सोमवार, 27 अप्रैल 2026

रिकार्ड मतदान के मायने

अवधेश कुमार 

भारतीय चुनाव में जो कभी नहीं हुआ वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अभी तक 92.86 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड हुआ है। तमिलनाडु का भी लगभग 85% मतदान एक रिकॉर्ड है।अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि होगी। पूर्वोत्तर राज्यों में मतदान प्रतिशत औसत से अधिक रहा है किंतु वहां भी केवल 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 91.4% मतदान हुआ था। बंगाल में 2011 से मतदान औसत से ज्यादा रहा। 2011 में 84.5%, 2016 में 82.56% और 2021 में 81.56% मतदान हुआ। वैसे 2010 के बाद से मतदान में वृद्धि देशव्यापी प्रवृत्ति रही है। मतदान अंकगणित का विषय है लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक होती है और उनके मायने राजनीति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम तक जाते हैं। बंगाल का दूसरा चरण अभी बाकी है इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने हुए माहौल का संकेत यही है की मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला और यहीं संकेत भी छिपा हुआ है। 2010 के पहले सामान्य मतदान में वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी या घटकों की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में यह प्रवृत्ति बदल गई। मतदान बढ़ाने के बावजूद सरकारें वापस आती रही और मतदान घटना पर भी कई सरकारें गईं। इसलिए सामान्यत: मतदान का प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने या इसके विपरीत राजनीति परिणाम का निश्चयात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

बंगाल में 2011 में 84.5 प्रतिशत का रिकार्ड मतदान हुआ और वामपंथी मोर्चे की 34 वर्षों की स्थापित सरकार चली गई। उसके बाद मतदान प्रतिशत थोड़ा-थोड़ा घटा किंतु ममता वापस आती रहीं। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान या एसआईआर की प्रक्रिया के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत संतोषजनक होगा। पिछले वर्ष बिहार के चुनाव में 67.25% मतदान हुआ जो 2020 के 57.29 प्रतिशत से 9.96% ज्यादा था। बिहार में लगभग 65 लाख नाम एसआईआर की प्रक्रिया में हटाए गए थे। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं का नाम सूची से हटा।  कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई हुई है और न्यायिक प्राधिकरणों को फैसला करना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई। यह सच नहीं है कि प्रतिशत ज्यादा होते हुए भी कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढी। पिछले चुनाव से लगभग 26 लाख ज्यादा मतदाताओं ने मतदान किया। भारी संख्या में मृतक, दूसरे जगह चले गए या दो जगह नाम वाले या कुछ फर्जी नाम मतदाता सूची में थे और उनके नाम मतदान होते थे जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी। इनके नाम पर कितने वोट डाले गए इसकी गणना कोई नहीं कर सकता। अगर 6.77 करोड़ मतदाताओं के आधार पर पिछला मतदान होता तो मतदाताओं की संख्या कम होती और इस बार वृद्धि बहुत ज्यादा होती। इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

2011 में ममता बनर्जी ने लगभग 5 वर्षों के अनवरत संघर्ष और आक्रामकता से मतदाताओं में वाममोर्चा सरकार के विरुद्ध गुस्सा एवं आलोड़न पैदा किया था। वाम मोर्चा समर्थक भी उनके साथ आये और तृणमूल का अपना भी आधार खड़ा हुआ। जब से भाजपा ने बंगाल में अपनी विचारधारा और राजनीति को जमीन पर उतारने का अभियान चलाया ममता के विरुद्ध समाज के निचले स्तरों पर जबरदस्त आलोड़न है और कुछ महीनो में 2011 पूर्व की स्थिति ममता एवं भाजपा के संदर्भ में उल्टी है। ममता समर्थक और विरोधी तथा भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में स्वयं और अपने मतदाताओं को ज्यादा संख्या में मतदान केन्द्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। 2019 लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम दिखा जब भाजपा ने 40% मत के साथ राज्य 18 सीटें जीत ली। 2018 पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त आलोड़न था और संकेत मिल गया कि भाजपा जमीन पर नीचे तक पहुंची है तथा राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का लगभग सफाया हो चुका है। भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की लहर  भारत में देखा गया है। 2021 में भी भाजपा ने वातावरण बनाने की कोशिश की पर तब तीन सीटों से बहुमत के 148 तक पहुंचना बंगाल के सामाजिक - सांप्रदायिक समीकरणों में कठिन था। इसलिए लगभग 38% मत के साथ हुआ 77 सीटों तक पहुंच पाये। कोरोना महामारी के कारण बनाए गए सरकार विरोधी माहौल का भी थोड़ा असर हुआ। बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा आम लोगों के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। चुनावी रैगिंग या धांधली प्रदेश का स्वाभाविक चरित्र पिछले 60 सालों में बना रहा है। कांग्रेस फिर वाम दल और  तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रवृत्ति को ज्यादा निष्ठुरता से कायम रखा।

इस बार मतदाताओं का बड़ी संख्या में निकलने का एक प्रमुख कारण मतदान और बाद में के लिए दिखता सुरक्षा आश्वासन था। पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 2407 कंपनी, 2193 क्विक रिस्पांस टीम व 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां कुछ कुछ समस्या हो रही थी मतदान के पहले से ही केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे। मतदान के दौरान जहां भी समस्या आई सुरक्षा बल ज्यादातर पहुंचे। इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर के एक भाजपा उम्मीदवार को लोगों द्वारा खदेड़ने और पकड़ कर पिटाई करते वीडियो देखने से अनुमान लग जाता है कि मतदान कैसे भय और आतंक के वातावरण में होता रहा। सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही हिंसा में भी रिकार्ड कमी आई। मतदान बाद निश्चित समय तक केंद्रीय बलों की उपस्थिति के निर्णय ने भी मतदाताओं में सुरक्षा भाव पैदा किया। 2021 उसके पहले 2019 और 2018 तीनों चुनावों में मतदान बाद की हिंसा और लोगों के पलायन से भय का माहौल बना था। चुनाव अभियान के बीच प्रदेश की यात्रा करने वालों को 2026 में माहौल में बदलाव दिख रहा था। मतदाता धीरे -धीरे खुलकर अपना मत प्रकट करने लगे थे। लंबे समय बाद मतदान हत्याविहीन, न्यूनतम हिंसा और निर्भयता के वातावरण में संपन्न हुआ है। निस्संदेह, परिणाम में भी यह दिखाई देगा।

 ममता और समर्थकों की आक्रामकता का जवाब भाजपा ने भी प्रति आक्रामकता से दिया। गृह मंत्री अमित शाह तक के भाषणों में भी आक्रामकता थी ताकि उनके समर्थक मतदाता भयरहित होकर मतदान के लिए निकलें और आक्रमण होतो उसका प्रतिकार करें या सुरक्षा बलों तक सूचना पहुंचाएं। ममता ने अपनी शैली में हमलावर प्रचार किया और यहां तक कहा कि किसी कार्यकर्ता के साथ कार्रवाई होगी तो सरकार उसके साथ खड़ी ही नहीं रहेगी बल्कि कुछ संस्थाओं के मामले में यहां तक कहा कि उसको हम सरकारी नौकरी दे देंगे। पहले भी ममता उन सबकी रक्षा में सामने दिखीं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार या अपराध के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की। इसका असर उनके घोर समर्थकों पर था। देश भर में आम मुसलमान भाजपा के विरुद्ध मतदान करता है और उनकी संख्या कहीं कहीं शत-प्रतिशत तक चली जाती है। बंगाल में उनकी आबादी 29  से 30 प्रतिशत के बीच होगी। वे भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मतदान करने निकले ही होंगे। उसकी प्रतिक्रिया में गैर मुस्लिम समुदाय भी निकले हैं जो टीवी कैमरों पर दिख रहे थे। मुर्शिदाबाद , मालदा, दक्षिण दिनाजपुर आदि जिलों में निकले मतदाता गवाही दे रहे थे कि दोनों पक्षों में करो या मरो का भाव पैदा हो चुका है। जिलों के हिसाब से देखें तो दक्षिण दिनाजपुर में 95.4% , मालदा में 94.43%, मुर्शिदाबाद में 93.58%, उत्तर दिनाजपुर में 94.15%, अलीपुरद्वार में 92.69% , झारग्राम में 92.5%, पश्चिम मेदिनीपुर में 92.118% , बांकुरा में 92.5 0%, पूर्वी मेदिनीपुर में 91.20 प्रतिशत, तथा कूच बिहार में सबसे अधिक 96% मतदान हुआ है। इस दौर में सबसे कम कालिमपोंग में 83.07 प्रतिशत , दार्जिलिंग में 88.80 प्रतिशत, पश्चिम वर्धमान में 90.33% तथा पुरुलिया में 90.91% मतदान हुआ। साफज् है कि जहां एक पक्ष कम रहा वहां मतदान प्रतिशत कम हुआ और दार्जिलिंग, कालिमपोंग आदि इसके उदाहरण हैं।

बंगाल को समझने वाले स्वीकार करेंगे कि तीन लगातार कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान का भी वोट है तथा बदलाव के लिए निकलने वाले मतदाताओं के भी  संख्या है। यह बताने की आवश्यकता नहीं की इन मतदाताओं ने किसके चुनाव चिन्ह पर बटन दबाया होगा। ममता और तृणमूल के राज में सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थी तत्व तथा विरोधियों के विरुद्ध सत्ता व प्रशासन के भयानक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध खासकर संदेशखाली व आरजी कर जैसी महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराध घटनाएं भी सामने है,  दंगों के दौरान प्रशासन की भूमिका, एक समय का संपन्न और उद्योगों तथा कारोबार के मामले में देश के अगुआ राज्य का पीछे होना और संपूर्ण आर्थिक स्थिति पर इसके नकारात्मक असर के कारण भी असंतोष दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इन सबको मुद्दा बनाया। इस तरह रिकार्ड मतदान के पीछे इन समस्त कारकों की सामूहिक भूमिका रही।

वैसे इन 152 सीटों का पिछला अंकगणित देखें तो तृणमूल ने 92 में से 83 पर सीधे भाजपा, पांच पर कांग्रेस और तीन पर माकपा  तथा एक पर भाजपा की सहयोगी और झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आशु को हराया था। ‌इनमें से तीन दांतन,तमलुक और जलपाईगुडी में जीत का अंतर एक हजार से कम और नौ पर एक से पांच हजार का था।‌ कुल मिलाकर इनमें से 23 पर जीत का अंतर 10 हजार से कम था। इनसे ज्यादा एस आई आर में नाम कट गये। एसएआर में औसत प्रतिशत 28, 055 नाम हटे हैं । इस तरह मतदान में वृद्धि का चुनाव परिणाम के संदर्भ में पूर्व आकलन किया जा सकता है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

महिला आरक्षण की फिर वही परिणति क्यों

अवधेश कुमार 

लगभग 12 वर्षों के शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह पहला अवसर है जब कोई विधेयक पारित होने से लोकसभा में वंचित रह गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा किया कि विधेयक के पक्ष में 298 तथा विरोध में 230 मत पड़े। हालांकि सदन के बहुमत में विधायक के पक्ष में वोट डाला किंतु संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण दो तिहाई बहुमत यानी चाहिए था और इसलिए यह पारित नहीं हो सका। यानी कुल 528 लोकसभा सदस्य उपस्थित थे तो 352 सदस्यों का समर्थन चाहिए था वैसे उपस्थिति से 34 ज्यादा सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट डाला। अगर सामान्य विधेयक होता तो पारित हो गया होता। 1996 से महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभा में आरक्षण देने का मामला लटका हुआ है और विरोधी किसी न किसी बहाने इसमें अड़चन डालते आ रहे हैं। किसी का तर्क कुछ भी हो निष्कर्ष यही है वही प्रक्रिया फिर दोहराई गई है। अब इसमें गुणात्मक अंतर यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से 33% महिलाओं के आरक्षण का कानून संसद द्वारा पारित करवा लिया है। इसलिए उसको लागू तो होना है। किंतु अब विधेयक के गिर जाने से 2029 लोकसभा चुनाव में यह लागू नहीं हो सकता। इसके लिए हमें 2034 की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

दरअसल, 2023 के अधिनियम में यह प्रावधान था कि अगली जनगणना और फिर परिसीमन हो जाने के बाद इसे लागू किया जाएगा। तब अनुमान यह था कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 तक पूरी हो चुकी होगी इसलिए  इसे लागू करने में समस्या नहीं होगी। चूंकि यह पूरी नहीं हुई तो नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे संविधान संशोधन के जरिए तत्काल लागू करने का रास्ता चुना। पूरे प्रकरण का कठोर सच यह है कि इन तीनों विधेयकों में ऐसा कुछ नहीं था जिसको आशंका की दृष्टि से देखा जाए और जिसका इस सीमा तक विरोध हो कि काले झंडे और काले बिल्ले तक पार्टियां व सांसद लगा लें।  इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान करता था जिनमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें थीं। दूसरा,परिसीमन विधेयक, 2026 नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान करता था। और तीसरा,केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में महिला आरक्षण लागू करने के लिए था। विपक्ष का मुख्य विरोध पहले विधेयक से था। वस्तुत: संसद का विशेष सत्र आरंभ होने के पहले ही विपक्ष ने अविश्वसनीय रूप से विरोधी रख अपनाकर अपने संसदीय व्यवहार का संकेत दे दिया था। विपक्ष के सभी नेताओं ने, जिनमें महिला सांसद भी शामिल हैं नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन संबंधी विधेयकों का जैसा विरोध किया उसमें साफ हो गया कि इनका पारित होना संभव नहीं है। भाजपा के मंत्रियों ने विपक्ष के नेताओं से बात करनी शुरू की। स्वयं प्रधानमंत्री ने दो पोस्ट से अपील की। इसके पहले वे अपने भाषण में अपील कर चुके थे कि श्रेय आप लोग ले लीजिए लेकिन महिला आरक्षण में बाधा मत बनिए। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं इसके लिए तैयार हूं कि कल आप सबकी तस्वीर समाचार पत्रों में छपवाकर श्रेय दूंगा। लेकिन विपक्ष पहले से मन बनकर बैठा था। उन्होंने अपनी अपील में लिखा कि अपने घर में मां-बहन- बेटी -पत्नी सबको देखिए और उनके अधिकार के लिए विचार कर मतदान करिए।

 निष्पक्ष होकर विवेक, तथ्य और तर्क के साथ विचार करनेवालों का निष्कर्ष है कि पूरा विरोध एकपक्षीय अतिवाद से ग्रस्त रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तो इसे देश विरोधी और देश को बांटने वाला विधायक तक करार दिया। उन्होंने कहा कि ये देश का भूगोल बदलना चाहते हैं जो हम कभी नहीं होने देंगे। इससे अधिक अतिवादी वक्तव्य और कुछ नहीं हो सकता। उनका भाषण भाजपा के वरिष्ठ सांसदों को भी इतना आपत्तिजनक लगा कि राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को लोकसभा अध्यक्ष से अपील करनी पड़ी कि इन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए। राहुल गांधी के भाषण के एक बड़े अंश को असंसदीय करार देकर हटा दिया गया। सदन में विपक्ष के नेता के भाषण के अंशों को असंसदीय श्रेणी में ला दिया जाए इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती। अगर इरादा विधेयक पर बहस कर इसमें उचित संशोधन करना हो तो  आपके भाषण में उससे संबंधित सुझाव होते हैं। सरकार की राजनीतिक आलोचना में समस्या नहीं है। किंतु पूरी बहस सामान्य आलोचना ही नहीं विधेयक के विषय वस्तु से भी काफी दूर चला गया था। प्रश्न उठाया जा रहा था कि आखिर 850 सीटों का आपका आधार क्या है? इसी तरह के दक्षिण के राज्यों को इसमें नजरअंदाज किया जा रहा ? बजट सत्र में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेताओं से बातचीत शुरू की तो बताया होगा कि हर राज्य की 50% लोकसभा एवं विधानसभा की सीटें बढ़ाने का फार्मूला तय हुआ है। सोचा गया कि आज परिसीमन हो तो लोकसभा एवं विधानसभाओं की कितनी सीटें बढ़ सकतीं हैं। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर उत्तर प्रदेश की सीट 80 से 120 हो रही है तो तमिलनाडु की 39 से 59। इसी तरह अन्य राज्यों के भी विवरण दिए गए। हंगामा इस पर भी था कि 2011 की जनगणना को आधार क्यों बनाया गया? गृह मंत्री का उत्तर था कि 2011 की जनगणना का आधार बनाते तो तमिलनाडु की सुट केवल 49 होती। यही सच है।

यहां दो बातें समझने की है।  एक, वर्तमान 543 सीटों में 33% आरक्षण क्यों नहीं दिया गया? 2023 में जब विधेयक पारित हुआ तभी उसमें जनगणना और परिसीमन का प्रावधान था। विपक्ष ने विरोध नहीं किया? 1996 से उसके विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि आपसी बातचीत में नेता बोलते थे कि 543 में से 33% महिलाओं को मिल गया तो अनेक पुरुष नेताओं को घर बैठ जाना पड़ेगा और राजनीति का नाश हो जाएगा। पिछड़ों के आरक्षण आदि का बहाना बनाया गया। तो पुराने अनुभवों का ध्यान रखते हुए मोदी सरकार ने रास्ता निकाला कि 543 सीटें जस की तस रहें और बढ़ी 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होश   सहमति हुई तभी 2023 में कानून बन सका। आज यह तर्क देने वाले अपनी सरकारों में इसके लिए तैयार नहीं थे। 1996 में विरोध करने वाले उस संयुक्त मोर्चा सरकार के साथी थे तो 2008 से 2010 तक विरोध करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथी। इनमें समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और कुछ समय तक जनता दल यूनाइटेड अग्रणी रहे। दूसरे दलों के सांसद भी साथ देते रहे। 

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में महिला आरक्षण विधेयक चलाया किंतु आम सभमति नहीं बन सकी। 2010 में राज्यसभा में भाजपा के समर्थन से विधेयक पारित हुआ किंतु उनके साथी दलों ने विरोध किया और लोकसभा में पारित करना मुश्किल था। इस पृष्ठभूमि को जानने वाले यह प्रश्न नहीं उठाएंगे। दूसरे, हर 10 वर्ष पर संविधान लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों के जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रावधान करता है। 1971 तक नियमित होता रहा। 1976 में आपातकाल के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संशोधन कर 2001 तक लोकसभा एवं विधानसभाओं की सीटें न बढ़ाने का प्रावधान कर दिया। इस कारण 1981 और 91 में परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ। 1976 में लगभग 57.5 करोड़ आबादी थी और आज 140 करोड़ से ऊपर। क्या उस आधार पर आज लोकसभा या विधानसभाओं की सीटें होनी चाहिए? 2001 में वाजपेयी सरकार ने भी परिसीमन आयोग तो बनाया लेकिन केवल क्षेत्र का समायोजन हुआ संख्या नहीं बढ़ाई। हर सरकार इस विषय को स्पर्श करने से घबराती रही, क्योंकि दक्षिणी राज्यों की आबादी उत्तर के अनुपात में कम होने के कारण उनको सीटें कम मिलती और विरोध होता।

मोदी सरकार ने उसी का रास्ता निकाला। थोड़े शब्दों में कहें तो अगर दल वाकई महिला आरक्षण के पक्ष में होते तो विरोध जताते हुए कुछ संशोधन डालकर पारित कर देते। सीटों की संख्या की लिखित गारंटी के प्रश्न पर गृह मंत्री ने कहा कि आप विधेयक पारित करते हैं तो हम नया संशोधन सीटों की संख्या डालकर पेश करने को तैयार हैं। वास्तव में यह कहीं पे निशाना कहीं पे निगाहें वाली बात थी। कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों को दिखाना था कि हम संसद में नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित कर सकते हैं। किसी नेता ने महिलाओं को आरक्षण न मिलने पर अफसोस प्रकट नहीं किया। श इसे लोकतंत्र की विजय बताते हुए नए दौर की शुरुआत बताया जा रहा है। प्रियंका वाड्रा ने इसे ऐतिहासिक दिन जताया। थोड़े शब्दों में कहें तो महिलाओं के आरक्षण पर विरोधियों का जो रुख हमने 1996 से देखा लगभग वही अलग रूपों में फिर संसद में था और इसी की परिणति विधेयक के गिरने के रूप में सामने आई।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल-9811027208


शनिवार, 11 अप्रैल 2026

आंबेडकर जयंती पर विशेष : बाबा साहब डॉ आंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माण के पथ प्रदर्शक

बसंत कुमार

14 अप्रैल 2026 को देशभर में भारत रत्न बाबा साहब डॉ आंबेडकर जी की 136वीं जयंती पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। बाबा साहब भारत की सांसदी इतिहास के इकलौते महापुरुष हैं जिनके 125 में जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा वर्ष  2015 में संसद का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया था और इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने देश के निर्माण में बाबा साहब के योगदान की चर्चा की थी। बाबा साहब के विषय में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण चालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा था कि जब हम विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्रियों की बात करते हैं तो उसे सूची में डॉ अंबेडकर को प्रमुखता से पाते हैं,जब हम प्रमुख कानून विद की बात करते हैं तो डॉक्टर अंबेडकर का नाम सामने आता है,जब हम देश के  संविधान निर्माण की बात करते हैं तोड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन के रूप में  डॉक्टर अंबेडकर की भूमिका प्रमुख रूप से नजर आती है। जब हम देश के वंचित समाज के उत्थान की बात करते हैं तो बाबा साहब आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, साहू जी महाराज आदि समाज सुधारको की श्रेणी में पाए जाते हैं।

मात्र 23 वर्ष की उम्र में डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और उसके पश्चात लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (डी एस सी) की उपाधि प्राप्त की। जिस उपाधि को प्राप्त करने में लोगों को 8 वर्ष का समय लग जाता है डॉक्टर अंबेडकर ने उसे उपाधि को मध्य ढाई वर्ष के परिश्रम से प्राप्त प्राप्त कर लिया था। उनकी शोध "प्रॉब्लम आप रूपी" ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया! उनकी आर्थिक शोधों और विचारों से प्रेरणा लेकर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों और वंचितों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए स्टार्टअप, स्टैंड अप इंडिया,मेक इन इंडिया, जनधन योजना आत्म निर्भर भारत जैसी योजनाओं को मूर्ति रूप दियाऔर आज भारत विश्व की पांचवी अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शीघ्र ही भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लेगा।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने ब्रिटिश काल में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डिप्रेस्ड क्लास के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की अपनी मांग मां वाली वे चाहते तो वंचित वर्ग के समुदाय के लिए एक अलग देश की मांग कर सकते थे पर वह दिल से पक्के राष्ट्रवादी थे और गांधी जी के साथ 1932 में पुणे पैक समझौते के माध्यम से वंचित समुदाय के लिए प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु आरक्षण का प्रावधान करवाया जिसके परिणाम स्वरूप वंचित समाज आज समाज के मुख्य धारा में सम्मिलित हो रहा है और संविधान निर्माण के समय उन्होंने आर्टिकल 3 40 को संविधान में सम्मिलित करवाया जो पिछले वर्गों की स्थित की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान करता है उन्होंने वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के सामने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की वकालत की थी और मंडल आयोग की सिफारिश के लिए एक मजबूत आधार दिया था इसलिए कोई क्या नहीं कर सकता की बाबा साहब अंबेडकर मात्र दलितों के नेता थे बल्कि उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के लिए भी मजबूत आधार दिया।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की प्रतिभा का सम्मान करते हुए ब्रिटिश इंडिया काल में वायसराय काउंसिल के श्रम सदस्य (श्रम मंत्री) के रूप में उन्हें नियुक्त किया गया। वह इस पद पर 1946 42 से लेकर 1946 तक रहे और श्रमिकों का सुधार के लिए अनेक प्रावधान किया श्रमिकों कार्य की अवधि 12 घंटे से हटाकर 8 घंटे करवाई और काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का प्रावधान किया! देश की जल नीति के लिए 1942 में सेंट्रल वोल्टेज वॉटरवेज इरीगेशन और नेवीगेशन आयोग के चेयरमैन के रूप में सूखा मुक्त भारत की नींव रखी। नदियों को आपस में जोड़ने के उनके सुझाव का मध्य प्रदेश की केन और बेतवा नदी के को जोड़ने की परियोजना का वर्ष 2025 में उद्घाटन करके माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ आंबेडकर के सपनों को मूर्ति रूप देने का प्रयास किया।

देश के कानून मंत्री के रूप में डॉक्टर अंबेडकर ने 1931 में हिंदू कोड बिल पेश किया जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के सशक्तिकरण  के लिए पैतृक संपत्ति में उनका उत्तराधिकार था। पर जब कुछ रूढ़िवादी लोगों के कारण लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित न हो सका तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। भारत के इतिहास में डॉक्टर अंबेडकर इकलौते महापुरुष थे जिन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए अपना पद त्याग कर दिया दूसरे शब्दों में महिलाओं के अधिकार के लिए और उनकी शिक्षा के लिए ज्योति बा फुले और साबित्री बाई फूले के मिशन को आगे बढ़ाने का काम किया।

आज हमारा देश संप्रदायवाद की समस्या से जूझ रहा है देश में SIR की आलोचना हो रही हैऔर विपक्षी दलों ने इसको चुनावी मुद्दा बना दिया है जब कि मोदी सरकार अवैध घुसपैठ से देश को मुक्त करना चाहती हैं,पर 1940 की दशक मेंबाबा साहब की पुस्तक "पाकिस्तान एंड पार्टीशन आफ इंडिया" में लिखित बाबा साहब अंबेडकर की बात मान ली गई होती कि देश का  धार्मिक आधार विभाजन न होयदि यह विभाजन अवश्यंभावी ही है तो तो दोनों देशों में जनसंख्या का संपूर्ण स्थानांतरण अर्थात सारे हिंदू भारत में और सारे मुसलमान पाकिस्तान में चले गए होतेऔर यह हो जाता तो आज देश इस गंभीर स्थिति से नहीं गुजर रहा होता। इसके लिए देश के विभाजन की सूरत में जनसंख्या के स्थानांतरण के लिय एक विस्तृत योजना बना ली थी पर प नेहरूऔर जिन्ना ने इस पर अमल नहीं किया और 1947में दोनों ओर से भीषण नर संहार हुआ लेकिन विभाजन के पश्चातभी जो मुसलमान याअल्पसंख्यक भारत में रह गए उनके जीवनकी सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षण के लिए बाबा साहब ने संविधान में प्रावधान किए। जिसके कारण भारत को अपना देश मानने वाले मुसलमान व अल्प संख्यक सम्मान के साथ रह रहे हैं।

संविधान में विवादित अनुच्छेद 370 के पक्ष में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर नहीं थे संविधान निर्माता के रूप में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजो पर उनके डॉक्टर अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला को यह कह कर मना कर दिया कि आप चाहते हैं कि कश्मीर की रक्षा और देश की जनता की कल्याण का जिम्मा भारत उठाए और उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए परंतु नेहरू जी ने डॉ आंबेडकर की असहमति को नजर अंदाज करते हुए इस विवादित अनुच्छेद को संविधान में जुड़वाया परंतु वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प के कारण यह विवादित अनुच्छेद संविधान से हटाया गया और आज कश्मीर देश का हिस्सा बना हुआ है और आज कश्मीर की क्रिकेट टीम रणजी ट्रॉफी चैंपियन है और कश्मीर के अनेक युवा सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होकर देश की मुख्य धारा में शामिल हो रहे है।

बाबा साहब के महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी 125वीं जयंती परवर्ष 2015में आयोजित संसद के विदेश विशेष अधिवेशन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कोई बात कहना चाहती है तो वह डॉक्टर अंबेडकर को कोट (उद्धरित)करती है और सरकार भी अपने समर्थन में कोई बात कहना चाहती है तो वह भी डॉ आंबेडकर की कहिए लिखी बातों को कोट करती है यानि डॉ आंबेडकर पक्ष विपक्ष दोनों को स्वीकार्य हैं और यही डॉ आंबेडकर की महानता और विद्वता का परिचायक है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

देश प्रमुख का सम्मान हम पाश्चात्य से क्यों नहीं सीखते

बसंत कुमार

वर्ष 2014 में एक किताब छपी थी जिसका टाइटल था मोदी नामा, यह पुस्तक मुगल काल में छपी पुस्तक बाबर नामा की तर्ज पर लिखी गई थी जिस प्रकार बाबर नामा में मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर की प्रशंसा की गई थी, उसी प्रकार मोदी नामा की लेखिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बड़ी तारीफ की थी और यहां तक की गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। परंतु कुछ दिन पूर्व उसी लेखिका ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी पर चरित्र हनन के अनेक आरोप लगाए। जबकि यह 2014 से पहले मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात के विकास में उनको कार्यों की बड़ी प्रशंसक रही है परंतु ऐसा क्या है कि मार्च 2026 से प्रधानमंत्री मोदी के चरित्र को लेकर सोशल मीडिया पर इतनी आक्रामक हो गई है।

इसके अतिरिक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता रहेपूर्व मंत्री व राज्यसभा सांसद डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र के बारे में अनाप समाप कहते रहते हैं। यही नहीं डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के बारे में ऐसी बातें कह देते हैं जिसके कल्पना नहीं की जा सकती हैजबकि अटल बिहारी वाजपाई के व्यक्तित्व की प्रशंसा भाजपा के लोग ही नहीं बल्कि विपक्ष में बैठे कांग्रेस के लोग भी करते हैं। अब प्रश्न यह उठना है की सोशल मीडिया पर इस समय देश के प्रधानमंत्री के चरित्र हनन की पुरजोर कोशिश की जा रही है परंतु न तो सरकार और न ही न्यायालय इस मामले में कोई सजान ले रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि देश का प्रधानमंत्री किसी पार्टी का प्रधानमंत्री नहीं है अपितु वह पूरे देश का प्रधानमंत्री है उनसे राजनीतिक विरोध हो सकता है हम उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं पर इस तरह से उनके चरित्र हनन की बात नही की जानी चाहिए।

कुछ वर्षों पूर्व मैंने पूर्व आईएएस अधिकारी और अटल जी की कैबिनेट में वित्त मंत्री का उत्तरदायित्व निभा चुके श्री यशवन्त सिन्हा का एक लेख पढ़ा था जो एक दैनिक में प्रकाशित हुआ था जिसमे उन्होंने लिखा था कि अमेरिका सहित अन्य

पश्चिमी देशों में कभी भी ऐसा नहीं होता कि वहां के लोग अपने देश के प्रधानमंत्रीया राष्ट्रपति कीइस तरह आलोचना करते हैं अपने इस लेख के सपोर्ट में उन्होंने दशकों पहले अमेरिका की इराक पर आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा था इराक द्वारा जैविक परमाणु हथियार रखने केआरोप के आधार पर अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन सरकार पर हमला किया पर वहां कुछ नहीं मिला, लेकिन किसी भी अमेरिकी ने उसे समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की आलोचना नहीं की। इसी प्रकार यूनाइटेड किंगडम में वहां की संसद में किसी सांसद ने महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे थे तो उस सांसद को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी, पर आज हमारे देश में प नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र हनन का फैशन सा चल पड़ा है।

राज गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में और 9 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में चर्चा आयोजित की गई है और सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक वंदे मातरम की याद में साल भर चलने वाले कार्यक्रम की घोषणा की। यह पूरे राज्य के लिए गौरव का विषय था क्योंकि वंदे मातरम सर्वप्रथम1886में कांग्रेस के अधिवेशन में गया गया, लेकिन भाजपा सही सभी पार्टियों ने इस राष्ट्रगीत को सदैव सम्मान दियाऔर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा संसद में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया परंतु इस अवसर पर राज्यसभा सांसद निशिकांत दुबे विपक्ष पर आक्रमण करने में इतने उतावले थे कि इन्होंने इस अवसर पर भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बातें संसद मेंछेड़ दी,

माननीय सांसद यह भूल गए कि भारत के लोकतांत्रिक परंपरा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई के लिए एक दिन देश प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी की थी और वह भविष्य वाडी 4दशक बाद सत्य भी हुई और बांग्लादेश विजय पर अटल बिहारी वाजपेई ने इंदिरागांधी को दुर्गा की उपाधि दी थी और नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में यूनाइटेड नेशन में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया था, इसलिए ऐसे पवित्र मौके पर जहां राष्ट्र की वंदे मातरमऔर बंकिम चंद्र चटर्जी को याद करने की बात हो रही थी वहां पर पंडित नेहरू या श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बात करना हमारे लोकतांत्रिक परंपरा के मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

मधु किश्वर ने वर्ष 2014 में मोदी नामा पुस्तक लिखी और उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदीजी के कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा की यहां तक की गोधरा और अन्य घटनाओं पर उनका बचाव करती रही, ऐसा करते समय उनके मन में कोई न कोई महत्वाकांक्षा रही होगी और उसमें कोई बुराई भी नहीं थी क्योंकि लेखक भी इंसान होता हैऔर उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं और एक पुस्तक लिखने में उसे रात दिन एक करना पड़ता है। मैने भी एक राष्ट्रीय नेता के लिए राष्ट्रवादी कर्मयोगी और हिंदुत्व एक जीवन शैलीजैसी पुस्तके लिखी, जिसके लोकार्पण में भाजपा के शीर्ष पुरुष श्री लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथजी जैसे लोग आए। पर जब ये नेता मोदी सरकार में मंत्री बन गए तो मुझे दूध की मक्खी की तरह बाहर कर दिया गया हो, हो सकता है कि कुछ ऐसा भी मधु किश्वर जी के साथ हुआ हो उन्हें गुस्सा भी आया हो, पर इसके लिए उस नेता का इस तरह से चरित्र हनन करना मेरे विचार में बिल्कुल ही अनुचित है।

बेशक हम विश्व की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के रूप में माने जाते रहे हैं, एक समय ऐसा भी आया जब 1975के आपातकाल के दौरान सभी विपक्ष नेता जेल में ठूंस दिए गए परन्तु तब भी पक्ष विपक्ष के नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर अमर्यादित टिप्पणी नहीं कि। परंतु आज के समय में जिस तरह से नेताओं के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप और उनके चरित्र हनन की घटनाएं बढ़ रही है इन सबके लिए हमें अमेरिका सहित यूरोपीय देशों की परंपराओं को सिखना होगा जहां विरोध होते हुए भी अपने विरोधी नेताओं के ऊपर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए जाते। हमारे यहां तो ऐसे लोग जो बड़े-बड़े उत्तरदायित्व के पदों का निर्वहन कर चुके हैं उनके द्वारा प्रधानमंत्री या अन्य पदों पर रह चुके व्यक्तियों के लिए चरित्र हनन जैसी चीज शुरू कर देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है इससे पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाई जा रही है। सोशल मीडिया पर बेरोक टोक चल रही इस तरह की पोस्ट पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 11वर्षों से देश में सरकार चला रहे हैं और इस कार्यकाल में उनकी सरकार की अनेक उपलब्धियां रही है और यह भी संभव है कि इतने लंबे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो पर इन सब के लिए उनकी आलोचना यदि संसद के अंदर और बाहर हो तो वह स्वागत योग्य है परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के न पूरा होने के कारण डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और मधु किश्वर जैसे लोगों द्वारा चरित्र हनन किया जाना न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री का अपमान है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपमान है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

शिक्षा के नाम पर धंधा : कब तक चलेगी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी?

विकास खितौलिया

भारत में शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की रीढ़ माना गया है। “विद्या दान” को सबसे बड़ा दान कहा गया है, लेकिन आज के दौर में यही शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। खासकर महानगरों में प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और फीस की बेतहाशा वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राजधानी दिल्ली में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है, जहां शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि मुनाफे का साधन बनती दिखाई दे रही है। हाल ही में कुछ न्यूज चैनलों ने खासकर जी न्यूज ने अपने कई कार्यक्रमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और प्राइवेट स्कूलों की इस “कालाबाजारी” पर सवाल खड़े किए हैं। यह सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर है। दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूल पिछले साल से फीस में भारी बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह बढ़ोतरी किसी एक या दो प्रतिशत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार 15% से 30% तक पहुंच जाती है। इससे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि उसकी पारदर्शिता की भी है। स्कूल प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं करते कि आखिर किन आधारों पर फीस बढ़ाई जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों को बिना किसी पूर्व सूचना के बढ़ी हुई फीस का नोटिस थमा दिया जाता है। अगर कोई विरोध करता है, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।

फीस के अलावा स्पेशल एक्टिविटी, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। कई प्राइवेट स्कूलों ने खास दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का नियम बना रखा है। इन दुकानों पर किताबों के दाम बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जो किताबें  सामान्य बाजार में 2000 रुपये में मिल सकती हैं, वही स्कूल में उपस्थित दुकानों पर 7000-8000 रुपये में बेची जाती हैं। यही हाल यूनिफॉर्म का भी है। अन्य पब्लिशर द्वारा छपवाई गई किताबों में अक्सर प्रिंटिंग में बहुत सी त्रुटि भी पाई जाती है । यह एक तरह का “टाई-अप” होता है, जिसमें स्कूल और दुकानदार दोनों को फायदा होता है, लेकिन नुकसान सिर्फ अभिभावकों का होता है। स्कूल द्वारा जारी अनिवार्यता सर्कुलर के कारण मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल में उपस्थित दुकानों से ही खरीदनी पड़ती है। स्पेशल एक्टिविटी की बात तो पूछो ही मत कोई बच्चा यदि स्पोर्ट्स एक्टिविटी में अच्छा है, सही मार्गदर्शन मिले तो देश, अपने माता-पिता का नाम रोशन तो करेगा ही साथ में स्कूल का नाम रोशन होता है। पर स्कूल इस कौशल, प्रतिभा को दरकिनार करते हुए स्पेशल एक्टिविटी के नाम 5000 से 10 हजार ले लेता है । अभिभावकों पर फीस, किताबों का आर्थिक बोझ तो पहले से ही होता है उसके बाद स्पेशल एक्टिविटी के नाम पर और फीस । इसलिए देश में लाखों बच्चे स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी से दूर हो जाते है और तो और देशभर में कई निजी स्कूलों द्वारा हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फंक्शन, कार्निवल, डांडिया डांस और अन्य अलग-अलग शुल्क के नाम पर हजारों रुपये वसूले किए जाते हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या प्राइवेट स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ एक व्यवसाय चला रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना और समाज को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कई स्कूलों में एडमिशन के समय “डोनेशन” या “कैपिटेशन फीस” के नाम पर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं। यह पूरी तरह से अवैध होने के बावजूद खुलेआम चल रहा है। अभिभावक मजबूरी में इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है।

दिल्ली सरकार ने समय-समय पर प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने के लिए कई नियम बनाए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता। स्कूल प्रबंधन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी मनमानी जारी रखते हैं। फीस रेगुलेशन कमेटी जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यवाही अक्सर धीमी और सीमित होती है। जब तक कोई ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्कूलों पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसी वर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साकेत के एपीजे स्कूल ने फीस बढ़ोतरी के चलते कुछ बच्चों के बोर्ड परीक्षा के रोल नम्बर रोक दिए थे, जब यह नेशनल न्यूज बनी तो एग्जाम के एक दिन पूर्व रात्रि में बच्चों को रोल दिए थे । तो वहीं डीपीएस, सालवान आदि प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले उठ रहे है । शिक्षा क्षेत्र में दिल्ली की पिछली सरकार ने अच्छे कदम उठाए थे। कई वर्षों तक स्कूल अपनी मनमानी नहीं कर पाए थे । इस पूरे प्रकारण में सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों को झेलनी पड़ रही है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों को बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसके अलावा, अगर कोई अभिभावक स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं उसके बच्चे को नुकसान न उठाना पड़े। यह डर भी स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देता है।

इस पूरे मुद्दे को सामने लाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है। जब बड़े प्लेटफॉर्म इस विषय को उठाते हैं, तो सरकार और प्रशासन पर दबाव बनता है। हाल ही में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि शायद अब कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन सिर्फ खबर दिखाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को लगातार निगरानी और जन दबाव जरूरी है। वैसे इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं । पर सरकार की नीयत साफ हो । सरकार को फीस वृद्धि पर स्पष्ट और सख्त नियम बनाने होंगे और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। स्कूलों को अपनी आय और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में स्कूलों के एकाधिकार को खत्म करना होगा। स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए ताकि फैसलों में संतुलन बना रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। इन्हीं विषयों पर पिछले साल दिल्ली सरकार एक बिल भी लाई थी, लोगों ने खूब मिटाई भी बाटी और खुशियां बनाई थी । बिल को ताक पर रखते हुए, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी चालू है। सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कोर्ट में जाना चाहिए, और प्रमाणिता के साथ अभिभावकों का पक्ष रखे।

अंततः शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है, और अगर यही नींव कमजोर हो जाए या व्यापार का साधन बन जाए, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। यह सवाल आज हर अभिभावक के मन में है कि शिक्षा के नाम पर यह धंधा आखिर कब तक चलेगा? जब तक सरकार, समाज और अभिभावक मिलकर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक यह स्थिति बदलना मुश्किल है। शिक्षा को फिर से सेवा बनाना होगा, न कि मुनाफे का जरिया। तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

9818270202

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/