शनिवार, 4 अप्रैल 2026

शिक्षा के नाम पर धंधा : कब तक चलेगी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी?

विकास खितौलिया

भारत में शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की रीढ़ माना गया है। “विद्या दान” को सबसे बड़ा दान कहा गया है, लेकिन आज के दौर में यही शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। खासकर महानगरों में प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और फीस की बेतहाशा वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राजधानी दिल्ली में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है, जहां शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि मुनाफे का साधन बनती दिखाई दे रही है। हाल ही में कुछ न्यूज चैनलों ने खासकर जी न्यूज ने अपने कई कार्यक्रमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और प्राइवेट स्कूलों की इस “कालाबाजारी” पर सवाल खड़े किए हैं। यह सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर है। दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूल पिछले साल से फीस में भारी बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह बढ़ोतरी किसी एक या दो प्रतिशत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार 15% से 30% तक पहुंच जाती है। इससे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि उसकी पारदर्शिता की भी है। स्कूल प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं करते कि आखिर किन आधारों पर फीस बढ़ाई जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों को बिना किसी पूर्व सूचना के बढ़ी हुई फीस का नोटिस थमा दिया जाता है। अगर कोई विरोध करता है, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।

फीस के अलावा स्पेशल एक्टिविटी, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। कई प्राइवेट स्कूलों ने खास दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का नियम बना रखा है। इन दुकानों पर किताबों के दाम बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जो किताबें  सामान्य बाजार में 2000 रुपये में मिल सकती हैं, वही स्कूल में उपस्थित दुकानों पर 7000-8000 रुपये में बेची जाती हैं। यही हाल यूनिफॉर्म का भी है। अन्य पब्लिशर द्वारा छपवाई गई किताबों में अक्सर प्रिंटिंग में बहुत सी त्रुटि भी पाई जाती है । यह एक तरह का “टाई-अप” होता है, जिसमें स्कूल और दुकानदार दोनों को फायदा होता है, लेकिन नुकसान सिर्फ अभिभावकों का होता है। स्कूल द्वारा जारी अनिवार्यता सर्कुलर के कारण मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल में उपस्थित दुकानों से ही खरीदनी पड़ती है। स्पेशल एक्टिविटी की बात तो पूछो ही मत कोई बच्चा यदि स्पोर्ट्स एक्टिविटी में अच्छा है, सही मार्गदर्शन मिले तो देश, अपने माता-पिता का नाम रोशन तो करेगा ही साथ में स्कूल का नाम रोशन होता है। पर स्कूल इस कौशल, प्रतिभा को दरकिनार करते हुए स्पेशल एक्टिविटी के नाम 5000 से 10 हजार ले लेता है । अभिभावकों पर फीस, किताबों का आर्थिक बोझ तो पहले से ही होता है उसके बाद स्पेशल एक्टिविटी के नाम पर और फीस । इसलिए देश में लाखों बच्चे स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी से दूर हो जाते है और तो और देशभर में कई निजी स्कूलों द्वारा हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फंक्शन, कार्निवल, डांडिया डांस और अन्य अलग-अलग शुल्क के नाम पर हजारों रुपये वसूले किए जाते हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या प्राइवेट स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ एक व्यवसाय चला रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना और समाज को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कई स्कूलों में एडमिशन के समय “डोनेशन” या “कैपिटेशन फीस” के नाम पर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं। यह पूरी तरह से अवैध होने के बावजूद खुलेआम चल रहा है। अभिभावक मजबूरी में इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है।

दिल्ली सरकार ने समय-समय पर प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने के लिए कई नियम बनाए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता। स्कूल प्रबंधन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी मनमानी जारी रखते हैं। फीस रेगुलेशन कमेटी जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यवाही अक्सर धीमी और सीमित होती है। जब तक कोई ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्कूलों पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसी वर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साकेत के एपीजे स्कूल ने फीस बढ़ोतरी के चलते कुछ बच्चों के बोर्ड परीक्षा के रोल नम्बर रोक दिए थे, जब यह नेशनल न्यूज बनी तो एग्जाम के एक दिन पूर्व रात्रि में बच्चों को रोल दिए थे । तो वहीं डीपीएस, सालवान आदि प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले उठ रहे है । शिक्षा क्षेत्र में दिल्ली की पिछली सरकार ने अच्छे कदम उठाए थे। कई वर्षों तक स्कूल अपनी मनमानी नहीं कर पाए थे । इस पूरे प्रकारण में सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों को झेलनी पड़ रही है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों को बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसके अलावा, अगर कोई अभिभावक स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं उसके बच्चे को नुकसान न उठाना पड़े। यह डर भी स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देता है।

इस पूरे मुद्दे को सामने लाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है। जब बड़े प्लेटफॉर्म इस विषय को उठाते हैं, तो सरकार और प्रशासन पर दबाव बनता है। हाल ही में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि शायद अब कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन सिर्फ खबर दिखाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को लगातार निगरानी और जन दबाव जरूरी है। वैसे इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं । पर सरकार की नीयत साफ हो । सरकार को फीस वृद्धि पर स्पष्ट और सख्त नियम बनाने होंगे और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। स्कूलों को अपनी आय और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में स्कूलों के एकाधिकार को खत्म करना होगा। स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए ताकि फैसलों में संतुलन बना रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। इन्हीं विषयों पर पिछले साल दिल्ली सरकार एक बिल भी लाई थी, लोगों ने खूब मिटाई भी बाटी और खुशियां बनाई थी । बिल को ताक पर रखते हुए, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी चालू है। सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कोर्ट में जाना चाहिए, और प्रमाणिता के साथ अभिभावकों का पक्ष रखे।

अंततः शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है, और अगर यही नींव कमजोर हो जाए या व्यापार का साधन बन जाए, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। यह सवाल आज हर अभिभावक के मन में है कि शिक्षा के नाम पर यह धंधा आखिर कब तक चलेगा? जब तक सरकार, समाज और अभिभावक मिलकर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक यह स्थिति बदलना मुश्किल है। शिक्षा को फिर से सेवा बनाना होगा, न कि मुनाफे का जरिया। तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

हनुमान जन्मोत्सव पर रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सक्रिय भागीदारी

संवाददाता

नई दिल्ली। हनुमान जयंती के पावन अवसर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया। 

इस अवसर पर पार्टी के स्थानीय अध्यक्ष एवं समाजसेवी अधिवक्ता अनिल कुमार शुक्ला के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों, भंडारा एवं शोभायात्रा में शामिल होकर भगवान हनुमान जी के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया तथा क्षेत्र की सुख-समृद्धि एवं शांति के लिए प्रार्थना की गई।

अधिवक्ता अनिल कुमार शुक्ला ने कहा कि भगवान हनुमान जी हमें शक्ति, सेवा और समर्पण का संदेश देते हैं, जिसे अपनाकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी हमेशा सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेती रही है और आगे भी जनता के साथ इसी प्रकार जुड़ी रहेगी।

मंगलवार, 31 मार्च 2026

आखिर तरुण खटीक की मौत का जिम्मेदार कौन?

विकास खितौलिया 

किसी भी समाज की असली पहचान उसकी न्याय व्यवस्था, सामाजिक संतुलन और नागरिकों की सुरक्षा से होती है। जब किसी युवा की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह समाज और व्यवस्था दोनों की गंभीर विफलता का संकेत बन जाती है। यह केवल एक व्यक्ति या परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी होती है। दिल्ली के उत्तम नगर क्षेत्र में हुई तरुण खटीक की दर्दनाक मौत भी ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है “आखिर इस मौत का जिम्मेदार कौन है?” क्या यह सामाजिक असहिष्णुता का परिणाम है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर कहीं कोई चूक हुई? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि यह घटना कई परतों में उलझी हुई प्रतीत होती है। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि किसी भी प्रकार की हिंसा या व्यक्तिगत विवाद, चाहे वह धार्मिक हो, वैचारिक हो या सामाजिक हमेशा समाज के लिए घातक सिद्ध होता है। जब कोई विचारधारा अपने मूल मानवीय मूल्यों से हटकर हिंसा और नफरत का रूप ले लेती है, तो वह निर्दोष लोगों की जान तक ले सकती है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि यदि इस मामले में किसी प्रकार की हिंसक या आक्रामक प्रवृत्ति की भूमिका रही हो, तो यह न केवल कानून के लिए चुनौती है, बल्कि समाज के ताने-बाने के लिए भी खतरा है।

उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और पीड़ित पक्ष के बयानों के अनुसार, घटना की शुरुआत एक मामूली विवाद से हुई बताई जाती है। बताया जाता है कि होली के अवसर पर खेल-खेल में एक पानी का गुब्बारा फेंका गया, जिसकी कुछ पानी की छींटे एक महिला के कपड़ों पर गिरी। जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हो गई। पीड़ित परिवार द्वारा उस महिला से माफ़ी मांगने पर कुछ समय तक स्थिति शांत होने की बात भी सामने आती है। हालांकि, बाद में यह विवाद फिर से बढ़ गया। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि रात के समय कुछ लोगों ने कथित रूप से एकत्र होकर 26 वर्षीय तरुण खटीक पर हमला किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला गंभीर था, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई। इस पूरे घटनाक्रम की सत्यता और वास्तविक परिस्थितियों का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा किया जाना शेष है। यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि समाज में छोटे-छोटे विवाद भी कभी-कभी गंभीर रूप ले लेते हैं। समाज में कहीं न कहीं सहनशीलता की कमी, संवाद का अभाव और आक्रामकता की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसी परिस्थितियों को और अधिक जटिल बना देती है। 

आरोप है कि कुछ हिसंक कट्टर सोच रखने वाले लोगों ने इस विवाद को हिंसा में बदल दिया इसलिए किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह किसी भी कारण से उत्पन्न हुई हो, अंततः समाज के लिए हानिकारक ही सिद्ध होती है। जब किसी भी पक्ष में कट्टरता हावी हो जाती है, तो सामान्य घटनाएं भी असामान्य प्रतिक्रिया का कारण बन जाती हैं। कट्टरता व्यक्ति की सोच को सीमित कर देती है और उसे दूसरे की भावनाओं, परंपराओं और जीवन के अधिकार के प्रति असंवेदनशील बना देती है। यह कैसी मानसिकता है। यदि इस घटना में भी ऐसी मानसिकता का प्रभाव था, तो यह निश्चित रूप से एक चिंताजनक स्थिति है, जिस पर समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्या कारण है कि पचास वर्षों से रहे दो अलग अलग पक्षों के समुदाय में झगड़ा हो जाता है । हालांकि, किसी भी एक समुदाय या संस्था को समग्र रूप से दोषी ठहराना समस्या का समाधान नहीं है। हर समाज में कुछ असामाजिक तत्व होते हैं, जो अपने कृत्यों से पूरे समुदाय की छवि को प्रभावित करते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम इस घटना को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखें और यह समझें कि वास्तविक दोषी वे लोग हैं जिन्होंने हिंसा को अंजाम दिया, न कि पूरा समुदाय।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और प्रशासन का मूल कर्तव्य होता है । इस घटना में कानून-व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का मानना है और मीडिया रिपोर्ट्स में यह कहा गया है कि यदि समय पर प्रभावी हस्तक्षेप होता, तो संभवतः स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता था। क्योंकि धटना स्थल से पुलिस चौकी की दूरी मुश्किल से 500 मीटर की होगी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पुलिस और प्रशासन की भूमिका की समीक्षा तथ्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए। इसके अलावा, कानून का डर खत्म होना भी एक बड़ी समस्या है। जब अपराधियों को यह महसूस होने लगता है कि वे बिना किसी सख्त सजा के बच सकते हैं, तो उनके हौसले बुलंद हो जाते हैं। इस प्रकार की घटनाएं यह भी दर्शाती हैं कि क्या हमारे समाज में आपसी संवाद और विवाद समाधान की क्षमता कमजोर हो रही है। पहले जहां छोटे विवाद आपसी समझ से सुलझ जाते थे, वहीं अब वे कभी-कभी हिंसक रूप ले लेते हैं। यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, जिस पर सामूहिक रूप से विचार करने की आवश्यकता है। 

न्याय तभी संभव है जब जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित हो। कानूनी प्रक्रिया फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाई जाए, जिससे दोषियों की पहचान कर उन्हें कानून के अनुसार सख्त सजा मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से क्यों न हों। किसी भी व्यक्ति की असमय मृत्यु खासकर युवा हो। परिवार को गंभीर आर्थिक और मानसिक संकट में डाल देती है। ऐसे मामलों में सरकार द्वारा आर्थिक सहायता (कम से कम एक करोड़) देना पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत हो सकती है। साथ ही, यदि जांच में प्रशासनिक स्तर पर कोई लापरवाही सामने आती है, तो उसके लिए भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, यही लोकतंत्र की नींव है।

तरुण खटीक की मृत्यु हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में शांति और सुरक्षा केवल कानून के बल पर नहीं, बल्कि आपसी समझ, सहिष्णुता और जिम्मेदारी से भी सुनिश्चित होती है। यह आवश्यक है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और संवेदनशीलता के साथ कानून-व्यवस्था को मजबूत किया जाए। इसलिए पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और सक्रिय बनाना होगा। शिकायतों को गंभीरता से लेना और समय पर कार्रवाई करना अनिवार्य होना चाहिए। अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि तरुण खटीक की मौत केवल एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि यह कई कारकों का मिश्रण हो सकती है। 

व्यक्तिगत विवाद, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक असंतुलन। ये सभी मिलकर ऐसी दुखद घटनाओं को जन्म देते हैं। इसलिए, केवल एक पक्ष को दोषी ठहराने के बजाय, हमें पूरे सिस्टम की समीक्षा करनी होगी। यह समय है आत्ममंथन का प्रशासन के लिए भी और समाज के लिए भी। हम दोषारोपण से आगे बढ़कर समाधान की दिशा में सोचें ताकि आने वाले समय में किसी और परिवार को ऐसा दुख न सहना पड़े। तरुण खटीक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस घटना से सीख लेकर एक अधिक सुरक्षित, संतुलित और संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं। तरुण खटीक की मौत एक सवाल है और इसका जवाब हमें मिलकर ढूंढना होगा।

नोट : यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स, स्थानीय स्रोतों और पीड़ित पक्ष के बयानों पर आधारित है। मामले की जांच जारी है, और अंतिम सत्य का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों एवं न्यायालय द्वारा किया जाएगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

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गुरुवार, 19 मार्च 2026

संवैधानिक मर्यादा का खुलेआम अतिक्रमण

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?

राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें।  उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति  मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।

 अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में  संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था।  क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते।  राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है।  उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं?  क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था।‌ पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी‌ भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 ,मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 17 मार्च 2026

श्री संतोषी माता मंदिर, हरि नगर में 108वां नवरात्रि मेला 19 से 27 मार्च तक

संवाददाता

नई दिल्ली। धर्मनगरी हरि नगर, जेल रोड, नई दिल्ली-110058 स्थित सिद्धपीठ श्री संतोषी माता मंदिर में इस वर्ष भव्य 108वां नवरात्रि मेला श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के साथ 19 मार्च 2026 से 27 मार्च 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मंदिर परिसर इन पावन दिनों में भक्ति, साधना और सेवा का अद्‌भुत संगम बन जाता है। माँ संतोषी की असीम कृपा से आयोजित यह नवरात्रि महोत्सव वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर में विराजमान माँ संतोषी की दिव्य प्रतिमा, भव्य सजावट, फूलों और विद्युत रोशनी से जगमगाता मंदिर तथा भजन-कीर्तन की गूंज श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देती है। नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन लगभग 15000 हजार श्र‌द्धालु माँ के दरबार में दर्शन करने पहुँचते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। नवरात्रि मेले के दौरान मंदिर परिसर में विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। तथा प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक संकीर्तन, तथा रात्रि में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता है। भक्तों की सेवा के लिए प्रतिदिन दोपहर 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक विशाल भंडारे की व्यवस्था भी है।

मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के सान्निध्य में आयोजित यह महोत्सव भक्तों को भक्ति, संतोष और शांति का संदेश देता है। उनके अनुसार माँ संतोषी कलियुग मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के अनुसार, माँ संतोषी कलियुग की तारिणी स्वरूपा हैं जो अपने भक्तों के समस्त कष्ट हर कर, उन्हें संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं। इस उथल-पुथल भरे युग में संतोष और शांति ही वे दिव्य सूत्र हैं, जो सम्पूर्ण मानवता को प्रेम और भाईचारे के बंधन में जोड़ते हैं। माँ श्री संतोषी जी की कृपा से माता जी की चौकी प्रति मंगलवार, शुक्रवार तथा रविवार को होती है। आयोजित माता चौकी के दिनों में भक्त माँ की चौकी में हाजरी देकर अपनी समस्त समस्याओं एवं व्यथाओं से छुटकारा प्राप्त करते है। चौकी के दौरान मातारानी स्वयं गुरु श्री अमित सक्सेना जी के स्वरुप में प्रकट होकर भक्तों को उनके संकटों एवं तकलीफों से छुटकारा पाने के उपाय बताती हैं जिससे भक्तगण लाभान्वित होते हैं व साक्षात् माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माँ संतोषी के दरबार में आने वाले भक्तों की झोली कभी खाली नहीं रहती है।

नवरात्रि मेले का मुख्य आकर्षण 26 मार्च 2026 को रात्रि 9 बजे से प्रातः 5 बजे तक होने वाला विशाल भगवती जागरण होगा, जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक एवं कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से भक्तों को मंत्रमुग्ध करेंगे। इसके अगले दिन 27 मार्च की प्रातः कन्या पूजन और हवन के साथ नवरात्रि महोत्सव का समापन होगा।

मंदिर परिसर में श्र‌द्धालुओं की सुविधा के लिए भंडारा, चिकित्सा सहायता, व्यवस्था एवं सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं। सैकड़ों सेवादार निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहते हैं, जो इस आयोजन को सामाजिक सेवा और आध्यात्मिक समर्पण का अ‌द्भुत उदाहरण बनाते हैं।

श्री संतोषी माता मंदिर परिवार की ओर से सभी श्रद्धालुओं को इस पावन नवरात्रि महोत्सव में सपरिवार पधारकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सादर आमंत्रित है।

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