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बुधवार, 6 मई 2026

आखिर कैसे आए ये चुनाव परिणाम

अवधेश कुमार

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर कोई एक सुसंबद्ध टिप्पणी संपूर्ण स्थितियों का विश्लेषण नहीं कर सकता। सारे राज्यों के राजनीतिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे अलग-अलग थे तथा मतदाताओं ने उसी अनुसार मतदान किया। किंतु सबको मिलाकर एक तस्वीर बनाएं तो इसमें दो ऐतिहासिक युगांतरकारी परिणतियां हैं। एक , पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐसी विजय जो एक समय अकल्पनीय थी तथा तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी टीवीके का चमत्कारिक प्रदर्शन। वैसे तो असम में भी भाजपा की तीसरी बार लगातार विजय महत्वपूर्ण है पर ये दोनों घटनाएं ऐतिहासिक और युगांतरकारी हैं। बंगाल में एक तिहाई मुस्लिम मतदाताओं के बहुमत का खतरनाक तरीके से हर हाल में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने और तृणमूल के समर्थन में आक्रामकता से काम करने के बावजूद भाजपा की इतनी बढ़त सामान्य घटना नहीं है। आम सोच यही थी कि ममता की शुरुआत ही 30 प्रतिशत मत और लगभग 65-70 सीटों से होती है जबकि भाजपा को शून्य से शुरुआत करनी होगी। वैसे असम में इससे ज्यादा मुस्लिम आबादी के बावजूद भाजपा ने जीत हासिल कर कई मिथकों को तोड़ा। पर असम और बंगाल की राजनीति और सत्ता के चरित्र में मौलिक अंतर है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी राजनीति और सत्ता का चरित्र ऐसा बना दिया था जिसमें किसी भी पार्टी के लिए उसको भेजना असंभव सी चुनौती थी। 

पिछले एक दशक से ज्यादा समय के चुनावों का एक पहलू हर जगह लागू होता है वह यह कि हिंदुत्व व अपनी संस्कृति‌, धर्म के प्रति हिंदुओं के पुनर्जागरण के कारण एक निश्चित वोट का आधार हर राज्य में निर्मित हो गया है और यह मत भाजपा से संतुष्ट असंतुष्ट या कुछ मायनो में नाराज होने के बावजूद वह हारे या जीते उसे या साथी दलों या उसकी अनुपस्थिति में दूसरे दलों को जाता है। स्वाभाविक ही इसके समानांतर प्रतिक्रिया में भाजपा विरोधी मतों का एक अंश भी उसे चुनौती देने वाले प्रमुख दल या उसके साथियों के खाते चला जाता है। यह प्रवृत्ति पांचो राज्यों में रही है। आप देखेंगे कि पांचो राज्यों के परिणाम निर्धारण में इनकी भूमिका है। भाजपा स्थानीय -क्षेत्रिय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए भी चुनावों को मतदाताओं को सीधे अपील करने वाले राष्ट्रीय विषयों के साथ संबद्ध करती है। भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकी को बंगाल एवं असम दोनों जगह प्रमुख मुद्दे के रुप स्थापित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान संबंधी कार्यों तथा नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण को लागू करने की संसदीय पहल ने भी चुनावी माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

 वस्तुत: बंगाल के परिणाम ने उन सबको चौंकाया है जो जमीनी वास्तविकता और 2018 से मतदाताओं मुख्यतः हिन्दुओं के बड़े वर्ग के अंदर बदलाव की छटपटाहट को महसूस नहीं कर रहे थे। बंगाल में सुरक्षित वातावरण में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करा पाना चुनाव आयोग, न्यायिक संस्थाएं और पूरे देश के लिए चुनौती बन गई थी। तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता और पूरी राजनीति को निहित स्वार्थी तत्वों की गिरफ्त में दिए जाने से बंगाल की संस्कृति चुनावों को हर हाल में अपने पक्ष में करने की हो चुकी है। कट्टरपंथी तत्वों को प्रत्यक्ष- परोक्ष संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण पूरा प्रदेश हमेशा सांप्रदायिक भय और तनाव की स्थिति में रहा। मतदाताओं की इच्छा नहीं तृणमूल नेताओं की चाहत से आप मतदान करिए या चुपचाप घर बैठिये अन्यथा  हिंसा, आगजनी, दमन, उत्पीड़न और संबंधित स्थान या प्रदेश से पलायन का दंश झेलिये। साइलेंट रीगिंग बंगाल की मुख्य चुनावी प्रवृत्ति रह रही है। पहले इसी रास्ते वाम मोर्चा ने लगातार जीत सुनिश्चित किया और उसके विरुद्ध लंबा संघर्ष करते-करते ममता बनर्जी ने भी अपनी पूरी पार्टी को उससे ज्यादा हिंसक और दमनकारी तत्वों में परिणत कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद तृणमूल की सत्ता और राजनीति विरोधियों के विरुद्ध ज्यादा खूंखार हुई अन्यथा 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम वैसे नहीं आते। पलायन या हिंसा की सर्वाधिक शिकार महिलाएं होतीं हैं। पुरुषों के मुकाबले 1.5 महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया महिला होने के बावजूद ममता बनर्जी के विरुद्ध इनका बहुत बड़ा मत भाजपा को गया है। भाजपा पर ध्रुवीकरण का आरोप लगाकर सतही विश्लेषण करने वाले विचार करें कि भद्र लोक माने जाने वाले बंगाल के हिंदुओं ने ममता बनर्जी की सत्ता संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह कर भाजपा को मत दिया तो क्या इसे केवल ध्रुवीकरण कहेंगे और ऐसा हुआ भी तो क्यों?

 बंगाल में राजनीतिक संघर्ष वास्तविक लोकतंत्र की पुनर्स्थापना तथा सत्ता संस्कृति को सर्वसमावेशी बनाने का था। यह जिम्मेवारी मुख्यत: प्रदेश के गैर मुस्लिमों यानी हिंदुओं को ही लेना था। धीरे-धीरे हिंदुओं के बहुमत के अंदर अगर यह भाव पैदा हुआ कि इस सरकार के रहते हमारा अस्तित्व संकट में है तो इसके कारण अत्यंत गहरे हैं। बांग्लादेश की घटनाओं ने इस मनोविज्ञान को सशक्त किया कि हमें कुछ हद तक जान की बाजी लगानी होगी। हिंदू आबादी में लगभग 75 प्रतिशत ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया। यह बहुत बड़ी बात है।

तमाम विरोधों के बावजूद एसआईआर में 90 लाख से ज्यादा मृत, संदिग्ध और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने के कारण फर्जी मतदाताओं का खेल खत्म हो गया। सवा 2 लाख केंद्रीय बलों की उपस्थिति , चुनाव के बाद भी सुरक्षा बलों के बने रहने की घोषणा, दूसरे राज्यों के अधिकारियों को चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्ति, प्रदेश के अधिकारियों का व्यापक पैमाने पर स्थानांतरण या चुनाव प्रक्रिया तक कार्य मुक्ति तथा चुनावी हिंसा वाले चिन्हित व्यक्तित्वों के विरुद्ध कार्रवाई व सतर्क दृष्टि आदि ने भय व संशयग्रस्त मतदाताओं के अंदर सुरक्षा को लेकर आश्वस्त किया जिससे चुनावी वातावरण में आमूल परिवर्तन आया। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पहले दिन से यह विश्वास दिलाने की रणनीति अपनाई कि हम सत्ता में आ रहे हैं तथा किसी के साथ अन्याय हुआ तो पूरी पार्टी खड़ी रहेगी। इन सबका सम्मिलित परिणाम है असंभव सा लगने वाला सत्ता परिवर्तन।

असम में पहले दिन से स्पष्ट था कि  वह भाजपा को बड़ी चुनौती नहीं है। किंतु गौरव गोगोई भी जोरहाट से हार जाएंगे इसकी कल्पना कांग्रेस को नहीं रही होगी। कांग्रेस ने शुरुआत देर से की तथा राहुल गांधी एवं प्रियंका वाड्रा व उनके रणनीतिकारों के कारण टिकट बंटवारे तक नेता पार्टी छोड़कर जाते रहे। हिमंतो विस्वासरमा के पूर्व कांग्रेसी होने के कारण उन नेताओं का सीधा संपर्क भी रहा इसलिए उन्हें भाजपा में शामिल होने में समस्या नहीं आई। दूसरे, भाजपा ने पिछले लंबे समय से असम अस्मिता व आसामी संस्कृति को भारत के व्यापक हिंदुत्व संस्कृति और राष्ट्रभाव से जोड़ने में सफलता पाई है। मुगलों से युद्ध करने वाले लचित बरफ़ुकन से लेकर महाराज शंकर देव को जिस तरह भाजपा ने प्रस्तुत किया एवं जनजाति गौरव को निचले स्तर तक ले गए उन सबसे सामाजिक सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ है। सरकार की आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा नीति ने उसे बल दिया है। हिमांतो की छवि देश में भले घुसपैठी और मुस्लिम विरोधी बनाई गई किंतु इसके साथ असम में उन्होंने बच्चों व युवाओं के मामा और महिलाओं के भाई के रूप में भी छवि बनई है। गौरव गोगोई के प्रति अहोम समुदाय का आकर्षण तो था किंतु राज्यव्यापी लोकप्रियता हिंमातों की ही थी। जमीनी कार्यों उदाहरण के लिए तीन लाख चाय बागान मजदूरों के परिवारों को जमीन का पट्टा मिलना महत्वपूर्ण घटना थी। अंग्रेज उन्हें काम पर ले गए, उन्हें जमीन का पट्टा नहीं दिया। असम में घुसपैठ लंबे समय से मुद्दा रहा है और इसके आधार पर वहां 80 के दशक में छात्र नेताओं की सरकार बनी। तो यह मुद्दा समाप्त नहीं हो सकता और बाकी पार्टियों ने इसका उपहास उड़ाया और भाजपा आज भी इस पर कायम है। इन सबका असर हुआ है और भाजपा तीसरी बार सत्ता बनाए रखने में कामयाब रही।

तमिलनाडु के परिणामों की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। थलापति विजय की टीवीके या तमिलगा वेत्री कझगम दोनों मुख्य गठबंधन द्रमुक नेतृत्व वाला आईडिया तथा अन्य धार्मिक भाजपा गठबंधन नंबर एक की पार्टी बन जाएगी इसकी भी कल्पना किसी को नहीं थी। दरअसल, द्रमुक के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान जमीन पर दिख रहा था। इसी कारण एमके स्टालिन ने एक तिहाई विधायकों का टिकट काटा। वहां जहरीली शराब पीने से मृत्यु की घटनाएं लगातार हुई और पिछले चुनाव में उन्होंने महिलाओं के समक्ष शराबबंदी लागू करने का वादा किया था। लागू नहीं करने से महिलाओं में नाराजगी थी। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी थे और दो मंत्री जेल जा चुके थे। उन्होंने तमिलवाद और तमिल भाषा को लेकर आक्रामक राजनीति की। पूरी पार्टी और कांग्रेस को छोड़कर गठबंधन सनातन और हिंदुत्व के विरुद्ध जहर उगलने लगी। विधानसभा में अलग से तमिल राष्ट्रगान तक की परंपरा शुरू कर दी। सब अपनी सत्ता बचाने की ही कवायदें थीं। आम लोगों को इस तरह का अतिवाद स्वीकार नहीं था और द्रमुक को इसका आभास हुआ। चुनाव आते-आते सनातन विरोधी वक्तव्य बंद हो गए और उदयनिधि स्टालिन जो एक समय सनातन के समूल नाश की बत करते थे मंदिर -मंदिर घूमने लगे। अन्नाद्रमुख और भाजपा गठबंधन यद्यपि बेहतर चुनाव लड़ी और मटन एवं सीट और सीटों में हुए प्रमुख गठबंधन से आगे हैं पर सत्ता विरोधी जन असंतोष और लोगों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने में सफल नहीं रहे और इसका लाभ विजय को मिला। वैसे भी भाजपा वहां केवल 27 सीटों पर लड़ रही थी। विजय फिल्मी करियर छोड़कर तमिलनाडु की राजनीति बदलने की घोषणा के साथ आए और 2024 में पार्टी बनाने के बाद लगातार सक्रिय रहे। यद्यपि उन्होंने दोनों पक्षों का मत काटा किंतु प्रमुख को ज्यादा क्षति पहुंचाई। ईसाई होने के कारण लगभग चार प्रतिशत ईसाइयों के मत का बड़ा हिस्सा उनके खाते आया और मुस्लिम मतों का भी। यहां से तमिलनाडु की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो रही है और एमजी रामचंद्रन के बाद विजय दूसरे बड़े फिल्म स्टार होंगे जिनके राजनीति में लंबे समय तक रहने की संभावना है।

 केरल में प्रति पांछ वर्ष पर सरकार बदलती रही है। किंतु राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के दुर्बल व दिशाहीन होने के कारण प्रदेश में भी पार्टी प्रभावित हुई और माकपा के बुजुर्ग पी विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा 2021 में भी दूसरी बार सत्ता कायम रखने में कामयाब हुई थी। भाजपा ने वहां खूब काम किया,  जमीनी मुद्दे उठाए, धार्मिक प्रवृत्ति को देखते हुए लोगों की इच्छा को वाणी भी दी। इन सबके परिणामस्वरूप उसके जनाधार में उछाल आया, 2024 में त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत तथा तिरुवनंतपुरम के नगर निगम पर आधिपत्य इसका प्रमाण है। कुछ वर्ष पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। किंतु अभी प्रदेश में व्यापक जनाधार और चुनावी सफलता की दृष्टि से यह कम है। हालांकि भाजपा के कारण मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा या यूडीएफ के पक्ष में हुआ।

तो कुल मिलाकर इन परिणामों का भी निष्कर्ष यही है कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से काफी बदल चुका है। भारत के लोगों के लिए भाजपा अभी भी व्यक्तिगत - आंतरिक व राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंदुत्व अभिप्रेरित व्यापक राष्ट्रवाद तथा, क्षेत्रीय अस्मिता को सकारात्मक महत्व देने वाली, आर्थिक विकास के प्रति प्रतिबद्ध, विरासत के संरक्षण तथा  सामाजिक न्याय व लैंगिक समानता को सही परिप्रेक्ष्य में जमीन पर उतरने वाली पार्टी के रूप में मुख्य विकल्प बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्वमें 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम से यह मिथक टूटा था कि बगैर मुस्लिम मत के केंद्र में किसी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिल सकता। बंगाल के चुनाव परिणाम ने इस मिथक को अंतिम बार ध्वस्त कर दिया।




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मंगलवार, 5 मई 2026

LNJP कॉलोनी में 20 मिनट में मिली दूसरी लाश, छत से बरामद हुई सड़ी हालत में डेडबॉडी; गर्मी से मौत की आशंका, पुलिस जांच में जुटी

असलम अल्वी

नई दिल्ली, 5 मई 2026। LNJP कॉलोनी में मंगलवार देर रात *20 मिनट के अंदर दूसरी लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। पहली लाश राम लीला मैदान के सामने मिली, जबकि दूसरी लाश एक मकान की छत से सड़ी-गली हालत में बरामद हुई। भीषण गर्मी के बीच हुई इन मौतों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या है पूरा मामला:
1. पहली लाश: देर रात LNJP कॉलोनी स्थित राम लीला मैदान के सामने एक व्यक्ति का शव मिला। स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।
2. दूसरी लाश - छत पर: पहली घटना के सिर्फ 20 मिनट बाद एक मकान की छत से सड़ी हालत में लाश बरामद हुई। शव कई दिन पुराना बताया जा रहा है। 
3. पड़ोसी का बयान: छत से लाश मिलने के बाद एक पड़ोसी के मुंह से "हैरान करने वाली बात" निकली, जिससे पुलिस को शक है कि मामला सिर्फ गर्मी से मौत का नहीं है। पुलिस पड़ोसी से पूछताछ कर रही है।

गर्मी बनी वजह या कुछ और? - दिल्ली में पारा 45°C पार कर चुका है। शुरुआती आशंका है कि दोनों मौतें *हीट स्ट्रोक* से हुई हों। लेकिन छत से मिली लाश की हालत और पड़ोसी के बयान के बाद *हत्या या अन्य एंगल* से भी जांच की जा रही है। 

दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया: "दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। छत वाली लाश 4-5 दिन पुरानी लग रही है। PM रिपोर्ट के बाद ही मौत की असली वजह पता चलेगी। फिलहाल इलाके में पूछताछ जारी है।"

इलाके में दहशत: LNJP कॉलोनी में 20 मिनट में 2 लाश मिलने से लोग दहशत में हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि गर्मी में बेघर-लावारिस लोगों की मौत का खतरा बढ़ गया है। 

नोट:  पुलिस जांच जारी है। मौत की असली वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद साफ होगी। अफवाहों से बचें।_
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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

रिकार्ड मतदान के मायने

अवधेश कुमार 

भारतीय चुनाव में जो कभी नहीं हुआ वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अभी तक 92.86 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड हुआ है। तमिलनाडु का भी लगभग 85% मतदान एक रिकॉर्ड है।अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि होगी। पूर्वोत्तर राज्यों में मतदान प्रतिशत औसत से अधिक रहा है किंतु वहां भी केवल 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 91.4% मतदान हुआ था। बंगाल में 2011 से मतदान औसत से ज्यादा रहा। 2011 में 84.5%, 2016 में 82.56% और 2021 में 81.56% मतदान हुआ। वैसे 2010 के बाद से मतदान में वृद्धि देशव्यापी प्रवृत्ति रही है। मतदान अंकगणित का विषय है लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक होती है और उनके मायने राजनीति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम तक जाते हैं। बंगाल का दूसरा चरण अभी बाकी है इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने हुए माहौल का संकेत यही है की मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला और यहीं संकेत भी छिपा हुआ है। 2010 के पहले सामान्य मतदान में वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी या घटकों की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में यह प्रवृत्ति बदल गई। मतदान बढ़ाने के बावजूद सरकारें वापस आती रही और मतदान घटना पर भी कई सरकारें गईं। इसलिए सामान्यत: मतदान का प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने या इसके विपरीत राजनीति परिणाम का निश्चयात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

बंगाल में 2011 में 84.5 प्रतिशत का रिकार्ड मतदान हुआ और वामपंथी मोर्चे की 34 वर्षों की स्थापित सरकार चली गई। उसके बाद मतदान प्रतिशत थोड़ा-थोड़ा घटा किंतु ममता वापस आती रहीं। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान या एसआईआर की प्रक्रिया के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत संतोषजनक होगा। पिछले वर्ष बिहार के चुनाव में 67.25% मतदान हुआ जो 2020 के 57.29 प्रतिशत से 9.96% ज्यादा था। बिहार में लगभग 65 लाख नाम एसआईआर की प्रक्रिया में हटाए गए थे। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं का नाम सूची से हटा।  कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई हुई है और न्यायिक प्राधिकरणों को फैसला करना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई। यह सच नहीं है कि प्रतिशत ज्यादा होते हुए भी कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढी। पिछले चुनाव से लगभग 26 लाख ज्यादा मतदाताओं ने मतदान किया। भारी संख्या में मृतक, दूसरे जगह चले गए या दो जगह नाम वाले या कुछ फर्जी नाम मतदाता सूची में थे और उनके नाम मतदान होते थे जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी। इनके नाम पर कितने वोट डाले गए इसकी गणना कोई नहीं कर सकता। अगर 6.77 करोड़ मतदाताओं के आधार पर पिछला मतदान होता तो मतदाताओं की संख्या कम होती और इस बार वृद्धि बहुत ज्यादा होती। इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

2011 में ममता बनर्जी ने लगभग 5 वर्षों के अनवरत संघर्ष और आक्रामकता से मतदाताओं में वाममोर्चा सरकार के विरुद्ध गुस्सा एवं आलोड़न पैदा किया था। वाम मोर्चा समर्थक भी उनके साथ आये और तृणमूल का अपना भी आधार खड़ा हुआ। जब से भाजपा ने बंगाल में अपनी विचारधारा और राजनीति को जमीन पर उतारने का अभियान चलाया ममता के विरुद्ध समाज के निचले स्तरों पर जबरदस्त आलोड़न है और कुछ महीनो में 2011 पूर्व की स्थिति ममता एवं भाजपा के संदर्भ में उल्टी है। ममता समर्थक और विरोधी तथा भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में स्वयं और अपने मतदाताओं को ज्यादा संख्या में मतदान केन्द्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। 2019 लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम दिखा जब भाजपा ने 40% मत के साथ राज्य 18 सीटें जीत ली। 2018 पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त आलोड़न था और संकेत मिल गया कि भाजपा जमीन पर नीचे तक पहुंची है तथा राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का लगभग सफाया हो चुका है। भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की लहर  भारत में देखा गया है। 2021 में भी भाजपा ने वातावरण बनाने की कोशिश की पर तब तीन सीटों से बहुमत के 148 तक पहुंचना बंगाल के सामाजिक - सांप्रदायिक समीकरणों में कठिन था। इसलिए लगभग 38% मत के साथ हुआ 77 सीटों तक पहुंच पाये। कोरोना महामारी के कारण बनाए गए सरकार विरोधी माहौल का भी थोड़ा असर हुआ। बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा आम लोगों के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। चुनावी रैगिंग या धांधली प्रदेश का स्वाभाविक चरित्र पिछले 60 सालों में बना रहा है। कांग्रेस फिर वाम दल और  तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रवृत्ति को ज्यादा निष्ठुरता से कायम रखा।

इस बार मतदाताओं का बड़ी संख्या में निकलने का एक प्रमुख कारण मतदान और बाद में के लिए दिखता सुरक्षा आश्वासन था। पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 2407 कंपनी, 2193 क्विक रिस्पांस टीम व 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां कुछ कुछ समस्या हो रही थी मतदान के पहले से ही केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे। मतदान के दौरान जहां भी समस्या आई सुरक्षा बल ज्यादातर पहुंचे। इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर के एक भाजपा उम्मीदवार को लोगों द्वारा खदेड़ने और पकड़ कर पिटाई करते वीडियो देखने से अनुमान लग जाता है कि मतदान कैसे भय और आतंक के वातावरण में होता रहा। सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही हिंसा में भी रिकार्ड कमी आई। मतदान बाद निश्चित समय तक केंद्रीय बलों की उपस्थिति के निर्णय ने भी मतदाताओं में सुरक्षा भाव पैदा किया। 2021 उसके पहले 2019 और 2018 तीनों चुनावों में मतदान बाद की हिंसा और लोगों के पलायन से भय का माहौल बना था। चुनाव अभियान के बीच प्रदेश की यात्रा करने वालों को 2026 में माहौल में बदलाव दिख रहा था। मतदाता धीरे -धीरे खुलकर अपना मत प्रकट करने लगे थे। लंबे समय बाद मतदान हत्याविहीन, न्यूनतम हिंसा और निर्भयता के वातावरण में संपन्न हुआ है। निस्संदेह, परिणाम में भी यह दिखाई देगा।

 ममता और समर्थकों की आक्रामकता का जवाब भाजपा ने भी प्रति आक्रामकता से दिया। गृह मंत्री अमित शाह तक के भाषणों में भी आक्रामकता थी ताकि उनके समर्थक मतदाता भयरहित होकर मतदान के लिए निकलें और आक्रमण होतो उसका प्रतिकार करें या सुरक्षा बलों तक सूचना पहुंचाएं। ममता ने अपनी शैली में हमलावर प्रचार किया और यहां तक कहा कि किसी कार्यकर्ता के साथ कार्रवाई होगी तो सरकार उसके साथ खड़ी ही नहीं रहेगी बल्कि कुछ संस्थाओं के मामले में यहां तक कहा कि उसको हम सरकारी नौकरी दे देंगे। पहले भी ममता उन सबकी रक्षा में सामने दिखीं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार या अपराध के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की। इसका असर उनके घोर समर्थकों पर था। देश भर में आम मुसलमान भाजपा के विरुद्ध मतदान करता है और उनकी संख्या कहीं कहीं शत-प्रतिशत तक चली जाती है। बंगाल में उनकी आबादी 29  से 30 प्रतिशत के बीच होगी। वे भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मतदान करने निकले ही होंगे। उसकी प्रतिक्रिया में गैर मुस्लिम समुदाय भी निकले हैं जो टीवी कैमरों पर दिख रहे थे। मुर्शिदाबाद , मालदा, दक्षिण दिनाजपुर आदि जिलों में निकले मतदाता गवाही दे रहे थे कि दोनों पक्षों में करो या मरो का भाव पैदा हो चुका है। जिलों के हिसाब से देखें तो दक्षिण दिनाजपुर में 95.4% , मालदा में 94.43%, मुर्शिदाबाद में 93.58%, उत्तर दिनाजपुर में 94.15%, अलीपुरद्वार में 92.69% , झारग्राम में 92.5%, पश्चिम मेदिनीपुर में 92.118% , बांकुरा में 92.5 0%, पूर्वी मेदिनीपुर में 91.20 प्रतिशत, तथा कूच बिहार में सबसे अधिक 96% मतदान हुआ है। इस दौर में सबसे कम कालिमपोंग में 83.07 प्रतिशत , दार्जिलिंग में 88.80 प्रतिशत, पश्चिम वर्धमान में 90.33% तथा पुरुलिया में 90.91% मतदान हुआ। साफज् है कि जहां एक पक्ष कम रहा वहां मतदान प्रतिशत कम हुआ और दार्जिलिंग, कालिमपोंग आदि इसके उदाहरण हैं।

बंगाल को समझने वाले स्वीकार करेंगे कि तीन लगातार कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान का भी वोट है तथा बदलाव के लिए निकलने वाले मतदाताओं के भी  संख्या है। यह बताने की आवश्यकता नहीं की इन मतदाताओं ने किसके चुनाव चिन्ह पर बटन दबाया होगा। ममता और तृणमूल के राज में सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थी तत्व तथा विरोधियों के विरुद्ध सत्ता व प्रशासन के भयानक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध खासकर संदेशखाली व आरजी कर जैसी महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराध घटनाएं भी सामने है,  दंगों के दौरान प्रशासन की भूमिका, एक समय का संपन्न और उद्योगों तथा कारोबार के मामले में देश के अगुआ राज्य का पीछे होना और संपूर्ण आर्थिक स्थिति पर इसके नकारात्मक असर के कारण भी असंतोष दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इन सबको मुद्दा बनाया। इस तरह रिकार्ड मतदान के पीछे इन समस्त कारकों की सामूहिक भूमिका रही।

वैसे इन 152 सीटों का पिछला अंकगणित देखें तो तृणमूल ने 92 में से 83 पर सीधे भाजपा, पांच पर कांग्रेस और तीन पर माकपा  तथा एक पर भाजपा की सहयोगी और झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आशु को हराया था। ‌इनमें से तीन दांतन,तमलुक और जलपाईगुडी में जीत का अंतर एक हजार से कम और नौ पर एक से पांच हजार का था।‌ कुल मिलाकर इनमें से 23 पर जीत का अंतर 10 हजार से कम था। इनसे ज्यादा एस आई आर में नाम कट गये। एसएआर में औसत प्रतिशत 28, 055 नाम हटे हैं । इस तरह मतदान में वृद्धि का चुनाव परिणाम के संदर्भ में पूर्व आकलन किया जा सकता है।

प्रस्तुतकर्ता Musarrat Times Hindi News pepar पर 1:47 am कोई टिप्पणी नहीं:

रविवार, 26 अप्रैल 2026

वर्तमान युग का कर्बला और ज़हरा व ज़ैनब की बेटियाँ

  • समाज में महिलाओं की भूमिका और इस्लाम की बेटियाँ

अबू अब्दुल्लाह अहमद

समाज में महिलाओं की भूमिका पर कोई भी चर्चा मुस्लिम समाजों के भीतर मौजूद लैंगिक असमानता को संबोधित किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती। इस्लाम में माँ, बेटी या बहन होना गहरे अर्थ रखता है, जो उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अल-ताहिरा, सय्यिदत-उल-क़ाइनात हज़रत फ़ातिमा अल-ज़हरा, और “दूसरी ज़हरा” हज़रत ज़ैनब के आदर्श जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस्लाम में महिलाओं की स्थिति अक्सर दो अतियों के बीच फँसी रही है: एक ओर बाहरी आलोचकों के आरोप, गलत प्रस्तुतियाँ और रूढ़िवादी धारणाएँ; और दूसरी ओर मुस्लिम समाजों के भीतर कुछ पितृसत्तात्मक समूहों और पूर्व-इस्लामी अज्ञानता से प्रभावित व्याख्याएँ। ये दोनों ही इस्लाम की नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि के विपरीत हैं, जो महिलाओं को सम्मानित, नैतिक रूप से उत्तरदायी और सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों के रूप में मान्यता देती है। इस दृष्टि को समझने के लिए इस्लामी इतिहास, उसके मूल सिद्धांतों और आदर्श व्यक्तित्वों का अध्ययन आवश्यक है।

इस्लामी इतिहास की पहली मुस्लिम महिला उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अल-ताहिरा थीं, जो पैगंबर मुहम्मद की पत्नी थीं। वे सबसे पहले उन पर ईमान लाने वाली थीं और हर कठिनाई में उनके साथ अडिग रहीं, उन्हें निरंतर समर्थन और प्रोत्साहन देती रहीं। एक संपन्न महिला होने के बावजूद, उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति इस्लाम और समाज सुधार के कार्य में लगा दी। इसी परंपरा की निरंतरता दूसरी सदी में भी दिखाई देती है, जब दुनिया का पहला विश्वविद्यालय अल-क़रविय्यीन (859 ई.) मोरक्को के फ़ेज़ में एक मुस्लिम महिला फ़ातिमा अल-फ़िहरी द्वारा स्थापित किया गया, जो ख़दीजा की तरह ही एक सम्मानित कुरैशी व्यापारी की बेटी थीं।

जब मुसलमान जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी थे, तब मदीना, कूफ़ा, बग़दाद, काहिरा, दिल्ली और इस्तांबुल जैसे शहर ज्ञान, कला, उद्योग और व्यापार के वैश्विक केंद्र बन गए। यह उपलब्धि पुरुषों और महिलाओं, विद्वानों और कामगारों—सभी के संयुक्त प्रयास का परिणाम थी, क्योंकि इस्लाम समाज के समग्र विकास और प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान प्रगति के अवसरों पर बल देता है। एक संतुलित और प्रगतिशील समाज के लिए महिलाओं की घर और समाज दोनों में सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

हज़रत ख़दीजा, पैगंबर की पैगंबरी की घोषणा से पहले ही अरब में एक प्रतिष्ठित और समृद्ध व्यवसायी थीं, जो बड़े व्यापारिक काफिलों का प्रबंधन करती थीं। पैगंबर स्वयं उनके व्यापारिक साझेदार थे। इस्लाम के प्रसार में उनका योगदान पैगंबर के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इतिहासकार उन्हें मानवता की महान हितैषी मानते हैं, और उनके निधन का वर्ष “आम अल-हुज़्न” (शोक का वर्ष) के रूप में जाना जाता है। उनकी बुद्धिमत्ता, संपत्ति और कुरैश में प्रभाव ने पैगंबर के मिशन को मजबूत किया।

एक और उल्लेखनीय उदाहरण हज़रत फ़ातिमा अल-ज़हरा का है, जिन्हें जन्नत की महिलाओं की नेता कहा गया है। पैगंबर उन्हें प्रेमपूर्वक “उम्म अबीहा” (अपने पिता की माँ) कहते थे। वे कम उम्र से ही अत्यंत बुद्धिमान थीं और पैगंबर के मिशन में सक्रिय रूप से शामिल रहीं। वे अहल-उल-किसा (पवित्र चादर वाले पाँच व्यक्तियों) में शामिल थीं, जिनकी पवित्रता का उल्लेख क़ुरआन में मिलता है। जब भी वे पैगंबर से मिलने आतीं, वे सम्मान में खड़े हो जाते और उन्हें अपने पास बैठाते। उन्होंने कठिन समय में अपने पिता और अपने पति हज़रत अली अल-मुर्तज़ा का साथ दिया। उहुद की लड़ाई के दौरान, जब पैगंबर और हज़रत अली घायल हुए, तब उन्होंने साहसपूर्वक उनकी देखभाल की।

इसी प्रकार, कर्बला की त्रासदी अत्याचार, अन्याय, कानून के उल्लंघन, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और पैगंबरी परंपरा के स्थान पर साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष का एक सशक्त प्रतीक है। इस संघर्ष में हज़रत ज़ैनब बिन्त अली ने न केवल अपने भाई इमाम हुसैन का साथ दिया, बल्कि बाद में न्याय की आवाज़ बनकर उभरीं। अपार व्यक्तिगत क्षति के बावजूद, उन्होंने असाधारण नेतृत्व और साहस का परिचय दिया और कूफ़ा व दमिश्क के दरबारों में प्रभावशाली भाषण दिए, जो आज भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका के सशक्त प्रमाण हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि इतने उज्ज्वल उदाहरणों के बावजूद, मुस्लिम समाजों में कुछ व्याख्याओं ने महिलाओं को घर की चार दीवारों तक सीमित कर दिया है और इसके लिए क़ुरआन और हदीस का दुरुपयोग किया गया है। यह स्वीकार करना होगा कि इस्लाम में महिलाओं की वास्तविक स्थिति को समझने में विफलता का कारण अक्सर बाहरी आलोचना से अधिक, स्वयं मुसलमानों के कार्य और उनकी व्याख्याएँ हैं। यही कारण है कि जब भारत जैसे देशों में मुस्लिम महिलाएँ चिकित्सा, इंजीनियरिंग, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, या तुर्की और ईरान की महिला पायलट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाती हैं, तो दुनिया आश्चर्य करती है।

वास्तव में, परिवार और समाज का स्वास्थ्य उसके दोनों हिस्सों की मजबूती पर निर्भर करता है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में आधी आबादी को हाशिए पर रखना प्रगति की आधी लड़ाई हारने के समान है। पुरुष और महिलाएँ एक गाड़ी के दो पहिए और शरीर के दो हाथों की तरह हैं। महिलाएँ न केवल घर की नींव को मजबूत करती हैं, बल्कि शिक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शिक्षित और सशक्त महिलाएँ आने वाली पीढ़ियों के निर्माण, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक न्याय में योगदान देती हैं।

क़ुरआन पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी आध्यात्मिक या नैतिक भेदभाव का समर्थन नहीं करता, बल्कि उन्हें “एक-दूसरे के संरक्षक” के रूप में वर्णित करता है और ईश्वर के सामने समान रूप से उत्तरदायी मानता है। पैगंबर ने महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया, उन्हें विरासत का अधिकार दिया, उनके आर्थिक योगदान को मान्यता दी और उन्हें सामाजिक व राजनीतिक जीवन में शामिल किया। महिलाएँ सार्वजनिक रूप से नेताओं से प्रश्न करने का साहस रखती थीं, यहाँ तक कि खलीफा उमर इब्न अल-ख़त्ताब से भी।

पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देना परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि वास्तविक इस्लामी शिक्षाओं को बाद की विकृतियों से अलग करने का प्रयास है। इसके लिए न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा जैसे इस्लाम के मूल सिद्धांतों की ओर लौटना आवश्यक है। जब इन सिद्धांतों का पालन किया जाता है, तो कई अन्यायपूर्ण प्रथाएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।

इस्लाम महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है, जो बाहरी मॉडल की नकल पर नहीं बल्कि मूल्यों पर आधारित है। यह ढाँचा तीन मुख्य आधारों पर टिका है: गरिमा, शिक्षा और भागीदारी। इस्लाम हर इंसान की गरिमा को स्वीकार करता है, महिलाओं को अधिकारों और जिम्मेदारियों के साथ एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मान्यता देता है, और पुरुषों व महिलाओं दोनों के लिए ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य करता है। सामाजिक, आर्थिक और नागरिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रारंभिक इस्लामी समाज की एक स्थापित विशेषता है।

व्यापार, शिक्षा और सार्वजनिक परामर्श से लेकर समाज सेवा तक, महिलाओं ने इतिहास में विविध और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं। बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के अतिवादी दृष्टिकोणों से निपटने के लिए बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक स्पष्टता आवश्यक है। इसके लिए इस्लामी स्रोतों के साथ गहरा जुड़ाव, इतिहास में महिलाओं की सक्रिय भूमिका की स्वीकार्यता और समकालीन चुनौतियों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

फ़ातिमा और ज़ैनब की विरासत हमें सिखाती है कि गरिमा और प्रतिरोध, आस्था और धैर्य—एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। क़ुरआन की दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि न्याय बिना लैंगिक समानता के अधूरा है। इस दृष्टि को पुनः अपनाकर आज के मुस्लिम समाज एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं, जो अपनी आध्यात्मिक जड़ों के प्रति वफादार होने के साथ-साथ आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप भी हो—जहाँ महिलाएँ न्याय, ज्ञान और सामूहिक कल्याण की दिशा में समान भागीदार हों।

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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

जब कॉमन सिविल कोड आवश्यक है तो यूनिफार्म आपराधिक प्रक्रिया क्यों नहीं?

बसंत कुमार

आपके सरकारी आवास में बेहिसाब नोटो के बंडल मिलने के आरोप से घिरे जस्टिस वर्मा ने अपना त्याग पत्रभेजा दिया और उसके कारण संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बंद हो गई। इसके कारण न तो उनके खिलाफ अपराधिक कार्यवाही नहीं हो पाएगी और उनका त्याग पत्र स्वीकार होने के पश्चात उन्हें सेवा से संबंधित सभी लाभ मिल जाएंगे और जीवन पर्यन्त पेंशन भी मिलती रहेगी। अब प्रश्न यह उठता है कि जस्टिस वर्मा की जगह कोई साधारण कर्मचारी होता तो विजिलेंस प्रोसिडिंग या क्रिमिनल प्रोसिडिंग शुरू होने से पहले अपना त्याग पत्र देता और उनका त्याग पत्र स्वीकार करके उसे सारे सरकारी सेवा के लाभ लेने दिए जाते। जब इस देश में सर्वोच्च न्यायालय समेत अनेक प्लेटफार्म से कॉमन सिविल कोड की बात होती हैं तो फिर ऐसी न्यायिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जाती जहां उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और आम जनसेवक के विरूद्ध एक ही तरह की प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं होती।
यह पहला अवसर नहीं है कि उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई हो पर आरोपी न्यायाधीश को अपने पद से त्यागपत्र देकर उसे सेवा से संबंधित सभी लाभ प्राप्त करने का अवसर प्रदान कर दिया गया हो। 1990के दशक में जस्टिस रामा स्वामी के विरुद्ध संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया पर संसद के उत्तर भारत और दक्षिण भारत के आधार पर बंट जाने के कारण महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया और जस्टिस रामास्वामी को त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया और उन्हें सारे सेवा के लाभ मिल गए। ठीक उसी प्रकार वर्ष 2010के दशक में जस्टिस मुखर्जी के विरुद्ध संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी न हो सकी और उन्हें सरकारी सीवा से त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया क्या इस तरह से लाभ आम कर्मचारी को मिल सकता है।
भारत सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के मामले में भ्रष्टाचार के मामलों के निपटान के लिए लागू सी सी एस (सी सी ए) रूल्स के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उसे 48घंटे से अधिक जेल में रहता है तो उसे सरकारी सेवा से निलम्बित समझा जाए है पर दो वर्ष पूर्व दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपी मे गिरफ्तार किए गए तो वे कई माह तक तिहाड़ जेल से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में काम करते रहे और सरकार चलाते रहे आखिर न्यायाधीशों और मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लोगों के लिऐ आपराधिक प्रक्रिया अलग अलग क्यों है, जब आम कर्मचारी इस आशंका से कि वह जांच को प्रभावित कर सकता है, आपराधिक प्रक्रिया शुरू होते ही निलम्बित कर दिया जाता है पर उच्च पदों पर बैठें न्यायाधीश और मंत्री मुख्यमंत्री अपने पदों पर विराजमान रहते हैं। यू पी ए 1सरकार के समय जब चारा घोटाले में अपना नाम आने के बावजूद लालू प्रसाद यादव उनके मंत्रिमंडल में बने हुए थे तो उनका बचाव करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि जब तक कोई न्यायालय द्वारा दोषी सबित नहीं ठहराया जाता तो उसे निर्दोष ही माना जाएगा तो फिर आम कर्मचारी ट्रायल कोर्ट में केस के निपटान से पहले 20-2 0साल तक निलम्बित क्यों रखे जाते हैं।
मैने भारत सरकार में अपनी सेवा के दौरान कम से कम बीस मामलों में देखा है कि छोटे मोटे अपराधों में अपना नाम आने पर अपना त्यागपत्र दे देते है और स्टीरियोटाइप ढंग से उनका त्यागपत्र स्वीकार करने के बजाय उनको सस्पेंड करके सी बी आई या अन्य जांच एजेंसियों को भेज देते हैं और ये एजेंसियां छोटे मोटे अपराधों में कनविक्शन के लिय ट्रायल कोर्ट में भेज देते है जब कि इन मामलों को विभागीय कार्यवाही के द्वारा बर्खास्तगी, पद अवनति या अन्य उपयुक्त सजा दी जा सकती है। पर ट्रायल कोर्ट में भेजने के बाद ट्रायल बीस वर्ष तक चलता है और तब तक उस कर्मचारी को सस्पेंड रखा जाता है और उसे गुजारा भत्ता के रूप में 50%से लेकर 75%, तक वेतन देना पड़ता है और जो कर्मचारी बीस पच्चीस वर्ष की आयु में इन चक्करों में फंस जाता है वह 75से 80वर्ष की आयु में ही छूट पाते हैं, पर न्यायाधीशों की स्थिति अलग है जो त्यागपत्र देकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं।
जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले अपना त्यागपत्रसीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया और इस इस्तीफे से उन पर चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बीच में ही रुक गई, मानो संसद यह इंतजार कर रही थी कि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा आए और हम महाभियोग की कार्यवाही रोक दे, ऐसी दरियादिली आम कर्मचारियों के साथ नहीं दिखाई जाती कि 100-200 रु की रिश्वत के आरोप में घिरा व्यक्ति इस्तीफा दे और उसके खिलाफ सी बी आई या पुलिस की कार्यवाही रोक दे उसे तो अंजाम तक पहुंचाना होता है यहां पर गौर करने वाले बात है कि जस्टिस वर्मा के आवास से 15करोड़ से अधिक के नोट मिले या जले, पर कोई एफ आई आर नहीं हुई। इससे पहले वर्ष 2011में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ फंड की हेराफेरी का आरोप लगा, जांच में दोषी पाए जाने के बाद राज्यसभा में उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित हो गया लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले उन्होंनेइस्तीफा दे दिया। इसी तरह सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस दिनाकरन पर वर्ष 2011में ही कदाचार के आरोप लगे संसद द्वारा उनके खिलाफ जांच समिति बनाई गई पर जांच समिति की कार्यवाही शुरू होने से पहले उन्होंने जांच समिति की प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
इस प्रकार भ्रष्टाचार कदाचार के आरोपों से घिरे जजों का इस्तीफा दे देने से महाभियोग की प्रक्रिया रद्द हो जाती है और कोई ऐसा नियम नहीं है कि महाभियोग से पहले इस्तीफा देने वाले जज के रिटायरमेन्ट बेनिफिट्स पेंशन आदि रोक दिए जाए। इसीलिए भ्रष्टाचार और कदाचार के लिप्त पाए जाने के बाद भी ये सुविधाएं मिलती रहती है जो इज्जत के साथ अपनी सेवा पूरी करने वाले जज को मिलती रहती है। पर एक आम कर्मचारी यदि अपने खिलाफ कार्रवाई पूरी होने से पूर्व त्याग पत्र दे दे तो क्या उस पर हो रही कार्यवाही रुक जाएगी या उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही पड़ेगा।
स्वतंत्र भारत में विगत 7दशक में कई पार्टियां सत्ता में आई और सत्ता से बाहर हुई और इनकी नीति के हिसाब से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में बड़ा बदलाव हुआ गांधी आंबेडकर और नेहरू जैसे लोगों को बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता था पर आज कल कोई भीछूट भैया इनको गाली देने लगताहै, पर एक चीज नहीं बदली वो है लोगों का देश की न्यायपालिका के प्रति अटूट विश्वास, पर यदि भ्रष्टाचार और कदाचार में लिप्त न्यायाधीशों को तकनीकी आधार पर इनके कृत्यों की सजा पाने से बचाया जायेगा औरआम जनता छोटे छोटे अपराधों के लिय 30-4 0साल तक न्यायालयों के चक्कर लगाएगी तो लोगों का न्याय पालिका से विश्वास उठ जाएगा।
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