मंगलवार, 18 नवंबर 2025

मानवता के रक्षक श्री गुरु तेग बहादुर साहिब की शहीदी एवं आध्यात्मिक दर्शन

आचार्य राघवेंद्र पी. तिवारी

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) भारतीय इतिहास के उथल-पुथल वाले कालखंड में अवतरित हुए। औरंगज़ेब के दमनकारी शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्मांतरण ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को खतरे में डाल दिया था। जहाँ मुग़ल साम्राज्य में हिंदुओं का धर्मांतरण व्यापक पैमाने पर हो रहा था, वहीं कश्मीर का मुग़ल गवर्नर अपने बादशाह का कृपापात्र बनने हेतु, धर्मांतरण की नीति को बड़े उत्साह से लागू कर रहा था। परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार हुए। उनके मंदिर तोड़े गए। उन्हें इस्लाम स्वीकारने पर विवश किया गया। कश्मीरी पंडितों ने आनंदपुर साहिब में गुरु साहिब से भेंटकर अपने धर्म एवं आस्था की रक्षा हेतु प्रार्थना की।

असाधारण साहस, करुणा और अंतःकरण की स्वतंत्रता के सार्वभौमिक समर्थक गुरु साहिब ने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक स्वतन्त्रता की रक्षा करने का निर्णय लिया। उन्होंने पंडितों को आश्वासन दिया कि वे दिल्ली जाकर मुगल सम्राट से चर्चा करेंगे। साथ ही पंडितों से कहा कि वे अपने गवर्नर को सूचित करें कि यदि गुरु जी अपना धर्म परिवर्तित कर इस्लाम अपना लेते हैं, तो हम भी इस्लाम धर्म अपना लेंगे, लेकिन यदि वे इसका विरोध करते हैं, तो हमें धार्मिक रूप से स्वतंत्र रखा जाए।

गुरु साहिब के बढ़ते प्रभाव और जनसमर्थन को देखकर मुगल शासन घबरा उठा। दिल्ली यात्रा के दौरान मुगल शासक ने गुरु साहिब एवं उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ने हेतु उन्हें और उनके अनुयायियों को रास्ते भर यातनाएँ दी एवं अपमानित किया। परन्तु गुरु साहिब ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। काजी द्वारा झूठे मुकदमें के दौरान उन्हें धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया गया, जिसे गुरूजी ने दृढतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनके आँखों के समक्ष उनके तीन अनुयायियों, भाई मती दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी को निर्ममतापूर्वक मार दिया गया, फिर भी गुरू साहिब शांतचित्त होकर नाम-स्मरण में लीन रहे।

24 नवंबर, 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में स्वयं उपस्थित होकर गुरु साहिब ने धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा हेतु अपनी शहीदी दी। दृढ़ संकल्प एवं अटूट साहस के माध्यम से उन्होंने भारत की संप्रभुता की रक्षा की और धर्म के शाश्वत आदर्शों को कायम रखा। उनकी इस शहीदी ने भावी पीढ़ियों को भय और व्यक्तिगत सुरक्षा के बजाय विवेक, साहस और नैतिक कर्तव्य को बनाए रखने हेतु प्रेरित कर रही हैं। गुरु साहिब का जीवन इस आदर्श का प्रमाण है कि सच्ची वीरता अस्त्र-शस्त्र, सत्ता या क्रूरता में नहीं, अपितु आत्मविश्वास, बलिदान, नैतिक साहस, न्याय हेतु निडरता से खड़े होने में भी निहित है। इस सर्वोच्च बलिदान हेतु उन्हें ‘हिंद दी चादर’ अर्थात भारत की ढाल की उपाधि से विभूषित किया गया। युद्धकला में निपुण होने के बावजूद, गुरु साहिब का स्वभाव अत्यंत गंभीर, विचारशील, एवं आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख था। उनका साहस एवं वीरता केवल सांसारिक रक्षा के लिए नहीं बल्कि वैराग्य, ध्यान और धर्म के प्रति निष्ठाजनित नैतिक साहस के उच्चतम आदर्श के रूप में भी थी।

गुरु साहिब की शहादत मनुष्य के स्वतंत्र रूप से जीने के सार्वभौमिक अधिकार हेतु दिया गया सर्वोच्च बलिदान है। यह सिखाता है कि दूसरों के स्वतंत्रता की रक्षा करना आध्यात्मिक कर्तव्य का सर्वोच्च रूप है। अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध इस बात का भी प्रमाण था कि धर्म-पालन का विषय साम्राज्यों के अधिकार से परे है। गुरु साहिब ने बलिदान के माध्यम से उद्घोष किया था कि स्वतंत्रता, समानता और मानवीय गरिमा, मन की पवित्रता में अंतर्निहित हैं। उन्होंने जाति, पंथ, लोभ अथवा धन के आधार पर सभी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार किया और संदेश दिया कि ईश्वरीय प्रकाश सभी में विद्यमान है। उनकी शहादत मानवाधिकारों के वैश्विक इतिहास में मील का पत्थर बनकर भावी पीढ़ी को न्याय और स्वतंत्रता के समर्थन हेतु प्रेरित करती रहेगी।

गुरु साहिब आस्था के नैतिक मूल्यों को पुनर्परिभाषित करने हेतु सिख इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने सिख धर्म को न्याय, मानवीय गरिमा एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता हेतु प्रतिबद्धता के रूप में स्थापित किया। उनके बलिदान ने सामूहिक रूप से सिख धर्म के दायरे को  क्षेत्रीय धार्मिक समुदाय से सार्वभौमिक नैतिक धर्म के रूप में स्थापित किया। उन्होंने गुरु अर्जन देव जी की शहादत को सिख धर्म के सार्वभौमिक अंतरात्मा के जीवंत उदाहरण तथा रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे धार्मिक आस्था की रक्षा को नैतिक साहस एवं मानवाधिकारों के प्रतिमान के रूप में पहचान मिली।

गुरु साहिब के आध्यात्मिक योगदान उनके भजनों में परिलक्षित होते हैं। उदाहरणार्थ, वे कहते हैं, “किसी से डरो मत, किसी को भयभीत मत करो; इस प्रकार तुम ज्ञान प्राप्त करोगे” (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1427), जहाँ वे आध्यात्मिक अनुशासन और नैतिक साहस के समन्वय को स्पष्ट करते हैं, संत-सिपाही (संत-सैनिक) आदर्श की रूपरेखा स्थापित करते हैं, और सभी के कल्याण (सरबत दा भला) के लिए कार्य करते हैं। उनकी विरासत व्यापक मानवतावादी चिंतन को आलोकित करती है। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि सच्चा धर्म सभी सांप्रदायिक सीमाओं से परे है। उनके जीवन का संदेश सरल किन्तु शाश्वत है: “दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा उसी प्रकार करो जैसे तुम अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हो; इसी में ईश्वर का सच्चा मार्ग निहित है।”  साथ ही उनके सबद सांसारिक आसक्तियों की अनित्यता पर ज़ोर देते हैं और मानव को अहंकार, लोभ तथा क्षणिक सुखों से ऊपर उठने का आह्वान करते है। इन भजनों से सीख मिलती है कि हर परिस्थिती में समभाव बनाए रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। गुरु जी की आध्यात्मिक दृष्टि विवेकपूर्ण एवं व्यावहारिक है, जो गहन सिमरन (ध्यान) एवं समर्पण (सेवा) के संयोजन पर आधारित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भक्ति का सार मानवता के प्रति करुणा एवं सेवा में ही निहित है।

गुरु साहिब ने सिख धर्म को आध्यात्मिकता से आलोकित किया जो ध्यान, नैतिक सामर्थ्य तथा सार्वभौमिक करुणा पर आधारित है। उनके अनुसार  सच्ची आध्यात्मिकता किसी कर्मकांड, संन्यास में नहीं, बल्कि निडरता, विनम्रता और सांसारिक चुनौतियों के मध्य ईश्वर के स्मरण में निहित है। उन्होंने सिख धर्म को एक सार्वभौमिक दर्शन के रूप में स्थापित किया, जो आंतरिक जागृति, नैतिकता एवं मानवता की सेवा पर केंद्रित है। उन्होंने सीख दी कि आध्यात्मिक बोध और नैतिक साहस सत्य के दो अविभाज्य आयाम हैं।

गुरु साहिब का जीवन और बलिदान न केवल सिख इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, अपितु समूची मानवता के लिए शाश्वत सीख भी हैं। उनकी सीख सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की है। ये ऐसे जीवन मूल्य है जो अशांत एवं संघर्षग्रस्त विश्व में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा सुख भौतिक संपत्ति अथवा क्षणिक सुखों में नहीं, बल्कि सत्य, नि:स्वार्थता और मानव सेवा में निहित है। उनका जीवन प्रेरणा देता है कि कैसे सभी प्राणियों के प्रति गहरी करुणा रखते हुए भी धर्म पर दृढ़ रहा जा सकता है। यह संदेश संस्कृतियों की सीमाओं से परे मानव समाज को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। गुरु साहिब का जीवन हमें विपत्ति में वीरता, शक्ति में करुणा और सेवा में निस्वार्थता की सीख देता है। उनकी विरासत लोगों को स्वतंत्रता, समानता, न्याय और सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय के आदर्शों के लिए जीने हेतु प्रेरणा देती है। उनका साहस और बलिदान मानव समाज का अमर प्रेरणा स्त्रोत रहेगा।  हमेशा स्मरण कराएगा कि वास्तविक शक्ति सत्य और धर्म की रक्षा में निहित है। यह न्याय और करुणा का सार्वभौमिक संदेश है, जो कालातीत है।

(लेखक कुलपतिपंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालयबठिंडा हैं और यह इनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

मुसहर जाति : बिहार के सबसे वंचित समुदाय की सच्चाई

विकास खितौलिया 

भारत एक विविधताओं वाला देश है जहाँ अनेक जातियाँ, धर्म और समुदाय रहते हैं। इनमें से कुछ जातियाँ ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी रहीं। बिहार जैसे राज्य में जहाँ गरीबी और सामाजिक विषमता लंबे समय से बनी हुई है, वहाँ मुसहर जाति सबसे अधिक वंचित समुदायों में गिनी जाती है। मुसहर जाति को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में रखा गया है, परंतु आज भी यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। अस्पृश्यता के कारण जो लोग इनके हाथ का पानी पीना पसंद नहीं करते है, वह इनके हाथों से शराब भी पी लेते है। अन्य समाज की शादी समारोह आदि कार्यक्रमों में इनका जाना वर्जित है। स्वर्ण समाज को तो छोड़िए, अनुसूचित जाति की कुछ जातियां भी इनसे भेदभाव करती है। गरीबी के कारण इस जाति के अधिकांश लोग अवैध रूप से शराब बेचने का कार्य भी करती है, जबकि बिहार में शराब बंद है।

“मुसहर” शब्द की उत्पत्ति “मूस” (चूहा) से मानी जाती है और इसका मतलब है, मुस+हर यानी की मुस को हरने वाला। पुराने समय में यह जाति खेतों में मजदूरी करती थी और अत्यधिक गरीबी के कारण चूहे पकड़कर भोजन के रूप में उपयोग करती थी, यही उनकी पहचान बन गई। सच मानिए तो यह लोग वर्तमान समय से पूर्व 18वीं सदी में जी रहे है, इनके रहन सहन का तरीका सदियों पुराना है इसलिए यह लोग समाज की मुख्यधारा से बिल्कुल कटे हुए है। ये मुख्यतः कृषि मजदूर तो रहे, पर कभी भी लेबर कार्ड जैसी सरकारी सुविधा का लाभ नहीं ले सके और कभी भी इस जाति के लोग भूमि या संपत्ति के मालिक नहीं बन पाए, इस सामाजिक व्यवस्था के कारण ही इन्हें ग़रीबी, अशिक्षा और भेदभाव की गहरी खाई में धकेल दिया है । मुसहर जाति मुख्य रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ हिस्सों में निवास करती है। कुछ जगह इन्हें ऋषिदेव," "सदा," "माझी," "बनबासी," "भुइयां," और "राजावार" जैसे नामों से भी जाना जाता है । अकेले बिहार में इनकी जनसंख्या लगभग 30 से 40 लाख के बीच मानी जाती है और यह बिहार की अनुसूचित जातियों में एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व भी करती है, इस श्रेणी में आने वाली यह तीसरी बड़ी जाति है। आज भी यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। इस जाति की सामाजिक स्थिति आज भी अत्यंत दयनीय है। यह समुदाय प्रायः ग्रामीण इलाकों में “मुसहरी टोला” या “मुसहरी बस्ती” में रहता है, जो प्रायः गाँव के किनारे स्थित होती हैं, जहाँ सुविधाओं का गंभीर अभाव है। ऐतिहासिक रूप से मुसहर जाति को समाज में “अस्पृश्य” माना गया, आज भी इनसे सामाजिक दूरी बनाई जाती है। इनका रहन-सहन समाज के निचले स्तर पर है। इस जाति का सामाजिक बहिष्कार अब भी बना हुआ है इसलिए मंदिरों में प्रवेश न मिलना या सामूहिक आयोजनों में भेदभाव जैसी समस्याएँ आज भी प्रचलित हैं। इसी कारण इस जाति के गाँवों में अलग टोले में रहने के लिए मजबूर है।

स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण के क्षेत्र में भी इनकी स्थिति बेहद खराब है। अधिकांश मुसहर बस्तियों में शुद्ध पानी, शौचालय और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित मात्रा में है । अधिकतर मुसहर परिवार कुपोषण, बीमारियों और अशुद्ध जल के उपयोग से प्रभावित रहते हैं। नशाखोरी, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ गरीबी और अशिक्षा के कारण अब भी आम हैं। जिससे गरीबी पीढ़ी दर पीढ़ी बनती चली जा है। वैसे समाज के कुछ हिस्सों में भले ही स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन व्यापक रूप से यह जाति अब भी सामाजिक मुख्यधारा से बहुत दूर है।

शिक्षा किसी भी समुदाय, समाज के विकास की कुंजी होती है, इसलिए कहा जाता है कि "शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो पियेगा वहीं दहाड़ेगा।" पर मुसहर समाज का इस विषय में अत्यंत चिंताजनक है। मुसहर जाति के लोगों का कहना है कि "खाने को पैसा नहीं पढ़ाई कहां से करे"। बिहार सरकार की रिपोर्टों के अनुसार, मुसहर समुदाय की साक्षरता दर केवल 10–20 प्रतिशत के बीच है, जो राज्य की औसत दर से बहुत कम है। महिलाओं में साक्षरता दर तो और भी कम, लगभग 5 प्रतिशत है। इसका प्रमुख कारण है गरीबी, अभिभावकों की जागरूकता की कमी, बाल श्रम, और विद्यालयों तक पहुँच की समस्या प्रमुख हैं। बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक इन्हीं में देखी जाती है। मुसहर जाति शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक पिछड़ी हुई है। हालाँकि सरकार की कई योजनाएँ लागू हुई जैसे मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, महादलित शिक्षा कार्यक्रम और विद्यालय भोजन योजना से कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन अभी बहुत कोसों दूर है। शिक्षा की कमी के कारण मुसहर समाज आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से आगे नहीं बढ़ पा रहा।

आर्थिक रूप से मुसहर जाति बिहार की सबसे गरीब जातियों में गिनी जाती है। अधिकतर मुसहर भूमिहीन मजदूर हैं इसलिए वे खेतों में मजदूरी, झाड़ू लगाना ईंट-भट्ठों पर काम या अन्य दिहाड़ी कार्य करते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी ये झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं से आंशिक लाभ हुआ है, परंतु नियमित रोजगार नहीं मिल पाता और सरकार तंत्र द्वारा भ्रष्टाचार के कारण इसका लाभ पूरी तरह इनको नहीं मिल पाता।

वैसे मुसहर जाति के उत्थान के लिए 20 वर्षो से अधिक समय से समाजसेवी भीम सिंह भावेश अच्छा कार्य रहे है, उन्हें 25 जनवरी 2025 को महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू जी द्वारा "पदम श्री" सम्मान प्राप्त हुआ है।  राजनीतिक दृष्टि से मुसहर जाति लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति से वंचित रही, इनको कोई बड़ा नेता या राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं रहा। हालांकि मुसहर जाति को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है, पंचायत स्तर पर अब मुसहर समुदाय के कुछ प्रतिनिधि चुने जाने लगे हैं, परंतु राज्य या राष्ट्रीय राजनीति में अब भी इनकी भागीदारी नगण्य है। एनडीए गठबंधन समर्थित नीतीश सरकार ने इन्हें “महादलित वर्ग” में शामिल किया, जिससे कुछ योजनाओं का लाभ इनको मिलने लगा । जिनमें मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग, महादलित विकास मिशन, मुसहर विशेष शिक्षा कार्यक्रम, महादलित आवास योजना, मुसहर बस्तियों में प्राथमिक विद्यालय और आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना करना भी प्रमुख है । हालांकि इन योजनाओं का प्रभाव अभी सीमित है, क्योंकि ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही बड़ी बाधा हैं। अक्सर योजनाओं का लाभ बिचौलियों या अन्य प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रह जाता है इसलिए वर्तमान समय में मुसहर जाति के समग्र विकास के लिए निम्नलिखित ठोस कदम उठाना आवश्यक हैं।

हालांकि सरकार और समाज के प्रयासों से अब कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं, परंतु उचित विकास के लिए आवश्यक है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मान । इन चारों क्षेत्रों में उन्हें समान अवसर देना आवश्यक है।

जब तक मुसहर समाज मुख्यधारा में नहीं आता, तब तक बिहार का सामाजिक विकास अधूरा रहेगा इसलिए मुसहर जाति बिहार की उस सामाजिक सच्चाई का प्रतीक है, जो बताती है कि विकास योजनाओं के बावजूद समाज के निचले तबके तक समान अवसर नहीं पहुँच पाए हैं।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक)

9818270202

दिव्यांग सशक्तिकरण एवं जागरूकता शिविर दो विदसयी सम्पन्न

संवाददाता

नई दिल्ली। विकलांग कल्याण सह शोध समिति (पंजि.), मदनगीर, नई दिल्ली-110062 द्वारा आयोजित दिव्यांग सशक्तिकरण एवं जागरूकता शिविर - दो दिवसीय, F-II, 13, मदनगीर, नई दिल्ली-110062 में हुई, जिसमें क्षेत्र के कई दिव्यांग जन ने शिविर में भाग लिए। जिसमें दिव्यांग जनों के रोजगकार, शिक्षा, स्वास्थ शिक्षा पर बल दिया गया। सरकारी प्रयास एवं योजनाऐं सन्तोष का विषय है कि सरकार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगठन दिव्यांग जनों के सशक्तिकतरण के लिए लगातार प्रयासरत है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम-2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगताओं को मान्यता दी है और उनके अधिकारों को कानूनी रूप दिया है। सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण सुगम भारत अभियान के अंतर्गत भवनों एवं परिवहन प्रणालियों को सुगम बनाना एवं सहायक अंग एवं उपक्रम प्रदान करना ये सभी कदम मील के पत्थर है।

संस्था के अध्यक्ष श्री बौनु साहु जी जो 75% दिव्यांग हैं, ने ऐसे जागरूकता एव सशक्तिकरण योजनाओं और अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ मिलने वाली जानकारी एवं मार्गदर्शन से कई विकलांग व्यक्तियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं। श्री साहु जी ने कहा कि यह एक सामूहिक पहल है, जिसमें सरकार और गैर सरकारी संस्था एवं आम जनों की सहभागी आवश्यक है। आईए. हम सब मिलकर ऐसे समाज का निर्माण करें, जहाँ दिव्यांग जन दया के नहीं, बल्कि सम्मान और समानता के पात्र हों। जहाँ अपनी क्षमताओं को पूरा उपयोग कर सकें एवं समाज एवं राष्ट्र की मुख्य धारा में गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। उनका सशक्तिकरण केवल उनका ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश और समाज का सशक्तिकरण है। मैं एक बार फिर उपस्थित सभी दिव्यांग जनों एवं सहयोगियों को धन्यवाद देता हूँ। संस्था के कानूनी सलाहकार श्री रमेश कुमार (कोली) एडवोकेट ने भी दिव्यांग अधिकार अधिनियम पर विस्तृत जानकारी दिये और ऐसे आयोजनों का अनवृत रूप से करने का निश्चय किया। शिविर में संस्था सदस्य श्री वेदप्रकाश (दिव्यांग), श्री विजय कुमार दिव्यांग 90%, श्रीमती राधाजी दिव्यांग, श्री सुखविन्दर सिंह ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।


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