दिल्ली में खतरनाक
प्रदूषण के कारण राजधानी के सभी स्कूलों के कक्षा 5 तक के बच्चों के स्कूल बंद कर के
ऑन लाइन क्लासेज लेने के लिए सरकार ने फैसला लिया है और बोर्ड क्लासेज के लिए
स्कूल खुले हैं। इस मिली जूली स्थिति से बच्चो के अभिव्यक्ति परेशान है, वे चाहते है कि प्रदूषण रोकने के
लिए सरकार कोई वैकल्पिक व्यवस्था करे और बच्चे स्कूल जाए क्योंकि ऑन लाइन क्लासेज
से बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ता है और इससे बच्चों के स्वास्थ पर बुरा प्रभाव
पड़ता है, वैसे भी मोबाइल या कंप्यूटर की लत ने बच्चों के स्वास्थ को लेकर एक बड़ा चैलेंज
खड़ा हो गया है, मोबाइल के लत के कारण बच्चे अनेक बीमारियों का शिकार हो रहे है। बच्चों द्वारा
अत्यधिक मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर एक रिपोर्ट आई है जो अत्यंत चिंता जनक है। इस
सर्वे के अनुसार 81% माता पिता यह मानते है कि डिनर के समय जो बच्चे फोन बंद कर देते है वो
पेरेंट्स के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं। विवो इंडिया की स्विच ऑफ स्टडी में
यह बात निकल कर सामने आई है। सर्वे में पाया गया है कि 72% माता पिता और 30% बच्चे खाना खाते समय फोन देखना
बातचीत में सबसे बड़ी रुकावट है, जहां बच्चे अपने मनोरंजन के लिए फोन से चिपके रहते हैं वहीं माता पिट्स बार
बार स्टेटस या मैसेज चेक करने के लिया मोबाइल से चिपके रहते हैं और इससे उनके आपस
मे बातचीत का सिल सिला टूटता है।
ऑन लाइन क्लासेज के
साथ साथ, छोटी वीडियो, इंस्ट्राग्राम रील, यू ट्यूब शर्ट्स बच्चों के जीवन में इतनी गहराई से शामिल हो चुके है कि वे अब
पढ़ाई या समय बिताने का साधन नहीं बल्कि बच्चों की सोच, आदतों और व्यवहार को बदल रहे है।
जब बच्चे किताब पढ़ने, होम वर्क करने या किसी और काम पर ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं तो उनका मन
जल्द ही भटकने लगता हैं। लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों में सिर्फ शारीरिक नहीं
बल्कि मानसिक सेहत पर भी असर पड़ता है हाल के अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि
जो बच्चे या किशोर लंबे समय तक स्क्रीन पर आंख लगाए रहते हैं तो उनमें एंजायटी
बेचैनी अकेलापन जैसी समस्याएं आती हैं। नींद खराब होने नींद खराब होने से यह
परेशानी और बढ़ जाती है और जब बच्चा ठीक से सो नहीं पता तो उसकी मन भारी रहता है
और वह वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार हो रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार
ऑटिज्म की बीमारी के मरीजों की संख्या दिन व दिन बढ़ती जा रही है पूरी दुनिया में
इसको लेकर कई शोध किए गए हैं जिससे यह साफ हो गया है कि चार पांच साल के बच्चों
में वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा काफी बढ़ गया है। मोबाइल टीवी और कंप्यूटर जैसे
इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का अत्यधिक प्रयोग से बोलने की बोलने को की बीमारी हो रही है
,आप उन्हें बुलाते रहते हैं पर वे
आपकी बात का जवाब ही नहीं देते आजकल की मॉडर्न लाइफ का सबसे ज्यादा खामियाजा
बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। 1 साल के बच्चे भी फोन, टैब और टीवी के बिना खाना नहीं खाते हैं और उन्हें खाना खिलाने के लिए बच्चों
में मोबाइल का इस्तेमाल बहुत अधिक हो रहा है रिसर्च के अनुसार ज्यादा स्क्रीन टाइम
से बच्चों के न्यूरोलॉजिकल डेवलपमेंट और सोशल डेवलपमेंट पर काफी विपरीत असर पड़ता
है इससे बच्चों में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का भी खतरा रहता है रिसर्च में यह भी
पाया गया है कि जो लोग फोन और टैब ज्यादा देखते हैं उनकी फिजिकल एक्टिविटी कम होती
है उनमें गंभीर ईको कार्डियो ग्राफी बीमारी हो जाती है और भी शारीरिक रूप से कम
एक्टिव हो जाते हैं।
जो बच्चे शारीरिक रूप
से कम एक्टिव होते हैं उनमें कम उम्र में ही मोटापा और टाइप टू डायबिटीज का खतरा
बढ़ जाता है ,साथ ही साथ आजकल के
बच्चे और युवा फोन के कारण समाज से करते जा रहे हैं ,ऐसे में स्कूल द्वारा ऑनलाइन
क्लासेस शुरू करने उनकी परेशानी और बढ़ सकती है क्योंकि बच्चे ही नहीं आज के युवा
भी इस बीमारी से जूझ रहे हैं। आजकल युवाओं में वर्क फ्रॉम होम का फैशन बढ़ गया है
जिसका परिणाम यह है कि यह कार्यालय जाने के बजाय घर से ही सारा काम कंप्यूटर पर
बैठे कर रहे हैं और ऑनलाइन से अपनी जिम्मेदारियां निपटाना चाहते हैं इसी कारण से
युवाओं में हाइपरटेंशन दिल की बीमारी और अन्य बीमारियां हो रही हैं पहले लोगो को
घर से ऑफिस जाने और आफिस से घर आने में यात्रा करनी पड़ती थी जिससे उनकी शारीरिक
एक्टिविटी हो जाती थी पर नई कलर ने सब कुछ समाप्त कर दिया है इसलिए हमें अपने
पुराने पैटर्न पर वापस जाना होगा।
सरकारी कार्यालयों में
एफिशियंसी लाने के लिए मोबाइल और वाट्सअप मैसेज पर अत्यधिक निर्भरता हो गई है,लोगों को व्हाट्सएप पर तुरंत मैसेज
दे दिए जाते हैं कि कब कहां जाना है, इसके बिना किसी पूर्व योजना केये सब किया जाना उनमें डर का माहौल विकसित करता
है,विशेष करके सरकारी
विद्यालय के शिक्षकों को सुबह-सुबह मैसेज आ जाता है कि आज स्कूल जाना है या फिर या
अन्य ड्यूटी पर जाना है इसके कारण अधिकांश टीचर पढ़ने के बजाय अन्य चीजों पर और
डाटा इनफॉरमेशन भरने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और वह स्वयं भी ब्लड प्रेशर हाइपरटेंशन
का शिकार हो रहे हैं क्योंकि वह अत्यधिक व्यस्तता के कारण स्कूल के बच्चों पर पूरा
ध्यान नहीं दे पा रहे हैं और बच्चे भी मानसिक दबाव झेल रहे हैं इसलिए व्हाट्सएप पर
मैसेज भेज रहे भेजनेतया वीडियो कॉल द्वारा उनकी लोकेशन जानने जैसी चीजों को समाप्त
किया जाना चाहिए,जब हमारे कर्मचारी या हमारे बच्चे मानसिक रूप से स्वस्थ ही नहीं रहेंगे तो फिर
इस तकनीक से एफिशिएंसी लाने का प्रयास सफल नहीं होगा बल्कि इसका उल्टा प्रभाव
पड़ेगा।
अत्यधिक मोबाइल के
इस्तेमाल से आपस के रिश्तों में दूरी आ रही है कभी-कभी यह देखा जाता है कि घर के
चार-पांच मेंबर एक जगह बैठे हुए हैं पर कोई किसी से बात नहीं कर रहा है और सब लोग
अपने मोबाइल में व्यस्त हैं और मोबाइल की इस लत के कारण आज पति-पत्नी के रिश्तों में
भी दूरियां बढ़ रही है और भारत में भी अमेरिका व अन्य देशों में न्यायालय में तलाक
के मुकदमे अधिक मात्रा में आ रहे हैं पहले जब कोई विवाद होता था तो पति-पत्नी आपस
में बैठकर या अपने बुजुर्गों के साथ बैठकर विवाद को सुलझा लेते थे लेकिन आज तो वे
मोबाइल में इतना व्यस्त है की पति पत्नी आपस में कभी बात ही नहीं करते शायद उनके
लिए पति-पत्नी के बीच सुंदर पल बिताने से अधिक मोबाइल पर मैसेज, फेस बुक पर शॉर्ट वीडियो देखना
ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है इसलिए मोबाइल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण हमारा
सामाजिक ताना-बाना समाप्त होता जा रहा है क्योंकि घर में कौन आए कौन जाए इस पर
युवा पीढ़ी का ध्यान नहीं रह गया है और अब तो युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग भी इस
लड़का शिकार होना है इसलिए मोबाइल का इस्तेमाल जब तक जरूरी ना हो तब तक अवॉइड किया
जाना चाहिए। यह सच है की सूचना के आदान-प्रदान के लिए एक बहुत बढ़िया साधन हो गया
है लेकिन इसने घर और मन की शांति को भंग कर दिया है।
यह सही है कि मोबाइल
के आने से कई चीजें बहुत आसान हो गई है और तुरंत संपर्क का यह सुलभ साधन हो गया है
पर बच्चों की ऑन लाइन क्लासेज और सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों में हर समय उपयोग के
कारण यह बच्चों और शिक्षकों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को बहुत
बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है और कोई भी वस्तु हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर
डालते हो उससे दूरी बनाना जरूरी है, अब हमें इस समस्या के विषय में सोचना आवश्यक हो गया है और इसलिए ऑन लाइन और
डिजिटल संसाधनों का उपयोग तभी करे जब आवश्यक हो, क्योंकि बच्चों का स्वास्थ हमारे
प्राथमिकता होने चाहिए।
(लेखक
भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
