सोमवार, 27 अप्रैल 2026

रिकार्ड मतदान के मायने

अवधेश कुमार 

भारतीय चुनाव में जो कभी नहीं हुआ वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अभी तक 92.86 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड हुआ है। तमिलनाडु का भी लगभग 85% मतदान एक रिकॉर्ड है।अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि होगी। पूर्वोत्तर राज्यों में मतदान प्रतिशत औसत से अधिक रहा है किंतु वहां भी केवल 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 91.4% मतदान हुआ था। बंगाल में 2011 से मतदान औसत से ज्यादा रहा। 2011 में 84.5%, 2016 में 82.56% और 2021 में 81.56% मतदान हुआ। वैसे 2010 के बाद से मतदान में वृद्धि देशव्यापी प्रवृत्ति रही है। मतदान अंकगणित का विषय है लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक होती है और उनके मायने राजनीति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम तक जाते हैं। बंगाल का दूसरा चरण अभी बाकी है इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने हुए माहौल का संकेत यही है की मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला और यहीं संकेत भी छिपा हुआ है। 2010 के पहले सामान्य मतदान में वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी या घटकों की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में यह प्रवृत्ति बदल गई। मतदान बढ़ाने के बावजूद सरकारें वापस आती रही और मतदान घटना पर भी कई सरकारें गईं। इसलिए सामान्यत: मतदान का प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने या इसके विपरीत राजनीति परिणाम का निश्चयात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

बंगाल में 2011 में 84.5 प्रतिशत का रिकार्ड मतदान हुआ और वामपंथी मोर्चे की 34 वर्षों की स्थापित सरकार चली गई। उसके बाद मतदान प्रतिशत थोड़ा-थोड़ा घटा किंतु ममता वापस आती रहीं। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान या एसआईआर की प्रक्रिया के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत संतोषजनक होगा। पिछले वर्ष बिहार के चुनाव में 67.25% मतदान हुआ जो 2020 के 57.29 प्रतिशत से 9.96% ज्यादा था। बिहार में लगभग 65 लाख नाम एसआईआर की प्रक्रिया में हटाए गए थे। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं का नाम सूची से हटा।  कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई हुई है और न्यायिक प्राधिकरणों को फैसला करना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई। यह सच नहीं है कि प्रतिशत ज्यादा होते हुए भी कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढी। पिछले चुनाव से लगभग 26 लाख ज्यादा मतदाताओं ने मतदान किया। भारी संख्या में मृतक, दूसरे जगह चले गए या दो जगह नाम वाले या कुछ फर्जी नाम मतदाता सूची में थे और उनके नाम मतदान होते थे जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी। इनके नाम पर कितने वोट डाले गए इसकी गणना कोई नहीं कर सकता। अगर 6.77 करोड़ मतदाताओं के आधार पर पिछला मतदान होता तो मतदाताओं की संख्या कम होती और इस बार वृद्धि बहुत ज्यादा होती। इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

2011 में ममता बनर्जी ने लगभग 5 वर्षों के अनवरत संघर्ष और आक्रामकता से मतदाताओं में वाममोर्चा सरकार के विरुद्ध गुस्सा एवं आलोड़न पैदा किया था। वाम मोर्चा समर्थक भी उनके साथ आये और तृणमूल का अपना भी आधार खड़ा हुआ। जब से भाजपा ने बंगाल में अपनी विचारधारा और राजनीति को जमीन पर उतारने का अभियान चलाया ममता के विरुद्ध समाज के निचले स्तरों पर जबरदस्त आलोड़न है और कुछ महीनो में 2011 पूर्व की स्थिति ममता एवं भाजपा के संदर्भ में उल्टी है। ममता समर्थक और विरोधी तथा भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में स्वयं और अपने मतदाताओं को ज्यादा संख्या में मतदान केन्द्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। 2019 लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम दिखा जब भाजपा ने 40% मत के साथ राज्य 18 सीटें जीत ली। 2018 पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त आलोड़न था और संकेत मिल गया कि भाजपा जमीन पर नीचे तक पहुंची है तथा राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का लगभग सफाया हो चुका है। भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की लहर  भारत में देखा गया है। 2021 में भी भाजपा ने वातावरण बनाने की कोशिश की पर तब तीन सीटों से बहुमत के 148 तक पहुंचना बंगाल के सामाजिक - सांप्रदायिक समीकरणों में कठिन था। इसलिए लगभग 38% मत के साथ हुआ 77 सीटों तक पहुंच पाये। कोरोना महामारी के कारण बनाए गए सरकार विरोधी माहौल का भी थोड़ा असर हुआ। बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा आम लोगों के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। चुनावी रैगिंग या धांधली प्रदेश का स्वाभाविक चरित्र पिछले 60 सालों में बना रहा है। कांग्रेस फिर वाम दल और  तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रवृत्ति को ज्यादा निष्ठुरता से कायम रखा।

इस बार मतदाताओं का बड़ी संख्या में निकलने का एक प्रमुख कारण मतदान और बाद में के लिए दिखता सुरक्षा आश्वासन था। पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 2407 कंपनी, 2193 क्विक रिस्पांस टीम व 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां कुछ कुछ समस्या हो रही थी मतदान के पहले से ही केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे। मतदान के दौरान जहां भी समस्या आई सुरक्षा बल ज्यादातर पहुंचे। इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर के एक भाजपा उम्मीदवार को लोगों द्वारा खदेड़ने और पकड़ कर पिटाई करते वीडियो देखने से अनुमान लग जाता है कि मतदान कैसे भय और आतंक के वातावरण में होता रहा। सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही हिंसा में भी रिकार्ड कमी आई। मतदान बाद निश्चित समय तक केंद्रीय बलों की उपस्थिति के निर्णय ने भी मतदाताओं में सुरक्षा भाव पैदा किया। 2021 उसके पहले 2019 और 2018 तीनों चुनावों में मतदान बाद की हिंसा और लोगों के पलायन से भय का माहौल बना था। चुनाव अभियान के बीच प्रदेश की यात्रा करने वालों को 2026 में माहौल में बदलाव दिख रहा था। मतदाता धीरे -धीरे खुलकर अपना मत प्रकट करने लगे थे। लंबे समय बाद मतदान हत्याविहीन, न्यूनतम हिंसा और निर्भयता के वातावरण में संपन्न हुआ है। निस्संदेह, परिणाम में भी यह दिखाई देगा।

 ममता और समर्थकों की आक्रामकता का जवाब भाजपा ने भी प्रति आक्रामकता से दिया। गृह मंत्री अमित शाह तक के भाषणों में भी आक्रामकता थी ताकि उनके समर्थक मतदाता भयरहित होकर मतदान के लिए निकलें और आक्रमण होतो उसका प्रतिकार करें या सुरक्षा बलों तक सूचना पहुंचाएं। ममता ने अपनी शैली में हमलावर प्रचार किया और यहां तक कहा कि किसी कार्यकर्ता के साथ कार्रवाई होगी तो सरकार उसके साथ खड़ी ही नहीं रहेगी बल्कि कुछ संस्थाओं के मामले में यहां तक कहा कि उसको हम सरकारी नौकरी दे देंगे। पहले भी ममता उन सबकी रक्षा में सामने दिखीं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार या अपराध के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की। इसका असर उनके घोर समर्थकों पर था। देश भर में आम मुसलमान भाजपा के विरुद्ध मतदान करता है और उनकी संख्या कहीं कहीं शत-प्रतिशत तक चली जाती है। बंगाल में उनकी आबादी 29  से 30 प्रतिशत के बीच होगी। वे भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मतदान करने निकले ही होंगे। उसकी प्रतिक्रिया में गैर मुस्लिम समुदाय भी निकले हैं जो टीवी कैमरों पर दिख रहे थे। मुर्शिदाबाद , मालदा, दक्षिण दिनाजपुर आदि जिलों में निकले मतदाता गवाही दे रहे थे कि दोनों पक्षों में करो या मरो का भाव पैदा हो चुका है। जिलों के हिसाब से देखें तो दक्षिण दिनाजपुर में 95.4% , मालदा में 94.43%, मुर्शिदाबाद में 93.58%, उत्तर दिनाजपुर में 94.15%, अलीपुरद्वार में 92.69% , झारग्राम में 92.5%, पश्चिम मेदिनीपुर में 92.118% , बांकुरा में 92.5 0%, पूर्वी मेदिनीपुर में 91.20 प्रतिशत, तथा कूच बिहार में सबसे अधिक 96% मतदान हुआ है। इस दौर में सबसे कम कालिमपोंग में 83.07 प्रतिशत , दार्जिलिंग में 88.80 प्रतिशत, पश्चिम वर्धमान में 90.33% तथा पुरुलिया में 90.91% मतदान हुआ। साफज् है कि जहां एक पक्ष कम रहा वहां मतदान प्रतिशत कम हुआ और दार्जिलिंग, कालिमपोंग आदि इसके उदाहरण हैं।

बंगाल को समझने वाले स्वीकार करेंगे कि तीन लगातार कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान का भी वोट है तथा बदलाव के लिए निकलने वाले मतदाताओं के भी  संख्या है। यह बताने की आवश्यकता नहीं की इन मतदाताओं ने किसके चुनाव चिन्ह पर बटन दबाया होगा। ममता और तृणमूल के राज में सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थी तत्व तथा विरोधियों के विरुद्ध सत्ता व प्रशासन के भयानक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध खासकर संदेशखाली व आरजी कर जैसी महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराध घटनाएं भी सामने है,  दंगों के दौरान प्रशासन की भूमिका, एक समय का संपन्न और उद्योगों तथा कारोबार के मामले में देश के अगुआ राज्य का पीछे होना और संपूर्ण आर्थिक स्थिति पर इसके नकारात्मक असर के कारण भी असंतोष दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इन सबको मुद्दा बनाया। इस तरह रिकार्ड मतदान के पीछे इन समस्त कारकों की सामूहिक भूमिका रही।

वैसे इन 152 सीटों का पिछला अंकगणित देखें तो तृणमूल ने 92 में से 83 पर सीधे भाजपा, पांच पर कांग्रेस और तीन पर माकपा  तथा एक पर भाजपा की सहयोगी और झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आशु को हराया था। ‌इनमें से तीन दांतन,तमलुक और जलपाईगुडी में जीत का अंतर एक हजार से कम और नौ पर एक से पांच हजार का था।‌ कुल मिलाकर इनमें से 23 पर जीत का अंतर 10 हजार से कम था। इनसे ज्यादा एस आई आर में नाम कट गये। एसएआर में औसत प्रतिशत 28, 055 नाम हटे हैं । इस तरह मतदान में वृद्धि का चुनाव परिणाम के संदर्भ में पूर्व आकलन किया जा सकता है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

वर्तमान युग का कर्बला और ज़हरा व ज़ैनब की बेटियाँ

  • समाज में महिलाओं की भूमिका और इस्लाम की बेटियाँ

अबू अब्दुल्लाह अहमद

समाज में महिलाओं की भूमिका पर कोई भी चर्चा मुस्लिम समाजों के भीतर मौजूद लैंगिक असमानता को संबोधित किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती। इस्लाम में माँ, बेटी या बहन होना गहरे अर्थ रखता है, जो उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अल-ताहिरा, सय्यिदत-उल-क़ाइनात हज़रत फ़ातिमा अल-ज़हरा, और “दूसरी ज़हरा” हज़रत ज़ैनब के आदर्श जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस्लाम में महिलाओं की स्थिति अक्सर दो अतियों के बीच फँसी रही है: एक ओर बाहरी आलोचकों के आरोप, गलत प्रस्तुतियाँ और रूढ़िवादी धारणाएँ; और दूसरी ओर मुस्लिम समाजों के भीतर कुछ पितृसत्तात्मक समूहों और पूर्व-इस्लामी अज्ञानता से प्रभावित व्याख्याएँ। ये दोनों ही इस्लाम की नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि के विपरीत हैं, जो महिलाओं को सम्मानित, नैतिक रूप से उत्तरदायी और सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों के रूप में मान्यता देती है। इस दृष्टि को समझने के लिए इस्लामी इतिहास, उसके मूल सिद्धांतों और आदर्श व्यक्तित्वों का अध्ययन आवश्यक है।

इस्लामी इतिहास की पहली मुस्लिम महिला उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अल-ताहिरा थीं, जो पैगंबर मुहम्मद की पत्नी थीं। वे सबसे पहले उन पर ईमान लाने वाली थीं और हर कठिनाई में उनके साथ अडिग रहीं, उन्हें निरंतर समर्थन और प्रोत्साहन देती रहीं। एक संपन्न महिला होने के बावजूद, उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति इस्लाम और समाज सुधार के कार्य में लगा दी। इसी परंपरा की निरंतरता दूसरी सदी में भी दिखाई देती है, जब दुनिया का पहला विश्वविद्यालय अल-क़रविय्यीन (859 ई.) मोरक्को के फ़ेज़ में एक मुस्लिम महिला फ़ातिमा अल-फ़िहरी द्वारा स्थापित किया गया, जो ख़दीजा की तरह ही एक सम्मानित कुरैशी व्यापारी की बेटी थीं।

जब मुसलमान जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी थे, तब मदीना, कूफ़ा, बग़दाद, काहिरा, दिल्ली और इस्तांबुल जैसे शहर ज्ञान, कला, उद्योग और व्यापार के वैश्विक केंद्र बन गए। यह उपलब्धि पुरुषों और महिलाओं, विद्वानों और कामगारों—सभी के संयुक्त प्रयास का परिणाम थी, क्योंकि इस्लाम समाज के समग्र विकास और प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान प्रगति के अवसरों पर बल देता है। एक संतुलित और प्रगतिशील समाज के लिए महिलाओं की घर और समाज दोनों में सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

हज़रत ख़दीजा, पैगंबर की पैगंबरी की घोषणा से पहले ही अरब में एक प्रतिष्ठित और समृद्ध व्यवसायी थीं, जो बड़े व्यापारिक काफिलों का प्रबंधन करती थीं। पैगंबर स्वयं उनके व्यापारिक साझेदार थे। इस्लाम के प्रसार में उनका योगदान पैगंबर के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इतिहासकार उन्हें मानवता की महान हितैषी मानते हैं, और उनके निधन का वर्ष “आम अल-हुज़्न” (शोक का वर्ष) के रूप में जाना जाता है। उनकी बुद्धिमत्ता, संपत्ति और कुरैश में प्रभाव ने पैगंबर के मिशन को मजबूत किया।

एक और उल्लेखनीय उदाहरण हज़रत फ़ातिमा अल-ज़हरा का है, जिन्हें जन्नत की महिलाओं की नेता कहा गया है। पैगंबर उन्हें प्रेमपूर्वक “उम्म अबीहा” (अपने पिता की माँ) कहते थे। वे कम उम्र से ही अत्यंत बुद्धिमान थीं और पैगंबर के मिशन में सक्रिय रूप से शामिल रहीं। वे अहल-उल-किसा (पवित्र चादर वाले पाँच व्यक्तियों) में शामिल थीं, जिनकी पवित्रता का उल्लेख क़ुरआन में मिलता है। जब भी वे पैगंबर से मिलने आतीं, वे सम्मान में खड़े हो जाते और उन्हें अपने पास बैठाते। उन्होंने कठिन समय में अपने पिता और अपने पति हज़रत अली अल-मुर्तज़ा का साथ दिया। उहुद की लड़ाई के दौरान, जब पैगंबर और हज़रत अली घायल हुए, तब उन्होंने साहसपूर्वक उनकी देखभाल की।

इसी प्रकार, कर्बला की त्रासदी अत्याचार, अन्याय, कानून के उल्लंघन, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और पैगंबरी परंपरा के स्थान पर साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष का एक सशक्त प्रतीक है। इस संघर्ष में हज़रत ज़ैनब बिन्त अली ने न केवल अपने भाई इमाम हुसैन का साथ दिया, बल्कि बाद में न्याय की आवाज़ बनकर उभरीं। अपार व्यक्तिगत क्षति के बावजूद, उन्होंने असाधारण नेतृत्व और साहस का परिचय दिया और कूफ़ा व दमिश्क के दरबारों में प्रभावशाली भाषण दिए, जो आज भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका के सशक्त प्रमाण हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि इतने उज्ज्वल उदाहरणों के बावजूद, मुस्लिम समाजों में कुछ व्याख्याओं ने महिलाओं को घर की चार दीवारों तक सीमित कर दिया है और इसके लिए क़ुरआन और हदीस का दुरुपयोग किया गया है। यह स्वीकार करना होगा कि इस्लाम में महिलाओं की वास्तविक स्थिति को समझने में विफलता का कारण अक्सर बाहरी आलोचना से अधिक, स्वयं मुसलमानों के कार्य और उनकी व्याख्याएँ हैं। यही कारण है कि जब भारत जैसे देशों में मुस्लिम महिलाएँ चिकित्सा, इंजीनियरिंग, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, या तुर्की और ईरान की महिला पायलट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाती हैं, तो दुनिया आश्चर्य करती है।

वास्तव में, परिवार और समाज का स्वास्थ्य उसके दोनों हिस्सों की मजबूती पर निर्भर करता है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में आधी आबादी को हाशिए पर रखना प्रगति की आधी लड़ाई हारने के समान है। पुरुष और महिलाएँ एक गाड़ी के दो पहिए और शरीर के दो हाथों की तरह हैं। महिलाएँ न केवल घर की नींव को मजबूत करती हैं, बल्कि शिक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शिक्षित और सशक्त महिलाएँ आने वाली पीढ़ियों के निर्माण, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक न्याय में योगदान देती हैं।

क़ुरआन पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी आध्यात्मिक या नैतिक भेदभाव का समर्थन नहीं करता, बल्कि उन्हें “एक-दूसरे के संरक्षक” के रूप में वर्णित करता है और ईश्वर के सामने समान रूप से उत्तरदायी मानता है। पैगंबर ने महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया, उन्हें विरासत का अधिकार दिया, उनके आर्थिक योगदान को मान्यता दी और उन्हें सामाजिक व राजनीतिक जीवन में शामिल किया। महिलाएँ सार्वजनिक रूप से नेताओं से प्रश्न करने का साहस रखती थीं, यहाँ तक कि खलीफा उमर इब्न अल-ख़त्ताब से भी।

पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देना परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि वास्तविक इस्लामी शिक्षाओं को बाद की विकृतियों से अलग करने का प्रयास है। इसके लिए न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा जैसे इस्लाम के मूल सिद्धांतों की ओर लौटना आवश्यक है। जब इन सिद्धांतों का पालन किया जाता है, तो कई अन्यायपूर्ण प्रथाएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।

इस्लाम महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है, जो बाहरी मॉडल की नकल पर नहीं बल्कि मूल्यों पर आधारित है। यह ढाँचा तीन मुख्य आधारों पर टिका है: गरिमा, शिक्षा और भागीदारी। इस्लाम हर इंसान की गरिमा को स्वीकार करता है, महिलाओं को अधिकारों और जिम्मेदारियों के साथ एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मान्यता देता है, और पुरुषों व महिलाओं दोनों के लिए ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य करता है। सामाजिक, आर्थिक और नागरिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रारंभिक इस्लामी समाज की एक स्थापित विशेषता है।

व्यापार, शिक्षा और सार्वजनिक परामर्श से लेकर समाज सेवा तक, महिलाओं ने इतिहास में विविध और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं। बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के अतिवादी दृष्टिकोणों से निपटने के लिए बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक स्पष्टता आवश्यक है। इसके लिए इस्लामी स्रोतों के साथ गहरा जुड़ाव, इतिहास में महिलाओं की सक्रिय भूमिका की स्वीकार्यता और समकालीन चुनौतियों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

फ़ातिमा और ज़ैनब की विरासत हमें सिखाती है कि गरिमा और प्रतिरोध, आस्था और धैर्य—एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। क़ुरआन की दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि न्याय बिना लैंगिक समानता के अधूरा है। इस दृष्टि को पुनः अपनाकर आज के मुस्लिम समाज एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं, जो अपनी आध्यात्मिक जड़ों के प्रति वफादार होने के साथ-साथ आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप भी हो—जहाँ महिलाएँ न्याय, ज्ञान और सामूहिक कल्याण की दिशा में समान भागीदार हों।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

जब कॉमन सिविल कोड आवश्यक है तो यूनिफार्म आपराधिक प्रक्रिया क्यों नहीं?

बसंत कुमार

आपके सरकारी आवास में बेहिसाब नोटो के बंडल मिलने के आरोप से घिरे जस्टिस वर्मा ने अपना त्याग पत्रभेजा दिया और उसके कारण संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बंद हो गई। इसके कारण न तो उनके खिलाफ अपराधिक कार्यवाही नहीं हो पाएगी और उनका त्याग पत्र स्वीकार होने के पश्चात उन्हें सेवा से संबंधित सभी लाभ मिल जाएंगे और जीवन पर्यन्त पेंशन भी मिलती रहेगी। अब प्रश्न यह उठता है कि जस्टिस वर्मा की जगह कोई साधारण कर्मचारी होता तो विजिलेंस प्रोसिडिंग या क्रिमिनल प्रोसिडिंग शुरू होने से पहले अपना त्याग पत्र देता और उनका त्याग पत्र स्वीकार करके उसे सारे सरकारी सेवा के लाभ लेने दिए जाते। जब इस देश में सर्वोच्च न्यायालय समेत अनेक प्लेटफार्म से कॉमन सिविल कोड की बात होती हैं तो फिर ऐसी न्यायिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जाती जहां उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और आम जनसेवक के विरूद्ध एक ही तरह की प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं होती।
यह पहला अवसर नहीं है कि उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई हो पर आरोपी न्यायाधीश को अपने पद से त्यागपत्र देकर उसे सेवा से संबंधित सभी लाभ प्राप्त करने का अवसर प्रदान कर दिया गया हो। 1990के दशक में जस्टिस रामा स्वामी के विरुद्ध संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया पर संसद के उत्तर भारत और दक्षिण भारत के आधार पर बंट जाने के कारण महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया और जस्टिस रामास्वामी को त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया और उन्हें सारे सेवा के लाभ मिल गए। ठीक उसी प्रकार वर्ष 2010के दशक में जस्टिस मुखर्जी के विरुद्ध संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी न हो सकी और उन्हें सरकारी सीवा से त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया क्या इस तरह से लाभ आम कर्मचारी को मिल सकता है।
भारत सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के मामले में भ्रष्टाचार के मामलों के निपटान के लिए लागू सी सी एस (सी सी ए) रूल्स के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उसे 48घंटे से अधिक जेल में रहता है तो उसे सरकारी सेवा से निलम्बित समझा जाए है पर दो वर्ष पूर्व दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपी मे गिरफ्तार किए गए तो वे कई माह तक तिहाड़ जेल से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में काम करते रहे और सरकार चलाते रहे आखिर न्यायाधीशों और मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लोगों के लिऐ आपराधिक प्रक्रिया अलग अलग क्यों है, जब आम कर्मचारी इस आशंका से कि वह जांच को प्रभावित कर सकता है, आपराधिक प्रक्रिया शुरू होते ही निलम्बित कर दिया जाता है पर उच्च पदों पर बैठें न्यायाधीश और मंत्री मुख्यमंत्री अपने पदों पर विराजमान रहते हैं। यू पी ए 1सरकार के समय जब चारा घोटाले में अपना नाम आने के बावजूद लालू प्रसाद यादव उनके मंत्रिमंडल में बने हुए थे तो उनका बचाव करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि जब तक कोई न्यायालय द्वारा दोषी सबित नहीं ठहराया जाता तो उसे निर्दोष ही माना जाएगा तो फिर आम कर्मचारी ट्रायल कोर्ट में केस के निपटान से पहले 20-2 0साल तक निलम्बित क्यों रखे जाते हैं।
मैने भारत सरकार में अपनी सेवा के दौरान कम से कम बीस मामलों में देखा है कि छोटे मोटे अपराधों में अपना नाम आने पर अपना त्यागपत्र दे देते है और स्टीरियोटाइप ढंग से उनका त्यागपत्र स्वीकार करने के बजाय उनको सस्पेंड करके सी बी आई या अन्य जांच एजेंसियों को भेज देते हैं और ये एजेंसियां छोटे मोटे अपराधों में कनविक्शन के लिय ट्रायल कोर्ट में भेज देते है जब कि इन मामलों को विभागीय कार्यवाही के द्वारा बर्खास्तगी, पद अवनति या अन्य उपयुक्त सजा दी जा सकती है। पर ट्रायल कोर्ट में भेजने के बाद ट्रायल बीस वर्ष तक चलता है और तब तक उस कर्मचारी को सस्पेंड रखा जाता है और उसे गुजारा भत्ता के रूप में 50%से लेकर 75%, तक वेतन देना पड़ता है और जो कर्मचारी बीस पच्चीस वर्ष की आयु में इन चक्करों में फंस जाता है वह 75से 80वर्ष की आयु में ही छूट पाते हैं, पर न्यायाधीशों की स्थिति अलग है जो त्यागपत्र देकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं।
जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले अपना त्यागपत्रसीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया और इस इस्तीफे से उन पर चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बीच में ही रुक गई, मानो संसद यह इंतजार कर रही थी कि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा आए और हम महाभियोग की कार्यवाही रोक दे, ऐसी दरियादिली आम कर्मचारियों के साथ नहीं दिखाई जाती कि 100-200 रु की रिश्वत के आरोप में घिरा व्यक्ति इस्तीफा दे और उसके खिलाफ सी बी आई या पुलिस की कार्यवाही रोक दे उसे तो अंजाम तक पहुंचाना होता है यहां पर गौर करने वाले बात है कि जस्टिस वर्मा के आवास से 15करोड़ से अधिक के नोट मिले या जले, पर कोई एफ आई आर नहीं हुई। इससे पहले वर्ष 2011में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ फंड की हेराफेरी का आरोप लगा, जांच में दोषी पाए जाने के बाद राज्यसभा में उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित हो गया लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले उन्होंनेइस्तीफा दे दिया। इसी तरह सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस दिनाकरन पर वर्ष 2011में ही कदाचार के आरोप लगे संसद द्वारा उनके खिलाफ जांच समिति बनाई गई पर जांच समिति की कार्यवाही शुरू होने से पहले उन्होंने जांच समिति की प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
इस प्रकार भ्रष्टाचार कदाचार के आरोपों से घिरे जजों का इस्तीफा दे देने से महाभियोग की प्रक्रिया रद्द हो जाती है और कोई ऐसा नियम नहीं है कि महाभियोग से पहले इस्तीफा देने वाले जज के रिटायरमेन्ट बेनिफिट्स पेंशन आदि रोक दिए जाए। इसीलिए भ्रष्टाचार और कदाचार के लिप्त पाए जाने के बाद भी ये सुविधाएं मिलती रहती है जो इज्जत के साथ अपनी सेवा पूरी करने वाले जज को मिलती रहती है। पर एक आम कर्मचारी यदि अपने खिलाफ कार्रवाई पूरी होने से पूर्व त्याग पत्र दे दे तो क्या उस पर हो रही कार्यवाही रुक जाएगी या उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही पड़ेगा।
स्वतंत्र भारत में विगत 7दशक में कई पार्टियां सत्ता में आई और सत्ता से बाहर हुई और इनकी नीति के हिसाब से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में बड़ा बदलाव हुआ गांधी आंबेडकर और नेहरू जैसे लोगों को बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता था पर आज कल कोई भीछूट भैया इनको गाली देने लगताहै, पर एक चीज नहीं बदली वो है लोगों का देश की न्यायपालिका के प्रति अटूट विश्वास, पर यदि भ्रष्टाचार और कदाचार में लिप्त न्यायाधीशों को तकनीकी आधार पर इनके कृत्यों की सजा पाने से बचाया जायेगा औरआम जनता छोटे छोटे अपराधों के लिय 30-4 0साल तक न्यायालयों के चक्कर लगाएगी तो लोगों का न्याय पालिका से विश्वास उठ जाएगा।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

सपा की ’पीडीए’ राजनीति और सियासी यथार्थ


संतोष यादव 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के बुलावे पर उनके गृह जिले सुल्तानपुर आए तो नेताओं बीच उन्हें चेहरे दिखाने की होड़ मच गई।
कहने को तो यह उनका निजी कार्यक्रम था, लेकिन महज़ एक निजी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने स्थानीय राजनीति की कई परतों को उजागर कर दिया। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर दौरे के दौरान उनके आसपास दिखाई पड़े कुछ ऐसे चेहरे, जिनकी छवि पर वर्षों से सामंती वर्चस्व और कमजोर वर्गों के दमन के आरोप लगते रहे हैं, ने इस पूरी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विरोधाभास केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक द्वंद्व का प्रतीक है, जिसमें एक ओर वैचारिक प्रतिबद्धता है और दूसरी ओर चुनावी यथार्थ। अखिलेश यादव के लिए यह सिर्फ रणनीति का नहीं, बल्कि भरोसे का भी सवाल है। आने वाले समय में उनकी राजनीति की दिशा इस बात से तय होगी कि वे इस कथनी-करनी के अंतर को कैसे पाटते हैं। 
सपा सुप्रीमो के साथ विवादित चेहरों की मौजूदगी, उनकी सक्रिय उपस्थिति ने इस पूरे दौरे को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया। जिन पर पहले से ही दंबगई दिखाने एवं दूसरों की हत्या कराने जैसे गंभीर आरोप लग चुके हैं, उनका पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब दिखना सपा कार्यकर्ताओं के एक वर्ग को असहज कर रहा है। राजनीति में दागी छवि हमेशा एक चुनौती होती है। खासतौर पर तब, जब पार्टी खुद को वैकल्पिक और साफ-सुथरी राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हो। समाजवादी पार्टी की पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति का दावा ज़मीन पर कई बार अपने ही कसौटी पर खरा नहीं उतरता। सिद्धांत और व्यवहार के बीच का यही अंतर विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। सियासी दलों का कार्यकर्ता सिर्फ जमीन पर नहीं, डिजिटल मंचों पर भी सक्रिय है। 
सपा सुप्रीमो के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही नाराजगी संकेत देती है कि पार्टी का एक वर्ग नेतृत्व से  स्पष्टता चाहता है। आज के दौर में आंतरिक असहमति अब दबती नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है। अखिलेश यादव एक बार फिर अपनी स्थापित राजनीतिक लाइन ’पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ मैदान में नजर आए। यह अवधारणा कुछ समय से उनकी राजनीति का केंद्रीय आधार बनी हुई है, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय की नई धुरी तैयार करना है। पीडीए की राजनीति का मूल दर्शन भी यही है कि, सत्ता और संगठन में उन तबकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे हैं। यह सिर्फ सामाजिक समीकरण नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और सम्मान की राजनीति है। लेकिन जब इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ने वाला नेतृत्व उन चेहरों के साथ खड़ा दिखाई देता है, जिन्हें पारंपरिक प्रभुत्वशाली राजनीति का प्रतीक माना जाता रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलाव वास्तविक है या सिर्फ नारेबाजी तक सीमित है।
राजनीति में संदेश केवल भाषणों से नहीं, बल्कि प्रतीकों और साथ खड़े लोगों से जाता है। एक तस्वीर, एक मंच, एक साथ खड़ा व्यक्ति, ये सभी जनता के बीच गहरे अर्थ रखते हैं। ऐसे में यदि पीडीए की बात करने वाला नेतृत्व उन्हीं पुराने सामंती सत्ता-ढांचे के प्रतिनिधियों के साथ नजर आता है, तो यह संदेश जाता है कि बदलाव की प्रक्रिया अधूरी है अथवा समझौते के रास्ते पर है।
हालांकि, इस स्थिति को पूरी तरह एकतरफा नजरिए से देखना भी उचित नहीं होगा। चुनावी मजबूरियां अक्सर ऐसे फैसले करवाती हैं, जहां प्रभावशाली स्थानीय चेहरों को साथ रखना जरूरी हो जाता है, भले ही उनकी छवि विवादित क्यों न हो। यह ’विजय की अनिवार्यता’ और ’विचार की शुद्धता’ के बीच का संतुलन है, जिसे हर राजनीतिक दल अपने तरीके से साधने की कोशिश करता है। समाजवादी पार्टी भी वही कर रही है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा जोखिम भी छिपा होता है। यदि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए वैचारिक स्पष्टता से समझौता किया जाता है, तो दीर्घकाल में इसका असर  उसकी विश्वसनीयता पर पड़ता है। 
समाजवादी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का वह वर्ग, जो पीडीए की अवधारणा को सामाजिक बदलाव के रूप में देखता है, वह ऐसे विरोधाभासों से निराश हो सकता है। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही प्रतिक्रियाएं इसी असहजता की ओर इशारा करती हैं। समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती स्पष्ट है, क्या वह पीडीए को सिर्फ एक प्रभावी चुनावी नारा बनाए रखेगी, या उसे अपने संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व के चयन और राजनीतिक व्यवहार में भी उतारेगी? आने वाले समय में समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह ऊर्जा से भरे कार्यकर्ताओं, महत्वाकांक्षी नेताओं और सामंती, विवादित छवियों के बीच संतुलन कैसे बनाती है। 2027 की लड़ाई सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता नहीं होगी, बल्कि पार्टी के भीतर भी एक ’अदृश्य संघर्ष’ चल रहा है, जहां छवि, अवसर और स्वीकार्यता की परीक्षा साथ-साथ हो रही है।

महिला आरक्षण की फिर वही परिणति क्यों

अवधेश कुमार 

लगभग 12 वर्षों के शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह पहला अवसर है जब कोई विधेयक पारित होने से लोकसभा में वंचित रह गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा किया कि विधेयक के पक्ष में 298 तथा विरोध में 230 मत पड़े। हालांकि सदन के बहुमत में विधायक के पक्ष में वोट डाला किंतु संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण दो तिहाई बहुमत यानी चाहिए था और इसलिए यह पारित नहीं हो सका। यानी कुल 528 लोकसभा सदस्य उपस्थित थे तो 352 सदस्यों का समर्थन चाहिए था वैसे उपस्थिति से 34 ज्यादा सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट डाला। अगर सामान्य विधेयक होता तो पारित हो गया होता। 1996 से महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभा में आरक्षण देने का मामला लटका हुआ है और विरोधी किसी न किसी बहाने इसमें अड़चन डालते आ रहे हैं। किसी का तर्क कुछ भी हो निष्कर्ष यही है वही प्रक्रिया फिर दोहराई गई है। अब इसमें गुणात्मक अंतर यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से 33% महिलाओं के आरक्षण का कानून संसद द्वारा पारित करवा लिया है। इसलिए उसको लागू तो होना है। किंतु अब विधेयक के गिर जाने से 2029 लोकसभा चुनाव में यह लागू नहीं हो सकता। इसके लिए हमें 2034 की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

दरअसल, 2023 के अधिनियम में यह प्रावधान था कि अगली जनगणना और फिर परिसीमन हो जाने के बाद इसे लागू किया जाएगा। तब अनुमान यह था कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 तक पूरी हो चुकी होगी इसलिए  इसे लागू करने में समस्या नहीं होगी। चूंकि यह पूरी नहीं हुई तो नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे संविधान संशोधन के जरिए तत्काल लागू करने का रास्ता चुना। पूरे प्रकरण का कठोर सच यह है कि इन तीनों विधेयकों में ऐसा कुछ नहीं था जिसको आशंका की दृष्टि से देखा जाए और जिसका इस सीमा तक विरोध हो कि काले झंडे और काले बिल्ले तक पार्टियां व सांसद लगा लें।  इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान करता था जिनमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें थीं। दूसरा,परिसीमन विधेयक, 2026 नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान करता था। और तीसरा,केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में महिला आरक्षण लागू करने के लिए था। विपक्ष का मुख्य विरोध पहले विधेयक से था। वस्तुत: संसद का विशेष सत्र आरंभ होने के पहले ही विपक्ष ने अविश्वसनीय रूप से विरोधी रख अपनाकर अपने संसदीय व्यवहार का संकेत दे दिया था। विपक्ष के सभी नेताओं ने, जिनमें महिला सांसद भी शामिल हैं नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन संबंधी विधेयकों का जैसा विरोध किया उसमें साफ हो गया कि इनका पारित होना संभव नहीं है। भाजपा के मंत्रियों ने विपक्ष के नेताओं से बात करनी शुरू की। स्वयं प्रधानमंत्री ने दो पोस्ट से अपील की। इसके पहले वे अपने भाषण में अपील कर चुके थे कि श्रेय आप लोग ले लीजिए लेकिन महिला आरक्षण में बाधा मत बनिए। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं इसके लिए तैयार हूं कि कल आप सबकी तस्वीर समाचार पत्रों में छपवाकर श्रेय दूंगा। लेकिन विपक्ष पहले से मन बनकर बैठा था। उन्होंने अपनी अपील में लिखा कि अपने घर में मां-बहन- बेटी -पत्नी सबको देखिए और उनके अधिकार के लिए विचार कर मतदान करिए।

 निष्पक्ष होकर विवेक, तथ्य और तर्क के साथ विचार करनेवालों का निष्कर्ष है कि पूरा विरोध एकपक्षीय अतिवाद से ग्रस्त रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तो इसे देश विरोधी और देश को बांटने वाला विधायक तक करार दिया। उन्होंने कहा कि ये देश का भूगोल बदलना चाहते हैं जो हम कभी नहीं होने देंगे। इससे अधिक अतिवादी वक्तव्य और कुछ नहीं हो सकता। उनका भाषण भाजपा के वरिष्ठ सांसदों को भी इतना आपत्तिजनक लगा कि राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को लोकसभा अध्यक्ष से अपील करनी पड़ी कि इन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए। राहुल गांधी के भाषण के एक बड़े अंश को असंसदीय करार देकर हटा दिया गया। सदन में विपक्ष के नेता के भाषण के अंशों को असंसदीय श्रेणी में ला दिया जाए इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती। अगर इरादा विधेयक पर बहस कर इसमें उचित संशोधन करना हो तो  आपके भाषण में उससे संबंधित सुझाव होते हैं। सरकार की राजनीतिक आलोचना में समस्या नहीं है। किंतु पूरी बहस सामान्य आलोचना ही नहीं विधेयक के विषय वस्तु से भी काफी दूर चला गया था। प्रश्न उठाया जा रहा था कि आखिर 850 सीटों का आपका आधार क्या है? इसी तरह के दक्षिण के राज्यों को इसमें नजरअंदाज किया जा रहा ? बजट सत्र में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेताओं से बातचीत शुरू की तो बताया होगा कि हर राज्य की 50% लोकसभा एवं विधानसभा की सीटें बढ़ाने का फार्मूला तय हुआ है। सोचा गया कि आज परिसीमन हो तो लोकसभा एवं विधानसभाओं की कितनी सीटें बढ़ सकतीं हैं। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर उत्तर प्रदेश की सीट 80 से 120 हो रही है तो तमिलनाडु की 39 से 59। इसी तरह अन्य राज्यों के भी विवरण दिए गए। हंगामा इस पर भी था कि 2011 की जनगणना को आधार क्यों बनाया गया? गृह मंत्री का उत्तर था कि 2011 की जनगणना का आधार बनाते तो तमिलनाडु की सुट केवल 49 होती। यही सच है।

यहां दो बातें समझने की है।  एक, वर्तमान 543 सीटों में 33% आरक्षण क्यों नहीं दिया गया? 2023 में जब विधेयक पारित हुआ तभी उसमें जनगणना और परिसीमन का प्रावधान था। विपक्ष ने विरोध नहीं किया? 1996 से उसके विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि आपसी बातचीत में नेता बोलते थे कि 543 में से 33% महिलाओं को मिल गया तो अनेक पुरुष नेताओं को घर बैठ जाना पड़ेगा और राजनीति का नाश हो जाएगा। पिछड़ों के आरक्षण आदि का बहाना बनाया गया। तो पुराने अनुभवों का ध्यान रखते हुए मोदी सरकार ने रास्ता निकाला कि 543 सीटें जस की तस रहें और बढ़ी 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होश   सहमति हुई तभी 2023 में कानून बन सका। आज यह तर्क देने वाले अपनी सरकारों में इसके लिए तैयार नहीं थे। 1996 में विरोध करने वाले उस संयुक्त मोर्चा सरकार के साथी थे तो 2008 से 2010 तक विरोध करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथी। इनमें समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और कुछ समय तक जनता दल यूनाइटेड अग्रणी रहे। दूसरे दलों के सांसद भी साथ देते रहे। 

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में महिला आरक्षण विधेयक चलाया किंतु आम सभमति नहीं बन सकी। 2010 में राज्यसभा में भाजपा के समर्थन से विधेयक पारित हुआ किंतु उनके साथी दलों ने विरोध किया और लोकसभा में पारित करना मुश्किल था। इस पृष्ठभूमि को जानने वाले यह प्रश्न नहीं उठाएंगे। दूसरे, हर 10 वर्ष पर संविधान लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों के जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रावधान करता है। 1971 तक नियमित होता रहा। 1976 में आपातकाल के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संशोधन कर 2001 तक लोकसभा एवं विधानसभाओं की सीटें न बढ़ाने का प्रावधान कर दिया। इस कारण 1981 और 91 में परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ। 1976 में लगभग 57.5 करोड़ आबादी थी और आज 140 करोड़ से ऊपर। क्या उस आधार पर आज लोकसभा या विधानसभाओं की सीटें होनी चाहिए? 2001 में वाजपेयी सरकार ने भी परिसीमन आयोग तो बनाया लेकिन केवल क्षेत्र का समायोजन हुआ संख्या नहीं बढ़ाई। हर सरकार इस विषय को स्पर्श करने से घबराती रही, क्योंकि दक्षिणी राज्यों की आबादी उत्तर के अनुपात में कम होने के कारण उनको सीटें कम मिलती और विरोध होता।

मोदी सरकार ने उसी का रास्ता निकाला। थोड़े शब्दों में कहें तो अगर दल वाकई महिला आरक्षण के पक्ष में होते तो विरोध जताते हुए कुछ संशोधन डालकर पारित कर देते। सीटों की संख्या की लिखित गारंटी के प्रश्न पर गृह मंत्री ने कहा कि आप विधेयक पारित करते हैं तो हम नया संशोधन सीटों की संख्या डालकर पेश करने को तैयार हैं। वास्तव में यह कहीं पे निशाना कहीं पे निगाहें वाली बात थी। कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों को दिखाना था कि हम संसद में नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित कर सकते हैं। किसी नेता ने महिलाओं को आरक्षण न मिलने पर अफसोस प्रकट नहीं किया। श इसे लोकतंत्र की विजय बताते हुए नए दौर की शुरुआत बताया जा रहा है। प्रियंका वाड्रा ने इसे ऐतिहासिक दिन जताया। थोड़े शब्दों में कहें तो महिलाओं के आरक्षण पर विरोधियों का जो रुख हमने 1996 से देखा लगभग वही अलग रूपों में फिर संसद में था और इसी की परिणति विधेयक के गिरने के रूप में सामने आई।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल-9811027208


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