गुरुवार, 31 जुलाई 2014

गाजा मामले पर भारत सरकार का रुख

अवधेश कुमार

नरेन्द्र मोदी सरकार गाजा पट्टी में इजरायल की ओर से किए जा रहे हमले पर अपने रवैये को लेकर दोहरे विरोध का सामना कर रही है। इजरायल के  खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में वोट डालने के कारण यदि भाजपा के कार्यकर्ता एवं कट्टर समर्थक सरकार के खिलाफ हैं तो संसद में इस मुद्दे पर निंदा प्रस्ताव पारित न कराए जाने को लेकर कुछ विपक्षी दल नाक भौं सिकोड़ रहे हैं। इजरायल एवं फिलिस्तीन ऐसा मामला है जिस पर भारत में कभी एक राय नहीं रही है। हमेशा देश इस पर विभाजित रहा हैं। वामपंथी दल या उस सोच के समर्थक हमेशा से इजरायल को खलनायक मानते हुए फिलीस्तीन के पक्ष में खड़े होते रहे हैं। भाजपा एवं संघ परिवार का रुख हमेशा इजरायल के समर्थन का दिखता रहा है। प्रश्न है कि वर्तमान रुख को हम किस तरह लेे? अगर सीधे-सीधे देखंे तो संसद में बहस नहीं कराना एवं प्रस्ताव में मत डालना सरकार के  दोहरे रुख का प्रमाण नजर आएगा? तो क्या यही सच है?

सबसे पहले मानवाधिकार परिषद में आए प्रस्ताव को समझने की कोशिश करें। इसमें लाए गए प्रस्ताव में सबसे पहले गाजा पट्टी में इजराइली हमले में मारे जा रहे निर्दाेष लोगों की हत्या की निंदा की गई थी। साथ ही इसमें इजराइली हमले की जांच करने की बात भी कही गई थी। सामान्य तौर पर  देखें तो ऐसे प्रस्ताव का समर्थन करने में कोई समस्या नजर नहीं आएगा। न सरकार के पक्ष में यह भी कहा जा सकता है कि अगर प्रस्ताव में इजराइल की ओर से जबर्दस्त सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने की आलोचना की गई थी तो इसके समर्थन में मत देने में क्या समस्या थी? यह सच है कि इजराइल के पक्ष में सिर्फ अमेरिका ने वोट डाला। वैसे भी चीन, रूस, ब्राजील, भारत, पाकिस्तान समेत 46 देशों में 24 ने प्रस्ताव के पक्ष में यानी इजराइल के खिलाफ वोट दिया। आप देखेंगे ब्रिक्स के सारे देश इस प्रस्ताव के समर्थन में यानी इजरायल के खिलाफ खड़े हुए। हाल ही में ब्रिक्स सम्मेलन में जिस एकजुटता की बात की गई थी यह कदम उसके अनुरुप था। लेकिन इसके साथ सच यह भी है कि यूरोप के सभी देशों सहित कुल 17 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।  तो यह विकल्प भी भारत के पास था। भाजपा समर्थकों का कहना है कि भारत को प्रस्ताव के खिलाफ जाना चाहिए था और अगर न गया तो कम से कम वह बहिर्गमन तो कर ही सकता था। हालांकि सरकार समर्थकों का तर्क यह है कि भारत ने पहली बार ऐसा नहीं किया है। इसके पूर्व भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई बार इजराइल के खिलाफ वोट दिया है। यह परंपरा पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के समय से चली आ रही है। चूंकि, प्रस्ताव निर्दाेषों की हत्या की आलोचना और पूरे मामले की जांच से जुड़ा था, इसलिए भारत ने अपनी विदेश नीति में निरंतरता के मद्देनजर इजराइल के खिलाफ वोट दिया।

साफ है कि यह तर्क सबके गले नहीं उतर सकता। यह भारत ही है जिसने नरसिंह राव के नेतृत्व में जायनवाद बनाम नस्लवाद के खिलाफ वोट देकर इजरायल को उबारा था। यह भारत ही है जिसने इजरायल को मान्यता दी और अनेक देशों का विरोध झेलते हुए भी उसके साथ पूर्ण राजनयिक रिश्ता कायम किया। तब फिलीस्तीन नामक देश का उदय भी नहीं हुआ था। हां, इसके साथ यासर अराफात के नेतृत्व में फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन को भी भारत समर्थन करता रहा है। तो इस प्रकार भारत की पृष्ठभूमि ही इजरायल एवं फिलीस्तीन के संदर्भ में दोहरा दिखता रहा है। लेकिन इसके पीछे सशक्त सोच थी। भारत इजरायल के अस्तित्व को भी स्वीकारता रहा है तथा वह फिलीस्तिनियों के भी स्वतंत्र देश के रुप में आविर्भाव का पक्षधर था। तो हम विचार करते समय इस पक्ष को न भूलें।

लेकिन इस समय मामला दूसरा है। यह बात ठीक है कि हमास एक आतंकवादी संगठन है और उसे अनेक जेहादी आतंकवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त है। उसने जिस तह इजरायली लड़कों की हत्या करके अपना आचरण प्रदर्शित किया वह असह्य था। 2012 में हमास और इजराइल के बीच युद्धविराम समझौता हुआ था। उसके बाद से दोनों के बीच आपसी हमलों में कमी आई थी। हालांकि अप्रैल 2014 में अमेरिका की पहल पर फलस्तीनी संकट के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिशें नाकाम हो गई थीं। अचानक पिछले जून में हमास और फतह के बीच समझौता हो गया और दोनों ने एकता सरकार बना ली। इस तरह से दोनों गुटों ने 8 वर्षों से चल रही तनातनी के दौर को खत्म कर दिया। फलस्तीन के दो बड़े गुटों के बीच समझौतो को अपने लिए खतरा मानना इजराइल के लिए स्वाभाविक था। इसी बीच, इजराइल के तीन युवाओं का पश्चिमी किनारा में रहने वाले एक फलस्तीनी परिवार ने अपहरण कर हत्या कर दी। इजराइल ने दावा किया कि वह हमास की कार्रवाई थी। हालांकि हमास ने इस आरोप से इन्कार किया, लेकिन उसके इन्कार पर विश्वास करना कठिन है। इसके बाद ही इजरायल ने बड़े पैमाने पर फलस्तीनियों को गिरफ्तार करना शुरू किया और दबाव बनाया। हमास ने इस कार्रवाई का जवाब रॉकेट से दिया। इसके बाद इजरायल ने उस पर हमला कर दिया। अभी तक करीब 1200 लोग मारे जा चुके हैं।

तो स्थिति विकट है। यकीनन गाजापट्टी में जिस तरह बच्चों की हत्यायें हो रही हैं उनसे दिल दहल जाता है और यह मानवाधिकार का खुलेआम उल्लंघन है, लेकिन हमास जैसे कट्रपंथी आतंकवादी समूह का मनोबल बढ़े यह भी उचित नहीं होगा। प्रस्ताव की सबसे बड़ी कमी यही थी कि हमास को लेकर इसमें कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं था।  हम मानते हैं कि हमास से खतरे को लेकर इजराइल का चिंतित होना सही है। लेकिन गाजा में इजराइल की ओर से जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है यह भी सच है। गाजा में इजरायल की ओर से असंतुलित लड़ाई लड़ी जा रही है। अगर इस प्रस्ताव से लड़ाई रुक जाती तो बात समझ में आने वाली थी। ऐसा तो हुआ नहीं। तो इस प्रस्ताव का महत्व केवल प्रतीकात्मक ही है।

बावजूद इसके भारत के लिए बहिर्गमन का रास्ता ज्यादा उचित और भविष्य की दृष्टि से लाभकारी होता। हालांकि इससे इजरायल के साथ रिश्तों पर नकारात्मक असर नहीं होगा। भारत सरकार ने इस बात का ध्यान रखा है कि इजराइल को यह संदेश चला जाए कि भारत उसके साथ रिश्ते को अहमियत देता है और संयुक्त राष्ट्र संघ में वोट ज्यादा से ज्यादा चिंता जताता है न कि विरोध। इजरायल यह अवश्य ध्यान रखेगा कि भारत ने विपक्ष के दबाव के बावजूद उस पर संसद में वैसी बहस तो नहीं होने दी जैसी विपक्ष चाहता था। विपक्ष का एक तबका चाहता था कि बहस हो एवं इजरायल के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित हो। यह निस्संदेह, विदेश नीति के लिए गलत संदेश वाला होता। इजरायल हमारे लिए कई मामलांे में सहयोग और सहायक है। आतंकवाद के मामले पर हमें उसके सहयोग की लगातार आवश्यकता है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा के सभापति को चिट्ठी लिखकर कहा कि सरकार नहीं चाहती है कि किसी मित्र देश को लेकर किसी तरह की अशोभनीय या विवादित टिप्पणी की जाए। सुषमा का कहना था कि हमारे दोनों देशों (इजराइल और फलस्तीन) के साथ राजनयिक संबंध हैं। किसी भी मित्र देश के खिलाफ टिप्पणी उस देश के साथ हमारे रिश्ते पर बुरा असर डालेगा। 

यह सही सोच थी। काश, यही सोच मानवाधिकार परिषद में भी प्रतिबिम्बित होती। भारत की परंपरागत समस्या यही है कि एक बार तो वह लगता है जैसे किसी मुद्दे पर बिल्कुल एक परिपक्व और सबल देश की तरह तनकर खड़ा होता है लेकिन अगले ही पल वह ऐसी गं्रथि का शिकार हो जाता है जिससे उसकी पूर्व की भंगिमा कमजोर पड़ जाती है। ऐसा ही गाजा मामले में भी हुआ है। संसद में निंदा प्रस्ताव पारित न होने देने का मुखर रुख और प्रस्ताव के पक्ष में मत के बीच शत-प्रतिशत समानता तलाशी मुश्किल है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष: 01122483408, 09811027208 


मंगलवार, 29 जुलाई 2014

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

22-07-14 to 28-07-2014

PEGE-1


PEGE-2


PEGE-3


PEGE-4


PEGE-5


PEGE-6


PEGE-7


PEGE-8


मंगलवार, 15 जुलाई 2014

15-07-14 to 21-07-2014

PEGE-1

PEGE-2

PEGE-3

PEGE-4

PEGE-5

PEGE-6

PEGE-7

PEGE-8


शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

मोदी की आभा से पैदा उम्मीदों को कितना कायम रख पाए जेटली

अवधेश कुमार

जब जेटली ने एक दिन पूर्व संसद में पटल पर अपना पहला आर्थिक सर्वेक्षण रखा तो उसे लेकर जो कौतूहल था वह कुछ ही घंटों में खत्म हो गया। कारण उसमें उन संकल्पों, सख्त एवं निर्भीक सोच और संकेत का काफी अभाव था जिसे नरेन्द्र मोदी ने लगातार चुनाव पूर्व अपने भाषणा से देश मेें संदेश दिया था। ऐसा लगा था मानो सरकार लकीर की फकीर बन जाएगी। लेकिन संसद में प्रस्तुत बजट ने इस धारणा को खत्म किया है। भारत के बजट इतिहास का यह पहला अवसर है जब एक वित्त मंत्री ने चुनाव पूर्व अपने प्रधानमंत्री द्वारा भाषणों में किए गए वायदों से लेकर घोषणा पत्रों के सारे बिन्दुओं को रखा है। इसके पूर्व की सरकारों ने भी घोषणा पत्रो पर काम किया, लेकिन इस तरह एक-एक विन्दू को शामिल किया हो ऐसा कभी नहीं हुआ। हम इससे सहमत हो या असहमत, इसमें कई ऐसे प्रस्ताव हैं और उनके लिए जो वित्त पोषण है उसकी सफलता को लेकर संदेह की गुंजाइश है, लेकिन यह भारत के आर्थिक वर्णक्रम को काफी हद तक बदल डालने वाला बजट है। इसमें किसानों, कुछ करने की तमन्ना रखने वाले युवाओं, उद्यमियों, निवेशको, तथा विदेशी कारोबारियों के लिए काफी कुछ प्रस्ताव आए हैं।  थोड़े शब्दों में कहा जाए तो यह मोदी के सपनों का ऐसा बजट है जिसके आधार पर उनने लोगों को यह समझाया था कि जो कुछ हमारे पास मानवीय, प्रबंधकीय, प्राकृतिक संसाधन है नियम कानून हैं उसी में हम भारत को परिवर्तित कर दुनिया के विकसित और आदर्श देश के रुप में खड़ा करेंगे और ऐसा करते हुए भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विरासत को सशक्त करेंगे।

सबसे पहले हम यह देखें कि बजट के संदर्भ में सरकार के सामने मुख्य लक्ष्य क्या थें? इस संक्षेप मेें इस प्रकार रख सकते हैं। -1. देश की अर्थव्यवस्था को संभालते हुए उसे विकास की दिशा में ले जाने का कदम उठाना, 2.वित्तीय अवस्था को दुरुस्त करना, 3.मोदी को लेकर पैदा हुए उम्मीदों को कायम रखना कि वाकई अच्छे दिनों का जो वायदा किया गया उसे पूरा करने को सरकार कृतसंकल्प है, 4.महंगाई कम करने के ठोस उपाय, 5. विकास एवं वित्त को इस तरह प्रबंधित करना कि गरीब एवं आम जनता के सिर पर ज्यादा बोझ न बढ़े 6. देसी-विदेशी निवेशकों के अंदर यह विश्वास पैदा करना कि अब भारत मेें मनचाहा निवेश करने का मौसम आ गया है.7. और सबसे बढ़कर यह संदेश देना कि केवल आर्थिक विकास ही विकास नहीं है....आदि। अब यह देखना जरुरी है कि इन चुनौतियों को सामना करने में वे कितने सफल रहे हैं।

अपने बजट भाषण के आरंभ में अरुण जेटली ने पिछली सरकार की विफलताओं का जिक्र करते हुए विकास न होने के जो कारण बताए उसके साथ यह साफ किया हम उसे पूरी तरह बदलने को कृतसंल्प है। अर्थव्यवस्था को संभालने का अर्थ है हर क्षेत्र में विकास की गति को प्रोत्साहित करने का कदम। मोदी का विकास सिद्धांत यह है कि उद्योग, सेवा एवं कृषि तीनों को समान महत्व मिले। यह बजट उस सिद्धांत पर उतरने की कोशिश है। करीब सवा दो घंटे से ज्यादा के बजट भाषण के प्रत्येक विन्दुओं को यहां प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। हम यहां समझने के लिए कुछ विन्दुओं को ले सकते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में औद्योगिक विकास की गति आगे बढ़ने की बजाय पीछे जाने की बात थी। नई कंपनियों के लिए 10 हजार करोड़ रुपए के शुरुआती कोष। इससे नव उद्यमियों को वित्तीय मदद मिलगी। कपड़ा उद्योग को ठोस आधार देने के लिए रायबरेली, सूरत, लखनऊ समेत छह शहरों में 6 नए टेक्सटाइल क्लस्टर बनाए जाएंगे। यहां रोजगार के साथ ही उद्यमशीलता को भी बढ़ावा मिलेगा। जरा सोचिए, सात शहरों के स्मार्ट औद्योगिक सिटी में वे सारी सुविधा मिलेंगी जो किसी भी उद्योग को जरूरत होती है। इसका असर होगा या नहीं? इससे उद्योगों को काम करने में आसानी होगी और यह एक बेंचमार्क बनेगा। उम्मीद है कि रोजगार सृजन करने में भी ये शहर योगदान करेंगे। निवेश करने वाले प्रोत्साहित हों और कर विभाग उनको परेशान न करे इसकी भी घोषणा की गई है। निर्माण क्षेत्र अगर गति पकड़ ले तो कई उद्योग एक साथ चल पड़ते हैं। सरकार ने सड़कों के निर्माण की व्यापक योजनाएं तो रखा ही है, 2022 तक सभी को आवास योजना के लिए राष्ट्रीय आवास विकास बैक को विशेष राशि दी है। हालांकि इसमें निजी एवं सरकारी दोनों की भागीदारी से लक्ष्य पूर्ति में कठिनाइयों ा आभास होता है नेशनल हाउसिंग बैंक के लिए 12 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसकी वजह से भावी घर ग्राहकों को कम कीमत के घर पर सस्ते कर्ज मिल सकेंगे। हालांकि, यह रकम बहुत ही कम है, लेकिन शुरुआत के लिए ठीक है। पीपीपी मॉडल के जरिए कम से कम 100 स्मार्ट शहर बनाए जाएंगे।

अब आएं कृषि पर। लंबे समय बाद यह ऐसा बजट है जिसमें कृषि पर बहुत ज्यादा जोर है एवं नई सोच भी है। उदाहरण के लिए सॉयल हेल्थ कार्ड मुहैया कराने की स्कीम शुरू  की जाएगी। इसके लिए सौ करोड़ रुपए रखे गए हैं। इससे मिट्टी को किस उर्वरक की आवश्यकता है यह तय होगा एवं सब्सिडी को तार्किक बनाने में भी सुविधा होगी।  56 करोड़ रुपए की लागत से देश भर में मिट्टी जांचने के लिए प्रयोगशालाएं बनवाई जाएंगी। कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए 5000 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। अगर ऐसा होता है तो किसानों के अनाज भंडारण की समस्या सुलझ सकती है। अभी भंडारण की व्यवस्था न होने से किसानों को अपनी फसलों का मन मुताबिक मूल्य नहीं मिल पाता। किसानों के लिए विशेष टीवी चैनल के लिए 100 करोड़ रुपए। इससे किसानों को अद्यतन ही नहीं जो जानकारियां चाहिएं मिल सकतीं हैं। किसानों के लिए समय पर लौटाने के बाद कर्ज पर तीन प्रतिशत ब्याज दरों में छूट रहेगी। पूर्वोत्तर को और्गेनिक खेती का हब बनाने की भी शुरुआत हो गई है। इसके अलावा 8 लाख करोड़ रुपए की कर्ज राशि। 5 लाख सीमांत किसानों के लिए 500 करोड रुपया। किसानों को भी प्रशिक्षण एवं पशपालन की योजना ...आदि अनेक ऐसे कदम है जिनसे कृषि को ताकत मिलेगी।

महंगाई को लेकर बजट की यकीनन प्रतीक्षा थी। पूर्व घोषणा के अनुरुप 500 करोड़ रुपए से मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाया जाएगा। इसस  राज्य सरकारें चाहें तो जरूरी सामान बाजार से खरीदकर उन्हे रियायती दरों पर उपभोक्ताओं को बेचेंगी। उन्हे इस फंड के तहत सब्सिडी दी जाएगी। राष्ट्रीय कॉमन बाजार बनाया जाएगा। सरकारी भी होगा और निजी भी। इससे किसानों को अपना सामान बेचने में भी सुविधा होगी और सामानों के दाम भी तार्किक स्तर पर बने रहेंगे। हालांकि महंगाई घटाने के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है, फिर भी यह एक बेहतर शुरुआत है।

मोदी ने सबसे ज्यादा युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया था। इसलिए बजट में युवाओं के लिए विशेष घोषणाएं स्वाभविक थी। केवल अतिरिक्त आईआईटी या आईआईएम ही नहीं, केवल कृषि विश्वविद्यालय ही नहीं, उनके लिए विशेष कार्यकुलशता विकास, उद्यमिता विकास के साथ उनकी प्रतिभा को उभरने की बात बजट में कही गई है। खासकर खेल के क्षेत्र में बचपन से ही प्रतिभाओं को चयन कर उन्हें प्रशिक्षित करना। उस संस्थान में ही उनके लिए कैरियर काउंसेलिंग। उन्हें यह बताया जाएगा कि उनके लिए कौन सा रोजगार उपयुक्त होगा ताकि वे खेल भी जारी रख सकें। हिमालय क्षेत्र के लिए खेल प्रतियोगिता की शुरुआत बिल्कुल नया कदम है। इससे हम हिमालय क्षेत्र के दूसरे देशों को भी जोड़ सकेंगे और इस क्षेत्र के परंपरागत खेलों का भी विकास होगा। इसका उद्देश्य युवाओं को यह बताना है कि केवल रोजगार और खाना पीना ही जिन्दगी नहीं है।

यह पहलू इस बजट को अन्य अनेक बजटों से अलग करता है। कुल मिलाकर इसे एक बेहतरीन और संतुलित बजट इसे कहा जा सकता है। नमामी गंगा द्वारा उसे स्वच्छ बनाने की सुनिश्चितता, नदी जोड़ांे योजना, जल यातायात की ठोस योजना, विरासत संरक्षण के लिए काम, पुरातत्व की रक्षा, तीर्थक्षेत्रों के विकास पर फोकस आदि ऐसी बातें हैं जो जेटली के बजट को पिछले अनेक बजट से अलग रुप देते हैं। देखना है ये सारी योजनाएं साकार कैसे होतीं हैं।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष - 01122483408, 09811027208

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

08-07-14 to 14-07-2014


PEGE-1


PEGE-2

PEGE-3

PEGE-4



PEGE-5

PEGE-6

PEGE-7

PEGE-8

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/