मंगलवार, 14 मार्च 2023

शुक्रवार, 10 मार्च 2023

संघ की ब्रदरहुड से तुलना अस्वीकार्य

अवधेश कुमार

विपक्ष के किसी नेता द्वारा सरकार की आलोचना सामान्य स्थिति होती है। किंतु राहुल गांधी ने ब्रिटेन मैं जो कुछ बोला है उसे नरेंद्र मोदी सरकार की सामान्य आलोचना तक सीमित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से लेकर लंदन के थिंक टैंक चाथम हाउस में उनके वक्तव्यों से भारत की ऐसी भयावह तस्वीर बनती है मानो यहां फासिस्टवादी सरकार हो जिसने न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका से लेकर प्रेस और सारी थिंकटैंक संस्थाओं पर नियंत्रण कर लिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुस्लिम ब्रदरहुड से तुलना करने का अर्थ यही है कि भारत में भी हिंसा के द्वारा मजहबी राज स्थापित करने वाला  आतंकवादी संगठन है जिसके लोगों के हाथों अभी सत्ता है। संघ संबंधी उनकी आलोचना की चर्चा इसलिए आवश्यक है क्योंकि आम धारणा यही है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली या अन्य भाजपा सरकारों का वैचारिक स्रोत संघ ही है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक रहे। भाजपा में बड़ी संख्या में संघ के स्वयंसेवक हैं। संगठन मंत्री के तौर पर ऊपर से नीचे संघ से भेजे गए प्रचारक काम कर रहे हैं। इस कारण राहुल गांधी की बात को सच मान लिया जाए तो  म स्वीकारना होगा कि भारत में ऐसा मजहबी फासिस्ट शासन है जहां दूसरे मजहब और विचारधारा आदि के लिए कोई स्थान नहीं। भारत में वे काफी समय से कह रहे हैं कि संघ ने सारी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। इसे संघ के प्रति आम राजनीतिक विरोध की मानसिकता तक सीमित मान लिया जाता था। लेकिन में उन्होंने इसे उस रूप में चित्रित किया जिस तरह हिटलर और मुसोलिनी के शासनकाल में जर्मनी और इटली के अंदर संस्थाओं पर कब्जा किया गया था।

वामपंथी सोच वालों के द्वारा संघ का विरोध और आलोचना नई बात नहीं है। बावजूद इसके पूर्व विदेश की धरती पर भारत के किसी नेता ने इस तरह का वक्तव्य नहीं दिया। उसे मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा आतंकवादी संगठन कहने से बड़ा बौद्धिक अपराध और कुछ नहीं हो सकता। चूंकि आप विदेश की धरती से ऐसा बोल रहे हैं जहां आमतौर पर लोगों को भारत के संगठनों के बारे में जानकारी नहीं वहां देश की कितनी विकृत तस्वीर बनेगी इसकी कल्पना करिए। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी ने भी संघ को लेकर  मतभेद प्रकट किए, पर इस रूप में विदेश तो छोड़िए भारत की धरती पर भी उसे चित्रित नहीं किया। भारत में संघ के घोर विरोधी भी अंतर्मन से राहुल की इस तुलना से सहमत नहीं हो सकते।  मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1928 में अपनी स्थापना के बाद से राजनेताओं की योजनाबद्ध हत्या से लेकर अनेक हिंसक आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया है। उसके सदस्य इन मामलों में सजा पाते रहे हैं। यह संगठन कुरान और हदीस पर आधारित इस्लामिक शासन के लक्ष्य से काम कर रहा है। इसने अपनी स्थापना के दो वर्ष बाद ही राजनीतिक गतिविधियां आरंभ कर दी और 30 के दशक में मिस्र की सत्तारूढ़ वफ्द पार्टी का विरोध शुरू कर दिया जिसमें हिंसक विरोध भी शामिल था। इसने अनेक राजनीतिक हत्याएं की और जब सरकार ने इसे प्रतिबंधित करने की योजना बनाई तो  मिस्र के तत्कालीन प्रधानमंत्री महमूद फाहमी अल नुकराशी की 1948 में हत्या कर दी।  इस कारण हिंसा प्रतिहिंसा का ऐसा दौर चला कि मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक हसन अल्बाना की भी हत्या हो गई। मुस्लिम ब्रदरहुड ने उसके बाद 1954 में तत्कालीन मिस्र के राष्ट्रपति गमल अब्देल नसीर की हत्या करने की कोशिश की। इस षड्यंत्र में उसके नेता पकड़े गए और राजद्रोह के आरोप में उन्हें फांसी की सजा हुई। इनमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। कहने का तात्पर्य कि मुस्लिम ब्रदरहुड स्थापना के समय से आज तक इस तरह की गतिविधियों में बार-बार संलिप्त पाया गया है और अनेक देशों को उसे प्रतिबंधित करना पड़ा। क्या संघ के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

1925 में स्थापना से लेकर 98 वर्षों की यात्रा में संघ की सोच में भी कभी हिंसक गतिविधियां के संकेत तक नहीं मिले। भारत में संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगे और कभी कोई आरोप प्रमाणित नहीं हुआ।फलतः उसे प्रतिबंधों से मुक्त किया गया। राहुल गांधी को संघ विरोधी ज्ञान देने वाले रणनीतिकार एक बार इन प्रतिबंधों के हटाने के पीछे के कारणों को समझ लेते तो इस तरह निराधार आपत्तिजनक आरोप लगाने से बचते। तब उनका विरोध सामान्य होता और इस पर लोकतांत्रिक समाज में स्वाभाविक बहस भी होती। आप संघ के विरोधी हो या समर्थक सच कहा जाए तो आरोप वैसा है जिसका उत्तर देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। चूंकि भारत के अंदर और बाहर की कुछ प्रभावी शक्तियां राहुल गांधी को एक बड़े नेता और विपक्ष के सबसे बड़े आवाज के रूप में पेश कर रही हैं इसलिए भी उत्तर आवश्यक हो जाता है। आप देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के प्रथम परिवार में सोनिया गांधी के बाद और भविष्य के शीर्ष नेता है। चार बार के सांसद हैं। आपके सांसद बनने के साथ 10 वर्ष तक पार्टी के नेतृत्व में यूपीए सरकार रही है। इसके पहले भी सरकारों ने संघ के बारे में अनेक अध्ययन व रिपोर्ट प्राप्त किए हैं।

आरोप लगाना एक बात है, कभी भी कहीं से इसके संकेत तक नहीं मिले कि संघ के लक्ष्य या क्रियाकलापों में भारत की सत्ता को उखाड़ फेंक कर निरंकुशवादी सरकार की स्थापना करना है। या एक सांस्कृतिक सामाजिक संगठन है जो समाज परिवर्तन की दृष्टि से काम कर रहा है। संघ पर निष्पक्ष अध्ययन करने वाले बताते हैं कि इसके संपूर्ण साहित्य, नेताओं के भाषणों, बौद्धिक वर्गों आदि में सत्ता संबंधी सोच मिलती ही नहीं। यह मूलतः सांस्कृतिक सामाजिक संगठन है जो भारत राष्ट्र की उन्नति के लिए काम करता है। भारत राष्ट्र की सोच भी आधुनिक नेशन स्टेट की तरह भूगोल और राजनीति तक सीमित नहीं। हिंदुत्व इसकी सोच का मूल आधार है। हिंदुत्व एक उपासना पद्धति, कर्मकांड या इस्लाम, ईसागआदि की तरह  एक-दो पुस्तक के आधार पर संपूर्ण व्यवस्था की वकालत नहीं करता। हिंदुत्व व्यापक और विशाल जीवन दर्शन है जिसके मूल में शुचिता, नैतिकता और सभी जीवो के अंदर एक ही तत्व देखने का भाव है ताकि कोई किसी का दुश्मन न बने । इसकी की व्यापकता और उदारता इतनी है कि उसमें हर प्रकार के धार्मिक विचारों के लिए स्थान है। संकीर्ण मजहबी या उग्र राष्ट्रवादी या फासिस्टवादी सोच से पैदा हुआ कोई संगठन बिना टूट-फूट के लगभग 100 वर्ष तक लगातार विस्तारित होते और इतना बड़ा जनसमर्थन प्राप्त नहीं कर सकता। पीछे की बात जाने दीजिए पिछले एक दशक के अंदर ही संघ के किस पदाधिकारी का कोई एक बयान नहीं मिलेगा जिसमें किसी मजहब और यहां तक कि राजनीतिक पार्टी का विरोध। संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत हिंदुत्व के उदार चरित्र की बात करते हुए लगातार स्वयंसेवक संघ समर्थकों सहित संपूर्ण हिंदू समाज को उग्रता और आक्रामकता के प्रति सजग कर रहे हैं। राहुल गांधी इसे एक बंद संगठन बता रहे थे जिसकी गतिविधियों को बाहर के लोग जान ही नहीं सकते। संघ की शाखाएं प्रतिदिन खुले में लगती हैं। बड़े -छोटे सार्वजनिक कार्यक्रम नियमित होते हैं और उनमें समाज के सभी वर्गों को निमंत्रित किया जाता है। यह सब छिपा तथ्य नहीं है। वैसे भी संघ के इतने संगठन हैं कि भारत में ऐसे कम परिवार होंगे जहां किसी न किसी का किसी संगठन से कभी संपर्क नहीं हुआ हो। एक परिवार में कोई संघ से जुड़ा है तो कोई कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवाद से।  सबके बीच परिवार और समाज के रिश्ते हैं। जमीनी स्तर पर सभी संघ के स्वयंसेवकों का सम्मान भी करते देखे जाते है। संघ का ज्यादातर विरोध भारत में राजनीतिक रहा है और उसके पीछे भी मूल सोच मुस्लिम वोट पाना है।

राहुल गांधी इन सबसे आगे निकल गए। लगभग डेढ़ वर्ष पहले वर्ष पहले कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने अपनी पुस्तक सनराइज ओवर अयोध्या में संघ की तुलना आईएसआईएस और बोको हराम तक से कर दी। राहुल गांधी द्वारा इसे ब्रदरहुड के समान बताना साबित करता है कि कांग्रेस नेतृत्व और बाहर से इनको बौद्धिक खुराक देने वालों की यही सामूहिक सोच है। चूंकी यह सच नहीं है, इसलिए भारत का समाज मानता है कि राहुल गांधी ने अत्यंत गैर जिम्मेदार बयान दिया है। कल अगर राहुल गांधी और कांग्रेस को इस बयान के कारण राजनीतिक क्षति होती है तो वह इसी तरह राग अलापेंगे कि चुनाव आयोग से लेकर सारी संस्थाएं भाजपा और संघ के कब्जे में आ गई हैं। संवैधानिक संस्थाओं को छोड़कर आम संस्थाओं में सरकारें अपने अनुकूल लोगों को नियुक्त करती रही है। कांग्रेस के शासनकाल में संस्थाओं में किनकी नियुक्तियां हुई? भाजपा सरकार में भी ऐसे नियुक्तियां हुई है तो इसमें आश्चर्य की बात होनी ही नहीं चाहिए। 



मंगलवार, 7 मार्च 2023

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

चुनाव परिणामों में चौंकाने वाले तत्व नहीं

अवधेश कुमार

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में चौंकाने वाला कोई तत्व नहीं है। वास्तव में परिणाम लगभग उम्मीदों के अनुरूप ही है। तीनों राज्यों त्रिपुरा,  नागालैंड और मेघालय के चुनाव परिणामों को एक साथ मिलाकर देखें तो कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक, भाजपा की सीटें किसी राज्य में थोड़े कम या ज्यादा हो, मत प्रतिशत में थोड़े बहुत अंतर आ जाएं लेकिन अब वह पूर्वोत्तर की प्रमुख स्थापित पार्टी हो गई है। दूसरे, एक समय पूर्वोत्तर पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की क्षरण प्रक्रिया लगातार जारी है। तीसरे, पूर्वोत्तर में तृणमूल के एक प्रमुख पार्टी के रूप में उभरने की उम्मीद भी धराशाई हुई है। चौथे, माकपा के नेतृत्व वाले वाम दलों की पुनर्वापसी की संभावना पहले से ज्यादा कमजोर हुई है। जरा सोचिए, अगर त्रिपुरा में वामदल और कांग्रेस मिलकर भी भाजपा को सत्ता से बाहर करने में सफल नहीं हुए तो इसके मायने क्या हैं? पिछले चुनाव में यद्यपि माकपा नेतृत्व वाला वाममोर्चा सत्ता से बाहर हुआ था लेकिन भाजपा और वाम मोर्चे के मतों में ज्यादा अंतर नहीं था। इस कारण भाजपा विरोधी और वाममोर्चा के समर्थक यह मान रहे थे कि भले जनता ने सत्ता विरोधी रुझान में माकपा को बाहर कर दिया लेकिन अगले चुनाव में इसकी वापसी हो सकती है। चुनाव परिणामों ने बता दिया कि वाम मोर्चे का उदय अब दूर की कौड़ी है। निश्चित रूप से इस परिणाम के क्षेत्र के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी विश्लेषण होगा। आखिर 2024 लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भाजपा विरोधी पार्टियां कई प्रकार के समीकरण बनाने की कवायदें कर रही है तो इस चुनाव का असर उस पर न पड़े ऐसा संभव नहीं। तो कैसे देखा जाए इन चुनाव परिणामों को?

यद्यपि तीनों राज्यों के चुनाव महत्वपूर्ण थे,देश का सबसे ज्यादा ध्यान त्रिपुरा की ओर था। यह पहला राज्य था जहां भाजपा ने अपने विपरीत विचारधारा वाले वाममोर्चा को पहली बार पराजित किया था। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लव देव के शासनकाल में स्वयं पार्टी के अंदर असंतोष के स्वर तथा सरकार की कुछ नीतियों के विरुद्ध जनता में भी विरोध देखा गया। भाजपा ने मई 2022 में उनकी जगह माणिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया। कहा जा सकता है कि चेहरा बदलने से दोनों स्तरों का असंतोष थोड़ा कम हुआ। भाजपा की सीटें और मत दोनों पिछले चुनाव से घटे हैं लेकिन वह अपनी बदौलत 60 सदस्य विधानसभा में बहुमत पा चुकी है। इंडीजीनस पीपल्स फ्रंट यानी आईपीएस के साथ गठजोड़ कर भाजपा ने चुनाव जीता था। इस बार भी दोनों के बीच गठबंधन था लेकिन आईपीएफ को केवल 5 सीटें भाजपा ने दी थी। इस कारण  कुछ स्थानों पर आईपीएफ भाजपा के विरुद्ध भी चुनाव लड़ रहा था। कांग्रेस और वाममोर्चा का गठबंधन नेताओं के स्तर पर हुआ लेकिन जमीन पर दोनों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच तालमेल न हो सका। भाजपा के उभार के पहले राज्य में कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच संघर्ष की स्थिति थी। इसमें बची-  खुची कांग्रेस के लोगों के लिए स्वीकार करना कठिन था कि वह उसी वाम मोर्चे के उम्मीदवार का साथ दे जिनसे उसकी लंबी लड़ाई रही है। यह इस बात को साबित करता है कि भाजपा विरोध के नाम पर भले पार्टियों का गठबंधन हो जाए ,जनता ही नहीं स्वयं उन पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थकों के बीच सहयोग होना आसान नहीं। इसका असर आगामी विधानसभा चुनावों से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव के समीकरणों पर भी पड़ेगा। चुनाव के कुछ समय पूर्व बनी टिपरा मोथा पार्टी ने एक दर्जन सीटें जीतकर भी कुछ संकेत दिया है। शाही परिवार से प्रद्योत विक्रम माणिक्य देबबर्मन ने पार्टी को अलग आदिवासियों के लिए ग्रेटर त्रिपुरालैंड की मांग के साथ सामने लाया था। हालांकि मतदान के पहले कुछ नेताओं के साथ छोड़कर जाने से दुखी होकर उन्होंने घोषणा किया था कि वे अब आगे बढ़ा नीति में नहीं रहेंगे। बावजूद जनता का उन्हें इतना समर्थन मिला। भाजपा ने भी अपने घोषणापत्र में आदिवासियों के लिए ज्यादा स्वायत्तता का वायदा किया था। इन दोनों पार्टियों के बीच तालमेल की पूरी संभावना है। ऐसा होता है तो यहां से त्रिपुरा की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत होगी।

नागालैंड की ओर देखें तो वहां भी भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के साथ गठबंधन में वह छोटा साझेदार थी। उसे 20 सीटें ही लड़ने के लिए मिली किंतु केंद्रीय नेतृत्व ने इसके कारण पार्टी की स्थानीय इकाई में विरोध और असंतोष उभरने नहीं दिया। छोटा साझेदार होकर भी उसने एनडीपीएस के साथ मिलकर उसी तन्मयता से चुनाव लड़ा जैसे वह अन्य राज्यों में लड़ रही थी।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे सभी नेता वहां चुनाव प्रचार करने गए और पूरा जोर लगाया। पिछले नागालैंड की विधानसभा में कोई विपक्ष रही नहीं गया था। नागा पीपुल्स फ्रंट के विधायक सरकार के साथ चले गए थे। आगे क्या होगा अभी कहना कठिन है लेकिन भाजपा ने वहां सभी दलों के नेताओं से अपना संपर्क संबंध बनाए रखा है। वैसे भी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, लोक जनशक्ति पार्टी आदि भाजपा की सहयोगी पार्टियां हैं। इस तरह नागालैंड में एक मजबूत सरकार की संभावना है जो वहां जारी शांति प्रक्रिया को और सुदृढ़ करेगी । निस्संदेह,  मेघालय का चुनाव परिणाम भाजपा के उम्मीदों के अनुरूप नहीं है। उसे स्वयं बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद थी।  पिछली बार उसे 2 सीटें आई थी और एनपीईपी,पीडीएफ और एचएसबीसी के साथ मिलकर उसने मेघालय डेमोक्रेटिक एलाइंस बनाया था। एनपीईपी के साथ उसका चुनावी गठबंधन नहीं था।  चुनाव के बाद असम के मुख्यमंत्री और पूर्वोत्तर जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक हेमंतो तो विश्वासरमा का कोनराड संगमा से मुलाकात बताता है कि साथ मिलकर काम करने की बातचीत परिणाम के पहले ही शुरू हो गई थी। तृणमूल कांग्रेस भी यहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी और कांग्रेस को लेकर तो बहुत उम्मीद ही नहीं थी। तृणमूल कांग्रेस ने मुकुल संगमा सहित कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर मेघालय की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनने की उम्मीद की थी। लगता है मेघालय के मतदाताओं को यह रास नहीं आया।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्वोत्तर पर विशेष फोकस किया है। वहां अपनी नीतियों, कार्यक्रमों और संवाद से अलगाववाद, क्षेत्रीय -जातीय विशेषता के भाव को भारतीय राष्ट्र भाव के साथ जोड़ने की लगातार कोशिश की। यातायात और संचार के क्षेत्र में पूर्वोत्तर में सच कहा जाए तो क्रांति हुई है। सड़कें और रेलमार्ग ही नहीं हवाई यात्राओं की दृष्टि से भी आधारभूत संरचनाएं सशक्त हुई है। पूर्वोत्तर में इस समय 17 हवाई अड्डे कार्य कर रहे हैं। मेघालय के लोगों ने पहली बार अपने हक के लिए रेल यात्राएं की है। बिजली की स्थिति में काफी सुधार हो चुका है। शिक्षा के क्षेत्र में 191 उच्च शिक्षा के नए संस्थान खोले गए। उच्च शिक्षा में नामांकन में 29% की वृद्धि हुई। उग्रवाद को काबू करने के लिए सुरक्षा सख्ती के साथ क्षेत्रीय विकास और संवाद तीनों रास्ते अपनाए गए। परिणामतः 8000 से ज्यादा उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया। आज पूर्वोत्तर उग्रवाद से लगभग मुक्त है। सबसे बड़ी बात कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम यानी अफस्पा को हटाने की बात अनेक पार्टियां और मानवाधिकार संगठन करते थे। उसे सही मायनों में भाजपा ने ही स्वीकार किया। आज असम, त्रिपुरा ,मणिपुर, मेघालय,मिजोरम आदि सभी राज्यों में ज्यादातर क्षेत्रों से अफस्पा हटाया जा चुका है। नागालैंड की सभा में प्रधानमंत्री ने इसे हटाने का वायदा किया। इस तरह वहां के लोगों ने लंबे समय बाद शांति, स्थिरता और आवागमन से लेकर सभी प्रकार की गतिविधियों में भयमुक्त स्वतंत्र वातावरण महसूस किया है। इन सबके साथ पूर्वोत्तर के अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृतियों, स्थानीय परंपराओं,  सोच और व्यवहार से लेकर स्थानीय विशेषताओं को भी प्रोत्साहित किया गया। पूर्वोत्तर के उन महापुरुषों को सामने लाकर महत्त्व दिया गया जिन्हें इतिहास के अध्याय में स्थान नहीं मिला था। इन सबका व्यापक असर हुआ है और आज पूर्वोत्तर सोच और व्यवहार की दृष्टि से समग्र रूप से भारत का बदला हुआ क्षेत्र है। इन सबकी प्रतिध्वनि चुनावों में दिखाई पड़ रही है। हालांकि अभी इन सारी दिशाओं में काफी कुछ किया जाना शेष है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208



बुधवार, 1 मार्च 2023

बसंत कुमार के लेख

सांसद निधि और अन्य फंड है राजनीति में बढ़ते अपराधों की जड़
चुनावों में धर्म और जाति का उपयोग गलत परंपरा
डॉ. आंबेडकर की विरासत के संवाहक नरेंद्र मोदी
आम चुनाव: सरकार किसी की बने पर लोकतंत्र और संविधान सुरक्षित रहना चाहिए
प्रधानमंत्री की देवालय से पहले शौचालय की पहल के प्रेरणास्रोत डॉ. बिंदेश्वर पाठक
इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में हेरा-फेरी की आशंका
नागरिकता संसोधन अधिनियम (सीएए) डॉ. अंबेडकर के सपनो को मूर्त रूप देने का प्रयास
वोट फार कैश मामले मे सुप्रीम कोर्ट का साराहनीय फैसला
युवाओं को बर्बाद करती शराब और नशीली दवाओं की लत
भर्ती परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार युवाओं के साथ घोर अत्याचार
क्यों बिखर रही है कांग्रेस और इंडिया गठबंधन
जाति का विचार करके मंत्रिमंडल में विभाग का बंटवारा आलोकतंत्रिक
चुनावी बजट मे आर्थिक चुनौतियां
क्या चुनावी वर्ष के बजट मे सार्वजनिक उपक्रमो को मिलेगी राहत
आगामी लोक सभा चुनावों में मायावती की डगर
हिट एंड रन के नये कानून के विरोध मे राजनीति
पूना पैक्ट देश के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी भूल
आनलाइन सेटबाजी से बर्बाद होते युवा
आधुनिक समाज में वरिष्ठ नागरिक तिरस्कृत क्यों
पिछड़ों और महादलितों के कल्याण की बात करना राजनीति है या कुछ और?
मुफ्त राशन वितरण योजना पर राजनीति 
आखिर एक आधुनिक भारत की स्थापना हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं
कुछ भ्रांतियों को तोड़ गए स्पिन के सरदार ‘बिशन सिंह बेदी’
जातीय जनगणना की राजनीति कितनी कारगर
आज की कलुसित राजनीतिक दौर में प. दीनदयाल उपाध्याय के मानव दर्शन के सार्थकता
देश के सामने असली परीक्षा - गरीबी दूर हो या जातिवादी क्लेश
लोकतंत्र के मन्दिर में अमर्यादित शब्दों की पार होती सीमा
 
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