बसंत कुमार
मैं सन 1979 में रेलवे सेवा आयोग की परीक्षा पास करके उत्तर रेलवे प्रधान कार्यालय में 20 वर्ष की आयु में लिपिक के पद पर
तैनात हुआ क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का रहने वाला था इसलिए मुझे
कार्यालय के सहपाठियों द्वारा बिहारी संबोधित करके बुलाया जाता था, क्योंकि दिल्ली में पूर्वी उत्तर
प्रदेश समेत बिहार के लोगों को बिहारी कहके संबोधित किया जाता है। यद्यपि मैं वहां
सबसे अधिक शिक्षित लोगों में था पर मेरे लिए बिहार संबोधन शायद प्रयोग होता था कि मैं
जिस क्षेत्र से आया हूं उसे पिछड़ा और गंवारों का क्षेत्र माना जाता था। आज लगभग 50 वर्ष हो चुके हैं पर मैं यह नहीं
समझ पाया हूं की कब तक बिहारी शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा। अभी
कुछ दिन पूर्व उत्तराखंड के भाजपा के एक नेता ने उन लड़कों जिनकी शादियां नहीं हो
रही थी को संबोधित करते हुए यह कह दिया की बिहार में 20-25 हजार रुपए में लड़कियां मिल जाती हैं। प्रश्न यह है
कि लोग बिहारी शब्द को गाली के रूप में कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे।
उत्तराखंड के नेता का यह बयान न सिर्फ बिहार और बिहारी का
अपमान है बल्कि यह महिला जाति का भी अपमान है जिस भारत में महिला को देवी के रूप
में पूजा जाता था वहां एक व्यक्ति एक बिहारी महिला को 20-25 हजार रुपए में पत्नी बनाने का ख्वाब देख रहा है। आश्चर्य
की बात है कि किसी भी बिहारी नेता, नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता ने इस बात का विरोध नहीं किया है। कैसी विडम्बना है कि जिस
बिहार ने गौतम बुद्ध, चाणक्य, सम्राट अशोक जैसे महान विभूतियां
पैदा की और आधुनिक भारत में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, टॉयलेट मैन के नाम से मशहूर पद्म विभूषण विंदेश्वर
पाठक आदि न जाने कितनी महान हस्तियों को जन्म दिया और आज भी नई दिल्ली में नौकरशाह
के रूप में सचिव, अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव, कमिश्नर स्तर के अधिकांश बिहारी मौजूद हैं लेकिन अभी भी बिहारी को पिछड़ा, बेवकूफ का पर्याय मानकर, मजाक का पात्र बनाया जाता है। यह
भी सत्य है कि दिल्ली के व्यापारियों की दुकानें, औद्योगिक संस्थान, किरायेदारों से अपनी जीविका-आजीविका चलाने वाले
जमीदारों की जिंदगी बिहारियों के बल पर चलती है पर हर जगह बिहारी का मजाक उड़ाना
अनुचित है। जिस देश में पंजाबी मराठी कहना गौरव की बात होती है उसी देश में बिहारी
एक गाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है आखिर ऐसा क्यों है। इस पर विस्तार से
विचार किया जाना चाहिए और ऐसा हमारे बिहार के बड़े-बड़े नेता और नौकरशाह खुद तो
बिहार से आकर दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, हौजखास, ग्रेटर कैलाश जैसे पाश इलाकों में राजसी ठाट बाट से रहते हैं पर बिहार और
बिहारियों के बारे में कोई नहीं सोचता।
एक ओर देश के रेल मंत्री स्लीपर बंदे भारत ट्रेन का रोज-रोज
प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उनको यह नहीं पता है कि बिहार से आने जाने वाली ट्रेनों में पूरे वर्ष
भर आसानी से रिजर्वेशन नहीं मिलता है और होली, दीपावली और छठ पूजा के दौरान दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे शहरों में
काम करने वाले बिहार के श्रमिकों को घर जाने के लिए अनारक्षित डिब्बों में भेड़
बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर जाना पड़ता है। आज तक भारतीय रेल ने कभी भी बिहार में
आने-जाने वाली ट्रेनों में बढ़ती भीड़ और सीट की अनुपलब्धता पर कोई लॉन्ग टर्म
योजना बनाने की कोशिश नहीं की, जबकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में नजर डालें तो ललित नारायण मिश्र, बाबू जगजीवन राम, राम विलास पासवान, नीतीश कुमार, अब्दुल ग़फुर, लालू प्रसाद यादव जैसे बड़े नाम
वाले नेता भारत के रेल मंत्री रहे हैं। लेकिन कभी भी बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश
में जाने वाली रेलगाड़ियों के बारे में नहीं सोचा। देश के रेल मंत्री से आग्रह है
कि बंदे भारत राजधानी आदि ट्रेनों की सुविधा के साथ-साथ बिहार में जाने वाली
ट्रेनों पर भी ध्यान दें।
आज दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में 80 % से 90% किरायेएदार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग
होते हैं यह जिन लोगों के मकान में किराये पर रहते हैं वहां पर उनकी महिलाओं को भी
बड़ी उल्टी नजर से देखा जाता है मकान मालिक जहां अपनी आर्थिक आमदनी के लिए इन किरायेदारों
पर निर्भर करते हैं वही उनकी महिलाओं पर इनकी कुदृष्टि रहती है जो कहीं से भी उचित
नहीं है पर उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों के निकम्मेपन के कारण बिहार के युवक 10 - 15 हजार रूपए की नौकरी के लिए
महानगरों में पड़े हुए हैं, जहां वे झुग्गी झोपड़ी या फिर किराये के मकान में नरकीय जिंदगी गुजारने को
मजबूर रहती है देखना यह है कि बिहार वोटो के सहारे सरकारें तो बनती बिगड़ती रहती
है लेकिन क्या बिहार की अस्मिता के लिए कोई सरकार या कोई राजनीतिक दल काम कर रहा
है।
बिहार में प्राकृतिक संसाधनों का अ संतुलित वितरण बिहार के
गरीबों के इस अपमान का कारण है, बिहार में दो तरह के वर्ग के लोग रहते हैं एक इतना गरीब है कि उसे दो जून की
रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता और एक इतना अमीर है कि उसको पता ही नहीं कि उसके
पास कितनी जमीन या प्रॉपर्टी है इसी गरीबों के कारण बिहार के लोग गांव से पलायन
करके शहरों में 10-20 हजार की नौकरी करते हैं यदि पूरे देश में नजर डालें तो पंजाब का व्यक्ति अपनी
खेती के लिए मशहूर है, कर्नाटक और हैदराबाद के व्यक्ति आईटी इंजीनियरिंग के लिए मशहूर हैं, केरल के व्यक्ति की पहचान नर्सिंग
इंडस्ट्री के लिए है लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की पहचान मजदूरी
पल्लेदारी आदि के लिए है अब जहां दुनिया वैश्वीकरण में प्रतिस्पर्धा कर रही है
वहां देखना यह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी मजदूर के ब्रांड से
कब बाहर निकाल पाते हैं, इस विषय में एक किस्सा मशहूर है एक बिहार के व्यक्ति दिल्ली में यूपी पुलिस
आयुक्त के रूप में तैनात थे गाड़ी में जाते समय उन्होंने अपने ड्राइवर से टूटी हुई
सड़क के बारे में शिकायत की तो ड्राइवर ने बगल के दुकान वाले से कहा की भाई
चार-पांच बिहारियों को भेज दे यह सड़क ठीक करवानी है तो कर में बैठे पुलिस उप
आयुक्त ने कहा की पांच बिहारी नहीं चारही भेजना क्योंकि एक बिहारी इस गाड़ी में
बैठा हुआ है तो यह है बिहारी की पहचान।
पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार व अन्य पिछले में राज्यों को उधमिता से जोड़ने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया गया जिससे वहां के लोग उधमिता से जुड़े और उन्हें महानगरों में जाकर मजदूरों के रूप में नौकरी न करनी पड़े कैसी विडंबना है कि महावीर प्रसाद, कलराज मिश्र, गिरिराज सिंह, भानु प्रताप सिंह वर्मा और जीतन नाम माझी जैसे बड़े नेता कई दशकों तक देश के एमएसएमई विभाग के मंत्री रहे और वे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले थे, यहां तक के एमएसएमई विभाग के सचिव भी उत्तर प्रदेश बिहार के निवासी रहे हैं पर दुर्भाग्य इस बात का है की बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उद्यमिता के क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ और वहां के पढ़े-लिखे युवा अपना उद्यम शुरू करने के बजाय महानगरों में श्रमिकों के रूप में काम कर रहे हैं और न ही इन लोगों के मन में उद्यमिता के क्षेत्र में काम करने के लिए इच्छा शक्ति जगाने का काम हुआ। इस विषय में मैं अपना स्वयं का अनुभव बताना चाहता हूं कि मैं एनडीए-1 में एमएसएमई सलाहकार के रूप में कार्यरत था और राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम में बैठा करता था वहां मेरे पास उत्तर प्रदेश व बिहार के अनेक लोग काम की तलाश में आते थे और मेरी कोशिश होती थी की इनक्यूबेशन आदि में प्रशिक्षण दिलाकर इनको उद्यमिता के क्षेत्र में डाला जाए पर होता यह था की सब कुछ देख लेने के बाद वह यही कहते थे की साहब हमें 10-12 हजार रुपए की नौकरी दिलवा दो, कहने का मतलब यह है की इन लोगों को कभी भी उद्यमिता के क्षेत्र में मानसिक रूप से तैयार नहीं किया गया और दूसरों की नौकरी करना इन्होंने अपना भाग्य मान लिया है।
बिहार की छठ पूजा के अवसर पर बिहार केवोटरों के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों
घाट बनवाने से लेकर अन्य सुविधाये मुहैया करा ने के लिए जोर-जोर से दिखावा करती है
और कुछ पार्टियों तो बिहारी वोटर को लुभाने के लिए बिहार से आकर दिल्ली में बसे
हुए बिहारके लोगों को अपना प्रत्याशी भी बनाते हैं पर आज उत्तराखंड सरकार के एक
मंत्री के पति द्वारा बिहार की महिलाओं के लिए इस तरह का अनुचित बात कहने पर कोई
भी पार्टी इसका विरोध करने को तैयार नहीं है यह बिहार के अस्मिता का प्रश्न नहीं
बल्कि देश की बेटियों का बेटियों की अस्मिता का प्रश्न है और और प्रधानमंत्री जी
की बेटी बढ़ाओ बेटी बचाओ और बेटीपढ़ाओ नारी का अपमान है।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव
हैं।)
