- गहरे संदेश देने जा रही है ‘उत्तर दा पुत्तर’
विवेक शुक्ला
भारतीय सिनेमा में कॉमेडी फिल्में अक्सर सिर्फ हंसाने का काम करती हैं, लेकिन कभी-कभी वे जीवन के गहरे सवालों को भी छू लेती हैं। उदाहरण के तौर पर, ‘खोसला का घोसला’ संपत्ति और मेहनत की कहानी है, ‘दो दूनी चार’ ईमानदारी के छोटे-छोटे कर्मों की बड़ी जीत दिखाता है। ऐसी ही एक आने वाली फिल्म है ‘उत्तर दा पुत्तर’। इस फिल्म में अनु कपूर मुख्य भूमिका में हैं। यह फिल्म कॉमेडी है, लेकिन इसमें एक गहरा संदेश है कि वास्तु शास्त्र की दिशाओं पर भरोसा करने वाले लोग कर्म पर भी यकीन करें।
‘उत्तर दा पुत्तर’ की कहानी एक फिजिक्स के टीचर के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी जिंदगी तब बदलने लगती है जब वह मान लेता है कि सही दिशा उसकी तकदीर बदल सकती है। फिल्म हास्य और दिल को छूने वाले तरीके से यह दिखाती है कि वास्तु अच्छा है, लेकिन बिना कर्म के कुछ नहीं होता।
भारतीय संस्कृति में कर्म की प्रधानता - भारतीय संस्कृति में कर्म सदैव प्रधान रहा है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को स्पष्ट रूप से कहते हैं- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” अर्थात् तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फलों की चिंता मत करो। यह संदेश स्पष्ट करता है कि भाग्य या दिशाओं से अधिक महत्वपूर्ण है सतत मेहनत और सही कर्म। रामायण में भगवान राम वनवास जाते हैं, लेकिन उनके कर्म, त्याग और धैर्य ने उन्हें विजयी बनाया।
महाभारत में पांडवों ने कठिन परिस्थितियों में भी कर्म के बल पर राज्य प्राप्त किया। गुरु नानक देव जी ने भी कर्म और ईमानदारी पर जोर दिया। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को कर्मयोग का संदेश दिया। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से कर्म की शक्ति से ब्रिटिश साम्राज्य को झुकाया।
दरअसल हमारे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों और महानगरों में बहुत से लोग यह भ्रम पाल बैठे हैं कि वास्तु के हिसाब से घर बनाकर या सजाकर वे दुनिया जीत सकते हैं। वे लाखों रुपये वास्तु कंसल्टेंट को देते हैं, दरवाजों की दिशा बदलवाते हैं, बेडरूम की पोजीशन फेरते हैं और उम्मीद करते हैं कि सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। यह सोच पूरी तरह गलत है। वास्तु सहायक हो सकता है, लेकिन बिना मेहनत, ईमानदारी, निरंतर प्रयास और सकारात्मक कर्म के कोई दिशा जीवन को नहीं बदल सकती। कई उदाहरण हैं जहां वास्तु परफेक्ट घर वाले लोग दिवालिया हो गए, जबकि साधारण घर में रहने वाले लोग कर्म के बल पर सफलता की ऊंचाइयां छू गए। फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ इसी सच्चाई को हल्के-फुल्के अंदाज में याद दिलाती है।
‘उत्तर दा पुत्तर’ के लेखक संदीप कपूर ने वास्तु शास्त्र को नकारने के बजाय उसे कर्म के साथ जोड़ने का सुंदर प्रयास किया है। उनका मानना है कि यह प्राचीन विद्या ऊर्जा के प्रवाह और पर्यावरण के सामंजस्य पर आधारित है, लेकिन इसका असली महत्व तभी उभरता है जब इसे मेहनत और सकारात्मक कर्म के साथ अपनाया जाए। फिल्म ठीक इसी बैलेंस को हास्य के माध्यम से पेश करती है।
मोदी सरकार और वास्तु शास्त्र का प्रभाव - 2014 में मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद भारत की कई नई इमारतों में वास्तु शास्त्र का प्रभाव साफ दिखता है। नई संसद भवन इसका बड़ा उदाहरण है। यह त्रिकोणीय आकार में बना है, जो वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों से मेल खाता है। उद्घाटन के समय वैदिक मंत्रों का जाप हुआ, गणपति होम किया गया और सेंगोल स्थापित किया गया।
नई संसद के अलावा सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत कई इमारतें बन रही हैं या बदली जा रही हैं, जिनमें वास्तु के नियमों का ध्यान रखा गया है। इसमें कमल, बरगद, मोर जैसे भारतीय प्रतीक शामिल हैं।सरकार का मानना है कि ये इमारतें भारत की प्राचीन सभ्यता और आधुनिक महत्वाकांक्षा को जोड़ती हैं।
‘उत्तर दा पुत्तर’ इसी माहौल में आगामी 24 जुलाई को रीलिज हो रही है। फिल्म वास्तु के प्रति सम्मान का भाव रखती है। ये आस्था का मजाक नहीं उड़ाती, बल्कि साफ कहती है कि वास्तु सद्भाव जरूर ला सकता है, लेकिन सच्चा बदलाव हमारे कर्मों से आता है। पर फिल्म का संदेश बेहद गहरा है। संदेश है कि वास्तु पर चलते हुए कर्म के महत्व को इग्नोर करना गलता होगा।
अनु कपूर भारतीय सिनेमा के अनमोल रत्न हैं। उनका सफर 1980 के दशक से शुरू हुआ। उन्होंने श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ (1983) से शुरुआत की। उसके बाद ‘उत्सव’ में मसाजिस्ट का रोल किया, जिसके लिए फिल्मफेयर नॉमिनेशन मिला। ‘खोसला का घोसला’ और ‘डू डूनी चार’ जैसी फिल्मों में उन्होंने साधारण भारतीय की पीड़ा और हंसी को बखूबी जीवंत किया। इस फिल्म में भी उनका कॉमिक टाइमिंग और गहराई दर्शकों को बांधेगी।
एक बात जान लें कि‘उत्तर दा पुत्तर’ जैसी कॉमेडी फिल्में मनोरंजन के साथ गहरे संदेश भी देती हैं। हल्की-फुल्की कहानियों के जरिए वे सामाजिक कुरीतियों, पूर्वाग्रहों और मानवीय कमजोरियों को उजागर करती हैं। चार्ली चैप्लिन की फिल्में पूंजीवाद की क्रूरता पर व्यंग्य करती हैं, जबकि भारतीय सिनेमा में ‘हेरा फेरी’, ‘3 इडियट्स’ और ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ हास्य के माध्यम से दोस्ती, शिक्षा की विसंगतियों और अहिंसा का संदेश देते हैं। ये फिल्में दर्शकों को बिना बोझिल हुए सोचने पर मजबूर करती हैं। हंसी के पर्दे में छिपा सत्य अधिक प्रभावी होता है। आज के तनावपूर्ण युग में कॉमेडी फिल्में न केवल राहत देती हैं, बल्कि समाज सुधार की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
‘उत्तर दा पुत्तर’सिर्फ हंसी-मजाक नहीं है। यह परिवार के साथ देखने लायक है। दिल्ली की शूटिंग, अनु कपूर का कमाल, वास्तु और कर्म का संदेश सब मिलकर इसे खास बनाते हैं। आजकल लोग वास्तु पर किताबें पढ़ते हैं, ऐप्स यूज करते हैं, लेकिन फिल्म याद दिलाती है कि असली ताकत कर्म में है।
मोदी सरकार की इमारतों में वास्तु का प्रभाव दिखाता है कि हम अपनी जड़ों से जुड़ रहे हैं। ‘उत्तर दा पुत्तर’ इसी विचार को मनोरंजक तरीके से सामने लाती है।