मंगलवार, 30 जून 2026

अनाथ बच्चों को मिले मनन जैसी मां

विवेक शुक्ला

भारत के शहरों में हजारों अनाथ बच्चे माता-पिता के बिना सड़कों पर भटकते नजर आते हैं। शोषण, भुखमरी और निराशा उनके साथी बन जाते हैं। भारत में अनाथ बच्चों की संख्या विश्व में सबसे अधिक बताई जाती है। माता-पिता की मृत्यु, परित्याग या पारिवारिक विघटन के कारण ये बच्चे असुरक्षित हो जाते हैं। जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट 2015 और मिशन वात्सल्य  जैसी योजनाएं इन बच्चों के संरक्षण, देखभाल, शिक्षा और पुनर्वास के लिए संस्थागत व गैर-संस्थागत व्यवस्था प्रदान करती हैं। दत्तक ग्रहण नियम 2017 और फोस्टर केयर गाइडलाइंस परिवार-आधारित देखभाल को बढ़ावा देते हैं। फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं-अपर्याप्त फंडिंग, गुणवत्ता नियंत्रण की कमी, संस्थागत देखभाल में भावनात्मक उपेक्षा और पुनर्वास के बाद ट्रैकिंग की कमी। कोविड-19 महामारी ने स्थिति और बिगाड़ी, जिसके लिए पीएम केयर्स  फंड से सहायता दी गई।

अन्य देशों की तुलना में भारत अभी संस्थागत देखभाल पर निर्भर है, जबकि विकसित राष्ट्र परिवार-आधारित मॉडल को प्राथमिकता देते हैं। अमेरिका में फोस्टर केयर सिस्टम प्रमुख है, जिसमें रिश्तेदार देखभाल और छोटे ग्रुप होम्स शामिल हैं। बड़े अनाथालयों को कम किया गया है क्योंकि परिवार-आधारित वातावरण बच्चों के विकास के लिए बेहतर साबित होता है। नॉर्डिक देशों (स्वीडन, नॉर्वे) में मजबूत सामाजिक कल्याण प्रणाली के तहत फोस्टर फैमिली और प्रोफेशनल सपोर्ट उपलब्ध है, जिससे पुनर्वास दर उच्च है।

जयपुर की मनन चतुर्वेदी ने अपनी पूरी जिंदगी इन निराश्रित बच्चों को समर्पित कर दी है। वे इन बच्चों की मां बनकर उन्हें न सिर्फ छत, बल्कि ममता, शिक्षा और सम्मानजनक भविष्य दे रही हैं। उनकी 'सुरमन संस्थान' आज 127 बच्चों का एक स्नेहपूर्ण परिवार बन चुका है।

दरअसल एक सुबह मनन चतुर्वेदी अपनी कार के पास गईं तो टायर के पास एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था। उन्होंने उसे उठाया, छाती से लगाया और उसी क्षण अपना बच्चा मान लिया। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। 1998  में उन्होंने  सुरमन संस्थान की नींव रखी। 'सुरमन' का अर्थ गहरा है- समता, उम्मीद, राह, मन और आह्वान। शुरू में छोटा आश्रय केंद्र आज पूरे परिवार का रूप ले चुका है। यहां अनाथ, परित्यक्त, नशीले पदार्थों के शिकार, यौन शोषण से बचाए गए और समाज द्वारा ठुकराए गए बच्चे रहते हैं। बच्चे उन्हें 'मां' या 'दीदी' कहकर पुकारते हैं। अब तक उन्होंने 750 से अधिक बच्चों को विभिन्न परिवारों में स्थापित किया है।

मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली मनन का जीवन आरामदायक हो सकता था, लेकिन उन्नीस साल की उम्र में एक मौत से जूझ रही अनाथ बच्ची की पीड़ा ने सब बदल दिया। आरंभिक दिनों में धन की कमी, गहने बेचने और किराए के मकान से निकाले जाने जैसी चुनौतियों का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी। आज उनके कई बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और आत्मनिर्भर नागरिक बन चुके हैं। शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

सरकार और समाज की जिम्मेदारियाँ --- भारत में लाखों अनाथ और परित्यक्त बच्चे सड़कों पर भटकते, शोषण के शिकार होते और सपनों से वंचित रह जाते हैं। मनन चतुर्वेदी जैसी समर्पित आत्माएं इन बच्चों को ममता, शिक्षा और भविष्य दे रही हैं, लेकिन इस बाबत सैकड़ों सोशल वर्कर चाहे। इन बच्चों की सुरक्षा, पालन-पोषण और विकास सरकार व समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

सरकार को बाल अधिकार संरक्षण कानूनों का सख्ती से क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, शिक्षा का अधिकार और बाल श्रम निषेध कानूनों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। अनाथ आश्रमों के लिए पर्याप्त बजट, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और कौशल विकास कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाएं। बाल तस्करी, यौन शोषण और सड़क पर रहने वाले बच्चों की गणना व पुनर्वास की प्रक्रिया तेज की जानी चाहिए। गोद लेने की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और तेज बनाना भी जरूरी है।

समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नागरिकों को दान, स्वयंसेवा और जागरूकता के माध्यम से इन बच्चों के साथ खड़े होना चाहिए। कॉर्पोरेट्स को सीएसआर  फंड्स को ऐसे संस्थानों में लगाना चाहिए। पड़ोस, समुदाय और मीडिया को इन बच्चों को अपनाने, उनकी शिक्षा में मदद करने और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने का संकल्प लेना होगा।

भारत के पड़ोसी चीन में राज्य-चालित अनाथालय प्रमुख हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक देखभाल आम है। जापान और दक्षिण कोरिया अभी भी अनाथालयों पर भरोसा करते हैं, हालांकि फोस्टर केयर बढ़ रहा है। ये देश शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर जोर देकर बच्चों को आत्मनिर्भर बनाते हैं।

भारत को सफल अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से सीखकर फोस्टर केयर, किंशिप केयर और समुदाय-आधारित पुनर्वास को मजबूत करना चाहिए। शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक सहायता से इन बच्चों को मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है। समाज और सरकार की संयुक्त जिम्मेदारी से ही ये बच्चे सशक्त नागरिक बन सकेंगे।

'सुरमन संस्थान' इस बात का प्रमाण है कि एक संस्था और एक व्यक्ति कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। लेकिन जब सरकार नीतिगत समर्थन और समाज भावनात्मक व आर्थिक सहयोग देगा, तभी हम एक ऐसा भारत बना पाएंगे जहाँ कोई बच्चा निराश्रित न रहे।

मनन चतुर्वेदी सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक समर्पित चित्रकार भी हैं। उन्होंने वस्त्र डिजाइन का करियर छोड़कर बच्चों की पीड़ा और उम्मीद को कैनवास पर उतारा। उनका कहना है, “मैं कपड़ों को रंगने की बजाय बच्चों की आंखों में रंग भरना चाहती हूं।उन्होंने  72 घंटे की लगातार चित्रकारी का विश्व रिकॉर्ड बनाया। अब वो 30 जून और 1 जुलाई को दिल्ली के कनॉट प्लेस पर 24 घंटे का चित्रकारी आयोजन कर रही हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी उनसे मिलने पहुंचीं। उनकी कूची से बने चित्र बेचकर सारी आय बच्चों की शिक्षा, भोजन और स्वास्थ्य पर खर्च होगी।

आज बाल अधिकारों की चर्चा में मनन चतुर्वेदी जैसे लोग याद दिलाते हैं कि शब्दों से आगे बढ़कर काम करना ही असली सेवा है। भारत को प्रगति की राह पर बढ़ने के लिए ऐसे हजारों समर्पित कार्यकर्ताओं की जरूरत है। सरकार और समाज यदि आर्थिक, नीतिगत और भावनात्मक सहयोग दें तो हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहां कोई बच्चा निराश्रित न रहे। मनन की यात्रा साबित करती है कि करुणा और समर्पण से असंभव भी संभव हो जाता है।

न्यायपालिका और हिंदी -जनता के विश्वास का सेतु

डॉ. मीना शर्मा

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है। लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब जनता को समान अवसर, समान अधिकार और समान न्याय प्राप्त हो। न्यायपालिका इस लोकतांत्रिक ढाँचे की सबसे अहम कड़ी है, क्योंकि यह न केवल संविधान की व्याख्या करती है, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी करती है। न्यायपालिका तभी सार्थक मानी जाएगी जब वह जनता की भाषा और जनता की संवेदना से जुड़ सके।

आज हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या न्याय केवल अंग्रेज़ी भाषा तक सीमित रहे या फिर उसे हिंदी और भारतीय भाषाओं में भी सुलभ बनाया जाए? यह प्रश्न मात्र भाषा का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का प्रश्न है। हिंदी यदि न्यायपालिका की भाषा बनती है तो वह जनता और न्यायालय के बीच विश्वास का सेतु बनेगी।

भारतीय संविधान की धारा 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही अंग्रेज़ी में की जाएगी। स्वतंत्रता के तुरंत बाद यह व्यवस्था इसलिए की गई थी क्योंकि तत्कालीन प्रशासनिक ढाँचा अंग्रेज़ी पर आधारित था और विधिक शिक्षा भी अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध थी। लेकिन यह व्यवस्था अस्थायी होनी चाहिए थी। दुर्भाग्यवश यह अस्थायी प्रावधान स्थायी रूप ले बैठा।

भारतीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है जनता के लिए, जनता द्वारा और जनता का शासन। किंतु यदि न्याय की भाषा ही जनता की समझ से परे होगी तो यह सिद्धांत अधूरा रह जाएगा। न्याय का अधिकार तभी सार्थक है जब न्याय हर नागरिक तक उसकी अपनी भाषा में पहुँचे।

भारत की लगभग 80 प्रतिशत से अधिक आबादी अंग्रेज़ी भाषा में दक्ष नहीं है। गाँव, कस्बे और छोटे नगरों में रहने वाले अधिकांश लोग हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से संवाद करते हैं। जब वही लोग अदालत में जाते हैं तो उन्हें न्यायिक आदेश अंग्रेज़ी में प्राप्त होते हैं। परिणामस्वरूप—उन्हें निर्णय की भाषा समझ नहीं आती। उन्हें अपने ही मुकदमे की बारीकियों को जानने के लिए पूरी तरह वकीलों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह निर्भरता न्यायिक प्रक्रिया को जनता से दूर कर देती है।

इस प्रकार भाषा की दीवार जनता और न्यायपालिका के बीच विश्वास को कमज़ोर करती है।

हिंदी केवल एक संचार का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सोच और भावनाओं की भाषा है। हिंदी न्यायिक कार्यवाही में अपनाई जाए तो न्याय अधिक पारदर्शी, सरल और सुलभ हो सकता है। निर्णय और आदेश हिंदी में उपलब्ध होने पर जनता सीधे उन्हें समझ सकेगी। अपनी भाषा में न्याय मिलने से नागरिकों का भरोसा न्यायपालिका पर और गहरा होगा। अंग्रेज़ी न जानने वाले व्यक्ति को भी वही अधिकार मिलेंगे जो किसी अंग्रेज़ी जानने वाले को प्राप्त हैं।

जब न्याय समान और सुलभ होगा  तो लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होंगी।

वर्तमान स्थिति यह है कि जिला न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों में कार्यवाही प्रायः हिंदी या स्थानीय भाषा में होती है। कई राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान) के उच्च न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग की अनुमति दी गई है किंतु सर्वोच्च न्यायलय में  अभी तक अंग्रेज़ी ही मुख्य भाषा है, किंतु हाल के वर्षों में न्यायिक निर्णयों का अनुवाद हिंदी सहित 22 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाने लगा है। यह स्थिति सुधार की ओर संकेत करती है, परंतु अभी यह पहल आंशिक है और इसे व्यापक बनाने की आवश्यकता है।

इस दिशा में अनेक चुनौतियाँ हैं जैसे विधिक शब्दावली की जटिलता। कानून की भाषा में सटीकता आवश्यक है। हिंदी में एक समान और सर्वमान्य विधिक शब्दावली विकसित करना चुनौतीपूर्ण है। वकीलों और न्यायाधीशों का प्रशिक्षण भी जरूरी है। अधिकतर वकील और न्यायाधीश अपनी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम से प्राप्त करते हैं। अचानक हिंदी में बदलाव उनके लिए कठिनाई उत्पन्न कर सकता है। प्रौद्योगिकी का अभाव भी समस्या उत्पन्न करता है क्योंकि   न्यायालयों में अनुवाद, डिजिटलीकरण और तकनीकी साधनों की पूर्ण उपलब्धता नहीं है। इसी के साथ ही समाज में अब भी यह धारणा है कि अंग्रेज़ी अधिक "प्रतिष्ठित" है। यह मानसिकता हिंदी के प्रयोग में बाधा बनती है।

न्यायपालिका का दायित्व केवल कानून के अनुसार निर्णय देना नहीं, बल्कि जनता के मन में यह विश्वास जगाना भी है कि न्याय हुआ है। जब यह न्याय हिंदी में व्यक्त होगा, तो जनता उसे दिल से स्वीकार करेगी। इससे न्यायपालिका और जनता के बीच दूरी घटेगी। विधिक प्रणाली अधिक लोकतांत्रिक और सहभागितापूर्ण बनेगी। न्याय केवल अभिजात वर्ग तक सीमित न रहकर हर नागरिक तक पहुँचेगा।

न्यायपालिका लोकतंत्र की आत्मा है और हिंदी उसकी अभिव्यक्ति का सहज माध्यम। यदि न्यायपालिका हिंदी और भारतीय भाषाओं को अपनाती है तो यह न केवल भाषा का विस्तार होगा, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का पुनर्सशक्तीकरण भी होगा।

न्याय का अधिकार तभी पूर्ण होगा जब वह जनता की भाषा में होगा। यही जनता और न्यायपालिका के बीच विश्वास का वास्तविक सेतु बनेगा। समय आ गया है कि न्यायपालिका और सरकार मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाएँ, ताकि भारत का लोकतंत्र केवल काग़ज़ पर नहीं, बल्कि जनता की चेतना में भी सशक्त और जीवंत हो।

हिंदी का प्रयोग न्यायिक भाषा के रूप में केवल भाषायी आग्रह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सुदृढ़ता का उपाय है। जब किसान, मजदूर, महिला अथवा ग्रामीण नागरिक अपने मुकदमे का निर्णय अपनी ही भाषा में समझेगा, तभी उसके मन में न्यायपालिका के प्रति आस्था और विश्वास बढ़ेगा। यही विश्वास लोकतंत्र की आधारशिला को मजबूत करेगा।

महादेवी वर्मा ने कहा था – भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, संस्कृति और चेतना की आत्मा है। भाषा का प्रश्न केवल प्रशासनिक या विधिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। हिंदी को न्याय की भाषा बनाने का आग्रह हमारी सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा है।

मैथिलीशरण गुप्त ने भी चेताया था –
हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।

निराला जी ने भी  कहा था- 

हिंदी हमारे हृदय की भाषा है । इसमें हमारे जीवन का स्पंदन है।” 

भारतेंदु जी ने भी हिंदी में ही कामकाज के लिए प्रेरित करते हुए कहा था- 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।।

ये पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि हमें अपनी ही भाषा में प्रगति का मार्ग तलाशना चाहिए। न्यायपालिका यदि हिंदी अपनाती है, तो यह केवल भाषा का नहीं बल्कि आत्मा का उत्थान होगा। न्यायपालिका यदि हिंदी को अपनाती है तो वह न केवल विधिक व्यवस्था को सरल बनाएगी बल्कि जनता की चेतना को भी सम्बल देगी।

हिंदी मात्र स्वर और व्यंजन का संयोग नहीं अपितु हमारे हमारी भावनाओं की संवाहक है। 14 सितंबर 1949 को जब संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था तो यह भी कहा था कि हिंदी न केवल सरकार की भाषा हो बल्कि आम जनता तक सरकार की नीतियों और कानून को पहुंचाने का माध्यम भी बने । मगर लगभग 250 वर्षों की गुलामी हमारी मानसिकता पर भी ऐसी हावी हुई कि आज भी हम विचारों से अंग्रेज ही बनने का प्रयास कर रहे हैं। आज हम हिंदी को अंग्रेजी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा की तुलना में दूसरे दर्जे पर देखते हैं। हालांकि गूगल पर सबसे अधिक खोजी जाने वाली भारतीय भाषा हिंदी ही है। देश में हर पांच में से एक व्यक्ति इंटरनेट को हिंदी में चलाना पसंद करता है। यह आज हमारे देश के जनमानस की भाषा है, व्यापार की भाषा है, रोजगार की भाषा है, उद्गार की भाषा है तो पूर्ण न्याय की भाषा  क्यों नहीं

आज हिंदी को दरकिनार कर अंग्रेज़ी को हम अपना रहे। 

मानो सगी मॉं से नज़रें चुरापड़ोसी हमारे मन भा  रहे।। 

मॉं तो आखिर मॉं है, फिर भी  साथ निभाएगी। 

जब कभी पड़ी मुसीबत, तो हिंदी ही याद आएगी।। 

यह एक सच्चाई है किन्याय जब अपनी जबान में मिले तब ही सुकून आता है दिल को, वरना किताबों के फैसले तो अक्सर पन्नों पर ही रह जाते हैं।यदि अंग्रेजी भाषा में लिखे गए फैसले और तर्क आम आदमी की समझ से परे  ही रहेंगे तो न्याय की पूरी प्रक्रिया एक तरह से बंद दरवाजा बन जाएगी I इसीलिए भारत की प्रादेशिक भाषाओं, विविधताओं को सुरक्षित रखते हुए सबको सम्मान देते हुए, अखिल भारतीय स्तर पर एक राष्ट्र के रूप में भारत को जोड़ने और राष्ट्रभाषा हिंदी की उपस्थिति को दर्ज करने की आवश्यकता है ।

 यह एक निर्विवाद सत्य है कि हिंदी के द्वारा पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है बशर्ते कि दिल से इसके लिए कोशिश की जाए, मात्र औपचारिकता न निभाई जाए। इतने वर्षों से अधूरे पड़े कार्य को एक झटके में पूरा करना संभव नहीं किंतु इस दिशा में प्रयासों को तेज करके मंजिल को पाया जा सकता है जैसे इंडियन पेनल कोड को हटाकर भारतीय न्याय संहिता की स्थापना इस दिशा में एक सराहनीय कदम है। सरकार, शासन, विभिन्न संस्थान इस दिशा में काम तो कर रहे हैं किंतु अभी भी अनेक ऐसे कदम है जिनके उठाए जाने की अपेक्षा है । हमें मिलकर यह प्रयास करना होगा कि हिंदी केवल बोलचाल की भाषा न रहे, बल्कि यह कानून, विज्ञान, तकनीक और प्रशासन की भी भाषा बने।

हिंदी हमारे हृदय की भाषा है, और न्याय समाज की आत्मा। जब हृदय और आत्मा मिलते हैं, तभी एक सशक्त, संवेदनशील और न्यायसंगत समाज की कल्पना साकार होती है। अत: हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करना भाषा का मानवीकरण करना होगा। हिंदी के माध्यम से ही न्याय और जनता के बीच विश्वास का सेतु निर्मित हो सकता है। हमारा संविधान हमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय का अधिकार तो देता है किंतु इन अधिकारों की वास्तविकता तभी स्थापित होती है जब न्याय हर नागरिक की पहुंच में हो और न्याय की भाषा वही हो जो जनमानस की आत्मा में रची बसी हो। यदि न्याय की भाषा आम इंसान की भाषा नहीं तो न्याय अधूरा रह जाता है जैसे दीपक तो हो किंतु तेल न होबारिश तो हो किंतु खेतों की प्यास  मिटाने तक न पहुंचे। इसीलिए लोकतंत्र की आत्मा को मजबूत बनाने का एक ही मार्ग है और वह है सरल हिंदी भाषा में किया जाने वाला न्याय। ऐसा न्याय जो अदालत का दरवाजा खटखटाने  वाला किसान, मजदूर, छात्र, महिला सब आसानी से समझ सकें, उन्हें अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी बात समझ में आए। भाषा की ताकत न्याय, शिक्षा, प्रशासन, जनजीवन को जोड़ने वाला एक मजबूत सेतु है जब सेतु मजबूत होता है तो लोकतंत्र भी मजबूत होता है, न्याय भी सहज होता है और जनता भी सशक्त होती है जैसे कवि दिनकर ने कहा था-सदियों से दबी हुई है जो अबला, जाग उठी है, गरज उठी है।ठीक ऐसे ही भाषा की चेतना भी अब गरजने लगी है कि विदेशी भाषा का वर्चस्व अब कम होना चाहिए और जनता की अपनी भाषा को मान मिलना चाहिए। 

रामधारी सिंह 'दिनकर' के शब्दों में -

सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी.. 

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है…

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो. 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है !

न्याय वही है जो समझ में आए, आत्मा को छू ले। इसीलिए जब अंग्रेजी भाषा में लिखा  फैसला समझ से परे होता  हैं तो न्याय की पूरी प्रक्रिया एक तरह से बंद दरवाजा बन जाती है और जब वही दरवाजा हिंदी में खुलता है तो आम आदमी स्वयं को सहभागी और सशक्त महसूस करता है। अतः लोकतंत्र को प्राणवान बनाने के लिए, आम जनता को न्याय दिलाने के लिए ,उनके बीच कोई दीवार अथवा अवरोध से बचाने के लिए आवश्यक है कि न्यायपालिका की भाषा जनता की ही भाषा हो। जब न्याय जनता की भाषा में मिलेगा, तभी वह सच्चे अर्थों में "न्याय" कहलाएगा। इसी कारण न्यायपालिका और हिंदी के संबंध को "जनता के विश्वास का सेतु" माना जा सकता है।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि न्याय और भाषा का रिश्ता केवल ऐतिहासिक नहीं बल्कि जीवंत और भविष्यनिष्ठ भी है, हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिस तरह प्राचीन पंचायतें स्थानीय बोलियों में निर्णय करती थीं, उसी तरह आज की अदालतों में भी निर्णय जनभाषा में हों, तभी न्याय सुलभ और सार्थक होगा, इसी संदर्भ में कवि दिनकर का यह कथन प्रासंगिक है—जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफ़ान रहेगा,” उसी प्रकार जब तक न्याय की भाषा जनता की भाषा नहीं होगी तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा, इसलिए यह आवश्यक है कि न्याय और भाषा का यह ऐतिहासिक बंधन पुनः जीवंत हो, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ न्याय की आत्मा में समाहित हों और जनमानस यह अनुभव करे कि उसकी बोली ही उसकी रक्षा का साधन है, तभी सच्चे अर्थों में न्याय हर द्वार तक पहुँचेगा और लोकतंत्र अपनी जड़ों में मजबूत होगा, जैसे कवि ने कहा है—सकल जनम सुख करि राखैं, बोली मधुर सुभाष,” वैसी ही मधुरता और सहजता न्याय की भाषा में भी होनी चाहिए, और जब ऐसा होगा तो यह संबंध इतिहास से भविष्य तक एक सशक्त सेतु बन जाएगा।

हिंदी की शक्ति और जनसंपर्क का महत्व इस दृष्टि से और भी बढ़ जाता है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं है बल्कि यह करोड़ों भारतीयों की सोच, भावनाओं और संवाद का जीवंत माध्यम है, यह वह धड़कन है जो गाँव-गाँव, शहर-शहर और जन-जन को जोड़ती है, यह वह सेतु है जो उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक एक अदृश्य डोर में सबको बाँधती है, यही कारण है कि हिंदी भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है और जब हम जनसंपर्क की बात करते हैं तो सबसे पहले हिंदी की शक्ति ही हमारे सामने आती है क्योंकि यही भाषा उस किसान के खेत से जुड़ती है जो अपनी मेहनत की कमाई से देश को अन्न देता है, यही भाषा उस मजदूर की हथेलियों की गंध से जुड़ी है जो ईंट-पत्थरों से शहर खड़ा करता है और यही भाषा उस माँ की लोरी है जो बच्चे को पालना झुलाते हुए सुनाती है I इसीलिए जब कोई नागरिक अपने अधिकारों के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है तो उसकी पहली और सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि उसकी व्यथा उसी भाषा में सुनी जाए जिसे वह हृदय से समझ सके, क्योंकि यदि न्याय की भाषा उसकी अपनी भाषा न हो तो उसका दर्द और अधिक गहरा हो जाता है, इसी को एक शायर ने यूँ कहा है—दर्द वही है जो अल्फ़ाज़ में ढल जाए, वरना ख़ामोशी तो हर शख़्स सहता है,” अर्थात यदि उसकी पीड़ा को उसकी ही बोली में व्यक्त और सुना जाए तभी न्याय का विश्वास उत्पन्न होता है, यही कारण है कि न्यायपालिका में हिंदी का प्रयोग न्याय को अधिक सुलभ, सरल और विश्वासपूर्ण बना सकता है, क्योंकि न्याय का आधार केवल निर्णय नहीं बल्कि वह विश्वास है जो जनता को यह एहसास दिलाता है कि उसकी भाषा में उसकी व्यथा को समझा गया और उसका समाधान हुआ, हिंदी की यही शक्ति है कि यह केवल शब्द नहीं बोलती बल्कि यह दिल की आवाज़ है I इसी संदर्भ में कवि दिनकर का कथन स्मरणीय है—हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, हिंदी हमारी आत्मा है,” यह आत्मा जब न्याय की चौखट पर भी गूँजने लगेगी तो लोकतंत्र और भी गहरा होगा, इसी भाव को तुलसीदास की वाणी में देखा जा सकता है—बोली एक अमोल रस, जो कोई बोले जानि,” अर्थात बोली जब जनमानस की आत्मा से जुड़ती है तब वह अमूल्य हो जाती है, इसी अमूल्य शक्ति का नाम है हिंदी, जो न केवल संवाद की भाषा है बल्कि संपर्क और सशक्तिकरण का माध्यम भी है, हिंदी का यही रूप तब और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब वह न्यायपालिका में प्रवेश करती है, क्योंकि अदालत का दरवाज़ा खटखटाने वाला व्यक्ति केवल कानूनी तर्क नहीं चाहता बल्कि वह यह चाहता है कि उसका दर्द, उसकी पुकार, उसकी बात उसी भाषा में समझी जाए जिसे उसने माँ की गोद से सीखा है और जीवन के हर मोड़ पर बोला है, जब न्याय उसी भाषा में मिलता है तो उसका प्रभाव सीधा दिल तक पहुँचता है, अन्यथा अंग्रेज़ी के भारी-भरकम शब्द उसकी आत्मा को छू नहीं पाते, यही कारण है कि हिंदी को न्याय की भाषा बनाने का संकल्प केवल भाषाई आग्रह नहीं बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा को सजीव करने का संकल्प है, क्योंकि लोकतंत्र तभी सफल होता है जब जनता और शासन के बीच कोई दूरी न रहे और वह दूरी सबसे पहले भाषा की दूरी होती है, यदि हम इसे पाट सके तो न्याय न केवल सुलभ होगा बल्कि वह आत्मीय भी होगा, जैसे कवि ने कहा है—सकल जनम सुख करि राखैं, बोली मधुर सुभाष,” वैसे ही जब न्याय हिंदी की मधुरता और सहजता में ढलकर जनता तक पहुँचेगा तब लोकतंत्र की जड़ें और भी गहरी होंगी, इसलिए हमें  स्मरण करना आवश्यक है कि हिंदी की शक्ति केवल साहित्य और कविता में ही नहीं बल्कि जनसंपर्क और न्याय की दुनिया में भी उतनी ही जीवंत है ।

"हिंदी है भारत की पहचान,
आओ करें इसका सम्मान।
कानून की भाषा बने यह महान,
हर जन तक पहुँचे न्याय का निदान!"

अतः समय की माँग है कि न्यायपालिका की भाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ बनें। इससे न्याय का मार्ग सुगम होगा, जनता और अदालत के बीच की दूरी मिटेगी और "न्यायपालिका और हिंदी" वास्तव में जनता के विश्वास का अटूट सेतु सिद्ध होंगे। यही वह सपना है जो गांधी नेहरू अंबेडकर और दिनकर जैसे महान विभूतियों ने देखा था और जिसे पूरा करना अब हम सब का कर्तव्य है। यदि 140 करोड़ की जनता ठान ले तो क्या नामुमकिन है? क्योंकि सोच से बदलाव मुमकिन है ।

अंधेरा घना सामने खड़ा,

मुमकिन हो तो अंधेरों से बाहर निकल कर तो देखो ,

हो जाएगा यह मंजर आफताब,

जरा खुद को बदल कर तो देखो।

हवाओं के साथ तो बैठे हैं सभी,

जरा हवाओं का रुख बदल कर तो देखो।

                                                            - लेखिका डॉ मीना शर्मा       

                                                               (प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय)

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