बुधवार, 24 जून 2026

हर हाथ में किताब हो, औजार नहीं

महेशानंद भाई

सुबह के सात बजे हैं। स्कूल की घंटी बजने वाली है। एक तरफ बस्ता उठाए बच्चे दौड़ते हुए कक्षा की ओर जा रहे हैं, दूसरी तरफ एक आठ साल का बच्चा किसी ढाबे पर जूठे बर्तनों का ढेर साफ कर रहा है। यह सिर्फ एक दृश्य नहीं है यह हमारे समाज का वह कड़वा सच है जिससे हम अक्सर आंखें चुरा लेते हैं। यह कोई मामूली समस्या नहीं है बल्कि यह अपराध पर चुनी हुई एक चुप्पी है समाज की, व्यवस्था की और हम सबकी। बाल श्रम को समझना हो तो पहले यह समझना होगा कि यह पनपता कहां से है? यह कहना सही है कि गरीबी बाल श्रम को बढ़ावा देती है, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि बाल श्रम गरीबी को बनाए रखता है। जब बच्चे पढ़ाई छोड़कर कम उम्र में काम करने लगते हैं, तो वे शिक्षा और बेहतर रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इससे उनका भविष्य सीमित हो जाता है और गरीबी का चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। इसके साथ ही अशिक्षा, सामाजिक असमानता, भेदभाव और कानूनों के कमजोर पालन जैसी समस्याएं भी बाल श्रम को बढ़ावा देती हैं। ईंट-भट्ठों, होटल-ढाबों, घरेलू कामकाज, बीड़ी उद्योग और खेत-खलिहानों में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे काम करते दिखाई देते हैं। चूंकि उत्तर प्रदेश में जनसंख्या अधिक है इसलिए यहां समस्या भी बड़े रूप में सामने आती है।  ऐसे में राज्य सरकार का वर्ष 2027 तक प्रदेश को बाल श्रम मुक्त बनाने की प्रतिबद्धता सराहनीय है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह हजारों बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और बेहतर भविष्य का अवसर प्रदान कर सकता है।

हालांकि बाल श्रम रोकने के लिए कानूनी ढांचा मौजूद है। बाल एवं किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम और शिक्षा का अधिकार कानून जैसे कई और कानून पहले से हैं। बावजूद इसके कानून और जमीनी हकीकत के बीच की खाई आज भी चौड़ी है। श्रम विभाग की छापेमारी होती है, बच्चे छुड़ाए जाते हैं, नियोक्ताओं पर कड़ी कार्रवाई की बजाए मामूली खानापूर्ति के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है। जिससे वो फिर एक नई ऊर्जा के साथ किसी और मासूम को बाल श्रम के दलदल में फंसा देते हैं। लेकिन इस दुष्चक्र का अंत यहीं नहीं हो जाता क्योंकि अगर मुक्त कराए गए बच्चे को पुनर्वास नहीं मिला, तो वह दोबारा उसी दलदल में लौट जाता है। यही वह बिंदु है जहां कानूनी कार्रवाई नाकाफी साबित होती है। असली काम बच्चे को छुड़ाने के बाद शुरू होता है। उसे स्कूल में दाखिला दिलाना, परिवार को आर्थिक सहायता देना और समाज में उसकी सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित करना यह पूरी प्रक्रिया उतनी ही जरूरी है जितनी छापेमारी।

बाल श्रम के खात्मे का सबसे कारगर और टिकाउ इलाज है स्कूल, जो बच्चा नियमित रूप से स्कूल जाता है, वह बाल मजदूर नहीं बनता। इस क्रम में मध्याह्न भोजन योजना ने लाखों गरीब बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाई है। समग्र शिक्षा अभियान, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय और विशेष प्रशिक्षण केंद्र ये सब उन बच्चों के लिए उम्मीद की खिड़कियां हैं जो बाल मजदूरी के अंधेरे से बाहर निकल रहे हैं। अब जरूरत इस बात की है कि बारहवीं तक की शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण, अनिवार्य और निःशुल्क के आयामों को जमीन पर उतारा जाए। महज कागजी अनिवार्यता से काम नहीं चलेगा यह सुनिश्चित करना होगा कि हर बच्चा स्कूल में हो। 

बाल श्रम में लड़कियों की स्थिति और भी दयनीय है। घरेलू काम और सामाजिक भेदभाव उन्हें शिक्षा से दूर रखते हैं। बेटी है तो पराया धन ही जैसी मानसिकता के चलते उन्हें पढ़ाई से दूर कर घर बैठाने वाली परिस्थितियां बाल श्रम के लिए मुफीद हैं। हालांकि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं समाज की सोच बदलने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन यह लड़ाई लंबी है। बाल श्रम और ट्रैफिकिंग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ट्रैफिकिंग के जरिए बच्चों को उनके घरों से दूर कहीं बाल श्रम के दलदल में फंसा दिया जाता है। इस जघन्य अपराध पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है बाल श्रम के लिए चिह्नित 543 हॉटस्पॉट पर एक मजबूत सक्रिय जमीनी नेटवर्क और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की चौबीसों घंटे प्रतिबद्धता जरूरी है। इस दिशा में नागरिक समाज की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। 

बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) अपने 250 से अधिक सहयोगियों के साथ देश के 450 से ज्यादा जिलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर बच्चों को बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग से बचाने के लिए काम कर रहे है। जेआरसी अपने 25 सहयोगी संगठनों के साथ उत्तर प्रदेश के 41 जिलों में राज्य सरकार के बाल श्रम-मुक्त प्रदेश के लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा है। इसी क्रम में सरकार के सहयोग से वर्ष 2027 तक 20,000 से अधिक सुरक्षित बाल ग्राम विकसित किए जाएंगे। जेआरसी की यह पहल सरकार और समाज के साझा प्रयासों का एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करेगी।

सबसे जरूरी बात यह है कि यह लड़ाई सरकार अकेले नहीं जीत सकती। हम में से अधिकांश लोग ढाबे पर बर्तन धोते बच्चे को देखकर मुंह फेर लेते हैं। यह उदासीनता भी उतनी ही दोषी है जितना बाल मजदूरी करवाने वाला नियोक्ता। पंचायत स्तर पर जागरूकता, सामाजिक संगठनों की सक्रियता, जनभागीदारी और व्यापक जन जागरूकता के समन्वित प्रयासों से बाल मजदूरी के खिलाफ एक मजबूत दीवार खड़ी कर सकते हैं। इसलिए अगर आप कहीं, किसी भी बच्चे को मजदूरी करते देखें तो चुप मत रहिए। पहले तो उसका बहिष्कार करिए फिर फोन करिए, एक शिकायत किसी बच्चे की पूरी जिंदगी बदल सकती है। क्योंकि जब बच्चा खेलने की उम्र में काम करता है तो सिर्फ उसका बचपन ही नहीं छिनता बल्कि देश का एक उज्जवल भविष्य भी छिन जाता है। 

एक पढ़ा-लिखा, स्वस्थ और आत्मविश्वासी बच्चा राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार 2027 तक राज्य को बाल श्रम मुक्त बनाने के लक्ष्य को कानूनों पर सख्त अमल, प्रभावी पुनर्वास, शिक्षा और जनभागीदारी के संयुक्त प्रयासों से साकार किया जा सकेगा। लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब सरकार के साथ समाज, परिवार और सामाजिक संगठन भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें, ताकि बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो।

(लेखक ग्राम स्वराज्य समिति के निदेशक हैं।)

मंगलवार, 23 जून 2026

दिल्ली में कब टूटने रुकेंगे मेहनतकशों के आशियाने

विवेक शुक्ला

अब शायद ही कोई दिन गुजरता हो जब गरीबों के आशियानों पर बुलडोजर ना चलता हो। दरअसल दिल्ली में विकास के नाम पर बीते दशकों से लाखों लोगों के आशियानों को तोड़कर इमारतें बनती रही हैं। सवाल उठता है कि दशकों से एक जगह पर बसे परिवारों को उनके आशियाने से क्यों हटाया जाता है। क्या कोई ठोस और मानवीय नीति नहीं बनाई जा सकती। बीती कुछ सरकारों ने झुग्गी निवासियों के लिए फ्लैट बनाने की पहल की, लेकिन समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

स्वतंत्रता के बाद दिल्ली में तेजी से आबादी बढ़ी। ग्रामीण क्षेत्रों से आए मजदूरों ने शहर के कोनों में झुग्गियां बसाईं। 1956 के स्लम एरिया इम्प्रूवमेंट एंड क्लियरेंस एक्ट के तहत शुरू हुईं स्लम क्लियरेंस स्कीम। इमरजेंसी काल 1975-77 में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ हुई। तुर्कमान गेट में बड़ी संख्या में सरकारी जमीन पर बने घर तोड़े गए। उन्हें रंजीत नगर में बसाया गया। जानकारों ने बताया कि 1990 से 2003 के बीच दिल्ली में करीब 51,461 घर तोड़े गए। 2004-2007 के बीच और 45,000 से ज्यादा।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के अनुसार शहर में 675 से ज्यादा मान्यता प्राप्त जेजे क्लस्टर हैं, जिनमें लाखों परिवार रहते हैं। अनुमान है कि दिल्ली की आबादी का करीब 20-30 प्रतिशत हिस्सा इन घनी बस्तियों में बसता है। सोशल वर्कर  प्रीतम धारीवाल कहते हैं कि चाणक्यपुरी में बांग्लादेश दूतावास तथा ताज महल और मौर्या होटलों के आसपास की झुग्गियां सुरक्षा और विकास के नाम पर हटाई गईं। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि राजनयिक इलाकों, पर्यटन और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है। झुग्गी हटाने के पीछे मुख्य कारण शहरी विकास, मास्टर प्लान और अतिक्रमण हैं। दिल्ली मास्टर प्लान 2021 और 2041 में स्लम-फ्री शहर का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन अमल में तोड़फोड़ प्रमुख रहती है। सड़क विस्तार, मेट्रो, कमर्शियल प्रोजेक्ट, ग्रीन बेल्ट और नदी किनारे की सफाई जैसे कार्यों के लिए जमीन चाहिए। जी20 समिट से पहले भी बड़े पैमाने पर डेमोलिशन हुए।

तुर्कमान गेट- 1975 से 2026 - दिल्ली में घरों या दुकानों को तोड़ने की बात होती है तो तुर्कमान गेट की याद आना लाजिमी है। एक 1975 की इमरजेंसी की काली रात, और दूसरी 2026 की ठंडी जनवरी की आधी रात। 1975 की वह अप्रैल की सुबह। तब इमरजेंसी का दौर था। तुर्कमान गेट में बने अवैध निर्माण पर बुलडोजर चले। "अतिक्रमण हटाओ," चिल्लाते हुए अधिकारी आए। तुर्कमान गेट के सोशल वर्कर मकसूद अहमद कहते हैं कि जब वहां पुलिस एक्शन हो रहा था तब संजय गांधी करीब के रणजीत होटल में बैठकर पल पल की जानकारी ले रहे थे। पुलिस एक्शन का लोगों ने विरोध किया। वे रहे थे, "यह हमारा घर है, सदियों से यहां रहते हैं।" अब रणजीत होटल भी खत्म हो चुका है।

तब दिल्ली पुलिस और स्थानीय लोगों में जमकर संघर्ष हुआ। बहुत सारे लोग घायल हुए। विस्थापित लोगों को करोल बाग के आगे रणजीत नगर में प्लाट मिले थे। वहां पर रहते हुए उन्हें अब आधी सदी हो रही है। जो लोग तुर्कमान गेट से रणजीत नगर भेजे गए थे अब उनके बच्चे और बच्चों के बच्चे भी बड़े हो चुके हैं। बच्चों ने तो तुर्कमान गेट की कहानियां ही सुनी हैं।

समय बीता, तोड़फोड़ जारी रही - तब से दिल्ली बदलती गई। लेकिन पुरानी दिल्ली की गलियां वैसी ही संकरी रहीं। और फिर, 6 जनवरी 2026 की आधी रात एक बार फिर से तुर्कमान गेट में 1975 की यादें ताजा हो गईं। दिल्ली की सर्द रात के कारण आसपास सब लोग घरों में दुबके हुए थे। तब दिल्ली नगर निगम ने अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू किया।  वहां पर दिल्ली पुलिस के भी बहुत सारे जवान थे। फाइज-ए-इलाही मस्जिद के आसपास की जमीन पर बने अवैध निर्माणों को निशाना बनाया गया। आधिकारिक तौर पर सुबह 8 बजे शुरू होना था, लेकिन बुलडोजर रात 1:30 बजे ही आए।

शोर से लोग जाग गए कोलाहल के कारण। वे घर से बाहर आए। कुछ देर के बाद पत्थरबाजी शुरू हो गई। पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। 1975 की यादें घूम गईं। लोग फिर से  जगमोहन को कोस रहे थे। कुछ ने कहा, "यह 1975 की पुनरावृत्ति है," जबकि सरकार ने इसे 'कानूनी कार्रवाई' बताया। खैर, तुर्कमान गेट के साथ 1975 के साथ अब 2026 भी जुड़ गया। जगमोहन कहते थे कि उन्हें तुर्कमान गेट की कार्रवाई का जिम्मेदारी माना जाता है। पर वे तो कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे थे। अब वे भी गुजर चुके हैं। उन्होंने एक बार इस लेखक को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बताया था कि उन्होंने ही दिल्ली में पहली बार 1955 में नबी करीब के पास अतिक्रमण हटाए थे। तब भी बहुत बवाल हुआ था।

एक बात याद रखे कि अधिकांश  बस्तियां सरकारी जमीन पर हैं.जु पर बुलडोजर चलता है। ये रेलवे, डीडीए, एमसीडी या अन्य एजेंसियों की होती है। यहां रहने वाले दशकों पुराने दस्तावेज रखते हैं, फिर भी उन्हें अवैध माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश अक्सर हटाने के पक्ष में होते हैं, जबकि पुनर्वास अपर्याप्त रहता है।

शीला दीक्षित सरकार ने 2007 में कम लागत वाले फ्लैट बनाने का फैसला किया। कालकाजी  हजारों फ्लैट बने, लेकिन कई खाली पड़े रहे और आवंटन में देरी हुई। आम आदमी पार्टी की सरकार ने 2015 में दिल्ली स्लम एवं जेजे रिहैबिलिटेशन एंड रिलोकेशन पॉलिसी लाई।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भी काम हुआ। हाल ही में 2026 पॉलिसी की चर्चा हुई, जिसमें स्थायी आवास पर जोर है।विस्थापन केवल घर नहीं छीनता। महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। शिक्षा बाधित होती है, स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं, रोजगार छिन जाता है। कई अध्ययनों में पाया गया कि विस्थापित परिवार पुरानी आमदनी का आधा भी नहीं कमा पाते। दिल्ली की अर्थव्यवस्था इन मजदूरों पर निर्भर है, फिर भी उन्हें समस्या माना जाता है।

समय आ गया है कि दिल्ली एक समावेशी मानवीय नीति बनाए। 2025 कट-ऑफ के आधार पर ताजा सर्वे कर सभी बस्तियों को मान्यता दी जाए। झुग्गियों में रहने वालों को भी इस देश का नागरिक माना जाए। स्थानीय लोगों, एनजीओ और विशेषज्ञों की भागीदारी से योजना बनाई जाए। रोजगार लिंकेज और सामुदायिक सुविधाएं दी जाएं। मास्टर प्लान 2041 में स्लम को विकास का अंग माना जाए।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और डीडीए की जिम्मेदारी है कि वे इन दिशाओं में ठोस कदम उठाएं। दिल्ली को विश्व स्तरीय शहर बनाने का सपना तभी पूरा होगा जब गरीब भी उसका हिस्सा महसूस करेंगे। विकास सबका होना चाहिए, न कि कुछ चुनिंदा लोगों का। झुग्गी तोड़ना आसान है, लेकिन लाखों परिवारों को सम्मानजनक जीवन देना असली चुनौती है। शीला दीक्षित और आप के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए एक लंबी अवधि की मानवीय नीति बनानी होगी, ताकि विकास की आंधी में कोई आशियाना न उजड़े।

मंगलवार, 16 जून 2026

ब्राजील: फीफा विश्व कप की सबसे पसंदीदा टीम क्यों?

विवेक शुक्ला

ब्राजील के बिना फीफा विश्व कप की कल्पना करना भी नामुमकिन है। जब ब्राजील की टीम मैदान पर उतरती है, तो माहौल जादुई हो जाता है। पीली जर्सी में सजे खिलाड़ी जैसे फुटबॉल का जादू बिखेर देते हैं। पूरा स्टेडियम नाच उठता है, संगीत गूंजने लगता है। ब्राजील न सिर्फ मैच जीतता है, बल्कि करोड़ों दर्शकों के दिल जीत लेता है। यही वजह है कि हर विश्व कप में ब्राजील सबसे बड़ा फेवरेट माना जाता है। ब्राजील की टीम ने चालू विश्व कप के पहले मैच में मोरोक्को के खिलाफ कोई चमकदार प्रदर्शन नहीं किया, पर उसका जलवा बरकरार है।

ब्राजील फीफा विश्व कप का सबसे सफल और लोकप्रिय देश है। वे एकमात्र टीम हैं जिसने हर विश्व कप में हिस्सा लिया है और रिकॉर्ड पांच बार खिताब जीता है। 1958, 1962, 1970, 1994 और 2002 में। कोई भी टीम इतनी निरंतरता और सफलता नहीं दिखा पाई है। शुरू से ही ब्राजील ने यूरोपीय दबदबे को चुनौती दी और फुटबॉल को नया आयाम दिया।

1958 का स्वीडन विश्व कप ब्राजील के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। सिर्फ 17 साल के पेले ने अपनी चमक से दुनिया को चौंका दिया और ब्राजील पहली बार चैंपियन बना। 1962 के चिली विश्व कप में पेले चोटिल हो गए, लेकिन गार्रिंचा के नेतृत्व में टीम ने दूसरा खिताब जीत लिया। गार्रिंचा इतिहास के सबसे महान ड्रिब्लर्स में से एक थे। उनकी विकृत टांगों के बावजूद गेंद के साथ उनका जादू आज भी याद किया जाता है।

1970 का मेक्सिको विश्व कप ब्राजील के कलात्मक फुटबॉल का स्वर्णिम अध्याय था। पेले, जर्सिन्हो, टोस्टाओ, रिवेलिनो और कार्लोस अल्बर्टो जैसी दिग्गजों से सजी टीम को आज भी विश्व कप इतिहास की सर्वश्रेष्ठ टीम माना जाता है। फाइनल में इटली को 4-1 से हराकर तीसरा खिताब जीतने के साथ ब्राजील ने जूल्स रीमेट ट्रॉफी को स्थायी रूप से अपने नाम कर लिया। तीन बार जीतने वाली टीम को ट्रॉफी हमेशा के लिए मिल जाती थी, इसलिए नई ट्रॉफी शुरू की गई।

1982 की स्पेन विश्व कप टीम हालांकि खिताब नहीं जीत सकी, लेकिन कई विशेषज्ञों के लिए कलात्मकता के मामले में सबसे बेहतरीन रही। टेले सांताना की कोचिंग में ज़िको, सोक्रेट्स, फाल्काओ, एडर और जूनियर वाली टीम ने फुटबॉल का नया मापदंड पेश किया। वे जीतने से ज्यादा खेल का आनंद लेते थे। ग्रुप स्टेज में न्यूजीलैंड को 4-0, स्कॉटलैंड को 4-1 और सोवियत संघ को 2-1 से हराने वाली यह टीम क्वार्टर फाइनल में इटली से 3-2 से हार गई, लेकिन सबसे बेहतरीन टीम जो कभी विश्व कप नहीं जीतीके रूप में अमर हो गई।

पेप गार्डिओला जैसे महान कोच ने इसे सबसे अद्भुत राष्ट्रीय टीमकरार दिया। ज़िको की क्रिएटिविटी, सोक्रेट्स की विजन और कप्तानी, फाल्काओ की मिडफील्ड मास्टरी और एडर के खतरनाक शॉट्स आज भी फुटबॉल प्रेमियों को प्रेरित करते हैं। यह टीम साबित करती है कि फुटबॉल में नतीजे से ज्यादा स्टाइल, जुनून और सुंदरता मायने रखती है।

ब्राजील की फुटबॉल सिर्फ जीत का खेल नहीं, बल्कि कला का प्रदर्शन है। उनकी पासिंग लाजवाब, ड्रिब्लिंग मंत्रमुग्ध करने वाली और ऑफ-बॉल मूवमेंट संगीतमय होता है। ब्राजील के समुद्र तटों, फुटबॉल मैदानों और गलियों से निकलने वाले खिलाड़ी बचपन से गेंद के साथ नाचते-खेलते बड़े होते हैं। गरीबी की चुनौतियों के बीच फुटबॉल उनके लिए उम्मीद और सपनों का माध्यम बन जाता है। यही संस्कृति उन्हें अलग बनाती है।

पेले को द किंगकहा जाता है। उन्होंने तीन विश्व कप जीते, 12 गोल किए और 1000 से ज्यादा गोलों का रिकॉर्ड बनाया। उनका खेल सरल लेकिन बेहद प्रभावी था। रोनाल्डो की स्पीड, पावर और फिनिशिंग ने 2002 में ब्राजील को खिताब दिलाया। उन्होंने 15 विश्व कप गोल किए, जो आज भी रिकॉर्ड है। रोनाल्डिन्हो का मुस्कुराता जादू हर किसी के जेहन में है। आज नेमार, विनीसियस जूनियर, रोड्रिगो और अन्य युवा सितारे उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। ब्राजील का खेल हमेशा आक्रामक, खुशमिजाज और अप्रत्याशित रहता है। वे डिफेंस को भेदने के बजाय उसे नाचते-गाते पार कर जाते हैं।

ब्राजील की सफलता के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है विशाल टैलेंट पूल। 20 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में हर गली-मोहल्ले में फुटबॉल खेला जाता है। यहां फुटबॉल धर्म की तरह है। कार्निवल की लय, सांबा की ताल और फुटबॉल का अनोखा मिश्रण खिलाड़ियों को आत्मविश्वास और रचनात्मकता देता है। तकनीकी रूप से भी ब्राजील हमेशा आगे रहा। 1958 की टीम ने 4-2-4 फॉर्मेशन का इस्तेमाल किया, जो आधुनिक फुटबॉल की नींव बना।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में चुनौतियां आई हैं। 2014 में घरेलू मैदान पर जर्मनी के हाथों 7-1 की करारी हार और 2022 में क्वार्टर फाइनल में निराशा याद है। यूरोपीय टीमों ने शारीरिक और सामरिक तैयारी में तेजी दिखाई है। फिर भी हर टूर्नामेंट से पहले ब्राजील को सबसे मजबूत दावेदार माना जाता है। उनका आत्मविश्वास, विरासत और अप्रत्याशित खेल उन्हें फेवरेट बनाए रखता है। 2026 में भी वे ट्रॉफी का प्रबल दावेदार हैं।

दुनिया भर में ब्राजील सबसे पसंदीदा टीम क्यों है? क्योंकि वे फुटबॉल को मनोरंजन और कला से जोड़ते हैं। भारत में भी ब्राजील का जलवा खास है। पेले की कहानियां 1950-60 के दशक से भारतीयों को आकर्षित करती रहीं। 1982 की टीम ने युवाओं को दीवाना बना दिया। केरल, पश्चिम बंगाल, गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों में ब्राजील समर्थक सबसे ज्यादा हैं। भारतीय दर्शक कौशल, फ्लेयर और खुशी चाहते हैं, जो ब्राजील खूब देता है। दोनों देशों की उपनिवेशवाद विरोधी भावना भी इस लगाव को मजबूत करती है।

ब्राजील का विश्व कप में जलवा सिर्फ ट्रॉफी जीतने से नहीं, बल्कि फुटबॉल को सुंदरता और जुनून से भरने से है। 1970 की चैंपियन टीम से लेकर 1982 की जादुई टीम, पेले से ज़िको-सोक्रेट्स, रोनाल्डो-रोनाल्डिन्हो और विनीसियस तक की यात्रा हर फुटबॉल प्रेमी को प्रेरित करती है। वे सिखाते हैं कि खेल सिर्फ परिणाम नहीं, प्रक्रिया, जुनून और कला भी होता है।

ओ ब्राजील, ओ ब्राजीलका नारा सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक है। 2026 विश्व कप में फिर से सेलेकाओ का जादू देखने का इंतजार है। ब्राजील फुटबॉल की आत्मा है और यही वजह है कि वह हर विश्व कप की सबसे पसंदीदा टीम बनी रहती है।

 

शनिवार, 13 जून 2026

हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण

बसंत कुमार
पिछले दिनों बकरीद के अवसर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्रीश्री मुख्तार अब्बास नकवी जी को बकरीद की हार्दिक शुभकामनाएं देने गया । इस दौरान नकवी साहब से मेरी आने वाली अगली पुस्तक जो हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण पर चर्चा होने लगी और इस चर्चा में श्री नक़वीने मनुस्मृति में कर्म के आधार पर दी गई वर्ण व्यवस्था की तारीफ करते हुए बताया की मनु के वर्ण  व्यवस्था से हमको परंपरागत रूप में दक्ष कारीगर मिल जाते थे जैसेलोहार, सोनार, बढ़ई, नाई, बुनकर दर्जी या अन्य कार्यों के लिये बगैर किसी ट्रेनिंग के दक्ष कारीगर मिल जाया करते हैं और यह प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, यद्यपि मनुस्मृति में महिलाओं और शूद्रों की शिक्षा व धर्म ग्रंथो पर जो प्रतिबंध था उसको जायज नहीं ठहराया जा सकता, फिर भी मुझे नकवी जी के तर्कों में दम लगा और मुझे उचित प्रतीत हुआ कि इस समय हिंदू धर्म में सवर्ण बनाम दलित पिछड़े का जो विवाद चल रहा है उस पर विस्तार से चर्चा की जाए, वैसे सभी लोगों को यह पता होगा कि मुख्तार अब्बास नकवी देश के उन गिने चुने नेताओं में से एक है जिसके यहां ईद -' हाेली- दिवाली उसी उत्साह से मनाई जाती है।
हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था एक ऐसा विषय है जो प्रारंभिक काल से आज तक विद्यमान है। प्रारंभ में वर्ण व्यवस्था समाज के विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से करने के लिए निर्धारित की गई थी पर वही वर्ण व्यवस्था हिंदू समाज में आज तनाव का कारण बनी हुई है और जब से सोशल मीडिया आया है तब से दलित बनाम सवर्ण का विवाद अपने विकराल रूप में आ गया है, जिसे रोका जाना अत्यंत आवश्यक है इसके लिए हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों को हिंदू धर्म के मर्म को जाना आवश्यक है। आज हिंदू दलितों को राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू तो मान लेते हैं पर उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते, वहीं दलित अपने आप को हिंदू नहीं मानते पर संविधान में प्रदाता आरक्षण कल का लाभ लेने केलिए अपने आप को हिंदू कहते हैं इस कारण हिंदुत्व के मौलिक स्वरूप को जानना अत्यंत आवश्यक है।
हिंदुत्व प्राचीन काल से भारतीय समाज की संस्कृत व संस्कारों की रक्षा करता रहा है वेद ,पुराण, हमारे अन्य ग्रंथ धर्म ग्रंथ हमारी संस्कृति के मौलिक स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं, वास्तव में हिंदू धर्म हमें नीति बद्ध तरीके से चलकर सुकर्म करते हुए जीने की कला सिखाता है स्वस्थ समाज के निर्माण में धर्म का पालन आवश्यक है इसके बिना एक स्वस्थ आदर्श समाज का निर्माण नहीं हो सकता। समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म का पालन करें जैसे समाज में पिता का धर्म ,पुत्र का धर्म ,राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, शिक्षक का धर्म , विद्यार्थी का धर्म निश्चित कर दिए गए हैं यदि इनमें से कोई भी अपने धर्म से विमुख होता या अपने धर्म का अतिक्रमण करेगा तो समाज में अराजकता व्याप्त हो जाएगी जैसे आजकल हिंदू समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, पंच वर्ण दलित समाज के टकराव के कारण हिंदू धर्म पतन की ओर जा रहा है लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या तो पाखंडवाद की ओर जा रहे हैं या वे नास्तिक हो रहे हैं जबकि समाज अपने शैशवकाल से आज तक धर्म सापेक्ष रहकर एक सुंदर समाज के रूप में विद्यमान है धर्म से ही मानव जीवन में नैतिक मूल्य और संस्कारों का रोपण होता है और धर्म से ही मानवता अभी संचित व अभिसंचित होती है। समाज में विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से चलने के लिए वर्ण व्यवस्था निश्चित की गई गीता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है की चार वर्णों का निर्माण कर्म और योग्यता के आधार पर निर्धारित किया गया परंतु कालांतर में यह कब जन्म पर आधारित हो गया यह शोध का विषय है। प्रारंभ में हिंदू धर्म में चार वर्ण अस्तित्व में आए- ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र को कर्मों के अनुसार बांटा गया ब्राह्मण का मुख्य कार्य यज्ञ करना वेद पढ़ना और उनका अध्ययन करना था तथा आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में शिक्षा देना एवं पुरोहित के रूप में समाज में आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करना था। वे कानून और न्याय प्रणाली  के विशेषज्ञ माने जाते थे तथा कानून और न्याय के मामले में उनका परामर्श लिया जाता था, परंपरागत रूप से ब्राह्मण को सामाजिक वर्गों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, क्षत्रिय पदानुक्रम में ब्राह्मण के बाद आता था। क्षत्रिय वर्ण के लोगों का काम गांव कबीलों को राज्य की रक्षा करना था मनु के अनुसार इस वर्ण के लोगों का कर्तव्य वेद अध्ययन, प्रजापालन दान और दक्षिणा करना तथा विषय वासना से दूर रहना था वशिष्ठ ने इन लोगों का मुख्य व्यवसाय अध्ययन शास्त्रअभ्यास और प्रजापालन बताया है।
हिंदू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य समाज वर्णाश्रम का तीसरा स्तंभ था इसको लक्ष्मी पुत्र भी कहा जाता था, ऐसा माना जाता है कि वैसे समाज की 90% जातियां पहले क्षत्रिय थी और वर्ण व्यवस्था का चौथा वर्ण शूद्र पदानुक्रम क्रम में चौथे स्थान पर था, शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था वेदों में शूद्रों को सेवा करने वाले और श्रमिक के रूप में प्रस्तुत किया गया वह अपने श्रम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था उस पर अनेक प्रतिबंध थे पर वे अछूत नहीं थे। प्रसिद्ध  अर्थशास्त्री राष्ट्रवादी चिंतक डॉसुब्रमण्यम स्वामी हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था की व्युत्पत्ति के लिए हिंदू धर्म में स्थानांतरण को दोषी मानते हैं, वे कहते हैं कि दलितों की व्युत्पत्ति 5000 साल के हिंदू काल में नहीं हुई,बल्कि 800 वर्षों के मुस्लिम शासन 200 वर्षों के अंग्रेज शासन के दौरान जिन्होंने जजिया कर नहीं दिया और ना ही धर्मांतरण किया उन्हें मैला ढोने और मरे हुए पशुओ को ढोने व उनकी खाल उतारने तथा उनका मांस खाने के लिए विवश कर दिया गया और वे अछूत बन गए !वास्तव में ये लोग कट्टर हिंदू थे जिन्होंने उपेक्षित और अपमानित होने के बावजूद न तो मुगलों की गुलामीस्वीकार की और न ही धर्म परिवर्तन किया तथा हिंदू बने रहे ,वे शूद्र व दलितमूलतः ब्राह्मण और क्षत्रियों के वंशज हैं जिन्होंने हिंदू वर्ण व्यवस्था में जाति पदानुक्रम से बाहर होना स्वीकार किया लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया, आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए उन्हें कोटिश प्रणाम करना चाहिए कि उन्होंने भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया भले ही उन्होंने अपमान और दमनझेला और आज भी झेल रहे हैं।
प्रसिद्ध लेखक शेयरिंग एम एम ने अपनी पुस्तक "हिंदू कास्ट एंड ट्राइब्स"में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत के निम्न अछूत जाति के लोग कोई और नहीं बल्कि ब्राह्मण और क्षत्रिय थे एक और लेखक स्टेकर राइट्स ने अपनी पुस्तक" कस्टम्स एंड देयर ओरिजिन "में लिखा है कि दलित जातियां वे हैं जो मुगलो से हारी तथा मुगलों ने उन्हें अपमानित करने के लिए मानवाने तरीके से उनसे गंदे से गंदे काम करवाएं, पार आश्चर्य इस बात का है की 1857 में मुगल साम्राज्य का अंत हो गया और 1947 में देश हजार वर्ष की गुलामी के बाद आजाद हो गया पर मुसलमानो द्वारा चलाए बनाए गए दलितों के साथ बार-बार अमानवीय घटनाएं उन हिंदुओं द्वारा दी गई जो इस देश के गुलाम बनने से पूर्व उन्हीं के वर्ण के थे। विगत कुछ वर्षों से देश में जिस प्रकार से जातिवादी हिंसा की घटनाएं हो रही है वह चिंता का विषय बनी हुई है , वर्ण विशेष के कुछ लोग जिन्हें वेद पुराण उपनिषद और स्मृतियों के विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है वे भारत को हिंदू राज बनाने की आड़ में दलित और उनके आदर्श डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं, इन अज्ञानी लोगों को इस बात का आभास नहीं है कि दलित अछूत और पिछड़े समुदाय के लोग यदि हिंदू धर्म से अपने आप को अलग कर ले तो क्या 15% आबादी वाला सवर्ण हिंदू समाज हिंदू धर्म प्रतिनिधित्व कर सकेगा, ऐसे लोगों की मनसा यदि पूरी हो गई तो हिंदू राष्ट्र की स्थापना तो दूर हिंदू धर्म का ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जो हिंदू धर्म लगभग 1000 वर्षों की गुलामी के बावजूद भी अपने आप को सुरक्षित रखने में सफल रहा इन स्वयंभू राष्ट्र भक्तों के कारनामों के कारण समाप्त होने की कगार पर है आवश्यकता इस बात की है कि हिंदुस्तान का हर नागरिक स्थिति को माने की हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी कोई भी व्यक्ति एक जाति विशेष में जन्म लेने से ब्राह्मण नहीं हो जाता है, न क्षत्रिय हो जाता है ना वैश्य हो जाता है और नीचे अछूत हो जाता है पर भारत में महार जाति में जन्म लेने के कारण अपने सम कालीन नेताओं में सबसे शिक्षित डॉ आंबेडकर दलित नेता की पहचान से बाहर नहीं निकाल पाए।
हिंदू धर्म के पुनर्जागरण के विषय में अपनी पुस्तक हिंदुत्व एवं राष्ट्रीय पुनरुत्थान में डॉ सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि हिंदू सभ्यता की रक्षा किसी एक व्यक्ति के सहारे नहीं हो सकती और व्यक्तिगत पूजा पाठ से कुछ हासिल नहीं होने वाला। हिंदुओं को अपनी रक्षा के करने के लिए एक संगठित हिंदू मानसिकता विकसित करनी होगी तभी हम अपने ऊपर आने वाले खतरों का सामना कर सकेंगे। हिंदुवाद या हिंदुत्व का अर्थ एक ऐसी संगठन मानसिकता है जो हिमालय से लेकर हिंदू महासागर तक के सारे क्षेत्र को अपनी मातृभूमि मानती है, इसका एक शानदार इतिहास रहा है हिंदू धर्म चाहे कितना भी पवित्र क्यों ना हो ,एक हिंदू मंदिर दानवीरों के दान से कितना धन क्यों नसंचित कर ले,अंततः हिंदूत्ववादी संगठित मानसिकता का ही मूल्य है। देखकर पवित्र या मंदिर के धान का कोई मोल नहीं है मेरा मानना है कि हिंदुत्व में अल्पसंख्यकों को भी शामिल कर सकते हैं जो यह मानते हैं कि उनके पूर्वज हिंदू थे ,फिर हम अपने राष्ट्र को हिंदुस्तान का सकते हैं जिसका अर्थ होगा कि वह भूमि जहां हिंदुओं के साथ वे लोग भी रहते हैं जिनको हिंदुओं का वंशज कहलाने में गर्व महसूस होता है।  यह  भी सत्य  है कि जब हम उन अल्पसंख्यको  को हिंदू मान सकते हैं जिनके पूर्वज हिंदू थे तब हम उन दलित अछूतों को हिंदू मानकर मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते जिन्होंने हिंदू धर्म कभी छोड़ ही नहीं।
वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्र स्थापना के फर्जी झंडा वरदार सीमा पार से और सीमा कें अन्दरसे गैर हिंदुओं द्वारा चलाए जा रहे आतंकवाद का विरोध करने के बजाय हिंदू धर्म के पंच वर्ण (दलित)और उनके महापुरुष डॉ भीमराव अंबेडकर के अस्तित्व को समाप्त करने की बात कर रहे हैं और इसके जवाब में बहुजन समाज भी हिंदू धर्म और उनके आराध्य देवी देवताओं का विरोध कर रहे हैं जब कि इस विवादसे हिंदू धर्म को ही हानि पहुंचेगी।इस बात को ध्यान देने की जरूरत है कि हिंदू धर्म में विकृतियां समाप्त हो और हिंदू धर्म में चाहे अनचाहे जो पंच एकी स्थापना हो गई है उसे न छूना ,मंदिर में उसका प्रवेश न होना, उनके शादी विवाह में घोड़ी पर न चढ़ने देना जैसी कुरीतियों को बंद किया जाए और उन्हें अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार हिंदू के रूप में बराबर का अधिकार दिया जाए इससे भारतीयता और हिंदुत्व दोनों मजबूत होंगे।

गुरुवार, 11 जून 2026

टीएमसी के 19 बागी सांसदों की लिस्ट आई सामने, कोकोली घोष, सायोनी और युसुफ पठान समेत ये नाम शामिल

 

तृणमूल कांग्रेस से बागी हुए 19 सांसदों के नामों लिस्ट सामने आ गई है। इस लिस्ट में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों ने 18 मई को लोकसभा स्पीकर के कार्यालय को अपने नाम भेजे थे। इस लिस्ट काकोली घोष, सायोनी घोष, युसुफ पठान और रचना बनर्जी के नाम शामिल हैं। इस लिस्ट में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम नहीं है। मीडिया रिपोर्ट में पहले शुत्रघ्न सिन्हा का नाम भी इस लिस्ट में बताया जा रहा था। हालांकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि वो अभी भी ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।

बागीं सांसदों की लिस्ट 

काकोली घोष दस्तीदार 

शताब्दी रॉय 

बापी हलदर 

डॉ शर्मिला सरकार 

प्रसून बंद्योपाध्याय 

जगदीश बर्मा बसुनिया 

असित कुमार मल अ

रूप चक्रवर्ती 

रचना बनर्जी 

सायोनी घोष 

खलीलुर्रहमान 

अबू ताहिर खान 

यूसुफ पठान 

मिताली बैग 

माला रॉय 

कालीपद सोरेन 

दीपक अधिकारी 

जून मालिया 

पार्थ भौमिक

चौंकाने वाला है ये नाम - इस लिस्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम सायोनी घोष का है। सायोनी घोष को अभिषेक बनर्जी का खास बताया जाता है। वो अभिषेक बनर्जी ही थे जिन्होंने उन्हें कभी यूथ विंग की चीफ बनाया था। पार्टी में उनकी पहचान एक प्रमुख युवा और लोकप्रिय चेहरे के रूप में रही है। ऐसे में उनका बागी खेमे के साथ जाना टीएमसी नेतृत्व के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। जादवपुर लोकसभा सीट से टीएमसी सांसद सायोनी घोष ने हाल ही में काकोली घोष दस्तीदार से संपर्क किया था। उन्होंने पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। 

शत्रुघ्न बोले में टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा - वहीं शत्रुघ्न सिन्हा ने टीएमसी को नहीं छोड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि मैं टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा। उन्होंने कहा कि मैं ममता बनर्जी के साथ ही रहूंगा। उन्होंने मुसीबत में मेरा साथ दिया है। मैं टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा। शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा है कि मैं दुख की घड़ी में ममता बनर्जी के साथ रहूंगा।

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/