शनिवार, 7 मार्च 2026

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अवधेश कुमार 

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्लाह अल खामेनेई का मारा जाना 21वीं सदी की ऐसी बड़ी घटना है जिसका प्रभाव कई रूपों में संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा। इस्लामी शासन होने के कारण वे व्यावहारिक रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भूमिका खामेनेई की नीतियों के क्रियान्वयन की रही है।अयातुल्लाह होने के कारण उन्हें विश्व भर के शिया मुसलमान अपने शीर्ष मजहबी नेता के रूप में देखते थे। पाकिस्तान ,ईरान ,भारत सहित कई देशों में शिया मुसलमानों का विरोध सामने है। किंतु यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एक भी पड़ोसी देश ने ईरान का पक्ष नहीं लिया है। हालांकि पिछले वर्ष खामेनेई ने संपूर्ण विश्व के मुसलमानों की एकता का आह्वान किया था। ईरान और उसके बाहर उनके समर्थकों की कल्पना में कभी उनके इस तरह की मौत की बात नहीं आई होगी। हालांकि पिछले वर्ष जून में पहले इजरायल और बाद में अमेरिका के हमले के समय अटकलें लगी थी कि शायद वे देश छोड़कर चले गए। ऐसा हुआ नहीं।

इस घटना की संपूर्ण परिणतियों का स्पष्ट पूर्वावलोकन अभी कठिन है। इतना स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईरान में 1979 से इस्लामी क्रांति का एक दौर तत्काल समाप्त हो गया है।

ऐसा नहीं है कि इस्लामी क्रांति के बाद हुए परिवर्तनों, स्थापित ढांचें, विचारधारायें समाप्त हो गईं हैं पर कम से कम उस रूप में आने वाले लंबे समय तक मुक्त और स्वतंत्र शिया इस्लामी शासन नहीं हो सकता। यह कथन सामान्य क्रांतियों के संदर्भ में है कि क्रांति के शिशु ही क्रांति को खा जाते हैं। ईरान के इस्लामी क्रांति के बारे में भी तत्काल यह निष्कर्ष सही दिखता है। सामान्यतः आम इस्लामी देशों से थोड़ा उदार और खुले जीवन जीने वाले ईरान में 1979 के इस्लामी क्रांति और अयातुल्लाह के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापना संपूर्ण विश्व की दृष्टि से एक नई घटना थी। इसमें केवल ईरान नहीं संपूर्ण अरब और कुछ मायनो में इससे बाहर भी गैर इस्लामी या इस्लाम विरोधी शासनों के अंत और इसके विस्तार का विचार प्रबल था। यहूदी देश इजरायल को इस्लाम का दुश्मन घोषित करते हुए ईरान राष्ट्र का लक्ष्य धरती से उसका नामोनिशान मिटाना हो गया। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को शैतान कहा गया। यह व्यावहारिक तौर पर विश्व में एक इस्लामी विद्रोह की सत्ता का स्वरूप था। सच कहें तो इसी अतिवादी भाव के व्यवहार ने ईरान को उस अवस्था में पहुंचा दिया जहां उसका शांत, स्थिर, सशक्त और सुरक्षित रहना असंभव था। जब आप किसी एक देश के धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करेंगे और उसके अनुसार देश का व्यवहार होगा, बाहर अलग-अलग हिंसक समूह पैदा कर उसकी मदद करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया आपको झेलनी पड़ेगी। आखिर कोई देश ऐसे शासन को कायम रहने देने के पक्ष में क्यों होगा जो उसके अंत को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रहा हो?

इस्लामी क्रांति के साथ 1979 में अमेरिकी दूतावास पर हमले और उसके बाद की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। अमेरिकी कर्मचारियों के हाथ बांध कर बाहर लाया गया, वे बंधक बनाये गये। तब से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की कामना होती थी ईरान से इस्लामी शासन का अंत हो। तत्कालीन ईरानी शासक राजा शाह पहलवी को अपने परिवार और समर्थकों के साथ अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। आज उनके पुत्र रेजा शाह पहलवी और  परिवार अमेरिका में ही है। पिछले लगभग 3 महीने से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों में हमने देखा कि लोग उनकी तस्वीरें लिए वापस आओ के नारे लगा रहे थे। ये लोग अमेरिका से भी हस्तक्षेप की भी मांग कर रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विरोधियों का समर्थन किया,  ईरान को चेतावनी दी पर तत्काल सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। कुछ वक्तव्यों और घटनाओं से लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप इस बार परिणामकारी सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने खामेनेई शासन को चेतावनी दी, न्यूक्लियर कार्यक्रमों को समाप्त करने की शर्तें रखी, ओमान में बातचीत भी आरंभ की किंतु सब रणनीति के तहत था। उसके साथ-ईरान के आसपास अब्राहम लिंकन जैसा सबसे बड़ा नौसैनिक बेरा और अन्य तैयारी होती रही।

दरअसल, 7 अक्टूबर ,2023 को हमास द्वारा उत्सव मना रहे निर्दोष निरपराध यहूदियों पर हमला कर लगभग 1200 लोगों का सरेआम कत्लेआम और बंधक बना लेने की घटना ने पश्चिम एशिया खासकर ईरान इजरायल ,ईरान अमेरिका संबंधों को ऐसे मोड़ पर ला दिया जिसे अयातुल्लाह सहित उनके परिवार के अनेक सदस्यों ,प्रमुख कमांडरों और रक्षा मंत्री आदि की मृत्यु की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। गाजा में हमास , लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुती अयातुल्लाह के ईरान के ही गैर राज्यीय आतंकवादी समूह हैं। उस घटना ने विश्व के हर विवेकशील व्यक्ति और संतुलित राष्ट्रों को अंदर से हिला दिया। हालांकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी मजहबी भाव को देखते हुए मुस्लिम देशों में आम भाव ऐसा नहीं था किंतु ईरान की तरह भूमिका दूसरे की नहीं थी।

इजरायल और अमेरिका का ऑपरेशन तभी से आगे बढ़ने लगा। लेबनान में हिजबुल्लाह  तथा गाजा में हमास को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कार्रवाई आरंभ की। हिजबुल्लाह प्रमुख नजीबुल्लाह और उसके ज्यादातर शीर्ष साथियों की मृत्यु ,उसके केंद्र काफी हद तक नष्ट होने आदि के साथ उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि पहले की तरह संघर्ष नहीं कर सकते थे। गाजा में भी संघर्ष जारी रहा और अपने लोगों को सुरक्षित लाने की विवशता रहते हुए भी इजरायल ने हमास के ढांचे को जितना संभव था अंत करने की कोशिश की। डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आने के बाद कुछ समय के लिए लगा कि शायद इजरायल की उनको लेकर अपेक्षाएं गलत साबित हो सकतीं हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका के शक्तिशाली जीबी 57ए/ बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमोपी  जिसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है, के हमलों में ईरान के तीन महत्वपूर्ण फोर्डो, नतांज और इस्फाहान न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट किया। वस्तुत: अमेरिका और इजराइल क्रमबद्ध तरीके से यहां तक पहुंचे हैं। ईरान पर पिछले एक दशक से ज्यादा के प्रतिबंधों ने उसके तेल व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया और आर्थिक संकट बढ़ता गया। डोनाल्ड ट्रंप ने उन प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के उपाय किए और उनके तेवर ऐसे थे जिसका असर हुआ। इस बीच ईरान रिवॉल्यूशनरी कोर्प्स गार्ड से लेकर प्रमुख रक्षा वैज्ञानिकों आदि की हत्यायें होती रहीं । इजरायल ने भी बीच-बीच में हमले किये। हालांकि पिछले वर्ष ईरान के मिसाइल हमले से इजरायल को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। उसके बाद ज्यादा सशक्त तैयारी का अहसास हुआ और वही किया गया।

आयतुल्लाह के मारे जाने के कुछ घंटे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा किया कि ईरान के बहादुर लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप अपने घरों में रहें ,चारों तरफ हमारे बम गिर रहे हैं और इस शासन से मुक्त कर आपको हम ईरान सौंप देंगे तब भी शायद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को विश्वास नहीं हुआ होगा कि वे जो बोल रहे हैं वही करने की तैयारी से इस बार ईरान में हस्ताक्षेप हुआ है। देख लीजिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीश में ज्यादातर मुस्लिम देश ही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका और इजरायल का पूरा साथ दिया है। ईरान जिस तरह सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत ,क़तर आदि सभी स्थानों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के नाम पर हमले कर रहा है उसके लगता है कि हर देश उसके विरुद्ध थे। वैसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे पहला और लंबा युद्ध इराक के साथ हुआ जो स्वयं शिया बहुल देश है।

अभी भविष्य की स्पष्ट तस्वीर नहीं प्रस्तुत की जा सकती। ईरान के बचे-खुचे कमांडर अपनी शक्ति से संघर्ष करेंगे,  दुनिया भर के शिया अतिवादी समूह अपने स्तर से हिंसा और विरोध करेंगे, लेकिन ईरान के शासन का लंबे समय तक समूचे देश पर नियंत्रण रहना कठिन होगा। ईरान पर कब्जा कर किसी को सत्ता पर बिठाना अमेरिका के लिए कठिन है। बड़ी संख्या में ईरानी भी किसी बाहरी हस्तक्षेप वाले शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खामेनेई की मृत्यु के बाद तत्काल उनके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुई है जो‌ लोगों की प्रतिक्रियाओ में दिख रही है।‌ ईरान में तुर्क, कुर्द, अज़रबैजानी  अलग-अलग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका हौसला बढ़ा है। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाला समूह भी बहुत बड़ी संख्या में है। इसलिए ईरान के एक निश्चित दिशा में पहुंचने के पहले वहां घटनाएं अनेक मोड़ लेंगी और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस्लामी शासन का ऐसा हस्र पूरी दुनिया के इस्लामवादियों के लिए सबक होना चाहिए। जो भी हो 1979 इस्लामी क्रांति के सिद्धांत वाली ऐसी शासन व्यवस्था वहां कायम नहीं रह सकती, जिसका संपूर्ण देश पर प्रभावी नियंत्रण हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

अविश्वास प्रस्ताव बनाम सब्सटेंसिव मोशन

अवधेश कुमार 

भारत की राजनीति ऐसी अवस्था में पहुंची है जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। यह भारत के संसदीय इतिहास की अत्यंत गंभीर स्थिति है जब लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस है तो उसके समानांतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध सब्सटेंसिव मोशन। राहुल गांधी के विरुद्ध सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सब्सटेंसिव मोशन लाने की मांग की है। भाजपा ने पहले राहुल गांधी के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात की थी किंतु लगता है गंभीरता से विमर्श करके सब्सटेंसिव मोशन की पहल की है। सब्सटेंसिव मोशन विशेषाधिकार हनन से ज्यादा गंभीर हो सकता है। सब्सटेंसिव मोशन स्वतंत्र मूल प्रस्ताव है जिसमें सांसद के विरुद्ध स्पष्ट आचरण या निर्णय सामने आता है। इस पर बहस और मतदान होता है तथा पारित होने पर सदन का अधिकारिक रुख और मत प्रकट होता है। यानी संबंधित सांसद का आचरण और चरित्र सांसद के अनुकूल है या नहीं, इन्हें सांसद होना चाहिए या नहीं, इन्हें भविष्य में चुनाव लड़ने देना चाहिए या नहीं आदि आदि।  इसके आधार पर कार्रवाई हो सकती है और सदन की सदस्यता भी जा सकती है? चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की अनुशंसा की जा सकती है। तो इसे कैसे देखा जाए? राहुल गांधी प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस इस पर या प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि हम डरने वाले नहीं है। 24 दिसंबर, 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता कैसे गई थी? एक टेलीविजन चैनल ने  स्टिंग किया और सांसदों पर धन लेकर प्रश्न पूछने का आरोप लगा। सब्सटेंसिव मोशन के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और उन्हें आरोपों के उत्तर का भी अवसर नहीं दिया गया। इसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस की ही थी। 

अविश्वास अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में आना बंद कर दिया है।अविश्वास प्रस्ताव के बाद बहस और परिणाम तक लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते। तो उन्होंने यह निर्णय किया । यही बात सांसद या विपक्ष के नेता पर लागू नहीं होती। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव या सब्सटेंसिव प्रस्ताव स्वीकृत होने के बावजूद संबंधित सदस्य हिस्सा ले सकते हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का समय दिया जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को बहस होने की संभावना है। यह देखना होगा कि सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होता है या नहीं। चूंकि भाजपा नेतृत्व वाले राजग को बहुमत है इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा। यही बात सब्सटेंसिव मोशन के साथ लागू नहीं होता। बहुमत के आधार पर गठबंधन राहुल गांधी के विरुद्ध निश्चित मत और कार्रवाई तक का प्रस्ताव पारित कर सकता है। कांग्रेस के अंदर उनके समर्थकों में इससे कोई परेशानी नहीं दिखाई देती। उल्टे वे यह कहते हुए प्रफुल्ल होते हैं कि एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट कर रहे हैं और वह सब्सटेंसी मोशन पर बहस भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगी। अगर सोच ऐसी हो तो कल्पना की जा सकती है कि राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द के रणनीतिकार किस दिशा में जा रहे हैं। बजट सत्र आरंभ होने के पहले दिन को छोड़कर आरंभ से अंत तक राहुल गांधी सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक चर्चा और बहस के विषय रहे। क्या इसे सही अर्थों में राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारित करना कहेंगे? लोकसभा में विपक्ष के नेता की दृष्टि से इसे बिल्कुल जायज माना जाएगा?  क्या इससे राहुल गांधी अपने राष्ट्रीय दायित्वों की पूर्ति कर रहे हैं?

किसी एक नेता के विरुद्ध कार्रवाई होगी तो लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा हो सकती है और अनेक प्रश्न उठ सकते हैं। दूसरा पक्ष यह है जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अभियान चला उसका क्या? उनकी बेटी के सिविल सर्विस पास होने तक पर प्रश्न उठाने वाले कौन थे?  कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा उनको लिखा गया पत्र देखिए , चरित्रहनन है। और आपने अविश्वास प्रस्ताव तक ला दिया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट घेर कर कांग्रेस की महिला सांसद बैनर लिए खड़ीं थी। माहौल का ध्यान रखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा मैंने उनसे सदन में न आने का अनुरोध किया क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था। एपिस्टन फाइल को लेकर निराधार आरोप क्या चरित्रहनन नहीं है? इस फाइल में किसी का नाम आना उसके पाप में भागीदार का द्योतक नहीं हो सकता। एपिस्टन फाइल की मुख्य चर्चा अवयस्क बालक - बालिकाओं के साथ शर्मनाक यौनाचार के संदर्भ में है। यह जानते हुए कोई उसके संपर्क में है तोउसे दोषी माना जाएगा। जिस तरह राहुल गांधी और उनके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घसीटने की कोशिश कर रहे हैं उसे चरित्र हनन की राजनीति के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। संकेत में यह कहना कि प्रधानमंत्री दबाव में है क्योंकि अभी फाइल में माल बहुत है और अडाणी पर अमेरिका में केस हैं आदि आदि . क्या है?  यही बताने की कोशिश हो रही है कि प्रधानमंत्री का दबाव है और इसीलिए वे देश का सौदा कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष के लिए ऐसी कठिन स्थिति पैदा करने की कोशिश है कि उन्हें फैसला लेने में ही समस्या हो। ओम बिरला यहां व्यक्ति नहीं लोकसभा अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर हैं। हमारा व्यक्तिगत उनसे मतभेद हो सकता है, उनसे नापसंदगी भी होगी, पर पद का सम्मान करने और विश्वास करने का प्राथमिक दायित्व भी नेता और संसद न निभाएं तो इसे क्या कहेंगे? यह सब शर्मनाक है।

 हालांकि राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव ने विश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किया। यह भी एक रणनीति होगी ताकि वे बोल सके कि हमने अध्यक्ष पद की गरिमा का ध्यान रख हस्ताक्षर नहीं किया।आपकी रणनीति हो सकती है कि किसी तरह उन्हें मनोवैज्ञानिक दबाव में रखो और अपना एजेंडासदन के माध्यम से प्रचारित और स्थापित करने की कोशिश करो। जब एक पक्ष सीमा का इस सीमा तक उल्लंघन करता रहेगा तो दूसरे पक्ष से भी प्रत्युत्तर उस रूप में आ सकता है। सांसद निशिकांत दुबे द्वारा प्रस्तुत पुस्तक जिनमें नेहरू परिवार के चरित्र पर प्रश्न खड़े किए गए हैं उसी की प्रतिक्रिया में आया था। आपने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव दिया, प्रधानमंत्री का भी चरित्रहनन किया, देश के प्रति उनकी निष्ठा के विरुद्ध दुष्प्रचार किया तथा अंततः ऐसी स्थिति पैदा की किए हुए राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में भाषण नहीं दे सके तो आपके विरुद्ध भी सब्सटेंसिव मोशन आ गया।  शीर्ष स्तर की राष्ट्रीय राजनीति का इस स्तर पर नहीं पहुंचना चाहिए था जहां प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। आखिर रास्ता क्या है?

 अगर राहुल गांधी के समर्थकों को गलतफहमी है कि चर्चा और बहस का एजेंडा सेट करना है बड़ी उपलब्धि है तो एसआईआर एवं चुनाव आयोग के संदर्भ में भी ऐसी ही स्थिति थी। उन्होंने अपनी ओर से पूरी तैयारी के साथ एसआईआर और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया, बिहार में वोट अधिकार यात्रा की , चुनाव परिणाम आपके सामने है। महाराष्ट्र चुनाव में अडाणी मुद्दा उनके लिए सर्वोपरि था।परिणाम देख लीजिए। लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों का निलंबन तब किया जब वे बेल में जाकर लगातार अध्यक्ष की ओर कागज फेंक रहे थे, कोई आदेश या नियमन नहीं मान रहे थे। सामान्य सभा की भी अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति की ओर चिल्ला- चिल्ला कर कागज फेंका जाएगा तो उनके प्रति गुस्सा ही पैदा होगा और समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सदन संचालन के नियम और परंपरा हैं । इसको हर हाल में रौंदने  को उतारू लोगों के विरुद्ध अध्यक्ष को फैसला करना ही पड़ेगा। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस एक दिन भी सामान्य स्थिति पैदा नहीं होने देने पर उतारू है। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दे पर किसी सत्र में भाषण नहीं दिया। वह एजेंडा लेकर आते हैं और उसे सदन में रखते हैं तथा अध्यक्ष के रोकने पर उन्हें आरोपित करते हैं। इस लोकसभा के पहले हाथों में संविधान की लाल किताब लेकर नारे लगाए गए। क्या यह आचरण उचित था? पहली बार कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा किया। इस तरह की सोच और व्यवहार में कोई लोकतांत्रिक रास्ता निकल नहीं सकता। यह कहना कठिन है कि सब्सटेंसिव मोशन से रास्ता निकल पाएगा। सच कहें तो सदन को तय करना पड़ेगा कि विपक्ष के इस तरह के नेता से कैसे निपटा जाए?  नियम और परंपरा बनाने वालों ने ऐसे विपक्ष के नेता की कल्पना भी नहीं की होगी। आप एक बार रोकेंगे तो दूसरे तरीके से आ जाएंगे। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092 ,मोबाइल -9811027208

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

चुनौतियों का जवाब देने वाला बजट

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक महिला के रूप में और लगातार नौ बजट पेश करके रिकॉर्ड बनाया है। हमारे आपके  लिए महत्वपूर्ण यह है कि उनके द्वारा प्रस्तुत बजट भारत के सभी समूहों की आकांक्षाओं, आंतरिक और बाह्य चुनौतियों व आवश्यकताओं , राजनीतिक मांग एवं नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा देश के घोषित आर्थिक विकास लक्ष्यों की कसौटी पर खरा है या नहीं? पिछले कुछ समय से उत्पन्न वैश्विक उथल-पुथल में भारत को अपनी विकास गति बनाए रखने के साथ नए वैश्विक साझेदारी ,निर्यात बाजार आदि विकसित करने तथा घरेलू उत्पादकों को नीतियों और प्रोत्साहन से समर्थन देने तथा सबके साथ समाज के निचले तबके से लेकर हर समूह की चाहत के बीच सामंजस्य बिठाने की चुनौती है। आर्थिक सर्वेक्षण में साफ कहा गया था कि वैश्विक उथल-पुथल जल्दी समाप्त नहीं होने वाला इसलिए भारत को मैराथन एवं स्प्रिंट दोनों दौड़ लगाने की आवश्यकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज 53.47 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट पेश कर यह संदेश दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार इन चुनौतियों और संकटों को अवसर में बदलने की दृष्टि से काम कर रही है। कोई  लोक लुभावन घोषणा नहीं पूरा फोकस इस बात पर कि इस उथल-पुथल और अनिश्चितताओं के दौर में देश की अर्थव्यवस्था सुरक्षित, मजबूत और स्थिर होने के साथ विस्तारित भी हो, विश्व व्यापार के अनुरूप पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण उत्पादन हो, किशोर और युवा वर्ग को भारत राष्ट्र के लक्ष्य और रोजगार दिलाने के अनुरुप शिक्षा,  रोजगार के अवसर के साथ समाज के सभी समूह के लोगों का जीवन सुरक्षित हो सहज हो तथा आवश्यक सेवाएं सहायक उपलब्ध हों …।

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में तीन कर्त्तव्य के नाम पर लक्ष्य और बजट की सैद्धांतिक आधारभूमि स्पष्ट कर दिया। पहला, उत्‍पादकता और प्रतिस्‍पर्धा बढ़ाने  तथा वैश्विक उथल-पुथल के परिदृश्‍य में लचीलापन लाकर आर्थिक विकास को तेज करना और उसकी गति बनाए रखना। दूसरा, भारत की समृद्धि के पथ में सशक्‍त साझेदार बनाने के लिए लोगों की आकांक्षाएं पूरी करना और उनकी क्षमता बढ़ाना। तथा तीसरा,  सरकार की सबका साथ, सबका विकास के दृष्टिकोण के अनुकूलयह सुनिश्चित करना कि सार्थक भागीदारी के लिए प्रत्‍येक परिवार, समुदाय और क्षेत्र की संसाधनों, सुविधाओं और अवसरों तक पहुंच उपलब्‍ध हो। प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने भाषणों में व्यापक सुधारो का संकेत दिया था। वित्त मंत्री ने कहा कि हम 12 साल से आर्थिक विकास की दिशा में काम कर रहे हैं और आर्थिक सुधार की गाड़ी सही रास्ते पर है, 350 से अधिक सुधार किए हैं और अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए इसकी गति बनाए रखनी पड़ेगी। उन्होंने आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए सात क्षेत्रों में पहल शुरू करने का प्रस्ताव रखा- रणनीतिक और अग्रणी क्षेत्रों में विनिर्माण को तेज करना। दो, विरासत के औद्योगिक क्षेत्रों का कायाकल्प करना। तीन, चैंपियन एमएसएमई का निर्माण करना। चार, आधारभूत संरचना को सशक्त प्रोत्साहन प्रदान करना। पांच, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित करना। सात, शहरों में आर्थिक क्षेत्र विकसित करना…।  आप देखेंगे कि अपनी सैद्धांतिक आधारों और इन प्रक्रियाओं की दृष्टि से बजट में व्यवहारिक साहसिक और विजनरी घोषणायें हैं।

तमाम उथल-पुथल के बीच नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अपने राजकोषीय अनुशासन को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। घोषित लक्ष्यों के अनुरुप राजकोषीय घाटा 4.4% तक सीमित रखना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और इसीलिए इस वर्ष के लिए 4.3% का लक्ष्य घोषित किया गया है। कर राजस्व में थोड़ी कमी है लेकिन ऐसी नहीं जिससे योजनाओं की दृष्टि से आवंटन में समस्याएं आयें। पूंजीगत खर्च जो मुख्ता आधारभूत संरचना पर खर्च होता है के लिए 12 लाख 20 करोड़ का आवंटन सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। यह कुल बजट का लगभग 23% है। यूपीए सरकार में कभी भी पूंजीगत ब्याज 7 – 8% से ज्यादा नहीं गया। यहीं पर सरकार की विचारधारा नीति और दुर्गा में सोच स्पष्ट होता है कि आपका सबसे ज्यादा फोकस किस बात पर है। यानी भारत को हर क्षेत्र में कृषि से लेकर कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, कपड़ा, हस्तकरघा, वाहन, यातायात, सूचना तकनीक…. सभी क्षेत्र की आधारसंरचना इतनी सशक्त और विकास के अनुकूल बना दिया जाए कि आने वाले वर्षों तक इन पर आर्थिक गतिविधियां खिलखिलाती मुस्कुराती तेज गति से बढ़ती रहे।

कुछ और पहलुओं पर नजर दौड़ायें । विनिर्माण, सेवा और कृषि हमारी अर्थव्यवस्था और विकास के मूलाधार हैं। कुशल और दक्ष युवा वर्ग तैयार करना भारत का बड़ा लक्ष्य है,क्योंकि जब हम यूरोपीय संघ और अन्य देशों से मोबिलिटी समझौता करते हैं तो काम करने वालों के क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार हो जाता है। बजट में शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता के नाम से एक स्थायी उच्चाधिकार समिति का गठन होगा जो सेवा क्षेत्र को विकसित भारत का मुख्य चालाक बनने के लिए आवश्यक उपायों की अनुशंसा करेगा।  2047 तक भारत का सेवा क्षेत्र में वैश्विक हिस्सा 10 प्रतिशत तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निश्चित है। यह स्थायी समिति वृद्धि, रोजगार और निर्यात की संभावनाओं को अधिकतम करने वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देगी। आप सोचिए दुनिया भर का जो सेवा क्षेत्र है उसमें हमारा योगदान कम से कम एक दही हो इसकी दृष्टि से ही नहीं भारत दूसरे छात्रों में भी भारत और विश्व की आवश्यकताओं के अनुकूल कुशल कार्यबल तैयार करने का एक स्थायी ढांचा तैयार किया जा रहा है ।उभरती तकनीकों, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, का नौकरियों और स्किल पर प्रभाव आंकेगी और आवश्यक नीतिगत उपाय सुझाएगी। स्वास्थ्य पेशेवर बनाने वाले संस्थानों को अपग्रेड किया जाएगा जिसमें रेडियोलॉजी, एनेस्थीशिया जैसे क्षेत्रों पर फोकस होगा।  अगले पांच वर्ष में एक लाख एएचपी जोड़े जाएंगे तो 1.5 लाख केयर गिवर्स को प्रशिक्षित किया जाएगा।

इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्‍नोलॉजी, मुम्‍बई को 15 हजार माध्‍यमिक विद्यालयों और पांच सौ महाविद्यालयों में ए.वी.जी.सी. कंटेंट क्रिएटर लैब (सी.सी.एल.) स्‍थापित करने में सहायता प्रदान किया जाएगा। आधुनिक समय में औरेंज इकोनामी दृष्टि से स्टोरी टेलिंग को क्रिएटिव आर्ट से मिलाने व गेमिंग, एनीमेशन आदि क्षेत्र का स्किल विकसित किया जाएगा। वैश्विक बायोफॉर्मा निर्माण केन्द्र के रूप में भारत को विकसित करने के लिए कुल 10,000 करोड़ रुपये से बायोफॉर्मा शक्ति की शुरुआत हो रही है जो बायोलॉजिक और बायोसिमिलरों के घरेलू उत्पादन के लिए अगले पांच वर्षों में इको-सिस्टम का निर्माण करेगी। इसकी रणनीति में तीन नए राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईपीईआर) और सात वर्तमान संस्थानों के उन्नयन के साथ बायोफॉर्मा पर केन्द्रित नेटवर्क बनाया जाएगा। यह 1000 मान्यता प्राप्त भारत क्लिनिक जांच स्थलों के एक नेटवर्क का निर्माण करेगा। सेमीकंडक्टर और एआई क्षेत्र में देर से आने के बावजूद अग्रणी देश बनने की दृष्टि से महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। रेयर अर्थ मिनिरल्स अन्य दुर्लभ खनिज संसाधन की संपूर्ण दुनिया में मांग है और चीन 94% बाजार पर हिस्सा रखता है।‌हमें भी जब चाहता है तभी देता है । घरेलू कैपिटल-गुड्स क्षमताएं बनाने और एक स्वतंत्र आपूर्ति श्रृंखला खड़ा करने का लक्ष्य बनाया गया है। इसके लिए ओडिशा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों में दुर्लभ पृथ्वी संसाधनों की खोज, खुदाई और संसाधन की श्रृंखला बनेगी।

विश्व को भारत के मुख्य निर्यात में कपड़े , वस्त्र,  चमड़े आदि के उत्पाद , आभूषण , इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि शामिल होते हैं। विश्व में प्रतिस्पर्धा के अनुरूप टिकाऊ वस्त्र और परिधानों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से वस्त्र कौशल इको-सिस्टम के आधुनिकीकरण और उन्नयन के लिए समर्थ 2.0 कार्यक्रम की शुरुआत हो गई है। इसमें श्रम प्रभावी वस्त्र क्षेत्र के लिए, पांच उपभागों के साथ एकीकृत कार्यक्रम का प्रस्ताव महत्वपूर्ण है। रेशम, ऊन और जूट जैसे प्राकृतिक फाइबर, मानव निर्मित फाइबर और नए युग के फाइबरों में आत्मनिर्भरता के लिए राष्ट्रीय फाइबर योजना है तो मशीनरी, प्रौद्योगिकी उन्नयन ,परीक्षण एवं प्रमाणन केन्द्रों के लिए पूंजीगत सहायता के साथ पारम्परिक क्लस्टरों के आधुनिकीकरण के लिए वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना। बुनकरों एवं कारीगरों की सहायता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम भी शुरू हो गया है। महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल के जरिए खादी, हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट पर केंद्रित करते हुए एक जिला-एक उत्पादन और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले युवाओं को बढ़ावा मिलेगा।  सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्योगों का हमारे विकास व निर्यात में आज भी सर्वाधिक योगदान है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को 10 हजार करोड़ की विकास निधि का प्रस्ताव है जिससे ताकि भविष्य के चैम्पियनों का निर्माण किया जा सके और निर्धारित विशेषताओं के आधार पर उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जा सके। दर्शन मध्यम स्तर के उद्योग सुविधा खोने के दृष्टि से आगे नहीं बढ़ते और इसीलिए यह व्यवस्था की गई है ताकि वह आगे बढ़ें और उनको सुविधायें मिलती रहे।

कृषि के लिए चार आयामों में किसानों की आय बढ़ाना मुख्य है। पहली बार बहुभाषीय एआई टूल 'भारत विस्तार' बनाने का जबरदस्त योजना सामने आई है। इसके अलावा मत्‍स्‍य पालन, पांच सौ जलाशयों और अमृत सरोवरों के विकास, पशुपालन,  उच्‍च मूल्‍य वाली कृषि को प्रोत्‍साहन दिया जाएगा। तटवर्ती इलाकों में नारियल, चंदन, कोको, काजू जैसे उच्‍च मूल्‍य वाली फसलों को प्रोत्साहन देने के लिए हर स्तर की सहायता प्रदान की जाएगी। 2030 तक भारतीय काजू और कोको को प्रीमियम वैश्विक ब्रांड के रूप में बदलने के के लिए समर्पित कार्यक्रम आया है। नारियल उत्‍पादन में प्रतिस्‍पर्धा बढ़ाने के लिए नारियल संवर्धन योजना  बनी है। इससे तमिलनाडु, केरल, आंध्र , तेलंगाना के किसानों के लाभ होगा ।पूर्वोत्‍तर में अगर के पेड़ों और पर्वतीय क्षेत्रो में बादाम, अखरोट और खुमानी जैसे गिरीदार फलों को प्रोत्‍साहन देने की भी समग्र योजना है। पशुपालन कृषि और डेयरी का मुख्य अंग है । इसके लिए घोषित कार्यक्रमों में  20 हजार से अधिक पशु डॉक्‍टरों की उपलब्‍धता योजना है। नि‍जी क्षेत्र में पशु रोग विशेषज्ञ और पैरा पशु शल्‍य महाविद्यालय, पशु अस्‍पताल, नैदानिक प्रयोगशालाओं और प्रजनन सुविधाओं के लिए ऋण संबद्ध पूंजी सब्सिडी सहायता योजना शुरू की गई है।

थल, जल और नभ यातायात में भारत वैसे ही दुनिया के अनेक देशों को पीछे छोड़ चुका है। एक बड़ा फोकस इस समय जल यातायात है। पर्यावरण रूप से टिकाऊ आवाजाही को बढ़ावा देने के लिए  पूर्वी भारत में डानकूनी से पश्चिमी भारत के सूरत को जोड़ने के लिए नए समर्पित माल गलियारे, पांच वर्षों में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों (एनडब्ल्यू) का संचालन ,  जलमार्गों और तटीय पोत परिहवन की हिस्‍सेदारी 6 प्रतिशत से बढाकर वर्ष 2047 तक 12 प्रतिशत करने के लिए तटीय कार्गोनन, सात उच्च-गति रेल कॉरीडोर विकसित करना,  सी-प्‍लेन के स्‍वदेशी निर्माण के लिए प्रोत्‍साहन के लिए योजना आदि । इनके साकार होने के बाद कल्पना करिए कि भारत विश्व स्तरीय यातायात में कहां खड़ा होगा और यह हमारे आम जीवन से लेकर आंतरिक और विदेशी आर्थिक क्रियाकलापों के लिए कितनी बड़ी आधारभूमि होगी।

तो कुल मिलाकर 2047 के विकसित भारत का लक्ष्य पाने और फिर उसके आगे सतत छलांग लगाते रहने की दृष्टि से वर्तमान एवं दूरगामी भविष्य के संभावित आवश्यकता है और चुनौतियों  की दृष्टि से बजट समग्र दृष्टिकोण और योजना प्रस्तुत करती है।

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल -9811027208

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

दिल्ली पुलिस VIPs के साथ-साथ सभी लोगों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध

संवाददाता

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की माननीय मुख्यमंत्री को दिल्ली में Z+ कैटेगरी की सुरक्षा निर्धारित है। तय प्रोटोकॉल के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी में उनकी सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की है और इस बारे में पश्चिम बंगाल पुलिस ने हमें पहले ही बता दिया था। इसके बाद, दिल्ली पुलिस ने चाणक्य पुरी और हेली रोड, दिल्ली स्थित बंग भवन में व्यापक सुरक्षा और कानून व्यवस्था के इंतज़ाम किए। दिल्ली पुलिस सामान्यतः साल भर अलग-अलग सुरक्षा और कानून व्यवस्था की ड्यूटी के लिए CAPF के कर्मियों की भी मदद लेती है और उन्हें भी इन कानून व्यवस्था/सुरक्षा इंतजामों के लिए तैनात किया गया था।

इस सिलसिले में, आज न तो कोई पुलिसकर्मी बंग भवन में घुसा है और न ही वहां रहने वालों की आवाजाही पर कोई रोक लगाई गई है। मिली जानकारी के अनुसार, बताया गया था कि एक राजनीतिक पार्टी के लगभग 150-200 समर्थक पश्थिम बंगाल से आए हैं और दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं, जिसमें साउथ दिल्ली, नई दिल्ली और सेंट्रल दिल्ली इलाकों के गेस्ट हाउस होटल शामिल है। यह भी जानकारी मिली थी कि VVIP और वरिष्ठ नेता इन गेस्ट हाउस होटलों में जाएँगे। उसी के अनुसार इन जगहों पर पर्याप्त तैनाती की गई थी।

चूंकि संसद का बजट सत्र चल रहा है, इसलिए दिल्ली पुलिस संसद परिसर के अंदर और आसपास के साथ-साथ राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में भी पुख्ता सुरक्षा और कानून व्यवस्था के इंतजाम सुनिश्चित करने के लिए उचित एहतियाती कदम उठा रही है। इसे हासिल करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अलग-अलग होटलों और गैस्ट हाउस के साथ-साथ व्यक्तियों की भी नियमित चेकिंग की जाती है। इसके अलावा, हम अलग-अलग स्तरों पर पश्चिम बंगाल पुलिस के साथ लगातार संपर्क में हैं और हमे आधिकारिक या गैर-आधिकारिक तौर पर किसी भी अप्रिय घटना या सुरक्षा में चूक के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।

दिल्ली पुलिस VIPs के साथ-साथ दिल्ली में आने वाले सभी लोगों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने और उचित कानून व्यवस्था के इंतज़ाम करने के लिए प्रतिबद्ध है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का लोकार्पण, कांस्टीट्यूशन क्लब में हुआ भव्य समारोह

संवाददाता 

नई दिल्ली। समसामयिक विषयों की अंतरराष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन व परिचर्चा एवं सहस्त्र-चंद्र-दर्शन कर चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मीनारायण भाला जी के जन्मदिवस पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आपको बता दे चाणक्य वार्ता ने अपने गौरवमय 10 वर्षों का सफर पूरा किया है। पत्रिका मौजूदा समय में भारत की लोकप्रिय पत्रिकाओं में एक मानी जाती है। इस कार्यक्रम में पत्रिका के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन किया गया। इस विशेषांक में 125 लेखकों ने बच्चों को केंद्र में बनाकर लेख, कहानियां, कविताओं के माध्यम से अपना योगदान दिया है। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्याम जाजू ने कहा कि चाणक्य वार्ता अपने आप में एक अद्भुत पत्रिका है। कोरोना काल के दौरान अनेक स्थापित पत्रिकाएं बंद हो गई मगर चाणक्य वार्ता इस कठिन समय में भी लगातार प्रकाशित होती रही। उन्होंने कहा कि इस पत्रिका ने कम संसाधनों में भी लंबा सफर तय किया है। यह दिखाता है कि जनहित से जुड़ी पत्रकारिता करने के लिए बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती है। श्री भाला के विषय में बोलते हुए श्याम जाजू ने कहा कि भाला जी 82 वर्ष की आयु में भी बहुत सक्रिय होकर कार्य कर रहें है।वें युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि भाला जी हमेशा लोगों की मदद करने के लिए आगे रहते हैं।

समारोह अध्यक्ष श्री ताई तागा, संरक्षक, विद्या भारती एवं पूर्व अध्यक्ष भाजपा, अरुणाचल प्रदेश ने इस मौके पर नॉर्थ ईस्ट के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाएं गए कदमों को लेकर कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ने नॉर्थ ईस्ट को बाकी राज्यों के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन राज्यों के लोगों को एक नई पहचान देने का काम किया है। इसके अलावा मोदी सरकार के प्रयासों से नॉर्थ ईस्ट में विकास की गंगा बह रही है। समारोह को संबोधित करते हुए डाॅ. विनोद बब्बर, वरिष्ठ साहित्यकार ने चाणक्य वार्ता को 10 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनाएं प्रदान की। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार एवं संविधान विशेषज्ञ लक्ष्मीनारायण भाला ने अपने संबोधन में कहा कि संघ की शाखा के माध्यम से उनको बच्चों से जुड़ने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि बच्चों से उन्होंने बहुत कुछ सिखा है वह कहते है कि उनको 10 से अधिक भाषाएं आती है यह सब उनको बच्चों के माध्यम से सीखने को मिली है। उन्होंने चाणक्य वार्ता को लेकर कहा कि वह इस पत्रिका के संरक्षक है और उनको गर्व है कि पत्रिका को देश के लाखों लोग अपना आशीर्वाद दे रहे है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि यह पत्रिका सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हो रही है। चाणक्य वार्ता आज जनसाधारण की आवाज बनकर सामने आई है। इस कार्यक्रम में डाॅ. बलराम अग्रवाल, बाल साहित्यकार, अलका सिन्हा, वरिष्ठ साहित्यकार ने भी अपने विचार साझा किए। वहीं इस कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत मृत्युंजय झा, मुख्य संयोजक द्वारा किया गया। स्वागत भाषण द्वारा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अजीत कुमार ने सभी का आभार जताया‌।कार्यक्रम का संचालन डाॅ. अमित जैन, संपादक-चाणक्य वार्ता द्वारा किया गया।

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