गुरुवार, 19 मार्च 2026

संवैधानिक मर्यादा का खुलेआम अतिक्रमण

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?

राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें।  उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति  मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।

 अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में  संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था।  क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते।  राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है।  उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं?  क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था।‌ पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी‌ भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 ,मोबाइल -98110 27208

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

नीतीश की विदाई के मायने

अवधेश कुमार

नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना ऐसी घटना है जिस पर लंबे समय तक चर्चा होगी। राजनीति के छात्र भविष्य में इस पर शोध भी करेंगे । भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सत्ता शीर्ष पर बने रहने के बाद जब भी कोई स्वयं निवृत होने का फैसला करेगा या नहीं करेगा तब - तब इसे उदाहरण के रूप में पेश किया जाएगा। हमारी राजनीति, मीडिया और बौद्धिक जगत में संदेह का मनोविज्ञान इतना हावी है कि ऐसे किसी कदम को सहज स्वाभाविक स्वीकार नहीं किया जा सकता। विरोधी इसमें षड्यंत्र देख रहे हैं तो इसका उत्तर राजनीति और समाज के चरित्र में है। अपने व्यक्तित्व या अभी तक की घटनाओं के संदर्भ में देखते हैं तो यही निष्कर्ष आएगा। चूंकि भारतीय राजनीति में इस तरह के उदाहरण नहीं है, इसलिए यह असामान्य घटना लगती है। लगभग दो दशक प्रदेश का प्रत्यक्ष नेतृत्व करने के बाद इस निर्णय को सहज स्वीकार करना आसान नहीं होता। उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक वर्ग में भावनात्मक उबाल भी है। कुछ समय बाद धीरे-धीरे यह समाप्त हो जाएगा। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना पाखंड है कि कल तक जो लोग नीतीश कुमार को मानसिक रूप से असंतुलित होने की बात कर वीडियो वायरल करा रहे थे , बयान दे रहे थे वे भी इसमें भाजपा का षड्यंत्र देख रहे हैं। याद करिए जब एक मुस्लिम लड़की को नियुक्ति पत्र सौंपते समय उन्होंने अभिभावकीय भाव में हिजाब पड़कर यह कहते हुए कि क्या लगाई हो हटाओ खींचने की कोशिश की तो कितना बड़ा मुद्दा बनाया गया? वे भी नीतीश के नाम पर छाती पीट रहे। क्या हम राजनीति में ऐसी ही प्रवृत्ति चाहते हैं जहां कोई कभी अपने तरीके से सत्ता शीर्ष से निवृत होने का कदम उठाये ही नहीं? या उन्हें इसके लिए सम्मानपूर्वक तैयार करने की कोशिश नहीं हो? आप चाहते हैं कि ऐसा हो तो इसे सकारात्मक दृष्टि से देखिए।

ऐसी घटना के पीछे निश्चित रूप से कुछ कारण और बड़े प्रयास भी होंगे। अंततः परिणति ही मुख्य अर्थ रखती है। यह कहना कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनना चाहती थी इसलिए उन्हें हटा दिया गया नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को देखते हुए स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी टिप्पणी करने वाले नीतीश कुमार को दुर्बल या खोखला व्यक्तित्व साबित कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा हो सकती है किंतु इसके लिए नीतीश को जबरन हटाकर गठबंधन में विपरीत संकेत देंगे यह मानने का कोई कारण नहीं है। लोकसभा में भाजपा को बहुमत नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार जदयू और तेलुगू देशम की बदौलत चल रही है।भाजपा नेतृत्व क्या किसी नेता, उनके सहयोगियों या पार्टी से दुर्व्यवहार करने का जोखिम उठायेगी? आम दुष्प्रचार के विपरीत भाजपा अपने गठबंधन के साथियों को सम्मान देती है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना उद्धव ठाकरे को नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने भाजपा को छोड़ा। नीतीश कुमार को कभी भाजपा ने नहीं छोड़ा उन्होंने ही पाला बदल किया लेकिन जब वापस आए तो सरकार चलाने एवं निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता रही। 2020 में भाजपा को जद यू से ज्यादा सीटें थीं फिर भी मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया। नीतीश पर दबाव डालकर ऐसा कराया जा सकता है यह उनके चरित्र के साथ मेल नहीं खाता। नीतीश कुमार ने जब चाहा भाजपा को छोड़ा और फिर अपनी इच्छा से राजद छोड़ भाजपा के साथ आये। तो फिर?

उन्होंने एक्स पर लिखा है कि संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूँ। कहां जा रहा है कि कारण कुछ और है, यह स्क्रिप्ट औरों ने लिखकर उनकी विदाई का झूठा आधार प्रस्तुत किया है। ऐसा क्या कारण हो सकता है जिसके लिए नीतीश को झूठ बोलना पड़े? प्रत्यक्ष कोई कारण नजर नहीं आता। क्या यह संभव है कि भाजपा नीतीश को दबाव में लाकर मुख्यमंत्री पद से हटने के लिए मजबूर करे और वे इसे सहन कर जाएं? किसी को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की इच्छा हो और उसे जबरन हटाने की कोशिश होगी तो वह सरकार गिरा देगा। जिस सरकार का मुखिया नहीं हो उसे बनाए रखने में क्या रुचि हो सकती है। तो यह तर्क गले नहीं उतरता। मान लीजिए उन्होंने राज्यसभा को विदाई का बहाना बनाया तो इससे साबित नहीं होता कि किसी दबाव में थे। पिछली बार जब वह राजद के साथ गए थे तो तेजस्वी यादव के सामने घोषणा किया था कि अब अब हम आगे बहुत दिन नहीं रहेंगे और यही लोग आगे बढ़ाएंगे। अपने साथियों से बोलते थे कि अब हम मुख्यमंत्री पद से अलग होना चाहते हैं।

यह बात सही है कि पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार के व्यवहार, वचन और भाव में अस्वाभाविकता, असहजता और असंतुलन प्रदर्शित होता था। इन कारणों सेसमस्याएं आतीं थीं और दोनों पार्टी के नेताओं को हैंडल करना पड़ता था। इसलिए संभव है उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने की कोशिश हुई होगी। मुख्य बात निर्णय और उसके समय का है

सही समय पर लिए गए या कराए गए निर्णय का भी महत्व होता है और यह कई बार इतिहास के लिए उदाहरण भी बन जाता है। नीतीश कुमार के लिए इससे उपयुक्त अवसर सत्ता शीर्ष से अलग होकर तत्काल सक्रिय रहने का क्या हो सकता है? उनके नेतृत्व में गठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता मे है, राजनीतिक स्थिरता है, उनके विरुद्ध असंतोष का भाव नहीं है, विकास की गाड़ी पटरी पर है और‌सक्रिय रहने के लिए राज्यसभाकी सदस्यता है। शायद वे सीधे निवृत्ति की घोषणा करते तो विरोध ज्यादा उग्र और हिंसक हो सकता था। तो समर्थकों को समझाने के लिए उनके पास राज्यसभा में जाने की इच्छा का एक आधार है।

सच कह तो यह अवसर नीतीश कुमार के संपूर्ण राजनीतिक जीवन,  उनके योगदान आदि का निष्पक्ष मूल्यांकन का है। बिहार का नेतृत्व भाजपा के समर्थन से उन्होंने तब संभाल जब प्रदेश गहरे निराशा, हताशा और अवसाद से ग्रस्त था। बिहार में कुछ हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं थी। भारत और उसके बाहर बिहार कुशासन, अविकास, सामाजिक जातीय तनाव, नेताओं के भ्रष्टाचार का शर्मनाक उदाहरण बन गया था। बिहार शब्द गाली हो गई थी और स्वयं को बिहारी कहने में लोग शर्म महसूस करते थे। नीतीश के नेतृत्व में जनता दल यू और भाजपा ने बिहार में न केवल आशा,  उम्मीद और उत्साह पैदा किया बल्कि कानून और व्यवस्था पुनर्स्थापित कर प्रदेश को विकास के रास्ते सरपट दौड़ा दिया। पिछले लंबे समय से इसका विकास दर शीर्ष राज्यों के समान या कई बार आगे रहा है। लेकिन ध्वस्त हो चुके प्रदेश को वहां तक ले जाना आसान नहीं है। हालांकि उन्होंने लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय विभाजन और टकराव बनाए रखना एवं सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम परस्त नीति की काट के लिए पिछड़ों में अति पिछड़े, दलित में महा दलित , मुसलमान में पसमांदा आदि समूह खड़े किए और इससे जातिवाद दूसरे रूप में मजबूत हुआ। 

किंतु उनके कल में किसी तरह का जाति संघर्ष नहीं होना भी सच्चाई है। दूसरे, लड़कियों और महिलाओं को मुख्य धारा में लाने के कदम उनके दूरदर्शी विजन और लैंगिक समानता के प्रति सच्ची प्रप्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। जहां लड़कियां डर से स्कूल कॉलेज जाने से बचती थी वहां सीमित संसाधनों में उनके लिए साइकिल, वस्त्र, पुस्तकों और प्रोत्साहित करने के लिए वजीफे आदि की व्यवस्था ने चमत्कार कर दिया। हालांकि इन सबके पीछे भाजपा की भी भूमिका थी किंतु आज जब हम उनका मूल्यांकन करते हैं तो ये सब उनके योगदान में जुड़ेंगे। महिलाओं को स्थानीय निकाय में 33% आरक्षण की सामाजिक वर्णक्रम बदलने में ऐतिहासिक भूमिका थी। अगर कुछ निहित स्वार्थी बुद्धिजीवियोंऔर समर्थकों के प्रभाव में आकर सेकुलरिज्म के नाम पर उन्होंने 2013 में तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्धअतिवादी रवैया अपनाते हुए गठबंधन नहीं तोड़ा होता, राजद के साथ नहीं गए होते तो उनके ऐतिहासिक योगदान निर्दोष होते। 2010 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव का संपूर्ण परिवार पराजित हो गया था, पार्टी न्यूनतम वोट और सीटों पर आ गई थी। इसके अंत के साथ बिहार में विपक्ष की नई राजनीति के उभरने की संभावना थी। उन्होंने 2015 में साथ चुनाव लड़कर राजद को जीवन दान दिया। इस भूल के लिए उन्हें पश्चाताप होगा।‌ पर उन पर किसी तरह के वित्तीय भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि का आरोप नहीं लगा और यही सच्चाई है। उनके पुत्र इतने समय बाद राजनीति में आ रहे हैं तो इसे परिवारवाद को बढ़ावा देना नहीं कह सकते। सत्ता शीर्ष से स्वयं को अलग करने के कदम पर ऐसे व्यक्ति का अभिनंदन होना चाहिए , इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भाजपा नेतृत्व एवं जदयू के वरिष्ठ नेताओं की भी सराहना होनी चाहिए कि उन्हें इसके लिए उचित व सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराया। इसे राजनीति मेंश्रएक प्रवृत्ति स्थापना मान लें तो लोकतंत्र की दृष्टि से इसका संदेश मंगलकारी होगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली - 110092,  मोबाइल- 98110 27208

शनिवार, 7 मार्च 2026

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अवधेश कुमार 

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्लाह अल खामेनेई का मारा जाना 21वीं सदी की ऐसी बड़ी घटना है जिसका प्रभाव कई रूपों में संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा। इस्लामी शासन होने के कारण वे व्यावहारिक रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भूमिका खामेनेई की नीतियों के क्रियान्वयन की रही है।अयातुल्लाह होने के कारण उन्हें विश्व भर के शिया मुसलमान अपने शीर्ष मजहबी नेता के रूप में देखते थे। पाकिस्तान ,ईरान ,भारत सहित कई देशों में शिया मुसलमानों का विरोध सामने है। किंतु यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एक भी पड़ोसी देश ने ईरान का पक्ष नहीं लिया है। हालांकि पिछले वर्ष खामेनेई ने संपूर्ण विश्व के मुसलमानों की एकता का आह्वान किया था। ईरान और उसके बाहर उनके समर्थकों की कल्पना में कभी उनके इस तरह की मौत की बात नहीं आई होगी। हालांकि पिछले वर्ष जून में पहले इजरायल और बाद में अमेरिका के हमले के समय अटकलें लगी थी कि शायद वे देश छोड़कर चले गए। ऐसा हुआ नहीं।

इस घटना की संपूर्ण परिणतियों का स्पष्ट पूर्वावलोकन अभी कठिन है। इतना स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईरान में 1979 से इस्लामी क्रांति का एक दौर तत्काल समाप्त हो गया है।

ऐसा नहीं है कि इस्लामी क्रांति के बाद हुए परिवर्तनों, स्थापित ढांचें, विचारधारायें समाप्त हो गईं हैं पर कम से कम उस रूप में आने वाले लंबे समय तक मुक्त और स्वतंत्र शिया इस्लामी शासन नहीं हो सकता। यह कथन सामान्य क्रांतियों के संदर्भ में है कि क्रांति के शिशु ही क्रांति को खा जाते हैं। ईरान के इस्लामी क्रांति के बारे में भी तत्काल यह निष्कर्ष सही दिखता है। सामान्यतः आम इस्लामी देशों से थोड़ा उदार और खुले जीवन जीने वाले ईरान में 1979 के इस्लामी क्रांति और अयातुल्लाह के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापना संपूर्ण विश्व की दृष्टि से एक नई घटना थी। इसमें केवल ईरान नहीं संपूर्ण अरब और कुछ मायनो में इससे बाहर भी गैर इस्लामी या इस्लाम विरोधी शासनों के अंत और इसके विस्तार का विचार प्रबल था। यहूदी देश इजरायल को इस्लाम का दुश्मन घोषित करते हुए ईरान राष्ट्र का लक्ष्य धरती से उसका नामोनिशान मिटाना हो गया। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को शैतान कहा गया। यह व्यावहारिक तौर पर विश्व में एक इस्लामी विद्रोह की सत्ता का स्वरूप था। सच कहें तो इसी अतिवादी भाव के व्यवहार ने ईरान को उस अवस्था में पहुंचा दिया जहां उसका शांत, स्थिर, सशक्त और सुरक्षित रहना असंभव था। जब आप किसी एक देश के धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करेंगे और उसके अनुसार देश का व्यवहार होगा, बाहर अलग-अलग हिंसक समूह पैदा कर उसकी मदद करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया आपको झेलनी पड़ेगी। आखिर कोई देश ऐसे शासन को कायम रहने देने के पक्ष में क्यों होगा जो उसके अंत को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रहा हो?

इस्लामी क्रांति के साथ 1979 में अमेरिकी दूतावास पर हमले और उसके बाद की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। अमेरिकी कर्मचारियों के हाथ बांध कर बाहर लाया गया, वे बंधक बनाये गये। तब से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की कामना होती थी ईरान से इस्लामी शासन का अंत हो। तत्कालीन ईरानी शासक राजा शाह पहलवी को अपने परिवार और समर्थकों के साथ अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। आज उनके पुत्र रेजा शाह पहलवी और  परिवार अमेरिका में ही है। पिछले लगभग 3 महीने से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों में हमने देखा कि लोग उनकी तस्वीरें लिए वापस आओ के नारे लगा रहे थे। ये लोग अमेरिका से भी हस्तक्षेप की भी मांग कर रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विरोधियों का समर्थन किया,  ईरान को चेतावनी दी पर तत्काल सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। कुछ वक्तव्यों और घटनाओं से लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप इस बार परिणामकारी सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने खामेनेई शासन को चेतावनी दी, न्यूक्लियर कार्यक्रमों को समाप्त करने की शर्तें रखी, ओमान में बातचीत भी आरंभ की किंतु सब रणनीति के तहत था। उसके साथ-ईरान के आसपास अब्राहम लिंकन जैसा सबसे बड़ा नौसैनिक बेरा और अन्य तैयारी होती रही।

दरअसल, 7 अक्टूबर ,2023 को हमास द्वारा उत्सव मना रहे निर्दोष निरपराध यहूदियों पर हमला कर लगभग 1200 लोगों का सरेआम कत्लेआम और बंधक बना लेने की घटना ने पश्चिम एशिया खासकर ईरान इजरायल ,ईरान अमेरिका संबंधों को ऐसे मोड़ पर ला दिया जिसे अयातुल्लाह सहित उनके परिवार के अनेक सदस्यों ,प्रमुख कमांडरों और रक्षा मंत्री आदि की मृत्यु की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। गाजा में हमास , लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुती अयातुल्लाह के ईरान के ही गैर राज्यीय आतंकवादी समूह हैं। उस घटना ने विश्व के हर विवेकशील व्यक्ति और संतुलित राष्ट्रों को अंदर से हिला दिया। हालांकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी मजहबी भाव को देखते हुए मुस्लिम देशों में आम भाव ऐसा नहीं था किंतु ईरान की तरह भूमिका दूसरे की नहीं थी।

इजरायल और अमेरिका का ऑपरेशन तभी से आगे बढ़ने लगा। लेबनान में हिजबुल्लाह  तथा गाजा में हमास को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कार्रवाई आरंभ की। हिजबुल्लाह प्रमुख नजीबुल्लाह और उसके ज्यादातर शीर्ष साथियों की मृत्यु ,उसके केंद्र काफी हद तक नष्ट होने आदि के साथ उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि पहले की तरह संघर्ष नहीं कर सकते थे। गाजा में भी संघर्ष जारी रहा और अपने लोगों को सुरक्षित लाने की विवशता रहते हुए भी इजरायल ने हमास के ढांचे को जितना संभव था अंत करने की कोशिश की। डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आने के बाद कुछ समय के लिए लगा कि शायद इजरायल की उनको लेकर अपेक्षाएं गलत साबित हो सकतीं हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका के शक्तिशाली जीबी 57ए/ बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमोपी  जिसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है, के हमलों में ईरान के तीन महत्वपूर्ण फोर्डो, नतांज और इस्फाहान न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट किया। वस्तुत: अमेरिका और इजराइल क्रमबद्ध तरीके से यहां तक पहुंचे हैं। ईरान पर पिछले एक दशक से ज्यादा के प्रतिबंधों ने उसके तेल व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया और आर्थिक संकट बढ़ता गया। डोनाल्ड ट्रंप ने उन प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के उपाय किए और उनके तेवर ऐसे थे जिसका असर हुआ। इस बीच ईरान रिवॉल्यूशनरी कोर्प्स गार्ड से लेकर प्रमुख रक्षा वैज्ञानिकों आदि की हत्यायें होती रहीं । इजरायल ने भी बीच-बीच में हमले किये। हालांकि पिछले वर्ष ईरान के मिसाइल हमले से इजरायल को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। उसके बाद ज्यादा सशक्त तैयारी का अहसास हुआ और वही किया गया।

आयतुल्लाह के मारे जाने के कुछ घंटे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा किया कि ईरान के बहादुर लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप अपने घरों में रहें ,चारों तरफ हमारे बम गिर रहे हैं और इस शासन से मुक्त कर आपको हम ईरान सौंप देंगे तब भी शायद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को विश्वास नहीं हुआ होगा कि वे जो बोल रहे हैं वही करने की तैयारी से इस बार ईरान में हस्ताक्षेप हुआ है। देख लीजिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीश में ज्यादातर मुस्लिम देश ही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका और इजरायल का पूरा साथ दिया है। ईरान जिस तरह सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत ,क़तर आदि सभी स्थानों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के नाम पर हमले कर रहा है उसके लगता है कि हर देश उसके विरुद्ध थे। वैसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे पहला और लंबा युद्ध इराक के साथ हुआ जो स्वयं शिया बहुल देश है।

अभी भविष्य की स्पष्ट तस्वीर नहीं प्रस्तुत की जा सकती। ईरान के बचे-खुचे कमांडर अपनी शक्ति से संघर्ष करेंगे,  दुनिया भर के शिया अतिवादी समूह अपने स्तर से हिंसा और विरोध करेंगे, लेकिन ईरान के शासन का लंबे समय तक समूचे देश पर नियंत्रण रहना कठिन होगा। ईरान पर कब्जा कर किसी को सत्ता पर बिठाना अमेरिका के लिए कठिन है। बड़ी संख्या में ईरानी भी किसी बाहरी हस्तक्षेप वाले शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खामेनेई की मृत्यु के बाद तत्काल उनके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुई है जो‌ लोगों की प्रतिक्रियाओ में दिख रही है।‌ ईरान में तुर्क, कुर्द, अज़रबैजानी  अलग-अलग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका हौसला बढ़ा है। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाला समूह भी बहुत बड़ी संख्या में है। इसलिए ईरान के एक निश्चित दिशा में पहुंचने के पहले वहां घटनाएं अनेक मोड़ लेंगी और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस्लामी शासन का ऐसा हस्र पूरी दुनिया के इस्लामवादियों के लिए सबक होना चाहिए। जो भी हो 1979 इस्लामी क्रांति के सिद्धांत वाली ऐसी शासन व्यवस्था वहां कायम नहीं रह सकती, जिसका संपूर्ण देश पर प्रभावी नियंत्रण हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

रविवार, 1 मार्च 2026

भारत-चीन सीमा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी चर्चा होनी चाहिए

कर्नल शिवदान सिंह

लोकसभा के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सेना के भूतपूर्व अध्यक्ष जन नरवाने की प्रकाशित नहीं हुई पुस्तक को सदन में लहराते हुए मौजूदा सरकार को निर्णय लेने में अक्षम बताने की कोशिश की है। 2020 में गलवान संघर्ष के समय लद्दाख के कैलाश क्षेत्र में कुछ चीनी टैंकोकी हरकत देखी गई जिसके बारे में सेना प्रमुख ने सरकार से इनके विरुद्ध कार्रवाई के बारे में जानने की कोशिश की जिसके उत्तर में जैसा कि पिछले लंबे समय से सरकार ने सेना को देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने की पुरी छूट दी हुई है उसी प्रकार सरकार ने सेना प्रमुख को बताया कि जो उन्हें जो उचित लगे वह कार्रवाई कर सकते हैं। इसके लिए सेना ने कोई अतिरिक्त संसाधन या गोला बारूद की मांग सरकार से नहीं की थी तो इससे साफ हो जाता है कि इसमें विवाद या सरकार की निष्क्रियता कहीं भी नजर नहीं आ रही है। इसी प्रकार कुछ राजनीतिक दल सेना और सरकार की कामयाबी को कम दिखाने के प्रयास में ऑपरेशन सिंदूर और 2016 में जम्मू कश्मीर के ऊरि क्षेत्र में पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकी कैंपों पर भारतीय सेना के द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइकका भी प्रूफ मांग रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि हमारी सेना ने सफलता पूर्वक पाकिस्तान में लश्करे तैयबा के 11 कैंप और वहां के पांच हवाई अड्डओ पर हमला करके उनको बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तान इसके जवाब में हमारे देश का बाल बांका भी नहीं कर सका। उसके ड्रोनों और मिसाइलो को हमारा अभेद एयर डिफेंस सिस्टम सीमा में घुसने से पहले ही बर्बाद कर देता था। इसलिए दुनिया की प्रेस किसी भी भारत के नुकसान का फोटो विश्व पटल पर नहीं रख सकी। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सफलता को देखते हुए विश्व के 135 देशों ने भारत के ऑपरेशन की सराहना की थी। इस सब के बावजूद भी हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल सेना की इन सफलताओं को भी स्वीकार नहीं करके सेना के मनोबल को गिराने का प्रयास करते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नकारात्मक है।

लद्दाख क्षेत्र और चीन के बारे में प्रश्न करने वालों को इस विषय पर भी विचार करना चाहिए की 1962 के युद्ध में भारत की हार और उसके 38000 वर्ग किलोमीटर सियाचिन क्षेत्र को चीनी सेना ने किन कारणों से कब्जे में कर लिया था। 1950 के दशक में चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। इसी के अंतर्गत चीन ने 1955 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया तथा उसके साथ-साथ सीमावर्ती भूटान नेपाल और भारत के क्षेत्र की तरफ भी अपनी सैनिक गतिविधि बढ़ाने शुरू कर दी थी। चीन के इस कब्जे को विश्व पटल पर उचित तथा न्याय संगत ठहरने के लिए भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को उचित ठहराते हुए उसे मान्यता प्रदान कर दी और तिब्बत को चीन के भाग के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद चीन ने तिब्बत के दक्षिणी क्षेत्र से सियाचिन होकर एक सड़क बननी शुरू कर दी जिससे उसकी गतिविधियां भारतीय सीमा तक बढ़ गई। 1958 तक चीन काफी आक्रामक मूड में भारतीय सीमा की तरफ क् बढ़ने लगा। इसको देखते हुए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने चीन की गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेमन को पेश करते हुए सेना के लिए आधुनिक हथियार और गोला बारूद के लिए धन की मांग की जिससे चीनी सेना का मुकाबला किया जा सके। परंतु उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने नहीं माना तथा प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा कि हमने चीन के साथ पंचशील संधि की है जिसके अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हुए एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। जब काफी प्रयासों के बाद भी नेहरू ने अपना निर्णय न बदलते हुए सेना बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की इससे निराश होकर जन. थीमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिसको भारत सरकार ने स्वीकार नहीं कियाइसके बाद जन. ने सेना की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद करते हुए सेना के संचालन से दूरी बना ली। इसके बाद बिना किसी कारण के चीनी सेना ने अक्टूबर 1962 में लद्दाख नेफा और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर आधुनिक हथियारों से हमला कर दिया

भारतीय सैनिकों के पास उस समय केवल बोल्ट एक्सन राइफल थी जिससे चीनी सेना की आधुनिक हथियारों का मुकाबला असंभव था। इसके अलावा भारत-चीन सीमा तक भारतीय क्षेत्र में संचार के साधन सड़क इत्यादि बिल्कुल नहीं थे इसके कारण सेना को समय पर सहायता भेजा जाना असंभव था। इसके बावजूद भी भारतीय सेवा ने बहादुरी सेचीनी हमले का मुकाबला किया और इसी हमले में लद्दाख के रेजांगला की सुरक्षा में तैनात में मेजर शैतान सिंह ने अपने 110 सैनिकों के साथ दुश्मन के 1200 सैनिकों का मुकाबला बहादुर से किया। जब उनकी रायफलों की गोलियां समाप्त हो गई और पीछे से कोई मदद की आशा नहीं थी नहीं थी। तब उस स्थिति में शैतान सिंह ने पीछे भागने के स्थान पर दुश्मन का मुकाबला राइफल की संगिनो से करने का निश्चय करके अपने सैनिकों के साथ चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया। जिसमें एक-एक भारतीय सैनिक ने चीन के 10–10 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और चीन के इस हमले को नाकाम कर दिया। इस युद्ध में मेजर शैतान सिंह और उसके सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। उस समय संचार व्यवस्था का इतना बुरा हाल था कि इन सैनिकों के मृत शरीरों की जानकारी पूरे 40 दिन के बाद उस समय प्राप्त हुई जब एक चरवाहा अपनी भेडॉ को चराते हुए उस क्षेत्र में गया और उसने वहां पर इन सैनिकों के शब् और चीनी सैनिकों के शब चारों तरफ बिखरे हुए देखे। इसकी सूचना उसने फौरन सेना को दी तब उनकी वीरता की कहानी देश को पता चली और उनके शरीरों का अंतिम संस्कारकिया जा सका

इसी क्रम में चीन ने 1967 में देश के मुख्य भाग कोउत्तर पूर्वी राज्यों से से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहे जाने क्षेत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई जिसके द्वारा वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों पर कब्जा करना चाह रहा था। इसके लिए चीन ने अपनी आक्रामक करवाई सिक्किम की सीमाओं पर शुरू कर दी। इसकी जानकार सिक्किम क्षेत्र के जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने सेना मुख्यालय तक पहुंचा दी थी। इस पर जन. सागत सिंह को भारत सरकार के निर्देश सेना मुख्यालय के द्वारा प्राप्त हुये कि वे चीन के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेंगे तथा सीमाओं से 1000 मीटर पीछे हटकर मोर्चा संभालेंगे। इस प्रकार 1962 के युद्ध की तरह ही चीन को भारत सरकार पूरा मौका भारत में अंदर प्रवेश करने का दे रही थी परंतु जन. सगत सिंह नेइस आदेश का पालन नहीं किया तथा अपने सैनिकों को और भी मजबूती से नाथुला और उसके आसपास तैनात कर दिया।

जब चीन ने सितंबर 1967 में नाथुला पर हमला किया तो जन. सगत सिंह स्वयं अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों के पीछे जाकर पोजीशन संभाली और घोषणा करवा दी की जो भी भारतीय सैनिक मोर्चे से पीछे भागेगा उसकी हत्या वे स्वयं वे गोली मारकर करेंगे। इस प्रकार उन्होंने सैनिकों का मनोबल इतना बढ़ाया कि भारतीय सैनिकों ने चीनी हमले को नाकाम करते हुए उसके सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। इस प्रकार देखा जा सकता है की 1962 की हार और 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में जाने के लिए किसी हद तक केवल भारत सरकार ही जिम्मेदार थी। क्योंकि उसने भारतीय सेना को उचित गोला बारूद उपलब्ध नहीं कराया जिसके कारण भारतीय सेना चीनी सेना का मुकाबला नहीं कर पाई। इसके अतिरिक्त चीन के साथ लगने वाली उत्तर पूर्वी सीमाओं और लद्दाख क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचा जैसे सड़क इत्यादि की कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके कारण समय से सेना के लिए उचित सहायता समय से नहीं पहुंच सकी। 

विश्व में चीन की गतिविधियों और उसकी चालों को समझ कर भारत सरकार ने चीन की हर चाल को नाकाम करने के लिए उत्तर पूर्वी तथा लद्दाख सीमा तक संचार व्यवस्था जैसे राजमार्ग तथा हवाई अड्डे बना दिए हैं। यह राजमार्ग इतनी क्षमता के हैं कि उनके द्वारा सेना के लड़ाकू टैंक भी शीघ्रता से सीमा तक पहुंच कर चीनी हमलों को नाकाम करके चीन के अंदर तक मार कर सकते हैंइसके लिए उत्तर पूर्व की सीमाओं के लिए स्ट्राइक कोर का गठन किया गया है जिसमें लड़ाकू टैंक होते हैं। 1962 के युद्ध में लड़ाकू विमान का प्रयोग चीनी हमले के विरुद्ध नहीं किया गया था। जिसका मुख्य कारण था कि उस क्षेत्र में इन विमानो केउतरने और उड़ान भरने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसको देखते हुए अब अकेले लद्दाख क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चार हवाई अड्डे– थोयस, लेह, नियोमा तथा कारगिल में स्थापित कर दिए गए हैं। जिनसे आधुनिक राफेल विमान दुश्मन पर मार कर सकेंगे। इसके साथ ही चीन से लगती सभी सीमाओं पर आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त सैनिक तैनात किए गए हैं। जिससे चीन अपनी संख्या से हमारे सैनिकों को हराने का प्रयास न कर सके। इस सबके साथ अब 1962 और 1967 जैसी स्थिति नहीं है जिसमें जन सगत सिंह को नाथुला की सुरक्षा से पीछे हटने के लिए भारत सरकार ने आदेश दिए थे। आज की स्थिति में एक सैनिक कमांडर को सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने के लिएभारत सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ती है। आज के समय मेंसैनिक कमांडर सीमा को सुरक्षा के लिए निर्णय लेने में स्वतंत्र है जैसा की जन. नरवाने ने स्वयं कीअपनी पुस्तक में लिखा है। 

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के लिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर का महत्व देखते हुए उन्होंने बांग्लादेश में भी इसके समानांतर एक कॉरिडोर निर्माण का वादा किया है। जिसके द्वारा के भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ संपर्क हर स्थिति में बना रहे। यदि 1967 में जन. संगत सिंह केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार कार्रवाई करते तो आज हो सकता है यह सिलिगुड़ी कॉरिडोर और हमारे उत्तर पूर्व के 7 राज्य भारत का हिस्सा ना होते। इसलिए आज के समय में देश की सीमाओं की सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम भारत सरकार ने थल, जल और वायु मेंकर दिया है। इसलिए अब चीन भारत को पहले जैसी धमकियां और आंखें नहीं दिख रहा है बल्कि वह भारत के साथ हर तरह के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटने के लिए तैयार है।

 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

अविश्वास प्रस्ताव बनाम सब्सटेंसिव मोशन

अवधेश कुमार 

भारत की राजनीति ऐसी अवस्था में पहुंची है जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। यह भारत के संसदीय इतिहास की अत्यंत गंभीर स्थिति है जब लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस है तो उसके समानांतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध सब्सटेंसिव मोशन। राहुल गांधी के विरुद्ध सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सब्सटेंसिव मोशन लाने की मांग की है। भाजपा ने पहले राहुल गांधी के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात की थी किंतु लगता है गंभीरता से विमर्श करके सब्सटेंसिव मोशन की पहल की है। सब्सटेंसिव मोशन विशेषाधिकार हनन से ज्यादा गंभीर हो सकता है। सब्सटेंसिव मोशन स्वतंत्र मूल प्रस्ताव है जिसमें सांसद के विरुद्ध स्पष्ट आचरण या निर्णय सामने आता है। इस पर बहस और मतदान होता है तथा पारित होने पर सदन का अधिकारिक रुख और मत प्रकट होता है। यानी संबंधित सांसद का आचरण और चरित्र सांसद के अनुकूल है या नहीं, इन्हें सांसद होना चाहिए या नहीं, इन्हें भविष्य में चुनाव लड़ने देना चाहिए या नहीं आदि आदि।  इसके आधार पर कार्रवाई हो सकती है और सदन की सदस्यता भी जा सकती है? चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की अनुशंसा की जा सकती है। तो इसे कैसे देखा जाए? राहुल गांधी प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस इस पर या प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि हम डरने वाले नहीं है। 24 दिसंबर, 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता कैसे गई थी? एक टेलीविजन चैनल ने  स्टिंग किया और सांसदों पर धन लेकर प्रश्न पूछने का आरोप लगा। सब्सटेंसिव मोशन के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और उन्हें आरोपों के उत्तर का भी अवसर नहीं दिया गया। इसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस की ही थी। 

अविश्वास अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में आना बंद कर दिया है।अविश्वास प्रस्ताव के बाद बहस और परिणाम तक लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते। तो उन्होंने यह निर्णय किया । यही बात सांसद या विपक्ष के नेता पर लागू नहीं होती। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव या सब्सटेंसिव प्रस्ताव स्वीकृत होने के बावजूद संबंधित सदस्य हिस्सा ले सकते हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का समय दिया जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को बहस होने की संभावना है। यह देखना होगा कि सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होता है या नहीं। चूंकि भाजपा नेतृत्व वाले राजग को बहुमत है इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा। यही बात सब्सटेंसिव मोशन के साथ लागू नहीं होता। बहुमत के आधार पर गठबंधन राहुल गांधी के विरुद्ध निश्चित मत और कार्रवाई तक का प्रस्ताव पारित कर सकता है। कांग्रेस के अंदर उनके समर्थकों में इससे कोई परेशानी नहीं दिखाई देती। उल्टे वे यह कहते हुए प्रफुल्ल होते हैं कि एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट कर रहे हैं और वह सब्सटेंसी मोशन पर बहस भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगी। अगर सोच ऐसी हो तो कल्पना की जा सकती है कि राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द के रणनीतिकार किस दिशा में जा रहे हैं। बजट सत्र आरंभ होने के पहले दिन को छोड़कर आरंभ से अंत तक राहुल गांधी सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक चर्चा और बहस के विषय रहे। क्या इसे सही अर्थों में राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारित करना कहेंगे? लोकसभा में विपक्ष के नेता की दृष्टि से इसे बिल्कुल जायज माना जाएगा?  क्या इससे राहुल गांधी अपने राष्ट्रीय दायित्वों की पूर्ति कर रहे हैं?

किसी एक नेता के विरुद्ध कार्रवाई होगी तो लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा हो सकती है और अनेक प्रश्न उठ सकते हैं। दूसरा पक्ष यह है जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अभियान चला उसका क्या? उनकी बेटी के सिविल सर्विस पास होने तक पर प्रश्न उठाने वाले कौन थे?  कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा उनको लिखा गया पत्र देखिए , चरित्रहनन है। और आपने अविश्वास प्रस्ताव तक ला दिया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट घेर कर कांग्रेस की महिला सांसद बैनर लिए खड़ीं थी। माहौल का ध्यान रखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा मैंने उनसे सदन में न आने का अनुरोध किया क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था। एपिस्टन फाइल को लेकर निराधार आरोप क्या चरित्रहनन नहीं है? इस फाइल में किसी का नाम आना उसके पाप में भागीदार का द्योतक नहीं हो सकता। एपिस्टन फाइल की मुख्य चर्चा अवयस्क बालक - बालिकाओं के साथ शर्मनाक यौनाचार के संदर्भ में है। यह जानते हुए कोई उसके संपर्क में है तोउसे दोषी माना जाएगा। जिस तरह राहुल गांधी और उनके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घसीटने की कोशिश कर रहे हैं उसे चरित्र हनन की राजनीति के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। संकेत में यह कहना कि प्रधानमंत्री दबाव में है क्योंकि अभी फाइल में माल बहुत है और अडाणी पर अमेरिका में केस हैं आदि आदि . क्या है?  यही बताने की कोशिश हो रही है कि प्रधानमंत्री का दबाव है और इसीलिए वे देश का सौदा कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष के लिए ऐसी कठिन स्थिति पैदा करने की कोशिश है कि उन्हें फैसला लेने में ही समस्या हो। ओम बिरला यहां व्यक्ति नहीं लोकसभा अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर हैं। हमारा व्यक्तिगत उनसे मतभेद हो सकता है, उनसे नापसंदगी भी होगी, पर पद का सम्मान करने और विश्वास करने का प्राथमिक दायित्व भी नेता और संसद न निभाएं तो इसे क्या कहेंगे? यह सब शर्मनाक है।

 हालांकि राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव ने विश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किया। यह भी एक रणनीति होगी ताकि वे बोल सके कि हमने अध्यक्ष पद की गरिमा का ध्यान रख हस्ताक्षर नहीं किया।आपकी रणनीति हो सकती है कि किसी तरह उन्हें मनोवैज्ञानिक दबाव में रखो और अपना एजेंडासदन के माध्यम से प्रचारित और स्थापित करने की कोशिश करो। जब एक पक्ष सीमा का इस सीमा तक उल्लंघन करता रहेगा तो दूसरे पक्ष से भी प्रत्युत्तर उस रूप में आ सकता है। सांसद निशिकांत दुबे द्वारा प्रस्तुत पुस्तक जिनमें नेहरू परिवार के चरित्र पर प्रश्न खड़े किए गए हैं उसी की प्रतिक्रिया में आया था। आपने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव दिया, प्रधानमंत्री का भी चरित्रहनन किया, देश के प्रति उनकी निष्ठा के विरुद्ध दुष्प्रचार किया तथा अंततः ऐसी स्थिति पैदा की किए हुए राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में भाषण नहीं दे सके तो आपके विरुद्ध भी सब्सटेंसिव मोशन आ गया।  शीर्ष स्तर की राष्ट्रीय राजनीति का इस स्तर पर नहीं पहुंचना चाहिए था जहां प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। आखिर रास्ता क्या है?

 अगर राहुल गांधी के समर्थकों को गलतफहमी है कि चर्चा और बहस का एजेंडा सेट करना है बड़ी उपलब्धि है तो एसआईआर एवं चुनाव आयोग के संदर्भ में भी ऐसी ही स्थिति थी। उन्होंने अपनी ओर से पूरी तैयारी के साथ एसआईआर और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया, बिहार में वोट अधिकार यात्रा की , चुनाव परिणाम आपके सामने है। महाराष्ट्र चुनाव में अडाणी मुद्दा उनके लिए सर्वोपरि था।परिणाम देख लीजिए। लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों का निलंबन तब किया जब वे बेल में जाकर लगातार अध्यक्ष की ओर कागज फेंक रहे थे, कोई आदेश या नियमन नहीं मान रहे थे। सामान्य सभा की भी अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति की ओर चिल्ला- चिल्ला कर कागज फेंका जाएगा तो उनके प्रति गुस्सा ही पैदा होगा और समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सदन संचालन के नियम और परंपरा हैं । इसको हर हाल में रौंदने  को उतारू लोगों के विरुद्ध अध्यक्ष को फैसला करना ही पड़ेगा। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस एक दिन भी सामान्य स्थिति पैदा नहीं होने देने पर उतारू है। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दे पर किसी सत्र में भाषण नहीं दिया। वह एजेंडा लेकर आते हैं और उसे सदन में रखते हैं तथा अध्यक्ष के रोकने पर उन्हें आरोपित करते हैं। इस लोकसभा के पहले हाथों में संविधान की लाल किताब लेकर नारे लगाए गए। क्या यह आचरण उचित था? पहली बार कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा किया। इस तरह की सोच और व्यवहार में कोई लोकतांत्रिक रास्ता निकल नहीं सकता। यह कहना कठिन है कि सब्सटेंसिव मोशन से रास्ता निकल पाएगा। सच कहें तो सदन को तय करना पड़ेगा कि विपक्ष के इस तरह के नेता से कैसे निपटा जाए?  नियम और परंपरा बनाने वालों ने ऐसे विपक्ष के नेता की कल्पना भी नहीं की होगी। आप एक बार रोकेंगे तो दूसरे तरीके से आ जाएंगे। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092 ,मोबाइल -9811027208

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