शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

भाजपा की वोट नीति

अवधेश कुमार

जबसे यह साफ हो गया कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनेंगे तभी से अपने चुनावी रंगरुप और ढांचे को वह एक श्रेष्ठतम सुप्रबंधित मशीनरी और जीवंत समूहों- योजनाओं में ढालने का कदम उठा रही है। जून में मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही भाजपा चुनावी मोड में आ गई थी। 13 सितंबर को उनके प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के साथ उसका एक क्रम पुरा हुआ। 24 दिसंबर को पार्टी की संसदीय बोर्ड और मुख्यमंत्रियों की साझा बैठक तथा उसके बाद चुनाव अभियान समिति की बैठक में जो कुछ हुआ वह उसी कड़ी का अंग था। अगर सामने आए कार्यक्रमों पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो यह औपचारिक चुनाव प्रचार अभियान आरंभ होने के पूर्व सम्पूर्ण पार्टी का अंतिम मतदान को छोड़कर उससे संबंधित सारे क्रियाकलापों, जरुरतों के मोर्चे पर सक्रिय हो जाना है। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा भी कि आम चुनाव के लिए अब मात्र 120 दिन बचे हैं। इसलिए भाजपा 60 दिन तैयारी और शेष 60 दिन प्रचार में लगाएगी। तो क्या हैं योजनाएं? क्या हैं इनके पीछे की सोच? और क्या हो सकते हैं इनके संभावित परिणाम?

चुनाव की दृष्टि से यह पहली ऐसी बैठक थी जिसमें वे सभी  नेता शामिल थे, जिनकी औपचारिक रुप से महत्वपूर्ण भूमिका होगी। पार्टी की शीर्ष निर्णयकारी ईकाई केन्द्रीय संसदीय बोर्ड, फिर पार्टी शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सभी प्रदेशों के अध्यक्ष व चुनाव अभियान समिति व उप समितियों के प्रमुखों के अलावा उन लोगों को भी बुलाया गया था जिनकी सक्रियता और अनुभव की आवश्यकता पार्टी को होगी। इसके बाद अलग से केंद्रीय चुनाव अभियान समिति ने विचार विमर्श किया और तब जाकर योजनाओं और कार्यक्रमों का ऐलान हुआ। ऐसी बैठकें लगातार नहीं हो सकतीं। इसका अर्थ साफ है कि बैठक के पूर्व एजेंडा आदि पर अनौपचारिक तैयारी चल रही थी और जितने सुझाव व कार्यक्रम आए उन सबको अंतिम रुप देकर सामने लाया गया। निस्संदेह, 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस को ध्यान में रखकर इसका आयोजन किया गया होगा ताकि अगले दिन से ही इसकी शुरुआत हो जाए। तो कहा जा सकता है कि 25 दिसंबर को भाजपा ने सुशासन दिवस के साथ चुनाव अभियान आरंभ कर दिया है। लेकिन स्वाभाविक ही वाजपेयी अब जैविक रुप से जीवित होते हुए भी भाजपा को नेतृत्व या मार्गदर्शन देने की स्थिति में नहीं है। इसलिए  अबकी बारी अटलबिहारी की जगह ‘मोदी फॉर पीएम’ का ही नारा होगा। 

तीन कार्यक्रम चुनाव की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकसभा चुनाव परिणाम पर प्रभाव डालने वाले साबित हो सकते हैं। उनमें सबसे पहला है, घर-घर जाकर मतदाताओं से वोट के साथ नोट मांगने का अभियान। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भाजपा कार्यकर्ता कम से कम एक नोट, एक वोट की योजना के साथ 10 करोड़ परिवारों से सीधे संपर्क करेंगे। उन्हें भाजपा की नीतियों के बारे में बताने के अलावा 10 से 1000 रुपये तक का चंदा एकत्र करेंगे। इसी दौरान मतदान केन्द्र स्तर के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन भी होगा। ये सम्मेलन फरवरी अंत तक पूरे कर लिए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए लोकसभा की 450 सीटों को लक्ष्य बनाया है। तीसरा कार्यक्रम, जो इसके साथ होते हुए भी अलग से किया जाएगा वह है, जनवरी में नए मतदाताओं से संपर्क करने का। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण कराना भी शामिल है। नए मतदाताओं में मतदान के प्रति रुचि सबसे ज्यादा देखी जा रही है और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा कुछ हद तक दिल्ली चुनाव में नए मतदाता कैमरे पर बयान देते देखे गए कि वे मोदी के लिए मत दे रहे हैं। मोदी वैसे भी युवाओं को आकर्षित करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। वे युवाओं को न्यू एज वोटर की जगह न्यू एज पावर घोषित करके उनकी तालियां बटोरते हैं।

कोई राजनीतिक अभियान बगैर ठोस आधार और विचार के नहीं हो सकता। निस्संदेह, चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम यदि भाजपा के अनुकूल नहीं आए होते तो पार्टी नेतृत्व का मनोविज्ञान चिंता और निराशा से भरा होता और तब उसका मुख्य लक्ष्य प्रतिकूल परिणामों के प्रभावों से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बाहर निकालना होता। चुनाव परिणामों से उत्साहित भाजपा के संसदीय बोर्ड ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि राज्यों के चुनाव परिणाम इस बात का जनमत सर्वेक्षण हैं कि सरकार को काम करके दिखाना चाहिए या हट जाना चाहिए। साफ है कि परिणाम के बाद माहौल उसे अपने पक्ष में लग रहा है और मोदी केन्द्रित अभियान उसे और सुदृढ़ करेगा। विचार के तौर पर जनता को संदेश दिया जाएगा कि देश में इस समय 1975 में कांग्रेस के लगाए गए आपातकाल के बाद जैसे हालात हैं। इसके साथ अपना दृष्टिकोण पत्र, घोषणा पत्र तथा भाजपा शासित राज्यों की उपलब्धियों की प्रचार सामग्रियां साथ होंगी। और मोदी की सभाएं ज्यादा से ज्यादा कराकर माहौल को सशक्त करने की कोशिश होगी। किंतु यह भाजपा का अपना आकलन है। भारत जैसे बहुविध आकांक्षाओं और राजनीतिक अपेक्षाओं वाले देश में कम से कम 300 लोकसभा क्षेत्रों तक अपने पक्ष में बहुमत को मोड़ना कितना कठिन है यह बताने की आवश्यकता नहीं।

पर भाजपा के दोनों संपर्क अभियानों को एक साथ मिलाकर देखिए तो इसका महत्व साफ हो जाएगा। ध्यान रखिए 2014 के लोकसभा चुनाव तक देश में पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं की संख्या करीब 12 करोड़ होगी। 10 करोड़ लोगों तक चंदे और मतदान के लिए पहुंचना तथा 12 करोड़ नए मतदाताओं से संपर्क करने का अर्थ चुनावी गणित के आलोक में सामान्य बात नहीं हैं। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 11 करोड़ 91 लाख 11 हजार 19 मत मिला था। भाजपा को 7 करोड़ 84 लाख 35 हजार 381 मत मिले थे। पिछले लोस चुनाव में करीब 10 करोड़ वोटर ऐसे थे, जिन्हें पहली बार मतदान करना था। इनमें भी 2 करोड़ की वृद्धि है। अभी तक की स्थिति के अनुसार करीब 400 लोकसभा स्थानों पर भाजपा उसके सहयोगियों और कांग्र्रेस के बीच ही टकराव होना है। भाजपा को यदि 272 का आंकड़ा पार करना है तो उसे 13 से 14 करोड़ के बीच मत चाहिए होगा। यानी 2009 से 6 करोड़ ज्यादा। यह कार्य आसान नहीं है। इसलिए भाजपा ने नोट और वोट, नए मतदाताओं एवं मतदान स्तर के सम्मेलनों का निर्धारिण उचित ही किया है। इसी नोट और वोट योजना से जनसंघ एवं बाद में भाजपा आगे बढ़ी थी। 1977 में जनता पार्टी इसी की बदौलत चुनाव लड़ने के लिए संसाधन पा सकी थी एवं जनमत निर्माण संभव हुआ था। इसलिए यह बिल्कुल व्यावहारिक और संसदीय लोकतंत्र के लिए सर्वथा उचित राजनीतिक आचरण होगा।

किंतु प्र्रश्न तो यही है कि क्या जैसी योजनाएं बनाईं गईं हैं जमीन पर भी वैसे ही उतर जाएंगी? क्या भाजपा में इतनी संख्या में चारों ओर निष्ठावान, ईमानदार और अनुशासित कार्यकर्ता बचे हैं जो पार्टी की योजनानुसार इसे जमीन पर अंजाम दे सकेंगे? अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस के प्रति असंतोष, अन्य दलों को लेकर आकर्षण में क्षीजन के दौर में मोदी का नाम चमत्कार कर सकता है और मोदी फॉर पीम का लक्ष्य हासिल हो सकता है। लेकिन भाजपा भी धीरे-धीरे कांग्रेस की तरह कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं रह गई है। पार्टी में स्वाभाविक नेतृत्व की जगह लद गए या लादे गए नेताओं की प्रबंधन शैली के कारण कार्यकर्ताओं की जगह भाजपा में निहित स्वार्थियों का वर्चस्व हो चुका है। आज विवेक से कौन निष्ठावान और कौन निहित स्वार्थी है इसकी पहचान करने वाले अत्यंत कम बचे हैं। इसीलिए उम्मीदवारों के रुप में भी वैसे लोगों का नाम सामने आ रहा है जिन्हें ईमानदार और निष्ठावान कार्यकर्ता आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते। हां, मोदी का नाम उनके अंदर एक उम्मीद जरुर पैदा कर रहा है और युवाओं की बड़ी तादाद उनके नाम पर काम करने के लिए आगे आ रही है। पर इनका भी उचित उपयोग करने वाले ईमानदार और विवेकशील लोग चाहिए। इसलिए भाजपा को सबसे पहले ऐसे लोगों को तलाशकर जिम्मेवारी देनी होगी जो इस योजना को ईमानदारी से अमल में लाने के कार्यक्रम को अंजाम दिलवा सकें, अन्यथा योजनाएं और कार्यक्रम अपेक्षानुरुप साकार नहीं होंगी।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः110092, दूर.ः 011 22483408, 09811027208
 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

राजनीतिक रणनीति हैं आप की सरकार बनाने की शर्तें

अवधेश कुमार

भारत की राजनीति में यह दृश्य पहली बार दिखा है जब समर्थन देने वाली पार्टी कोई शर्त्त नहीं रख रही है और जिसे समर्थन दिया जा रहा है उसका कहना है कि मैं समर्थन लेने की शर्त रख रहा हूं। जबसे भारत में विखंडित राजनीति का दौर आरंभ हुआ, सामान्यतः गठबंधन की सरकारें समर्थन देने वालों की शर्त्तों से दबीं होतीं थीं और उनके लिए काम करना कठिन होता था। आम आदमी पार्टी कह रही है कि कांग्रेस ने उनको बिना शर्त्त समर्थन देने का पत्र दिया तो उसने कहा कि वह स्वीकार कर रही है, लेकिन हमारी जो शर्त्तें हैं यदि उन्हें ये मंजूर हैं तो हम सरकार बनाएंगे। फिर कांग्रेस ने पत्र से बता दिया कि उनकी शर्तें सरकार को स्वीकार है। यह अब तक अनुभव से बिल्कुल उल्टी स्थिति है। समर्थन देने वाले आगे और जिसे समर्थ दिया जा रहा है वह पीछे। दिल्ली में लटकी हुई विधानसभा के परिणाम के बाद किसी पार्टी की सरकार अपने-आप तो बन नहीं सकती। या तो मिलीजुली सरकार बन सकती है या बाहर के समर्थन पर या फिर नहीं बन सकती है। सबसे बड़ी पार्टी होेने के बावजूद भाजपा ने बहुमत न होने की बात कहकर अस्वीकार कर दिया तो उप राज्यपाल नजीब जंग के पास दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण आप को ही बुलाने का विकल्प था। चूंकि कांग्रेस ने राज्यपाल के यहां आप को समर्थन का पत्र दे दिया, इसलिए उनको विधानसभा में बहुमत भी प्राप्त है। सामान्य स्थिति में सरकार आराम से बन सकती थी। यह आप की राजनीति है, जो परंपरागत तरीके से बिल्कुल अलग है।
कुछ बड़ी पार्टियों को इसका आंशिक अनुभव हो सकता है, क्योंकि सरकार बनाते समय वे भी अपने सथियों और समर्थकों के बीच यह बात रखते थे कि हम फलां फलां काम सरकार के एजेंडा में रखेंगे। पूरा अनुभव तो किसी को नहीं होगा। अगर आप की 18 शर्तों को देखें तो उसे किसी भी पार्टी के लिए स्वीकार करना आसान नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र भेजने के बारे में राज्यपाल के आवास से बाहर आते समय आप के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने जो बातें कहीं वे दोनों पार्टियों को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त थीं। मसलन, भाजपा को केवल चार विधायक चाहिए, जिसे वह आसानी से खरीद सकती थी, क्योंकि न जाने कितने विधायकों एवं सांसदों को उनके द्वारा खरीदे जाने का रिकॉर्ड है। भाजपा की तीखी प्रतिक्रियाओं से जाहिर हो जाता है कि उन्हें यह नागवार गुजरा है। यह स्वाभाविक भी है। किसी पार्टी पर आरोप लगेगा तो उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी। अरविन्द केजरीवाल ने अपनी राजनीति और रणनीति के तहत ऐसा बोला है। आम आदमी पार्टी सभी दलों को भ्रष्ट, पाखंडी बताते हुए ही राजनीति में उतरी है। वैसे आप को जो मत मिला है उसका कारण इतना तो है ही कि कांग्रेस से असंतुष्ट व नाराज बड़े तबके का भाजपा पर भी विश्वास नहीं है। अगर आप को इस समर्थन को बनाए रखते हुए उसका विस्तार करना है तो उसे दोनों पार्टियों को आक्रामक तरीके से कठघरे में खड़ा करना ही होगा।
यही वे कर रहे हैं। अगर आप आप पार्टी द्वारा दोनों पार्टियों के अध्यक्षों को भेजे गए प्रश्नों के सभी 18 विन्दुओं को देखें तो उसका स्वर भी यही है। यानी शीला दीक्षित के मंत्रिमंडल के सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच होगी तब भी आपका समर्थन जारी रहेगा। इसी तरह 7 वर्ष से दिल्ली की स्थायी नगर ईकाई पर भाजपा का कब्जा है। उनके पार्षदों के खिलाफ जांच होगी तब भी क्या उनको स्वीकार होगा। वे पूछ  रहे हैं कि कोई मंत्री, विधायक, अधिकारी सुरक्षा नहीं लेगा... आदि आदि। यह सब जनता को यह बताने के लिए हम क्या चाहते हैं, हम कैसी शासन व्यवस्था लाना चाहते हैं और कांग्रेस व भाजपा कैसी व्यवस्था की समर्थक है। देखा जाए तो आम आदमी पार्टी ने राज्यपाल से मिलने के बाद पत्र लिखने और प्रश्न पूछने के बहाने अपना अगला चुनाव प्रचार आरंभ कर दिया है। इन 18 प्रश्नों मंे दिल्ली की लगभग वो सारी समस्याएं हैं, जिनसे लोग परेशान हैं। बिजली, पानी, झुग्गी झोंपड़ी, शिक्षा, स्वास्थ्य.... आदि सारी बातें हैं और सबमंे राज्य सरकार के नाते कांग्रेस तथा नगर निमम एवं नगरपालिकाओं मेें होने के कारण भाजपा को कठघरे में खड़ा किया गया है। इसमें सभी वर्गों के लिए वे बातें हैं जो उनको सीधे प्रभावित करती है। मसलन, व्यापारी के लिए वैट का मामला है। यह आम आदमी पार्टी की सरकार का एजेंडा है। अरविन्द ने कहा भी कि सोनिया गांधी और राजनाथ सिंह का जो जवाब आएगा उसे हम जनता के बीच लेकर जाएंगे। जाहिर है, जनता के बीच जाने का अर्थ वे चुनाव प्रचार आरंभ कर चुके होंगे। वे रामलीला मैदान में विधानसभा बुलाकर जन लोकपाल यानी लोकायुक्त पारित करना चाहते हैं और सभी पार्टियों से उसमें सहमति चाहते हैं।
यह बात ठीक है कि समर्थन देने का कांग्रेस का अतीत अत्यंत स्याह है। कांग्रेस ने 1979 में चौधरी चरण सिंह को समर्थन देकर उनके संसद में जाने तक का अवसर नहीं दिया और समर्थन वापस ले लिया। चन्द्रशेखर, एचडी देेवेगौड़ा, इन्दरकुमार गुजराल तक को भी उसने नहीं बख्सा। इसलिए कांग्रेस के समर्थन पत्र को स्थायी समर्थन की वचनबद्धता नहीं माना जा सकता। कांग्रेस नेता कह भी रहे हैं कि हमने समर्थन दिया है कि आपने जो लोगों से झूठे वायदे किए उन्हें पूरा करिए। यानी उनकी भी आप को जनता के सामने नंगा करने की रणनीति है बिना शर्त समर्थन का पत्र देना। आप इसे उठा सकती थी और फिर अपने रुख को दोहरा सकती थी। इस प्रकार पत्र देकर आप ने उन दलों को स्वाभाविक ही यह कहने का अवसर दे दिया है कि ये जिम्मेवारी से भाग रहे हैं। ये अपने वायदे के अनुरुप जिम्मेवारी नहीं निभा सकते, इसलिए वे बहाना बना रहे हैं। कांग्रेस ने अपने जवाब मंे एक प्रकार से आप को घेरने की रणानीति ही अपनाई है। उसने जवाब में कहा है कि इनमें से 16 मांगों पर समर्थन की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि ये प्रशासनिक मामले हैं, दो मामले लोकायुक्त और पूर्ण राज्य का तो यदि लोकायुक्त कानून में वे संशोधन करना चाहते हैं तो हम सहयोग देंगे यदि केन्द्र के लोकपाल कानून के अनुरुप हो तथा राज्य की मांग के लिए पहल का भी समर्थन करेंगे। कांग्रेस की ओर से दिल्ली के प्रभारी शकील अहमद ने कहा कि उनको अनुभव की कमी है, इसलिए ऐसा पत्र लिख दिया। यह आसानी से समझने वाली बात है कि सरकार जैसे ही प्रशासनिक कदम उठाएगी जो उनके विरुद्ध जाएगा वे समर्थन वापस ले सकते हैं। वैसे विचार करने वाली बात है कि आम आदमी पार्टी का जो घोषणा पत्र है उसे लागू करने का वचन दूसरी पार्टियां कैसे दे सकतीं हैं। यह बात भी सही है कि इन 18 शर्तों में ऐसी अनेक बाते हैं जो भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में भी हैं। आप ने इसका जिक्र नहीं किया। अगर आप की ओर से यह कहा जाता कि हम सबसे सहयोग लेकर कुछ मुद्दों पर काम करना चाहते हैं और एक आम एजेंडा बनाने की अपील करतीं तो उसका सकारात्मक संदेश जाता।
कोई भी देख सकता है कि यह और कुछ नहीं, बल्कि अन्य पार्टियोे से स्वयं को बिल्कुल अलग शासक की मानसिकता से परे केवल आम आदमी को समर्पित, ईमानदारी, शुचिता और पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्ध पार्टी साबित करना है। हालांकि अभी तक आप के प्रमुख नेताओं की प्रतिबद्धता को संदेह में लाने का कोई कारण नहीं दिखा है। लेकिन यह रवैया विशुद्ध राजनीतिक रणनीति ही है। आप के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव परिणाम के ठीक बाद साफ कर दिया था कि वे न किसी से समर्थन लेंगे न देंगे। वे राज्यपाल को यही बता सकते थे। 18 शर्तों की सूची देना और 10 दिनों का समय लेना रणनीति के अनुसार तो ठीक है, आपको दूसरे दलों को पटखनी देनी है तो यह भाव भंगिमा उचित है, लेकिन यह पारदर्शी और निष्कपट राजनीतिक व्यवहार नहीं है। यह जैसे को तैसा तो है, किंतु इसमें पवित्रता अनुपस्थित है। यह रवैया आने वाले समय में आप को भी अन्य दलों की उस कतार में खड़ी करेगी जहां जन समर्थन के लिए एक दूसरों को निचा दिखाने और स्वयं को महान साबित करने की छलपूर्ण कोशिशें ही प्रबलतम होतीं हैं। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। वह सीधा कह सकती थी कि जिन दलों के आचरण के खिलाफ हम बदलाव के लिए राजनीति में आए हैं और जिनके लिए जन समर्थन मिला है उनको साकार करना तभी संभव है जब हम पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएं।
अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष : 01122483408, 09811027208


गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

देश की राजनीति के लिए क्या संकेत हैं

अवधेश कुमार

निश्चय ही लोकसभा चुनाव पूर्व के इन विधानसभा चुनावों के बाद हमारा ध्यान 2014 की ओर जा रहा है। सामान्यतः यह कहा जाता है कि राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों को लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जाना चाहिए। चार राज्यों के चुनावों के संदर्भ में भी कुछ हलकों से यही तर्क दिया जा रहा है। किंतु इसे हम आंशिक सच के रुप में ही स्वीकार कर सकते हैं। यह चुनाव यकीनन प्रदेश का चुनाव था जिनके परिणामों के निर्धारण में स्थानीय समस्याएं, स्थानीय मुद्दे, स्थानीय नेतृत्व, स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की मुख्य भूमिका रही है। किंतु इसे हम राष्ट्रीय राजनीतिक परिपे्रक्ष्य से अलग होकर नहीं देख सकते हैं। इन परिणामों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर नहीं होगा और लोकसभा चुनाव इससे बिल्कुल अप्रभावित रहेगा ऐसा मानना बेमानी होगा। सामान्य तौर पर विचार करने से भी यह स्पष्ट हो जाएगा कि इसका यकीनन राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य है और भविष्य की राजनीति के लिए कुछ साफ संदेश भी। अगर इन परिप्रेक्ष्यों और संदेशों को हम ठीक प्रकार से पढ़े ंतो फिर कुछ निश्चित निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

कांग्रेस या अन्य कुछ पार्टियां इसे जिस रुप में लें, पर भाजपा ने राज्यों के चुनावों को लोकसभा चुनाव के पूर्व सेमिफाइनल का नाम दिया था। इसमें कांगे्रस बुरी तरह पराजित हुई है तो उसके द्वारा लोकसभा चुनाव को फाइनल कहकर इससे जोड़ते हुए प्रचारित करना एकदम स्वाभाविक है। इन चार राज्यों के 72 लोकसभा स्थानों में कांग्रेस के पास 41 तथा भाजपा के पास 30 थे। दिल्ली को छोड़कर ऐतिहासिक रुप से तीन राज्यों में विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों के प्रदर्शनों में समानता रही है। यानी जिस पार्टी को विधानसभा चुनाव मंे सफलता मिलती है उसी को लोकसभा में भी। इससे भाजपा अपना प्रदर्शन काफी बेहतर करने की उम्मीद कर सकती है। अगले लोकसभा चुनाव के लिए बढ़े हुए आत्मविश्वास का महत्व आसानी से समझा जा सकता है। मध्यप्रदेश में पिछली बार से ज्यादा सीटें, राजस्थान में रिकाॅर्ड विजय, दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी तथा छत्तीसगढ़ में भी संतोषजनक प्रदर्शन.......के बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभााविक है। इसके समानांतर यह कांग्रेस के लिए हर पहलू से आत्मविश्वास गिराने वाला तथा भविष्य की चिंता में डुबोने वाला परिणाम है। नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितीज पर आविर्भाव तथा भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदार बनने के बाद राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है। उनकी सभाओं से वैसे ही लोकसभा चुनाव जैसा वातावरण बन चुका है। इस कारण भी इन चुनावों पर राष्ट्रीय माहौल का असर था। मध्यप्रदेश में 73 प्रतिशत लोगांे ने एक सर्वेक्षण में स्वीकार किया कि उनके मतदान करने के निर्णय में नरेन्द्र मोदी भी कारक हैं। राजस्थान में इससे ज्यादा लोगों का जवाब ऐसा ही था। इसके आधार पर इन चुनावों पर राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव को स्वीकार करने में समस्या नहीं है।

कांग्रेस कह रही है कि यह चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी था ही नहीं। इसके विपरीत भाजपा ने इन चुनावों को नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी में परिणत करके इसे राष्ट्रीय प्रकृति से आच्छादित करने की रणनीति अपनाई थी। मोदी ने दिल्ली एवं राजस्थान की अपनी रैलियों में स्थानीय सरकारों के साथ केन्द्र सरकार, राहुल गांधी, सोनिया गांधी को ज्यादा निशाना बनाया। उनने प्रदेश चुनावों को भी कांग्रेस से देश को मुक्त करने के अपने विचार से जोड़ा। वे कहते थे कि पहले प्रदेश से कांग्रेस को खत्म करेंगे उसके बाद देश से। कांग्रेस भी प्रदेश नेतृत्व के साथ मोदी पर हमला करती थी। हालांकि राहुल गांधी एवं सोनिया गांधी ने कभी मोदी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ होता था। राहुल गांधी को जिस भाषण के लिए चुनाव आयोग का नोटिस मिला, उसमें उनने मुजफ्फरनगर दंगे के लिए बिना नाम लिए भाजपा को जिम्मेवार ठहराया था। इस प्रकार दोनों पक्षों ने इसे एक राष्ट्रीय चरित्र दिया था। कांग्रेस ने केन्द्र सरकार की खाद्य सुरक्षा कानून से लेकर अन्य कल्याणकारी योजनाओं को लगातार प्रचारित किया। प्रदेश के नेताओं ने भी हर स्तर पर नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाया। सच यह है कि आज यदि भाजपा का प्रदर्शन खराब हुआ होता तो कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियां भी इसे मोदी की अस्वीकृति कहकर उन पर हमला करते।

वस्तुतः इन परिणामों को कांग्रेस के विरुद्ध जनादेश स्वीकार करने में किसी को समस्या नहीं होगी। स्वयं कांग्रेस को भी नहीं। इसमें भ्रष्टाचार, महंगाई, असुरक्षा केन्द्र सरकार से जुड़े मुदृदे थे। साफ है कि इससे जनता में व्याप्त व्यापक असंतोष ही इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन से बाहर आया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की आशातीत सफलता के पीछे यदि जन लोकपाल को लेकर केन्द्र सरकार के विरुद्ध अन्ना के अनशन अभियानों से जोड़कर देखें तो यह केवल मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की नीतियों की नहीं केन्द्र एवं राज्य दोनों की सम्मिलित नीतियों के विरुद्ध परिणाम है। साफ है कि अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में वहां की भाजपा सरकारों के संदर्भ में सत्ता विरोधी रुझान को कमजोर करने में कामयाब न हुए और केन्द्र के विरुद्ध असंतोष हाबी रहा तो फिर लोकसभा चुनाव में वे इससे परे परिणाम लाने में कामयाब होंगे इसकी उम्मीद कठिन है। यह राहुल बनाम मोदी की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस के विरुद्ध जाने वाली राजनीतिक परिणति है। मोदी छत्तीसगढ़ एवं दिल्ली में भाजपा को श्रेष्ठतम सफलता दिलाने में सफल नहीं हुए, लेकिन कांग्रेस की राजधानी दिल्ली और राजस्थान में जैसी दुर्गति हुई उसे कांग्रेसजन याद भी नहीं करना चाहेंगे। इससे बचे-खुचे संप्रग के अंदर निराशा बढ़ रही है। राकांपा द्वारा कांग्रेस को आत्ममंथन करने की नसीहत को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

तो इन चुनाव परिणामों के कुछ संदेश और संकेत साफ हैं। सबसे पहले कांग्रेस के लिए। एक, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार की नीतियों के विरुद्ध जनता में गुस्सा कायम है और भाजपा व मोदी तथा दूसरे दल भी उसे और बढ़ाने में सफल हो रहे हैं। दूसरा, पूरा कांग्रेस नेतृत्व इस गुस्से के शमन का सूत्र तलाशने में विफल है। राहुल गांधी एवं सोनिया गांधी का करिश्मा गुस्से की अग्नि के सामने कमजोर पड़ रही है। तीसरा, इससे कांग्रेस के अंदर निराशा बढ़ेगी। इसका चैथा संकेत यह है कि राहुल एवं सोनिया की महिमा कमजोर होने के कारण आगामी चुनाव में उसे सहयोगी मिलना कठिन हो जाएगा। कोई भी बगैर मजबूरी ऐसी पार्टी के साथ चुनाव लड़ना नहीं चाहेगा जिसके विरुद्ध जनता में गुस्सा हो। यानी कांग्रेस पर अपने साथियों का दबाव बढ़ेगा। इसके समानांतर भाजपा के लिए पहला संदेश यह है कि नरेन्द्र मोदी का प्रभाव मतदाताओं पर है। इन चुनावों ने साबित कर दिया कि उनमें गुजरात से बाहर वोट पाने की क्षमता है। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने के बाद उनके लिए यह पहला परीक्षण था। इसमें वे डिस्टिंग्शन यानी विशिष्टता से भले उत्तीर्ण नहीं हुए, लेकिन अच्छे अंक अवश्य पाए हैं। दूसरा, यह बढ़ा हुआ आत्मबल भाजपा और मोदी को कांग्रेस, केन्द्र सरकार, राहुल गांधी, सोनिया गांधी के खिलाफ और आक्रामक बनने को प्रेरित करेगा। इससे उनके समर्थकों का उत्साह बढ़ सकता है। तीसरा, मोदी द्वारा व्यंग्यात्मक लहजे में राहुल गांधी को शहजादा एवं सोनिया गांधी को मैडम कहने की हम आप जितनी आलोचना करें लेकिन इन चुनावों के दौरान उनकी सभाओं में इसका असर देखा गया है। यह राजनीति के लिए उचित भाषा है या अनुचित इस पर सहमति असहमति हो सकती है, पर जब वे शहजादा बोलते थे तो लोगों की तालियां ज्यादा बजतीं थीं। इसलिए आगे इसके कम होने के संकेत नहीं हैं। इस प्रकार रजनीति का तापमान और बढ़ेगा।
इस प्रकार इसका राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और संकेत बिल्कुल स्पष्ट है। इसके अनुसार कुल मिलाकर यह स्वीकार करने में समस्या नहीं है कि कांग्रेस अपना चेहरा, चिंतन, चित्त, चरित्र और आचरण में बदलाव लाने के लिए व्यापक पैमाने पर कदम नहीं उठाती तो केन्द्र से उसकी सत्ता का जाना निश्चित है। दूसरी ओर भाजपा को भी अपनी राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से यह विचार करना होगा कि दिल्ली में वह कांग्रेस विरोधी माहौल का पूरा लाभ उठाने में सफल क्यों नहीं हुई? क्यों नवजात आम आदमी पार्टी इसका लाभ उठाने में कामयाब हो गई? इस प्रश्न का अगर वह ईमानदारी से उत्तर तलाशेगी तो फिर यह समझ आएगा कि उसे भी जनता का सकारात्मक विकल्प बनने के लिए काफी कुछ करने की आवश्यकता है। मोदी का असर वोट में योगदान तो कर सकता है, लेकिन आधार तो उसकी रीति-नीति ही होगी।
अवधेश कुमार, ई.ः30, ्रगणेश नगर, पांडव नगर काॅम्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208      

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने लवली को जन्मदिन पर बधाई दी

संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के प्रतिनिधि मंडल ने अरविंदर सिंह लवली (विधायक, गांधीनगर) का उनके निवास पर उन्हें जन्मदिन की बधाईं दी। इस प्रतिनिधि मंडल के साथ संस्था के सरपरस्त व बिहार समाज समिति के संस्थापक श्री अब्दुल खालिक व कालोनी के कुछ जिम्मेदार मौजूद थे। इस प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने किया।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने श्री अरविंदर सिंह लवली को फूलों का गुलदस्ता देकर उनको जन्मदिन व भारी बहुमत से गांधीनगर का विधायक चुने जाने पर बधाईं दी व कहा कि उनकी आयु सौ वर्षो से अधिक हो और वह इसी प्रकार जनता की सेवा करते रहें।
उन्होंने कहा कि लवली जी ने जिस भी मंत्रालय को संभाला उसमें चार चांद लगा दिया और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी उन्हें जो जिम्मेदारी दी जाएगी वह उस पर उसी तरह काम करेंगे।
श्री अब्दुल खालिक ने कहा कि लवली जी ने जो काम बुलंद मस्जिद के लिए किया है वह पहले नहीं हुआ था। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी उसी तरह काम करेंगे जिस तरह काम करते आए हैं।
इस प्रतिनिधि मंडल में श्री अब्दुल खालिक (सरपरस्त), साबिर हुसैन (संस्थापक व अध्यक्ष), मो. रियाज़ (उपाध्यक्ष), अंजार (सचिव), शमीम हैदर (महासचिव), डा. आर अंसारी (कोषाध्यक्ष), मो. यामीन (ब्लॉक अध्यक्ष बुलन्द मस्जिद) और सज्जाद, नियामत आदि (सदस्य) व कालोनी के जिम्मेदार हाजी जाबिर हुसैन, जुबैर आज़म, मो. शोएब, मो. अंसार आदि लोग शामिल थे।



गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

भारी संख्या में मतदान मशीन का बटन दबने का अर्थ

अवधेश कुमार

राज्य विधानसभा के चुनावों में जिस तरह मतदाताओं ने भारी संख्या में घरों से निकलकर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों का बटन दबाने का रिकाॅर्ड कायम किया है उससे संसदीय लोकतंत्र में आस्था रखने वालों का उत्साह यकीनन बढ़ा होगा। छत्तीसगढ़ के दूसरे दौर में कुल 74.7 प्रतिशत मतदान हुआ। जिस बस्तर क्षेत्र के 19 विधानसभाओं में माओवादियों ने उंगली काटने से लेकर अन्य सजाओं की धमकी दी थी वहां भी आश्चर्यनक रुप से 75.53 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2008 में कुल 71.09 प्रतिशत मतदान हुआ था। मध्यप्रदेश में 71.24 प्रतिशत मतदान 2008 के 69.78 प्रतिशत से 1.46 प्रतिशत ज्यादा है। यहां भी नक्सल प्रभावित बालाघाट में तो 80 प्रतिशत मतदान की खबरें आईं। मिजोरम में भी 83 प्रतिशत से ज्यादा होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि वहां 2008 में भी 82.35 प्रतिशत मतदान हुआ था। राजस्थान में 75.2 प्रतिशत मतदान हुआ। 2008 में 66.39 प्रतिशत मतदान हुआ था। यनी 8.63 प्रतिशत अधिक। यह असामान्य वृद्धि है। जैसलमेर में रिकाॅर्ड 85.26 प्रतिशत तो हनुमानगढ़ में 84.93 प्रतिशत मतदान हुआ। 2008 की तुलना में राजस्थान के 33 जिलों में से 31 में मतदान वृद्धि हुई। दिल्ली में पिछली बार 57.8 प्रतिशत मदान हुआ था। जाहिर है अगर 69 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ है तो यह 11 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोत्तरी है। दिल्ली के राज्य बनने के बाद 1993 के पहले मतदान में 61.8 प्रतिशत मतदान हुआ था। तो इस बढ़ते मतदान प्रतिशत का क्या अर्थ लगाया जाए?

पिछले तीन सालों में रिकाॅर्ड मतदान भारत की प्रवृत्ति बन चुकी है। आप याद करिए पिछले वर्ष उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड एवं पंजाब में कड़ाके की ठंढ के बीच भारी संख्या में मतदाता मतदान करने बाहर आए थे। उत्तराखंड में 67 प्रतिशत मतदान 2007 के 59.45 प्रतिशत से करीब 8 प्रतिशत अधिक था। पंजाब में भी रिकाॅर्ड 76.63 प्रतिशत मतदान हुआ है। यह 2007 के रिकाॅर्ड 75.47 प्रतिशत से 1.16 प्रतिशत अधिक था। उत्तरप्रदेश के मतदाताओं ने भी आजादी के बाद सभी रिकाॅर्ड घ्वस्त करते हुए 59.50 प्रतिशत मतदान किया। यह अन्य राज्यों की तुलना में कम लगता है, लेकिन 2007 से करीब 14 प्रतिशत ज्यादा था। 14 प्रतिशत का अर्थ उत्तरपदेश के लिए औसत से करीब 2 करोड़ 40 लाख ज्यादा मतदाताओं द्वारा मत प्रयोग करना था। इसके पूर्व भी विधानसभा एवं स्थानीय चुनावों में मतदान बढ़ने की ही प्रवृत्ति थी। प. बंगाल में 84 प्रतिशत तमिलनाडु में 80 प्रतिशत तथा पुड्डुचेरी में 86 प्रतिशत मतदान का रिकाॅर्ड कायम हुआ। असम में भी 76 प्रतिशत एवं केरल में 75 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का रिकाॅर्ड कायम किया। तमिलनाडु के मतदान ने 1967 के 75.67 प्रतिशत के रिकाॅर्ड को ध्वस्त कर दिया तो केरल में 2006 के ही 72.38 प्रतिशत के। तमिलनाडु के करुर जिला में 86 प्रतिशत से ज्यादा तो केरल के कोझिकोड में 81.30 प्रतिशत तथा असम के धुबरी में 85.65 प्रतिशत मतदान हुआ। यही नहीं पिछले वर्ष जम्मू कश्मीर के स्थानीय चुनावों में भी अगल-अलग क्षेत्रों में 76 प्रतिशत से 82 प्रतिशत के बीच मतदान हुआ। इस पृष्ठभूमि में यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ से लेकर राजस्थान तक मतदाताओं ने मत डालने का जो रिकाॅर्ड बनाया है वह अब भारतीय चुनाव का स्थापित संस्कार बन रहा है। किंतु इसके कुछ तो अर्थ हैं।

हमने देखा है कि पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग से लेकर मीडिया, नागरिक संगठन आदि मतदाता जागरुकता अभियान चला रहे हैं। राजनीतिक दलों के नेता भी अपने भाषणों के अंत में घरों से निकलकर मतदान करने की अपील करने लगे हैं। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी तो पहले मतदान फिर जलपान का नारा लगवाते रहे। चुनाव आयोग का सुरक्षा संबंधी सख्त कदम भी लोगों के अंदर से भय का अंत करने में योगदान कर रहा है। मत डालने के संकल्प के बावजूद नक्सली क्षेत्रों में सुरक्षा का माहौल नहीं होता तो मतदान करने के लिए इतनी संख्या में आगे आने की संभावना कायम नहीं होती। यह भी ध्यान रखें की 2006 के बाद मतदाता बने युवाओं की संख्या 21 प्रतिशत से ज्यादा है। संपूर्ण भारत में 40 प्रतिशत से ज्यादा मतदाता 35 वर्ष की आयु सीमा के नीचे हैं। हमने मतदान केन्द्रोें पर युवाओं की संख्या देखी है। यही बात महिलाओं के साथ भी है। अब महिलाएं भी ज्यादा संख्या में निकलने लगीं हैं।  मतदान करने वालों में युवा वर्ग एवं महिलाओं की संख्या काफी देखी जाती है। इन सबके साथ कुछ नेताओं के प्रति विशेष आकर्षण भी लोगांे को बाहर आने को प्रेरित करता है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की उपस्थिति ने यकीनन मदतान को रोचक बनाया है और अन्ना अनशन अभियान की ओर आकर्षित लोगों के एक समूह ने भी कुछ क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बढ़ाने में भूमिका दी गी है। अगर संक्षेप में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि लोगों  के अंदर मतदान से सत्ता निर्माण का भाव तीव्र हो रहा है। पर क्या इतने मात्र से मतदान की बढ़ती प्रवृत्ति की व्याख्या पूरी हो जाती है?

अगर कोई शासन मतदान पर ही निर्मित या विघटित होता है तो फिर उसमें अधिकाधिक लोगों की भागीदारी अपरिहार्य है। हमारी संसदीय व्यवस्था की एक प्रमुख कमजोरी यही रही है कि चाहे केन्द्र हो या राज्य कुल मतों के बहुमत से बहुत कम पर सरकारें सत्तासीन हो जातीं हैं। लोकसभा चुनाव में औसत मतदान 58 प्रतिशत रहा है। इसमें 27-28 प्रतिशत मत पाने वाला दल यदि सरकार गठित कर सकता है तो वह करीब 15 प्रतिशत मत की सरकार हुई। राज्यों में उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लीजिए।  2008 के विधानसभा चुनाव में 3 करोड़ 62 लाख 66 हजार 969 मतदाता थे। इनमें से 2 करोड़ 51 लाख 27 हजार 120 ने वोटिंग की। यानी कुल 69.28 प्रतिशत मतदताओं ने मताधिकार का उपयोग किया। भाजपा ने इसमें से केवल 94 लाख 93 हजार 641 मत पाया। यानी केवल 37.64 प्रतिशत मत। अगर कुल मतदान के अनुसार देखें तो यह 26-27 प्रतिशत के आसपास है। तो सरकार बहुमत की कहां हुई। अगर अधिकाधिक संख्या में मतदाता बाहर आते हैं तो फिर वास्तविक बहुमत की सरकार कायम हो सकती है। मतदान है तो आंकड़ों का गणित, लेकिन इसके सामाजिक, राजनीतिक,सांस्कृतिक, आर्थिक सारे निहितार्थ होते हैं। कम मतदान से आम जनता चाहती क्या है यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकता। इसलिए भी ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं का मत प्रयोग जरुरी है। अगर आपकों राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों से कोई उम्मीद नहीं हैं तो आप कोई नहीं का भी बटन दबा सकते हैं। यह हमारे पास असंतोष प्रकट करने का एक नया विकल्प है। इसका असर चुनाव पर हो या न हो, पर इससे विश्लेषकों को यह अनुमान लगाने में सुविधा होगी कि हमारे राजनीतिक तंत्र से असंतुष्ट लोगों की संख्या कितनी है। यह बढ़ रही है या घट रही है।

इस प्रकार मतदान करने के विस्तारित होते संस्कार के कारक और उसके निहितार्थों के बारे में और भी बातें कहीं जा सकतीं हैं। पर इससे अभी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि लोगों की अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास पहले से ज्यादा सुदृढ़ हुआ है, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के प्रति उनकी वितृष्णा कम हुई है। सामान्यतः मतदान बढ़ने के साथ ही सरकार की विदाई तय हो जाती थी। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड , प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल एवं पुड्डुचेरी इसके उदाहरण हैं। लेकिन पंजाब, बिहार और असम जैसे अपवाद भी हैं। वस्तुतः कई जगह मतदान बढ़े, लेकिन शासन नहीं बदली। हां, किसी के काम से खुश होकर भारी संख्या में मतदान करने की प्रवृत्ति अभी सामने नहीं आई है। इस बार का परिणाम इसे थोड़ा और स्पष्ट कर सकता है। कई बार कुछ नेता लोगों को प्रेरित करने में सफल हो जाते हैं और उम्मीद से लोग मतदान करने निकलते हैं। आप देख लीजिए, दिल्ली को छोड़कर किसी राज्य में नेतृत्व, नीति के स्तर पर कोई नया विकल्प जनता को नहीं मिला है। लेकिन उन्हें वोट देना है तो वे किसी को तो देंगे ही। यह संभव है कि आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी में से किसी के प्रति उम्मीद की किरण भी इन्हें खींच ला रही हो। किंतु यह किसी दृष्टि से राजनीतिक तंत्र के प्रति असंतोष के कम होने का प्रमाण नहीं हो सकता। अगर आप विभिन्न सर्वेक्षणों पर नजर दौड़ाएं तो लोगों ने अपने विधायकों से वैसी उम्मीदें बताईं या उन कामों के न किए जाने पर निराशा जताई जो कि पंचायतों और नगर निकायों या प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों के जिम्मे है। यह सामूहिक अपरिपक्ता का परिचायक है। इसलिए भारत में अभी सही समझ वाले जनमत निर्माण का कार्य ही अधूरा है। ऐसा जनमत निर्माण हो, फिर चुनाव इतने व्यापक सुरक्षा तामझाम और खर्चों से परे आयोजित हों, उनमें मतदाता भारी संख्या में निकलें तो उसे परिपक्व जनमत से उभरे स्वस्थ लोकतांत्रिक या राजनीतिक व्यवस्था का प्रमाण माना जा सकता है। अगर चुनाव आयोग के नेतृत्व में कठोर सुरक्षा व्यवस्था के तहत हम मतदान के लिए बाहर आते हैं तो यह किसी दृष्टि से स्वस्थ स्थिति नहीं हो सकती। वैसे भी हमें लोकसभा चुनाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए।  

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः22483408, 09811027208

 


सोमवार, 2 दिसंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के पदाधिकारी व सदस्य घर-घर जाकर कर रहे हैं मतदाताओं को जागरुक

संवाददाता
नई दिल्ली। चुनावी मैदान में कूदे उम्मीदवार मतदाताओं को अपने हक में मतदान करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। कोई उन्हें विकास कराने की बात कह रहा तो कोईं मूलभूत समस्याओं से निजात दिलाने की बात कह रहा है।
वहीं मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने पूरी तरह से मेहनत की है। उसने भी अपनी तरफ से वह सारी तैयारी कर रखी हैं जो मतदान के दिन मतदाताओं को मतदान केंद्र पर जाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। मतदाताओं को किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो उसके लिए भी चुनाव आयोग ने अपनी ओर से मतदाताओं को मतदाता पर्ची घर-घर भेज दी है।
इसी अभियान में नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के पदाधिकारी व सदस्य लोगों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं वह घर-घर जाकर लोगों को बता रहे हैं कि मतदान नहीं करने से क्या नुकसान है और मतदान करने से उनका व उनके क्षेत्र आदि को क्या फायदा होगा। संस्था के अध्यक्ष साबिर हुसैन ने बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क (गांधीनगर विधानसभा-61) में अपने पदाधिकारी व सदस्यों के साथ लोगों को जागरुक किया। साबिर हुसैन लोगों को मतदान के दिन ज्यादा से ज्यादा मतदान करने के लिए कहा व लोगों को मतदान के फायदे नुकसान से अवगत कराया।
श्री साबिर ने बताया कि जो लोग मतदान नहीं करते वह लोग अपने आपको होशियार समझते हैं वह होशियार नहीं बेववूफ हैं क्योंकि उनकी भागीदारी नहीं होने से ही सही लोग चुनकर नहीं आ पाते। श्री हुसैन ने लोगों से अपील की कि वह मतदान करने जरूर जाएं। सही लोगों का चुनाव करें व अपने क्षेत्र के विकास में भागीदार बनें।
इस अवसर पर डॉ. आर अंसारी, अंजार, मो. रियाज़, मो. यामीन, मो. सज्जाद, मो. मुन्ना अंसारी, गुलजार अख्तर, मो. सेहराज, नईम, विनोद, संजय, अब्दुल रज्जाक, आजाद, शकीला, शान बाबू, रजी अहमद आदि पदाधिकारी, सदस्य व आम जनता शामिल थी।

 

 

रविवार, 1 दिसंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने एड्स व मतदाता जागरुकता कैम्प का आयोजन किया

संवाददाता

नई दिल्ली। पूर्वी दिल्ली के गांधी नगर विधानसभा में स्थित शास्त्री पार्क में नई पीढ़ी-नई सोच(पंजी) संस्था ने एड्स व मतदाता जागरुकता अभियान कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कैम्प कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लीनिक में लगाया गया। कैम्प में एड्स से बचाव, मतदान करने व सही उम्मीदवार चुनने के लिए प्रेरित किया गया जिसमें सभी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन द्वारा की गई उन्होंने कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी संस्था का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को जागरुक कर मतदान प्रतिशत बढ़ाना है जिससे मतदान के दिन मतदाता घर पर छुट्टी का आनंद लेने के बजाय अपने अधिकारों का प्रयोग कर सही उम्मीदवार चुन सके नहीं तो 5 वर्ष तक हमें अपनी भूल का एहसास होता रहेगा कि हमने मतदान क्यों नहीं किया, क्योंकि सही उम्मीदवार चुनने में भाग नहीं लिया और यही मतदान प्रतिशत कम होने का कारण भी है जबकि दिल्ली में यह 100 प्रतिशत होना चाहिए।

डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि यदि हम जागरुक हैं तो एड्स की संभावना कम होती है व सही मतदान से हम सही उम्मीदवार को चुन सकते हैं नहीं तो हम 5 साल तक अपनी भूल का एहसास करते रहते है कि सही समय पर अगर हमने सुरक्षा अपनाई होती तो यह दिन देखने को नहीं मिलता। यह बात दोनों पर लागू होती है
1. एड्स-मौजूदा समय में एड्स तेजी से फैल रहा है। इसके सबसे ज्यादा युवा शिकार हो रहे हैं। युवा अपने दोस्तों की गलत संगत को ग्रहण करते हैं और जब वह ज्यादा बीमार हो जाते हैं तो फिर डाक्टरों व अस्पताल के चक्कर लगाते हैं। जब उनकी जांच आदि होती है तो पता चलता है कि वह एड्स (एचआईवी पॉजिटिव) से ग्रस्त हैं। लोग अभी भी एड्स की जांच कराने से घबराते हैं। वह सोचते हैं कि यदि मुझे एड्स हुआ तो मुझे समाज किस नजर से देखेगा।
2. मतदान-यदि हम वोट डालने नहीं जाते हैं तो गलत व्यक्ति चुनकर आ जाता है। जब गलत व्यक्ति चुनकर आ जाता है तो हम कहते हैं कि यह व्यक्ति गलत है। हमें उसे गलत कहना का अधिकार नहीं क्योंकि अगर हमने अपने मत का प्रयोग किया होता तो सही गलत व्यक्ति चुनकर आ सकता था।
डॉ. अंसारी ने कहा कि युवा आगे आकर एड्स व सही मतदान की जानकारी हासिल करें व इससे होने वाले नुकसान से अपने आपको बचाएं व दूसरों को भी बचाने की कोशिश करें।
संस्था के उपाध्यक्ष श्री मो. रियाज ने कविता के माध्यम से कहा कि एक रास्ता खराब है तो दूसरा रास्ता अपना लेंगे, बाहर सुरक्षा का डर लगे तो छुट्टी घर पर बिता लेंगे, घर पर पानी नहीं आया तो पड़ोसी का दरवाजा खटखटा लेंगे, रात में बिजली चली गई तो कैंडिल लाइट डिनर का बहाना बना लेंगे, महंगाईं की मार पड़ी तो एक सब्जी से गुजारा कर लेंगे, सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़े तो रिश्वत देकर काम निकाल लेंगे, बड़े अजीब है ना हम हर मुसीबत उठाएंगे फिर भी वोट करने नहीं जाएंगे। लेकिन एक दिन की मुसीबत से बचने के लिए 5 साल की मुसीबत मत पालो, अपनी बात मनवानी है तो वोट जरूर डालो। सुनाकर सभी से मतदान करने की शपथ दिलवाई कि मैं, 04 दिसम्बर 2013 दिन बुधवार को मतदान करने जरुर जाउंगा व अपने साथ औरों को भी मतदान केंद्र लेकर जाउंगा तथा सभी को कार्यक्रम में भाग लेने व समय देने के लिए धन्यवाद दिया तथा कार्यक्रम में सहयोग देने वाले श्री अब्दुल खालिक, श्री जुबैर आजम, हनीफ प्रधान, मो. इलियास, मौलाना हुसैन साहब, हाजी जाबिर हुसैन, मो. शुएब, मो. उमर व संस्था के पदाधिकारी-सदस्यों व अन्य जनों का रहा है।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

आम आदमी पार्टी कैसी राजनीतिक संस्कृति बना रही है

अवधेश कुमार

राजनीति में कौन भ्रष्ट है कौन सदाचारी इसका प्रमाण पत्र देना इतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं। किंतु आम आदमी पार्टी के नेता अपनी स्थापना के पहले से आरोपों का पुलिंदा लेकर जिस तरह से दहाड़ें मारते थे उनसे उनकी छवि आम जन मानस में अन्यों से अलग ईमानदार, नैतिक, जन सरोकारों को समर्पित ...व्यक्तित्वों की स्थापित हो रही थी। जो लोग किसी दल से जुड़े नहीं या उसके कट्टर समर्थक नहीं, उनको यह उम्मीद बंधी कि इनका राजनीति में आना अलग राजनीतिक संस्कृतिक की संभावना पैदा करेगा। जन लोकपाल के नाम पर अन्ना हजारे के सारे प्रचारित अनशन अभियानों के पीछे और आगे के चेहरे ये ही थे और बाद में तो खुद इनने ही अनशन किया। अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया ने स्वयं दिल्ली के बढ़े हुए बिजली बिल तथा अन्य अनियमितताओं के खिलाफ दो सप्ताह का अनशन किया। यह राजनीति में लंबे समय बाद दिखा। जनता की मांगों को लेकर इस ढंग से संघर्ष में अपने को झोंकने की खत्म होती दलीय राजनीतिक संस्कृति में यह किसी के लिए भी नई सुबह की उम्मीदांे वालीं थीं। गांधी जी के नमक सत्याग्रह के दिन से अपने संघर्ष की घोषणा करके इनने यह संदेश भी दिया कि वे केवल चुनावी युद्ध के लिए नहीं, राजनीति को बदलने के लिए आए हैं। क्या आज हम यह कह सकते हैं कि आम आदमी पार्टी या आप वाकई राजनीति में बेहतर बदलाव या नई राजनीतिक संस्कृति की वाहक बनी हुई है?

अभी आप के 9 नेताओं के खिलाफ एक स्टिंग ऑपरेशन सामने आया। उसमें कुछ बातें बिल्कुल साफ दिख रहीं थीं। हालांकि आज समाज और राजनीति में जो जीवन शैली है, उसमें अनेक ऐसे विचलन जो पहले अस्वीकार्य थे, स्वीकार्य हो गए हैं। यह समाज का ऐसा दौर है जिसमें किसी की गलत कमाई या राजनीति में गलत तरीके से धन पाने या चुनाव में अघोषित तरीके से खर्च करने की बात उठाने पर कह दिया जाता कि इसके बगैर कोई उपाय नहीं है और सब ऐसा करते हैं। यह स्थिति का सरलीकरण है, जो पूरा सच नहीं है। पर मान लीजिए सच हो भी तो आप के लोग तो बाकी सारे दलों को भ्रष्ट, चोर साबित करते हुए नई नैतिक, ईमानदार, शतप्रतिशत पारदर्शी आचरण का डंका पीटते आए थे। अगर उनके नेताओं को चुनाव खर्च के लिए या पेशे में अपारदर्शी धन लेने के लिए तैयार होते दिखाया गया या वैसा संदेह भी हुआ तो उसका आचरण क्या होना चाहिए था? इन्होंने उनको केवल पाक साफ करार नहीं दिया, स्टिंग करने वाली कंपनी तथा उसे चलाने वाले चैनलों पर मुकदमा करने की धमकी दे दी। अब सबको उनके खिलाफ षडयंत्र में शामिल होने तथा मानहानि करने के मुकदमे का सामना करना पड़ेगा। प्रशांत भूषण वकील हैं और वे मामलों को हमेशा कानूनी नजरिए से देखते हुए न्यायालय को अपनी लड़ाई का साधन बनाए हुए हैं। उनके लिए ऐसा मुकदमा सामान्य बात है। वैसे स्टिंग का टेप चुनाव आयोग के पास भी चला गया है और उसका फैसला भी आएगा।  

लेकिन जरा याद करिए- यही आप के नेता जब भाजपा अध्यक्ष नितीन गडकरी के खिलाफ आरोपों का पुलिंदा लेकर आए थे और इनकी पत्रकार वार्ता को चैनलों ने लाइव किया। गडकरी को इस कारण दोबारा अध्यक्ष पद प्राप्त नहीं हुआ जो कि निर्धारित था। किंतु भाजपा ने किसी पर मानहानि की धमकी न दी। भाजपा के पास भी एक से एक नामी वकील हैं। उनने किसी चैनल को धमकाया नहीं। कांग्रेस ने भी राॅबर्ट बाड्रा के खिलाफ लगाए गए आरोपों का खंडन किया, इनकी आलोचना की, लेकिन कभी चैनलों एवं समाचार पत्रों को मुकदमे की धमकी न दी, ऐसा ही सलमान खुर्शीद के मामले में हुआ। रिलायंस के मुकेश अंबानी के खिलाफ इनने मामला लाया, उनके तो चैनलों में शेयर भी हैं, फिर भी सबने इसे चलाया, लेकिन धमकी किसी को नहीं आई। ये कहते हैं कि वे तो मोटी चमड़ी वाले हैं, भ्रष्ट हैं इसलिए ऐसा नहीं करते, हम उनसे अलग संवेदनशील हैं, इसलिए हमें ऐसा करना पड़ रहा है। किंतु यह बात गले नहीं उतरती। गडकरी के खिलाफ जांच में कुछ नहीं आया। वे चाहें तो मुकदमा कर सकते थे,उनने नहीं किया। 

जंतर-मंतर पर अयोजित कार्यक्रम में जिस तरह आम आदमी पार्टी के नेताओं ने विरोधियों के लिए कुत्ते कमीने से लेकर पुरस्कारों को जूते की नोंक पर रखने जैसी भाषा का प्रयोग किया उसके बाद कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। वस्तुतः आज हम चाहें या न चाहें यह स्वीकार करना होगा कि आप ने अपने विरोध या आलोचना के प्रति अस्वीकार्य असहिष्णुता प्रदर्शित किया है। यह दुःखद है। अगर आप राजनीति ही नहीं सार्वजनिक जीवन में हैं तो आपको आलोचना, निंदा, आरोप या स्टिंग झेलने की आदत डालनी होगी। आप के एक नेता इसे पत्रकारिता के न्यूनतम मापदंडों के विपरीत बताने लगे। उनने किसी मीडिया हाउस से नहीं पूछा कि मूल 18 घंटे की टेप देखी गई या नहीं। ऐसे भी चैनल हैं जिनने मूल टेप देखा है और उनका दावा है कि गलत कुछ भी नहीं दिखाया गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दूसरों पर आरोप लगाते हुए राजनीति में उतरने वाले अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी इस तरह व्यवहार कर रहे हैं। आप यदि यह कहें कि हमें अपने साथियों पर विश्वास है तो यह आपका अधिकार है और उसकी आलोचना केवल नैतिकता और सदाचार की स्वयं इनकी कसौटी पर आलोचना होगी और हो भी रही है। लेकिन यह व्यवहार ऐसा है मानो हमें यह धमकी दी जा रही है कि आगे आपने ऐसे स्टिंग या आरोप दिखाएं तो आप मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहिए। आज कम से कम इस मायने में कांग्रेस और भाजपा को तो इससे बेहतर आचरण वाला कहा जा सकता है। आपको यदि आम आदमी पार्टी के सदस्यों की परीक्षा लेनी है तो जरा उनकी आलोचना कर दीजिए। आप पर तीखे हमले आरंभ हो जाएंगे, आप पर बिना सिर पैर के आरोप लगेंगे, आपके खानदान तक ये पहुंच जाएंगे, आपको किसी पार्टी का दलाल या खरीदा गया व्यक्ति, अखबार, चैनल या संस्था का आदमी घोषित कर दिया जाएगा। उनके विरोध में यदि आप कोई पत्रकार वार्ता करते हैं और आप बड़े दलों के नेता नहीं हैं, तो उनके समर्थक वहां पहुंचकर हंगामा करेंगे। यह उनका आम व्यवहार हो गया है।
अब जरा दूसरे कुछ आचरणों पर नजर दौड़ा लीजिए। आप की ओर से एक पर्चा जारी किया गया है जिसमें मुसलमानों से विशेष तौर पर आप को वोट देने की अपील है। यह वैसे ही है जैसे अन्य गैर भाजपाई दल करते हैं। इसमें बाटला हाउस मुठभेड़ पर संदेह प्रकट किया गया है। गुजरात के इशरत जहां मुठभेड़ का भी जिक्र करते हुए मोदी एवं भाजपा पर हमला है। इस पर उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस मिल चुका है। अगर आम आदमी पार्टी भी मजहब और समुदाय के नाम पर वोट मांगती है तो फिर आपमें और अन्य दलों की संस्कृति में अंतर क्या है? इसके पूर्व अरविंद केजरीवाल ने बरेली में दंगा भड़काने के आरोपी मौलाना तौकीर रजा से मुलाकात कर दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार में मदद और समर्थन मांगा था। तौकीर रजा की अपनी एक राजनीतिक पार्टी इत्तेहाद मिल्लत कौंसिल (आईएमसी) है, जिसने 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक स्थान पर विजय पाई थी। मार्च 2010 में बरेली में हुए दंगों को भड़काने के आरोप में तौकीर रजा खान की गिरफ्तारी हुई थी। तौकीर के रिहा होने के तुरत बाद दंगे फिर भड़के थे। तस्लीमा और जॉर्ज बुश के खिलाफ फतवा जारी करने वालों में भी तौकीर रजा का नाम शामिल था। इसकी तीखी आलोचना हुई।
मुसलमान हों या हिन्दू किसी से मत मांगने या उनके धार्मिक नेताओं से मिलने और मदद लेने में समस्या नहीं है। किंतु यदि आधार उस मजहब या समुदाय का मत पाना तो यह आपत्तिजनक है और यह कांग्रेस, सपा, राजद, जद यू आदि के समान चरित्र है। इसमें एक और बात है। आम आदमी पार्टी को आम आदमी के माध्यम से राजनीति को बदलना था और खास को भी आम बनाना था। यह तो खास के माध्यम से आम तक पहुंचने की अन्य राजनीतिक दलों की विकृत व्यवहार के समतुल्य है। इससे साफ हो जाता है कि आप के नेताओं ने भले नई राजनीतिक संस्कृति एवं आम जनता वाले दल व सत्ता का लक्ष्य घोषित किया, उनकी सोच और व्यवहार उन्हें भी आम दलों की कतार में शामिल कर रहा है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्ली-110092, दूरभाष-1122483408, 09811027208  


सोमवार, 25 नवंबर 2013

संस्था किसी भी पार्टी का प्रचार नहीं करेगी: साबिर

साबिर हुसैन, अध्यक्ष
संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के केंद्रीय कार्यालय में एक बैठक का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने की। इस बैठक में सभी पदाधिकारी व सदस्य शामिल हुए। चुनाव के मद्देनजर इस बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में सभी ने अपनी-अपनी बात रखते हुए चुनाव में लोगों से ज्यादा से ज्यादा वोट डालने के लिए प्रोरित करने को कहा क्योंकि पिछले चुनाव में लोगों की भागीदारी तो बढ़ी थी परंतु यह बहुत कम थी।

 पिछले चुनावों को देखते हुए इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि हम लोग उनको उनके वोट की कीमत से  अवगत कराएंगे व ज्यादा से ज्यादा वोट डलवाने के लिए घर-घर जाकर प्रचार करेंगे।

इस बैठक में अब्दुल खालिक (सरपरस्त) ने कहा कि लोग कहते हैं कि हम वोट क्यों करें क्योंकि हमें सभी काम तो  रिश्वत देकर हीे कराना हैं। इसलिए हम सभी मिलकर उन्हें उनके वोट की कीमत क्या है और वोट न देने के क्या नुकसान हैं उससे अवगत करवाएंगे।

 संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज़ ने कहा कि जब हम मतदाताओं के घर जाएंगे तो चुनाव आयोग द्वारा पहली बार मतदाताओं को दिए के अधिकार कोई पसंद नहीं अर्थात नोटा के बारे में भी बताएंगे। हो सकता है कि इस कारण लोग मतदान करने जाएंगे।

 संस्था के अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने बैठक के आखिर में अपनी बात रखते हुए कहा कि हम किसी पार्टी विशेष का प्रचार नहीं करेंगे बल्कि लोगों को उनके वोटों की कीमत से उन्हें अवगत कराएंगे। जो लोग अभी तक मतदान करने नहीं जाते थे उन्हें उनके मतदान न करने के नुकसान से अवगत कराएंगे व उन्हें सही प्रात्याशी को चुनने के लिए कहेंगे। चुनाव आयोग द्वारा पहली बार मतदाताओं को दिए के अधिकार कोई पसंद नहीं अर्थात नोटा के प्रयोग के बारे में भी बताएंगे।

 साबिर हुसैन ने आगे बताया कि हमारा प्रचार पूरी दिल्ली में होगा (जहां पर भी संस्था के सदस्य मौजूद हैं)। सदस्य अपने क्षेत्र में मतदाताओं को मतदान करने के लिए प्रोरित करेंगे। हर सदस्य रोजाना अपने कीमती समय में से एक घंटा मतदाताओं को मतदान के फायदे- नुकसान से अवगत कराएंगे। उन्होंने कहा कि यदि कोई सदस्य या पदाधिकारी किसी पार्टी विशेष का प्रचार करता है तो संस्था के नाम का प्रयोग नहीं करेगा। यदि कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्यंवाही की जाएगी। इस बैठक में अब्दुल खालिक (सरपरस्त), मो. रियाज, अब्दुल रज्जाक, डॉ. आर. अंसारी, इलमातुल्ला, अब्दुल कादीर, अंजार, नईम, विनोद, आजाद, अब्दुल रज्जाक, इरफान आलम, मो. सुल्तान, यामीन, मो. मुन्ना अंसारी, मो. सेहराज आदि पदाधिकारी व अन्य सदस्य मौजूद थे।


शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

अन्ना बनाम अरविन्द परिदृश्य अनुचित

अवधेश कुमार
आम आदमी पार्टी के खिलाफ हुए स्टिंग ऑपरेशन पर अभी कोई टिप्पणी जल्दबाजी होगी, लेकिन जिस तरह चंदे का मामला अन्ना हजारे द्वारा उठाया गया वह काफी महत्वपूर्ण है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पूरा परिदृश्य अरविंद केजरीवाल बनाम अन्ना हजारे का बना हुआ है और विरोधी इसे हवा दे रहे हैं। यह पहली बार नहीं है कि जब आप पार्टी के संयोजक के नाते अरविन्द और उनके साथियों के खिलाफ नारेबाजी या अन्ना को आधार बनाकर उन्हें लांछित करने की कोशिश हुई है। एक युवक ने पत्रकार वार्ता में अरविन्द पर काली स्याही भी फेंकी। पता नहीं उस युवक का उद्देश्य क्या था, लेकिन ऐसी अशोाभनीय घटनाएं केवल और केवल निंदा किए जाने के ही लायक हैं। अन्ना कह रहे हैं कि वे उस युवक को नहीं जानते और युवक अन्ना का नाम ले रहा है। इसे भी स्वीकार करने में समस्या नहीं है कि अन्ना ऐसा नहीं करवा सकते। हालांकि अरविन्द के इस आरोप से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता कि स्वयं को भाजपा का कार्यकर्ता बताने वाले उस युवक को भाजपा के नेताओं ने ऐसा करने के लिए भेजा होगा, पर इसके पीछे कुछ न कुछ तो था। आखिर कुछ ही दिनों पहले अन्ना हजारे ने अरविन्द केजरीवाल को कुछ प्रश्न उठाते हुए पत्र लिखा, जिसका जवाब देने के लिए पत्रकार वार्ता आयोजित की गई थी। महाराष्ट्र के अहमदनगर के उस युवक को सब कुछ पता था तो जाहिर है, वह निकट से सारी गतिविधियों पर नजर रख रहा था।
साफ है कि अगर अन्ना हजारे का पत्र न आया होता तो यह घटना न घटती और न ऐन चुनाव के बीच इस तरह अन्ना बनाम केजरीवाल का परिदृश्य बनता। किसी को भले यह सामान्य घटना लग रही हो, पर यह अत्यंत ही गंभीर प्रसंग है। हम आप पार्टी के विचारों से सहमत हों या असहमत, लेकिन कुछ महीने पहले गठित एक पार्टी, जो एक अभियान के क्रम से उत्पन्न हुई, जोे राजनीति में नए मापदंड स्थापित करने का वायदा करते हुए पहली बार चुनाव में उतरी है, उसके सामने इस तरह का पत्र आने का क्या अर्थ हो सकता है? अन्ना हजारे के निजी चरित्र पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, पर इसी समय आंदोलन के चंदे की बात उठाना, हिंसाब मांगना, अपने नाम के इस्तेमाल करने का आरोप लगाना... आदि बातें उनके दिमाग में कैसे आई होगी?  रालेगण सिद्धि में अन्ना ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए जो कुछ कहा उस पर ध्यान दीजिए- ‘ मुझे दो बातों पर ऐतराज है। सिम कार्ड से मेरा कोई ताल्लुक नहीं फिर भी मुझे आरोपी बनाया गया। दूसरी बात, अरविंद 29 दिसंबर को लोकपाल लाने की बात करते हैं वे लोकपाल को दिल्ली में कैसे लागू कर सकते हैं। ...मुझे संदेह है कि मेरे नाम का दुरुपयोग हो रहा है। मेरे नाम का इस्तेमाल करना ठीक नहीं। ....मैंने अरविंद पर भरोसा किया। अरविंद ने अपना दफ्तर चलाने के लिए 20 लोगों को रखा था। इन्हें 30-35 हजार रुपये महीना दिया जाता था। यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है। हालांकि मैंने उनसे इस बारे में कुछ नहीं कहा। लेकिन जनता के पैसे से ज्यादा खर्च करना ठीक नहीं है।’
अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी कह रहे हैं कि जो सिम बनवाया गया था, वह अन्ना के अलग होते ही रोक दिया गया। उनका यह भी कहना है कि आंदोलन के लिए जो चंदा आया था वह पहले ही खर्च हो गया। उसमें से कुछ बचा ही नहीं है और अन्ना कभी भी हिंसाब ले सकते हैं। तो फिर समस्या क्या है कि इस तरह पत्र लिखे जा रहे हैं और उनको सार्वजनिक भी किया जा रहा है? अन्ना कह रहे हैं कि अरविंद अगर मुझसे बात करना चाहते हैं तो मैं तैयार हूं। अरविंद से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। मुझे अरविंद के चरित्र पर भी कोई संदेह नहीं है। केजरीवाल कह रहे हैं कि अन्ना के करीबी उन्हें उनसे नहीं मिलते देते। इससे इतना तो पता चलता है कि दोनों एक दूसरे पर संदेह नहीं कर रहे, लेकिन इनके बीच संवाद नहीं है और ऐसे में दूरियां बढ़ना स्वाभाविक है। अन्ना कह रहे हैं कि उनके नाम का इस्तेमाल न हो। उस अभियान को अन्ना आंदोलन का नाम मिला और ये सारे उसके स्तंभ थे। व्यक्ति के रुप में अन्ना हजारे का नाम लेना एक बात है और अन्ना आंदोलन कहना अलग। अन्ना को भी यह समझना चाहिए। हालांकि अन्ना का नाम लेने से आप को बहुत ज्यादा जन समर्थन मिल जाएगा ऐसा है नहीं, पर उनके निकट पहुंचे लोग उनके मन में यह गलतफहमी पैदा करते रहते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में इससे कांग्रेस और भाजपा को मुंहमांगा मुद्दा मिल गया है। इसका असर चुनाव पर पड़ना निश्चित है। आम आदमी पार्टी की चुनाव में जमीनी हकीकत उतनी अच्छी नहीं है जितनी कुछ सर्वेक्षणों में दिखाईं गईं, पर जो भी है उस पर ऐसे विवादों का असर तो पड़ना ही है। विरोधियों के लिए यह सवाल उठाना लाजिमी है कि अन्ना को लेकर आगे बढ़ने वाले लोगों ने अगर उन्हें ही धोखा दिया तो वे हमको आपको कैसे धोखा नहीं देंगे।
वास्तव में यह सामान्य त्रासदी का विषय नहीं है कि जिस अन्ना अनशन अभियान को हाल के दिनों में सबसे ज्यादा प्रचार मिला, जिससे  जनता के एक वर्ग में ही सही यह उम्मीद पैदा हुई कि अब कुछ बेहतर बदलाव हो सकता है, भ्रष्टाचार से निजात का रास्ता इससे निकलने की अपेक्षाएं भी उत्पन्न हुंई, आज उसे टीम के दोनों हीरो ही एक दूसरे के आमने-सामने दिख रहे हैं। हम यदि तटस्थ होकर विचार करेंगे तो यह भले दुखद हो, पर अस्वाभाविक स्थिति नहीं है। वस्तुतः अन्ना के अनशन अभियान को लेकर स्वयं अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया... आदि हमेशा गलतफहमी में रहे। मीडिया के अभूतपूर्व समर्थन से जो माहौल बना उन सबने इसे अपना स्थायी और व्यापक जन समर्थन मान लिया। यह सच नहीं था। उसमें गैर कांग्रेसी दलांे व संगठनों की व्यापक भागीदारी थी। सच यह भी है कि अन्ना हजारे तब तक एक क्षेत्र विशेष के सामाजिक कार्यकर्ता और संघर्षशील व्यक्तित्व के रुप मंे सीमित थे। अरविन्द एवं उनके साथियों के प्रबंध कौशल ने ही उन्हें राष्ट्रीय व्यक्तित्व में परिणत किया। यह भारत देश है। यहां ऐसे साथ को तोड़ने की कोशिशें होतीं रहतीं हैं। पहले स्वामी रामदेव से अरविन्द, उनके साथी एवं अन्ना हजारे को अलग करने की कोशिशें सफल हुईं और उसके बाद फिर इनको....।
हालांकि जिन लोगों ने अन्ना अभियान से लेकर आप के गठन तक के घटनाक्रम पर ध्यान रखा है वे बता सकते हैं कि जब 29 जुलाई,2012 को अरविन्द एवं मनीष को अनशन तोड़ने के लिए मनाया गया और उसमें राजनीतिक दल बनाने पर सहमति बनी तो अन्ना ने जंतर मंतर पर भाषण देते हुए कहा कि वे भी इससे सहमत हैं। यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने राजनीतिक दल बनाने से असहमति प्रकट कर दी। क्यों? इसका कारण अन्ना ने आज तक स्पष्ट नहीं किया है। दोनों ओर गलतफहमियां तो थी हीं। अन्ना हजारे मानने लगे थे कि उनका व्यक्तित्व जयप्रकाश नारायण और गांधी जी की तरह विराट हो चुका है तो अरविन्द और उनके साथी यह सोचते थे कि सब कुछ तो किया हमने और उनका चेहरा आगे रखा। यानी यदि हम न करते तो अन्ना को कौन राष्ट्रीय क्षितीज पर लाता। यह भी सच है कि अरविन्द एवं मनीष दोनों ने स्वयं दो बार लंबा अनशन करके दिखाया कि ऐसा केवल अन्ना नहीं कर सकते, उनमंे भी इसकी क्षमता और अंतर्संकल्प है। सच कहें तो ऐसा करके उनने अन्ना से अलग अपना वजूद स्थापित करने की कोशिश की। दोनों प्रकार की सोच गलत थी। लेकिन तब तक ऐसे लोग इनके बीच में आ चुके थे जो पहले नहीं थे। आज दोनों को समझना चाहिए कि उनके इरादे में दोष नहीं था, वे देश की भलाई चाहते थे और हैं, पर जितना समर्थन उनको था वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध था, न उसमें जन लोकपाल का समर्थन था और न इनके व्यक्तित्व को। अन्ना भी जहां जा रहे हैंं वहां पहले की तरह भीड़ नहीं जुटती और आम आदमी पार्टी को भी एक-एक व्यक्ति को जोड़ने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। साफ है कि अगर अरविन्द एवं उनके साथी तुरत पार्टी गठन के सुझाव को स्वीकार करने की जगह पहले अभियान को देशव्यापी करते हुए संगठन बनाते और दलीय राजनीति में बाद में आते तो उनकी स्थिति बेहतर होती।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने लगाया बचत खाता कैंप

संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच (पं.) संस्था हमेशा से जनता की भलाई के लिए समर्पित रहती है। इसी कड़ी में आज एक कार्य और किया गया। इस बार संस्था की ओर से बचत खाता कैंप लगाया गया। यह कैंप संस्था के केंद्रीय कार्यालय के निकट आयोजित किया गया। इस कैंप में लगभग 100 लोगों के खाते खोले गए। यह कैंप सीलमपुर पोस्ट आफिस के साथ मिलकर लगाया गया था। इस कैंप में सीलमपुर पोस्ट आॅफिस के पोस्टमास्टर श्री राजपाल जी अपने साथ अपनी टीम लाए थे।
कैंप 11 बजे के करीब शुरू हुआ जिस कारण ज्यादा लोगों के खाते नहीं खुल पाए। इस पर पोस्टमास्टर श्री राजपाल जी व आए अन्य अधिकारियों ने रविवार को दोबारा कैंप लगाने की बात कही। उन्होंने कहा कि हमें नहीं मालूम था कि यहां इतने खाते खुल जाएंगे।
संस्था के सरपरस्त अब्दुल खालिक ने कहा कि जब से यह संस्था बनी है तब से लोगों की सेवा में लगी हुई है। इसके सभी सदस्य युवा हैं और अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण रूप से निभाते हैं और इनकी कोशिश रहती है कि इनके पास आया हुआ व्यक्ति निराश होकर न जाए।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था लगातार अपनी तरफ से कोशिश करती रहती है कि लोगों की जितनी मदद की जा सकती है करें क्योंकि एक समय था जब हम दूसरों लोगों के पास जाते थे तो वह लोग कहते थे कि अभी समय नहीं कल आना आदि परन्तु संस्था के सदस्य अपने कीमती समय में से लोगों की सेवा के लिए समय निकालकर लोगों की परेशानी दूर करने की पूर्ण कोशिश करते हैं।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज ने कहा कि लोगों को खाता खुलवाने में कभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि दिल्ली में लोग बचत करते तो हैं परंतु उनके पास बचत खाता नहीं होता जिससे वह अपनी बचत को लंबे समय तक घर में बचाकर नहीं रख पाते हैं। इसलिए सीलमपुर पोस्ट आॅफिस के पोस्टमास्टर श्री राजपाल जी से यहां पर बचत खाता कैंप लगाने के लिए बात की गई तो उन्होने हां कर दी। भरी। हम श्री राजपाल जी के आभारी हैं।
यहां खाता 50 रुपये में खुला जिससे लोगों को यह खाता खुलवाने में कोई परेशानी नहीं आई। बैंक बगैरा के कई नियम होते हैं परन्तु पोस्ट आॅफिस के में सिर्फ दो प्रूफ पर ही खाता खुल गया।
इस मौके पर अब्दुल खालिक, जुबैर आज़म, साबिर हुसैन, डॉ. आर. अंसारी, मो. रियाज, शमीम हैदर, अब्दुल रज्जाक, यामीन, सदरे आलम, आजाद, सज्जाद, मो. सेहराज, मो. नाजिम, इरशाद अहमद, रईस अहमद, मो. मुन्ना अंसारी, आमीर अहमद, कुरबान, अनीस, इलमत, फुरकान, गुलजार अख्तर आदि शामिल थे जिन्होंने फार्म आदि भरे व लोगों की परेशानी कम करने की कोशिश की।

सोमवार, 18 नवंबर 2013

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था द्वारा बचत खाता कैंप का आयोजन 21 को

 संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नईं सोच (पं.) संस्था हमेशा से जनता की भलाई के लिए समर्पित रहती है। इसी कड़ी में एक कार्य और किया जाएगा। इस बार संस्था की ओर से डाक घर द्वारा बचत खाता कैंप का आयोजन 21 नवंबर 2013 को सुबह 10 बजे से किया जाएगा। यह कैंप संस्था के केंद्रीय कार्यालय के निकट आयोजित किया जाएगा।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था लगातार अपनी तरफ से कोशिश करती रहती है कि लोगों की जितनी मदद की जा सकती है करें क्योंकि एक समय था जब हम दूसरों लोगों के पास जाते थे तो वह लोग कहते थे कि अभी समय नहीं कल आना आदि परन्तु संस्था के सदस्य अपने कीमती समय में से लोगों की सेवा के लिए समय निकालकर लोगों की परेशानी दूर करने की पूर्ण कोशिश करते हैं।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज ने कहा कि लोगों को खाता खुलवाने में कभी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि दिल्ली में लोग बचत करते तो हैं परंतु उनके पास बचत खाता नहीं होता जिससे वह अपनी बचत को लंबे समय तक रख सकें। इसलिए संस्था की एक बैठक हुई जिसमें सभी ने यह निर्णय लिया कि हम डाक घर में जाकर बात करें कि वह हमारे यहां बचत खाता कैंप आयोजित करें क्योंकि डाकघर में सिर्फ 50 रुपये में खाता खुल जाता है। 50 रुपये में कोई भी खाता खुलवा सकते हैं।

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

न्यू जाफराबाद में बीएसपी का भाईचारा सम्मेलन का आयोजन

संवाददाता शाहरूख खान
उत्तरी पूर्वी दिल्ली। विधनसभा बाबरपुर के अन्तर्गत न्यू जाफराबाद के समुदाय भवन में बसपा के तत्वाधन में भाईचारा सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अघ्यक्षता ऑल इण्डिया जमीयतुल उलेमा-ए-हिन्द  के महासचिव दिल्ली प्रदेश व जमीयतुल कुरैशी दिल्ली प्रदेश महासचिव, हाजी मौ. यामीन ने कहा कि क्षेत्र में हिन्दू, मुस्लिम, भाईचारा सही बना हुआ है। 

उन्होंने जनता से अपील कि की भाईचारा और ज्यादा बनाए इसमें हमारे देश की मजबूती है। हर इन्सान को चाहिए कि वह जिस सरजमीन पर पैदा हुआ उसकी हिफाजत करें एकता ही अंख्डता है। मुजफ्फर नगर हुए दगों में उत्तर प्रदेश, एवं केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठेहीराते हुए कहा की यूपी सरकार के शासन में जो दंगा हुआ उसमें सरकार की लापरवाही हुई। केन्द्र सरकार चाहती तो 7 सितम्बर को आर्मी लगा कर दगें पर काबू किया जा सकता था। मगर आर्मी 9 सितम्बर को लगाई इससे जाहिर होता है। कि सरकार ने जानबूझकर दंगा नहीं रोकना चाहा।

उन्होने कहा कि बसपा ही ऐसी पार्टी है जो मुस्लिमों, दलितो, गरीबों पर जुल्म नहीं होने देती है। उन्होंने जनता से अपील की कि बसपा पार्टी को भारी मतों से विजयी बना कर विधनसभा में भेजे। मौ. हाजी यामीन एवं आबिद पहलवान अपने सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ बसपा में शामिल हुए। कार्यक्रम में हजारों लोगों की संख्या में लोगों कि उपस्थिति देखकर बसपा के लोग गदगद हुए।
हाजी मौ. यामीन समाजसेवा से जुड़े हुए समाजसेवक हैं और जिस लगन और मेहनत से समाजसेवा करते हैं। उसी लगन और मेहनत से बसपा पार्टी के लिए भी काम करेंगे, ऐसी हमें उम्मीद है। भाईचारा सम्मेलन में बसपा के ऑल इण्डिया तेली समाज के अघ्यक्ष शेर खान मलिक ने कहा कि भाजपा, काग्रेस एक सिक्के के दो पहलू है जैसे कहावत है चोर-चोर मौसरे भाई उन्होने दिल्ली को बर्बाद कर रख है।

उन्होने जनता से अपील की कि बसपा को विजयी बनाकर दिल्ली की हालत सुधरने का मौका दें। अत्याचार गुण्डागर्दी से मुक्ति बसपा ही दिला सकती है। इस मौके पर बसपा के उत्तरी पूर्वी लोकसभा प्रभारी चौ. सतीश (इंजीनियर), लोकसभा कोडिनेटर बसपा, हाजी समी सलमानी लोकसभा संयोजक, अब्दुल रहमान, आमिर राजा, रूप चन्द गौतम जिला अघ्यक्ष, मामा नूर हसन, मौ. जाकिर, सुलेमान प्रधान, हाजी आफताब , उपाध्यक्ष हाजी महरदिन, हाजी जुल्फेकार , चौ. बेद, हारून पहलवान, अनवर भाई, बब्बू भाई, रपफीक, मुल्लाजी अली, मकसूद, अमजद, गब्बर पहलवान, पप्ले पूर्व प्रत्याशी नगर निगम, सिकन्दर बख्श इलाही, सफी इलाही, हाजी मुन्ना अंसारी, हाजी याकूब, डा. उमर, सलीम पहलवान, हाजी नवाब, हाजी इफ्तेखार मलिक के अलावा हजारों लोग मौजूद थे।

 

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

सीलमपुर विधायक चौ. मतीन अहमद ने की पद यात्रा

संवाददाता

उत्तर पूर्वी दिल्ली।  सीलमपुर के  विधायक चौ. मतीन अहमद ने आज क्षेत्र स्थित ब्रह्मपुरी में गली नं. 1 से 6 तक की गलियों में पदयात्रा की। पदयात्रा के दौरान उन्होंने क्षेत्रीय निवासियों से संपर्क किया। इस मौके पर कांग्रेस नेता मकसूद जमाल,अनिल गौड, देवराज शर्मा, चौ. नत्थू सिंह,आबाद अहमद, बल्लू, त्रिलेाकचंद शर्मा, तेजू भाई,महिपाल सिंह,रवि कुमार, महेन्द्र पाली, समय सिंह, प्रशांत, विजय पाल, शेखर शर्मा, मुकेश शर्मा, सुरेन्द्र, विनोद,राजीव, पदम शर्मा, सोनू भाई, परशुराम रावत, राकेश शर्मा, दिनकर जी, मुख्तार सिद्दीकी, अबरार अहमद, रियाज अहमद, नदीम, मौ. जााकिर, अंसार, जुबीन, शकील मलिक, हाजी पप्पू सैफी, पप्पू चौधरी, रशीद केबिल वाले, शहिद चौधरी, हाजी सादिक अली, अकरम खेडा, रिजवान, शौकिन बेग, आरके शर्मा के अलावा महिला कांग्रेस नेता गुड्डी गुप्ता सहित अन्य कार्यकर्ता मौजूद थे।

 

बुधवार, 6 नवंबर 2013

आप और हम समाज सेवा समिति ने कांग्रेस पार्टी के लिए वोट देने की अपील की

 

संवाददाता

उत्तर-पूर्वी दिल्ली। चुनाव का मौहाल चल रहा है और कोई अपने पक्ष में मतदान करने के लिए कहता है। वहीं सीलमपुर विधानसभा में आप और हम समाज सेवा समिति ने कांग्रेस पार्टी के लिए वोट के लिए अपील की। यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार मौजूदा विधायक चौधरी मतीन अहमद हैं जो एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। आप और हम समाज सेवा समिति ने सभी से अपील की कि विधायक चौधरी मतीन साहब को एक बार फिर भारी बहुमत से जिताना है ताकि विकास की राह टूटे नहीं। 

समिति की ओर से मो. रिजवान ने बताया कि आप सभी अपने वोट का सही इस्तेमाल करें और वोट डालने जरूर जाएं। आपका सिर्फ एक वोट आपके इलाके की तस्वीर बदल सकता है आपका एक वोट आपकी दौलत से ज्यादा कीमती है इसलिए पूरी दिल्ली में कांग्रेस को वोट करें और सीलमपुर विधानसभा में चौधरी मतीन अहमद को वोट करें। 

इस मौके पर फस्सू भाई, सलीम भाई, गुलाम रसूल, शमशाद, चीना भाई, शाहिद, नासिर भाई, अरशद भाई जमीर अहमद मुन्ना पूर्व सलाहकार, अनवर भाई हाजी मुजम्मिल आदि लोगों ने शिरकत की।







 

शनिवार, 2 नवंबर 2013

साबिर हुसैन ने दीं दीपावली की शुभकामनाएं

संवाददाता
नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन ने देशवासियों को दिवाली की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह त्योहार निराशा पर आशा, बुराई पर अच्छाई और अंधेरे पर उजाले की जीत है। साबिर हुसैन ने अपने संदेश में कहा कि दिवाली के पवित्र अवसर पर मैं भारत के बाहर और यहां मौजूद अपने देशवासियों और भारत के सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।
उन्होंने कहा कि सभी धर्मों के लोगों द्वारा देशभर में मनाया जाना वाला यह त्योहार हमारी धर्मनिरपेक्ष परंपरा को मजूबती से दोबारा पुष्ट करता है। इस साल यह त्योहार हमारे बीच सद्भावना और भाईचारे को मजबूत करे और पारस्परिक समझदारी की भावना को भी आगे बढ़ाए।
साबिर हुसैन ने कहा कि इस दिन हम खुद को दया, प्रेम, भाईचारा और शांति का संदेश फैलाने के लिए समर्पित करें। यह दिवाली जरूरतमंद लोगों के जीवन में खुशियां और आनंद की रोशनी लाने वाली साबित हो।
साबिर हुसैन ने इसके साथ ही पर्यावरण अनुकूल दिवाली मनाने तथा प्रदूषण न फैलाने का संदेश दिया।

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

पोषण पहलू को शामिल किए बिना भोजन के अधिकार को समझा नहीं जा सकता: जय गुप्ता

संवाददाता

नई दिल्ली। सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि, विधि ज्ञाता एवं फियान (फूड फस्र्ट इन्फारमेशन एंड ऐक्शन नेटवर्क) इंडिया की सहयोगी संस्थाएँ, जो भारत में भोजन के अधिकार हेतु समर्पित हैं, राइट टू फूड एंड न्यूट्रिशन वाच 2013 के छठें संस्करण के विमोचन तथा विश्व खाद्य दिवस मनाने के लिए आज फियान के जंगपुरा स्थित कार्यालय में एकत्र हुए।
वाच का वर्ष 2013 का संस्करण उन नीतियों का विरोध करते हुए जो विश्वव्यापी भूख के लिए जिम्मेदार हैं उनके बेहतर विकल्पों की बात करता है। इस रिपोर्ट में सार्वजनिक नीतियों के विकास में व्यक्तियों एवं समुदायों की अर्थपूर्ण भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट कहती है कि ऐसे देशों में जहाँ बड़ी संख्या में लोग भोजन की कमी से जूझ रहे हैं, यह जरूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय नियम के अंतर्गत वे अपने दायित्वों को निभाएँ और उन नीतियों के लिए कार्य करें जो संसाधनों के स्थानीय नियंत्रण को प्रोत्साहित करती हैं। विदेशी निवेशकों को उन समुदायों में क्षेत्रातीत दायित्वों को निभाना जरूरी है जिसमें वे निवेश करते हैं।
इस पुस्तक का विमोचन करते हुए दिल्ली बार कौंसिल के अध्यक्ष श्री जय गुप्ता ने फियान इंडिया के साथ समन्वय को व्यक्त करते हुए कहा कि पोषण पहलू को शामिल किए बिना भोजन के अधिकार को समझा नहीं जा सकता है। फियान इंडिया की उपाध्यक्ष सुश्री सुमन ने इस पुस्तक का संक्षेप में वर्णन किया और यह बताया कि यूनिसेफ की “प्रोग्रेस फाॅर चिल्ड्रेनः अ रिपोर्ट कार्ड आन न्यूट्रिशन“ मई 2006 के अनुसार भारत में 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार हैं जो पूरी दुनिया के कुपोषित बच्चों का एक-तिहाई है। उन्होंने आगे कहा कि तथाकथित विकास नीतियाँ गरीब समुदायों के सीमांतीकरण को बढ़ावा देती हैं और भूख, कुपोषण एवं गरीबी को बढ़ा देती हैं। अन्य वक्ताओं ने भी इस अवसर पर अपने विचार रखे और फियान के कार्य का समर्थन किया। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 21.38 करोड़ लोग आज भी कुपोषित है। जिसमें यह भी पता लगा है कि 46 प्रतिशत बच्चे आज भी कुपोषण का शिकार है। विश्व में अकेले भारत में ही 1/3 बच्चे कुपोषण का शिकार है।





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