शनिवार, 11 अप्रैल 2026

आंबेडकर जयंती पर विशेष : बाबा साहब डॉ आंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माण के पथ प्रदर्शक

बसंत कुमार

14 अप्रैल 2026 को देशभर में भारत रत्न बाबा साहब डॉ आंबेडकर जी की 136वीं जयंती पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। बाबा साहब भारत की सांसदी इतिहास के इकलौते महापुरुष हैं जिनके 125 में जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा वर्ष  2015 में संसद का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया था और इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने देश के निर्माण में बाबा साहब के योगदान की चर्चा की थी। बाबा साहब के विषय में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण चालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा था कि जब हम विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्रियों की बात करते हैं तो उसे सूची में डॉ अंबेडकर को प्रमुखता से पाते हैं,जब हम प्रमुख कानून विद की बात करते हैं तो डॉक्टर अंबेडकर का नाम सामने आता है,जब हम देश के  संविधान निर्माण की बात करते हैं तोड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन के रूप में  डॉक्टर अंबेडकर की भूमिका प्रमुख रूप से नजर आती है। जब हम देश के वंचित समाज के उत्थान की बात करते हैं तो बाबा साहब आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, साहू जी महाराज आदि समाज सुधारको की श्रेणी में पाए जाते हैं।

मात्र 23 वर्ष की उम्र में डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और उसके पश्चात लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (डी एस सी) की उपाधि प्राप्त की। जिस उपाधि को प्राप्त करने में लोगों को 8 वर्ष का समय लग जाता है डॉक्टर अंबेडकर ने उसे उपाधि को मध्य ढाई वर्ष के परिश्रम से प्राप्त प्राप्त कर लिया था। उनकी शोध "प्रॉब्लम आप रूपी" ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया! उनकी आर्थिक शोधों और विचारों से प्रेरणा लेकर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों और वंचितों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए स्टार्टअप, स्टैंड अप इंडिया,मेक इन इंडिया, जनधन योजना आत्म निर्भर भारत जैसी योजनाओं को मूर्ति रूप दियाऔर आज भारत विश्व की पांचवी अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शीघ्र ही भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लेगा।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने ब्रिटिश काल में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डिप्रेस्ड क्लास के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की अपनी मांग मां वाली वे चाहते तो वंचित वर्ग के समुदाय के लिए एक अलग देश की मांग कर सकते थे पर वह दिल से पक्के राष्ट्रवादी थे और गांधी जी के साथ 1932 में पुणे पैक समझौते के माध्यम से वंचित समुदाय के लिए प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु आरक्षण का प्रावधान करवाया जिसके परिणाम स्वरूप वंचित समाज आज समाज के मुख्य धारा में सम्मिलित हो रहा है और संविधान निर्माण के समय उन्होंने आर्टिकल 3 40 को संविधान में सम्मिलित करवाया जो पिछले वर्गों की स्थित की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान करता है उन्होंने वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के सामने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की वकालत की थी और मंडल आयोग की सिफारिश के लिए एक मजबूत आधार दिया था इसलिए कोई क्या नहीं कर सकता की बाबा साहब अंबेडकर मात्र दलितों के नेता थे बल्कि उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के लिए भी मजबूत आधार दिया।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की प्रतिभा का सम्मान करते हुए ब्रिटिश इंडिया काल में वायसराय काउंसिल के श्रम सदस्य (श्रम मंत्री) के रूप में उन्हें नियुक्त किया गया। वह इस पद पर 1946 42 से लेकर 1946 तक रहे और श्रमिकों का सुधार के लिए अनेक प्रावधान किया श्रमिकों कार्य की अवधि 12 घंटे से हटाकर 8 घंटे करवाई और काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का प्रावधान किया! देश की जल नीति के लिए 1942 में सेंट्रल वोल्टेज वॉटरवेज इरीगेशन और नेवीगेशन आयोग के चेयरमैन के रूप में सूखा मुक्त भारत की नींव रखी। नदियों को आपस में जोड़ने के उनके सुझाव का मध्य प्रदेश की केन और बेतवा नदी के को जोड़ने की परियोजना का वर्ष 2025 में उद्घाटन करके माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ आंबेडकर के सपनों को मूर्ति रूप देने का प्रयास किया।

देश के कानून मंत्री के रूप में डॉक्टर अंबेडकर ने 1931 में हिंदू कोड बिल पेश किया जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के सशक्तिकरण  के लिए पैतृक संपत्ति में उनका उत्तराधिकार था। पर जब कुछ रूढ़िवादी लोगों के कारण लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित न हो सका तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। भारत के इतिहास में डॉक्टर अंबेडकर इकलौते महापुरुष थे जिन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए अपना पद त्याग कर दिया दूसरे शब्दों में महिलाओं के अधिकार के लिए और उनकी शिक्षा के लिए ज्योति बा फुले और साबित्री बाई फूले के मिशन को आगे बढ़ाने का काम किया।

आज हमारा देश संप्रदायवाद की समस्या से जूझ रहा है देश में SIR की आलोचना हो रही हैऔर विपक्षी दलों ने इसको चुनावी मुद्दा बना दिया है जब कि मोदी सरकार अवैध घुसपैठ से देश को मुक्त करना चाहती हैं,पर 1940 की दशक मेंबाबा साहब की पुस्तक "पाकिस्तान एंड पार्टीशन आफ इंडिया" में लिखित बाबा साहब अंबेडकर की बात मान ली गई होती कि देश का  धार्मिक आधार विभाजन न होयदि यह विभाजन अवश्यंभावी ही है तो तो दोनों देशों में जनसंख्या का संपूर्ण स्थानांतरण अर्थात सारे हिंदू भारत में और सारे मुसलमान पाकिस्तान में चले गए होतेऔर यह हो जाता तो आज देश इस गंभीर स्थिति से नहीं गुजर रहा होता। इसके लिए देश के विभाजन की सूरत में जनसंख्या के स्थानांतरण के लिय एक विस्तृत योजना बना ली थी पर प नेहरूऔर जिन्ना ने इस पर अमल नहीं किया और 1947में दोनों ओर से भीषण नर संहार हुआ लेकिन विभाजन के पश्चातभी जो मुसलमान याअल्पसंख्यक भारत में रह गए उनके जीवनकी सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षण के लिए बाबा साहब ने संविधान में प्रावधान किए। जिसके कारण भारत को अपना देश मानने वाले मुसलमान व अल्प संख्यक सम्मान के साथ रह रहे हैं।

संविधान में विवादित अनुच्छेद 370 के पक्ष में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर नहीं थे संविधान निर्माता के रूप में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजो पर उनके डॉक्टर अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला को यह कह कर मना कर दिया कि आप चाहते हैं कि कश्मीर की रक्षा और देश की जनता की कल्याण का जिम्मा भारत उठाए और उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए परंतु नेहरू जी ने डॉ आंबेडकर की असहमति को नजर अंदाज करते हुए इस विवादित अनुच्छेद को संविधान में जुड़वाया परंतु वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प के कारण यह विवादित अनुच्छेद संविधान से हटाया गया और आज कश्मीर देश का हिस्सा बना हुआ है और आज कश्मीर की क्रिकेट टीम रणजी ट्रॉफी चैंपियन है और कश्मीर के अनेक युवा सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होकर देश की मुख्य धारा में शामिल हो रहे है।

बाबा साहब के महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी 125वीं जयंती परवर्ष 2015में आयोजित संसद के विदेश विशेष अधिवेशन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कोई बात कहना चाहती है तो वह डॉक्टर अंबेडकर को कोट (उद्धरित)करती है और सरकार भी अपने समर्थन में कोई बात कहना चाहती है तो वह भी डॉ आंबेडकर की कहिए लिखी बातों को कोट करती है यानि डॉ आंबेडकर पक्ष विपक्ष दोनों को स्वीकार्य हैं और यही डॉ आंबेडकर की महानता और विद्वता का परिचायक है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

देश प्रमुख का सम्मान हम पाश्चात्य से क्यों नहीं सीखते

बसंत कुमार

वर्ष 2014 में एक किताब छपी थी जिसका टाइटल था मोदी नामा, यह पुस्तक मुगल काल में छपी पुस्तक बाबर नामा की तर्ज पर लिखी गई थी जिस प्रकार बाबर नामा में मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर की प्रशंसा की गई थी, उसी प्रकार मोदी नामा की लेखिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बड़ी तारीफ की थी और यहां तक की गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। परंतु कुछ दिन पूर्व उसी लेखिका ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी पर चरित्र हनन के अनेक आरोप लगाए। जबकि यह 2014 से पहले मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात के विकास में उनको कार्यों की बड़ी प्रशंसक रही है परंतु ऐसा क्या है कि मार्च 2026 से प्रधानमंत्री मोदी के चरित्र को लेकर सोशल मीडिया पर इतनी आक्रामक हो गई है।

इसके अतिरिक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता रहेपूर्व मंत्री व राज्यसभा सांसद डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र के बारे में अनाप समाप कहते रहते हैं। यही नहीं डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के बारे में ऐसी बातें कह देते हैं जिसके कल्पना नहीं की जा सकती हैजबकि अटल बिहारी वाजपाई के व्यक्तित्व की प्रशंसा भाजपा के लोग ही नहीं बल्कि विपक्ष में बैठे कांग्रेस के लोग भी करते हैं। अब प्रश्न यह उठना है की सोशल मीडिया पर इस समय देश के प्रधानमंत्री के चरित्र हनन की पुरजोर कोशिश की जा रही है परंतु न तो सरकार और न ही न्यायालय इस मामले में कोई सजान ले रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि देश का प्रधानमंत्री किसी पार्टी का प्रधानमंत्री नहीं है अपितु वह पूरे देश का प्रधानमंत्री है उनसे राजनीतिक विरोध हो सकता है हम उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं पर इस तरह से उनके चरित्र हनन की बात नही की जानी चाहिए।

कुछ वर्षों पूर्व मैंने पूर्व आईएएस अधिकारी और अटल जी की कैबिनेट में वित्त मंत्री का उत्तरदायित्व निभा चुके श्री यशवन्त सिन्हा का एक लेख पढ़ा था जो एक दैनिक में प्रकाशित हुआ था जिसमे उन्होंने लिखा था कि अमेरिका सहित अन्य

पश्चिमी देशों में कभी भी ऐसा नहीं होता कि वहां के लोग अपने देश के प्रधानमंत्रीया राष्ट्रपति कीइस तरह आलोचना करते हैं अपने इस लेख के सपोर्ट में उन्होंने दशकों पहले अमेरिका की इराक पर आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा था इराक द्वारा जैविक परमाणु हथियार रखने केआरोप के आधार पर अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन सरकार पर हमला किया पर वहां कुछ नहीं मिला, लेकिन किसी भी अमेरिकी ने उसे समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की आलोचना नहीं की। इसी प्रकार यूनाइटेड किंगडम में वहां की संसद में किसी सांसद ने महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे थे तो उस सांसद को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी, पर आज हमारे देश में प नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र हनन का फैशन सा चल पड़ा है।

राज गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में और 9 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में चर्चा आयोजित की गई है और सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक वंदे मातरम की याद में साल भर चलने वाले कार्यक्रम की घोषणा की। यह पूरे राज्य के लिए गौरव का विषय था क्योंकि वंदे मातरम सर्वप्रथम1886में कांग्रेस के अधिवेशन में गया गया, लेकिन भाजपा सही सभी पार्टियों ने इस राष्ट्रगीत को सदैव सम्मान दियाऔर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा संसद में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया परंतु इस अवसर पर राज्यसभा सांसद निशिकांत दुबे विपक्ष पर आक्रमण करने में इतने उतावले थे कि इन्होंने इस अवसर पर भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बातें संसद मेंछेड़ दी,

माननीय सांसद यह भूल गए कि भारत के लोकतांत्रिक परंपरा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई के लिए एक दिन देश प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी की थी और वह भविष्य वाडी 4दशक बाद सत्य भी हुई और बांग्लादेश विजय पर अटल बिहारी वाजपेई ने इंदिरागांधी को दुर्गा की उपाधि दी थी और नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में यूनाइटेड नेशन में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया था, इसलिए ऐसे पवित्र मौके पर जहां राष्ट्र की वंदे मातरमऔर बंकिम चंद्र चटर्जी को याद करने की बात हो रही थी वहां पर पंडित नेहरू या श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बात करना हमारे लोकतांत्रिक परंपरा के मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

मधु किश्वर ने वर्ष 2014 में मोदी नामा पुस्तक लिखी और उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदीजी के कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा की यहां तक की गोधरा और अन्य घटनाओं पर उनका बचाव करती रही, ऐसा करते समय उनके मन में कोई न कोई महत्वाकांक्षा रही होगी और उसमें कोई बुराई भी नहीं थी क्योंकि लेखक भी इंसान होता हैऔर उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं और एक पुस्तक लिखने में उसे रात दिन एक करना पड़ता है। मैने भी एक राष्ट्रीय नेता के लिए राष्ट्रवादी कर्मयोगी और हिंदुत्व एक जीवन शैलीजैसी पुस्तके लिखी, जिसके लोकार्पण में भाजपा के शीर्ष पुरुष श्री लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथजी जैसे लोग आए। पर जब ये नेता मोदी सरकार में मंत्री बन गए तो मुझे दूध की मक्खी की तरह बाहर कर दिया गया हो, हो सकता है कि कुछ ऐसा भी मधु किश्वर जी के साथ हुआ हो उन्हें गुस्सा भी आया हो, पर इसके लिए उस नेता का इस तरह से चरित्र हनन करना मेरे विचार में बिल्कुल ही अनुचित है।

बेशक हम विश्व की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के रूप में माने जाते रहे हैं, एक समय ऐसा भी आया जब 1975के आपातकाल के दौरान सभी विपक्ष नेता जेल में ठूंस दिए गए परन्तु तब भी पक्ष विपक्ष के नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर अमर्यादित टिप्पणी नहीं कि। परंतु आज के समय में जिस तरह से नेताओं के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप और उनके चरित्र हनन की घटनाएं बढ़ रही है इन सबके लिए हमें अमेरिका सहित यूरोपीय देशों की परंपराओं को सिखना होगा जहां विरोध होते हुए भी अपने विरोधी नेताओं के ऊपर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए जाते। हमारे यहां तो ऐसे लोग जो बड़े-बड़े उत्तरदायित्व के पदों का निर्वहन कर चुके हैं उनके द्वारा प्रधानमंत्री या अन्य पदों पर रह चुके व्यक्तियों के लिए चरित्र हनन जैसी चीज शुरू कर देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है इससे पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाई जा रही है। सोशल मीडिया पर बेरोक टोक चल रही इस तरह की पोस्ट पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 11वर्षों से देश में सरकार चला रहे हैं और इस कार्यकाल में उनकी सरकार की अनेक उपलब्धियां रही है और यह भी संभव है कि इतने लंबे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो पर इन सब के लिए उनकी आलोचना यदि संसद के अंदर और बाहर हो तो वह स्वागत योग्य है परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के न पूरा होने के कारण डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और मधु किश्वर जैसे लोगों द्वारा चरित्र हनन किया जाना न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री का अपमान है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपमान है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

शिक्षा के नाम पर धंधा : कब तक चलेगी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी?

विकास खितौलिया

भारत में शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की रीढ़ माना गया है। “विद्या दान” को सबसे बड़ा दान कहा गया है, लेकिन आज के दौर में यही शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। खासकर महानगरों में प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और फीस की बेतहाशा वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राजधानी दिल्ली में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है, जहां शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि मुनाफे का साधन बनती दिखाई दे रही है। हाल ही में कुछ न्यूज चैनलों ने खासकर जी न्यूज ने अपने कई कार्यक्रमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और प्राइवेट स्कूलों की इस “कालाबाजारी” पर सवाल खड़े किए हैं। यह सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर है। दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूल पिछले साल से फीस में भारी बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह बढ़ोतरी किसी एक या दो प्रतिशत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार 15% से 30% तक पहुंच जाती है। इससे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि उसकी पारदर्शिता की भी है। स्कूल प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं करते कि आखिर किन आधारों पर फीस बढ़ाई जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों को बिना किसी पूर्व सूचना के बढ़ी हुई फीस का नोटिस थमा दिया जाता है। अगर कोई विरोध करता है, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।

फीस के अलावा स्पेशल एक्टिविटी, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। कई प्राइवेट स्कूलों ने खास दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का नियम बना रखा है। इन दुकानों पर किताबों के दाम बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जो किताबें  सामान्य बाजार में 2000 रुपये में मिल सकती हैं, वही स्कूल में उपस्थित दुकानों पर 7000-8000 रुपये में बेची जाती हैं। यही हाल यूनिफॉर्म का भी है। अन्य पब्लिशर द्वारा छपवाई गई किताबों में अक्सर प्रिंटिंग में बहुत सी त्रुटि भी पाई जाती है । यह एक तरह का “टाई-अप” होता है, जिसमें स्कूल और दुकानदार दोनों को फायदा होता है, लेकिन नुकसान सिर्फ अभिभावकों का होता है। स्कूल द्वारा जारी अनिवार्यता सर्कुलर के कारण मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल में उपस्थित दुकानों से ही खरीदनी पड़ती है। स्पेशल एक्टिविटी की बात तो पूछो ही मत कोई बच्चा यदि स्पोर्ट्स एक्टिविटी में अच्छा है, सही मार्गदर्शन मिले तो देश, अपने माता-पिता का नाम रोशन तो करेगा ही साथ में स्कूल का नाम रोशन होता है। पर स्कूल इस कौशल, प्रतिभा को दरकिनार करते हुए स्पेशल एक्टिविटी के नाम 5000 से 10 हजार ले लेता है । अभिभावकों पर फीस, किताबों का आर्थिक बोझ तो पहले से ही होता है उसके बाद स्पेशल एक्टिविटी के नाम पर और फीस । इसलिए देश में लाखों बच्चे स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी से दूर हो जाते है और तो और देशभर में कई निजी स्कूलों द्वारा हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फंक्शन, कार्निवल, डांडिया डांस और अन्य अलग-अलग शुल्क के नाम पर हजारों रुपये वसूले किए जाते हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या प्राइवेट स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ एक व्यवसाय चला रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना और समाज को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कई स्कूलों में एडमिशन के समय “डोनेशन” या “कैपिटेशन फीस” के नाम पर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं। यह पूरी तरह से अवैध होने के बावजूद खुलेआम चल रहा है। अभिभावक मजबूरी में इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है।

दिल्ली सरकार ने समय-समय पर प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने के लिए कई नियम बनाए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता। स्कूल प्रबंधन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी मनमानी जारी रखते हैं। फीस रेगुलेशन कमेटी जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यवाही अक्सर धीमी और सीमित होती है। जब तक कोई ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्कूलों पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसी वर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साकेत के एपीजे स्कूल ने फीस बढ़ोतरी के चलते कुछ बच्चों के बोर्ड परीक्षा के रोल नम्बर रोक दिए थे, जब यह नेशनल न्यूज बनी तो एग्जाम के एक दिन पूर्व रात्रि में बच्चों को रोल दिए थे । तो वहीं डीपीएस, सालवान आदि प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले उठ रहे है । शिक्षा क्षेत्र में दिल्ली की पिछली सरकार ने अच्छे कदम उठाए थे। कई वर्षों तक स्कूल अपनी मनमानी नहीं कर पाए थे । इस पूरे प्रकारण में सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों को झेलनी पड़ रही है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों को बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसके अलावा, अगर कोई अभिभावक स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं उसके बच्चे को नुकसान न उठाना पड़े। यह डर भी स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देता है।

इस पूरे मुद्दे को सामने लाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है। जब बड़े प्लेटफॉर्म इस विषय को उठाते हैं, तो सरकार और प्रशासन पर दबाव बनता है। हाल ही में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि शायद अब कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन सिर्फ खबर दिखाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को लगातार निगरानी और जन दबाव जरूरी है। वैसे इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं । पर सरकार की नीयत साफ हो । सरकार को फीस वृद्धि पर स्पष्ट और सख्त नियम बनाने होंगे और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। स्कूलों को अपनी आय और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में स्कूलों के एकाधिकार को खत्म करना होगा। स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए ताकि फैसलों में संतुलन बना रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। इन्हीं विषयों पर पिछले साल दिल्ली सरकार एक बिल भी लाई थी, लोगों ने खूब मिटाई भी बाटी और खुशियां बनाई थी । बिल को ताक पर रखते हुए, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी चालू है। सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कोर्ट में जाना चाहिए, और प्रमाणिता के साथ अभिभावकों का पक्ष रखे।

अंततः शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है, और अगर यही नींव कमजोर हो जाए या व्यापार का साधन बन जाए, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। यह सवाल आज हर अभिभावक के मन में है कि शिक्षा के नाम पर यह धंधा आखिर कब तक चलेगा? जब तक सरकार, समाज और अभिभावक मिलकर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक यह स्थिति बदलना मुश्किल है। शिक्षा को फिर से सेवा बनाना होगा, न कि मुनाफे का जरिया। तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

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स्कूलों में भाई भतीजा वाद समाप्त करने के लिय शिक्षा का राष्ट्रीयकरण आवश्यक

बसंत कुमार

सरकार द्वारा लाया गया यूजीसी एक्ट का विवाद यद्यपि न्यायालय में लंबित है और इसके सबजूडिस होने के कारण इस पर कोई तर्क वितर्क नहीं किया जाना चाहिए़। परंतु सोशल मीडिया में यूजीसी एक्ट की आड़ में आरक्षण सहित एससी एसटी एक्ट पर लोग मनमाने ढंग से अपने अपने विचार विशेषज्ञ के रूप में दे रहे हैं जो चीज भारत की संसद के द्वारा पारित की गई है उसपर अनभिज्ञ लोग अपनी राय बिना रोक-टोक के दे रहे हैं। प्राय यह कहा जाता है की विद्यालयों में 90% तक पाने वाले लोग बेरोजगार हैं और 40% अंक पाने वाले लोग उच्च पदों पर बैठे हुए हैं इसके पीछे लोग यह जानने का प्रयास नहीं करते कि देश में प्राइवेट स्कूलों के कारण धनाढ्य परिवारों से ताल्लुक रखने वाले छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में मानवाने अंक दिए जाते हैं जिसके कारण उनका अंक प्रतिशत गरीब वे वंचित समाज के बच्चों से बहुत ही ऊपर होता है इसके लिए यह जरूरी है कि देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण हो। जिससे शिक्षा में भाई भतीजा वाद समाप्त हो और सभी छात्रों को अपनी प्रतिभा साबित करने का अवसर समान रूप से मिले।

भारतीय संविधान का और यूजीसी एक्ट का विरोध करने वाले स्वामी आनंद स्वरूप जैसे लॉग डॉ आंबेडकर के बारे में कहते हैं कि स्कूल परीक्षा में 10वीं या 12वीं में कभी भी डॉक्टर अंबेडकर को 40% से ऊपर अंक प्राप्त नहीं हुए। पर आश्चर्यकी बात यह है कि 23 वर्ष की उम्र में ही डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद लंदन स्कूल का इकोनॉमिक्स से डायरेक्टरेट आफ साइंस डीएससी की उपाधि प्राप्त की जिसे एक आम विद्यार्थी को पूरा करने में 8 वर्ष का समय लग जाता है जबकि डॉक्टर अंबेडकर ने यह उपाधि मात्र ढाई 3 साल के समय में पूरी कर लीऔर उनके शोधों ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस भारतीय स्कूल सिस्टम में डॉक्टर अंबेडकर जैसाप्रतिभा शाली विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी में रहा, वह विदेशी विश्वविद्यालय में पी एचडी और डी ससी जैसे उपाधियां प्राप्त करने में सफल कई हो गया। यूनिवर्सिटी में लिखी गई उनकी थीसिस आज भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है, कहने का तात्पर्य है कि डॉ आंबेडकर में प्रतिभा की कमी नहीं थी बल्कि उनको प्रतिभा को अपने में भारतीय शिक्षण संस्थाओं में द्रोणाचार्यो रवैया गलत था। डॉआंबेडकर जिस समाज से आते थे उसके लिए शिक्षकों का ऐसा ही पूर्वाग्रह था कि ऐसे समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% कैटेगरी के ऊपर के विद्यार्थी होही नहीं सकते। इसलिए पूरे समाज को इस पूर्वाग्रह को छोड़ना होगा की वंचित समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी के होते हैं।

बात 1972 की है जब मैने कक्षा दसवीं की परीक्षा पास की और मेरा दाखिला अपने जिले के प्रतिष्ठित विद्यालय तिलकधारी सिंह क्षत्रिय इंटर कॉलेज जौनपुर में विज्ञान संकाय के छात्रों के रूप में हो गया हो गया। उस विद्यालय में 90%से अधिक शिक्षक क्षत्रिय समुदाय के थे, अपवाद के रूप में पिछड़े वर्ग गड़ेरिया समुदाय के एक शिक्षक फेरु राम पाल थेजो उस जमाने में गणित में पी एच डी थे और 11वी और 12वी कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थे, गणित में डॉक्टरेट होने के बावजूद उनका प्रमोशन डिग्री कॉलेज में नहीं हो पाया। वहां 12वीं की बोर्ड की परीक्षा में रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र व जीव विज्ञान के प्रश्न के पेपर सौ-सौ अंकों के होते थे इनमें से 80 अंक के लिखित परीक्षा के पेपर होते थे और 20-20 संख्या प्रैक्टिकल परीक्षा केलिए निर्धारित होते थे। जिसका कहने को तो परीक्षक बाहर आता था लेकिन वहां के स्थानीय शिक्षकों के मार्गदर्शन में सवर्ण व प्रतिष्ठित परिवारों से आए हुए छात्रों को बीस में से 17-18 से ऊपर ही अंक मिलते थे। मतलब यह है कि 500 अंक की परीक्षा में 60 अंकों में पुणे की प्रैक्टिकल परीक्षा में उन्हें इतनेअंक दे दिए जाते थे उनकी अच्छी खासी मेरिट हो जाती थी जबकि वहीं पर पिछड़े वर्गव वंचित समझाएं के छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में वह मुश्किल 10-12 अंक दिए जाते थे, इसका परिणाम यह होता था कि लिखित परीक्षा में वंचित समुदाय का विद्यार्थी कितना भी अच्छा कर ले फाइनल परीक्षा फल में वह काफी नीचे होताथा।

यूपीएससी सहित अन्य भर्ती आयोगों में उन परीक्षाओं में जहां साक्षात्कार परीक्षा के अंक परीक्षा के परिणाम का का हिस्सा होते हैं वहां पर सवर्ण और धनाढ्य परिवारों के बच्चों को अधिक नंबर मिलते हैं जिससे उनकी मेरिट काफी ऊपर चली जाती है जैसे सिविल सर्विस परीक्षा में साक्षात्कार परीक्षा 275 अंकों की होती है और लिखित परीक्षा 1750 अंकों में होती है इस तरह से फाइनल रिजल्ट 2025 में प्राप्त अंकों के आधार पर बनते है क्योंकि सवर्ण और धनाढ्य के बच्चे 275 अंकों साक्षात्कार परीक्षा में पिछड़े व वंचित समाज के बच्चों के मुकाबले अच्छे नंबर प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं क्योंकि इंटरव्यू परीक्षा में बैठे बोर्ड मेंबर्स के सामने परीक्षार्थी की पूरी फाइल उनके सामने होती है और ऐसे में जाति और रुतबे के असर से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए गरीब और वंचित समाज के बच्चे लिखित परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद फाइनल मेरिट में बहुत नीचे आ जाते है। प्राय या देखा गया है स्टाफ सिलेक्शन कमीशन की क्लर्क ग्रेड इग्जामिनेशन और अस्सिटेंट ग्रेड एग्जामिनेशन जिसमें इंटरव्यू नहीं होता उनमें जनरल ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातिऔर ईडब्लूएस के छात्रों की मेरिट में बहुत अंतर नहीं होता है। लेकिन जहां इंटरव्यू का प्रावधान होता है वहां पर मेरिट में बहुत बड़ा अंतर पाया जाता है इसका मतलब यह है कि आज भी साक्षात परीक्षाओं में उच्च जाति धनाढ्य का परिवार से होना बहुत अंतर लाता है।

जहां तक प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की बात है अधिकांश प्राइवेट शिक्षण संस्थान सवर्ण और धनाढ्य लोगों के द्वारा चलाए जाते है और प्रैक्टिकल परीक्षा में इंटरनल असेसमेंट के नाम पर बड़े परिवारों के छात्रों को अच्छे नंबर मिल जाते हैं और इसी के आधार पर यह नारेटिव गढ़लिया जाता है कि 90%वालों को नौकरी नहीं मिल रही और 40% वालों को आसानी से नौकरी मिल जा रही है क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में गरीब अमीर सवर्ण दलित सबको परफॉर्म करने के लिए एक स्तर का प्लेइंग ग्राउंड नहीं मिलता। इस विषय में मैं अपने कॉलेज मडियाहूं डिग्री कॉलेज का 1978का उदाहरण देना चाहता हूं-वहां आपातकाल के बाद छात्र संघ के चुनाव होने थे और प्रधानाचार्य ने यह घोषणा की की बीए प्रथम वर्ष में सर्वोच्च अंक लाने वाले तीन विद्यार्थियों को छात्र यूनियन की कमेटी में प्रतिनिधि प्रतिनिधि के रूप में रखा जाएगा। संभवतःप्रधानाचार्य को या उम्मीद रही होगी कि तीनों ही प्रतिनिधि सवर्ण समाज के होंगे पर क्योंकि वहां पर सिर्फ औरआर्ट्स फैकल्टी चलती थी इसलिएउसमें कोई प्रैक्टिकल परीक्षा नहीं थी और इस कारण 3 के तीनों प्रतिनिधि दलित वंचित और बैकवर्ड समाज से आगए, कहने का तात्पर्य है कि जब वहां पर साक्षात्कार परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था तो वहां पर पिछले वर्गों का 40% और सामानों का 90% पूर्वाग्रह फेल हो गया। और टॉपर विद्यार्थियों में एक भी सवर्ण नहीं मिला जिसे छात्र संघ में प्रतिनिधि के तौर पर रखा जा सकता।

इस समय पूरे हिंदू समाज में यह नारेटिव बड़े जोर शोर से चलाया जा रहा है कि 90% वाले बेकार बैठे हैं और 40% लोग लेकर लोग डॉक्टर बने हुए हैं और ऐसे डॉक्टर मरीज का कैसे इलाज करें ऐसा फैलाने वालों को शायद पता नहीं है कि किसी भी मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थियों को पास मार्क लाने के लिए 50% तक जाना पाना जरूरी होता है चाहे वह किसी भी जाति यां वर्ण के हो, इसीलिए कभी भी 40% और 90%वाली डॉक्टरों का भ्रम न फैलाए अपना आत्मा से पूछे जब कभी आप अस्पताल में बीमार होकर जाते हैं तो न तो डॉक्टर की जाति पूछते हैं और न खून देने वाले की जाति पूछते हैं फिर राजनीतिक स्वार्थ के लिय ऐसी अफवाहें फैलाकर डॉक्टरी पेशे को बदनाम क्यों करते हैं। आप जिस 90% के नम्बर की दुहाई देते हैं वह अपने दम पर नहीं अपने स्कूल में पैरवी पुत्र के रूप में पाई है इसलिए उस पर घमंड न करें जिस तरह से 90% और 40% के रूप में नारेटिव गढ़े जा रहे हैं और यह दलील दी जाती है कि 40% अंक प्राप्त करने वाला आरक्षित केटेगिरी वाला छात्र कभी अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता लेकिन वास्तविकता इसके उलट है, जो डा आंबेडकर भारत में स्कूल शिक्षा के दौरान लगातार 40%कैटेगरी वाले छात्र रहे वही विदेश में जाकर पी एच डी और डी एस सी डिग्रियां हसिल करने में कामयाब रहे, इसका अर्थ यह है कि दोष सवर्ण या वंचित समाज के विद्यार्थियों में है बल्कि सारा दोष यहां की शिक्षा व्यवस्था में है जो वर्ग विशेष के नियंत्रण में चल रही है, यदि सरकार आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना चाह रही है तो उसे स्कूल और कॉलेजों में वर्ण विशेष नियंत्रण को समाप्त करना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

हनुमान जन्मोत्सव पर रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सक्रिय भागीदारी

संवाददाता

नई दिल्ली। हनुमान जयंती के पावन अवसर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया। 

इस अवसर पर पार्टी के स्थानीय अध्यक्ष एवं समाजसेवी अधिवक्ता अनिल कुमार शुक्ला के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों, भंडारा एवं शोभायात्रा में शामिल होकर भगवान हनुमान जी के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया तथा क्षेत्र की सुख-समृद्धि एवं शांति के लिए प्रार्थना की गई।

अधिवक्ता अनिल कुमार शुक्ला ने कहा कि भगवान हनुमान जी हमें शक्ति, सेवा और समर्पण का संदेश देते हैं, जिसे अपनाकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी हमेशा सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेती रही है और आगे भी जनता के साथ इसी प्रकार जुड़ी रहेगी।

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