शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

आर्थिक आधार पर आरक्षण का सच

बसंत कुमार

एक दिन एक वीडियो वायरल हुई जिसमें एक गरीब ब्राह्मण का घर दिखाया गया और घर देखकर लग रहा था कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी अगर घर के मुखिया को मनरेगा के तहत रोजगार दे दिया गया होता तो उस घर में बच्चे अच्छे से पल जाते पर ऐसा नहीं हुआ। इस वीडियो के अंत में संचालक ने ब्राह्मण परिवार की इस दुर्दशा के कारण प्राकृतिक संसाधनों के असामान्य वितरण, गरीबी उन्मूलन और बेरोजगारी के लिए सरकारों की लापरवाही को जिम्मेदार न ठहराते हुए डॉ. आंबेडकर के संविधान और दलित और आदिवासियों के लिए आरक्षण को दोषी ठहरा दिया। ऐसा लगता है कि जब से देश आजाद हुआ और पूना पैक्ट के कारण देश में आरक्षण लागू हुआ तब से ही अनेक सवर्ण समाज के लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। मानो आरक्षण से पहले भारत सोने की चिड़िया था और यहां कोई गरीब नहीं था।

दलित और आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षण के विरोधी एक सुर से कहते है कि आरक्षण जाति के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए। जबकि आरक्षण शदियों से शोषित घृणित उपेक्षित समाज को मुख्य धारा में ले आने के उद्देश्य से किया गया। पर बार बात उठती आर्थिक आधार पर उठ रही मांगो को ध्यान रखते हुए केंद्र सरकार ने सवर्ण समाज के गरीब लोगो के लिये सरकारी नौकरियों में 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण की व्यवस्था कर दी, पर हो यह रहा है कि ईडब्ल्यूएस की पात्रता की आय सीमा 8 लाख रुपये की सीमा को धता बताकर सवर्ण समाज के करोड़पति और अरबपति लोग इस कोटे को लूट रहे हैं। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा 2025 के आधार पर एक खुलासा हुआ है कि कोठियों में रहने वाले 10-10 गाड़ियों के मालिकों के बच्चे जुगाड से ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र बनवा ले रहे हैं और गरीब सवर्णों का हक मार रहे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी जिसका शीर्षक था इंग्लिश मीडियम। इस फिल्म में नायक ईडब्ल्यूएस सीट पर एक नामी स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए अपनी कोठी छोड़कर एक झोपड़ पट्टी में रहने को मजबूर होता है और वह झोपड़ पट्टी में रहने वाले गरीब का हक मारकर अपने बच्चे का एडमिशन कराने में सफल हो जाता है, यह कहानी फिल्मों में नहीं हकीकत में होती है, जब से सरकार ने हर पब्लिक स्कूल में 25% सीटें ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के बच्चों द्वारा भरा जाना आवश्यक कर दिया है तब से दिल्ली में यह देखने में आया है कि ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के बच्चों की आरक्षित सीटों पर ग्रेटर कैलाश, साउथ एक्सटेंशन, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी जैसे पॉश इलाकों में रहने वाले लोगों के बच्चों को प्रवेश मिल जाता है। देश का रेवेन्यू कार्यालय इतना भ्रष्ट हो चुका है कि लेखपाल और कानूनगो की मुट्ठी गरम कर देने से एक करोड़पति ईडब्ल्यूएस का सर्टिफिकेट प्राप्त कर लेता है, गरीबों को आरक्षण की बात करने में बहुत अच्छा लगता है पर देश के भ्रष्ट सिस्टम में अमीरों को तो गरीब होने का प्रमाण पत्र तो मिल जाता है पर जो वास्तव में गरीब है उन्हें यह प्रमाण पत्र नहीं मिल पाता।

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा 2025के बारे में एक रिपोर्ट आई की कैसे करोड़पतियों के बेटा बेटी ईडब्ल्यूएस कैटेगरी में आरक्षण का लाभ उठाकर आईएएस, आईपीएस या अन्य सेवा में चयनित हो जाते हैं। इस रिपोर्ट में ईडब्ल्यूएस कोटे में चयनित 104 उम्मीदवारों में से कई संपन्न विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि में से है। इस रिपोर्ट में सभी सफल 104 उम्मीदवारों की आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण किया गया है।

  • ईडब्ल्यूएस कोटे से चयनित 104 उम्मीदवारों में से 84 ने सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी के लिए औपचारिक कोचिंग की थी और 67 उम्मीदवारों ने दिल्ली के महंगे और जाने माने संस्थानों से पढ़ाई की।
  • इनमें से 46 उम्मीदवार प्रतिष्ठित निजी स्कूलों से पढ़े थे जहां पर लाखों रुपए में फीस जाती है।
  • 28 उम्मीदवारों के माता पिता का अपना अच्छा खासा बिजनेस था और 10 उम्मीदवार कॉर्पोरेट या मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर चुके हैं।
  • लगभग 11 उम्मीदवार आईआईटी या एनआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों से ग्रैजुएट है।
ईडब्ल्यूएस कोटा के तहत लाभ पाने के लिए परिवार की सकल वार्षिक आय 8 लाख वार्षिक से कम होनी चाहिए इसके अलावा कृषि भूमि 5 एकड़ से कम और आवासीय फ्लैट 1000 फीट से कम और संपत्ति के दायरे तय किए जाते हैं। पर आलोचकों और जानकारों का तर्क है कि 8 लाख रुपए की आय सीमा बहुत व्यापक है, जिससे उन परिवारों के बच्चे इसका लाभ ले पा रहे हैं जिनके पास महंगी शिक्षा और संसाधन जुटाने के पर्याप्त साधन है और जमीनी स्तर पर सबसे गरीब व्यक्ति तक इसका वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।
बड़ी विडंबना यह है कि सभी प्रकार के आरक्षण एससी/एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस जिन लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए बनाए गए थे उनको नहीं पहुंच पा रहे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण के मामले में यह देखा गया है कि कुछ लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं कुछ मामलों में शिकायत भी हुई पर हमारे देश की जांच प्रक्रिया और न्याय प्रक्रिया इतनी सुस्त है कि लोग फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर पाई हुई नौकरी पूरी कर लेते हैं पर उनके खिलाफ शिकायत की जांच पूरी नहीं हो पाती। इस विषय में पूर्व आई ए एस और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगा का उदाहरण ज्वलंत है उनके एस टी स्टेट्स के खिलाफ दशकों पहले शिकायत आई पर जांच प्रक्रिया इतनी सुस्त रहीं कि वे आई ए एस भी बन लिय और राजनेता के रूप में अच्छी पारी खेल ली पर उनके खिलाफ शिकायत की जांच नहीं हो पाई। दूसरा मामला वर्ष 2014 में जौनपुर मछली शहर लोक सभा सीट से सांसद चुने गए राम चरित्र निषाद का है वे बस्ती के निषाद ओबीसी थे पर दिल्ली से फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर मछली शहर सुरक्षित सीट से सांसद बने इसकी शिकायत हुई पर इसका निपटारा नहीं हो पाया और वे सांसद के रूप में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके थे। कहने का अभिप्राय यह है कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान उस वर्ग के लोगों को मुख्यधारा में लाया जाए पर इसका लाभ उस वर्ग के आम लोगों को न मिलकर उस वर्ग के धनाढ्य लोगों को मिल रहा है।
आजकल प्रायः यह देखने को मिलता है कि यदि किसी सवर्ण व्यक्ति की आर्थिक स्थिति दयनीय है तो इसके लिए दलित और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण को दोषी ठहराया जाता है जबकि गरीब हर समाज में पाए जाते हैं और इसके लिए सरकार का गरीबी उन्मूलन के लिए उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण है और प्राकृतिक संसाधनों और जमीन का अनुचित विवरण है। इसके लिए हजारों वर्षों से उपेक्षित और तिरष्कृत समाज की मुख्य धारा में लाने के उद्देश्य से दिया गया आरक्षण नहीं है। इसलिए लोगो की हर समस्या का निदान आरक्षण समाप्त किए जाने में नहीं खोजना चाहिए, वैसे भी आरक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी उन्मूलन नहीं बल्कि हजारों वर्षों से उपेक्षित लोगो के प्रतिनिधित्व का है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

नंदन नीलेकणी: इंफोसिस से आधार तक, और अब परीक्षा सुधार

विवेक शुक्ला

 नंदन नीलेकणी फिर राजधानी वापस लौट रहे हैं। फिर उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है। पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दी थी और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें परीक्षा व्यवस्था सुधारने वाले उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का अध्यक्ष बना दिया है। पेपर लीक, छात्रों की चिंता और परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच यह जिम्मेदारी उन पर आई है। लेकिन नीलेकणी के लिए यह कोई नई बात नहीं। वे पहले भी बड़े-बड़े काम हाथ में ले चुके हैं और हर बार सिस्टम को थोड़ा बेहतर छोड़ गए हैं।

ये बात करीब चार-पांच साल पहले की है। दिल्ली के बंगाली मार्केट में एक प्रमुख मिठाई की दुकान के बाहर 15-20 लोग किसी व्यक्ति को घेरे खड़े थे। सब ऑटोग्राफ मांग रहे थे। वो शख्स विनम्रता से मना कर रहा था। वो नंदन नीलेकणी ही थे। दुकान के मालिक आज भी कहते हैं कि सज्जनता और विनम्रता में उनका कोई सानी नहीं। शाम को जब शहर की भीड़ थोड़ी थमती, वे कभी-कभी पेंट-शर्ट में दोस्तों के साथ वहां दिख जाते। बिना सुरक्षा के।  दिल्ली के जायके उनके लिए कोई शौक नहीं, बल्कि पुरानी यादें थीं उस शहर की जहां उन्होंने एक बार पूरा भारत बदलने का फैसला किया था।

नीलेकणी का बचपन स्थिर नहीं रहा। पिता मोहन राव नीलेकणी मैसूर और मिनर्वा मिल्स के जनरल मैनेजर थे, फैबियन समाजवादी विचारों वाले। मां दुर्गा घर संभालती थीं। पिता की नौकरी में बार-बार तबादले होते रहे। बारह साल की उम्र में वे धारवाड़ में चाचा के पास चले गए। वहीं उन्होंने आत्मनिर्भर होना सीखा। पढ़ाई बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, सेंट जोसेफ हाई स्कूल धारवाड़ और कर्नाटक कॉलेज में हुई। फिर आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग। वहां वे औसत छात्र थे, लेकिन क्विज टीम के सितारे और सोशल लीडर। एक क्विज में ही रोहिणी से मुलाकात हुई। 1981 में शादी हो गई। उनके दो बच्चे हैं-निहार और जान्हवी।

करियर की शुरुआत 1978 में पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से हुई। वहीं एन.आर. नारायण मूर्ति से दोस्ती हुई। 1981 में सिर्फ 250 डॉलर की पूंजी लेकर नीलेकणी, मूर्ति और पांच और साथियों ने इंफोसिस खड़ा किया। कंपनी ने भारत को ग्लोबल आईटी हब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 2002 से 2007 तक नीलेकणी सीईओ रहे। उनके समय में इंफोसिस अरबों डॉलर का कारोबार छू गई। 2009 में उन्होंने कंपनी छोड़ दी और सार्वजनिक जीवन में कदम रखा।

सबसे बड़ा काम आधार था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें बुलाया। यूआईडीएआई के संस्थापक अध्यक्ष बने, कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। जुलाई 2009 में दिल्ली आए। पहले होटल या दोस्तों के घर, फिर कर्नाटक भवन, बाद में 2 सफदरजंग लेन का बंगला। औपनिवेशिक स्टाइल का सफेद बंगला, बगीचे में मोर घूमते। पास ही इंदिरा गांधी का घर। हफ्ते में तीन रात दिल्ली, बाकी बेंगलुरु में परिवार के साथ। ऑफिस में फाइलों का अंबार, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात, गृह मंत्रालय की आपत्तियां, प्राइवेसी के सवाल। फिर भी वे कहते“मैं प्लंबर हूं, सरकार की पाइपलाइन ठीक कर रहा हूं।” आधार ने एक अरब से ज्यादा भारतीयों को बायोमेट्रिक पहचान दी। फर्जी लाभार्थी हटे, सरकारी खजाने में हजारों करोड़ बचे, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर आसान हुआ। यूपीआई, डिजिलॉकर जैसी चीजें उसी सोच से निकलीं। आलोचनाएं आईं, लेकिन उन्होंने गोपनीयता और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए काम आगे बढ़ाया।

दानवीरता भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। 2017 में पत्नी रोहिणी के साथ बिल गेट्स की गिविंग प्लेज पर हस्ताक्षर किए। संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा समाज के लिए देने का वादा। आईआईटी बॉम्बे को सैकड़ों करोड़ दे चुके हैं। रोहिणी भी बड़े पैमाने पर परोपकार करती हैं। दोनों शिक्षा, जलवायु और सुशासन पर काम करते हैं।

नीलेकणी राजनीति में भी गए। 2014 में कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु साउथ से चुनाव लड़ा, हार गए। फिर तकनीक और सार्वजनिक सेवा पर लौट आए। 2017 में इंफोसिस के संकट में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष बनकर कंपनी को संभाला। जी-20 में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष भी रहे।

अब फिर दिल्ली लौट रहे हैं। जिम्मेदारी बदली है, शहर वही है। परीक्षा सुधार का टास्क फोर्स। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के विवाद, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य की चिंता के बीच। टास्क फोर्स में पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास निदेशक वी. कामाकोटी जैसे लोग हैं। नीलेकणी जानते हैं कि सिर्फ सजा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। सिस्टम डिजाइन मजबूत करना होगा।पारदर्शी, तकनीक-आधारित और भरोसेमंद।

दोनों सरकारों ने उन्हें चुना। मनमोहन सिंह के समय कांग्रेस थी, अब मोदी के समय एनडीए। लेकिन नीलेकणी हमेशा टेक्नोक्रेट ही रहे। विशेषज्ञ। वे कहते हैं कि असमानता बढ़ रही है, युवा चिंतित हैं। इसलिए दीर्घकालिक, रणनीतिक दान पर जोर देते हैं। उनकी जिंदगी मध्यवर्गीय घर से वैश्विक मंच तक की है, लेकिन जमीनी समस्याएं कभी नहीं छोड़ीं।

आज जब भारत डिजिटल महाशक्ति बनने की बात करता है, नीलेकणी उस रास्ते के पथप्रदर्शक हैं। इंफोसिस से आधार, दान से परीक्षा सुधार-हर जगह राष्ट्रहित को आगे रखा। उनका व्यक्तित्व विनम्र, गहरा सोचने वाला और समस्या सुलझाने वाला है। बड़े प्रोजेक्ट लेते हैं-एक अरब लोगों की पहचान हो या परीक्षा व्यवस्था लीक-प्रूफ बनाना। तकनीक और करुणा के मेल से बदलाव संभव है, यही उनका संदेश है।

राजधानी की शामों में जब बंगाली मार्केट की रोशनी जलती है, तो लगता है कुछ कहानियां शहर के साथ चलती रहती हैं। कभी आधार की, कभी परीक्षा सुधार की। और उनके बीच एक आदमी जो दोनों को जोड़ता है। नाम आप जानते ही हैं। उनकी कहानी अभी जारी है। और भारत उनका ऋणी है।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

सरकारों के विरुद्ध चलाए गए छात्र आंदोलन अपने उद्देश्य में कितने सफल

बसंत कुमार

पिछले कुछ सप्ताह से नीट पेपर लीक मामले को लेकर युवाओं से समर्थित काकरोच जनता पार्टी का दिल्ली के जंतर मंतर पर भारी विरोध चल रहा था और इसको राजनीतिक रंग देने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत सभी विपक्षी नेता बारी बारी से जंतर मंतर में अपनी उपस्थिति से इसे एक आंदोलन का स्वरुप दे रहे थे और इस आन्दोलन के समर्थन में समाजसेवी सोनम वांग चुक की 26 दिन की भूख हड़ताल काफी प्रभावी रही और अंततः देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। प्रश्न यह उठता है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान जी का इस्तीफा इस समस्या का स्थाई समाधान है या सरकार पेपर लीक मामलो पर कोई समाधान निकले। इतिहास गवाह है कि स्वतंत्र भारत में कई छात्र आंदोलन हुए हैं और उनके आंदोलन को विपक्षी पार्टियों द्वारा राजनीतिक रंग देने के लिए समर्थन भी दिया गया और ये आंदोलन सरकार को सत्ता से हटाने में सफल भी हो गए पर क्या ये ये आन्दोलन अपने उद्देश्य जिसके लिए शुरू किए गए सफल हो पाए है।

वर्ष 1975में देश में आपातकाल लग गया और इसके विरोध में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी लोक नायक जय प्रकाश नारायन के नेतृत्व में युवाओ ने समग्र क्रांति का आन्दोलन प्रारंभ किया। इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य लोकतंत की बहाली और प्रेस की आजादी था, उस समय भी सभी विपक्षी नेताओं ने इसमें शामिल होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अपनी एक जुटता दिखाई और जेल के अंदर ही जनता पार्टी का गठन हुआ। परिणाम यह हुआ कि दो तिहाई बहुमत वाली इंदिरागांधी की सरकार चुनाव हार गई पर क्या उसके बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना हुई और क्या प्रेस मीडिया की आजादी बहाल हो गई। जनता पार्टी के सत्ता में आते ही घटक दलों में आपस में खींचातानी हुई और जनता पार्टी दो ढाई साल में ही बिखर गई। और राष्ट्रवाद एवं हिंदुत्व के नाम पर अस्तित्व में आया जनसंघ भाजपा के रूप में अपने मुख्य मुद्दों पर समझौता करके सत्ता में आ गया और सत्ता में रहने के लिय पुराने कांग्रेसियों, समाजवादियों को अपने पक्ष में लाकर लगातार सत्ता में बनी हुई है और भाजपा का काग्रेस मुक्त भारत तो दूर कांग्रेस युक्त भाजपा हो गई है।

वर्ष 1990में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दशकों से ठंडे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया, जिससे ओ बी सी को 27%आरक्षण शुरू हुआ, इस आरक्षण के विरोध में देश भर के युवाओं ने विरोध किया और कुछ युवाओं ने आत्म दाह कर लिया, इस विद्रोह के कारण विश्वनाथ प्रताप सिंह सत्ता से बाहर हो गए पर मंडल सिफारिशों के आधार पर ओ बी सी वर्ग को मिलने वाला आरक्षण समाप्त हुआ। इसके उलट देश की राजनीति मंडल और कमण्डल की राजनीति के इर्द गिर्द घूमने लगा। और देश की राजनीति में जाति पर आधारित राजनीतिक दलों जैसे समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल अस्तित्व में आये जिनकी मुख्य राजनीति जाति पर आधारित थी। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब हिंदू मुसलमान और अगड़ा पिछड़ा की राजनीति के बल पर सत्ता में बने रहने के लिए विवश है। अब तक देश की राजनीति में सबसे प्रतिष्ठित व सफल राजघराना सिंधिया का प्रमुख अब अपने आप को ओ बी सी कहने को मजबूर है। यहां तक की देश के प्रधानमंत्री वोटों के खातिर अपने आप को ओ बी सी कह रहे हैं।

वर्ष 2013 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में सरकार थी और जहां दुनिया भर में आर्थिक मंदी का दौर था, डॉ मनमोहन सिंह ने आर्थिक सूझ बूझ से देश को आर्थिक मंदी के दौर से निकाला। पर उसी समय अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल की स्थापना और डॉ मनमोहन सिंह की सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन शुरू हुआ, परिणाम स्वरुप केंद्र के साथ साथ दिल्ली राज्य में अब तक की सबसे सफल माने जाने वाले शिक्षा दीक्षित सरकार चुनाव हार गई। पर अन्ना हजारे आंदोलन के हीरो अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में जो सरकार बनी वह भ्रष्टाचार समाप्त करना तो दूर खुद भ्रष्टाचार में लिप्त रही और भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहली बार हुआ कि प्रदेश का मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और वित्तमंत्री समेत कई नेता जेल में बंद थे। अन्ना हजारे के आंदोलन के कंधे पर बैठकर केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय, सजंय सिंह, किरण बेदी, जनरल वी के सिंह विभिन्न राजनीतिक पदों पर पहुंचे और सत्ता की मलाई खाने में सफल रहे।

अभी देश में नीट परीक्षा के पेपर लीक होने से गुस्साए युवकों ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन किया जिसमें समाज सेवी पर्यावरण विद सोनम वांग चुक ने लगभग 26दिन का अनशन किया और लगभग सभी विपक्षी पार्टियों का इस आंदोलन को भरपूर समर्थन मिला, इस आन्दोलन की मुख्य मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्याग पत्र था। कैसी विडंबना है कि नीट की परीक्षा से पहले उत्तर प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों में लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए और रेलवे और पुलिस भर्ती परीक्षाओं में साल्वर जैसे टर्म आए अर्थात असली परीक्षार्थी की जगह किसी अन्य को परीक्षा में बिठाना। पर कभी किसी ने रेल मंत्री या राजू के मुख्यमंत्री का इस्तीफा नहीं मांगा। अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं पर क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता हैं कि भविष्य में नीट सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो पाएंगी या इस आन्दोलन का भी हाल पिछले आंदोलनों कि तरह ही होगा यानि आगामी चुनावों में सत्ता धारी पार्ट को हराया जा सके और देश की राजनीति में दो एक नेता अपना वर्चस्व बना सके।

इस आन्दोलन की सफलता से कुछ अंध भक्त जो अपने आप को सनातन का रक्षक मानते हैं वे आरक्षण समाप्त करने, एस सी एस टी एक्ट और यू जी सी रोल बैक करने के लिए आंदोलन करने की बात कर रहे, इन बेचारों को ये नहीं पाता कि यह आन्दोलन छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले नीट पेपर लीक के विरोध में हुआ था और वे सरकार से भविष्य में होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए एश्योरेंस चाह रहे थे पर ये लोग भारत की संविधान सभा और संसद द्वारा बनाए गए प्रावधानों को समाप्त करवाने के लिय आन्दोलन करना चाहते हैं। मजे की बात यह है कि ये लोग EWS ओ बी सी आरक्षण को हटाने की मांग नहीं कर रहे इनका मुख्य निशाना हजारों वर्षों से शोषित पीड़ित दलित और आदिवासी समुदाय को मिलने वाला 22%एस सी -एस टी आरक्षण है इनमें कुछ युवा तो ऐसे है कि उनके पिता उनके लिए EWS आरक्षण का जुगाड़ करने के लिए तहसील के चक्कर काट रहे हैं और बेटा सोशल मीडिया पर आरक्षण समाप्त करने के लिय व्याख्यान दे रहा होता है। समय की जरूरत यह है कि देश का युवा जातीय पूर्वाग्रह को छोड़कर देश और समाज के हित से संबंधित मामलों पर आंदोलन का रास्ता अपनाए।

यह सच है कि युवकों द्वारा किए गए आंदोलनों ने कही बार देश के अंदर और नेपाल और बंगला देश में सरकार बदल दी है पर विचारणीय प्रश्न यह है कि जिस उद्देश्य के लिये ये आंदोलन चलाए गए वे उद्देश्य पूरे हुए। किसी सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिय कुछ राजनीतिक दलों या संगठनों द्वारा युवाओं को भ्रमित करके आंदोलन चलाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध है और इससे परहेज किया जाना चाहिए।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

बाढ़ का कैसे मुकाबला करता भारत

विवेक शुक्ला

एक बार फिर से देश के कई राज्य इस वक्त बाढ़ की चपेट में हैं। जान-माल का नुकसान भी हुआ है। लोग अपने घरों से बाहर निकलकर राहत शिविरों में आश्रय लिए हुए हैं। लेकिन अच्छी बात यह रही कि बचाव और राहत कार्यों में बड़ी ही तत्परता से सेना, नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ), स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एसडीआरएफ), फायर और इमरजेंसी सर्विस के जवान तैनात हो गए और बाढ़ प्रभावित इलाकों में नुकसान न्यूनतम हुआ।

असम में बाढ़: एक नियमित चुनौती -  वैसे असम में बाढ़ की यह स्थिति हर साल बनती है। लाखों लोग प्रभावित होते हैं। बाढ़ यहां के जीवन का एक नियमित हिस्सा बन गई है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बाढ़-संभावित क्षेत्र में आता है, क्योंकि यह ब्रह्मपुत्र नदी की जद में है और हिमालय से निकलने वाली 50 से ज्यादा सहायक नदियां इसमें आकर मिलती हैं। हालांकि यह एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन इससे बचने का या न्यूनतम नुकसान की एक मजबूत व्यवस्था देश में उपलब्ध है।

आपदा प्रबंधन का मजबूत इकोसिस्टम - आप इतना तो मानिए कि इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिन्होंने आपदा प्रबंधन का एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है, जो वैश्विक मानदंडों पर न सिर्फ खड़ा उतरता है, बल्कि दुनिया के कई देशों को नेतृत्व भी प्रदान कर रहा है। आज भारत आपदा प्रबंधन की ग्लोबल रैंकिंग में विश्व के श्रेष्ठ 6 देशों में शामिल हो गया है। भारत में प्राकृतिक आपदा से नुकसान कुल जीडीपी का केवल 0.45 प्रतिशत होता है।

पिछले दो दशकों के आंकड़े: सुधार की कहानी - पिछले दो दशकों के आंकड़े देखें तो स्पष्ट होता है कि हर साल देश के आपदा प्रबंधन में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है। 2013-14 में जहां प्राकृतिक आपदा से 5,677 लोगों की मौतें हुई थीं, वहीं 2024-25 में 3,080 लोगों की मौतें हुईं। इसी तरह से मवेशियों का सबसे ज्यादा नुकसान 2006-07 में हुआ जब यह आंकड़ा 4.55 लाख तक पहुँच गया। 2023-24 में यह आंकड़ा 1.19 लाख रहा। 2007-08 में प्राकृतिक आपदा से 35 लाख से ज्यादा घर प्रभावित हुए, जबकि 2023-24 में 1.4 लाख घरों को इन्हीं आपदाओं से नुकसान हुआ। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि तैयारी, समन्वय और त्वरित प्रतिक्रिया की क्षमता में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

देश में आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की है, और वह लगातार कह रहे हैं कि भारत प्राकृतिक आपदाओं से शून्य मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है। वह केवल भौतिक उपायों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के उपायों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।

वैश्विक नेतृत्व और संस्थागत ढांचा - भारत को इस समय आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन में क्षमता निर्माण, गति, दक्षता और सटीकता के कई मानदंड स्थापित किये हैं। इस समय राज्यों के हर जिले में आपदा प्रबंधन योजना तैयार की जा रही है। हर प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कार्य योजना तैयार की जा रही है। इसी का परिणाम है कि भारत कई आपदाओं में शून्य मानवीय जान के नुकसान की उपलब्धि हासिल कर पाया है। चक्रवातों से न्यूनतम नुकसान से निपटने का रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि किस तरह केंद्र, राज्य और स्थानीय इकाइयां मिलकर बड़ी सफलताएं हासिल कर सकते हैं। मोदी सरकार ने नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए), नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) के बेहतरीन ढांचे खड़े कर दिए हैं।

नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) की तत्परता और कार्यकुशलता का प्रमाण हमने कई बार देख लिया है। इस बल ने अब तक खतरे में फंसे 1,68,000 से ज्यादा लोगों की जान बचाई। फंसे हुए 8,50,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया और 2024 में रिकॉर्ड 1,038 ऑपरेशन किए। मानसून आने से पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों को किसी भी संभावित आपदा से निपटने की व्यवस्था मजबूत करने का दिशा निर्देश दे दिया था। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाली एक एकीकृत प्रणाली भी एक्टिव कर दी गई थी। अर्ली वार्निंग सिस्टम से जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को विशेष कर जोड़ा गया।

उत्तर प्रदेश और बिहार में सतर्कता - केवल मानसून की बात करें तो असम के साथ-साथ भारत में बाढ़ की सबसे ज्यादा आशंका वाले क्षेत्र उत्तर प्रदेश को माना जाता है। बिहार भी सबसे ज्यादा जोखिम वाला राज्य माना जाता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 7.34 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आती है तो बिहार के कुल 73 प्रतिशत हिस्से पर बाढ़ का खतरा बना रहता है। यहाँ भी गृह मंत्री ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) की टीमों को बिहार और उत्तर प्रदेश भेज दिया गया है। अतिरिक्त बचाव कर्मियों को भी तैनात किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार भी उच्च जोखिम वाले राज्य हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग 7.34 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आती है तो बिहार के कुल 73 प्रतिशत हिस्से पर बाढ़ का खतरा बना रहता है। यहां भी एनडीआरएफ की टीमें भेज दी गई हैं।

भारत को  नदी तल की नियमित सफाई व ड्रेजिंग, जलग्रहण क्षेत्रों में व्यापक वृक्षारोपण पर और अधिक जोर देना चाहिए। गांव स्तर पर सामुदायिक प्रशिक्षण तथा जागरूकता बढ़ाकर स्थानीय क्षमता को और मजबूत करना होगा।  इन ठोस कदमों से शून्य मृत्यु का लक्ष्य और करीब आएगा।प्राकृतिक आपदाओं को रोकने का कोई उपक्रम संभव नहीं है पर उनसे बचने और नुकसान को टालना हमारी जिम्मेदारी है।

बुधवार, 22 जुलाई 2026

सत्तर साल से अधिक आयु के बंदियों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

बसंत कुमार

पिछले दिनों एक क्रिमिनल केस में 85 वर्ष के एक वृद्ध को जेल भेजने का मामला आया, यद्यपि भारत की न्याय व्यवस्था में 20 से 40वर्ष तक  आपराधिक मामले चलते है औरआरोपी जब मरने  की कगार पर पहुंच गए लोगों को जेल भेजने की घटना नई नहीं है। फिर भी जब 85 वर्ष का वृद्ध को जो ठीक से चल भी नहीं सकता जिसको  अपनी दिनचर्या के लिए एक व्यक्ति की जरूरत पड़ती है उसको हत्या के आरोप के  पचासी वर्ष की आयु में जेल भेजना कुछ समझ में नहीं आता। बता दे की इस मामले में फैसला लगभग 40 वर्ष के बाद आया था।इसी तरह 1972 में देश के तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के मामले में फैसला लगभग 50 वर्ष बाद आया और तब तक अधिकांश आरोपियों की मृत्यु हो चुकी थी।ऐसे में 70 वर्ष से अधिक आयु लोगों को जेल में रखने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का एक फैसला आया है जो स्वागत योग्य है क्योंकि किसी अपराधी को दंड देने का न्यायिक सिद्धांत यह है कि इनको सुधारने का मौका दिया जाए पर जिस व्यक्ति को 40 वर्ष के ट्रायल के बाद 85 और 90 वर्ष की आय में जेल भेजा जाएतो इससे अपराधी को सुधरने के सिद्धांत का उल्लंघन होता है।इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की जहां न्याय के दृष्टिकोण से अनुचित है वहीं मानवाधिकार का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों सभी राज्यों को और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार औरअशक्त कैदियों को समय से पहले रिहाई के लिए 3 महीने के भीतर स्पष्ट नीति तैयार कर उसे नोटिफाई करें। कोर्ट ने ऐसी ही प्रक्रिया को पारदर्शी और समय बद्ध बनाने के लिए तकनीक आधारित डिजिटल व्यवस्था लागू करने का भी निर्देश दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।याचिका में देश भर में 70 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग गंभीर रूप से बीमार, अशक्त और असहाय  कैदियों की मानवीय आधार पर समय से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार है-

  • सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को बुजुर्ग और लाइलाज बीमारियों से पीड़ित और अक्षम कैदियों की रिहाई के लिए पारदर्शी और स्पष्ट नियम बनाने होंगे।
  • इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए ex -prison pirtal का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है ताकि समय पर निर्णय हो सके।
  • बीमारी के मामले में जांच के लिए मेडिकल बोर्ड बनाए जाएंगे।
  • इस आदेश का पालन कैसे किया जाय इसकी रिपोर्ट State legal Service Authority के माध्यम से 6महीने में सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी होगी।

इन आदेशों से यह साफ हो जाता है कि कोर्ट को अपराधी को सजा देते समय अपराध की प्रवृत्ति दोषी का पिछला रिकॉर्ड और उसके आयु को ध्यान में रखना चाहिए। पर अभी तक इन तथ्यों का विचार किए बगैर कोर्ट स्टीरियोटाइप ढंग से दोषी पाए जाने वाले लोगों को जेल में डाल देती रहे और इस प्रकार से प्रथम बार अपराध करने वाले कैदी भी जेल की चारदीवारी में रहकर आदतन अपराधियों के सानिध्य में रहकर जब जेल से बाहर निकलते हैं तो वह शातिर अपराधी बन जाते हैं ।अभी हाल में₹40 की रिश्वत लेने वाले 80 वर्षी बुजुर्ग को उच्च न्यायालय द्वारा जेल में भेज दिया गया है जबकि इस अपराधी ने ट्रायल और अपील में मिलाकर कुल 40 वर्ष इस केस में निकाल दिए हैं। इस समय देश में  जेल में उनके कैपेसिटी से अधिक कैदियों की संख्या होने के बावजूद न्यायालय द्वारा बीमार बुजुर्गों को जेल भेजा जा रहा है।

पहली बार अपराध में करने वाले और बीमार लोगों के लिए भारत सरकार की ओर से अपराधी परीविक्षा अधिनियम 1958 (प्रोविजन आफ ऑफेंडर्स एक्ट 1958 )लाया गया जो एक कल्याणकारी और सुधारात्मक कानून है इसका मुख्य उद्देश्य पहले या छोटे-मोटे अपराध के दोषियों को जेल भेजने के बजाय उन्हें परी विक्षा अधिकारी की निगरानी में रखकर सुधरने और समाज में पुनर्निवास का अवसर प्रदान करता है इसके प्रमुख बिंदु और प्रावधान यह है-

  1. चेतावनी देकर छोड़ देना (धारा 4) -यदि व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 379 (चोरी) 380, 381, 404 या 420 के अंतर्गत हो और उसे किसी अन्य अपराध में पहले दोषी नहीं ठहराया गया हो तो फिर उसकी चरित्र अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उसे चेतानी देकर छोड़ दिया जाता है
  2. अच्छे आचरण पर रिहा करना (धारा 4)-यह इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धारा है यदि किसी व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जिसमें सजाये मौत या आजीवन कारावास का प्रावधान नहीं है तो न्यायालय उसे जेल भेजने के बजाय अच्छे आचरण की परीक्षा वधि पर रिहा कर सकता है।
  3. दोस्त सिद्धि का कलंक मिटाना (धारा 12)-इस अधिनियम के तहत लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भविष्य में नौकरियां अन्य जगहों पर किसी प्रकार की अयोग्यता का सामना न करना पड़े, इससे व्यक्ति के जीवन पर अपराध के कलंक से मुक्ति मिल जाती है।

प्रोबेशन एक्ट के कल्याण कारी प्रावधानों के बावजूद न्यायालय छोटे मोटे अपराधों में सजा पाए अभियुक्तो को इस प्राविधान का लाभ देने से कतराती है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्वीकार कर लिया है कि रिहाई शब्द से आपराधिक परिवीक्षा अधिनियम 1958 के अंतर्गत जुर्माने के भुगतान से भी मुक्ति शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार अधिनियम का उद्देश्य अपराधियों को पुनर्वासित करके उन्हें सुधरे हुए नागरिक बनाना है और यह सिद्धांत पर आधारित है कि व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के कारण अपराधी बनता है , यही ध्यान देने की आवश्यकता है कि 1958, का अधिनियम एक लाभकारी कानून है इसलिए विधायी आशय को ध्यान में रखते हुए इन प्रावधानों का उपयोग व्यापक रूप में होना चाहिए। देश में जेलों में बंद इतने अच्छे और गुणी लोग हैं जिन्हें दोष सिद्धि और कारावास के कलंक से मुक्त होकर समाज में पुनर्वासित होने का अवसर अवश्य देना चाहिए।

दुर्भाग्य से निचली अदालत के दुर्भाग्य पूर्ण फैसले को ही अंतिम फैसला मानकर एक दोषी ठहराए व्यक्ति को अपने आप को निर्दोष साबित करने का मौका नहीं मिलता क्योंकि ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई में 20वर्ष से अधिक लग जाते हैं ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का नया आदेश ऐसे लोगो के लिय राहत ले आयेगा।

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