शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का लोकार्पण, कांस्टीट्यूशन क्लब में हुआ भव्य समारोह

संवाददाता 

नई दिल्ली। समसामयिक विषयों की अंतरराष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन व परिचर्चा एवं सहस्त्र-चंद्र-दर्शन कर चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मीनारायण भाला जी के जन्मदिवस पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आपको बता दे चाणक्य वार्ता ने अपने गौरवमय 10 वर्षों का सफर पूरा किया है। पत्रिका मौजूदा समय में भारत की लोकप्रिय पत्रिकाओं में एक मानी जाती है। इस कार्यक्रम में पत्रिका के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन किया गया। इस विशेषांक में 125 लेखकों ने बच्चों को केंद्र में बनाकर लेख, कहानियां, कविताओं के माध्यम से अपना योगदान दिया है। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्याम जाजू ने कहा कि चाणक्य वार्ता अपने आप में एक अद्भुत पत्रिका है। कोरोना काल के दौरान अनेक स्थापित पत्रिकाएं बंद हो गई मगर चाणक्य वार्ता इस कठिन समय में भी लगातार प्रकाशित होती रही। उन्होंने कहा कि इस पत्रिका ने कम संसाधनों में भी लंबा सफर तय किया है। यह दिखाता है कि जनहित से जुड़ी पत्रकारिता करने के लिए बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती है। श्री भाला के विषय में बोलते हुए श्याम जाजू ने कहा कि भाला जी 82 वर्ष की आयु में भी बहुत सक्रिय होकर कार्य कर रहें है।वें युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि भाला जी हमेशा लोगों की मदद करने के लिए आगे रहते हैं।

समारोह अध्यक्ष श्री ताई तागा, संरक्षक, विद्या भारती एवं पूर्व अध्यक्ष भाजपा, अरुणाचल प्रदेश ने इस मौके पर नॉर्थ ईस्ट के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाएं गए कदमों को लेकर कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ने नॉर्थ ईस्ट को बाकी राज्यों के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन राज्यों के लोगों को एक नई पहचान देने का काम किया है। इसके अलावा मोदी सरकार के प्रयासों से नॉर्थ ईस्ट में विकास की गंगा बह रही है। समारोह को संबोधित करते हुए डाॅ. विनोद बब्बर, वरिष्ठ साहित्यकार ने चाणक्य वार्ता को 10 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनाएं प्रदान की। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार एवं संविधान विशेषज्ञ लक्ष्मीनारायण भाला ने अपने संबोधन में कहा कि संघ की शाखा के माध्यम से उनको बच्चों से जुड़ने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि बच्चों से उन्होंने बहुत कुछ सिखा है वह कहते है कि उनको 10 से अधिक भाषाएं आती है यह सब उनको बच्चों के माध्यम से सीखने को मिली है। उन्होंने चाणक्य वार्ता को लेकर कहा कि वह इस पत्रिका के संरक्षक है और उनको गर्व है कि पत्रिका को देश के लाखों लोग अपना आशीर्वाद दे रहे है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि यह पत्रिका सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हो रही है। चाणक्य वार्ता आज जनसाधारण की आवाज बनकर सामने आई है। इस कार्यक्रम में डाॅ. बलराम अग्रवाल, बाल साहित्यकार, अलका सिन्हा, वरिष्ठ साहित्यकार ने भी अपने विचार साझा किए। वहीं इस कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत मृत्युंजय झा, मुख्य संयोजक द्वारा किया गया। स्वागत भाषण द्वारा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अजीत कुमार ने सभी का आभार जताया‌।कार्यक्रम का संचालन डाॅ. अमित जैन, संपादक-चाणक्य वार्ता द्वारा किया गया।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को सकारात्मक दृष्टि से देखें

अवधेश कुमार

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तीन दिवसीय कार्यक्रमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जैसी भी रही हो देश ने इससे सकारात्मक संदेश लिया है। कार्यक्रम के आकर्षक दृश्यों ने देश में अपने इतिहास -संस्कृति -सभ्यता -अध्यात्म को लेकर सुदृढ़ हो रही चेतना को और सामूहिक बल प्रदान किया है। स्पष्ट है पूरे कार्यक्रम की योजना अत्यंत गंभीर विवेचन के बाद बनी जिसमें अध्यात्म ,साधना व कर्मकांड सहित इतिहास और पराक्रम का समुच्चय उचित रूप में समाहित था। तीन दिनों के मंत्र जाप के कर्मकांडीय विधान के पीछे संपूर्ण वातावरण में सकारात्मक चेतना और ऊर्जा पैदा कर ब्रह्मांड के कल्याण में योगदान का भाव था तो 108 घोड़े के शास्त्रीय विधान के साथ शौर्य यात्रा न केवल सोमनाथ संघर्ष में बलिदान हुए लोगों को श्रद्धांजलि की ओर लक्षित था बल्कि आत्मविश्वास पैदा करने का भाव भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शौर्य यात्रा का नेतृत्व किया। पूजा और अभिषेक के बाद उपस्थित जन समुदाय का संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जिनने सोचा कि सोमनाथ मंदिर नष्ट हो गया वे कहीं समाप्त हो गए लेकिन आज भी सोमनाथ का यह पताखा लहराता हुआ बता रहा है कि हम पर चाहे जितने हमले हों हमें नष्ट नहीं कर सकते। अंत में उन्होंने कहा भी कि इसी विश्वास के साथ हमें भारत को आगे बढ़ाना है तथा दुनिया की ऐसी शक्ति बनानी है जो विश्व कल्याण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दे सके।


2026 गुजरात के सोमनाथ मंदिर के लिए दो कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक, 1026 में महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमला कर ध्वस्त कर दिया था, जिसके 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। दूसरे, 11 मई, 1951 को स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष हो गए हैं। वर्तमान राजनीति एवं अन्य बौद्धिक क्षेत्र में इसे जैसे भी देखा जाए अगर स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, विद्वान और नेता कन्हैयालाल मानणक लाल मुंशी सहित अनेक महापुरुषों ने इसके पुनर्निर्माण किया तो निश्चय ही इसके पीछे गंभीर विमर्श और चिंतन था। सोमनाथ का उल्लेख द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले आता है- "सौराष्ट्रे सोमनाथं च"।‌ इसका अर्थ है कि सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। सोमनाथ पहला ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती के संगम पर स्थित है। इस त्रिवेणी संगम पर स्नान करने का अपना अलग महत्व है। मंदिर परिसर के बाणस्तंभ पर संस्कृत (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग) और दूसरी तरफ इंग्लिश में एक अभिलेख है। इसमें लिखा है- इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई अवरोध नहीं है। यह वही स्थान माना जाता है जहां भगवान कृष्ण ने अपना शरीर त्याग कर वैकुंठ गमन किया था।


सोमनाथ: द श्राइन इटरनल पुस्तक में केएम मुंशी ने लिखा है कि गजनवी ने 18 अक्टूबर, 1025 को सोमनाथ की ओर बढ़ना शुरू किया और लगभग 80 दिन बाद, 6 जनवरी 1026 को किलेबंद मंदिर शहर पर हमला कर दिया।‌‌ सोमनाथ मंदिर में लूट और विध्वंस की घटना 8 जनवरी, 1026 की है। अनेक लोगों ने प्रश्न उठाया कि आखिर विध्वंस का उत्सव कैसे मनाया जा सकता है? प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। आक्रांता आते रहे, लेकिन हर युग में सोमनाथ फिर से खड़ा हुआ। इतना धैर्य, संघर्ष और पुनर्निर्माण का उदाहरण दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है। उनका यह वक्तव्य सबसे ज्यादा बहस का विषय बना है कि सोमनाथ को तोड़ने वाले आक्रांता आज इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं, लेकिन दुर्भाग्य से देश में आज भी ऐसी ताकतें मौजूद हैं, जो मंदिरों के पुनर्निर्माण का विरोध करती रही हैं। इसे राजनीतिक वक्तव्य मान सकते हैं। किंतु सोमनाथ के इतिहास को बार-बार विकृत करने की कोशिश हुई। कुछ का मानना है कि सोमनाथ सात बार लूटा गया जबकि कुछ 17 आक्रमण की बात करते हैं। सबसे पहला आक्रमण मोहम्मद बिन कासिम के सूबेदार जुनैद ने किया था और अंतिम हमला औरंगजेब द्वारा। यानी 980 ई से लेकर 1702 तक सोमनाथ पर लगातार हमला होता रहा तो इसके पीछे केवल धन लूटना कारण नहीं हो सकता इस पर 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने, 1394 में मुजफ़्फर खान ने और 1459 में ,महमूद बेगड़ा ने हमला किया था।‌ इसके बावजूद मंदिर रहा। वऔरंगजेब ने 1669 में इसे गिराने का आदेश दिया तथा 1702 में  इतना तोड़ दिया गया कि मरम्मत नहीं हो सकी और 1706 में इसे मस्जिद में बदल दिया गया। क्या इसे आप लूट का इतिहास कहेंगे ? नहीं तो इतिहासकारों ने सच्चाई का दमन क्यों किया?


रानी अहिल्याबाई होल्कर ने द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महत्वपूर्ण सोमनाथ की महत्ता को पहचानते हुए 1783 में पास में एक नया मंदिर बनवाया तथा विधिपूर्वक शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई। उनकी सोच थी कि जब वास्तविक जगह पर मंदिर बनेगा तो बनेगा किंतु द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में जाने वाले मस्जिद के पास से लौट जाएं यह अच्छा नहीं होगा, इसलिए वहां एक भव्य मंदिर होना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद पिछले लगभग 1000 वर्ष के काल में ध्वस्त प्रेरणा, चेतना और भारत की अंत:शक्ति के केन्द्रों के पुनरुद्धार की बात उठी और इनमें सबसे पहला स्थान सोमनाथ का ही था।  सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ गएऔर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। मंदिर के निर्माण और धन की व्यवस्था के लिए सोमनाध ट्रस्ट की स्थापना की गई।‌ 15 दिसंबर ,1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया तो मंदिर का दायित्व के एम मुंशी को दी गई। राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद यजमान बने, 1950 में आधारशिला रखी गई और 5 - 6 महीने में पहले चरण का काम पूरा हो गया। जनता द्वारा चंदे से लगभग 25 लाख रुपए इकट्ठे हुए थे। 11 मई, 1951 को राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने प्राण प्रतिष्ठा की। वैसे मंदिर संपूर्ण रूप में बनकर 1955 में तैयार हुआ। 


यहां इनमें विस्तार से जाना संभव नहीं है। किंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल , केएम मुंशी, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एवं अन्य नेताओं के बीच संबंधित पत्र व्यवहार देखेंगे तथा सार्वजनिक वक्तव्यों पर नजर दौड़ाएंगे तो पता चल जाएगा कि इसका कितना विरोध हुआ। पंडित नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन न वे सरदार पटेल को रोक सके न मुंशी को और न डॉ राजेंद्र प्रसाद को। इनके कारण अन्य नेता भी इसमें लगे। डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भूमिका निभाकर परंपरा स्थापित किया था कि गुलामी के कालखंड में ऐसे ध्वस्त स्थानों का स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण होना चाहिए और उसमें सरकार का शीर्ष नेतृत्व भी भूमिका निभा सकता है।  हां, निर्माणों में सरकारी पैसा न लगे इसका ध्यान रखा गया। महात्मा गांधी ने भी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से सहमति व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सरकारी खजाने से इसमें एक पैसा नहीं लगना चाहिए।


कहने का तात्पर्य कि सेक्यूलरवाद के नाम गलत सोच और व्यवहार तब से आज तक कायम है । इसीलिए समस्याएं आती हैं और ऐसे कार्यों को सांप्रदायिक, फासीवादी और न जाने क्या-क्या नाम दे दिया जाता है।


आखिर विदेशी आक्रमणकारियों से लेकर देश के अंदर मजहबी सोच वाले हमलावरों ने सोमनाथ और ऐसे दूसरे मंदिरों को निशाना क्यों बनाया?  मेहमूद गजनवी और उसकी फौज ने केवल संपत्ति लूटकर सोमनाथ मंदिर का विध्वंस नहीं किया था बल्कि उपस्थित व्यक्तियों को मार दिया या बंदी बनाकर अपने साथ ले गया । स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा गया। बलात्कार हुए ,क्रूरता पूर्वक हत्याएं हुईं या बंदी बनाकर ले जाईं गईं  जिन्हें गुलामों के बाजार में बेचा गया।‌ मंदिर परिसर में 50 हजार  लोगों के उपस्थित होने की बात है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का कत्लेआम इतिहास के क्रूरतम अध्यायों में से एक है। मिन्हाज सिराज के अनुसार गजनवी ने मूर्ति के चार टुकडे किये थे, एक गजनी की जमी मस्जिद में, दूसरा उसे शाही महल की सीढियों पर, तीसरा मक्का और चौथा मदीना भेज दिया। महमूद ने मूर्तियों को गलियों और मस्जिद की सीढियों पर डलवा दिया। उसने कहा नमाज के लिए जाने वाले नमाजी इन बूतों को पैरों तले रौंदेंगे। अलबरूनी गजनवी के साथ ही आया था और उसने अनेक बातें इसके संदर्भ में लिखी है। तो स्वाभिमान पर्व से इतिहास के सारे  सच देश के सामने आए जिसमें मजहबी सोच से हमलों‌ और उसके प्रतिरोध तथा पुनर्निर्माण के प्रयास शामिल है । इससे यह विश्वास और गहरा हुआ है कि हमारी शाश्वत अंत:शक्ति को कोई नष्ट नहीं कर सकता। वास्तव में ऐसे पर्व हमारे लिए प्रेरणा और स्थायी आत्मविश्वास के कारण बनते हैं।

 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अवैध कब्जा हटाने व दंगा आरोपियों को जमानत न मिलने पर ऐसा रवैया चिंताजनक

अवधेश कुमार

राजधानी दिल्ली का तुर्कमान गेट पूरे देश में चर्चा का विषय है। पाकिस्तान द्वारा इस पर दिए गए वक्तव्य को आधार बनाएं तो कह सकते हैं इसकी चर्चा सीमा पार भी चला गया है। चर्चा अगर सकारात्मक और उचित हो तो चिंता का कोई कारण नहीं। किंतु यहां तो एक ओर दिल्ली नगरपालिका परिषद द्वारा अवैध निर्माण को गिराने और उसकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस तथा सामने विरोध और पत्थरबाजों से टकराव। अगर इसके दो दिन पहले वापस लौटें तो फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज किया जाना सबसे ज्यादा चर्चा और बवंडर का विषय था। इन दोनों घटनाओं को एक साथ मिलकर देखिए तो कुछ समानताएं दिखेंगीं तथा निष्कर्ष चिंताजनक आएंगे। दोनों मामलों में न्यायपालिका विद्यमान है। जमानत खारिज करने और उनके साथ पांच अन्य आरोपियों को जमानत देने का आदेश हमारे शीर्ष न्यायपालिका का है तो अवैध निर्माण खाली करने का आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय का । इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं को न्यायालय ने तत्काल सुनवाई के योग्य नहीं माना तथा आगे की तिथि निर्धारित कर दी। बावजूद जिस तरह से इसका विरोध हुआ, हो रहा है और जैसी प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं उनको कैसे देखा जाए?

ध्यान रखिए, उमर खालिद और सर्जिल इमाम की जमानत याचिका छठी बार खारिज हुई है। दो बार ट्रायल न्यायालय में ,दो बार दिल्ली उच्च न्यायालय में और दूसरी बार उच्चतम न्यायालय ने। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि एक वर्ष तक अब आरोपी किसी भी न्यायालय में जमानत याचिका नहीं डाल सकते हैं। क्या हम मानते हैं कि उच्चतम न्यायालय बिना ठोस तथ्यों और सबूतों को देखे हुए ऐसा आदेश दे देगा ? उसने जिन पांच लोगों को जमानत दी उनके साथ भी 12 कठोर शर्तें लगाई है। उसमें स्पष्ट लिखा है अगर इन शर्तों का उल्लंघन हुआ तो निचला न्यायालय उनकी जमानत रद्द कर सकता है। इससे समझा जा सकता है कि न्यायालय के सामने किस तरह की सच्चाइयां प्रस्तुत हुईं हैं। ऐसा तो है नहीं कि इन दोनों के लिए मुकदमा लड़ने वाले वहां नहीं थे। सच यह है कि दिल्ली पुलिस की ओर से तो केवल सरकारी वकील थे , जबकि दूसरी तरफ प्रमुख नामी वकीलों की फौज थी। यही हाल दिल्ली तुर्कमान गेट इलाके के मुकदमों का भी था। फैज़ ए इलाही मस्जिद, जिसे लेकर दुष्प्रचार किया गया उसे वक्फ की संपत्ति कहा गया है। कहा जाता है कि उस मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के ही काल में हुआ था। शाही जामा मस्जिद जहां मुगल शासक परिवार से लेकर समाज के उच्च वर्गीय मुसलमानों के लिए थी वहीं सामान्य मुसलमानों के लिए फैज ए इलाही मस्जिद बनाई गई।

हम इसमें नहीं जाना चाहते कि सच क्या है। मुख्य बात है कि मस्जिद के आसपास चारों तरफ ताकत और संख्या बल की बदौलत सरकारी जमीनों पर कब्जे कर व्यावसायिक स्थल खड़े किए गए उनको हटाया जाना आवश्यक था। आम दिल्ली में रामलीला मैदान से दरियागंज की ओर के रास्ते में मुड़ेंगे तो सामने हज मंजिल दिखाई देगा। उसी के पीछे यानी बाएं से आगे बढ़िये तो पूरा तुर्कमान गेट का इलाका है। उसी रास्ते में फैज ए इलाही मस्जिद से लेकर जमा मस्जिद के बीच अनेक मस्जिदें हैं । हर कुछ दूरी पर आपको मस्जिदें दिखेगी। कभी किसी सरकारी विभाग ने उन मस्जिदों को तोड़ने की कोशिश तक नहीं की। फैज ए इलाही मस्जिद के इर्द-गिर्द बारात घर, डायग्नोस्टिक सेंटर , पुस्तकालय,  दूकानें सब बना लिए गए। रामलीला मैदान की जमीन कब्जाई गई। खाली करने की कोशिश करने वालों की हमेशा शामत आ जाती थी। उस रास्ते पर दिन में चलना तक मुश्किल हो चुका था।  स्थानीय लोगों की मांग खाली करने की थी। दिल्ली नगर पालिका परिषद में वर्षों से अनेक पत्र और आवेदन इसके लिए आते रहे हैं। थाने में वहां आपराधिक गतिविधियों की शिकायतें आम बात हैं। अब आप सोचिए क्या अवैध जमीन पर, भले वह मस्जिद से लगी हुई हो ,बारात घर, क्लीनिक या डायग्नोस्टिक सेंटर , व्यावसायिक लाइब्रेरी, दुकानें बनाना इस्लामी कृत्य है? क्या उसे तोड़ना इस्लाम या मुसलमान के विरुद्ध माना जाएगा? जिस मस्जिद को खरोंच तक नहीं आया उसको आधार बनाकर जिन लोगों ने पुलिस से टकराव की पहले से तैयारी की उनके बारे में क्या कहा जाए? भले यह विषय यहां नहीं है किंतु क्या किसी मजहब, पंथ का स्थल अगर सरकारी जमीन पर हो तब भी क्या उसे स्पर्श नहीं किया जाएगा?

कुछ लोगों का तर्क है कि कार्रवाई रात में क्यों की गई? उस क्षेत्र में दिन में कार्रवाई करने का मतलब चारों तरफ के ट्रैफिक को रोक देना होता और इसके परिणाम भयानक हो सकते थे। सामान्य स्थिति में वहां बुलडोजर, डिम्पल, गाड़ियां जा ही नहीं सकती थी। सोचिए, अगर रात में कार्रवाई के बाद इतनी पत्थरबाजी हुई तो दिन में कैसी तस्वीर होती? उमर खालिद, सर्जिल इमाम की जमानत न मिलने को भी इस्लाम और मुस्लिम मुद्दा बनाया गया तो तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे को मुक्त करने के अभियान को भी। आप बहुत बड़े वर्ग की देशभर की प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। टीवी चैनलों के डिबेट, समाचार पत्रों , सोशल मीडिया में आये वक्तव्यों पर नजर डाल दीजिए तथा जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं वो देश के वर्तमान और भविष्य को लेकर किसी को भी भयभीत करने वाले हैं। तुर्कमान गेट मामले में बाजाब्ता यूट्यूब चैनलों पर फिल्मों के दृश्य की तरह लोगों को अल जिहाद , अल जिहाद गाने के साथ संघर्ष के लिए उत्तेजित किया गया। कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। इतनी भीड़ में पत्थर किन-किन ने चलाई सबकी पहचान असंभव है। उमर खालिद सर्जिल इमाम के रिहा होने पर अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के कब्र खोदने के नारे लग रहे हैं, भारत की संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक भगवा ध्वज तक की कब्र खोदने के नारों से पता चलता है कि समाज के अंदर किस तरह झूठ के आधार पर जहर और बारूद पैदा किया जा चुका है। दुर्भाग्य से राजनीतिक नेताओं में भाजपा विरोधियों ने भी अपराध को अपराध , अवैध कब्जे को अवैध कब्जा कहने की जगह इनको राजनीतिक मुद्दा बनाया है।

इसका लाभ पाकिस्तान जैसा देश उठाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने स्वयं अपने यहां अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों का समूल नाश किया है‌। मुस्लिम समुदाय के बहुत बड़े वर्ग में यह भावना घर करा दी गई है कि नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी है,  यह भारत में मुसलमानों को नष्ट करना चाहते हैं, मस्जिदें , मदरसे , दरगाह इस्लामी रीति-  रिवाज सब उनके निशाने पर हैं। एक वर्ग में यह भाव भी पैदा किया जा रहा है कि न्यायालय तक पर मोदी सरकार का नियंत्रण है और उनके मन के अनुसार मुसलमान और विरोधियों के विरुद्ध वो फैसला दे रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने जमानत रद्द करते हुए या तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे पर न्यायालय ने जैसी टिप्पणियां की है वास्तव में चिंता उनसे होनी चाहिए। न्यायालय की दृष्टि में उमर खालिद , सर्जिल इमाम जैसे लोग नागरिकता संशोधन कानून या नेशनल नागरिकता रजिस्टर के विरुद्ध लोगों को भड़काने, हिंसा की योजना बनाने, उनके लिए सामग्रियां जुटाने आदि में सम्मिलित दिखते हैं। इस तरह सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा ,गैर कानूनी कमाई करना उसके आधार पर दादागिरी और धौंसपट्टी जैसी भूमिका अपराधियों की ही मानी जाएगी। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में ऐसा लगता है कि पूरा शहर और जिले का बहुत बड़ा भाग ही कब्जा लिया गया। मौलिक, उनसे जुड़े स्थल, तालाब, कुयें कब्जाए गए या ध्वस्त कर , जमींदोज कर उन पर र्निर्माण कर दिए गए। इनके विरुद्ध कार्रवाई और खाली कराने के आदेश या दंगे के आरोपियों की जमानत रद्द करना मुसलमान या इस्लाम की रक्षा लड़ाई कैसे हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर आप अवश्य तलाशिये क्योंकि यह भारत के अखंड राष्ट्र के रूप में बने रहने का प्रश्न भी है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 , मोबाइल - 98110 27208


गुरुवार, 8 जनवरी 2026

जी रामजी तथा इसके विरोध के मायने

अवधेश कुमार

भाजपा की राज्य सरकारें या प्रदेश इकाइयां हर जगह जी राम जी पर पत्रकार वार्तायें आयोजित कर रही हैं तथा पार्टी के स्तर पर इसे अभियान के रूप में लिया गया है। सरकारी कार्यक्रमों में ऐसा सामान्यतया कम होता है। विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने दृढ़ता के साथ संसद में पारित कराकर संदेश दे दिया था कि इसे हर हाल में क्रियान्वित किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। कई अन्य दल भी इसके विरुद्ध मोर्चाबंदी कर रहे हैं। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगीं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध और इसके समानांतर भाजपा के द्वारा इसके समर्थन का अभियान चलेगा। सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 2005 में नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परंपरा न पहले थी न आगे स्थापित हो सकती है। देश , काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होतीं हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नयी आरंभ भी होतीं हैं। विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यूपीए सरकार ने भी महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग सेविशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी इसलिए जारी योजना में नाम जोड़ा  गया। विपक्ष की ओर उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है? क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्युलर चरित्र समाप्त होता है?  कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि की सनातन और हिंदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम परिचित हैं। इसलिए यह भी जी राम जी के साथ महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो जाता है।

वर्तमान कार्यक्रम मनरेगा है ही नहीं। मनरेगा समाप्त कर जी राम जी नया कानून बना है। इसलिए यह आलोचना गलत है कि महात्मा गांधी का नाम हटाकर जी राम जी कर दिया गया है। नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के ऐसे कृतिमान बनाये जिनको रोक पाना मनरेगा ढांचे में संभव नहीं हो पाया। केंद्र से राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एनजीओ के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूर्ति हो रही है। जी राम जी में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण , डिजिटल मॉनिटरिंग,सशक्त सोशल ऑडिट साप्ताहिक पब्लिक डिस्क्लोजर आदि के प्रावधान से भ्रष्टाचार की संभावनाएं क्षीण होती हैं। किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता। यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ उनमें और आज में अनेक मायनों में बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होते समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आर्थिक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023 24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज के गांवों की स्थिति वैसी ही नहीं है। गांव की डिजिटल पहुंच बढ़ी है , बिजली आपूर्ति काफी हद तक सुनिश्चित है, यातायात संपर्क की सुविधा बेहतर हुई है और सामाजिक सुरक्षा आज ज्यादा सशक्त है।  भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिए।

 इसमें केवल 100 की जगह 125 दिनों के रोजगार की ही बात नहीं है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ग्रामीण क्षेत्र को ऐसे सशक्त और टिकाऊ आधारभूत ढांचा देना है जिनसे वे सक्षमता की ओर बढ़ें। इसमें बने निर्मित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना स्ट्रेट में शामिल किया जाएगा। इससे ग्रामीण विकास से जुड़े सारे काम एक ही व्यवस्था से जुड़ेंगे। जी राम जी में चार मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं। जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। बाढ़ और सुखार के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे शामिल है। जीरामजी का स्वरुप और संस्कार मनरेगा से अलग है। तब काम अलग-अलग श्रेणियों में फैले हुए थे। यहां रोजगार पर फोकस होते हुए भी गांव के लिए स्थिर उत्पादक क्षमता पैदा करने और बढ़ाने यानी आत्मनिर्भरता का भाव है। मनरेगा या पहले के ग्रामीण रोजगार योजनाओं का फोकस ऐसा नहीं था। इसमें ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। इन योजनाओं को प्रधानमंत्री गति शक्ति जैसे राष्ट्रीय प्रणालियों से भी संबद्ध किया जाएगा।

मिशन अमृत सरोवर के तहत 68, 000 से ज्यादा जल निकाय बने या पुनर्जीवित हुए हैं । इससे खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन , बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका सुरक्षित होगी। सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी।

जी राम जी के व्यय की 40% जिम्मेवारी राज्यों पर डालने का विरोध हो रहा है। जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है वहां के लिए विचार करना चाहिए। वैसे भारतीय स्टेट बैंक ने एक रिपोर्ट में इस आलोचना को निराधार बताते हुए कहा है कि राज्य इसमें नेट गेनर होंगे। केंद्र सरकार द्वारा राजस्व साझा करने की प्रणाली में राज्यों को 17,000 करोड रुपए का अतिरिक्त आवंटन होगा। आवंटन के आधार पर आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु को थोड़ा नुकसान दिख रहा है जबकि शेष राज्यों में ज्यादा आवंटन का आंकड़ा सामने आता है। राज्यों को भी अपनी वित्तीय स्थिति सशक्त करने की नीतियां अपनानी पड़ेगी। फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी की योजनाओं की जगह ऐसी योजना से लोगों का ज्यादा भला होगा। मुख्य बात है इस व्यवहारिक तथा गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने वाले कार्यों का कल्पना के अनुरूप क्रियान्वयन। यह जिम्मेवारी अंततः राज्यों , स्थानीय प्रशासन, पंचायत तथा सामाजिक -सांस्कृतिक -धार्मिक संगठनों के साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर आती है। इस कार्यक्रम में गांव के लोगों की रुचि बढ़ेगी क्योंकि मनरेगा सीमांत और सामान्य मध्यम किसानों के लिए अनर्थकारी बनकर सामने आया था। मुख्य कृषि कार्य के समय कृषि श्रमिकों की उपलब्धता अत्यंत कम हो गई थी। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों ने मूल अनाज उत्पादन वाली खेती छोड़ दी। बुवाई से कटाई तक किसानों के लिए कष्टकर स्थिति रही है। मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे या गुस्से में आ जाते थे। जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई ,कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं थी। अब काम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। हालांकि मनरेगा ने पूरी व्यवस्था में जैसा उथल-पुथल मचाया उसमें कृषि को पुनर्स्थापित करना आसान नहीं है फिर भी इसका सकारात्मक असर होगा।

कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन, परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन या  संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगी। किंतु अगर कुछ नेताओं, एक्टिविस्टों आदि को जी रामजी नाम रखने से समस्या है तो इसका उपचार नहीं। सभी देवी-देवता केवल मनुष्य से परे शक्ति संपन्नता के ही नहीं सात्विकता, नैतिकता ,समाज के लिए आत्मोत्सर्ग तथा सर्व कल्याणकारी चरित्र वाले हैं। उनके नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्यूलर चरित्र प्रभावित नहीं होता। इसमें आध्यात्मिकता एवं आम लोगों के लिए योजना की पवित्रता बनाए रखने की जो भावना पैदा हो सकती है उससे व्यापक सेक्यूलर भाव क्या हो सकता है?

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

प्रसिद्ध फिल्मकार दिलीप विरेंद्र सूद ने अपनी पुस्तक लाइफ हग मी टाइट के विमोचन की घोषणा की

संवाददाता

नई दिल्ली। प्रतिष्ठित फिल्मकार दिलीप विरेंद्र सूद ने अपनी नई पुस्तक लाइफ हग मी टाइटः आशा, हास्य और संकल्प की कहानीका विमोचन किया है। यह पुस्तक व्हाइट फाल्कन पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशिल की गई है। लेखक के जीवन अनुभवों से प्रेरित यह पुस्तक एक संवेदनशील और प्रेरक कथा प्रस्तुत करती है, जिसमें रचनात्मक महत्वाकांक्षाओं, पारिवारिक दायित्वों और जीवन की अनिश्थित सीखों के बीच संतुलन को सशक्त रूप से दर्शाया गया है।

200 से अधिक पृष्ठों में विस्तृत लाइफ हग भी टाइट चुनौतियों और उपलब्धियों के क्षणों को गर्मजोशी, दृढ़ता और सौम्य हास्य के साथ पिरोती है। यह पुस्तक आशा और निरंतर प्रयास की शक्ति को रेखांकित करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव पर एक सकारात्मक और प्रेरणादायी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

साहित्यिक विमोचन के साथ-साथ, इस पुस्तक को एक प्रमुख फीचर फिल्म के रूप में रुपांतरित करने की योजना भी विकसित की जा रही है, जिससे इसकी भवनात्मक गहराई काग़ज़ से परदे तक विस्तार पा सके।

दिलीप विरेंद्र सूद एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित लेखक, निर्देशक और निर्माता है, जिनके कार्यों को अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहना और पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वे भारत सरकार द्वारा आयोजित 68वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के प्रतिष्ठित जूरी सदस्य भी रह चुके हैं। वर्तमान में वे प्रसार भारती, भारत सरकार के राष्ट्रीय नेटवर्क के लिए भारत का पहला साइबर अपराध जागरुकता कार्यक्रम साइबर क्राइम की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं।

लाइफ हग मी टाइट दिलीप विरेंद्र सूद की रचनात्मक यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो व्यक्तिगत अनुभूतियों, कलात्मक चिंतन और आशा के सार्वभौमिक अनुभव को सशक्त रूप से प्रस्तुत करती है।

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