वर्ष 2014 में एक किताब छपी थी जिसका टाइटल था मोदी नामा, यह पुस्तक मुगल काल में छपी पुस्तक बाबर नामा की तर्ज पर
लिखी गई थी जिस प्रकार बाबर नामा में मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर की प्रशंसा की
गई थी, उसी प्रकार मोदी नामा की लेखिका
ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बड़ी तारीफ की
थी और यहां तक की गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं पर तत्कालीन मुख्यमंत्री
नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। परंतु कुछ दिन पूर्व उसी लेखिका ने सोशल
मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी पर चरित्र हनन के अनेक आरोप लगाए। जबकि यह 2014 से पहले मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात के विकास में उनको
कार्यों की बड़ी प्रशंसक रही है परंतु ऐसा क्या है कि मार्च 2026 से प्रधानमंत्री मोदी के चरित्र को लेकर सोशल मीडिया पर
इतनी आक्रामक हो गई है।
इसके
अतिरिक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता रहेपूर्व मंत्री व राज्यसभा सांसद डॉक्टर
सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र के बारे में अनाप समाप
कहते रहते हैं। यही नहीं डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल
बिहारी वाजपेई के बारे में ऐसी बातें कह देते हैं जिसके कल्पना नहीं की जा सकती
हैजबकि अटल बिहारी वाजपाई के व्यक्तित्व की प्रशंसा भाजपा के लोग ही नहीं बल्कि
विपक्ष में बैठे कांग्रेस के लोग भी करते हैं। अब प्रश्न यह उठना है की सोशल
मीडिया पर इस समय देश के प्रधानमंत्री के चरित्र हनन की पुरजोर कोशिश की जा रही है
परंतु न तो सरकार और न ही न्यायालय इस मामले में कोई सजान ले रहे हैं। जबकि
वास्तविकता यह है कि देश का प्रधानमंत्री किसी पार्टी का प्रधानमंत्री नहीं है
अपितु वह पूरे देश का प्रधानमंत्री है उनसे राजनीतिक विरोध हो सकता है हम उनके
द्वारा लिए गए निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं पर इस तरह से उनके चरित्र हनन की
बात नही की जानी चाहिए।
कुछ वर्षों
पूर्व मैंने पूर्व आईएएस अधिकारी और अटल जी की कैबिनेट में वित्त मंत्री का
उत्तरदायित्व निभा चुके श्री यशवन्त सिन्हा का एक लेख पढ़ा था जो एक दैनिक में
प्रकाशित हुआ था जिसमे उन्होंने लिखा था कि अमेरिका सहित अन्य
पश्चिमी
देशों में कभी भी ऐसा नहीं होता कि वहां के लोग अपने देश के प्रधानमंत्रीया
राष्ट्रपति कीइस तरह आलोचना करते हैं अपने इस लेख के सपोर्ट में उन्होंने दशकों
पहले अमेरिका की इराक पर आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा था इराक द्वारा जैविक
परमाणु हथियार रखने केआरोप के आधार पर अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन सरकार पर
हमला किया पर वहां कुछ नहीं मिला, लेकिन किसी भी अमेरिकी
ने उसे समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की आलोचना नहीं की। इसी प्रकार
यूनाइटेड किंगडम में वहां की संसद में किसी सांसद ने महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ
कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे थे तो उस सांसद को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी, पर आज हमारे देश में प नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपाई और
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र हनन का फैशन सा चल पड़ा है।
राज गीत
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में और 9 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में चर्चा
आयोजित की गई है और सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक वंदे मातरम की याद में साल भर चलने वाले कार्यक्रम की
घोषणा की। यह पूरे राज्य के लिए गौरव का विषय था क्योंकि वंदे मातरम सर्वप्रथम1886में कांग्रेस के अधिवेशन में गया गया, लेकिन भाजपा सही
सभी पार्टियों ने इस राष्ट्रगीत को सदैव सम्मान दियाऔर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
के द्वारा संसद में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया परंतु इस अवसर पर राज्यसभा
सांसद निशिकांत दुबे विपक्ष पर आक्रमण करने में इतने उतावले थे कि इन्होंने इस
अवसर पर भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा
गांधी के चरित्र हनन की बातें संसद मेंछेड़ दी,
माननीय
सांसद यह भूल गए कि भारत के लोकतांत्रिक परंपरा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने
विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई के लिए एक दिन देश प्रधानमंत्री बनने की
भविष्यवाणी की थी और वह भविष्य वाडी 4दशक बाद सत्य भी हुई और
बांग्लादेश विजय पर अटल बिहारी वाजपेई ने इंदिरागांधी को दुर्गा की उपाधि दी थी और
नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा
में यूनाइटेड नेशन में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया था, इसलिए ऐसे पवित्र मौके पर जहां राष्ट्र की वंदे मातरमऔर
बंकिम चंद्र चटर्जी को याद करने की बात हो रही थी वहां पर पंडित नेहरू या श्रीमती
इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बात करना हमारे लोकतांत्रिक परंपरा के मर्यादा के
अनुरूप नहीं है।
मधु किश्वर
ने वर्ष 2014 में मोदी नामा पुस्तक लिखी और
उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदीजी के कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा
की यहां तक की गोधरा और अन्य घटनाओं पर उनका बचाव करती रही, ऐसा करते समय उनके मन में कोई न कोई महत्वाकांक्षा रही होगी
और उसमें कोई बुराई भी नहीं थी क्योंकि लेखक भी इंसान होता हैऔर उसकी भी कुछ
इच्छाएं होती हैं और एक पुस्तक लिखने में उसे रात दिन एक करना पड़ता है। मैने भी
एक राष्ट्रीय नेता के लिए राष्ट्रवादी कर्मयोगी और हिंदुत्व एक जीवन शैलीजैसी
पुस्तके लिखी, जिसके लोकार्पण में भाजपा के
शीर्ष पुरुष श्री लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथजी जैसे
लोग आए। पर जब ये नेता मोदी सरकार में मंत्री बन गए तो मुझे दूध की मक्खी की तरह
बाहर कर दिया गया हो, हो सकता है कि कुछ ऐसा
भी मधु किश्वर जी के साथ हुआ हो उन्हें गुस्सा भी आया हो, पर इसके लिए उस नेता का इस तरह से चरित्र हनन करना मेरे
विचार में बिल्कुल ही अनुचित है।
बेशक हम
विश्व की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के रूप में माने जाते
रहे हैं, एक समय ऐसा भी आया जब 1975के आपातकाल के दौरान सभी विपक्ष नेता जेल में ठूंस दिए गए
परन्तु तब भी पक्ष विपक्ष के नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर अमर्यादित टिप्पणी नहीं कि।
परंतु आज के समय में जिस तरह से नेताओं के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप और उनके चरित्र
हनन की घटनाएं बढ़ रही है इन सबके लिए हमें अमेरिका सहित यूरोपीय देशों की
परंपराओं को सिखना होगा जहां विरोध होते हुए भी अपने विरोधी नेताओं के ऊपर इस तरह
के आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए जाते। हमारे यहां तो ऐसे लोग जो बड़े-बड़े
उत्तरदायित्व के पदों का निर्वहन कर चुके हैं उनके द्वारा प्रधानमंत्री या अन्य
पदों पर रह चुके व्यक्तियों के लिए चरित्र हनन जैसी चीज शुरू कर देना अत्यंत
दुर्भाग्यपूर्ण है इससे पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाई जा रही है।
सोशल मीडिया पर बेरोक टोक चल रही इस तरह की पोस्ट पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी पिछले 11वर्षों से देश में सरकार
चला रहे हैं और इस कार्यकाल में उनकी सरकार की अनेक उपलब्धियां रही है और यह भी
संभव है कि इतने लंबे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो पर
इन सब के लिए उनकी आलोचना यदि संसद के अंदर और बाहर हो तो वह स्वागत योग्य है
परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के न पूरा
होने के कारण डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और मधु किश्वर जैसे लोगों द्वारा चरित्र हनन
किया जाना न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री का अपमान है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े
लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपमान है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव
हैं।)




