मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

बढ़ते सड़क प्रदर्शनों के बीच विकसित भारत का सपना?

सुशील वकील

भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। विकसित भारत का यह vision निरंतर आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक सद्भाव, बड़े पैमाने पर रोजगार और देश की युवा आबादी के प्रभावी उपयोग की मांग करता है। साथ ही, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों की बढ़ती संख्या विपक्षी दलों, छात्रों और युवाओं के कुछ वर्गों को सड़कों पर ला रही है। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: यदि राजनीतिक टकराव संसद से बाहर निकलकर लगातार सड़कों पर बढ़ता रहा, तो क्या भारत विकास की गति बनाए रख पाएगा?

शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में कुछ भी अलोकतांत्रिक नहीं है। वास्तव में, असहमति का अधिकार लोकतंत्र की प्रमुख शक्तियों में से एक है। नागरिकों को सरकारी फैसलों पर सवाल उठाने, जवाबदेही की मांग करने और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब हर राजनीतिक मतभेद लंबे टकराव में बदलने लगे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। मतदाता सूचियों, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों पर हालिया प्रदर्शनों ने दिखाया है कि किस तरह कोई विशेष शिकायत तेजी से बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकती है।

छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सीजेपी का हालिया बड़ा प्रदर्शन इसका एक उदाहरण था। युवा पीढ़ी को प्रभावित करने वाली शिकायतों को लेकर शुरू हुआ यह प्रदर्शन उस समय बड़े टकराव में बदल गया, जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने लगे। इसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई ने राजनीतिक बहस को और तीखा कर दिया। मूल मुद्दे तक सीमित रहने के बजाय यह पूरा घटनाक्रम सरकार और विपक्षी दलों के बीच व्यापक टकराव में बदल गया। ऐसे घटनाक्रम दर्शाते हैं कि आज के भारत में युवाओं से जुड़े मुद्दों में कितनी बड़ी राजनीतिक क्षमता है।

स्थिति ने तब एक और राजनीतिक रूप ले लिया, जब युवा प्रदर्शनकारियों के समर्थन और पुलिस कार्रवाई के विरोध में कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन किया। वरिष्ठ विपक्षी नेताओं की भागीदारी ने इस मुद्दे को युवा प्रदर्शन से आगे बढ़ाकर सीधे राजनीतिक टकराव में बदल दिया। विपक्षी दलों को प्रदर्शन करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन ऐसी घटनाएं यह भी रेखांकित करती हैं कि राजनीतिक नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वास्तविक शिकायतें सरकार और विपक्ष के बीच स्थायी टकराव का कारण न बन जाएं।

ताजा उदाहरण 6 अक्टूबर को सामने आया, जब राहुल गांधी ने अन्य विपक्षी नेताओं और सांसदों के साथ मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को सीधे सड़कों पर उठाया। संसद से निर्वाचन आयोग की ओर मार्च करने के बाद प्रदर्शनकारी नेता आकाशवाणी भवन पहुंचे और उनका मार्च रोके जाने के बाद वहीं धरने पर बैठ गए। इस घटना ने एक बार फिर एसआईआर विवाद को राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया और दिखाया कि इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिष्ठान कितना गहराई से विभाजित है।

एसआईआर विवाद निस्संदेह संवेदनशील है, क्योंकि मतदाता सूचियां मतदान के मौलिक अधिकार से सीधे जुड़ी हैं। विपक्षी दलों ने वास्तविक मतदाताओं के नाम छूट जाने की आशंका जताई है, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सटीक और विश्वसनीय मतदाता सूचियां सुनिश्चित करना है। ऐसे विवाद का समाधान पारदर्शिता, सत्यापन और संस्थागत संवाद के माध्यम से होना चाहिए। प्रत्येक वास्तविक मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में बना रहेगा और किसी भी गलती को सुधारने के लिए आसान व्यवस्था उपलब्ध होगी।

चुनावी राजनीति से परे बेरोजगारी कहीं बड़ी और लंबे समय से चली आ रही चुनौती है। यदि शिक्षा पूरी करने के बाद लाखों युवाओं को उपयुक्त रोजगार नहीं मिलता, तो भारत का जनसांख्यिकीय लाभ बोझ में बदल सकता है। वर्षों तक सरकारी भर्ती के अवसर की प्रतीक्षा करने वाला या उपयुक्त निजी क्षेत्र की नौकरी तलाशने वाला स्नातक आर्थिक विकास का आकलन स्वाभाविक रूप से अपने अनुभव के आधार पर करेगा, न कि केवल जीडीपी के आंकड़ों से। इसलिए देश को केवल आर्थिक विस्तार नहीं, बल्कि ऐसा रोजगार-केंद्रित विकास मॉडल चाहिए, जो बढ़ते कार्यबल के लिए पर्याप्त अवसर पैदा कर सके।

राजनीतिक विभाजन के दोनों पक्षों की भी जिम्मेदारी है। सरकार को वास्तविक शिकायतों को सुनना, विवादास्पद फैसलों को अधिक प्रभावी ढंग से समझाना और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संस्थागत व्यवस्थाएं तेजी से प्रतिक्रिया दें। विपक्ष को विरोध करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का अधिकार है, लेकिन उसे व्यावहारिक विकल्प भी प्रस्तुत करने चाहिए और संसद तथा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं का प्रभावी उपयोग करना चाहिए। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संवाद और समाधान का मार्ग खोलते हैं, न कि टकराव के अंतहीन चक्र में बदल जाते हैं।

2047 के विकसित भारत की यात्रा अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत आर्थिक महत्वाकांक्षा को राजनीतिक परिपक्वता और सामाजिक सद्भाव के साथ किस तरह जोड़ता है। दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना एक बड़ी उपलब्धि होगी, लेकिन वास्तव में विकसित भारत को गुणवत्तापूर्ण रोजगार, बेहतर शिक्षा, आधुनिक बुनियादी ढांचा, तकनीकी अवसर और बेहतर जीवन स्तर भी सुनिश्चित करना होगा। भारत के युवाओं की ऊर्जा को आदर्श रूप से कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, कारखानों, खेतों, व्यवसायों और स्टार्टअप्स में लगाया जाना चाहिए, न कि निराशा के कारण उन्हें लगातार सड़कों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़े। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा बने रहेंगे, लेकिन बड़ी राष्ट्रीय चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि असहमति संवाद में बदले, संवाद समाधान पैदा करे और समाधान भारत को विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाते रहें।

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

जब खेल कमेंट्री होती थी सुनने लायक

विवेक शुक्ला

कमेंट्री कभी खेल का दूसरा मैदान होती थी। आंखें बंद करके भी स्ट्रोक दिख जाता था, गोल सुनाई देता था, विकेट गिरने की आवाज कमरे तक पहुंच जाती थी। आज स्क्रीन बड़ी है, कैमरे हर कोण से देखते हैं, रेडियो, दूरदर्शन और निजी चैनल एक साथ बोलते हैं। एशियन गेम्स चल रहे हैं। भारत-वेस्टइंडीज क्रिकेट सीरीज भी चल रही है। आवाज साथ-साथ है। पर सुनने का आनंद कम रह गया है। भाषा ढीली पड़ गई है। ज्ञान अधूरा दिखता है। वाक्य टूटते हैं। आंकड़े गलत निकलते हैं। उत्साह नारेबाजी बन जाता है। दर्शक देखता भी है, सुनता भी है, फिर भी संतोष नहीं मिलता।

एक दौर और था। लोग रेडियो से दूर नहीं होते थे। टीवी से भी नहीं उठते थे। सुशील दोषी कमेंट्री करते थे। रवि चतुर्वेदी कमेंट्री करते थे। बी.पी. ओझा भी कमेंट्री करते थे। आवाज शांत होती थी। वाक्य पूरे होते थे। खेल की समझ साफ होती थी। घर में बैठा श्रोता मैदान को आंखों से देख लेता था। क्योंकि शब्द पूरे होते थे।

सुशील दोषी की आवाज पहचान बन गई थी। क्रिकेट में उनकी शैली घर-घर पहुंची। रवि चतुर्वेदी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। पढ़ाई और खेल दोनों उनके पास थे। बी.पी. ओझा भारत सरकार में आला अधिकारी थे। वे केवल माइक के पीछे नहीं बैठे थे। वे मैदान भी जानते थे। राज्य स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी रहे। दिल्ली हॉकी लीग खेली। रेफरी भी रहे। इसलिए उनकी कमेंट्री में केवल शब्द नहीं होते थे। अनुभव होता था।

ओझा तीन खेलों के माहिर थे - ओझा ने कमेंट्री 1978 में शुरू की। उसके बाद कई बड़े आयोजन उनके हिस्से आए। डीसीएम और डूरंड कप के फाइनल। रोवर्स कप। संतोष ट्रॉफी। आईएफए शील्ड। 1984 का एशिया कप फुटबॉल। 1986 का हॉकी विश्व कप। 1988 के सियोल ओलंपिक। 1982 के दिल्ली एशियाई खेल। 1987 का रिलायंस विश्व कप। मुंबई में भारत-इंग्लैंड सेमीफाइनल। अनेक टेस्ट और वनडे। ईडन गार्डंस में भारत-दक्षिण अफ्रीका का ऐतिहासिक वनडे। नेहरू गोल्ड कप। इंदिरा गांधी गोल्ड कप। 1986 का फुटबॉल विश्व कप दूरदर्शन स्टूडियो से।

सूची लंबी है। बड़ी बात यह है कि एक ही व्यक्ति हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट तीनों में माहिर था। आज एक खेल में भी पकड़ अधूरी रहती है। तीन खेलों में पकड़ तब दुर्लभ थी। ओझा के पास वह पकड़ थी क्योंकि वे मैदान से आए थे। खिलाड़ी रहे। रेफरी रहे। फिर कमेंटेटर बने। यह क्रम उनकी आवाज में सुनाई देता था।

टीवी का नया दबाव - जसदेव सिंह भी स्तरीय थे। ओलंपिक और बड़े आयोजनों में उनकी आवाज घर-घर पहुंची। गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की कमेंट्री भी उनके नाम रही। टीवी आने के बाद उन पर सवाल उठे। कैमरा सब दिखा देता था। अब वर्णन कम, अर्थ अधिक चाहिए था। कुछ मानते थे कि वे पुरानी शैली में अटके रहे। कुछ मानते थे कि माध्यम ने अपेक्षाएं बदल दीं। विवाद रहा। पर वह पीढ़ी बिना तैयारी के माइक पर नहीं बैठती थी। दोषी, चतुर्वेदी, ओझा और जसदेव सिंह सभी तैयारी करके आते थे।

आज भाषा टूट गई है - आज की शिकायत इससे आगे है। हिंदी में अंग्रेजी के अधूरे शब्द घुस आए हैं। क्रिकेट में हर गेंद पर एक ही उत्साह दोहराया जाता है। हॉकी में मैदान की समझ कम दिखती है। फुटबॉल में नियम अधूरे बताए जाते हैं। एशियन गेम्स जैसे बड़े मंच पर भी यही हाल है। कई खेल एक साथ चलते हैं। नाम नए लगते हैं। नियम नए लगते हैं। तब कमेंटेटर का काम बढ़ जाता है। पर कई बार वे खेल की बारीकी से ज्यादा खुद को सामने रखते हैं। दर्शक थक जाता है। कान ऊब जाते हैं।

पुरानी कमेंट्री में संयम था। चुप्पी भी भाषा का हिस्सा होती थी। स्ट्रोक लगे तो शब्द कम होते थे। विकेट गिरा तो वाक्य साफ होता था। गोल हुआ तो आवाज उठती थी। अर्थ नहीं खोता था। ओझा, चतुर्वेदी और दोषी के यहां खेल पहले आता था। व्यक्ति बाद में।

भाई-भतीजावाद ने स्तर गिराया - ऐसी आवाजें क्यों कम हो गईं? एक जवाब बार-बार आता है। रेडियो और टीवी कमेंट्री में भाई-भतीजावाद जम गया। जो मैदान जानते थे, उन्हें जगह नहीं मिली। जो गलियारे जानते थे, वे माइक तक पहुंच गए। योग्यता पीछे रह गई। पहचान आगे आ गई। नए चेहरे आए। नई तैयारी नहीं आई। खेल का पाठ अधूरा रहा। भाषा का अभ्यास अधूरा रहा।

कमेंट्री हल्की कला नहीं है। आंख से देखना होता है। दिमाग से जोड़ना होता है। फिर सरल वाक्य में कहना होता है। चतुर्वेदी अध्यापक थे, इसलिए भाषा साफ थी। ओझा अधिकारी भी थे, खिलाड़ी भी थे, इसलिए विवरण ठोस था। दोषी लंबे समय तक क्रिकेट के पास रहे, इसलिए आवाज में प्रवाह था। तीनों खेल एक आवाज में समा जाते थे। यह संयोग नहीं था। यह मेहनत थी।

मात्रा बढ़ी, स्तर नहीं बढ़ा - आज निजी चैनल ज्यादा हैं। घंटे ज्यादा हैं। मैच ज्यादा हैं। संतोष कम है। मात्रा बढ़ी है। स्तर नहीं बढ़ा। एशियन गेम्स में दर्शक को गाइड चाहिए। नियम समझाने वाला चाहिए। इतिहास याद दिलाने वाला चाहिए। केवल शोर नहीं चाहिए। क्रिकेट में भी गेंद की लाइन काफी नहीं। मैच का प्रवाह, पिच और रणनीति बतानी चाहिए। बिना तैयारी के यह संभव नहीं।

पुरानी पीढ़ी पूर्ण नहीं थी। जसदेव सिंह पर टीवी युग में सवाल उठे। समय बदलता है। शैली बदलती है। पर मूल बात नहीं बदलनी चाहिए।खेल की समझ, भाषा की साफगोई, दर्शक का सम्मान।

ओझा की असली विशेषता - ओझा की विशेषता यही सम्मान था। मैदान का, खिलाड़ी का, श्रोता का। उनकी कमेंट्री में दिखावा कम था। तथ्य ज्यादा थे। फाइनल देखे। विश्व कप देखे। ओलंपिक देखे। एशियाई खेल देखे। फिर भी आवाज में संयम रहा। जोर से बोलना आसान है। साफ बोलना कठिन है।

अगर भाई-भतीजावाद न होता तो और ओझा सामने आते। मैदान के रेफरी आते। राज्य स्तर के खिलाड़ी आते। अध्यापक आते। जिनकी जिंदगी खेल के पास रही हो, केवल कैमरे के पास नहीं। कमेंट्री तब फिर सुनने लायक बनती।

कसौटी वही रहनी चाहिए - आज जरूरत केवल नए चेहरों की नहीं है। जरूरत पुरानी कसौटी की है। खेल जानो। भाषा संभालो। दर्शक को साथ रखो। एशियन गेम्स और क्रिकेट सीरीज इसी कसौटी पर चल रहे हैं। माइक खुला है। कान संतुष्ट नहीं हैं। यही अफसोस है। और यही याद भी है। जब दोषी, चतुर्वेदी और ओझा बोलते थे तो लोग रेडियो और टीवी के पास बैठे रहते थे। वह समय पूरी तरह नहीं लौटेगा। पर उसका स्तर लौट सकता है अगर योग्यता को रिश्ते से ऊपर रखा जाए।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

भारत का सबसे कम जाना-पहचाना स्कूल: जहाँ गांधी जी पढ़ाते थे

विवेक शुक्ला

दुनिया गांधी जी को शांति का दूत, आज़ादी की लड़ाई का नेता और समाज सुधारक के रूप में जानती है। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि एक समय वे सचमुच के मास्टर भी बने थे। राजधानी के कनॉट प्लेस के पास मंदिर मार्ग पर वाल्मीकि मंदिर में रहते हुए उन्होंने वाल्मीकि कॉलोनी के बच्चों और उनके माँ-बाप को हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाई। शायद यही पहला और आखिरी मौका था जब गांधी जी सही मायने में शिक्षक बने।

बापू के कमरे में कदम रखिए तो दीवारों पर पुरानी सेपिया तस्वीरें दिखती हैं-लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन, आचार्य कृपलानी, सीमांत गांधी, सी. राजगोपालाचारी, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद और पंडित नेहरू के साथ। इन सबके बीच एक धुंधली पेंटिंग इस कमरे की कहानी कहती है। उसमें कई बच्चे बापू से बात कर रहे हैं, चेहरे जीवंत हैं। चित्रकार का नाम नहीं मिला, पर तस्वीर उस जगह का मूड आज भी पकड़ लेती है।

कमरे में कालीन बिछा है। बीच में लकड़ी की वह मेज़ है जिस पर गांधी जी लिखा करते थे। दाईं ओर वह चारपाई है जिस पर वे सोते थे। पास ही छोटी-सी चरखा रखा है। मंदिर के पुजारी और रखवाले कृष्ण विद्यार्थी कहते हैं कि सब कुछ उसी जगह है जहाँ बापू ने छोड़ा था।

डॉ. ओम प्रकाश, दलित कार्यकर्ता, जिनके पिता और भाई गांधी जी के छात्र रहे, कहते हैं, “गांधी जी ने यह जगह इसलिए चुनी कि वे तथाकथित अछूतों के साथ रह सकें। उन दिनों मंदिर के बगल वाली वाल्मीकि कॉलोनी में बहुत सारे परिवार झुग्गियों में रहते थे। लोग गोल मार्केट, इरविन रोड यानी आज के बाबा खड़क सिंह मार्ग और कनॉट प्लेस में सफाई का काम करते थे। बापू को हमारी बिरादरी से गहरा लगाव था।”

आज भी कई वाल्मीकि परिवार यहीं रहते हैं, अब पक्के फ्लैटों में। झुग्गियाँ कब की उठ चुकी हैं। सन् 1946 में गांधी जी ने कॉलोनी के बुजुर्गों से पूछा कि क्या वे दो-चार महीने उनके साथ रह सकते हैं। लोगों ने हाँ कर दी। वे ठीक 214 दिन रहे-एक अप्रैल 1946 से दस जून 1947 तक।

सुबह और शाम की कक्षाएँ वे कभी नहीं छोड़ते थे। इतने नियमित थे कि आज़ादी के आंदोलन के बड़े नेताओं की मुलाकात भी अक्सर कक्षा खत्म होने तक टाल देते। कक्षा प्रार्थना से पहले शुरू होती। पढ़ाई और प्रार्थना के समय मेहमान नहीं मिलते थे। जीवनीकार लुई फिशर अपनी किताब द लाइफ ऑफ महात्मा गांधी में लिखते हैं, “मैं अपने होटल इंपीरियल से वाल्मीकि मंदिर पहुँचा था उनसे बात करने। पर वे प्रार्थना के बाद ही मिले।” फिशर 1946 में किताब के नोट्स जुटाने दिल्ली में एक महीने से ज्यादा रुके थे।

कृष्ण विद्यार्थी बताते हैं, “बापू जब कॉलोनी आए तो परिवारों से मिलने लगे। उन्हें सदमा लगा कि सब अनपढ़ हैं। किसी ने स्कूल का मुँह तक नहीं देखा था। फिर उन्होंने कहा कि बच्चों को भेज दो, मैं पढ़ाऊँगा। बुजुर्गों ने माना।” विद्यार्थी के पिता और चाचा भी उन कक्षाओं में बैठे। गांधी जी चाहते थे कि लोग सादी हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़-लिख लें।

मास्टर बड़े सख्त थे। बिना नहाए कक्षा में आने वाले को डाँट पड़ती। सिर्फ वाल्मीकि कॉलोनी के बच्चे नहीं आते थे। हरकोर्ट बटलर स्कूल, रायसीना बंगाली स्कूल और दिल्ली तमिल एजुकेशन एसोसिएशन यानी डीटीईए स्कूल के बच्चे भी आते। कक्षा सबके लिए खुली थी। कहा जाता है कि बापू हर छात्र का नाम जानते थे।

वे छात्र अब नहीं रहे अपनी कहानी खुद कहने को, पर उनके बच्चे हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “जब सुरक्षा के चलते बापू को यहाँ से बिड़ला हाउस ले जाया गया, बड़ा झटका लगा। हमारे बुजुर्ग टूट गए। अफसोस, मारे गए वहीं जहाँ सुरक्षा कड़ी थी।”

डॉ. ओम प्रकाश बाद में इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट में पढ़ाते रहे। वे कहते हैं, “मैंने बापू की पाठशाला की कहानियाँ बाबूजी से सुनी। पिता जी उनकी कक्षा में बैठे थे। उस समय हमारा घर भी मंदिर के पास ही था। गांधी जी की वजह से घर के कई लोग थोड़े पढ़े-लिखे हो गए। सबसे अच्छी बात यह थी कि बाप-बेटा और माँ-बेटी एक साथ कक्षा में आते थे।”

जब मंदिर में पढ़ाई चली तो गोल मार्केट, पहाड़गंज, इरविन रोड और आसपास के बच्चे भी जुड़ गए। शुरू में करीब तीस बच्चे थे। फिर सुबह पचहत्तर और शाम पचहत्तर हो गए। भीड़ बढ़ी तो कक्षा खुले में लगने लगी।

इसी दिल्ली से गांधी जी का नाता पुराना था। पहली बार वे बारह से चौदह अप्रैल 1915 को आए। कश्मीरी गेट स्थित सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल एस. के. रुद्र के घर रुके थे। फादर जॉर्ज सोलोमन कहते हैं कि रुद्र साहब गांधी जी के मित्र दीनबंधु सी. एफ. एंड्रयूज की वजह से बने, जो सेंट स्टीफंस कॉलेज में शिक्षक थे। उस पहली यात्रा की एक तस्वीर आज भी कॉलेज के प्रिंसिपल ऑफिस में लगी है।

वाल्मीकि मंदिर वाली वह पाठशाला इतिहास की किताबों में बहुत नहीं चलती। नेता आते थे, बातें होती थीं, पर सुबह-शाम बापू तख्ती के पास बैठे रहते। बच्चे नहा-धोकर आते, बड़े भी बैठ जाते। कोई फीस नहीं। सिर्फ यह कि पढ़ना चाहिए।

आज कमरे में वही मेज़ है, वही छोटा चरखा, वही चारपाई। बाहर कॉलोनी बदल चुकी है। झुग्गी गई, फ्लैट आए। पर पुरानी बातें बची हैं। मास्टर जी आते थे, नाम लेकर पुकारते थे। दिल्ली ने गांधी जी को नेता के रूप में देखा। मंदिर मार्ग वाली इस छोटी पाठशाला में दिल्ली ने उन्हें मास्टर जी के रूप में भी देखा। यही बात इस कमरे को याद रखने लायक बनाती है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

आर्थिक आधार पर आरक्षण का सच

बसंत कुमार

एक दिन एक वीडियो वायरल हुई जिसमें एक गरीब ब्राह्मण का घर दिखाया गया और घर देखकर लग रहा था कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी अगर घर के मुखिया को मनरेगा के तहत रोजगार दे दिया गया होता तो उस घर में बच्चे अच्छे से पल जाते पर ऐसा नहीं हुआ। इस वीडियो के अंत में संचालक ने ब्राह्मण परिवार की इस दुर्दशा के कारण प्राकृतिक संसाधनों के असामान्य वितरण, गरीबी उन्मूलन और बेरोजगारी के लिए सरकारों की लापरवाही को जिम्मेदार न ठहराते हुए डॉ. आंबेडकर के संविधान और दलित और आदिवासियों के लिए आरक्षण को दोषी ठहरा दिया। ऐसा लगता है कि जब से देश आजाद हुआ और पूना पैक्ट के कारण देश में आरक्षण लागू हुआ तब से ही अनेक सवर्ण समाज के लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। मानो आरक्षण से पहले भारत सोने की चिड़िया था और यहां कोई गरीब नहीं था।

दलित और आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षण के विरोधी एक सुर से कहते है कि आरक्षण जाति के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए। जबकि आरक्षण शदियों से शोषित घृणित उपेक्षित समाज को मुख्य धारा में ले आने के उद्देश्य से किया गया। पर बार बात उठती आर्थिक आधार पर उठ रही मांगो को ध्यान रखते हुए केंद्र सरकार ने सवर्ण समाज के गरीब लोगो के लिये सरकारी नौकरियों में 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण की व्यवस्था कर दी, पर हो यह रहा है कि ईडब्ल्यूएस की पात्रता की आय सीमा 8 लाख रुपये की सीमा को धता बताकर सवर्ण समाज के करोड़पति और अरबपति लोग इस कोटे को लूट रहे हैं। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा 2025 के आधार पर एक खुलासा हुआ है कि कोठियों में रहने वाले 10-10 गाड़ियों के मालिकों के बच्चे जुगाड से ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र बनवा ले रहे हैं और गरीब सवर्णों का हक मार रहे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी जिसका शीर्षक था इंग्लिश मीडियम। इस फिल्म में नायक ईडब्ल्यूएस सीट पर एक नामी स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए अपनी कोठी छोड़कर एक झोपड़ पट्टी में रहने को मजबूर होता है और वह झोपड़ पट्टी में रहने वाले गरीब का हक मारकर अपने बच्चे का एडमिशन कराने में सफल हो जाता है, यह कहानी फिल्मों में नहीं हकीकत में होती है, जब से सरकार ने हर पब्लिक स्कूल में 25% सीटें ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के बच्चों द्वारा भरा जाना आवश्यक कर दिया है तब से दिल्ली में यह देखने में आया है कि ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के बच्चों की आरक्षित सीटों पर ग्रेटर कैलाश, साउथ एक्सटेंशन, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी जैसे पॉश इलाकों में रहने वाले लोगों के बच्चों को प्रवेश मिल जाता है। देश का रेवेन्यू कार्यालय इतना भ्रष्ट हो चुका है कि लेखपाल और कानूनगो की मुट्ठी गरम कर देने से एक करोड़पति ईडब्ल्यूएस का सर्टिफिकेट प्राप्त कर लेता है, गरीबों को आरक्षण की बात करने में बहुत अच्छा लगता है पर देश के भ्रष्ट सिस्टम में अमीरों को तो गरीब होने का प्रमाण पत्र तो मिल जाता है पर जो वास्तव में गरीब है उन्हें यह प्रमाण पत्र नहीं मिल पाता।

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा 2025के बारे में एक रिपोर्ट आई की कैसे करोड़पतियों के बेटा बेटी ईडब्ल्यूएस कैटेगरी में आरक्षण का लाभ उठाकर आईएएस, आईपीएस या अन्य सेवा में चयनित हो जाते हैं। इस रिपोर्ट में ईडब्ल्यूएस कोटे में चयनित 104 उम्मीदवारों में से कई संपन्न विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि में से है। इस रिपोर्ट में सभी सफल 104 उम्मीदवारों की आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण किया गया है।

  • ईडब्ल्यूएस कोटे से चयनित 104 उम्मीदवारों में से 84 ने सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी के लिए औपचारिक कोचिंग की थी और 67 उम्मीदवारों ने दिल्ली के महंगे और जाने माने संस्थानों से पढ़ाई की।
  • इनमें से 46 उम्मीदवार प्रतिष्ठित निजी स्कूलों से पढ़े थे जहां पर लाखों रुपए में फीस जाती है।
  • 28 उम्मीदवारों के माता पिता का अपना अच्छा खासा बिजनेस था और 10 उम्मीदवार कॉर्पोरेट या मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर चुके हैं।
  • लगभग 11 उम्मीदवार आईआईटी या एनआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों से ग्रैजुएट है।
ईडब्ल्यूएस कोटा के तहत लाभ पाने के लिए परिवार की सकल वार्षिक आय 8 लाख वार्षिक से कम होनी चाहिए इसके अलावा कृषि भूमि 5 एकड़ से कम और आवासीय फ्लैट 1000 फीट से कम और संपत्ति के दायरे तय किए जाते हैं। पर आलोचकों और जानकारों का तर्क है कि 8 लाख रुपए की आय सीमा बहुत व्यापक है, जिससे उन परिवारों के बच्चे इसका लाभ ले पा रहे हैं जिनके पास महंगी शिक्षा और संसाधन जुटाने के पर्याप्त साधन है और जमीनी स्तर पर सबसे गरीब व्यक्ति तक इसका वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।
बड़ी विडंबना यह है कि सभी प्रकार के आरक्षण एससी/एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस जिन लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए बनाए गए थे उनको नहीं पहुंच पा रहे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण के मामले में यह देखा गया है कि कुछ लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं कुछ मामलों में शिकायत भी हुई पर हमारे देश की जांच प्रक्रिया और न्याय प्रक्रिया इतनी सुस्त है कि लोग फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर पाई हुई नौकरी पूरी कर लेते हैं पर उनके खिलाफ शिकायत की जांच पूरी नहीं हो पाती। इस विषय में पूर्व आई ए एस और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगा का उदाहरण ज्वलंत है उनके एस टी स्टेट्स के खिलाफ दशकों पहले शिकायत आई पर जांच प्रक्रिया इतनी सुस्त रहीं कि वे आई ए एस भी बन लिय और राजनेता के रूप में अच्छी पारी खेल ली पर उनके खिलाफ शिकायत की जांच नहीं हो पाई। दूसरा मामला वर्ष 2014 में जौनपुर मछली शहर लोक सभा सीट से सांसद चुने गए राम चरित्र निषाद का है वे बस्ती के निषाद ओबीसी थे पर दिल्ली से फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर मछली शहर सुरक्षित सीट से सांसद बने इसकी शिकायत हुई पर इसका निपटारा नहीं हो पाया और वे सांसद के रूप में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके थे। कहने का अभिप्राय यह है कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान उस वर्ग के लोगों को मुख्यधारा में लाया जाए पर इसका लाभ उस वर्ग के आम लोगों को न मिलकर उस वर्ग के धनाढ्य लोगों को मिल रहा है।
आजकल प्रायः यह देखने को मिलता है कि यदि किसी सवर्ण व्यक्ति की आर्थिक स्थिति दयनीय है तो इसके लिए दलित और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण को दोषी ठहराया जाता है जबकि गरीब हर समाज में पाए जाते हैं और इसके लिए सरकार का गरीबी उन्मूलन के लिए उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण है और प्राकृतिक संसाधनों और जमीन का अनुचित विवरण है। इसके लिए हजारों वर्षों से उपेक्षित और तिरष्कृत समाज की मुख्य धारा में लाने के उद्देश्य से दिया गया आरक्षण नहीं है। इसलिए लोगो की हर समस्या का निदान आरक्षण समाप्त किए जाने में नहीं खोजना चाहिए, वैसे भी आरक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी उन्मूलन नहीं बल्कि हजारों वर्षों से उपेक्षित लोगो के प्रतिनिधित्व का है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

नंदन नीलेकणी: इंफोसिस से आधार तक, और अब परीक्षा सुधार

विवेक शुक्ला

 नंदन नीलेकणी फिर राजधानी वापस लौट रहे हैं। फिर उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है। पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दी थी और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें परीक्षा व्यवस्था सुधारने वाले उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का अध्यक्ष बना दिया है। पेपर लीक, छात्रों की चिंता और परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच यह जिम्मेदारी उन पर आई है। लेकिन नीलेकणी के लिए यह कोई नई बात नहीं। वे पहले भी बड़े-बड़े काम हाथ में ले चुके हैं और हर बार सिस्टम को थोड़ा बेहतर छोड़ गए हैं।

ये बात करीब चार-पांच साल पहले की है। दिल्ली के बंगाली मार्केट में एक प्रमुख मिठाई की दुकान के बाहर 15-20 लोग किसी व्यक्ति को घेरे खड़े थे। सब ऑटोग्राफ मांग रहे थे। वो शख्स विनम्रता से मना कर रहा था। वो नंदन नीलेकणी ही थे। दुकान के मालिक आज भी कहते हैं कि सज्जनता और विनम्रता में उनका कोई सानी नहीं। शाम को जब शहर की भीड़ थोड़ी थमती, वे कभी-कभी पेंट-शर्ट में दोस्तों के साथ वहां दिख जाते। बिना सुरक्षा के।  दिल्ली के जायके उनके लिए कोई शौक नहीं, बल्कि पुरानी यादें थीं उस शहर की जहां उन्होंने एक बार पूरा भारत बदलने का फैसला किया था।

नीलेकणी का बचपन स्थिर नहीं रहा। पिता मोहन राव नीलेकणी मैसूर और मिनर्वा मिल्स के जनरल मैनेजर थे, फैबियन समाजवादी विचारों वाले। मां दुर्गा घर संभालती थीं। पिता की नौकरी में बार-बार तबादले होते रहे। बारह साल की उम्र में वे धारवाड़ में चाचा के पास चले गए। वहीं उन्होंने आत्मनिर्भर होना सीखा। पढ़ाई बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, सेंट जोसेफ हाई स्कूल धारवाड़ और कर्नाटक कॉलेज में हुई। फिर आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग। वहां वे औसत छात्र थे, लेकिन क्विज टीम के सितारे और सोशल लीडर। एक क्विज में ही रोहिणी से मुलाकात हुई। 1981 में शादी हो गई। उनके दो बच्चे हैं-निहार और जान्हवी।

करियर की शुरुआत 1978 में पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से हुई। वहीं एन.आर. नारायण मूर्ति से दोस्ती हुई। 1981 में सिर्फ 250 डॉलर की पूंजी लेकर नीलेकणी, मूर्ति और पांच और साथियों ने इंफोसिस खड़ा किया। कंपनी ने भारत को ग्लोबल आईटी हब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 2002 से 2007 तक नीलेकणी सीईओ रहे। उनके समय में इंफोसिस अरबों डॉलर का कारोबार छू गई। 2009 में उन्होंने कंपनी छोड़ दी और सार्वजनिक जीवन में कदम रखा।

सबसे बड़ा काम आधार था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें बुलाया। यूआईडीएआई के संस्थापक अध्यक्ष बने, कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। जुलाई 2009 में दिल्ली आए। पहले होटल या दोस्तों के घर, फिर कर्नाटक भवन, बाद में 2 सफदरजंग लेन का बंगला। औपनिवेशिक स्टाइल का सफेद बंगला, बगीचे में मोर घूमते। पास ही इंदिरा गांधी का घर। हफ्ते में तीन रात दिल्ली, बाकी बेंगलुरु में परिवार के साथ। ऑफिस में फाइलों का अंबार, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात, गृह मंत्रालय की आपत्तियां, प्राइवेसी के सवाल। फिर भी वे कहते“मैं प्लंबर हूं, सरकार की पाइपलाइन ठीक कर रहा हूं।” आधार ने एक अरब से ज्यादा भारतीयों को बायोमेट्रिक पहचान दी। फर्जी लाभार्थी हटे, सरकारी खजाने में हजारों करोड़ बचे, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर आसान हुआ। यूपीआई, डिजिलॉकर जैसी चीजें उसी सोच से निकलीं। आलोचनाएं आईं, लेकिन उन्होंने गोपनीयता और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए काम आगे बढ़ाया।

दानवीरता भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। 2017 में पत्नी रोहिणी के साथ बिल गेट्स की गिविंग प्लेज पर हस्ताक्षर किए। संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा समाज के लिए देने का वादा। आईआईटी बॉम्बे को सैकड़ों करोड़ दे चुके हैं। रोहिणी भी बड़े पैमाने पर परोपकार करती हैं। दोनों शिक्षा, जलवायु और सुशासन पर काम करते हैं।

नीलेकणी राजनीति में भी गए। 2014 में कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु साउथ से चुनाव लड़ा, हार गए। फिर तकनीक और सार्वजनिक सेवा पर लौट आए। 2017 में इंफोसिस के संकट में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष बनकर कंपनी को संभाला। जी-20 में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष भी रहे।

अब फिर दिल्ली लौट रहे हैं। जिम्मेदारी बदली है, शहर वही है। परीक्षा सुधार का टास्क फोर्स। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के विवाद, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य की चिंता के बीच। टास्क फोर्स में पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास निदेशक वी. कामाकोटी जैसे लोग हैं। नीलेकणी जानते हैं कि सिर्फ सजा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। सिस्टम डिजाइन मजबूत करना होगा।पारदर्शी, तकनीक-आधारित और भरोसेमंद।

दोनों सरकारों ने उन्हें चुना। मनमोहन सिंह के समय कांग्रेस थी, अब मोदी के समय एनडीए। लेकिन नीलेकणी हमेशा टेक्नोक्रेट ही रहे। विशेषज्ञ। वे कहते हैं कि असमानता बढ़ रही है, युवा चिंतित हैं। इसलिए दीर्घकालिक, रणनीतिक दान पर जोर देते हैं। उनकी जिंदगी मध्यवर्गीय घर से वैश्विक मंच तक की है, लेकिन जमीनी समस्याएं कभी नहीं छोड़ीं।

आज जब भारत डिजिटल महाशक्ति बनने की बात करता है, नीलेकणी उस रास्ते के पथप्रदर्शक हैं। इंफोसिस से आधार, दान से परीक्षा सुधार-हर जगह राष्ट्रहित को आगे रखा। उनका व्यक्तित्व विनम्र, गहरा सोचने वाला और समस्या सुलझाने वाला है। बड़े प्रोजेक्ट लेते हैं-एक अरब लोगों की पहचान हो या परीक्षा व्यवस्था लीक-प्रूफ बनाना। तकनीक और करुणा के मेल से बदलाव संभव है, यही उनका संदेश है।

राजधानी की शामों में जब बंगाली मार्केट की रोशनी जलती है, तो लगता है कुछ कहानियां शहर के साथ चलती रहती हैं। कभी आधार की, कभी परीक्षा सुधार की। और उनके बीच एक आदमी जो दोनों को जोड़ता है। नाम आप जानते ही हैं। उनकी कहानी अभी जारी है। और भारत उनका ऋणी है।

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