यूसुफ खान उर्फ वाई के राजपूत
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सत्य, निष्पक्ष और जनहितकारी जानकारी उपलब्ध कराना है। लेकिन दुर्भाग्य से आज पत्रकारिता का यह गौरवशाली स्वरूप कई जगहों पर धूमिल होता दिखाई दे रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण वे लोग हैं, जो पत्रकारिता को सेवा और जिम्मेदारी नहीं, बल्कि निजी लाभ और प्रभाव का माध्यम समझ बैठे हैं।
वर्तमान समय में अनेक मीडिया संस्थान सर्कुलेशन, विज्ञापन और आर्थिक लाभ की होड़ में बिना उचित जांच-पड़ताल के लोगों को अपने साथ जोड़ रहे हैं। परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनका पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। कई स्थानों पर अवैध कारोबार, ठेकेदारी, रियल एस्टेट, निजी व्यवसाय या राजनीतिक स्वार्थों से जुड़े लोग भी पत्रकारिता का पहचान पत्र लेकर घूमते दिखाई देते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे लोगों का उद्देश्य समाचार संकलन या जनहित के मुद्दों को उठाना नहीं होता। उनका ध्यान अक्सर उन स्थानों पर केंद्रित रहता है जहां किसी प्रकार की अनियमितता या विवाद हो, ताकि उसका इस्तेमाल व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जा सके। इससे न केवल पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचती है, बल्कि समाज में पत्रकारों की छवि भी प्रभावित होती है।
विडंबना यह है कि जब ऐसे किसी व्यक्ति का नाम किसी आपराधिक या विवादित मामले में सामने आता है, तो पूरे पत्रकार समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आम जनता के मन में यह धारणा बनने लगती है कि सभी पत्रकार एक जैसे हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। आज भी हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद निष्पक्षता, ईमानदारी और साहस के साथ जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं।
असली पत्रकार सत्ता के सामने सवाल खड़े करता है, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है और समाज की समस्याओं को मंच प्रदान करता है। वहीं फर्जी और अवसरवादी तत्व पत्रकारिता की आड़ लेकर अपने हित साधने में लगे रहते हैं। यही कारण है कि ईमानदार पत्रकारों को कई बार अनावश्यक आलोचना और अविश्वास का सामना करना पड़ता है।
समय आ गया है कि मीडिया संस्थान अपनी जिम्मेदारी को समझें। किसी भी व्यक्ति को संस्थान से जोड़ने से पहले उसके चरित्र, कार्यशैली और सामाजिक पृष्ठभूमि की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। पत्रकारिता कोई पहचान पत्र बांटने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेही का दायित्व है।
यदि मीडिया संस्थान इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाते, तो कुछ लोगों की गलत हरकतों का दाग पूरे पत्रकारिता जगत को बदनाम करता रहेगा। पत्रकारिता की साख बचाने के लिए आवश्यक है कि संस्थान, पत्रकार और समाज—तीनों मिलकर इस चुनौती का सामना करें।
कलम की ताकत तभी तक सम्मानित है, जब तक वह सच और जनहित के लिए समर्पित है।
यह लेख संपादकीय शैली में लिखा गया है और शीर्षक पाठकों का ध्यान आकर्षित करने वाला रखा गया है।
National Totay 24×7 satalite News chennal के पत्रकार यूसुफ खान उर्फ वाई के राजपूत की कलम से कड़वा सच।