गुरुवार, 27 नवंबर 2025

सिमटते गांव चिंता का विषय

बसंत कुमार

पहले यह कहा जाता था कि भारत देश गांवों में बसता है और यदि हम भारत देश की संस्कृति और परम्परा को जानना चहते हैं तो गांवों में जाकर देखें पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और गांव सिकुड़ते जा रहे हैं। आज के चार दशक पहले तक गांवों में गन्ना की बुवाई से लेकर छप्पर उठाने तक के कार्य बिना मजदूरी दिए सहकारिता के आधार पर हो जाते थे पर जब से लोगों का शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है तब से गांव में आदमी न मिलने के कारण गन्ना बोना और छप्पर बनाना ही छोड़ दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 81% आबादी अब शहरों में रहने लगी है और केवल 19% आबादी विशुद्ध रूप से गांवों में बची है।

यह आंकड़ा इस कारण भी चौंकाने वाला इसलिए है कि वर्ष 2018 यानि सात वर्ष पूर्व यह आंकड़ा मात्र 55% था, यूएस की वर्ल्ड आर्गोनाइजेशन प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल शहरी आबादी में से 45% लोग बड़े शहरों में रहते हैं और 36% आबादी कस्बों में रहती है। इस पलायन और विकास के कारण गांवों में मात्र 19% लोग रह गए हैं। अनुमान है कि 2050 तक 83% लोग शहरों में पहुंच जाएंगे। शहरीकरण की यह रफ्तार दर्शाती है कि लोग गांवों की मेहनतकश जिन्दगी को छोड़कर शहरों की आरामतलब जिंदगी जीना चाहते हैं जहां शारीरिक श्रम कम से कम हो और बहुराष्ट्रीय कंपनियां की वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने इस बीमारी को और बढ़ा दिया है। जहां युवा प्रातः उठकर तैयार होकर 5-10 किलोमीटर की दूरी तय करके अपने कार्य स्थल पर जाते थे पर अब तो वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने सुबह उठना तैयार होना सब कुछ बंद कर दिया है। युवाओं की सारी दिनचर्या एक कमरे में कम्प्यूटर के सामने कैद होकर बन्द हो गई है। आर्थिक सुधार युग के पहले यानि 1970 और 1980 के दशक की गांवों की जिंदगी पर निगाह डाले तो पता लगता है कि इस शहरीकरण से जहां हमने सुख-सुविधा के नाम पर बहुत कुछ पाया है वहीं स्वास्थ पर्यावरण और सामाजिकता के मामले में हमने खोया बहुत है, जहां गाय-बैल और अन्य पालतू जानवर हमारे लिए पूंजी होते थे आज मशीन पर आधारित खेती शुरू हो जाने के कारण ये हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। इनके खुला लावारिश घूमने के कारण अब किसान खरीफ और जायद कि फसलें बोना छोड़ चुके हैं और खेती के नाम पर गेहूं और धान की फसल बो रहे हैं और राज्य सरकारों को गौशाला के रखरखाव पर बहुत मोटा फंड देना पड़ रहा है। जो पैसा देश के विकास के लिए लगना चाहिए़ था वो इन चीजों पर लग रहा है।

यदि हम आज के चालीस पचास के गांवों की जिन्दगी देखें तो वहां कृषि स्वाबलंबन पर होती थी। कृषि का मुख्य आधार पशु और श्रम होते थे यदि घर में कोई चीज घट जाए तो बाज़ार भागने के बजाय पड़ोस से मांगकर काम चला लिए जाता था। यद्यपि उस समय माचिस प्रयोग में आ गई थी उसका प्रयोग मन्दिर में दिया जलाने में होने लगा था पर घर का चूल्हे जलाने के लिए बोरसी में 24 घंटे सुलगती आग को ही शुभ माना जाता था और शाम के समय महिलाओं का पड़ोस के घर आग मांगने जाना आम दिन का कार्य होता था। उस बहाने वे 10-15 मिनट बैठकर सारा हाल चाल जान लेती थी और पड़ोस में क्या हो रहा है यह सब पता कर लेती थी। शाम को सारे बड़े लोग एक घर पर अलाव के पास बैठकर रामायण महाभारत के कथानकों के संबंधित कहानियां सुनाया करते और बच्चों का काम बुजुर्गों के लिए तम्बाकू की चिलम भरना होता था उसके बदले में उन्हें किस्से और कहानियां सुनने को मिल जाती थी। आज की तरह मैरिज ब्यूरो नहीं होते थे। लोगों को लड़की-लड़कों की शादी के लिए खोज उनके अलावा या गांव की चौपाल पर पूरी हो जाती थी। अगर गांव में किसी की लड़की की शादी होती थी तो बर्तन और चरपाई के लिए टेंट हाउस के चक्कर लगाने के बजाय गांव में ही आपसी सहयोग से हो जाता था। बारात की स्वागत से लेकर बिदाई तक गांव के युवा एक पैर पर खड़े रहते थे पर आज ये चीजें नदारत हो गई है। आज गांव में भी शहरों की ओर भागने की लालसा ने ये सब छीन लिया है, सामाजिकता का स्थान घर-घर फैले मोबाइल ने छीन लिया है। आज सभी युवा और बड़े शाम होते ही या तो शराब के ठेकों पर मिलते हैं या फिर घरों में कैद होकर मोबाइल पर आंखे गड़ाए रहते हैं। आस-पड़ोस में क्या हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

जब बोर्ड के दसवीं कक्षा के परिणाम आते थे तो गांवों में एक उत्सव का माहौल होता था जब रिजल्ट अखबार में आ जाता था तो कस्बे में रहने वाले अखबार वाले के पास रिजल्ट देखने की लाइन लगाती थी और जो पास हुए वे अड़ोस पड़ोस में लड्डू या बताशे जरूर बांटता था। गांव की अशिक्षित महिलाओं को भी पता लग जाते था कि फलां का बेटा 10वीं पास हो गया है पर आज-कल की चकाचौंध की दुनिया में लोग अपने घर के बच्चों के बारे में भूल जाते हैं कि किस कक्षा में है। बस बच्चों को जुगाड़ लगाकर अच्छे स्कूल में पढ़ा दिया और ट्यूशन लगा दिया जिम्मेदारी खत्म। गांव में किसी के यहां कोई मेहमान आ जाता था तो अड़ोस-पड़ोस इस बात का ध्यान रखते थे कि मेहमान अकेले ही बैठा है पर आज कल यह सामाजिकता गायब है।

आखिर क्या कारण है कि लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं इसका आत्मावलोकन आवश्यक है। आर्थिक सुधार युग और मशीनीकरण के कारण गांवों में परम्परागत रोजगार समाप्त हो गए हैं। आधुनिक मशीनों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले दोना पत्तल, मिट्टी के बर्तन, कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले हल, फावड़ा, कुदाल सभी का उपयोग समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव में बसने वाले लोहार, कोहार, बढ़ई, सुनार, मुसहर, डोम धीमर सभी बेरोजगार हो गए तो उनके लिए शहरों में भागकर लेबर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्पों नहीं बचा था। यद्यपि महानगरों में उनकी जिंदगी नर्क से बेहतर नहीं है। एक-एक कमरे में 10-10 लोगों का रहना। पानी के लिए और नित्य कर्म के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना और 10-12 घंटे की ड्यूटी करना पड़ता है फिर भी वे अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते। इसके अतिरिक्त गांवों में व्याप्त जाति वादी मानसिकता और ऊंच-नीच का भाव भी गांवों से पलायन का कारण है। दलित व उपेक्षित समाज के पढ़े-लिखे युवा गांव की सड़ी गली जाति वादी मानसिकता से पीछा छुड़ाने के लिए शहरों में जाकर अपनी जाति छुपाकर काम करते हैं और इज्जत के साथ गुजर-बसर करते हैं। महानगरों में उनका दलित या पिछड़ा होना उन्हें तंग नहीं करता पर ज्यों वे साल दो साल बाद गांव जाते हैं तो स्टेशन से उतरते ही उनकी जाति उनके पीछे चिपक जाती है और वे गांव वापस जाने के बजाय शहर की नरकीय जिंदगी में वापस चले जाते हैं। यह ऐसी समस्या है जिसके विषय में सरकार और समाज को सोचना होगा।

यदि सरकार शहरों में इस तरह की बढ़ती हुई भीड़ को रोकने का प्रयास नहीं करेगी तो निकट भविष्य में महानगरों सहित अन्य शहर रहने लायक नहीं रह पाएंगे और ये गैस चैंबर के रूप में बदल जाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि गावों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसी चीजें उपलब्ध कराई जाएं। गांवों में महिलाओं की स्वास्थ्य-चिकित्सा एक बड़ी समस्या है, इसके अलावा गांवों में रोजगार की समस्या भी है, सरकार ने गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया पर उसमें भी अभी वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है क्योंकि एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहा है पर भारत में मंडल और कमंडल की राजनीति के चक्कर में युवाओं के रोजगार का मामला गौड़ हो गया है और हर राजनीतिक दल को पार्टी लाइन से हटकर इस समस्या के विषय में सोचना चाहिए।

यदि इस प्रकार से शहरों की ओर पलायन को नहीं रोका गया तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। वहां वायु गुणवत्ता (AQI) 300 से 450 तक पहुंच गया है, जहां लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष करते हैं वहीं प्रशासन को एक्यूआई स्तर को नीचे लाने के लिए सुबह शाम गाड़ियों से पानी का छिड़काव करना पड़ रहा है और लोग सांस संबंधित बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। अब सरकार और सामाजिक संस्थाओं को प्रयास करना होगा कि लोग गांवों की ओर वापस जाएं विशेषकर काम धंधे से रिटायर होने के बाद शहरों में बोझ बनकर जीने के बजाय अपनी मांटी में वापस जाएं और सम्मानपूर्वक अपना बचा खुचा जीवन बिताएं।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

बुधवार, 26 नवंबर 2025

दिल्ली धमाके के आरोपी का वीडियो: आत्मघाती हमले के बचाव की मुस्लिम समुदाय द्वारा कड़ी निंदा

अफ़ीफ़ अहसन

दिल्ली धमाके के आरोपी डॉक्टर उमर नबी का एक वीडियो ऑनलाइन सामने आया है जिसमें वह आत्मघाती हमले का बचाव करते हुए उसे "शहादत की कार्रवाई" (Martyrdom Operation) करार दे रहा है। यह वीडियो बड़े पैमाने पर वायरल हो रहा है, जिस पर मुस्लिम समुदाय और विभिन्न राजनीतिक हस्तियों द्वारा कड़ी निंदा की गई है।

10 नवंबर को लाल किला इलाके में होने वाले धमाके के बाद सामने आने वाले इस खुद के बनाए (Self-made) और बिना तारीख वाले वीडियो में, आतंकवादी मॉड्यूल का मुख्य सदस्य डॉक्टर उमर नबी अपनी विचारधारा के बारे में बात करता नजर आ रहा है। डॉक्टर उमर नबी ने आत्मघाती हमले का बचाव किया और इसे "शहादत का कार्य" बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वीडियो एक कट्टरपंथी (Radicalized) दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसका उद्देश्य दूसरों को प्रभावित करना है।

प्रमुख मुस्लिम हस्तियों और समूहों ने इस वीडियो की व्यापक रूप से आलोचना की है और जोर दिया है कि इस्लाम आत्महत्या और मासूम लोगों की हत्या से मना करता है। असदुद्दीन ओवैसी और इमरान मसूद जैसे नेताओं ने इस कृत्य को "हराम", "गंभीर पाप" और "आतंकवाद" करार देते हुए इसकी निंदा की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि इस तरह के कदम इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं।

सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया में इसी नापसंदगी का इजहार किया गया, जहां आत्महत्या को इस्लाम में एक बड़ा पाप बताया गया और वीडियो के विचारों को चरमपंथी विचारधारा से जोड़ा गया। मुस्लिम समुदाय का सर्वसम्मत फैसला वीडियो में दिखाए गए चरमपंथी विचारों को स्पष्ट रूप से खारिज करना और उनसे खुद को अलग करना है, क्योंकि यह बुनियादी इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ हैं।

आत्मघाती हमलावर डॉक्टर उमर नबी अपने घिनौने कृत्यों और हिंसा पर आधारित अपने चरमपंथी विचारों को सही ठहराने के लिए इस्लाम की अपनी व्याख्या और जिसे वह "शरई" सिद्धांत कहता है, का सहारा लेता है। उमर नबी का तर्क मुख्य इस्लामी दृष्टिकोण के विपरीत है। लगातार उलेमा ने बयान दिया है कि इस्लाम में किसी भी बेगुनाह व्यक्ति की हत्या या हिंसा फैलाना सख्ती से मना (हराम) है। आतंकवादी गतिविधियों की धर्म में कोई जगह नहीं है। इस संबंध में कुरान का हवाला दिया जाता है जिसमें कहा गया है कि "एक बेगुनाह इंसान की हत्या पूरी मानवता की हत्या के बराबर है।"

कुरान करीम स्पष्ट रूप से खुद को हलाक (नष्ट) करने से मना करता है। सूरह अन-निसा (4) की आयत 29 में इरशाद है कि:  "ऐ ईमान वालों! आपस में एक-दूसरे का माल नाहक मत खाओ, सिवाय इसके कि वह आपसी रजामंदी से व्यापार के जरिए हो। और अपने आप को [या एक-दूसरे को] कत्ल मत करो। बेशक अल्लाह तुम पर बहुत मेहरबान है।"

सूरह अल-अन'आम (6) की आयत 151 में इरशाद (फरमान) है कि: "...और उस जान को मत मारो जिसे अल्लाह ने हराम ठहराया है सिवाय हक के साथ [यानी न्याय के तकाजों के अनुसार]। ये तुम्हारे लिए उसके आदेश हैं ताकि तुम समझ सको।"

सूरह बनी इसराइल (17) की आयत 33 में आदेश है कि: "और किसी भी जान को नाहक (अन्यायपूर्वक) मत मारो जिसे अल्लाह ने हराम ठहराया है, सिवाय हक के साथ [यानी न्याय के तकाजों के अनुसार]।"

सूरह अल-बकरा (2) की आयत 195 में अल्लाह फरमाता है कि: "और अल्लाह की राह में खर्च करो और अपने ही हाथों अपने आप को हलाकत (विनाश) में मत डालो [यानी कंजूसी करके]। और नेकी करो; बेशक अल्लाह नेकी करने वालों को पसंद करता है।"

ये आयतें मुस्लिम विद्वानों और संगठनों की ओर से आतंकवाद और आत्मघाती बमबारी की निंदा करने के लिए पेश की जाती हैं, जिन्हें एक बड़े गुनाह (पाप) और इस्लामी शिक्षाओं से भटकाव (विचलन) माना जाता है।

आत्मघाती हमलावर यह दलील देते हैं कि वे शहीद का दर्जा हासिल करते हैं, जबकि यह आत्महत्या है। वे अपनी जान खुद लेते हैं, जिसे अल्लाह ने मना किया है और जो एक बहुत बड़ा पाप है। जीवन अल्लाह की नेमत है और उसी के अनुसार हमें अपना जीवन गुजारना है।

अपने पाप को अंजाम देने के लिए वे कहते हैं कि वे 'कुफ्फार' (काफिरों) से लड़ रहे हैं। इसे जायज ठहराने के लिए वे किसी को भी काफिर करार दे देते हैं, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, यहां तक कि वे अपने मकसद के लिए मुसलमानों को भी काफिर कह देते हैं।  परंतु उनका सारा जुल्म मासूम और निहत्थों पर उतरता है। वे गैर-लड़ाकों (Non-combatants) जैसे औरतों, बच्चों और बुजुर्गों को मार रहे होते हैं, जिससे पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) ने सख्त मना फरमाया है। वे सोचते हैं कि आम नागरिक 'Collateral Damage' हैं, जबकि वे उन्हें जानबूझ कर निशाना बनाते हैं। 'ततर्रुस' (युद्ध के दौरान नागरिकों का अनैच्छिक नुकसान) का नियम हालिया लाल किला हमले जैसे घिनौने कृत्य पर लागू नहीं हो सकता, जिसमें बिना किसी भेदभाव के सभी मासूम लोग मारे गए। ये लोग मानते हैं कि उनका तथाकथित मकसद ही उनके साधनों को सही ठहराता है (The end justifies the means)। जबकि इस्लाम में साधनों का भी उतना ही पवित्र होना जरूरी है जितना कि मकसद का। ये लोग अल्लाह की नाफरमानी करके (बेगुनाहों को मारकर) उसकी इताअत (आज्ञापालन) नहीं कर सकते।

उमर नबी और उसके जैसे आतंकवादी साफ तौर पर "जैश" जैसे आतंकवादी संगठनों की सोच के प्रतीक हैं। इस वीडियो से साफ पता चलता है कि इस आत्मघाती हमले में पाकिस्तान में बैठे हुए "जैश" के आतंकवादियों का हाथ है और वही इस आतंकवादी मॉड्यूल के ब्रेनवॉशिंग (Indoctrination), और आर्थिक व नैतिक समर्थन के साथ-साथ सशस्त्र समर्थन भी कर रहे हैं। इस आतंकवादी संगठन का मकसद केवल और केवल भारत जैसे बहुआयामी और शांतिपूर्ण देश में कानून-व्यवस्था को बिगाड़ना और धार्मिक नफरत फैलाने के अलावा कुछ भी नहीं है।

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रविवार, 23 नवंबर 2025

विवाह पंचमी: मर्यादा, समर्पण और संस्कारों की अमर प्रेरणा

 आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

भारतीय संस्कृति सिखाती है कि नित्य कर्म यदि चेतना, श्रद्धा और कर्तव्य भावना के साथ किये जाए, तो वह संस्कार बन जाते हैं। सोलह संस्कारों के साथ ही हम जीवन के प्रत्येक कर्म यथा स्नान, भोजन, शयन, जागरण, कृषि कार्य का आरंभ एवं समापन आदि को भी संस्कार ही मानते हैं। इन कार्यों को पूजा-अर्चना एवं श्रद्धा के साथ करते हैं। यही जीवन दृष्टि हमारी संस्कृति को अतिविशिष्ट बनाती है। संस्कार का अर्थ है- शुद्धिकरण, परिष्कार, सुधार, सभ्य या पवित्र बनाने की क्रिया, अर्थात् अच्छे कर्मों द्वारा मन, वचन एवं शरीर का परिष्कार करना। इसी वजह से संस्कार शब्द का प्रयोग चरित्र, आचरण और जीवन की पवित्रता के संदर्भ में भी किया जाता है।

इसी श्रृंखला में हमारी संस्कृति में विवाह पंचमी का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। यह पावन पर्व भगवान श्रीराम और माता सीता के दिव्य विवाह की स्मृति में प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह तिथि 25 नवम्बर को है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण ही नहीं, अपितु धर्म, प्रेम और मर्यादा के शाश्वत मूल्यों के समन्वय का उत्सव है।

अयोध्या और जनकपुर की संयुक्त आस्था - इस दिन भक्तगण व्रत-उपवास रखते हैं, घरों और मंदिरों में मंडप सजाए जाते हैं। कलश स्थापना, दीप प्रज्वलन, भजन-संध्या और रामायण पाठ  का आयोजन होता है। विवाहित दंपती इस दिन अपने मंगलमय दांपत्य जीवन के लिए विशेष रूप से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

यह पर्व भारत और नेपाल के मध्य सांस्कृतिक एकता और सांझी आस्था का भी प्रतीक है। जनकपुर (अब नेपाल में), जिसे माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है, में इस पावन अवसर पर विशालविवाह पंचमी मेला’ का आयोजन होता है। वहाँ राम जानकी मंदिर  में श्रीराम और सीता का प्रतीकात्मक विवाह संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। वहीं अयोध्या में कनक भवन  और अन्य मंदिरों में भक्तगण विशेष पूजन-अर्चना करते हैं और सीयावर रामचंद्र जी की जय”  के उद्घोष से सम्पूर्ण नगरी गुंजायमान हो उठती है। दीपों की ज्योति से नगर प्रकाशित हो जाता है। तब विवाह पंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि प्रेम, आध्यात्म और मर्यादा ही जीवन का सच्चा आधार हैं।

आदर्श दांपत्य जीवन की प्रेरणा - विवाह पंचमी हमें दाम्पत्य जीवन के उस स्वरूप की याद दिलाती है, जिसमें प्रेम के साथ मर्यादा, त्याग, और परस्पर सम्मान निहित है। वर्तमान समय में, जब वैवाहिक जीवन में अस्थिरता और स्वार्थ की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं साथ ही वैवाहिक जीवन की पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं, इस परिस्थिति में श्रीराम और सीता का आदर्श यह सिखाता है कि सच्चा दाम्पत्य जीवन परस्पर सहयोग, विश्वास, कर्तव्य एवं त्याग पर आधारित होता है, न कि भौतिक आकर्षण पर। कुल-परिवार एवं समाज का हित व्यक्तिगत हित से ऊपर होता है। ‘मैं’ आधारित सोच एवं स्वयं की सुख-सुविधा नहीं अपितु ‘हम’ की भावना एवं सामाजिक धारणाओं का सम्मान ही वैवाहिक जीवन की धुरी होती है। यह सन्देश देती है कि वैवाहिक जीवन मात्र भौतिक संबंध नहीं, अपितु दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन है, जो धर्म और कर्तव्य से जुड़ा होता है। माता सीता का भगवान राम के साथ वनवास जाने, दर-दर विचरण करने एवं उनके इशारे पर अयोध्या छोड़ने का निर्णय इन्हीं भावनाओं के ज्वलंत उदाहरण हैं।

वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ पुराणों में विशेषकर पद्म पुराण तथा विभिन्न कथा-साहित्य में श्रीराम-सीता विवाह का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण के "पातालखण्ड" में सीता-राम विवाह प्रसंग को धार्मिक, सांस्कृतिक और लोकमर्यादा का आदर्श बताया गया है। इसमें सीता स्वयंवर, शिव धनुष को भंग करना और विवाह की पद्धति को अत्यंत दिव्य और प्रेरक कहकर, संपूर्ण समाज के लिए मर्यादा एवं संस्कारों की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।​ यह प्रसंग इस बात की पुष्टि करता है कि विवाह पंचमी अकेले प्रेम या युगल-मिलन का पर्व नहीं, अपितु मर्यादा, समर्पण और सत्कार्यों की परंपरा का अमर प्रतीक है, जिसमें कर्तव्य, अनुशासन एवं संस्कारों का सर्वोच्चतम स्थान है। यह पर्व हमें पुराणकालीन धार्मिक आदर्शों से जोड़ते हुए समाज को संस्कारशील बनाता है।

संस्कृति का संरक्षण एवं नारी सामान का वैश्विक सन्देश - आधुनिक युग में जब पश्चिमी प्रभावों के कारण सनातनी परंपराएँ क्षीण होती जा रही हैं, यह पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है। विवाह पंचमी भारतीय समाज में संस्कार, धर्म और कर्तव्य की भावना को सुदृढ़ करने का माध्यम बनती है। माता सीता के जीवन से समाज यह सीखता है कि नारी शक्ति, धैर्य, और गरिमा की प्रतीक है। आज जब विश्वभर में महिला सशक्तीकरण की चर्चा होती है, तब माता सीता के वैवाहिक जीवन के आदर्श हमें यह बताते हैं कि ढाढस, सौम्यता एवं साहस का अद्भुत संगम नारी के व्यक्तित्व में ही फूलता-फलता है।

सामाजिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्त्रोत - विवाह पंचमी का पर्व सामूहिक उत्सव का प्रतीक है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, रामायण पाठ और शोभायात्राएँ लोगों के बीच सामाजिक सौहार्द और धार्मिक आस्था का वातावरण निर्मित करती हैं। यह पर्व परिवार और समाज में सम्मान, समर्पण और संतुलन के मूल्यों को सुदृढ़ करता है। आज के बदलते सामाजिक परिवेश में यह पर्व हमें संस्कारों, निष्ठा और मर्यादा में निहित अनंत आध्यात्मिक ऊर्जा का स्मरण कराता है।

आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण के बालकाण्ड में सीता द्वारा श्रीराम का दाहिना हाथ अपने बाएं हाथ में लेने की क्रिया का पाणिग्रहण संस्कार के रूप में वर्णन है, जो विवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संस्कार केवल एक सामाजिक रीति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और मानसिक समर्पण का प्रतीक है। इस संस्कार के माध्यम से वर और वधू एक-दूसरे के जीवन में पूर्ण समर्थन और साथ चलने का संकल्प लेते हैं। पाणिग्रहण का अर्थ है हाथ का ग्रहण, जो मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। यह क्रिया वर वधू के बीच विश्वास, प्रेम, और जिम्मेदारी की नींव रखती है, जो उनके वैवाहिक जीवन को सुदृढ़ और स्थायी बनाती है। पाणिग्रहण संस्कार से दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जीवन की खुशियों और कठिनाइयों में संयुक्त रूप से आगे बढ़ने का एक-दूसरे को वचन देते हैं।

निष्कर्ष - विवाह पंचमी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी त्रेता युग में थी। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चा सुख, मर्यादा, प्रेम, निष्ठा और कर्तव्यपालन में निहित है। श्रीराम और सीता के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपने परिवार और समाज को संस्कारवान बना सकते हैं। वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो टूटते हुए परिवारों को बचा सकते हैं। भगवान श्रीराम और माता सीता के आदर्श विवाह का यह पर्व आज के बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का संदेश देता है। यही इसकी वास्तविक सीख एवं  शाश्वत महत्त्व है। महाकवि तुलसीदस ने ठीक ही कहा है, सिय राम मय सब जग जानी।

(लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

दिव्याग सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान

संवाददाता

नई दिल्ली। आज दिनाक 23-11-2005 को विकलांग कल्याण सह शोध समिति (रजि.) मदनगीर, नई दिल्ली-110042 द्वारा आयोजित दिव्याम सशक्तिकरण एवं जागरूकता अभियान नाटी गाईना बारात घर नई दिल्ली-110074 में हुई जिसमें क्षेत्र के कई दिव्यांगजन ने अभियान में भाग लिए। जिसमें दिव्या जनी के रोजगार शिक्षा स्वास्थ शिक्षा पर बल दिया गया। सरकारी प्रयास एवं योजनाएं सन्तोष का विषय है कि सरकार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संगतन दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण के लिए लगातार प्रयासरत है। दिव्यांग अधिकार अधिनियम-2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगताओं की मान्यता दी है और उनके अधिकारों को कानूनी रूप दिया है। सरकारी नौकरी और शिक्षण सस्थानों में आरक्षण सुगम मारत अभियान के अंतर्गत भवनों एवं परिवहन प्रणालियों को सुगम बनाना एवं सहायक अम एव उपक्रम प्रदान करना वे सभी कदम मील के पत्थर है। दिव्याग जनों के UDID Card के बारे में भी जानकारी दी।

सस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बौनु साहु जी जो 75% दिव्याग है. ने ऐसे जागरूकता एब सशक्तिकरण योजनाओं और अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यहाँ मिलने वाली जानकारी एवं मार्गदर्शन से कई  विकलांग नातियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तनसाहुजी ने कहा कि यह एक सकिने सरकार और गैरसरकारीसम निर्माण करे दिव्याजदरता के पात्र हज अपनी क्षमताओं को पूरा धारा में गरिमापूर्ण जीवन जी सके और दिव्यांगों के लिए दिव्याक समूहका निर्माण एवं कौशल प्रशिक्षण पर विस्तृत जानकारीका सशक्तिकरण केवल उनकी नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश और समाज को सशक्तिकर है। वे एक बार फिर उपस्थित सभी दिव्यामजनों एवं सहयोगियों को धन्यवाद देता है। सस्था के कानूनी सलाहकार श्री रमेश कुमार (कोली) ने भी दिव्यान अधिकार अधिनियम पर विस्तृत जानकारी दिये और श्री रमेश कुमार (कोली) जी ने महात्मा गांधी का रूप धारण करके उपस्थित सभी व्यक्तियों को सम्बोधन किया तथा ऐसे आयोजनों का अनवृत रूप से करने का निश्चय किया। शिविर में सरथा सदस्य श्री विजय कुमार दिव्यांग 90%, श्री सुखविन्दर सिंह तथा माटी गाईन्स क्षेत्र के दिव्याज जन में मुख्य रूप से सुश्री सीताजी श्री नन्दलाल जी. श्री किशोरीलाल जी. श्री बलवीर सिंह, श्री बीडो जी. राजेंवाई जी, शीला जी ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।

शनिवार, 22 नवंबर 2025

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करता पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध

कर्नल शिवदान सिंह

जब कोई देश अपने दुश्मन देश सेआमने-सामने के युद्ध में नहीं जीत पता है तो वह फिर परोक्ष युद्ध का सहारा लेता है जैसे कि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध कर रहा है क्योंकि भारत से1947 से लेकर अब तक वह चार युद्ध हार चुका है इसलिए अब उसने परोक्ष युद्ध का सहारा लेने का निर्णय लिया है। यह युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता है बल्कि देश के आंतरिक हिस्सों में आंतरिक सुरक्षा पर हमले के रूप में लड़ा जाता है। देश की सामाजिक, आर्थिक और कानून व्यवस्था आंतरिक सुरक्षा के मुख्य हिस्से होते हैं। इसलिए पाकिस्तान 80 के दशक से ही हमारे देश के विभिन्न राज्यों जैसे पहले पंजाब मेंऔर बाद में कश्मीर राज्य में धार्मिक कट्टरपंथी सोच का प्रचार करके वहां परआतंकवाद को बढ़ावा दिया किया है। इन राज्यों में सांप्रदायिक तनाव के द्वारा वह पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करके कानून व्यवस्था को बर्बाद करना चाह रहा था। इसी क्रम में अभी दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले पर धमाके के पीछे यही मुख्य कारण था। इस धमाके के पीछे के रहस्य की परते खुलने पर पता लग रहा है कि आतंकियों का इरादा दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर और इसी प्रकार के देश के 37 प्रसिद्ध स्थान पर विस्फोट करकेसांप्रदायिक तनाव पैदा करके दंगे करवाना था। जिससे विश्व को दिखाया जा सके की भारत में कितनी अशांति है और इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को गिराया जा सके। परंतु हमारे देश की सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी चौकसी एवं कर्तव्य निष्ठा से इनके इरादों को नाकाम कर दिया।

80 के दशक में रूसी सेना के द्वारा अफगानिस्तान में कब्जे के बाद अमेरिका ने इसे दक्षिण एशिया में अपने लिए चुनौती माना। इसके बाद अमेरिका ने रूसी सेना को वहां से हटाने के लिए पाकिस्तान को अपना मोहरा बनाते हुए उसकेमदरसो में पढ़ने वाले जवानों को तालिबान बनाकर अफगानिस्तान मेंछापा मार युद्ध के लिए भेजना शुरू कर दिया। इसके लिए अमेरिका की सी आइ ए ने पाकिस्तान की आइ ईस आइ को इस प्रकार केऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित किया। अमेरिका के इस ऑपरेशन मेंअफगानिस्तान के लोग भी शामिल थे। जिन्हें अफगानिस्तान में रूसी सेना केहर ठिकाने की पूरी जानकारी थी। इस प्रकार के छापामार युद्ध के आगे रुसी सेना ज्यादा देर टिक नहीं पाई और वह वापस चली गई। इसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान की पीठ थपथपाई और उसे इसी प्रकार चीन के विरुद्ध भी इस्तेमाल किया। इसके लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को बहुत सी आर्थिक सहायता दी। इस प्रकार आतंकवादको कमाई का जरिया बनाते हुए पाकिस्तान ने इसको राष्ट्रीय नीति के रूप में अपना लिया। इस कारण तरह - तरह के आतंकी संगठन जैसे लश्कर ए तोयबा जैसे मोहम्मद इत्यादि वहां पर बन गए। जिन्हें वहां पर खुलेआम अपनी गतिविधि चलाने की पुरी छूट मिल गई। इसलिए पाकिस्तान के जिन नौजवानों को देश की आर्थिक प्रगति में सहयोग करना चाहिए था वह आतंकी बन गए। इस करण पाकिस्तान ना तो औद्योगिक क्षेत्र मेंकोई प्रगति की और ना ही पाकिस्तान में विदेशी निवेश आया इस कारण आज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का यह हाल है।

किसी भी देश में देश विरोधी आतंकी गतिविधि चलाने के लिए पहले वहां पर ऐसे कारण तैयार किए जाते हैं जिनके द्वारा वहां की जनता को दिगभ्रमित किया जा सकेऔर इसके द्वारा वहां के कुछ तत्वों को देश विरोधी गतिविधियों में लगाया जा सके। इसके लिए उसने सर्वप्रथम पाकिस्तान से सीमा लगने वाले पंजाब को अपना निशाना बनाया। पंजाब में सिखों में असंतोष फैलाने के लिए उसने उन्हें अलग खालिस्तान बनाने के लिए प्रेरित करने के लिएअपने रेडियो तथा टेलीविजन द्वारा इसका दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया। उसने पंजाब के सिखों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि भारत में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें अपना अलग देश खालिस्तान बनाना चाहिए। इस सोच को आगे बढ़ाने के लिए उसने पहले कुछ सफेद पोश लोगों को इसके प्रचार के लिए तैयार किया जिनमे संत जरनेलसिंह भिंडर वाले का नाम प्रमुख है  जिन्होंने वहां के कुछ नौजवानों को पंजाब में खालिस्तान के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने के लिए अपने आतंकवादियों के द्वारा हिंसा करवानी शुरू की। इसमें इनका मुख्य निशाना हिंदू आबादी होती थी। इन आतंकियों को ट्रेनिंग देने के लिए उसने पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र में इनके ट्रेनिंग कैंप स्थापित किये। आखिर मेंपंजाब की राष्ट्रवादी जनता के सहयोग से पाकिस्तान के इस नापाक इरादे को भारत ने कुचल दिया तथा पंजाब दोबारा देश का प्रगतिशील प्रदेश बन गया। इसके बाद पाकिस्तान की आइ एस आइ ने यही हरकत 90 के दशक में कश्मीर में शुरू की और वहां परदुष्प्रचार करना शुरू किया कि भारत में मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित नहीं है इसलिए कश्मीर को आजादी चाहिए। इसके लिए उसने वहां के नौजवानों को आतंकवादी बनाने के लिए उनकी सोच को कट्टरवादी बनाने के लिए मुस्लिम कट्टरपन को बढ़ावा वहां के कुछ मौलवियों से दिलवाना शुरू किया तथा वहां के कुछ नौजवानों को पाक अधिकृत कश्मीर में ले जाकर उन्हें आतंकवाद की ट्रेनिंग देकर अपने देश के आतंकियों के साथ कश्मीर में भेजकर उनसे हिंदुओं पर आतंकवादी हमले करवाए। 

इसके फलस्वरूप वहां के तीन लाख कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से विस्थापन पलायन करना पड़ा। इस सबके लिएआतंकवाद को बढ़ावा देने वाले ओवर ग्राउंड काम करने वाले स्थानीय एजेंट को को वहां पर लागू धारा 370 से मदद मिल रही थी। इसके कारण कश्मीर की जनता अपने आप को काफी प्रताड़ित महसूस कर रही थी। इसको देखते हुए भारत सरकार ने कश्मीर में अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए वहां पर लागू धारा 370 को हटाकर वहां पर भारत का संविधान लागू किया जिससे आतंकवाद को समर्थन देने वालेतत्वों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जा सके। इस प्रकार कश्मीर में पंजाब की तरह आतंकवाद को खत्म किया गया। आज जम्मू कश्मीर राज्य विकास के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।देश विरोधीआतंकवाद को देश के अंदर चलाने के लिए तीन तत्व मुख्य भूमिका निभाते हैं। पहले धार्मिक कट्टरपन कोबढ़ावा देने वाले तत्व तथा आतंकवाद के साथ सहानुभूति रखने वाले ,दूसरे उनके लिए धन एकत्रित करने वाले तथा इन आतंकी तत्वों के रहन-सहन का इंतजाम करने वाले तथा कट्टरपन की सोच को बढ़ाने वाले जिन्हें ओवर ग्राउंड वर्कर या सफेद पोश भी कहा जाता है। इस प्रकार इन तीनों तत्वों के सहयोग से आतंकी तैयार होते हैं जो देश में हिंसा फैलाने के लिए बेगुनाह लोगों पर हमले तथा सार्वजनिक स्थानों जैसे लाल किला इत्यादि पर हमला करके देश में आप शिक्षा असुरक्षा कथा सांप्रदायिक तनाव की भावना पैदा करते हैं। इससे देश की देश की आंतरिक सुरक्षा नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। परंतु अक्सर वोट बैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारे देशद्रोही तत्वों और उनके द्वारा फैलाई जा रहे हैं दुष्प्रचार की अनदेखी करती हैं जिसके कारणदेश में अस्थिरता फैलती है जैसा की उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के रूप में देखने में आया था।

उपरोक्त को देखते हुए देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति देश के हर नागरिक को भी उतना ही जागरूक रहना चाहिए जितना की सुरक्षा एजेंसी रहती है। फरीदाबाद की यूनिवर्सिटी में पिछले काफी दिनों से उसके अध्यक्ष की मंजूरी और उसके डॉक्टर उमर जैसे देश विरोधी तत्व अपनी गतिविधियां चला रहे थे। परंतु लाल किले के धमाके तक किसी भी सुरक्षा एजेंसी कोइस यूनिवर्सिटी के अंदरचल रही इन देश विरोधी गतिविधियों के बारे में कोई सूचना नहीं मिली। इसको देखते हुए सामरिक दृष्टि से इन जमीन की सतह के ऊपर सफेद पोश देशद्रोहियों और इन गतिविधियों के लिए धन देने वालों केविरुद्ध भी आतंकियों जैसी कार्रवाई करते हुए उन्हें कानून के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जहां से इन्हें कड़ी सजा दिलवानी चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर जिसमें एनआईए, आईबी और राज्यों की एटीएस के प्रतिनिधियों के साथ एक कमेटी स्थापित की जानी चाहिए जिससे पूरे देश में इस प्रकार की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर शीघ्रता से कार्रवाई की जा सके। इसके साथ ही कट्टरपंथी दुष्प्रचार को रोकने के लिए संप्रदाय विशेष के उदारवादी लोगों तथा उनके समाजसेवी और शिक्षा विदों का सहयोग लिया जाना चाहिए जो अपने समाज की सोच को धार्मिक कट्टरपन और देश विरोधी सोच से बदलकर इसे राष्ट्रवादी बना सकें। इसके बाद जिस प्रकार सरकार ने छत्तीसगढ़ में समर्पण किये नक्सली और माओवादियों का पुनर्वास किया हैऔर उन्हें देश की सकारात्मक गतिविधियों में लगाया है उसी प्रकार मुस्लिम समाज के उन युवाओं का पुनर्वास किया जाना चाहिए जो कट्टरपन से दिग्ग्रहित होकर देश विरोधी गतिविधियों मेंलग गए हैं।

जिस प्रकार भारतीय सेना का हर सैनिक सीमाओं की सुरक्षा में तैनात रहता है। उसी प्रकार देश के हर नागरिक को देश की आंतरिक सुरक्षा में तैनात रहना चाहिएम।और जहां भी किसी देश विरोधी गतिविधि की शंका हो उसकी सूचना फौरन सुरक्षा एजेंसी को दी जानी चाहिए जिससे वह समय पर कार्रवाई करके इन तत्वों को समाप्त कर सकें।

 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

अपराध के अनुपात से ज़्यादा सजा अनुचित और अनैतिक

बसंत कुमार

प्रायः हम सुनते रहते हैं कि जस्टिस डिलेयड इस जस्टिस डिनाइड, पर जब एक व्यक्ति को मात्र 100 रूपये की रिश्वत के आरोप में लगातार 39 वर्षों तक यातनाएं झेलनी पड़े और 39 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद 84 वर्ष की आयु में न्याय मिले तो प्रश्न यह उठता है कि क्या अब हमारी न्यायिक प्रणाली पर विचार किया जाना चाहिए। अभी एक मामले में एक सरकारी कर्मचारी को 1986 में 100 रुपए की रिश्वत के आरोप में गिरफ्तार किया गया। एक साल की सजा हुई, 15 साल निलंबित रहे फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिए गए। समाज में रिश्वतखोर की जिल्लत झेली, दवा के अभाव में पत्नी की मृत्यु हो गई। परिवार बिखर गया और अब बाइज्जत बरी हो गए तो क्या कोई भी न्यायालय उनके 39 वर्ष लौटा पाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे न्यायालयों की कार्य प्रणाली पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है।

अविभाजित मध्य प्रदेश के स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन में लिपिक के रूप में काम करने वाले जागेश्वर प्रसाद अवधिया को 1986 में मात्र 100 रु. रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था, अब उन्हें 39 वर्ष की कानूनी लड़ाई के बाद बाइज्जत बरी कर दिया गया। 84 वर्ष की आयु में न्यायालय से मिली इस राहत पर जागेश्वर प्रसाद अवधिया कहते हैं कि अब मेरे लिए इस फैसले का कोई महत्व नहीं रह गया है। इस केस के कारण मुझे जेल हुई, नौकरी चली गई समाज ने मेरा बहिष्कार कर दिया। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। बच्चों की शादी नहीं कर पाया। इलाज के अभाव में मेरी पत्नी की मौत हो गई। अब बस मैं अकेला बचा हूं। क्या इस फैसले के बाद कोई मेरे बीते हुए दिन लौटा सकता है। जब मैं चिल्ला चिल्लाकर कहता था कि मैं बेकसूर हूं मुझे साजिश के तहत फंसाया गया है पर कोई विश्वास नहीं करता था।

जागेश्वर के 52 वर्षीय बेटे नीरज ने बताया कि उस वक्त मेरी उम्र 13 वर्ष थी हमें यह पता नहीं था कि रिश्वत क्या होती है लेकिन लोग मुझे कहते थे कि रिश्वतखोर का बेटा है। बच्चे चिढ़ाते थे और स्कूल में कोई बच्चा हमसे कोई दोस्ती नहीं करना चाहता था। मोहल्ले में हमारे लिए लोगों के दरवाजे बंद हो गए और रिश्तेदारों ने संपर्क बंद कर दिया था। हमें दुख है कि जब पिताजी गिरफ्तार हुए मैं 13 वर्ष का था पर पिताजी की लड़ाई में हमारा सारा बचपन अदालत की सीढ़ियों में छूट गया।

1986 में जागेश्वर की गिरफ्तारी के दो वर्ष बाद 1988 में अदालत में चार्ज शीट दाखिल होते ही उसे नौकरी से निलंबित कर दिया गया और वे दशकों तक निलंबित रहे और 50% गुजारा भत्ता से उनका गुजारा मुश्किल हो गया था। इलाज के अभाव में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। एक-एक करके उसके चारों बच्चों की पढ़ाई छूट गई। 16 वर्ष के ट्रायल के बाद वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी करार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि ट्रायल कोर्ट के फैसले के विरुद्ध उनकी अपील पर फैसला आने से पहले ही उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया और सरकारी मकान खाली कराने के साथ-साथ सरकारी चिकित्सा सुविधाएं भी बंद कर दी गईं।

यह मामला सिर्फ जगेश्वर का ही नहीं है यह हाल छोटे-मोटे आरोपों में पकड़े गए सभी निम्न कोटि के कर्मचारियों का है। जागेश्वर प्रसाद की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है अपितु यह हमारी न्याय व्यवस्था के उस चेहरे को उजागर करती है जो न्याय की देरी को अन्याय मानता है, किसी की जवानी अदालत में गुजर जाती है और जब फैसला आता है तब तक उसका सब कुछ समाप्त हो चुका होता है। अदालतों में ट्रायल 20 वर्ष और अपीलीय न्यायालय में अगले 20 वर्ष लग जाते हैं तो व्यक्ति के जीवन के कितने वर्ष बचते हैं यह विचारणीय प्रश्न है। कुछ वर्ष पूर्व एक खबर छपी थी कि उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में लखन पासी नाम के व्यक्ति को एक मामले में 48 साल जेल में रहने के बाद 104 वर्ष की आयु में न्यायालय द्वारा बाइज्जत बरी किया गया। इस प्रकार के निर्णय भारत के कछुए की चाल चलने वाले न्यायिक प्रणाली की कहानी कहते हैं।

देश में हर समय चुनाव होते रहते हैं और चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह की लुभावनी घोषणाएं करते हैं कि हम सत्ता में आए तो ये करेंगे। कोई लाडली बहना के नाम पर पैसे बांटता है पर कोई अपनी लाडली बहना की उस तकलीफ की ओर ध्यान नहीं देता जहां उनके शौहर, बेटे बिना कसूर के जेलों में सड़ रहे हैं या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं और महिलाएं ही घर और बच्चों की शिक्षा का बोझ उठा रही हैं। कोई भी राजनीतिक दल इन असहाय गरीबों विषय में कभी आवाज नहीं उठाता। वास्तविकता यह है कि भारत में न्याय पाना तो बड़े धनाढ्य लोगों का ही एकाधिकार रह गया है। अगर किसी गरीब या छोटे व्यक्ति ने अज्ञानतावश या मजबूरी में कोई छोटा-मोटा अपराध कर लिया तो उसकी पूरी उम्र जेल की सलाखों या फिर अदालतों का चक्कर लगाते-लगाते कट जाएगी। पर बड़े लोगों के लिए तो यह कहावत चरितार्थ होती है जहां पैसे के लिए अपराध करो और पकड़े जाओ तो पैसे देकर छूट जाओ। उनके लिए अपराध करना और बेल मिलना मानो रोज की दिनचर्या है पर जब एक गरीब से अपराध हो जाए तो उसका ये जन्म इसी को निपटाने में निकल जायेगा।

सरकार ने सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट बनाया और सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की जांच के लिए सीबीआई जैसी जांच एजेंसी बनाई, पर दुर्भाग्य से दोनों को अस्तित्व में लाने का मकसद पूरा नहीं हुआ। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन की जद में छोटे-मोटे कर्मचारी व अधिकारी आते हैं क्योंकि बड़े अधिकारी तो पैसे के बल पर बड़े से बड़ा वकील करके या फिर जजों से सेटिंग करके छूट जाते हैं, जहां भ्रष्टाचार में आरोपित छोटे कर्मचारी न्याय की आस में तीस-तीस साल तक कोर्ट के चक्कर लगाते-लगाते भगवान को प्यारे हो जाते हैं। वहीं बड़े आरोपियों के सीनियर वकील मेंशन करके घंटों में उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में केस लिस्ट करवा लेते हैं। सबको याद होगा कि फिल्म अभिनेता सलमान खान को ब्लैक बक मामले में हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद मात्र कुछ घंटे में सर्वोच्च न्यायालय में बेल मिल गई थी, जहां तक सीबीआई की बात है तो उसे सर्वोच्च न्यायालय के एक जज ने पैरट इन ए केज कह दिया था। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह ने सीबीआई की जांच के बारे में अपनी किताब में लिखा था कि सीबीआई की जांच में सिर्फ छोटी मछली आती है जब इसमें किसी बड़ी मछली के पकड़े जाने का अंदेशा होता है तो जांच की दिशा दूसरी तरफ मोड़ दी जाती है।

रायपुर के जागेश्वर प्रसाद का मामला यह बताता है कि 100 रुपए की रिश्वत के आरोप में उनका गिरफ्तार होना और उनको साल दो साल की सजा होना तो ठीक है पर उसका 15 साल तक सस्पेंड रहना फिर नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाना और वर्षों तक रिश्वतखोर के विशेषण के साथ समाज के सामने जिल्लत उठाना कहां तक सही है। अब समय आ गया है कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय किसी भी आरोप में पकड़े गए आरोपी के विरूद्ध न्यायिक प्रक्रिया उन धाराओं जिससे उस पर मुकदमा चल रहा है में निर्धारित सजा की अवधि में पूरी न हो तो उसे बरी कर देना चाहिए और ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद उसको अपीलीय न्यायालय द्वारा मामला निपटाए जाने तक उसे सरकारी आवास और स्वास्थ सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो भुखमरी से बचने के लिए उनके बच्चे अपराध की दुनिया में जाएंगे और यह स्थिति भयावह होगी।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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