प्रदीप कुमार केशरी
पिछले डेढ़ महीने से मैं अमेरिका के ओहायो राज्य के मेसन शहर में
अपनी छोटी बहन के पास हूँ। यहाँ रहते हुए कुछ ऐसे अनुभव हुए जिन्होंने मन को गहराई
से छू लिया। कई स्कूली समारोहों में जाने का अवसर मिला जहाँ हाई स्कूल पास करने
वाले बच्चों का सम्मान किया जा रहा था। भारत में इसे हम बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण
करना कहेंगे।
समारोह में बच्चे स्नातक वस्त्र पहने मंच पर आते हैं। माता-पिता की
आँखें भर आती हैं। दादा-दादी दूर-दूर से चलकर आते हैं। घर के बाहर बधाई के बैनर
लगे होते हैं। पार्टियाँ होती हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, और यह खुशी हफ्तों तक बनी
रहती है। यह केवल मेसन जैसे संपन्न शहर की बात नहीं है — पूरे अमेरिका में, चाहे
स्कूल अमीर इलाके में हो या गरीब, सरकारी हो या निजी, यह परंपरा एक समान है। वहाँ
के स्कूल बोर्ड इसे नीति के रूप में मानते हैं कि हर बच्चे की उपलब्धि सार्वजनिक
रूप से सम्मानित होनी चाहिए।
इन समारोहों को देखकर मैं सोचने लगा कि उत्सव केवल धूमधाम नहीं होता
— वह एक संदेश होता है। जब समाज किसी उपलब्धि को उत्सव के योग्य मानता है, तो वह
यह भी बताता है कि उसकी नज़र में क्या मूल्यवान है। अमेरिका का यह उत्सव कह रहा था
— पढ़ाई मायने रखती है, मेहनत मायने रखती है, और तुम्हारी सफलता हम सबकी खुशी है। लेकिन
यहाँ इसे जिस तरह मनाया जाता है, वह देखकर मन में एक सवाल उठा — हम अपने देश में भी ऐसा क्यों नहीं करते हैं?
अब भारत की बात करें - हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। हमारे वैज्ञानिकों ने
अंतरिक्ष में तिरंगा लहराया है। हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, गणितज्ञ और शोधकर्ता देश
और दुनिया को बेहतर बनाने में चुपचाप लगे हुए हैं। लेकिन हम उन्हें कितना याद करते
हैं? कितनी सड़कें किसी वैज्ञानिक के नाम पर हैं? कितने पार्क किसी गणितज्ञ की
स्मृति में बने हैं? कितने स्कूली बच्चे किसी भारतीय शोधकर्ता का नाम जानते हैं?
यहाँ तक कि जिन विश्वविद्यालयों ने नोबेल पुरस्कार विजेता दिए, उन्होंने भी अपने
किसी छात्रावास या गली का नाम उनके सम्मान में रखना ज़रूरी नहीं समझा।
सार्वजनिक जीवन में सम्मान लगभग पूरी तरह राजनीति के इर्द-गिर्द
सिमटा हुआ है। नेताओं के नाम पर हवाई अड्डे हैं, सड़कें हैं, संस्थान हैं।
राजनीतिक नेतृत्व का महत्व निर्विवाद है, लेकिन क्या राष्ट्र केवल नेताओं से बनता
है? जो लोग ज्ञान की नींव रखते हैं, विज्ञान को आगे बढ़ाते हैं, समाज को स्वस्थ और
शिक्षित रखते हैं — उनकी स्मृति कहाँ है?
एक और बात जो मन को कचोटती है। हम भारतीय उत्सव मनाने में किसी से
पीछे नहीं हैं। शादियों में लाखों खर्च होते हैं, जन्मदिन पर बड़े आयोजन होते हैं,
सालगिरह धूमधाम से मनाई जाती है। इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन जब कोई बच्चा अच्छे
अंकों से बारहवीं पास करता है, किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला लेता है,
डॉक्टर या इंजीनियर बनता है — तो उसे मिलती है बस एक बधाई, और वह भी औपचारिक। यह
असंतुलन क्या संदेश देता है? यही कि समाज में रुतबा पढ़ाई से नहीं, दिखावे से
मिलता है।
मेरा अपना अनुभव इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। वर्षों की कठोर
साधना के बाद मैंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पीएचडी की उपाधि
प्राप्त की। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी — वर्षों का अध्ययन, अनगिनत रातें
पढ़ते-लिखते बिताई, अनेक कठिनाइयाँ पार कीं। लेकिन जब डिग्री लेने का दिन आया, तो
मैं कई दफ्तरों के चक्कर काटता रहा और अंत में एक क्लर्क के कमरे से अपना प्रमाण
पत्र उठाकर चला आया। न कोई समारोह, न कोई उत्साह, न कोई सार्वजनिक पहचान। वह पल जो
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था, बिल्कुल खामोशी में गुज़र गया।
यह मैं अपनी व्यथा कहने के लिए नहीं लिख रहा। यह तो बस उस बड़ी
सच्चाई की एक छोटी सी झलक है। जब समाज किसी उपलब्धि को उत्सव के योग्य नहीं समझता,
तो वह अनजाने में उसके महत्व को कम कर देता है। और जब युवा पीढ़ी देखती है कि
ज्ञान और परिश्रम को समाज में वह सम्मान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए, तो उसकी
आकांक्षाएँ भी उसी दिशा में मुड़ जाती हैं जहाँ सम्मान दिखता है।
महान राष्ट्र केवल राजनेताओं से नहीं बनते। वे उन हज़ारों-लाखों
लोगों से बनते हैं जो चुपचाप अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता की साधना करते हैं।
वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक, शोधकर्ता — ये सब भी उतने ही राष्ट्र-निर्माता हैं
जितने कोई नेता।
भारत को अमेरिका की हर बात की नकल नहीं करनी है। हमारी अपनी परंपराएँ
हैं, अपनी संस्कृति है, अपनी पहचान है। लेकिन एक बात सीखने लायक ज़रूर है — जो
समाज ज्ञान को सम्मान देता है, वही समाज आगे बढ़ता है।
तो आइए, शादियाँ भी मनाएँ, त्योहार भी मनाएँ — लेकिन जब घर का कोई
बच्चा स्कूल पास करे, डिग्री हासिल करे, शोध पूरा करे — तो उसे भी उसी उत्साह और
गर्व के साथ सम्मानित करें। पड़ोसी बधाई दें, परिवार जश्न मनाए, समाज उसे अपनी
उपलब्धि माने।
जिस दिन भारत में ज्ञान और परिश्रम का उत्सव उसी धूमधाम से होगा जिस
तरह आज दूसरे आयोजनों का होता है — उस दिन हम सच्चे अर्थों में एक ज्ञान-समाज बनने
की राह पर होंगे।
लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पीएचडी हैं और आई डी
बी आई बैंक के एक ट्रेनिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य के पद से सेवा निवृत हुए हैं।