शनिवार, 4 अप्रैल 2026

शिक्षा के नाम पर धंधा : कब तक चलेगी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी?

विकास खितौलिया

भारत में शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की रीढ़ माना गया है। “विद्या दान” को सबसे बड़ा दान कहा गया है, लेकिन आज के दौर में यही शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। खासकर महानगरों में प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और फीस की बेतहाशा वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राजधानी दिल्ली में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है, जहां शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि मुनाफे का साधन बनती दिखाई दे रही है। हाल ही में कुछ न्यूज चैनलों ने खासकर जी न्यूज ने अपने कई कार्यक्रमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और प्राइवेट स्कूलों की इस “कालाबाजारी” पर सवाल खड़े किए हैं। यह सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर है। दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूल पिछले साल से फीस में भारी बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह बढ़ोतरी किसी एक या दो प्रतिशत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार 15% से 30% तक पहुंच जाती है। इससे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि उसकी पारदर्शिता की भी है। स्कूल प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं करते कि आखिर किन आधारों पर फीस बढ़ाई जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों को बिना किसी पूर्व सूचना के बढ़ी हुई फीस का नोटिस थमा दिया जाता है। अगर कोई विरोध करता है, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।

फीस के अलावा स्पेशल एक्टिविटी, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। कई प्राइवेट स्कूलों ने खास दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का नियम बना रखा है। इन दुकानों पर किताबों के दाम बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जो किताबें  सामान्य बाजार में 2000 रुपये में मिल सकती हैं, वही स्कूल में उपस्थित दुकानों पर 7000-8000 रुपये में बेची जाती हैं। यही हाल यूनिफॉर्म का भी है। अन्य पब्लिशर द्वारा छपवाई गई किताबों में अक्सर प्रिंटिंग में बहुत सी त्रुटि भी पाई जाती है । यह एक तरह का “टाई-अप” होता है, जिसमें स्कूल और दुकानदार दोनों को फायदा होता है, लेकिन नुकसान सिर्फ अभिभावकों का होता है। स्कूल द्वारा जारी अनिवार्यता सर्कुलर के कारण मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल में उपस्थित दुकानों से ही खरीदनी पड़ती है। स्पेशल एक्टिविटी की बात तो पूछो ही मत कोई बच्चा यदि स्पोर्ट्स एक्टिविटी में अच्छा है, सही मार्गदर्शन मिले तो देश, अपने माता-पिता का नाम रोशन तो करेगा ही साथ में स्कूल का नाम रोशन होता है। पर स्कूल इस कौशल, प्रतिभा को दरकिनार करते हुए स्पेशल एक्टिविटी के नाम 5000 से 10 हजार ले लेता है । अभिभावकों पर फीस, किताबों का आर्थिक बोझ तो पहले से ही होता है उसके बाद स्पेशल एक्टिविटी के नाम पर और फीस । इसलिए देश में लाखों बच्चे स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी से दूर हो जाते है और तो और देशभर में कई निजी स्कूलों द्वारा हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फंक्शन, कार्निवल, डांडिया डांस और अन्य अलग-अलग शुल्क के नाम पर हजारों रुपये वसूले किए जाते हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या प्राइवेट स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ एक व्यवसाय चला रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना और समाज को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कई स्कूलों में एडमिशन के समय “डोनेशन” या “कैपिटेशन फीस” के नाम पर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं। यह पूरी तरह से अवैध होने के बावजूद खुलेआम चल रहा है। अभिभावक मजबूरी में इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है।

दिल्ली सरकार ने समय-समय पर प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने के लिए कई नियम बनाए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता। स्कूल प्रबंधन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी मनमानी जारी रखते हैं। फीस रेगुलेशन कमेटी जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यवाही अक्सर धीमी और सीमित होती है। जब तक कोई ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्कूलों पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसी वर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साकेत के एपीजे स्कूल ने फीस बढ़ोतरी के चलते कुछ बच्चों के बोर्ड परीक्षा के रोल नम्बर रोक दिए थे, जब यह नेशनल न्यूज बनी तो एग्जाम के एक दिन पूर्व रात्रि में बच्चों को रोल दिए थे । तो वहीं डीपीएस, सालवान आदि प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले उठ रहे है । शिक्षा क्षेत्र में दिल्ली की पिछली सरकार ने अच्छे कदम उठाए थे। कई वर्षों तक स्कूल अपनी मनमानी नहीं कर पाए थे । इस पूरे प्रकारण में सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों को झेलनी पड़ रही है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों को बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसके अलावा, अगर कोई अभिभावक स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं उसके बच्चे को नुकसान न उठाना पड़े। यह डर भी स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देता है।

इस पूरे मुद्दे को सामने लाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है। जब बड़े प्लेटफॉर्म इस विषय को उठाते हैं, तो सरकार और प्रशासन पर दबाव बनता है। हाल ही में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि शायद अब कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन सिर्फ खबर दिखाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को लगातार निगरानी और जन दबाव जरूरी है। वैसे इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं । पर सरकार की नीयत साफ हो । सरकार को फीस वृद्धि पर स्पष्ट और सख्त नियम बनाने होंगे और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। स्कूलों को अपनी आय और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में स्कूलों के एकाधिकार को खत्म करना होगा। स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए ताकि फैसलों में संतुलन बना रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। इन्हीं विषयों पर पिछले साल दिल्ली सरकार एक बिल भी लाई थी, लोगों ने खूब मिटाई भी बाटी और खुशियां बनाई थी । बिल को ताक पर रखते हुए, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी चालू है। सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कोर्ट में जाना चाहिए, और प्रमाणिता के साथ अभिभावकों का पक्ष रखे।

अंततः शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है, और अगर यही नींव कमजोर हो जाए या व्यापार का साधन बन जाए, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। यह सवाल आज हर अभिभावक के मन में है कि शिक्षा के नाम पर यह धंधा आखिर कब तक चलेगा? जब तक सरकार, समाज और अभिभावक मिलकर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक यह स्थिति बदलना मुश्किल है। शिक्षा को फिर से सेवा बनाना होगा, न कि मुनाफे का जरिया। तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

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स्कूलों में भाई भतीजा वाद समाप्त करने के लिय शिक्षा का राष्ट्रीयकरण आवश्यक

बसंत कुमार

सरकार द्वारा लाया गया यूजीसी एक्ट का विवाद यद्यपि न्यायालय में लंबित है और इसके सबजूडिस होने के कारण इस पर कोई तर्क वितर्क नहीं किया जाना चाहिए़। परंतु सोशल मीडिया में यूजीसी एक्ट की आड़ में आरक्षण सहित एससी एसटी एक्ट पर लोग मनमाने ढंग से अपने अपने विचार विशेषज्ञ के रूप में दे रहे हैं जो चीज भारत की संसद के द्वारा पारित की गई है उसपर अनभिज्ञ लोग अपनी राय बिना रोक-टोक के दे रहे हैं। प्राय यह कहा जाता है की विद्यालयों में 90% तक पाने वाले लोग बेरोजगार हैं और 40% अंक पाने वाले लोग उच्च पदों पर बैठे हुए हैं इसके पीछे लोग यह जानने का प्रयास नहीं करते कि देश में प्राइवेट स्कूलों के कारण धनाढ्य परिवारों से ताल्लुक रखने वाले छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में मानवाने अंक दिए जाते हैं जिसके कारण उनका अंक प्रतिशत गरीब वे वंचित समाज के बच्चों से बहुत ही ऊपर होता है इसके लिए यह जरूरी है कि देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण हो। जिससे शिक्षा में भाई भतीजा वाद समाप्त हो और सभी छात्रों को अपनी प्रतिभा साबित करने का अवसर समान रूप से मिले।

भारतीय संविधान का और यूजीसी एक्ट का विरोध करने वाले स्वामी आनंद स्वरूप जैसे लॉग डॉ आंबेडकर के बारे में कहते हैं कि स्कूल परीक्षा में 10वीं या 12वीं में कभी भी डॉक्टर अंबेडकर को 40% से ऊपर अंक प्राप्त नहीं हुए। पर आश्चर्यकी बात यह है कि 23 वर्ष की उम्र में ही डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद लंदन स्कूल का इकोनॉमिक्स से डायरेक्टरेट आफ साइंस डीएससी की उपाधि प्राप्त की जिसे एक आम विद्यार्थी को पूरा करने में 8 वर्ष का समय लग जाता है जबकि डॉक्टर अंबेडकर ने यह उपाधि मात्र ढाई 3 साल के समय में पूरी कर लीऔर उनके शोधों ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस भारतीय स्कूल सिस्टम में डॉक्टर अंबेडकर जैसाप्रतिभा शाली विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी में रहा, वह विदेशी विश्वविद्यालय में पी एचडी और डी ससी जैसे उपाधियां प्राप्त करने में सफल कई हो गया। यूनिवर्सिटी में लिखी गई उनकी थीसिस आज भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है, कहने का तात्पर्य है कि डॉ आंबेडकर में प्रतिभा की कमी नहीं थी बल्कि उनको प्रतिभा को अपने में भारतीय शिक्षण संस्थाओं में द्रोणाचार्यो रवैया गलत था। डॉआंबेडकर जिस समाज से आते थे उसके लिए शिक्षकों का ऐसा ही पूर्वाग्रह था कि ऐसे समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% कैटेगरी के ऊपर के विद्यार्थी होही नहीं सकते। इसलिए पूरे समाज को इस पूर्वाग्रह को छोड़ना होगा की वंचित समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी के होते हैं।

बात 1972 की है जब मैने कक्षा दसवीं की परीक्षा पास की और मेरा दाखिला अपने जिले के प्रतिष्ठित विद्यालय तिलकधारी सिंह क्षत्रिय इंटर कॉलेज जौनपुर में विज्ञान संकाय के छात्रों के रूप में हो गया हो गया। उस विद्यालय में 90%से अधिक शिक्षक क्षत्रिय समुदाय के थे, अपवाद के रूप में पिछड़े वर्ग गड़ेरिया समुदाय के एक शिक्षक फेरु राम पाल थेजो उस जमाने में गणित में पी एच डी थे और 11वी और 12वी कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थे, गणित में डॉक्टरेट होने के बावजूद उनका प्रमोशन डिग्री कॉलेज में नहीं हो पाया। वहां 12वीं की बोर्ड की परीक्षा में रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र व जीव विज्ञान के प्रश्न के पेपर सौ-सौ अंकों के होते थे इनमें से 80 अंक के लिखित परीक्षा के पेपर होते थे और 20-20 संख्या प्रैक्टिकल परीक्षा केलिए निर्धारित होते थे। जिसका कहने को तो परीक्षक बाहर आता था लेकिन वहां के स्थानीय शिक्षकों के मार्गदर्शन में सवर्ण व प्रतिष्ठित परिवारों से आए हुए छात्रों को बीस में से 17-18 से ऊपर ही अंक मिलते थे। मतलब यह है कि 500 अंक की परीक्षा में 60 अंकों में पुणे की प्रैक्टिकल परीक्षा में उन्हें इतनेअंक दे दिए जाते थे उनकी अच्छी खासी मेरिट हो जाती थी जबकि वहीं पर पिछड़े वर्गव वंचित समझाएं के छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में वह मुश्किल 10-12 अंक दिए जाते थे, इसका परिणाम यह होता था कि लिखित परीक्षा में वंचित समुदाय का विद्यार्थी कितना भी अच्छा कर ले फाइनल परीक्षा फल में वह काफी नीचे होताथा।

यूपीएससी सहित अन्य भर्ती आयोगों में उन परीक्षाओं में जहां साक्षात्कार परीक्षा के अंक परीक्षा के परिणाम का का हिस्सा होते हैं वहां पर सवर्ण और धनाढ्य परिवारों के बच्चों को अधिक नंबर मिलते हैं जिससे उनकी मेरिट काफी ऊपर चली जाती है जैसे सिविल सर्विस परीक्षा में साक्षात्कार परीक्षा 275 अंकों की होती है और लिखित परीक्षा 1750 अंकों में होती है इस तरह से फाइनल रिजल्ट 2025 में प्राप्त अंकों के आधार पर बनते है क्योंकि सवर्ण और धनाढ्य के बच्चे 275 अंकों साक्षात्कार परीक्षा में पिछड़े व वंचित समाज के बच्चों के मुकाबले अच्छे नंबर प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं क्योंकि इंटरव्यू परीक्षा में बैठे बोर्ड मेंबर्स के सामने परीक्षार्थी की पूरी फाइल उनके सामने होती है और ऐसे में जाति और रुतबे के असर से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए गरीब और वंचित समाज के बच्चे लिखित परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद फाइनल मेरिट में बहुत नीचे आ जाते है। प्राय या देखा गया है स्टाफ सिलेक्शन कमीशन की क्लर्क ग्रेड इग्जामिनेशन और अस्सिटेंट ग्रेड एग्जामिनेशन जिसमें इंटरव्यू नहीं होता उनमें जनरल ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातिऔर ईडब्लूएस के छात्रों की मेरिट में बहुत अंतर नहीं होता है। लेकिन जहां इंटरव्यू का प्रावधान होता है वहां पर मेरिट में बहुत बड़ा अंतर पाया जाता है इसका मतलब यह है कि आज भी साक्षात परीक्षाओं में उच्च जाति धनाढ्य का परिवार से होना बहुत अंतर लाता है।

जहां तक प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की बात है अधिकांश प्राइवेट शिक्षण संस्थान सवर्ण और धनाढ्य लोगों के द्वारा चलाए जाते है और प्रैक्टिकल परीक्षा में इंटरनल असेसमेंट के नाम पर बड़े परिवारों के छात्रों को अच्छे नंबर मिल जाते हैं और इसी के आधार पर यह नारेटिव गढ़लिया जाता है कि 90%वालों को नौकरी नहीं मिल रही और 40% वालों को आसानी से नौकरी मिल जा रही है क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में गरीब अमीर सवर्ण दलित सबको परफॉर्म करने के लिए एक स्तर का प्लेइंग ग्राउंड नहीं मिलता। इस विषय में मैं अपने कॉलेज मडियाहूं डिग्री कॉलेज का 1978का उदाहरण देना चाहता हूं-वहां आपातकाल के बाद छात्र संघ के चुनाव होने थे और प्रधानाचार्य ने यह घोषणा की की बीए प्रथम वर्ष में सर्वोच्च अंक लाने वाले तीन विद्यार्थियों को छात्र यूनियन की कमेटी में प्रतिनिधि प्रतिनिधि के रूप में रखा जाएगा। संभवतःप्रधानाचार्य को या उम्मीद रही होगी कि तीनों ही प्रतिनिधि सवर्ण समाज के होंगे पर क्योंकि वहां पर सिर्फ औरआर्ट्स फैकल्टी चलती थी इसलिएउसमें कोई प्रैक्टिकल परीक्षा नहीं थी और इस कारण 3 के तीनों प्रतिनिधि दलित वंचित और बैकवर्ड समाज से आगए, कहने का तात्पर्य है कि जब वहां पर साक्षात्कार परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था तो वहां पर पिछले वर्गों का 40% और सामानों का 90% पूर्वाग्रह फेल हो गया। और टॉपर विद्यार्थियों में एक भी सवर्ण नहीं मिला जिसे छात्र संघ में प्रतिनिधि के तौर पर रखा जा सकता।

इस समय पूरे हिंदू समाज में यह नारेटिव बड़े जोर शोर से चलाया जा रहा है कि 90% वाले बेकार बैठे हैं और 40% लोग लेकर लोग डॉक्टर बने हुए हैं और ऐसे डॉक्टर मरीज का कैसे इलाज करें ऐसा फैलाने वालों को शायद पता नहीं है कि किसी भी मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थियों को पास मार्क लाने के लिए 50% तक जाना पाना जरूरी होता है चाहे वह किसी भी जाति यां वर्ण के हो, इसीलिए कभी भी 40% और 90%वाली डॉक्टरों का भ्रम न फैलाए अपना आत्मा से पूछे जब कभी आप अस्पताल में बीमार होकर जाते हैं तो न तो डॉक्टर की जाति पूछते हैं और न खून देने वाले की जाति पूछते हैं फिर राजनीतिक स्वार्थ के लिय ऐसी अफवाहें फैलाकर डॉक्टरी पेशे को बदनाम क्यों करते हैं। आप जिस 90% के नम्बर की दुहाई देते हैं वह अपने दम पर नहीं अपने स्कूल में पैरवी पुत्र के रूप में पाई है इसलिए उस पर घमंड न करें जिस तरह से 90% और 40% के रूप में नारेटिव गढ़े जा रहे हैं और यह दलील दी जाती है कि 40% अंक प्राप्त करने वाला आरक्षित केटेगिरी वाला छात्र कभी अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता लेकिन वास्तविकता इसके उलट है, जो डा आंबेडकर भारत में स्कूल शिक्षा के दौरान लगातार 40%कैटेगरी वाले छात्र रहे वही विदेश में जाकर पी एच डी और डी एस सी डिग्रियां हसिल करने में कामयाब रहे, इसका अर्थ यह है कि दोष सवर्ण या वंचित समाज के विद्यार्थियों में है बल्कि सारा दोष यहां की शिक्षा व्यवस्था में है जो वर्ग विशेष के नियंत्रण में चल रही है, यदि सरकार आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना चाह रही है तो उसे स्कूल और कॉलेजों में वर्ण विशेष नियंत्रण को समाप्त करना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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