफिया हैं या तो उत्तर प्रदेश की सीमाओं से बाहर चले जाएं या गोलियां खाने को तैयार रहें। उनकी घोषणा का यह असर रहा कि सारे गुंडे माफिया प्रदेश की सीमाओं से बाहर हो गए और उत्तर प्रदेश में तब तक नहीं लौटे जब तक कल्याण सिंह जी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पर आज उन्हीं की पार्टी की हरियाणा में सरकार है और वहां के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी ने एक आईपीएस अधिकारी के आत्महत्या के मामले में यह कहते हुए अपनी लाचारी व्यक्त की कि हम एक चपरासी तक को सस्पेंड नहीं कर सकते। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश में लॉ एंड ऑर्डर के मामले में विरोधी भी कुमारी मायावाती के कार्यकाल बहुत बेहतर मानते थे और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द सहित भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेता भी यह मानते हैं कि मायावती के कार्यकाल में अधिकारी कांपते थे पर अब यह प्रश्न उठने लगा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत में जनता द्वारा चुने गए मंत्री या मुख्यमंत्री ब्यूरोक्रेसी के सामने मजबूर क्यों हैं।
जहां तक संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में होता यह है
कि जनता अपने मताधिकार से अपने प्रतिनिधियों सांसदों, विधायकों को चुनती है और ये चुने
हुए लोग अपने नेता के रूप में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव करते हैं और
ये लोग अपने मंत्रिमंडल के साथ सरकार चलाते हैं। कैबिनेट द्वारा लिए गए फैसलों को
नौकरशाही इंप्लिमेंट करतीं हैं। पर उधर कुछ वर्षों से ब्यूरोक्रेसी इतना मजबूत हो
चुका है कि मंत्री असहाय महसूस करते हैं। मेरे जानने वाले कई मंत्री यह ऑफ द
रिकॉर्ड कई बार कह चुके हैं कि हमारी यह स्थिति कुमारी मायावाती के मंत्रियों से
बदतर है। बस फक्र ये है कि मायावती के मंत्री उनके सामने दरियों पर बैठते हैं और
हमें कुर्सी मिल जाती है पर नेतृत्व द्वारा चुने गए ब्यूरोक्रेट्स के अलावा हमारी
और कुमारी मायावाती के मंत्रियों की हालत एक सी है। 1990 में देश में चन्द्रशेखर जी के
नेतृत्व में जनता दल की सरकार थी और औद्योगिक विकास विभाग का प्रभार बिहार के दलित
नेता दसई चौधरी को दिया गया पर वे इतने कमजोर मंत्री साबित हुए कि उनके बुलाने पर
सचिव तो दूर संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी नहीं आते थे कुछ ऐसी ही स्थिति हरियाणा
के मुख्यमंत्री साहब सिंह सैनी के हालिया बयान से लगती हैं।
वर्ष 2024 के आम चुनाव के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने विजन मंत्रालय एमएसएमई
का मंत्री अपने वरिष्ठतम मंत्री जीतन राम मांझी को बनाया। वे सदियों से उपेक्षित
तिरस्कृत मुसहर समाज से हैं और स्वतंत्र भारत के इतिहास में मुसहर समाज से इकलौते
मंत्री हैं। उनको इस विभाग का मंत्री बनाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एक
ही उद्देश्य था कि मांझी जी मुसहर समाज को उद्यमिता के माध्यम से उनको समाज की
मुख्यधारा में जोड़ सकेंगे। अनपढ़ मुसहर समाज को जागरूक करने के लिए मांझी जी की सहमति से मुसहर समाज का
इतिहास नामक पुस्तक लिखी गई और उसका लोकार्पण दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 24-9-2025 को सायं 5 बजे से रखा गया जिसमें
मांझी जी मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम की सूचना एमएसएमई के उपक्रम एनएसआईसी के सीएमडी
श्री संभ्रांत शेखर आचार्य को दे दी गई और उनसे इस कार्यक्रम के लिए सीएसआर फंड से
आर्थिक मदद के लिए भी अनुरोध किया गया पर श्री शेखर ने आर्थिक मदद तो दूर
कार्यक्रम को असफल बनाने के उद्देश्य से ठीक उसी समय एक उड़ीसा के प्रो सत्पथी का
कार्यक्रम जिसका शीर्षक था एमएसएमई सेक्टर में गुरु द्रोणाचार्य रख दिया। इसके लिए
23-9-2025
को शाम को सर्कुलर जारी कर दिया कि एनएसआईसी का कोई भी कर्मचारी इस कार्यक्रम
को छोड़कर कही नहीं जाएगा जिसका परिणाम यह हुआ कि अपने ही विभाग के मंत्री के उसी
के समाज के कार्यक्रम में एनएसआईसी का कोई कर्मचारी नहीं जा सका। इन लोगों के इसी एटीट्यूड के कारण मांझी जी जैसा वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री
गरीबों और उपेक्षितों के उठान के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं इसकी
ब्यूरोक्रेसी के सामने मंत्री की बेबसी न कहे तो और क्या कहें?
जबकि एनडीए-2 के कार्यकाल में जब नारायण राणे
देश के एमएसएमई मंत्री थे तो उसी एनएसआईसी में मंत्री के लोकसभा क्षेत्र में एससी/एसटी
हब का पैसा जॉब मेले तथा अन्य कार्यक्रमों को मंत्री को खुश करने के लिए डायवर्ट
किया गया जब कि एक आदिम जनजाति जो सदियों से उपेक्षित और शोषित हैं उसको विकास की
मुख्य धारा में लाने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के आयोजन के लिए सहभागिता तो दूर
उसमें रोड़े अटकाए गए उससे पहले वर्ष 2014 में तत्कालीन एम एस एम ई मंत्री कलराज मिश्र के जीवन पर आधारित पुस्तक
राष्ट्रवादी कर्मयोगी के लोकार्पण में मंत्रालय के काफी लोग वहां पहुंचे अपितु वह
पुस्तक खादी ग्रामोद्योग के विक्रय केंद्रों और एनएसआईसी के पुस्तकालयों में पढ़ने
के लिए रखी गई फिर शादियों से उपेक्षित तिरस्कृत मुसहर समाज के साथ इतनी उपेक्षा
क्यों?
आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की आत्महत्या के मामले में
पुलिस और प्रशासन की लापरवाही से स्थिति खराब हो गई है। मौत के सात दिन बीत जाने
के बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है और परिवार के लोगों को समझाने के लिए केंद्र
सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले का भेजा गया। वे विद्वान
और बड़े शरीफ इंसान हैं पर एक सदस्य वाले रिपब्लिकन पार्टी के नेता के रूप में
उनकी हैसियत नहीं है कि वे इस मामले में लीपापोती करने वाले अधिकारियों के विरूद्ध
कुछ कह सकें या उनकी शिकायत केंद्र सरकार से कर सकें। श्री अठावले पूरन कुमार कि
आईएएस पत्नी समेत परिवार के अन्य सदस्यों से मिले फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री साहब
सिंह सैनी से मिले और फिर दुबारा मृतक की पत्नी अमनीत कौर से बात की। उसके बाद भी
कोई हल नहीं निकला और मौत के सात दिन बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है और
प्रधानमंत्री की 17 अक्टूबर को रोहतक में होने वाली रैली स्थगित कर दी गई है।
बढ़ते दबाव के बाद चंडीगढ़ पुलिस ने इस मामले में उन
सभी अधिकारियों के बारे में जानकारी मांगे हैं जिनके नाम आत्महत्या से पहले पूरन
कुमार द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट में लिखे गए हैं या एफआईआर में आए हैं। सरकार
द्वारा गठित एसआईटी इन सबसे पूछताछ की तैयारी में है। वहीं जांच दल रोहतक के एक
पुलिस अधिकारी के घर से सबूत इकठ्ठा कर रहा है। कैसी विडंबना है कि आत्महत्या के
सात दिन बाद भी पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है। मृतक की पत्नी जो खुद भी एक आईएएस
अधिकारी हैं ने पोस्टमॉर्टम से पहले सुसाइड नोट में दर्ज आरोपियों के खिलाफ
कार्यवाही की मांग की है। सुसाइड नोट में हरियाणा के पुलिस महानिदेशक व रोहतक के
एसपी सहित 15 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आरोपी लगे हैं। मृतक की पत्नी के दबाव में
पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली है पर आरोपियों का नाम वाले कॉलम को खाली छोड़ दिया
गया है।
अगर हरियाणा सरकार मामले की गंभीरता को समझते हुए
सुसाइड नोट में लिखे गए 15 अधिकारियों को तुरंत निलम्बित कर देती और मामले की निष्पक्ष जांच कराकर समय से
निपटा लेती तो यह मामला इतना बड़ा राजनैतिक विवाद का मुद्दा न बनता। वहीं हरियाणा
सरकार को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के शासन के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में
होने वाली 17 अक्टूबर को प्रधानमंत्री की रैली को स्थगित न करना पड़ता और मुख्यमंत्री को
अपनी मजबूरी बताते हुए यह न करना पड़ता कि मैं तो एक चपरासी को भी निलम्बित नहीं
कर सकता तो अधिकारी को कैसे निलम्बित कर सकता हूं अर्थात मुख्यमंत्री जी
ब्यूरोक्रेसी के सामने मजबूर है। आखिरकार इतनी फजीहत के बाद पुलिस महानिदेशक
शत्रुजीत कपूर को छुट्टी पर भेजा गया। यदि यही काम समय से पहले कर दिया गया होता
इतनी समस्या न होती। अब समस्या यह है कि बेलगाम होती हुई ब्यूरोक्रेसी पर लगाम
कैसे लगाए जाए।

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