नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए और भारत के लिए विदेश के मोर्चे से यह असाधारण चुनौती है। भारत सरकार ने निर्माण कंपनी में काम करने वाले 40 भारतीयों के अगवा होने की बात मान ली है। इराक संकट का असर भारत में तेल की किल्लत के रूप में सामने आने की चर्चा हम कर रहे थे। भारत जिन देशों से सबसे ज्यादा तेल मंगवाता है उनमें इराक दूसरे नंबर पर है। लेकिन यह ऐसा संकट है जिससे निपटना कठिन है। इराक के मोसुल शहर में एक परियोजना पर काम कर रहे 40 भारतीयों को अगवा किए जाने के पीछे सुन्नी आतंकी संगठन आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड अल-शाम) का हाथ माना जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने 18 जून को यह खबर आने पर पहले तो अपहरण की पुष्टि नहीं की बस यह माना कि इन भारतीयों से संपर्क नहीं किया जा सका है। जाहिर है, वहां से सच की पुष्टि कठिन थी, लेकिन शाम होते-होते विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपहरण की खबर को सही बताया। आईएसआईएसयह एक छाता संगठन है, जिसके साथ कई सुन्नी संगठन हैं, स्व. सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी के लोग भी हैं। यह ऐसा खतरनाक आतंकवादी संगठन है जिसका केवल संबंध सउदी अरब से माना जाता है, अन्य बाहरी दुनिया से नहीं। पहले यह अल कायदा का रुप माना जाता था, लेकिन अब कहा जा रहा है कि शियाओं के खिलाफ इसकी जघन्य हिंसा को देखते हुए अल कायदा ने संबंध विच्छेद कर लिया है। इसने 1700 सैनिकों को नृशंसतापूर्वक मारकर जिस तरह वीडियो और तसवीरें जारी कर दी उससे इनके हिंसक जुनून का पता चलता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश नीति के जानकारों और सुरक्षा सलाहकारों से विचार विमर्श के बाद कुछ कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ए. के. डोभाल इस बचाव मिशन पर लगे हैं। इराक में फंसे भारतीयों को लाने के लिए भारत अपना सुपर हरक्यूलिस विमान तैयार रखा है। भारत सरकार ने इराक में अपने पूर्व राजदूत सुरेश रेड्डी को समझौते के लिए भेजा है। रेड्डी को हाल ही में आसियान का विशेष दूत नियुक्त किया गया है। रेड्डी के इराक में अच्छे संपर्क हैं। लेकिन प्रश्न है कि रेड्डी बातचीत करेंगे तो किनसे? ये 40 तो अपह्त हैं, लेकिन वहां कई हजार भारतीयों के लिए संकट का समय है, जहां आतंकवादियों का वर्चस्व कायम हो गया है। विद्रोहियों के कब्जे वाले तिरकित के एक अस्पताल में भी कार्यरत 46 भारतीय नर्से फंसी हुई हैं। ये नर्से ज्यादातर केरल की हैं। तिकरित टीचिंग अस्पताल की नर्स मेरियन जोस ने एक भारतीय टीवी चैनल से फोन पर बताया हम अस्पताल परिसर में किसी बंधक की तरह हैं। यहां कोई इराकी कर्मचारी नहीं है। एक दिन पहले रेडक्रॉस के लोग आए थे। उन्होंने हमारे सिम रिचार्ज कर दिए। पुलिस सेना और हर कोई यहां से भाग चुका है। रेडक्रॉस ने हमसे कहा है कि अगर हालात ठीक रहे तो वे हमें यहां से निकाल लेंगे अन्यथा हमें यहीं रहना होगा। वहीं तिकरित के मुकाबले बगदाद में काम कर रही नर्सों ने बताया कि उन्हें कोई परेशानी नहीं और वे सुरक्षित हैं।
सुन्नी संगठन आईएसआईएस लगातार कब्जा करते खून और विध्वंस मचाते बढ़ रहा है। इसके साथ कई सुन्नी संगठन हैं। दरअसल, सुन्नियों की शिकायत है शिया बहुल सरकार उनके साथ अन्याय कर रही है। इनका लक्ष्य सीधा सत्ता पर कब्जा करना है। पता नहीं भारतीयों का अपहरण इनने क्यों किया है? विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि इराक में 30 हजार भारतीय हैं, लेकिन सबसे प्रभावित क्षेत्र में संख्या सवा सौ के ही आसपास हैं। नर्सों के पूरी तरह सरुक्षित रहने का उनने दावा भी किया। उनका कहना है कि अभी ऐसी स्थिति नहीं है कि उनको वहां से बाहर निकाला जाए.....जैसे ही स्थिति थोड़ी अनुकूल होगी हम उन्हें वहां से निकाल लेंगे, उनकी पूरी व्यवस्था करेंगे। कुल मिलाकर सरकार के प्रतिनिधि के रुप में स्वराज ने लोगों से उन पर विश्वास करने, धैर्य रखने तथा ईश्वर से दुआ करने की अपील की। हालांकि किन अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों से भारत सरकार का सम्पर्क है यह स्पष्ट नहीं किया जाएगा। हम अपने सरकार पर अविश्वास करें इसका कोई कारण नहीं है। विदेश मंत्रालय ने वहां की स्थिति पर नजर रखने और फंसे भारतीयों के विषय में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए 24 घंटे काम करने वाले एक कंट्रोल रूम की स्थापना की है। इसलिए तत्काल हम मानकर चल सकते हैं कि सरकार को यह विश्वास है कि वे वहां से उन्हें बाहर निकाल देंगे। सरकार का सुझाव है कि लोग अपने घर में रहें, क्योंकि बाहर निकलने पर खतरा ज्यादा है।
यह सरकार का आकलन है। लेकिन वहां से ऐसी खबरें नहीं आ रहीं हैं जिन्हें पूर्णतया विश्वसनीय मान लिया जाए। 2003 के युद्ध के दौरान खबरें सीधीं आ रहीं थीं, दृश्य भी आ रहे थे.....आज वह स्थिति नहीं है। आतंकवादी समूह किसी नियम से युद्ध नहीं लड़ रहे, बल्कि आतंक, आग एवं खून से अपना विस्तार करते जा रहे हैं। वैसे किसी गुट ने न तो अपहरण की जिम्मेदारी ली है और न ही कोई मांग रखी है। हाल में ही में बगदाद से 210 किलोमीटर दूर स्थित बैजी रिफाइनरी पर मोर्टार और बंदूकों से हमला किया गया। हमले के बाद रिफाइनरी को बंद कर दिया गया। दाअसल, आतंकियों ने तेल के कई डिपो तबाह कर दिए हैं। राजधानी बगदाद से केवल 60 किमी दूर बाकुबा शहर को सुन्नी विद्रोहियों ने अपने कब्जे में ले लिया। इराक की फौज और आईएसआईएस के सुन्नी चरमपंथियों के बीच हफ्ते भर से इराक के पूर्वी और मध्य हिस्से में जंग चल रही है। पहले उन्होंने मोसूल और ताल अफार शहर पर भी कब्जा कर लिया था। सरकार देश के उत्तर में ताल अफार शहर को वापस अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रही है। ताल अफार सरकार और चरमपंथियों के कब्जे वाले इलाके के बीच एक शहर है। चरमपंथियों ने बगदाद के पश्चिम में फलुजा के पास सेना के एक हेलिकॉप्टर पर हमला कर उसे गिरा दिया और सेना के कई टैंक उड़ा देने का दावा किया।
सच कहें तो आईएसआईएस के लड़ाकों ने देश के उत्तरी इलाके में कब्जा जमा लिया है। अन्य सुन्नी समूहों द्वारा लड़ाकों की भर्ती जारी है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने भी कहा है कि आईएसआईएस के अन्य साथी समूहों ने युद्ध अपराध किए हैं। लेकिन वे कर कुछ नहीं सकते हैं। वैसे इराक सरकार की सेनाएं आईएसआईएस का मुकाबला कर रहीं हैं। किरकुक के पास एक गांव के लोगों द्वारा आतंकियों को खदेड़ने की भी सूचना आई। शिया और तुर्कमान ग्रामीण मिलिशिया ने इनका घंटेभर मुकाबला किया। उधर, दियाला प्रांत की राजधानी बाकुबा के कुछ हिस्सों पर आतंकियों ने कब्जा कर लिया था। सुरक्षा बलों ने पलटवार किया। इसमें 56 सैनिक मारे गए। पर शहर फिर अपने कब्जे में ले लिया। आतंकियों ने यहां एक जेल पर हमला कर ४४ कैदियों की भी हत्या कर दी। बाकुबा बगदाद से सिर्फ 60 किमी दूर है। आतंकियों के खिलाफ बच्चों ने भी हथियार उठाना शुरू कर दिया है। मौके से आ रही तस्वीरों में बच्चों को हथियार उठाए हुए देखा जा सकता है। शिया धर्मगुरु सिस्तानी के आग्रह पर शिया बच्चों ने हथियार उठाए हैं। आतंकी संगठन के भी बच्चे मोर्चे पर हैं। इस प्रकार बहुसंख्यशिया इनसे मोर्चाबंदी आरंभ कर चुके हैं। लेकिन इसका अर्थ सांप्रदायिक संघर्ष है। दूसरी ओर कुर्द मिलिसिया भी हैं। इनने मोसुल शहर को अपने कब्जे में कर लिया था लेकिन स्थानीय कुर्द मिलिसिया ने आइएसआइएस के आतंकियों को खदेड़ कर इस शहर पर अपना कब्जा जमा लिया है। ये तीनों समूह हिंसा और संघर्ष में इतने अराजक हैं कि इनको अनुशासित तक करना संभव नहीं।
भारत की समस्या यही है कि वह बात किससे करे। अमेरिका स्थित इराक के राजदूत लुकमान फैली ने कहा कि अफगानिस्तान में सिर्फ एक ओसामा बिन लादेन था। इराक में तो एक हजार ओसामा सड़कों पर है। उनसे निपटना आसान नहीं है। आईएसआईएस के पास धन की भी कमी नहीं है। इनकी आय का मुख्य स्रोत जबर्दस्ती वसूली है। इसके अलावा यह संगठन ट्रक चालकों और व्यापारियों से भी पैसा वसूलता है। ये कई बैंक और गोल्ड शॉप लूट चके है। मोसुल पर कब्जा करने के साथ 429 मिलियन डॉलर की लूट की। इसके बाद यह दुनिया का सबसे अमीर आतंकवादी संगठन बन गया है। यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के मुताबिक हाल ही में आईएसआईएस ने अपने हर फाइटर को 200 डॉलर प्रतिमाह देना शुरू कर दिया है, ताकि संगठन में अधिक से अधिक आतंकियों को जोड़ा जा सके।
कुवैत पर हमले के समय कई लाख लोगों को निकाला गया, इराक युद्ध के समय भी निकाला, लेकिन दोनों परिस्थितियों में अंतर है। तब कोई अपहरण नहीं था और इराक की हमलावर सेना या नाटो सेनाओं की भारतीयों से दुश्मनी नहीं थी। तो ऐसे समय काफी धैर्य एवं बुद्धि कुशलता की आवश्यकता है। पूरा देश कामना करेगा कि हमारे लोग वहां से सुरक्षित निकलें। लेकिन यह यूं ही नहीं होगां। भारत को अपनी क्षमता के अनुरुप कुव्वत दिखानी होगी।
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