सोमवार, 27 अप्रैल 2026

रिकार्ड मतदान के मायने

अवधेश कुमार 

भारतीय चुनाव में जो कभी नहीं हुआ वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अभी तक 92.86 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड हुआ है। तमिलनाडु का भी लगभग 85% मतदान एक रिकॉर्ड है।अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि होगी। पूर्वोत्तर राज्यों में मतदान प्रतिशत औसत से अधिक रहा है किंतु वहां भी केवल 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 91.4% मतदान हुआ था। बंगाल में 2011 से मतदान औसत से ज्यादा रहा। 2011 में 84.5%, 2016 में 82.56% और 2021 में 81.56% मतदान हुआ। वैसे 2010 के बाद से मतदान में वृद्धि देशव्यापी प्रवृत्ति रही है। मतदान अंकगणित का विषय है लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक होती है और उनके मायने राजनीति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम तक जाते हैं। बंगाल का दूसरा चरण अभी बाकी है इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने हुए माहौल का संकेत यही है की मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला और यहीं संकेत भी छिपा हुआ है। 2010 के पहले सामान्य मतदान में वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी या घटकों की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में यह प्रवृत्ति बदल गई। मतदान बढ़ाने के बावजूद सरकारें वापस आती रही और मतदान घटना पर भी कई सरकारें गईं। इसलिए सामान्यत: मतदान का प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने या इसके विपरीत राजनीति परिणाम का निश्चयात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

बंगाल में 2011 में 84.5 प्रतिशत का रिकार्ड मतदान हुआ और वामपंथी मोर्चे की 34 वर्षों की स्थापित सरकार चली गई। उसके बाद मतदान प्रतिशत थोड़ा-थोड़ा घटा किंतु ममता वापस आती रहीं। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान या एसआईआर की प्रक्रिया के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत संतोषजनक होगा। पिछले वर्ष बिहार के चुनाव में 67.25% मतदान हुआ जो 2020 के 57.29 प्रतिशत से 9.96% ज्यादा था। बिहार में लगभग 65 लाख नाम एसआईआर की प्रक्रिया में हटाए गए थे। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं का नाम सूची से हटा।  कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई हुई है और न्यायिक प्राधिकरणों को फैसला करना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई। यह सच नहीं है कि प्रतिशत ज्यादा होते हुए भी कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढी। पिछले चुनाव से लगभग 26 लाख ज्यादा मतदाताओं ने मतदान किया। भारी संख्या में मृतक, दूसरे जगह चले गए या दो जगह नाम वाले या कुछ फर्जी नाम मतदाता सूची में थे और उनके नाम मतदान होते थे जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी। इनके नाम पर कितने वोट डाले गए इसकी गणना कोई नहीं कर सकता। अगर 6.77 करोड़ मतदाताओं के आधार पर पिछला मतदान होता तो मतदाताओं की संख्या कम होती और इस बार वृद्धि बहुत ज्यादा होती। इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

2011 में ममता बनर्जी ने लगभग 5 वर्षों के अनवरत संघर्ष और आक्रामकता से मतदाताओं में वाममोर्चा सरकार के विरुद्ध गुस्सा एवं आलोड़न पैदा किया था। वाम मोर्चा समर्थक भी उनके साथ आये और तृणमूल का अपना भी आधार खड़ा हुआ। जब से भाजपा ने बंगाल में अपनी विचारधारा और राजनीति को जमीन पर उतारने का अभियान चलाया ममता के विरुद्ध समाज के निचले स्तरों पर जबरदस्त आलोड़न है और कुछ महीनो में 2011 पूर्व की स्थिति ममता एवं भाजपा के संदर्भ में उल्टी है। ममता समर्थक और विरोधी तथा भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में स्वयं और अपने मतदाताओं को ज्यादा संख्या में मतदान केन्द्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। 2019 लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम दिखा जब भाजपा ने 40% मत के साथ राज्य 18 सीटें जीत ली। 2018 पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त आलोड़न था और संकेत मिल गया कि भाजपा जमीन पर नीचे तक पहुंची है तथा राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का लगभग सफाया हो चुका है। भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की लहर  भारत में देखा गया है। 2021 में भी भाजपा ने वातावरण बनाने की कोशिश की पर तब तीन सीटों से बहुमत के 148 तक पहुंचना बंगाल के सामाजिक - सांप्रदायिक समीकरणों में कठिन था। इसलिए लगभग 38% मत के साथ हुआ 77 सीटों तक पहुंच पाये। कोरोना महामारी के कारण बनाए गए सरकार विरोधी माहौल का भी थोड़ा असर हुआ। बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा आम लोगों के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। चुनावी रैगिंग या धांधली प्रदेश का स्वाभाविक चरित्र पिछले 60 सालों में बना रहा है। कांग्रेस फिर वाम दल और  तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रवृत्ति को ज्यादा निष्ठुरता से कायम रखा।

इस बार मतदाताओं का बड़ी संख्या में निकलने का एक प्रमुख कारण मतदान और बाद में के लिए दिखता सुरक्षा आश्वासन था। पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 2407 कंपनी, 2193 क्विक रिस्पांस टीम व 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां कुछ कुछ समस्या हो रही थी मतदान के पहले से ही केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे। मतदान के दौरान जहां भी समस्या आई सुरक्षा बल ज्यादातर पहुंचे। इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर के एक भाजपा उम्मीदवार को लोगों द्वारा खदेड़ने और पकड़ कर पिटाई करते वीडियो देखने से अनुमान लग जाता है कि मतदान कैसे भय और आतंक के वातावरण में होता रहा। सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही हिंसा में भी रिकार्ड कमी आई। मतदान बाद निश्चित समय तक केंद्रीय बलों की उपस्थिति के निर्णय ने भी मतदाताओं में सुरक्षा भाव पैदा किया। 2021 उसके पहले 2019 और 2018 तीनों चुनावों में मतदान बाद की हिंसा और लोगों के पलायन से भय का माहौल बना था। चुनाव अभियान के बीच प्रदेश की यात्रा करने वालों को 2026 में माहौल में बदलाव दिख रहा था। मतदाता धीरे -धीरे खुलकर अपना मत प्रकट करने लगे थे। लंबे समय बाद मतदान हत्याविहीन, न्यूनतम हिंसा और निर्भयता के वातावरण में संपन्न हुआ है। निस्संदेह, परिणाम में भी यह दिखाई देगा।

 ममता और समर्थकों की आक्रामकता का जवाब भाजपा ने भी प्रति आक्रामकता से दिया। गृह मंत्री अमित शाह तक के भाषणों में भी आक्रामकता थी ताकि उनके समर्थक मतदाता भयरहित होकर मतदान के लिए निकलें और आक्रमण होतो उसका प्रतिकार करें या सुरक्षा बलों तक सूचना पहुंचाएं। ममता ने अपनी शैली में हमलावर प्रचार किया और यहां तक कहा कि किसी कार्यकर्ता के साथ कार्रवाई होगी तो सरकार उसके साथ खड़ी ही नहीं रहेगी बल्कि कुछ संस्थाओं के मामले में यहां तक कहा कि उसको हम सरकारी नौकरी दे देंगे। पहले भी ममता उन सबकी रक्षा में सामने दिखीं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार या अपराध के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की। इसका असर उनके घोर समर्थकों पर था। देश भर में आम मुसलमान भाजपा के विरुद्ध मतदान करता है और उनकी संख्या कहीं कहीं शत-प्रतिशत तक चली जाती है। बंगाल में उनकी आबादी 29  से 30 प्रतिशत के बीच होगी। वे भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मतदान करने निकले ही होंगे। उसकी प्रतिक्रिया में गैर मुस्लिम समुदाय भी निकले हैं जो टीवी कैमरों पर दिख रहे थे। मुर्शिदाबाद , मालदा, दक्षिण दिनाजपुर आदि जिलों में निकले मतदाता गवाही दे रहे थे कि दोनों पक्षों में करो या मरो का भाव पैदा हो चुका है। जिलों के हिसाब से देखें तो दक्षिण दिनाजपुर में 95.4% , मालदा में 94.43%, मुर्शिदाबाद में 93.58%, उत्तर दिनाजपुर में 94.15%, अलीपुरद्वार में 92.69% , झारग्राम में 92.5%, पश्चिम मेदिनीपुर में 92.118% , बांकुरा में 92.5 0%, पूर्वी मेदिनीपुर में 91.20 प्रतिशत, तथा कूच बिहार में सबसे अधिक 96% मतदान हुआ है। इस दौर में सबसे कम कालिमपोंग में 83.07 प्रतिशत , दार्जिलिंग में 88.80 प्रतिशत, पश्चिम वर्धमान में 90.33% तथा पुरुलिया में 90.91% मतदान हुआ। साफज् है कि जहां एक पक्ष कम रहा वहां मतदान प्रतिशत कम हुआ और दार्जिलिंग, कालिमपोंग आदि इसके उदाहरण हैं।

बंगाल को समझने वाले स्वीकार करेंगे कि तीन लगातार कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान का भी वोट है तथा बदलाव के लिए निकलने वाले मतदाताओं के भी  संख्या है। यह बताने की आवश्यकता नहीं की इन मतदाताओं ने किसके चुनाव चिन्ह पर बटन दबाया होगा। ममता और तृणमूल के राज में सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थी तत्व तथा विरोधियों के विरुद्ध सत्ता व प्रशासन के भयानक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध खासकर संदेशखाली व आरजी कर जैसी महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराध घटनाएं भी सामने है,  दंगों के दौरान प्रशासन की भूमिका, एक समय का संपन्न और उद्योगों तथा कारोबार के मामले में देश के अगुआ राज्य का पीछे होना और संपूर्ण आर्थिक स्थिति पर इसके नकारात्मक असर के कारण भी असंतोष दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इन सबको मुद्दा बनाया। इस तरह रिकार्ड मतदान के पीछे इन समस्त कारकों की सामूहिक भूमिका रही।

वैसे इन 152 सीटों का पिछला अंकगणित देखें तो तृणमूल ने 92 में से 83 पर सीधे भाजपा, पांच पर कांग्रेस और तीन पर माकपा  तथा एक पर भाजपा की सहयोगी और झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आशु को हराया था। ‌इनमें से तीन दांतन,तमलुक और जलपाईगुडी में जीत का अंतर एक हजार से कम और नौ पर एक से पांच हजार का था।‌ कुल मिलाकर इनमें से 23 पर जीत का अंतर 10 हजार से कम था। इनसे ज्यादा एस आई आर में नाम कट गये। एसएआर में औसत प्रतिशत 28, 055 नाम हटे हैं । इस तरह मतदान में वृद्धि का चुनाव परिणाम के संदर्भ में पूर्व आकलन किया जा सकता है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

वर्तमान युग का कर्बला और ज़हरा व ज़ैनब की बेटियाँ

  • समाज में महिलाओं की भूमिका और इस्लाम की बेटियाँ

अबू अब्दुल्लाह अहमद

समाज में महिलाओं की भूमिका पर कोई भी चर्चा मुस्लिम समाजों के भीतर मौजूद लैंगिक असमानता को संबोधित किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती। इस्लाम में माँ, बेटी या बहन होना गहरे अर्थ रखता है, जो उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अल-ताहिरा, सय्यिदत-उल-क़ाइनात हज़रत फ़ातिमा अल-ज़हरा, और “दूसरी ज़हरा” हज़रत ज़ैनब के आदर्श जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस्लाम में महिलाओं की स्थिति अक्सर दो अतियों के बीच फँसी रही है: एक ओर बाहरी आलोचकों के आरोप, गलत प्रस्तुतियाँ और रूढ़िवादी धारणाएँ; और दूसरी ओर मुस्लिम समाजों के भीतर कुछ पितृसत्तात्मक समूहों और पूर्व-इस्लामी अज्ञानता से प्रभावित व्याख्याएँ। ये दोनों ही इस्लाम की नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि के विपरीत हैं, जो महिलाओं को सम्मानित, नैतिक रूप से उत्तरदायी और सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों के रूप में मान्यता देती है। इस दृष्टि को समझने के लिए इस्लामी इतिहास, उसके मूल सिद्धांतों और आदर्श व्यक्तित्वों का अध्ययन आवश्यक है।

इस्लामी इतिहास की पहली मुस्लिम महिला उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अल-ताहिरा थीं, जो पैगंबर मुहम्मद की पत्नी थीं। वे सबसे पहले उन पर ईमान लाने वाली थीं और हर कठिनाई में उनके साथ अडिग रहीं, उन्हें निरंतर समर्थन और प्रोत्साहन देती रहीं। एक संपन्न महिला होने के बावजूद, उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति इस्लाम और समाज सुधार के कार्य में लगा दी। इसी परंपरा की निरंतरता दूसरी सदी में भी दिखाई देती है, जब दुनिया का पहला विश्वविद्यालय अल-क़रविय्यीन (859 ई.) मोरक्को के फ़ेज़ में एक मुस्लिम महिला फ़ातिमा अल-फ़िहरी द्वारा स्थापित किया गया, जो ख़दीजा की तरह ही एक सम्मानित कुरैशी व्यापारी की बेटी थीं।

जब मुसलमान जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी थे, तब मदीना, कूफ़ा, बग़दाद, काहिरा, दिल्ली और इस्तांबुल जैसे शहर ज्ञान, कला, उद्योग और व्यापार के वैश्विक केंद्र बन गए। यह उपलब्धि पुरुषों और महिलाओं, विद्वानों और कामगारों—सभी के संयुक्त प्रयास का परिणाम थी, क्योंकि इस्लाम समाज के समग्र विकास और प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान प्रगति के अवसरों पर बल देता है। एक संतुलित और प्रगतिशील समाज के लिए महिलाओं की घर और समाज दोनों में सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

हज़रत ख़दीजा, पैगंबर की पैगंबरी की घोषणा से पहले ही अरब में एक प्रतिष्ठित और समृद्ध व्यवसायी थीं, जो बड़े व्यापारिक काफिलों का प्रबंधन करती थीं। पैगंबर स्वयं उनके व्यापारिक साझेदार थे। इस्लाम के प्रसार में उनका योगदान पैगंबर के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इतिहासकार उन्हें मानवता की महान हितैषी मानते हैं, और उनके निधन का वर्ष “आम अल-हुज़्न” (शोक का वर्ष) के रूप में जाना जाता है। उनकी बुद्धिमत्ता, संपत्ति और कुरैश में प्रभाव ने पैगंबर के मिशन को मजबूत किया।

एक और उल्लेखनीय उदाहरण हज़रत फ़ातिमा अल-ज़हरा का है, जिन्हें जन्नत की महिलाओं की नेता कहा गया है। पैगंबर उन्हें प्रेमपूर्वक “उम्म अबीहा” (अपने पिता की माँ) कहते थे। वे कम उम्र से ही अत्यंत बुद्धिमान थीं और पैगंबर के मिशन में सक्रिय रूप से शामिल रहीं। वे अहल-उल-किसा (पवित्र चादर वाले पाँच व्यक्तियों) में शामिल थीं, जिनकी पवित्रता का उल्लेख क़ुरआन में मिलता है। जब भी वे पैगंबर से मिलने आतीं, वे सम्मान में खड़े हो जाते और उन्हें अपने पास बैठाते। उन्होंने कठिन समय में अपने पिता और अपने पति हज़रत अली अल-मुर्तज़ा का साथ दिया। उहुद की लड़ाई के दौरान, जब पैगंबर और हज़रत अली घायल हुए, तब उन्होंने साहसपूर्वक उनकी देखभाल की।

इसी प्रकार, कर्बला की त्रासदी अत्याचार, अन्याय, कानून के उल्लंघन, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और पैगंबरी परंपरा के स्थान पर साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष का एक सशक्त प्रतीक है। इस संघर्ष में हज़रत ज़ैनब बिन्त अली ने न केवल अपने भाई इमाम हुसैन का साथ दिया, बल्कि बाद में न्याय की आवाज़ बनकर उभरीं। अपार व्यक्तिगत क्षति के बावजूद, उन्होंने असाधारण नेतृत्व और साहस का परिचय दिया और कूफ़ा व दमिश्क के दरबारों में प्रभावशाली भाषण दिए, जो आज भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका के सशक्त प्रमाण हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि इतने उज्ज्वल उदाहरणों के बावजूद, मुस्लिम समाजों में कुछ व्याख्याओं ने महिलाओं को घर की चार दीवारों तक सीमित कर दिया है और इसके लिए क़ुरआन और हदीस का दुरुपयोग किया गया है। यह स्वीकार करना होगा कि इस्लाम में महिलाओं की वास्तविक स्थिति को समझने में विफलता का कारण अक्सर बाहरी आलोचना से अधिक, स्वयं मुसलमानों के कार्य और उनकी व्याख्याएँ हैं। यही कारण है कि जब भारत जैसे देशों में मुस्लिम महिलाएँ चिकित्सा, इंजीनियरिंग, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं, या तुर्की और ईरान की महिला पायलट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाती हैं, तो दुनिया आश्चर्य करती है।

वास्तव में, परिवार और समाज का स्वास्थ्य उसके दोनों हिस्सों की मजबूती पर निर्भर करता है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में आधी आबादी को हाशिए पर रखना प्रगति की आधी लड़ाई हारने के समान है। पुरुष और महिलाएँ एक गाड़ी के दो पहिए और शरीर के दो हाथों की तरह हैं। महिलाएँ न केवल घर की नींव को मजबूत करती हैं, बल्कि शिक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शिक्षित और सशक्त महिलाएँ आने वाली पीढ़ियों के निर्माण, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक न्याय में योगदान देती हैं।

क़ुरआन पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी आध्यात्मिक या नैतिक भेदभाव का समर्थन नहीं करता, बल्कि उन्हें “एक-दूसरे के संरक्षक” के रूप में वर्णित करता है और ईश्वर के सामने समान रूप से उत्तरदायी मानता है। पैगंबर ने महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया, उन्हें विरासत का अधिकार दिया, उनके आर्थिक योगदान को मान्यता दी और उन्हें सामाजिक व राजनीतिक जीवन में शामिल किया। महिलाएँ सार्वजनिक रूप से नेताओं से प्रश्न करने का साहस रखती थीं, यहाँ तक कि खलीफा उमर इब्न अल-ख़त्ताब से भी।

पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देना परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि वास्तविक इस्लामी शिक्षाओं को बाद की विकृतियों से अलग करने का प्रयास है। इसके लिए न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा जैसे इस्लाम के मूल सिद्धांतों की ओर लौटना आवश्यक है। जब इन सिद्धांतों का पालन किया जाता है, तो कई अन्यायपूर्ण प्रथाएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।

इस्लाम महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है, जो बाहरी मॉडल की नकल पर नहीं बल्कि मूल्यों पर आधारित है। यह ढाँचा तीन मुख्य आधारों पर टिका है: गरिमा, शिक्षा और भागीदारी। इस्लाम हर इंसान की गरिमा को स्वीकार करता है, महिलाओं को अधिकारों और जिम्मेदारियों के साथ एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मान्यता देता है, और पुरुषों व महिलाओं दोनों के लिए ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य करता है। सामाजिक, आर्थिक और नागरिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रारंभिक इस्लामी समाज की एक स्थापित विशेषता है।

व्यापार, शिक्षा और सार्वजनिक परामर्श से लेकर समाज सेवा तक, महिलाओं ने इतिहास में विविध और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं। बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के अतिवादी दृष्टिकोणों से निपटने के लिए बौद्धिक ईमानदारी और नैतिक स्पष्टता आवश्यक है। इसके लिए इस्लामी स्रोतों के साथ गहरा जुड़ाव, इतिहास में महिलाओं की सक्रिय भूमिका की स्वीकार्यता और समकालीन चुनौतियों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

फ़ातिमा और ज़ैनब की विरासत हमें सिखाती है कि गरिमा और प्रतिरोध, आस्था और धैर्य—एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। क़ुरआन की दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि न्याय बिना लैंगिक समानता के अधूरा है। इस दृष्टि को पुनः अपनाकर आज के मुस्लिम समाज एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं, जो अपनी आध्यात्मिक जड़ों के प्रति वफादार होने के साथ-साथ आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप भी हो—जहाँ महिलाएँ न्याय, ज्ञान और सामूहिक कल्याण की दिशा में समान भागीदार हों।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

जब कॉमन सिविल कोड आवश्यक है तो यूनिफार्म आपराधिक प्रक्रिया क्यों नहीं?

बसंत कुमार

आपके सरकारी आवास में बेहिसाब नोटो के बंडल मिलने के आरोप से घिरे जस्टिस वर्मा ने अपना त्याग पत्रभेजा दिया और उसके कारण संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बंद हो गई। इसके कारण न तो उनके खिलाफ अपराधिक कार्यवाही नहीं हो पाएगी और उनका त्याग पत्र स्वीकार होने के पश्चात उन्हें सेवा से संबंधित सभी लाभ मिल जाएंगे और जीवन पर्यन्त पेंशन भी मिलती रहेगी। अब प्रश्न यह उठता है कि जस्टिस वर्मा की जगह कोई साधारण कर्मचारी होता तो विजिलेंस प्रोसिडिंग या क्रिमिनल प्रोसिडिंग शुरू होने से पहले अपना त्याग पत्र देता और उनका त्याग पत्र स्वीकार करके उसे सारे सरकारी सेवा के लाभ लेने दिए जाते। जब इस देश में सर्वोच्च न्यायालय समेत अनेक प्लेटफार्म से कॉमन सिविल कोड की बात होती हैं तो फिर ऐसी न्यायिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जाती जहां उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और आम जनसेवक के विरूद्ध एक ही तरह की प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं होती।
यह पहला अवसर नहीं है कि उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई हो पर आरोपी न्यायाधीश को अपने पद से त्यागपत्र देकर उसे सेवा से संबंधित सभी लाभ प्राप्त करने का अवसर प्रदान कर दिया गया हो। 1990के दशक में जस्टिस रामा स्वामी के विरुद्ध संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया पर संसद के उत्तर भारत और दक्षिण भारत के आधार पर बंट जाने के कारण महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया और जस्टिस रामास्वामी को त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया और उन्हें सारे सेवा के लाभ मिल गए। ठीक उसी प्रकार वर्ष 2010के दशक में जस्टिस मुखर्जी के विरुद्ध संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी न हो सकी और उन्हें सरकारी सीवा से त्याग पत्र देने का अवसर मिल गया क्या इस तरह से लाभ आम कर्मचारी को मिल सकता है।
भारत सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के मामले में भ्रष्टाचार के मामलों के निपटान के लिए लागू सी सी एस (सी सी ए) रूल्स के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उसे 48घंटे से अधिक जेल में रहता है तो उसे सरकारी सेवा से निलम्बित समझा जाए है पर दो वर्ष पूर्व दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपी मे गिरफ्तार किए गए तो वे कई माह तक तिहाड़ जेल से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में काम करते रहे और सरकार चलाते रहे आखिर न्यायाधीशों और मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लोगों के लिऐ आपराधिक प्रक्रिया अलग अलग क्यों है, जब आम कर्मचारी इस आशंका से कि वह जांच को प्रभावित कर सकता है, आपराधिक प्रक्रिया शुरू होते ही निलम्बित कर दिया जाता है पर उच्च पदों पर बैठें न्यायाधीश और मंत्री मुख्यमंत्री अपने पदों पर विराजमान रहते हैं। यू पी ए 1सरकार के समय जब चारा घोटाले में अपना नाम आने के बावजूद लालू प्रसाद यादव उनके मंत्रिमंडल में बने हुए थे तो उनका बचाव करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि जब तक कोई न्यायालय द्वारा दोषी सबित नहीं ठहराया जाता तो उसे निर्दोष ही माना जाएगा तो फिर आम कर्मचारी ट्रायल कोर्ट में केस के निपटान से पहले 20-2 0साल तक निलम्बित क्यों रखे जाते हैं।
मैने भारत सरकार में अपनी सेवा के दौरान कम से कम बीस मामलों में देखा है कि छोटे मोटे अपराधों में अपना नाम आने पर अपना त्यागपत्र दे देते है और स्टीरियोटाइप ढंग से उनका त्यागपत्र स्वीकार करने के बजाय उनको सस्पेंड करके सी बी आई या अन्य जांच एजेंसियों को भेज देते हैं और ये एजेंसियां छोटे मोटे अपराधों में कनविक्शन के लिय ट्रायल कोर्ट में भेज देते है जब कि इन मामलों को विभागीय कार्यवाही के द्वारा बर्खास्तगी, पद अवनति या अन्य उपयुक्त सजा दी जा सकती है। पर ट्रायल कोर्ट में भेजने के बाद ट्रायल बीस वर्ष तक चलता है और तब तक उस कर्मचारी को सस्पेंड रखा जाता है और उसे गुजारा भत्ता के रूप में 50%से लेकर 75%, तक वेतन देना पड़ता है और जो कर्मचारी बीस पच्चीस वर्ष की आयु में इन चक्करों में फंस जाता है वह 75से 80वर्ष की आयु में ही छूट पाते हैं, पर न्यायाधीशों की स्थिति अलग है जो त्यागपत्र देकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं।
जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले अपना त्यागपत्रसीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया और इस इस्तीफे से उन पर चल रही महाभियोग की प्रक्रिया बीच में ही रुक गई, मानो संसद यह इंतजार कर रही थी कि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा आए और हम महाभियोग की कार्यवाही रोक दे, ऐसी दरियादिली आम कर्मचारियों के साथ नहीं दिखाई जाती कि 100-200 रु की रिश्वत के आरोप में घिरा व्यक्ति इस्तीफा दे और उसके खिलाफ सी बी आई या पुलिस की कार्यवाही रोक दे उसे तो अंजाम तक पहुंचाना होता है यहां पर गौर करने वाले बात है कि जस्टिस वर्मा के आवास से 15करोड़ से अधिक के नोट मिले या जले, पर कोई एफ आई आर नहीं हुई। इससे पहले वर्ष 2011में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ फंड की हेराफेरी का आरोप लगा, जांच में दोषी पाए जाने के बाद राज्यसभा में उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित हो गया लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले उन्होंनेइस्तीफा दे दिया। इसी तरह सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस दिनाकरन पर वर्ष 2011में ही कदाचार के आरोप लगे संसद द्वारा उनके खिलाफ जांच समिति बनाई गई पर जांच समिति की कार्यवाही शुरू होने से पहले उन्होंने जांच समिति की प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
इस प्रकार भ्रष्टाचार कदाचार के आरोपों से घिरे जजों का इस्तीफा दे देने से महाभियोग की प्रक्रिया रद्द हो जाती है और कोई ऐसा नियम नहीं है कि महाभियोग से पहले इस्तीफा देने वाले जज के रिटायरमेन्ट बेनिफिट्स पेंशन आदि रोक दिए जाए। इसीलिए भ्रष्टाचार और कदाचार के लिप्त पाए जाने के बाद भी ये सुविधाएं मिलती रहती है जो इज्जत के साथ अपनी सेवा पूरी करने वाले जज को मिलती रहती है। पर एक आम कर्मचारी यदि अपने खिलाफ कार्रवाई पूरी होने से पूर्व त्याग पत्र दे दे तो क्या उस पर हो रही कार्यवाही रुक जाएगी या उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना ही पड़ेगा।
स्वतंत्र भारत में विगत 7दशक में कई पार्टियां सत्ता में आई और सत्ता से बाहर हुई और इनकी नीति के हिसाब से सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में बड़ा बदलाव हुआ गांधी आंबेडकर और नेहरू जैसे लोगों को बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता था पर आज कल कोई भीछूट भैया इनको गाली देने लगताहै, पर एक चीज नहीं बदली वो है लोगों का देश की न्यायपालिका के प्रति अटूट विश्वास, पर यदि भ्रष्टाचार और कदाचार में लिप्त न्यायाधीशों को तकनीकी आधार पर इनके कृत्यों की सजा पाने से बचाया जायेगा औरआम जनता छोटे छोटे अपराधों के लिय 30-4 0साल तक न्यायालयों के चक्कर लगाएगी तो लोगों का न्याय पालिका से विश्वास उठ जाएगा।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

सपा की ’पीडीए’ राजनीति और सियासी यथार्थ


संतोष यादव 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के बुलावे पर उनके गृह जिले सुल्तानपुर आए तो नेताओं बीच उन्हें चेहरे दिखाने की होड़ मच गई।
कहने को तो यह उनका निजी कार्यक्रम था, लेकिन महज़ एक निजी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने स्थानीय राजनीति की कई परतों को उजागर कर दिया। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर दौरे के दौरान उनके आसपास दिखाई पड़े कुछ ऐसे चेहरे, जिनकी छवि पर वर्षों से सामंती वर्चस्व और कमजोर वर्गों के दमन के आरोप लगते रहे हैं, ने इस पूरी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विरोधाभास केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक द्वंद्व का प्रतीक है, जिसमें एक ओर वैचारिक प्रतिबद्धता है और दूसरी ओर चुनावी यथार्थ। अखिलेश यादव के लिए यह सिर्फ रणनीति का नहीं, बल्कि भरोसे का भी सवाल है। आने वाले समय में उनकी राजनीति की दिशा इस बात से तय होगी कि वे इस कथनी-करनी के अंतर को कैसे पाटते हैं। 
सपा सुप्रीमो के साथ विवादित चेहरों की मौजूदगी, उनकी सक्रिय उपस्थिति ने इस पूरे दौरे को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया। जिन पर पहले से ही दंबगई दिखाने एवं दूसरों की हत्या कराने जैसे गंभीर आरोप लग चुके हैं, उनका पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब दिखना सपा कार्यकर्ताओं के एक वर्ग को असहज कर रहा है। राजनीति में दागी छवि हमेशा एक चुनौती होती है। खासतौर पर तब, जब पार्टी खुद को वैकल्पिक और साफ-सुथरी राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हो। समाजवादी पार्टी की पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति का दावा ज़मीन पर कई बार अपने ही कसौटी पर खरा नहीं उतरता। सिद्धांत और व्यवहार के बीच का यही अंतर विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। सियासी दलों का कार्यकर्ता सिर्फ जमीन पर नहीं, डिजिटल मंचों पर भी सक्रिय है। 
सपा सुप्रीमो के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही नाराजगी संकेत देती है कि पार्टी का एक वर्ग नेतृत्व से  स्पष्टता चाहता है। आज के दौर में आंतरिक असहमति अब दबती नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है। अखिलेश यादव एक बार फिर अपनी स्थापित राजनीतिक लाइन ’पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ मैदान में नजर आए। यह अवधारणा कुछ समय से उनकी राजनीति का केंद्रीय आधार बनी हुई है, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय की नई धुरी तैयार करना है। पीडीए की राजनीति का मूल दर्शन भी यही है कि, सत्ता और संगठन में उन तबकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे हैं। यह सिर्फ सामाजिक समीकरण नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और सम्मान की राजनीति है। लेकिन जब इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ने वाला नेतृत्व उन चेहरों के साथ खड़ा दिखाई देता है, जिन्हें पारंपरिक प्रभुत्वशाली राजनीति का प्रतीक माना जाता रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलाव वास्तविक है या सिर्फ नारेबाजी तक सीमित है।
राजनीति में संदेश केवल भाषणों से नहीं, बल्कि प्रतीकों और साथ खड़े लोगों से जाता है। एक तस्वीर, एक मंच, एक साथ खड़ा व्यक्ति, ये सभी जनता के बीच गहरे अर्थ रखते हैं। ऐसे में यदि पीडीए की बात करने वाला नेतृत्व उन्हीं पुराने सामंती सत्ता-ढांचे के प्रतिनिधियों के साथ नजर आता है, तो यह संदेश जाता है कि बदलाव की प्रक्रिया अधूरी है अथवा समझौते के रास्ते पर है।
हालांकि, इस स्थिति को पूरी तरह एकतरफा नजरिए से देखना भी उचित नहीं होगा। चुनावी मजबूरियां अक्सर ऐसे फैसले करवाती हैं, जहां प्रभावशाली स्थानीय चेहरों को साथ रखना जरूरी हो जाता है, भले ही उनकी छवि विवादित क्यों न हो। यह ’विजय की अनिवार्यता’ और ’विचार की शुद्धता’ के बीच का संतुलन है, जिसे हर राजनीतिक दल अपने तरीके से साधने की कोशिश करता है। समाजवादी पार्टी भी वही कर रही है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा जोखिम भी छिपा होता है। यदि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए वैचारिक स्पष्टता से समझौता किया जाता है, तो दीर्घकाल में इसका असर  उसकी विश्वसनीयता पर पड़ता है। 
समाजवादी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का वह वर्ग, जो पीडीए की अवधारणा को सामाजिक बदलाव के रूप में देखता है, वह ऐसे विरोधाभासों से निराश हो सकता है। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही प्रतिक्रियाएं इसी असहजता की ओर इशारा करती हैं। समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती स्पष्ट है, क्या वह पीडीए को सिर्फ एक प्रभावी चुनावी नारा बनाए रखेगी, या उसे अपने संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व के चयन और राजनीतिक व्यवहार में भी उतारेगी? आने वाले समय में समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह ऊर्जा से भरे कार्यकर्ताओं, महत्वाकांक्षी नेताओं और सामंती, विवादित छवियों के बीच संतुलन कैसे बनाती है। 2027 की लड़ाई सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता नहीं होगी, बल्कि पार्टी के भीतर भी एक ’अदृश्य संघर्ष’ चल रहा है, जहां छवि, अवसर और स्वीकार्यता की परीक्षा साथ-साथ हो रही है।

महिला आरक्षण की फिर वही परिणति क्यों

अवधेश कुमार 

लगभग 12 वर्षों के शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह पहला अवसर है जब कोई विधेयक पारित होने से लोकसभा में वंचित रह गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा किया कि विधेयक के पक्ष में 298 तथा विरोध में 230 मत पड़े। हालांकि सदन के बहुमत में विधायक के पक्ष में वोट डाला किंतु संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण दो तिहाई बहुमत यानी चाहिए था और इसलिए यह पारित नहीं हो सका। यानी कुल 528 लोकसभा सदस्य उपस्थित थे तो 352 सदस्यों का समर्थन चाहिए था वैसे उपस्थिति से 34 ज्यादा सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट डाला। अगर सामान्य विधेयक होता तो पारित हो गया होता। 1996 से महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभा में आरक्षण देने का मामला लटका हुआ है और विरोधी किसी न किसी बहाने इसमें अड़चन डालते आ रहे हैं। किसी का तर्क कुछ भी हो निष्कर्ष यही है वही प्रक्रिया फिर दोहराई गई है। अब इसमें गुणात्मक अंतर यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से 33% महिलाओं के आरक्षण का कानून संसद द्वारा पारित करवा लिया है। इसलिए उसको लागू तो होना है। किंतु अब विधेयक के गिर जाने से 2029 लोकसभा चुनाव में यह लागू नहीं हो सकता। इसके लिए हमें 2034 की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

दरअसल, 2023 के अधिनियम में यह प्रावधान था कि अगली जनगणना और फिर परिसीमन हो जाने के बाद इसे लागू किया जाएगा। तब अनुमान यह था कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 तक पूरी हो चुकी होगी इसलिए  इसे लागू करने में समस्या नहीं होगी। चूंकि यह पूरी नहीं हुई तो नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे संविधान संशोधन के जरिए तत्काल लागू करने का रास्ता चुना। पूरे प्रकरण का कठोर सच यह है कि इन तीनों विधेयकों में ऐसा कुछ नहीं था जिसको आशंका की दृष्टि से देखा जाए और जिसका इस सीमा तक विरोध हो कि काले झंडे और काले बिल्ले तक पार्टियां व सांसद लगा लें।  इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान करता था जिनमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें थीं। दूसरा,परिसीमन विधेयक, 2026 नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान करता था। और तीसरा,केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में महिला आरक्षण लागू करने के लिए था। विपक्ष का मुख्य विरोध पहले विधेयक से था। वस्तुत: संसद का विशेष सत्र आरंभ होने के पहले ही विपक्ष ने अविश्वसनीय रूप से विरोधी रख अपनाकर अपने संसदीय व्यवहार का संकेत दे दिया था। विपक्ष के सभी नेताओं ने, जिनमें महिला सांसद भी शामिल हैं नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन संबंधी विधेयकों का जैसा विरोध किया उसमें साफ हो गया कि इनका पारित होना संभव नहीं है। भाजपा के मंत्रियों ने विपक्ष के नेताओं से बात करनी शुरू की। स्वयं प्रधानमंत्री ने दो पोस्ट से अपील की। इसके पहले वे अपने भाषण में अपील कर चुके थे कि श्रेय आप लोग ले लीजिए लेकिन महिला आरक्षण में बाधा मत बनिए। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं इसके लिए तैयार हूं कि कल आप सबकी तस्वीर समाचार पत्रों में छपवाकर श्रेय दूंगा। लेकिन विपक्ष पहले से मन बनकर बैठा था। उन्होंने अपनी अपील में लिखा कि अपने घर में मां-बहन- बेटी -पत्नी सबको देखिए और उनके अधिकार के लिए विचार कर मतदान करिए।

 निष्पक्ष होकर विवेक, तथ्य और तर्क के साथ विचार करनेवालों का निष्कर्ष है कि पूरा विरोध एकपक्षीय अतिवाद से ग्रस्त रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तो इसे देश विरोधी और देश को बांटने वाला विधायक तक करार दिया। उन्होंने कहा कि ये देश का भूगोल बदलना चाहते हैं जो हम कभी नहीं होने देंगे। इससे अधिक अतिवादी वक्तव्य और कुछ नहीं हो सकता। उनका भाषण भाजपा के वरिष्ठ सांसदों को भी इतना आपत्तिजनक लगा कि राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को लोकसभा अध्यक्ष से अपील करनी पड़ी कि इन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए। राहुल गांधी के भाषण के एक बड़े अंश को असंसदीय करार देकर हटा दिया गया। सदन में विपक्ष के नेता के भाषण के अंशों को असंसदीय श्रेणी में ला दिया जाए इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती। अगर इरादा विधेयक पर बहस कर इसमें उचित संशोधन करना हो तो  आपके भाषण में उससे संबंधित सुझाव होते हैं। सरकार की राजनीतिक आलोचना में समस्या नहीं है। किंतु पूरी बहस सामान्य आलोचना ही नहीं विधेयक के विषय वस्तु से भी काफी दूर चला गया था। प्रश्न उठाया जा रहा था कि आखिर 850 सीटों का आपका आधार क्या है? इसी तरह के दक्षिण के राज्यों को इसमें नजरअंदाज किया जा रहा ? बजट सत्र में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेताओं से बातचीत शुरू की तो बताया होगा कि हर राज्य की 50% लोकसभा एवं विधानसभा की सीटें बढ़ाने का फार्मूला तय हुआ है। सोचा गया कि आज परिसीमन हो तो लोकसभा एवं विधानसभाओं की कितनी सीटें बढ़ सकतीं हैं। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर उत्तर प्रदेश की सीट 80 से 120 हो रही है तो तमिलनाडु की 39 से 59। इसी तरह अन्य राज्यों के भी विवरण दिए गए। हंगामा इस पर भी था कि 2011 की जनगणना को आधार क्यों बनाया गया? गृह मंत्री का उत्तर था कि 2011 की जनगणना का आधार बनाते तो तमिलनाडु की सुट केवल 49 होती। यही सच है।

यहां दो बातें समझने की है।  एक, वर्तमान 543 सीटों में 33% आरक्षण क्यों नहीं दिया गया? 2023 में जब विधेयक पारित हुआ तभी उसमें जनगणना और परिसीमन का प्रावधान था। विपक्ष ने विरोध नहीं किया? 1996 से उसके विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि आपसी बातचीत में नेता बोलते थे कि 543 में से 33% महिलाओं को मिल गया तो अनेक पुरुष नेताओं को घर बैठ जाना पड़ेगा और राजनीति का नाश हो जाएगा। पिछड़ों के आरक्षण आदि का बहाना बनाया गया। तो पुराने अनुभवों का ध्यान रखते हुए मोदी सरकार ने रास्ता निकाला कि 543 सीटें जस की तस रहें और बढ़ी 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होश   सहमति हुई तभी 2023 में कानून बन सका। आज यह तर्क देने वाले अपनी सरकारों में इसके लिए तैयार नहीं थे। 1996 में विरोध करने वाले उस संयुक्त मोर्चा सरकार के साथी थे तो 2008 से 2010 तक विरोध करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथी। इनमें समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और कुछ समय तक जनता दल यूनाइटेड अग्रणी रहे। दूसरे दलों के सांसद भी साथ देते रहे। 

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में महिला आरक्षण विधेयक चलाया किंतु आम सभमति नहीं बन सकी। 2010 में राज्यसभा में भाजपा के समर्थन से विधेयक पारित हुआ किंतु उनके साथी दलों ने विरोध किया और लोकसभा में पारित करना मुश्किल था। इस पृष्ठभूमि को जानने वाले यह प्रश्न नहीं उठाएंगे। दूसरे, हर 10 वर्ष पर संविधान लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों के जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रावधान करता है। 1971 तक नियमित होता रहा। 1976 में आपातकाल के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संशोधन कर 2001 तक लोकसभा एवं विधानसभाओं की सीटें न बढ़ाने का प्रावधान कर दिया। इस कारण 1981 और 91 में परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ। 1976 में लगभग 57.5 करोड़ आबादी थी और आज 140 करोड़ से ऊपर। क्या उस आधार पर आज लोकसभा या विधानसभाओं की सीटें होनी चाहिए? 2001 में वाजपेयी सरकार ने भी परिसीमन आयोग तो बनाया लेकिन केवल क्षेत्र का समायोजन हुआ संख्या नहीं बढ़ाई। हर सरकार इस विषय को स्पर्श करने से घबराती रही, क्योंकि दक्षिणी राज्यों की आबादी उत्तर के अनुपात में कम होने के कारण उनको सीटें कम मिलती और विरोध होता।

मोदी सरकार ने उसी का रास्ता निकाला। थोड़े शब्दों में कहें तो अगर दल वाकई महिला आरक्षण के पक्ष में होते तो विरोध जताते हुए कुछ संशोधन डालकर पारित कर देते। सीटों की संख्या की लिखित गारंटी के प्रश्न पर गृह मंत्री ने कहा कि आप विधेयक पारित करते हैं तो हम नया संशोधन सीटों की संख्या डालकर पेश करने को तैयार हैं। वास्तव में यह कहीं पे निशाना कहीं पे निगाहें वाली बात थी। कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों को दिखाना था कि हम संसद में नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित कर सकते हैं। किसी नेता ने महिलाओं को आरक्षण न मिलने पर अफसोस प्रकट नहीं किया। श इसे लोकतंत्र की विजय बताते हुए नए दौर की शुरुआत बताया जा रहा है। प्रियंका वाड्रा ने इसे ऐतिहासिक दिन जताया। थोड़े शब्दों में कहें तो महिलाओं के आरक्षण पर विरोधियों का जो रुख हमने 1996 से देखा लगभग वही अलग रूपों में फिर संसद में था और इसी की परिणति विधेयक के गिरने के रूप में सामने आई।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल-9811027208


शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

नीतीश कुमार युग की उपलब्धियां

बसंत कुमार

कुछ दिन पर पूर्व बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का त्यागपत्र हुआ और उससे पहले उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ग्रहण किया,यह घटनाक्रम कुछ वर्ष पूर्व उनके गुरु जॉर्ज फर्नांडिस के साथ हुए घटनाक्रम की याद दिलाता है।जब वे लोकसभा का चुनाव हारने के बाद अस्वस्थ होते हुए भी राज्यसभा के लिये नामित किए गए तो नीतीश कुमार ने इस घटना को अपने गुरु जारी फर्नांडिस के प्रति गुरु दक्षिणा की संज्ञा दी थी।कुछ कुछ इसी तरह की घटना नीतीश कुमार जी के साथ हो रही है लेकिन यह भी सत्य है कि श्री नीतीश कुमार ने एक राजनेता और प्रशासक के रूप में अटल बिहारी सरकार में कृषि मंत्री के रूप में रेल मंत्री के रूप में और लगभग 20वर्षों  तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में जो उपलब्धियां हासिल की है उनको भुलाया नहीं जा सकता। इसलिए एक मुख्य एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी उपलब्धियां  की व्याख्या करना अत्यंत आवश्यक है और यह देखना है कि  उनके उत्तराधिकारी के रूप में उत्तराधिकार के रूप में सम्राट चौधरी क्या उन उपलब्धियां के आसपास भी पहुंच पाएंगे।
वर्ष 2002में हमे दरभंगा में एक क्रिकेट आयोजन में जाना पड़ा, इसका आयोजन वहां के तत्कालीन सांसद कीर्ति आजाद की पत्नी पूनम आजाद द्वारा संचालित एन जी ओ कर रही थी हमारे साथ दिल्ली से टेस्ट खिलाड़ी रहेअजय जडेजा, गुरु शरण सिंह और अंपायर एस के बंसल क्रिकेट कोच व ग्राउंड स्टाफ था, पटना से दरभंगा सड़क मार्ग के रास्ते जाते समय हमारी गाड़ी ऐसा लग रहा था सड़क पर नहीं गड्ढों में चल रही है वहां पहुंचते पहुंचते सब की हालत खराब हो गई थीं और कहने को हम दरभंगा के सबसे अच्छे होटल में रुके थे पर वह 24घंटे में से 12घंटे से ज्यादा बिजली गायब रहती थी और यह टूर्नामेंट गांव से आई हुई टीमों के बच्चों की जूनियर टीमें के लिए था पर बच्चों की आयु को लेकर कोई भी छूट भैया हमे धमका देता था और फ़ाइनल मैच में मुख्यअतिथि के रूप में लालू प्रसाद को की उपस्थिति में अंपायर के एक फैसले को लेकर इतना हंगामा हुआ कि पुलिस आई और जिले के एस पी के देख रेख में मैच सम्पन्न हुआ पर आज हम प्रायः बिहार जाते हैं और सड़क के साथ साथ कानून व्यवस्था सुधरी हुई है और इसका श्रेय नितीश जी के दो दशक के शासन को जाता है।
नीतीश कुमार ने वर्ष 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कानून व्यवस्था सुधारने, इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से राज्य को सुशासन की ओर मोड़ा। उनकी विशिष्ट उपलब्धियां में स्कूल जाने वाली छात्राओं को साइकिल योजना, शराब बंदी, जीविका दीदी, सात निश्चय के तहत हर घर को नल जल, बिजली, पंचायती राज, महिलाओं को 50% आरक्षण शामिल है। वर्ष 2005 में कानून का राज स्थापित करने और न्याय के साथ विकास के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर उन्होंने सुशासन पारदर्शिता एवं समावेशी विकास की सिद्धांतों पर शासन की नींव रखी उन्होंने पूरी ईमानदारी और लगन से सुशासन के कार्यक्रम पर आधारित नीतियों , कार्यक्रम एवं योजनाओं का कार्यन्वयन किया और उनकी उपलब्धियां संभावनाओं एवं चुनौतियां से भरपूर कार्यकाल को जनता का भरपूर समर्थन मिला।
कुछ वर्षों की अवधि में ही नितीश कुमार ने सार्वजनिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण किया। इस सफर में जहां एकओर प्रभावी विधि व्यवस्था, कानून का राज स्थापित करने में सफलता प्राप्त की वहीं दूसरी ओर मानव संसाधन के साथ-साथ उत्तम आधार भूत संरचना के विकास में कई ऊंचाइयां हासिल की।लोगों के मन में सुरक्षा एवं निश्चय का माहौल बना जिसका प्रभाव राज्य के शहरों तथा गांव में आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में दिखाई पड़ता है।समाज के कमजोरऔर साधन विहीन एवं विकास से वंचित वर्गों को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने बिहार के विकास की एक नई दिशा की परिकल्पना की। जिसकी तारीफ सत्ता पक्ष के साथ साथ विपक्षी भी करते है।
राज्य में विधि व्यवस्था बहाल कर कानून का राज्य स्थापित करना नीतीश कुमार की सर्वोच्च प्राथमिकता थी। बिना किसी  भेदभाव के कानूनी प्रावधानों और वैदिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपराध नियंत्रण एवं अपराधियों को निष्प्रभावी करने के लिए ठोस व्यवस्था लागू की। संगठित अपराध पर अंकुश लगाया। न्यायालयों से समन्वय स्थापित कर त्वरित विचरण प्रणाली की व्यवस्था  लागू की गई।संख्या के अनुपात में पुलिस बल की नियुक्ति सहित पुलिस के सभी आवश्यक संसाधनों के साथ-साथ उनके आधुनिकीकरण पर विशेष जोर दिया गया। जिस बिहार में स्कूलों में शिक्षकों की अत्यधिक कमी थी वहां हजारों की संख्या में शिक्षकों की बहाली हुई। असामाजिक तत्वों द्वारा सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा करने की कोशिश की गई तो उन्होंने त्वरित कार्यवाही करते हुए संवाद कायम कर इन घटनाओं को नियंत्रित किया इन प्रभावी कदमों से एक ओर नागरिकों के मन में सुरक्षा का भाव जागा वहीं दूसरी ओर अपराधियों में कानून का डर स्थापित हुआ और पूरे प्रदेश में लोग कभी भी और कहीं भी अपने घरों से निकाल कर जा सकते थे।
अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस की निति के तहत भ्रष्टाचार के विरुद्ध नीतीश कुमार जी की मुहिम सदैव जारी रही। कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्था कर भ्रष्ट लोक सेवकों के विरुद्ध प्रभावकारी कार्यवाही सुनिश्चित की गई। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो विशेष निगरानी इकाई और आर्थिक अपराध इकाई के द्वारा भ्रष्टाचार में संलिप्त, आय से अधिक संपत्ति रखने वाले, पद का दुरुपयोग करने वाले लोक सेवकों के विरुद्ध मामले दर्ज कर उन्हें सजा दिलवाई गई और उनके द्वारा अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को जप्त करने की ठोस कार्रवाई की गई । देश में पहली बार जप्त अवैध सम्पत्ति के भवनों में गरीब और नि शक्त बच्चों के लिए विद्यालय खोले गए,यहां तक कि भ्रष्टाचार में नाम आने पर अपनी ही सरकार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का त्यागपत्र लेने पर अड़ गए और उनके द्वारा त्यागपत्र न दिए जाने पर राष्ट्रीय जनता दल से अपना एलायंस तोड़ लिया और तमाम आलोचनाओं की परवाह न करते हुए भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर एक स्थाई सरकार बनाई।
सामाजिक न्याय नितीश कुमार की प्राथमिकताओं में सर्वोच्च रही है। वह पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने अपने राज्य में महादलित को परिभाषा किया। उन्होंने अनुसूचित जातियों में दलित और महादलित की पहचान की। महादलित विशेषकर सदियों से उपेक्षित और तिरस्कृत मुसहर समाज को मुख्य धारा में लाने के लिए कई कानून बनाए और घुमंतू जीवन व्यतीत करने वाले मुसहरों को तीन डिसमिल जमीन देने का कानून बनाया, दुर्भाग्य वश मुसहर समाज के नेताओं और सरकारी अधिकारियों की लापरवाही से यह योजना पूर्ण रूप से पूरी नहीं हो पाई। मुसहरों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए वर्ष 2014 में मुख्यमंत्री पद त्याग कर मुसहर समाज से आने वाले अपने मंत्री जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। 
शायद बिहार या पूरे देश में यह पहला अवसर था कि मुसहर जाति से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति एक राज्य का मुख्यमंत्री बना हो। जीतन राम मांझी अपने मुख्यमंत्री के कार्यकाल में कितने सफल या असफल रहे यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नीतीश कुमार ने एक मुसहर को अपनी जगह पर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया और बिहार का हर मुसहर इस बात पर गौरवान्वित महसूस कर सकता है। जब तक नितीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री रहे उनके मंत्रिमंडल में मुसहरों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जीतन राम मांझी, संतोष सुमन और रत्नेश सदा के रूप में सदैव रहा यह तथ्य नीतीश कुमार जी के मुसहर डोम आदि जातियों के विकास दृढ़ संकल्प की ओर इशारा करते हैं, अब देखना यह है कि उनके उत्तराधिकारी के रूप में सम्राट चौधरी कहां तक अपने आपको साबित कर पाते हैं।
यह बात अलग है की बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का व्यक्तित्व सुशासन बाबू और पलटू राम की छवि के बीच झूलता रहा है,पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने अपनी दूर दृष्टि,संकल्प शक्ति से बीमारू प्रदेश बिहार को विकास की राह पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

आंबेडकर जयंती पर विशेष : बाबा साहब डॉ आंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माण के पथ प्रदर्शक

बसंत कुमार

14 अप्रैल 2026 को देशभर में भारत रत्न बाबा साहब डॉ आंबेडकर जी की 136वीं जयंती पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। बाबा साहब भारत की सांसदी इतिहास के इकलौते महापुरुष हैं जिनके 125 में जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा वर्ष  2015 में संसद का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया था और इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने देश के निर्माण में बाबा साहब के योगदान की चर्चा की थी। बाबा साहब के विषय में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण चालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा था कि जब हम विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्रियों की बात करते हैं तो उसे सूची में डॉ अंबेडकर को प्रमुखता से पाते हैं,जब हम प्रमुख कानून विद की बात करते हैं तो डॉक्टर अंबेडकर का नाम सामने आता है,जब हम देश के  संविधान निर्माण की बात करते हैं तोड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन के रूप में  डॉक्टर अंबेडकर की भूमिका प्रमुख रूप से नजर आती है। जब हम देश के वंचित समाज के उत्थान की बात करते हैं तो बाबा साहब आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, साहू जी महाराज आदि समाज सुधारको की श्रेणी में पाए जाते हैं।

मात्र 23 वर्ष की उम्र में डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और उसके पश्चात लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (डी एस सी) की उपाधि प्राप्त की। जिस उपाधि को प्राप्त करने में लोगों को 8 वर्ष का समय लग जाता है डॉक्टर अंबेडकर ने उसे उपाधि को मध्य ढाई वर्ष के परिश्रम से प्राप्त प्राप्त कर लिया था। उनकी शोध "प्रॉब्लम आप रूपी" ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया! उनकी आर्थिक शोधों और विचारों से प्रेरणा लेकर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों और वंचितों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए स्टार्टअप, स्टैंड अप इंडिया,मेक इन इंडिया, जनधन योजना आत्म निर्भर भारत जैसी योजनाओं को मूर्ति रूप दियाऔर आज भारत विश्व की पांचवी अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शीघ्र ही भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लेगा।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने ब्रिटिश काल में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डिप्रेस्ड क्लास के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की अपनी मांग मां वाली वे चाहते तो वंचित वर्ग के समुदाय के लिए एक अलग देश की मांग कर सकते थे पर वह दिल से पक्के राष्ट्रवादी थे और गांधी जी के साथ 1932 में पुणे पैक समझौते के माध्यम से वंचित समुदाय के लिए प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु आरक्षण का प्रावधान करवाया जिसके परिणाम स्वरूप वंचित समाज आज समाज के मुख्य धारा में सम्मिलित हो रहा है और संविधान निर्माण के समय उन्होंने आर्टिकल 3 40 को संविधान में सम्मिलित करवाया जो पिछले वर्गों की स्थित की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान करता है उन्होंने वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के सामने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की वकालत की थी और मंडल आयोग की सिफारिश के लिए एक मजबूत आधार दिया था इसलिए कोई क्या नहीं कर सकता की बाबा साहब अंबेडकर मात्र दलितों के नेता थे बल्कि उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के लिए भी मजबूत आधार दिया।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की प्रतिभा का सम्मान करते हुए ब्रिटिश इंडिया काल में वायसराय काउंसिल के श्रम सदस्य (श्रम मंत्री) के रूप में उन्हें नियुक्त किया गया। वह इस पद पर 1946 42 से लेकर 1946 तक रहे और श्रमिकों का सुधार के लिए अनेक प्रावधान किया श्रमिकों कार्य की अवधि 12 घंटे से हटाकर 8 घंटे करवाई और काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का प्रावधान किया! देश की जल नीति के लिए 1942 में सेंट्रल वोल्टेज वॉटरवेज इरीगेशन और नेवीगेशन आयोग के चेयरमैन के रूप में सूखा मुक्त भारत की नींव रखी। नदियों को आपस में जोड़ने के उनके सुझाव का मध्य प्रदेश की केन और बेतवा नदी के को जोड़ने की परियोजना का वर्ष 2025 में उद्घाटन करके माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ आंबेडकर के सपनों को मूर्ति रूप देने का प्रयास किया।

देश के कानून मंत्री के रूप में डॉक्टर अंबेडकर ने 1931 में हिंदू कोड बिल पेश किया जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के सशक्तिकरण  के लिए पैतृक संपत्ति में उनका उत्तराधिकार था। पर जब कुछ रूढ़िवादी लोगों के कारण लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित न हो सका तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। भारत के इतिहास में डॉक्टर अंबेडकर इकलौते महापुरुष थे जिन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए अपना पद त्याग कर दिया दूसरे शब्दों में महिलाओं के अधिकार के लिए और उनकी शिक्षा के लिए ज्योति बा फुले और साबित्री बाई फूले के मिशन को आगे बढ़ाने का काम किया।

आज हमारा देश संप्रदायवाद की समस्या से जूझ रहा है देश में SIR की आलोचना हो रही हैऔर विपक्षी दलों ने इसको चुनावी मुद्दा बना दिया है जब कि मोदी सरकार अवैध घुसपैठ से देश को मुक्त करना चाहती हैं,पर 1940 की दशक मेंबाबा साहब की पुस्तक "पाकिस्तान एंड पार्टीशन आफ इंडिया" में लिखित बाबा साहब अंबेडकर की बात मान ली गई होती कि देश का  धार्मिक आधार विभाजन न होयदि यह विभाजन अवश्यंभावी ही है तो तो दोनों देशों में जनसंख्या का संपूर्ण स्थानांतरण अर्थात सारे हिंदू भारत में और सारे मुसलमान पाकिस्तान में चले गए होतेऔर यह हो जाता तो आज देश इस गंभीर स्थिति से नहीं गुजर रहा होता। इसके लिए देश के विभाजन की सूरत में जनसंख्या के स्थानांतरण के लिय एक विस्तृत योजना बना ली थी पर प नेहरूऔर जिन्ना ने इस पर अमल नहीं किया और 1947में दोनों ओर से भीषण नर संहार हुआ लेकिन विभाजन के पश्चातभी जो मुसलमान याअल्पसंख्यक भारत में रह गए उनके जीवनकी सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षण के लिए बाबा साहब ने संविधान में प्रावधान किए। जिसके कारण भारत को अपना देश मानने वाले मुसलमान व अल्प संख्यक सम्मान के साथ रह रहे हैं।

संविधान में विवादित अनुच्छेद 370 के पक्ष में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर नहीं थे संविधान निर्माता के रूप में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजो पर उनके डॉक्टर अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला को यह कह कर मना कर दिया कि आप चाहते हैं कि कश्मीर की रक्षा और देश की जनता की कल्याण का जिम्मा भारत उठाए और उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए परंतु नेहरू जी ने डॉ आंबेडकर की असहमति को नजर अंदाज करते हुए इस विवादित अनुच्छेद को संविधान में जुड़वाया परंतु वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प के कारण यह विवादित अनुच्छेद संविधान से हटाया गया और आज कश्मीर देश का हिस्सा बना हुआ है और आज कश्मीर की क्रिकेट टीम रणजी ट्रॉफी चैंपियन है और कश्मीर के अनेक युवा सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होकर देश की मुख्य धारा में शामिल हो रहे है।

बाबा साहब के महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी 125वीं जयंती परवर्ष 2015में आयोजित संसद के विदेश विशेष अधिवेशन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कोई बात कहना चाहती है तो वह डॉक्टर अंबेडकर को कोट (उद्धरित)करती है और सरकार भी अपने समर्थन में कोई बात कहना चाहती है तो वह भी डॉ आंबेडकर की कहिए लिखी बातों को कोट करती है यानि डॉ आंबेडकर पक्ष विपक्ष दोनों को स्वीकार्य हैं और यही डॉ आंबेडकर की महानता और विद्वता का परिचायक है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

देश प्रमुख का सम्मान हम पाश्चात्य से क्यों नहीं सीखते

बसंत कुमार

वर्ष 2014 में एक किताब छपी थी जिसका टाइटल था मोदी नामा, यह पुस्तक मुगल काल में छपी पुस्तक बाबर नामा की तर्ज पर लिखी गई थी जिस प्रकार बाबर नामा में मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर की प्रशंसा की गई थी, उसी प्रकार मोदी नामा की लेखिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बड़ी तारीफ की थी और यहां तक की गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। परंतु कुछ दिन पूर्व उसी लेखिका ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी पर चरित्र हनन के अनेक आरोप लगाए। जबकि यह 2014 से पहले मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात के विकास में उनको कार्यों की बड़ी प्रशंसक रही है परंतु ऐसा क्या है कि मार्च 2026 से प्रधानमंत्री मोदी के चरित्र को लेकर सोशल मीडिया पर इतनी आक्रामक हो गई है।

इसके अतिरिक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता रहेपूर्व मंत्री व राज्यसभा सांसद डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र के बारे में अनाप समाप कहते रहते हैं। यही नहीं डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के बारे में ऐसी बातें कह देते हैं जिसके कल्पना नहीं की जा सकती हैजबकि अटल बिहारी वाजपाई के व्यक्तित्व की प्रशंसा भाजपा के लोग ही नहीं बल्कि विपक्ष में बैठे कांग्रेस के लोग भी करते हैं। अब प्रश्न यह उठना है की सोशल मीडिया पर इस समय देश के प्रधानमंत्री के चरित्र हनन की पुरजोर कोशिश की जा रही है परंतु न तो सरकार और न ही न्यायालय इस मामले में कोई सजान ले रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि देश का प्रधानमंत्री किसी पार्टी का प्रधानमंत्री नहीं है अपितु वह पूरे देश का प्रधानमंत्री है उनसे राजनीतिक विरोध हो सकता है हम उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं पर इस तरह से उनके चरित्र हनन की बात नही की जानी चाहिए।

कुछ वर्षों पूर्व मैंने पूर्व आईएएस अधिकारी और अटल जी की कैबिनेट में वित्त मंत्री का उत्तरदायित्व निभा चुके श्री यशवन्त सिन्हा का एक लेख पढ़ा था जो एक दैनिक में प्रकाशित हुआ था जिसमे उन्होंने लिखा था कि अमेरिका सहित अन्य

पश्चिमी देशों में कभी भी ऐसा नहीं होता कि वहां के लोग अपने देश के प्रधानमंत्रीया राष्ट्रपति कीइस तरह आलोचना करते हैं अपने इस लेख के सपोर्ट में उन्होंने दशकों पहले अमेरिका की इराक पर आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा था इराक द्वारा जैविक परमाणु हथियार रखने केआरोप के आधार पर अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन सरकार पर हमला किया पर वहां कुछ नहीं मिला, लेकिन किसी भी अमेरिकी ने उसे समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की आलोचना नहीं की। इसी प्रकार यूनाइटेड किंगडम में वहां की संसद में किसी सांसद ने महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे थे तो उस सांसद को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी, पर आज हमारे देश में प नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र हनन का फैशन सा चल पड़ा है।

राज गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में और 9 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में चर्चा आयोजित की गई है और सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक वंदे मातरम की याद में साल भर चलने वाले कार्यक्रम की घोषणा की। यह पूरे राज्य के लिए गौरव का विषय था क्योंकि वंदे मातरम सर्वप्रथम1886में कांग्रेस के अधिवेशन में गया गया, लेकिन भाजपा सही सभी पार्टियों ने इस राष्ट्रगीत को सदैव सम्मान दियाऔर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा संसद में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया परंतु इस अवसर पर राज्यसभा सांसद निशिकांत दुबे विपक्ष पर आक्रमण करने में इतने उतावले थे कि इन्होंने इस अवसर पर भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बातें संसद मेंछेड़ दी,

माननीय सांसद यह भूल गए कि भारत के लोकतांत्रिक परंपरा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई के लिए एक दिन देश प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी की थी और वह भविष्य वाडी 4दशक बाद सत्य भी हुई और बांग्लादेश विजय पर अटल बिहारी वाजपेई ने इंदिरागांधी को दुर्गा की उपाधि दी थी और नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में यूनाइटेड नेशन में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया था, इसलिए ऐसे पवित्र मौके पर जहां राष्ट्र की वंदे मातरमऔर बंकिम चंद्र चटर्जी को याद करने की बात हो रही थी वहां पर पंडित नेहरू या श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बात करना हमारे लोकतांत्रिक परंपरा के मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

मधु किश्वर ने वर्ष 2014 में मोदी नामा पुस्तक लिखी और उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदीजी के कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा की यहां तक की गोधरा और अन्य घटनाओं पर उनका बचाव करती रही, ऐसा करते समय उनके मन में कोई न कोई महत्वाकांक्षा रही होगी और उसमें कोई बुराई भी नहीं थी क्योंकि लेखक भी इंसान होता हैऔर उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं और एक पुस्तक लिखने में उसे रात दिन एक करना पड़ता है। मैने भी एक राष्ट्रीय नेता के लिए राष्ट्रवादी कर्मयोगी और हिंदुत्व एक जीवन शैलीजैसी पुस्तके लिखी, जिसके लोकार्पण में भाजपा के शीर्ष पुरुष श्री लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथजी जैसे लोग आए। पर जब ये नेता मोदी सरकार में मंत्री बन गए तो मुझे दूध की मक्खी की तरह बाहर कर दिया गया हो, हो सकता है कि कुछ ऐसा भी मधु किश्वर जी के साथ हुआ हो उन्हें गुस्सा भी आया हो, पर इसके लिए उस नेता का इस तरह से चरित्र हनन करना मेरे विचार में बिल्कुल ही अनुचित है।

बेशक हम विश्व की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के रूप में माने जाते रहे हैं, एक समय ऐसा भी आया जब 1975के आपातकाल के दौरान सभी विपक्ष नेता जेल में ठूंस दिए गए परन्तु तब भी पक्ष विपक्ष के नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर अमर्यादित टिप्पणी नहीं कि। परंतु आज के समय में जिस तरह से नेताओं के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप और उनके चरित्र हनन की घटनाएं बढ़ रही है इन सबके लिए हमें अमेरिका सहित यूरोपीय देशों की परंपराओं को सिखना होगा जहां विरोध होते हुए भी अपने विरोधी नेताओं के ऊपर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए जाते। हमारे यहां तो ऐसे लोग जो बड़े-बड़े उत्तरदायित्व के पदों का निर्वहन कर चुके हैं उनके द्वारा प्रधानमंत्री या अन्य पदों पर रह चुके व्यक्तियों के लिए चरित्र हनन जैसी चीज शुरू कर देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है इससे पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाई जा रही है। सोशल मीडिया पर बेरोक टोक चल रही इस तरह की पोस्ट पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 11वर्षों से देश में सरकार चला रहे हैं और इस कार्यकाल में उनकी सरकार की अनेक उपलब्धियां रही है और यह भी संभव है कि इतने लंबे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो पर इन सब के लिए उनकी आलोचना यदि संसद के अंदर और बाहर हो तो वह स्वागत योग्य है परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के न पूरा होने के कारण डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और मधु किश्वर जैसे लोगों द्वारा चरित्र हनन किया जाना न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री का अपमान है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपमान है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

शिक्षा के नाम पर धंधा : कब तक चलेगी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी?

विकास खितौलिया

भारत में शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की रीढ़ माना गया है। “विद्या दान” को सबसे बड़ा दान कहा गया है, लेकिन आज के दौर में यही शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। खासकर महानगरों में प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और फीस की बेतहाशा वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राजधानी दिल्ली में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है, जहां शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि मुनाफे का साधन बनती दिखाई दे रही है। हाल ही में कुछ न्यूज चैनलों ने खासकर जी न्यूज ने अपने कई कार्यक्रमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और प्राइवेट स्कूलों की इस “कालाबाजारी” पर सवाल खड़े किए हैं। यह सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर है। दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूल पिछले साल से फीस में भारी बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह बढ़ोतरी किसी एक या दो प्रतिशत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार 15% से 30% तक पहुंच जाती है। इससे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि उसकी पारदर्शिता की भी है। स्कूल प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं करते कि आखिर किन आधारों पर फीस बढ़ाई जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों को बिना किसी पूर्व सूचना के बढ़ी हुई फीस का नोटिस थमा दिया जाता है। अगर कोई विरोध करता है, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।

फीस के अलावा स्पेशल एक्टिविटी, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। कई प्राइवेट स्कूलों ने खास दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का नियम बना रखा है। इन दुकानों पर किताबों के दाम बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जो किताबें  सामान्य बाजार में 2000 रुपये में मिल सकती हैं, वही स्कूल में उपस्थित दुकानों पर 7000-8000 रुपये में बेची जाती हैं। यही हाल यूनिफॉर्म का भी है। अन्य पब्लिशर द्वारा छपवाई गई किताबों में अक्सर प्रिंटिंग में बहुत सी त्रुटि भी पाई जाती है । यह एक तरह का “टाई-अप” होता है, जिसमें स्कूल और दुकानदार दोनों को फायदा होता है, लेकिन नुकसान सिर्फ अभिभावकों का होता है। स्कूल द्वारा जारी अनिवार्यता सर्कुलर के कारण मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल में उपस्थित दुकानों से ही खरीदनी पड़ती है। स्पेशल एक्टिविटी की बात तो पूछो ही मत कोई बच्चा यदि स्पोर्ट्स एक्टिविटी में अच्छा है, सही मार्गदर्शन मिले तो देश, अपने माता-पिता का नाम रोशन तो करेगा ही साथ में स्कूल का नाम रोशन होता है। पर स्कूल इस कौशल, प्रतिभा को दरकिनार करते हुए स्पेशल एक्टिविटी के नाम 5000 से 10 हजार ले लेता है । अभिभावकों पर फीस, किताबों का आर्थिक बोझ तो पहले से ही होता है उसके बाद स्पेशल एक्टिविटी के नाम पर और फीस । इसलिए देश में लाखों बच्चे स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी से दूर हो जाते है और तो और देशभर में कई निजी स्कूलों द्वारा हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फंक्शन, कार्निवल, डांडिया डांस और अन्य अलग-अलग शुल्क के नाम पर हजारों रुपये वसूले किए जाते हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या प्राइवेट स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ एक व्यवसाय चला रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना और समाज को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कई स्कूलों में एडमिशन के समय “डोनेशन” या “कैपिटेशन फीस” के नाम पर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं। यह पूरी तरह से अवैध होने के बावजूद खुलेआम चल रहा है। अभिभावक मजबूरी में इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है।

दिल्ली सरकार ने समय-समय पर प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने के लिए कई नियम बनाए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता। स्कूल प्रबंधन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी मनमानी जारी रखते हैं। फीस रेगुलेशन कमेटी जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यवाही अक्सर धीमी और सीमित होती है। जब तक कोई ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्कूलों पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसी वर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साकेत के एपीजे स्कूल ने फीस बढ़ोतरी के चलते कुछ बच्चों के बोर्ड परीक्षा के रोल नम्बर रोक दिए थे, जब यह नेशनल न्यूज बनी तो एग्जाम के एक दिन पूर्व रात्रि में बच्चों को रोल दिए थे । तो वहीं डीपीएस, सालवान आदि प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले उठ रहे है । शिक्षा क्षेत्र में दिल्ली की पिछली सरकार ने अच्छे कदम उठाए थे। कई वर्षों तक स्कूल अपनी मनमानी नहीं कर पाए थे । इस पूरे प्रकारण में सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों को झेलनी पड़ रही है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों को बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसके अलावा, अगर कोई अभिभावक स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं उसके बच्चे को नुकसान न उठाना पड़े। यह डर भी स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देता है।

इस पूरे मुद्दे को सामने लाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है। जब बड़े प्लेटफॉर्म इस विषय को उठाते हैं, तो सरकार और प्रशासन पर दबाव बनता है। हाल ही में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि शायद अब कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन सिर्फ खबर दिखाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को लगातार निगरानी और जन दबाव जरूरी है। वैसे इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं । पर सरकार की नीयत साफ हो । सरकार को फीस वृद्धि पर स्पष्ट और सख्त नियम बनाने होंगे और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। स्कूलों को अपनी आय और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में स्कूलों के एकाधिकार को खत्म करना होगा। स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए ताकि फैसलों में संतुलन बना रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। इन्हीं विषयों पर पिछले साल दिल्ली सरकार एक बिल भी लाई थी, लोगों ने खूब मिटाई भी बाटी और खुशियां बनाई थी । बिल को ताक पर रखते हुए, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी चालू है। सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कोर्ट में जाना चाहिए, और प्रमाणिता के साथ अभिभावकों का पक्ष रखे।

अंततः शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है, और अगर यही नींव कमजोर हो जाए या व्यापार का साधन बन जाए, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। यह सवाल आज हर अभिभावक के मन में है कि शिक्षा के नाम पर यह धंधा आखिर कब तक चलेगा? जब तक सरकार, समाज और अभिभावक मिलकर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक यह स्थिति बदलना मुश्किल है। शिक्षा को फिर से सेवा बनाना होगा, न कि मुनाफे का जरिया। तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

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स्कूलों में भाई भतीजा वाद समाप्त करने के लिय शिक्षा का राष्ट्रीयकरण आवश्यक

बसंत कुमार

सरकार द्वारा लाया गया यूजीसी एक्ट का विवाद यद्यपि न्यायालय में लंबित है और इसके सबजूडिस होने के कारण इस पर कोई तर्क वितर्क नहीं किया जाना चाहिए़। परंतु सोशल मीडिया में यूजीसी एक्ट की आड़ में आरक्षण सहित एससी एसटी एक्ट पर लोग मनमाने ढंग से अपने अपने विचार विशेषज्ञ के रूप में दे रहे हैं जो चीज भारत की संसद के द्वारा पारित की गई है उसपर अनभिज्ञ लोग अपनी राय बिना रोक-टोक के दे रहे हैं। प्राय यह कहा जाता है की विद्यालयों में 90% तक पाने वाले लोग बेरोजगार हैं और 40% अंक पाने वाले लोग उच्च पदों पर बैठे हुए हैं इसके पीछे लोग यह जानने का प्रयास नहीं करते कि देश में प्राइवेट स्कूलों के कारण धनाढ्य परिवारों से ताल्लुक रखने वाले छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में मानवाने अंक दिए जाते हैं जिसके कारण उनका अंक प्रतिशत गरीब वे वंचित समाज के बच्चों से बहुत ही ऊपर होता है इसके लिए यह जरूरी है कि देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण हो। जिससे शिक्षा में भाई भतीजा वाद समाप्त हो और सभी छात्रों को अपनी प्रतिभा साबित करने का अवसर समान रूप से मिले।

भारतीय संविधान का और यूजीसी एक्ट का विरोध करने वाले स्वामी आनंद स्वरूप जैसे लॉग डॉ आंबेडकर के बारे में कहते हैं कि स्कूल परीक्षा में 10वीं या 12वीं में कभी भी डॉक्टर अंबेडकर को 40% से ऊपर अंक प्राप्त नहीं हुए। पर आश्चर्यकी बात यह है कि 23 वर्ष की उम्र में ही डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद लंदन स्कूल का इकोनॉमिक्स से डायरेक्टरेट आफ साइंस डीएससी की उपाधि प्राप्त की जिसे एक आम विद्यार्थी को पूरा करने में 8 वर्ष का समय लग जाता है जबकि डॉक्टर अंबेडकर ने यह उपाधि मात्र ढाई 3 साल के समय में पूरी कर लीऔर उनके शोधों ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस भारतीय स्कूल सिस्टम में डॉक्टर अंबेडकर जैसाप्रतिभा शाली विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी में रहा, वह विदेशी विश्वविद्यालय में पी एचडी और डी ससी जैसे उपाधियां प्राप्त करने में सफल कई हो गया। यूनिवर्सिटी में लिखी गई उनकी थीसिस आज भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है, कहने का तात्पर्य है कि डॉ आंबेडकर में प्रतिभा की कमी नहीं थी बल्कि उनको प्रतिभा को अपने में भारतीय शिक्षण संस्थाओं में द्रोणाचार्यो रवैया गलत था। डॉआंबेडकर जिस समाज से आते थे उसके लिए शिक्षकों का ऐसा ही पूर्वाग्रह था कि ऐसे समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% कैटेगरी के ऊपर के विद्यार्थी होही नहीं सकते। इसलिए पूरे समाज को इस पूर्वाग्रह को छोड़ना होगा की वंचित समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी के होते हैं।

बात 1972 की है जब मैने कक्षा दसवीं की परीक्षा पास की और मेरा दाखिला अपने जिले के प्रतिष्ठित विद्यालय तिलकधारी सिंह क्षत्रिय इंटर कॉलेज जौनपुर में विज्ञान संकाय के छात्रों के रूप में हो गया हो गया। उस विद्यालय में 90%से अधिक शिक्षक क्षत्रिय समुदाय के थे, अपवाद के रूप में पिछड़े वर्ग गड़ेरिया समुदाय के एक शिक्षक फेरु राम पाल थेजो उस जमाने में गणित में पी एच डी थे और 11वी और 12वी कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थे, गणित में डॉक्टरेट होने के बावजूद उनका प्रमोशन डिग्री कॉलेज में नहीं हो पाया। वहां 12वीं की बोर्ड की परीक्षा में रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र व जीव विज्ञान के प्रश्न के पेपर सौ-सौ अंकों के होते थे इनमें से 80 अंक के लिखित परीक्षा के पेपर होते थे और 20-20 संख्या प्रैक्टिकल परीक्षा केलिए निर्धारित होते थे। जिसका कहने को तो परीक्षक बाहर आता था लेकिन वहां के स्थानीय शिक्षकों के मार्गदर्शन में सवर्ण व प्रतिष्ठित परिवारों से आए हुए छात्रों को बीस में से 17-18 से ऊपर ही अंक मिलते थे। मतलब यह है कि 500 अंक की परीक्षा में 60 अंकों में पुणे की प्रैक्टिकल परीक्षा में उन्हें इतनेअंक दे दिए जाते थे उनकी अच्छी खासी मेरिट हो जाती थी जबकि वहीं पर पिछड़े वर्गव वंचित समझाएं के छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में वह मुश्किल 10-12 अंक दिए जाते थे, इसका परिणाम यह होता था कि लिखित परीक्षा में वंचित समुदाय का विद्यार्थी कितना भी अच्छा कर ले फाइनल परीक्षा फल में वह काफी नीचे होताथा।

यूपीएससी सहित अन्य भर्ती आयोगों में उन परीक्षाओं में जहां साक्षात्कार परीक्षा के अंक परीक्षा के परिणाम का का हिस्सा होते हैं वहां पर सवर्ण और धनाढ्य परिवारों के बच्चों को अधिक नंबर मिलते हैं जिससे उनकी मेरिट काफी ऊपर चली जाती है जैसे सिविल सर्विस परीक्षा में साक्षात्कार परीक्षा 275 अंकों की होती है और लिखित परीक्षा 1750 अंकों में होती है इस तरह से फाइनल रिजल्ट 2025 में प्राप्त अंकों के आधार पर बनते है क्योंकि सवर्ण और धनाढ्य के बच्चे 275 अंकों साक्षात्कार परीक्षा में पिछड़े व वंचित समाज के बच्चों के मुकाबले अच्छे नंबर प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं क्योंकि इंटरव्यू परीक्षा में बैठे बोर्ड मेंबर्स के सामने परीक्षार्थी की पूरी फाइल उनके सामने होती है और ऐसे में जाति और रुतबे के असर से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए गरीब और वंचित समाज के बच्चे लिखित परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद फाइनल मेरिट में बहुत नीचे आ जाते है। प्राय या देखा गया है स्टाफ सिलेक्शन कमीशन की क्लर्क ग्रेड इग्जामिनेशन और अस्सिटेंट ग्रेड एग्जामिनेशन जिसमें इंटरव्यू नहीं होता उनमें जनरल ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातिऔर ईडब्लूएस के छात्रों की मेरिट में बहुत अंतर नहीं होता है। लेकिन जहां इंटरव्यू का प्रावधान होता है वहां पर मेरिट में बहुत बड़ा अंतर पाया जाता है इसका मतलब यह है कि आज भी साक्षात परीक्षाओं में उच्च जाति धनाढ्य का परिवार से होना बहुत अंतर लाता है।

जहां तक प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की बात है अधिकांश प्राइवेट शिक्षण संस्थान सवर्ण और धनाढ्य लोगों के द्वारा चलाए जाते है और प्रैक्टिकल परीक्षा में इंटरनल असेसमेंट के नाम पर बड़े परिवारों के छात्रों को अच्छे नंबर मिल जाते हैं और इसी के आधार पर यह नारेटिव गढ़लिया जाता है कि 90%वालों को नौकरी नहीं मिल रही और 40% वालों को आसानी से नौकरी मिल जा रही है क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में गरीब अमीर सवर्ण दलित सबको परफॉर्म करने के लिए एक स्तर का प्लेइंग ग्राउंड नहीं मिलता। इस विषय में मैं अपने कॉलेज मडियाहूं डिग्री कॉलेज का 1978का उदाहरण देना चाहता हूं-वहां आपातकाल के बाद छात्र संघ के चुनाव होने थे और प्रधानाचार्य ने यह घोषणा की की बीए प्रथम वर्ष में सर्वोच्च अंक लाने वाले तीन विद्यार्थियों को छात्र यूनियन की कमेटी में प्रतिनिधि प्रतिनिधि के रूप में रखा जाएगा। संभवतःप्रधानाचार्य को या उम्मीद रही होगी कि तीनों ही प्रतिनिधि सवर्ण समाज के होंगे पर क्योंकि वहां पर सिर्फ औरआर्ट्स फैकल्टी चलती थी इसलिएउसमें कोई प्रैक्टिकल परीक्षा नहीं थी और इस कारण 3 के तीनों प्रतिनिधि दलित वंचित और बैकवर्ड समाज से आगए, कहने का तात्पर्य है कि जब वहां पर साक्षात्कार परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था तो वहां पर पिछले वर्गों का 40% और सामानों का 90% पूर्वाग्रह फेल हो गया। और टॉपर विद्यार्थियों में एक भी सवर्ण नहीं मिला जिसे छात्र संघ में प्रतिनिधि के तौर पर रखा जा सकता।

इस समय पूरे हिंदू समाज में यह नारेटिव बड़े जोर शोर से चलाया जा रहा है कि 90% वाले बेकार बैठे हैं और 40% लोग लेकर लोग डॉक्टर बने हुए हैं और ऐसे डॉक्टर मरीज का कैसे इलाज करें ऐसा फैलाने वालों को शायद पता नहीं है कि किसी भी मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थियों को पास मार्क लाने के लिए 50% तक जाना पाना जरूरी होता है चाहे वह किसी भी जाति यां वर्ण के हो, इसीलिए कभी भी 40% और 90%वाली डॉक्टरों का भ्रम न फैलाए अपना आत्मा से पूछे जब कभी आप अस्पताल में बीमार होकर जाते हैं तो न तो डॉक्टर की जाति पूछते हैं और न खून देने वाले की जाति पूछते हैं फिर राजनीतिक स्वार्थ के लिय ऐसी अफवाहें फैलाकर डॉक्टरी पेशे को बदनाम क्यों करते हैं। आप जिस 90% के नम्बर की दुहाई देते हैं वह अपने दम पर नहीं अपने स्कूल में पैरवी पुत्र के रूप में पाई है इसलिए उस पर घमंड न करें जिस तरह से 90% और 40% के रूप में नारेटिव गढ़े जा रहे हैं और यह दलील दी जाती है कि 40% अंक प्राप्त करने वाला आरक्षित केटेगिरी वाला छात्र कभी अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता लेकिन वास्तविकता इसके उलट है, जो डा आंबेडकर भारत में स्कूल शिक्षा के दौरान लगातार 40%कैटेगरी वाले छात्र रहे वही विदेश में जाकर पी एच डी और डी एस सी डिग्रियां हसिल करने में कामयाब रहे, इसका अर्थ यह है कि दोष सवर्ण या वंचित समाज के विद्यार्थियों में है बल्कि सारा दोष यहां की शिक्षा व्यवस्था में है जो वर्ग विशेष के नियंत्रण में चल रही है, यदि सरकार आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना चाह रही है तो उसे स्कूल और कॉलेजों में वर्ण विशेष नियंत्रण को समाप्त करना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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