बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

संयुक्त परिवार की व्यवस्था क्या आज भी प्रासंगिक है?

बसंत कुमार

हम दिल्ली के जिस इलाके में रहते हैं उसे दिल्ली का बड़ा समृद्ध इलाका का माना जाता है लेकिन एक चीज जो प्रायः मन को कचोटती रहती है की इन बड़े-बड़े घरों में वृद्ध पति पत्नी अकेले रहते हैं और उनको देखने वाला कोई नहीं रहता क्योंकि इनमें से अधिकांश के बेटे बहु विदेश में रहते हैं या अच्छे अवसर की तलाश में अन्य शहरों में रहते हैं। इन वेदों की खबर लेने वाला कोई नहीं है अगर यह बीमार हो जाए तो पैसा होने के बावजूद भी उनकी देख लेकर देखरेख वाला कोई नहीं रहता। हम अखबारों में रोज पढ़ते हैं कि की इन समृद्ध परिवारों के वृद्धो की देख-रेख करने के लिए वृद्ध आश्रम की एक विकल्प बचता है, ये भरे पूरे परिवार के होने के बावजूद अनाथालयों में या वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। खाने को भारत पूरा परिवार है बेटे बेटियां सभी उच्च पदों पर हैं लेकिन उन्हें 2 जून की रोटी देने वाला कोई नहीं है और यह समस्या पिछले30-40 वर्षों से अधिक हो गई है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद आधुनिकता की दौड़ में हम संयुक्त परिवार प्रथा से दूर न्यूक्लियर फैमिली की ओर अग्रसर हो रहे हैं अब इस समय यह विचार करने का समय आ गया है की क्या संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने से और न्यूक्लियर फैमिली कॉन्सेप्ट आने से हमारे सुकून भरे दिन अब लद चुके हैं।

वास्तविकता यह है कि डब्बे के दशक के जब से आर्थिक सुधार युग का आगमन हुआ और हम पश्चात देशों के सम्पर्क में आ गए तो हमारे आधुनिक जीवन शैली ने पारिवारिक ढांचे को बुरी तरह से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार का टूटना एकल परिवारों का बढ़ना और आपसी संवाद में कमी हमारे जीवन में चार और मानसिक तनाव को बढ़ा रहे हैं रोजगार बेहतर अवसरों की तलाश में लोग अपने घरों से दूर हो रहे हैं जिसे पारिवारिक भावनात्मक सहारा कमजोर पड़ रहा है। आर्थिक सुरक्षा सीमित आए परिवार की जिम्मेदारियां का दबाव और रिश्तो में प्रति दूरियां मन को अस्थिर कर रही हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद पारंपरिक और आधुनिक सोच का टकराव तथा रिश्तो के अनावश्यक हस्तक्षेप पारिवारिक तनाव को जन्म दे रहे हैं। आज मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती काम नहीं बल्कि कम से जुड़ा दबाव और समाज में बनी इमेज है। परिवार की उम्मीदें रिश्तेदारों की तुलना और लोग क्या कहेंगे का डर इंसान को भीतर से तोड़ रहा है और यही मानसिक दवा तनाव धीरे-धीरे हमारी मानसिक दशा को और पारिवारिक संबंधों को खराब कर रहा है।

आज अधिक पैसा कमाने और अच्छे जीवन की तलाश में लोग बाहर जा रहे हैं और परिवार बिखर रहे हैं और इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि है कि प्राचीन संयुक्त परिवार की परंपरा से हम दूर होते जा रहे हैं और पैसा कमाने की बोर्ड में घर का सुकून हमसे छीना जा रहा है और बड़े बुजुर्ग की ओर से हम उदासीन होते जा रहे हैं, आज के दो दशक पूर्व यदि पति पत्नी में कोई विवाद होता था तो घर के बड़े बुजुर्ग इस विवाद को बड़ी आसानी से सुलझा देते थे पर आज हम घर के बड़े बुजुर्गों से दूर हो गए हैं और पति-पत्नी कि थोड़े-थोड़े से मन मोटे झगड़ा के बाद स्थिति कोर्ट और तलाक तक पहुंच जाती हैआज के आधुनिक युग में जहां पर घर के बड़े बुजुर्ग वृद्ध आश्रम अनाथालय में रहने को मजबूर हैं वहीं पति-पत्नी के बीच कोर्ट केसेस और तलाक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है अब अवसर आ गया है किन समस्याओं के बारे में गंभीरता से सोचें और जान क्या आखिर क्यों हम मानसिक रूप से अस्थिर क्यों हो रहे हैं।

यदि हम इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करें तो हमें समझ में आता है लोगों का लगातार चिंतित रहना स्वभाव में चिडचिडापन का मुख्य कारण संयुक्त परिवार का बिछड़ना है जिसकी वजह से हम या तो दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और संवाद के लिए कोई जगह नहीं होती जबकि संयुक्त परिवार प्रणाली में हम दिन भर काम करने के बाद शाम को परिवार के सभी सदस्यों के बीच संवाद करते थे समाचार सुलझाई जाती थी और फिर दूसरे दिन तरोताजा होकर कम पर जाते थे लेकिन आज संयुक्त परिवार बिगड़ने से ना तो संवाद हो रहे हैं और ना ही बड़े गुना से सलाह ली जा रही है जिसके कारण हमारा पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर रहा है। ऐसी स्थिति का लगातार बने रहना बहुत ही चिंताजनक है। लगातार चिंता चिड़चिड़ापन एकाग्रता में कमी, नींद न आने की समस्या, शारीरिक थकान सामाजिक अलगाव तथा भावनात्मक असंतुलन लंबे समय तक न बने रहे इसके लिए इसका समाधान आवश्यक है।

समाधान की शुरुआत परिवार से ही होती है। खुला संवाद एक दूसरे की भावनाओं को समझना और अपनापन ही मानसिक सुकून की पहली सीढ़ी है। बच्चों को डांट नहीं सहयोग की जरूरत होती है। युवाओं को आलोचना नहीं विश्वास चाहिए और बुजुर्गों को उपेक्षा नहीं सम्मान और साथ चाहिए, पर न्यूक्लियर फैमिली की कॉन्सेप्ट आने से यह सब समाप्त हो गयाहै। परिवार का टूटना परिवार का टूटना केवल सामाजिक ढांचे का बदलाव नहीं बल्कि एक गहरी मानसिक पीड़ा है संवेदनशीलता और आपसी सहयोग से ही इसके इलाकों काम किया जा सकता है जब समाज सफलता से पहले खुशहाली को प्राथमिकता देगा तो यह समस्याएं सदा समाप्त हो जाएंगे जब तक इंसान अपने मन को समझना नहीं सीखेगा तब तक बाहरी सफलताएं भी उसको शांति प्रदान नहीं करेंगी। यह जानने के पहले हमें समझना होगा कि हमारे संयुक्त परिवार से हमें क्या फायदे थे और अब संयुक्त परिवार बिखरने से क्या नुकसान हो रहे हैं।

सामूहिक परिवार या संयुक्त परिवार आज के भाग दौड़ भरे तनाव युक्त जीवन में सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग, बच्चों के बेहतर लालन पालन और आर्थिक मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है। ये घर के बुजुर्गों की देखभाल भी सुनिश्चित करते हैं और उनका अकेलापन दूर करते हैं और बच्चों में संस्कार और सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि बच्चे दादी-दादी या परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में बेहतर सामाजिक मूल्य और संस्कार सीखते हैं और यह उन्हें एकाकीपन के कारण उपजने वाली हताशा व निराशा आज के प्रभाव से दूर करता है दूसरे शब्दों में हमारे परंपरागत संयुक्त परिवार एक साथ कई समस्याओं से निपटने का मजबूत माध्यम है। पिछले दो-तीन दशकों से हमने केंद्रीय की परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) को अपनाने के कारण जिन मुसीबत को झेला है या झेल रहे हैं उनसे निपटने के लिए यही एक मात्र साधन है।

यद्यपि आज हम 21वीं शताब्दी के वैश्विक युग में जी रहे हैं जहां प्रतिस्पर्धा की होड़ में और पूरा विश्व एकही छतरी के नीचे समाया हुआ है फिर भी भारतीय परिपेक्ष में संयुक्त परिवार आज भी बहुत प्रासंगिक है। एक संयुक्त परिवार में सभी लोग एक दूसरे का सुख-दुख आपस में बांट लेते हैं और परिवार में कोई एक व्यक्ति कमजोर या अक्षम है उसका भी गुजारा हो जाता है। अकेलेपन के कारण जो बच्चे आज कल हताशा और निराशा में आत्म हत्या जैसे कदम उठा रहे हैं इन सब चीजों से बचने के संयुक्त परिवार जैसे परम्परागत समाज की ओर लौटना एक मात्र विकल्प है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

अविश्वास प्रस्ताव बनाम सब्सटेंसिव मोशन

अवधेश कुमार 

भारत की राजनीति ऐसी अवस्था में पहुंची है जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। यह भारत के संसदीय इतिहास की अत्यंत गंभीर स्थिति है जब लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस है तो उसके समानांतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध सब्सटेंसिव मोशन। राहुल गांधी के विरुद्ध सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सब्सटेंसिव मोशन लाने की मांग की है। भाजपा ने पहले राहुल गांधी के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात की थी किंतु लगता है गंभीरता से विमर्श करके सब्सटेंसिव मोशन की पहल की है। सब्सटेंसिव मोशन विशेषाधिकार हनन से ज्यादा गंभीर हो सकता है। सब्सटेंसिव मोशन स्वतंत्र मूल प्रस्ताव है जिसमें सांसद के विरुद्ध स्पष्ट आचरण या निर्णय सामने आता है। इस पर बहस और मतदान होता है तथा पारित होने पर सदन का अधिकारिक रुख और मत प्रकट होता है। यानी संबंधित सांसद का आचरण और चरित्र सांसद के अनुकूल है या नहीं, इन्हें सांसद होना चाहिए या नहीं, इन्हें भविष्य में चुनाव लड़ने देना चाहिए या नहीं आदि आदि।  इसके आधार पर कार्रवाई हो सकती है और सदन की सदस्यता भी जा सकती है? चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की अनुशंसा की जा सकती है। तो इसे कैसे देखा जाए? राहुल गांधी प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस इस पर या प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि हम डरने वाले नहीं है। 24 दिसंबर, 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता कैसे गई थी? एक टेलीविजन चैनल ने  स्टिंग किया और सांसदों पर धन लेकर प्रश्न पूछने का आरोप लगा। सब्सटेंसिव मोशन के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और उन्हें आरोपों के उत्तर का भी अवसर नहीं दिया गया। इसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस की ही थी। 

अविश्वास अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में आना बंद कर दिया है।अविश्वास प्रस्ताव के बाद बहस और परिणाम तक लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते। तो उन्होंने यह निर्णय किया । यही बात सांसद या विपक्ष के नेता पर लागू नहीं होती। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव या सब्सटेंसिव प्रस्ताव स्वीकृत होने के बावजूद संबंधित सदस्य हिस्सा ले सकते हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का समय दिया जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को बहस होने की संभावना है। यह देखना होगा कि सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होता है या नहीं। चूंकि भाजपा नेतृत्व वाले राजग को बहुमत है इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा। यही बात सब्सटेंसिव मोशन के साथ लागू नहीं होता। बहुमत के आधार पर गठबंधन राहुल गांधी के विरुद्ध निश्चित मत और कार्रवाई तक का प्रस्ताव पारित कर सकता है। कांग्रेस के अंदर उनके समर्थकों में इससे कोई परेशानी नहीं दिखाई देती। उल्टे वे यह कहते हुए प्रफुल्ल होते हैं कि एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट कर रहे हैं और वह सब्सटेंसी मोशन पर बहस भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगी। अगर सोच ऐसी हो तो कल्पना की जा सकती है कि राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द के रणनीतिकार किस दिशा में जा रहे हैं। बजट सत्र आरंभ होने के पहले दिन को छोड़कर आरंभ से अंत तक राहुल गांधी सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक चर्चा और बहस के विषय रहे। क्या इसे सही अर्थों में राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारित करना कहेंगे? लोकसभा में विपक्ष के नेता की दृष्टि से इसे बिल्कुल जायज माना जाएगा?  क्या इससे राहुल गांधी अपने राष्ट्रीय दायित्वों की पूर्ति कर रहे हैं?

किसी एक नेता के विरुद्ध कार्रवाई होगी तो लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा हो सकती है और अनेक प्रश्न उठ सकते हैं। दूसरा पक्ष यह है जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अभियान चला उसका क्या? उनकी बेटी के सिविल सर्विस पास होने तक पर प्रश्न उठाने वाले कौन थे?  कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा उनको लिखा गया पत्र देखिए , चरित्रहनन है। और आपने अविश्वास प्रस्ताव तक ला दिया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट घेर कर कांग्रेस की महिला सांसद बैनर लिए खड़ीं थी। माहौल का ध्यान रखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा मैंने उनसे सदन में न आने का अनुरोध किया क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था। एपिस्टन फाइल को लेकर निराधार आरोप क्या चरित्रहनन नहीं है? इस फाइल में किसी का नाम आना उसके पाप में भागीदार का द्योतक नहीं हो सकता। एपिस्टन फाइल की मुख्य चर्चा अवयस्क बालक - बालिकाओं के साथ शर्मनाक यौनाचार के संदर्भ में है। यह जानते हुए कोई उसके संपर्क में है तोउसे दोषी माना जाएगा। जिस तरह राहुल गांधी और उनके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घसीटने की कोशिश कर रहे हैं उसे चरित्र हनन की राजनीति के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। संकेत में यह कहना कि प्रधानमंत्री दबाव में है क्योंकि अभी फाइल में माल बहुत है और अडाणी पर अमेरिका में केस हैं आदि आदि . क्या है?  यही बताने की कोशिश हो रही है कि प्रधानमंत्री का दबाव है और इसीलिए वे देश का सौदा कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष के लिए ऐसी कठिन स्थिति पैदा करने की कोशिश है कि उन्हें फैसला लेने में ही समस्या हो। ओम बिरला यहां व्यक्ति नहीं लोकसभा अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर हैं। हमारा व्यक्तिगत उनसे मतभेद हो सकता है, उनसे नापसंदगी भी होगी, पर पद का सम्मान करने और विश्वास करने का प्राथमिक दायित्व भी नेता और संसद न निभाएं तो इसे क्या कहेंगे? यह सब शर्मनाक है।

 हालांकि राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव ने विश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किया। यह भी एक रणनीति होगी ताकि वे बोल सके कि हमने अध्यक्ष पद की गरिमा का ध्यान रख हस्ताक्षर नहीं किया।आपकी रणनीति हो सकती है कि किसी तरह उन्हें मनोवैज्ञानिक दबाव में रखो और अपना एजेंडासदन के माध्यम से प्रचारित और स्थापित करने की कोशिश करो। जब एक पक्ष सीमा का इस सीमा तक उल्लंघन करता रहेगा तो दूसरे पक्ष से भी प्रत्युत्तर उस रूप में आ सकता है। सांसद निशिकांत दुबे द्वारा प्रस्तुत पुस्तक जिनमें नेहरू परिवार के चरित्र पर प्रश्न खड़े किए गए हैं उसी की प्रतिक्रिया में आया था। आपने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव दिया, प्रधानमंत्री का भी चरित्रहनन किया, देश के प्रति उनकी निष्ठा के विरुद्ध दुष्प्रचार किया तथा अंततः ऐसी स्थिति पैदा की किए हुए राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में भाषण नहीं दे सके तो आपके विरुद्ध भी सब्सटेंसिव मोशन आ गया।  शीर्ष स्तर की राष्ट्रीय राजनीति का इस स्तर पर नहीं पहुंचना चाहिए था जहां प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। आखिर रास्ता क्या है?

 अगर राहुल गांधी के समर्थकों को गलतफहमी है कि चर्चा और बहस का एजेंडा सेट करना है बड़ी उपलब्धि है तो एसआईआर एवं चुनाव आयोग के संदर्भ में भी ऐसी ही स्थिति थी। उन्होंने अपनी ओर से पूरी तैयारी के साथ एसआईआर और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया, बिहार में वोट अधिकार यात्रा की , चुनाव परिणाम आपके सामने है। महाराष्ट्र चुनाव में अडाणी मुद्दा उनके लिए सर्वोपरि था।परिणाम देख लीजिए। लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों का निलंबन तब किया जब वे बेल में जाकर लगातार अध्यक्ष की ओर कागज फेंक रहे थे, कोई आदेश या नियमन नहीं मान रहे थे। सामान्य सभा की भी अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति की ओर चिल्ला- चिल्ला कर कागज फेंका जाएगा तो उनके प्रति गुस्सा ही पैदा होगा और समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सदन संचालन के नियम और परंपरा हैं । इसको हर हाल में रौंदने  को उतारू लोगों के विरुद्ध अध्यक्ष को फैसला करना ही पड़ेगा। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस एक दिन भी सामान्य स्थिति पैदा नहीं होने देने पर उतारू है। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दे पर किसी सत्र में भाषण नहीं दिया। वह एजेंडा लेकर आते हैं और उसे सदन में रखते हैं तथा अध्यक्ष के रोकने पर उन्हें आरोपित करते हैं। इस लोकसभा के पहले हाथों में संविधान की लाल किताब लेकर नारे लगाए गए। क्या यह आचरण उचित था? पहली बार कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा किया। इस तरह की सोच और व्यवहार में कोई लोकतांत्रिक रास्ता निकल नहीं सकता। यह कहना कठिन है कि सब्सटेंसिव मोशन से रास्ता निकल पाएगा। सच कहें तो सदन को तय करना पड़ेगा कि विपक्ष के इस तरह के नेता से कैसे निपटा जाए?  नियम और परंपरा बनाने वालों ने ऐसे विपक्ष के नेता की कल्पना भी नहीं की होगी। आप एक बार रोकेंगे तो दूसरे तरीके से आ जाएंगे। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092 ,मोबाइल -9811027208

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

पूर्ण राज्य के वादे से पीछे हटी रही है भाजपा की दिल्ली सरकार: बलविंदर सिंह

संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार ), दिल्ली प्रदेश के उपाध्यक्ष बलविंदर सिंह ने आज बयान जारी करते हुए कहा कि भाजपा ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का जो वादा किया था, उसे सत्ता में आते ही भुला दिया है। उन्होंने कहा कि जब भाजपा विपक्ष में थी, तब उसके नेता दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की पुरजोर वकालत करते थे, लेकिन आज केंद्र और प्रदेश—दोनों जगह सरकार होने के बावजूद इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है।

बलविंदर सिंह ने कहा कि यह दर्शाता है कि भाजपा के लिए पूर्ण राज्य का मुद्दा केवल राजनीतिक नारा था, न कि जनहित का संकल्प। यदि पार्टी वास्तव में दिल्ली को अधिकार देना चाहती, तो आज उसके पास निर्णय लेने की पूरी शक्ति है। फिर देरी क्यों? आखिर दिल्ली की दो करोड़ जनता को उनके संवैधानिक अधिकार देने में हिचकिचाहट क्यों?

उन्होंने आगे कहा कि पुलिस, भूमि और सेवाओं जैसे महत्वपूर्ण विषय अब भी केंद्र के अधीन हैं। कानून-व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो जिम्मेदारी तय नहीं होती। विकास कार्य भूमि स्वीकृति में अटक जाते हैं और प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर टकराव की स्थिति बनी रहती है। इसका सीधा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ रहा है।

बलविंदर सिंह ने भाजपा से सवाल किया - क्या पूर्ण राज्य का वादा केवल चुनावी जुमला था? सत्ता में आते ही जनता से किए गए वादे क्यों भुला दिए गए? यदि भाजपा आज भी पूर्ण राज्य के पक्ष में है, तो स्पष्ट समयसीमा और रोडमैप क्यों नहीं दे रही?

उन्होंने मांग की कि केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाकर पूर्ण राज्य के दर्जे पर ठोस प्रस्ताव लाए और संसद में इसे पारित कराने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए। 

अंत में उन्होंने कहा कि दिल्ली की जनता अब राजनीतिक बयानबाजी से संतुष्ट नहीं होगी। उसे अधिकार चाहिए, जवाबदेही चाहिए और स्पष्ट नीति चाहिए।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

क्या जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रशासन को निर्देश देना सही?

बसंत कुमार

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें श्री जितना मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के दलित विधायक लल्लन भुइया जो बिहार के जो कुटुंबा विधानसभा से विधायक हैं, को एक जनसभा में यह कहते हुए सुना गया कि मैंने अपने क्षेत्र के सभी थाना अध्यक्षों को यह निर्देश दिया है की वे एससी/एसटी एक्ट में कोई मुकदमा दर्ज न करें। उनके इस बयान ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है भारतीय संविधान, जो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है, में एक विधायक या सांसद पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश दे सकता है कि वे एससी एसटी एक्ट में कोई मुकदमा दर्ज न करें। यह बात एक विवाद का विषय हो सकती है कि देश में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है पर क्या दलित समाज का ही विधायक खुलेआम एससी एसटी एक्ट द्वारा दलित समाज को संविधान द्वारा दीसुरक्षा रोक सकता है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक विशेष कानून है जो दलित और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले और जाति आधारित भेदभाव हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए बनाया गया था, यह अधिनियम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने त्वरित न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतों के माध्यम से मामले को निपटाने और पीड़ितों को मुआवजा दिलाने एवं पुनर्वास की व्यवस्था करता है यह अधिनियम 30 जनवरी 19900 को लागू हुआ इसका मुख्य उद्देश्य दलित और आदिवासियों को अपमान और शोषण से मुक्ति दिलाने और संवैधानिक समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हुआ। पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की इक्विटी समिति के गठन के कानून का विरोध करने वाले सेवा से निलंबित बरेली के सिटी में स्टेट अलंकार अग्निहोत्री में यूजीसी एक्ट के साथ-साथ अब एससी एसटी एक्ट 1989 के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है उनको यह दिव्य दृष्टिकेदार धाम के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने के बाद मिली है तो क्या यह मान लिया जाए कि ये शंकराचार्य पूरे हिंदू धर्म के शंकराचार्य होने के बजाय किसी वर्ण विशेष विशेष के शंकराचार्य है। श्री अग्निहोत्री का यह मानना है कि एससी एसटी एक्ट के तहत 95% मुकदमे फर्जी होते हैं तो क्या ये महाशय यह साबित करना चाहते हैं कि इन मुकदमों को देखने वाले पुलिस अधिकारी और जज इतने अक्षम है कि उन्हें फर्जी मुकदमे और सही मुकदमे के बीच अंतर पता लगाने की क्षमता नहीं है।

प्रश्न क्या है कि एससी एसटी एक्ट से पहले महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न से उनको बचाने के लिए दहेज कानून सहित अनेक कानून सरकार द्वारा बनाए गए और दशकों तक इन कानून का दुरुपयोग भी होता रहा पर इन कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए ना तो कोई शंकराचार्य सामने आया और न ही अलंकार अग्निहोत्री जैसा महापुरुष सामने आया जो इनको महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने वाले कानूनों के दुरुपयोग को रोकता। पर ज्यों प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगतभेद भाव अत्याचार के मामले में यूजीसी एक्ट पारित किया तब से ये शंकराचार्य न सिर्फ यूजीसी एक्ट का विरोध कर रहे हैं बल्कि तीन दशक पुराने एससी- एसटी (अत्याचार निवारण)अधिनियम का भी विरोध कररहे है, ऐसा करके ये उन ईमानदार पुलिस अफसरो और जजों की निष्ठा पर भी सवाल उठा रहे हैं जो एस सी -एस टी एक्ट के तहत मुकदमों का निपटन कर रहे है।

संविधान निर्माताओ ने विधायिका में दलित व आदिवासी समुदाय के लोगों के प्रतिनिधित्व के लिए कुछ सीटें इसलिए आरक्षित की थी कि उनके अपने लोग विधायिका में जाकर दलित और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को रोक सके और इस प्रावधान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संज्ञा दी गई। पर अत्यंत उपेक्षित और शोषित मुसहर जाति का विधायक स्वयं दलितों पर के ऊपर हो रहे अत्याचारों से निपटने के लिए बनाए गए एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा न दर्ज करने के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे तो यह बड़ा आश्चर्यजनक लगता है।

जब वर्ष 2014 के चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने त्यागपत्र देकर मुसहर समाज के व्यक्ति जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया तो लोगों को उम्मीद बंधी की शायद सदियों से उपेक्षित और शोषित मुसहर समाज के कल्याण के लिए कुछ काम हो। और लेखक समेत अनेक बुद्धिजीवों को ऐसा लगने लगा की बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के बाद जितना मांझी के रूप में एक ऐसा नेता मिल गया है जो इन दलितों का कल्याण कर सके, पर जब तेरी मां जी केंद्र सरकार में मंत्री बने तो यह सपनादिवा स्वप्न बन कर ही रह गया। उनसे पूछकर सदियों से अपेक्षित शोषण अनुसार समाज की सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक पुस्तक" मुसहर समाज का इतिहास" मैंने लिखी और अपने खर्चसे इसका लोकार्पण कराया और यह उम्मीद थी कि श्री जीतन राम मांझी जी के सहयोग से यह पुस्तक अनुसार समाज के लोगों में पहुंचेगी, जिससे वे अपने समाज की शानदार परंपरा और अपने समाज के महापुरुषों तिलका मांझी, दशरथ मांझी, किराए मुसहर आदि के द्वारा राष्ट्र निर्माण में योगदान को जान सके। पर जितना मांझी जी समय देकर भी इस लोकार्पण में नहीं आए और न ही यह पुस्तक मुसहर समाज के लोगों तक पहुंचाने में कोई मदद की। इसकी विपरीत वे मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर पर लिखी पुस्तक" बाबरनामा"की तर्ज पर एक मुस्लिम द्वारा लिखी गई ले पुस्तक "मांझी नामा "को प्रमोट करने में लगे रहे !शायद उनके लिए मुसहर समुदाय के विकास से अधिक उनकी अपनी पापुलैरिटी ज्यादा मायने रखती है। उसके अलावा एक मंत्री के रूप में मोदी सरकार में रहकर कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे मुझे समुदाय का विकास हो सके। जबकि एमएसएमई मंत्री के रूप में वे केवीआईसी (khadi Village Industries Corporation) व राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड के माध्यम से मुसहर सहित अन्य दलित और आदिवासियों को विकास के माध्यम से मुख्य धारा में ला सकते थे पर अभी तक वह होता नहीं दिख रहा।

यह सही है कि राज परिवार के क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद बाबा साहब डॉ आंबेडकर को भारतीय रन से सम्मानित किया और अपने शासनकाल में दलित और अत्यधिक आदिवासियों पर अत्याचार रोकने के लिए एससी एसटी एक्ट 1989 पारित करवाया तथा अपनी कुर्सी की परवाह न करते हुए दशकों से लंबित पड़ी मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करवाया वहीं वैसे समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उच्च शिक्षा संस्थान में दलित और आदिवासी तथा पिछले वर्ग के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी एक्टमें इक्विटी समिति का प्राविधान करवाया पर दलित व आदिवासी समाज के सैकड़ो से अधिक संख्या में सांसद और विधायक कभी भी दलित समाज के साथ हुए अत्याचार पर एक साथ नहीं आए। इतिहास गवाह है कि डॉ आंबेडकर द्वारा पेश किए गए हिंदू कोड बिल के पास न होने के कारण उन्होंने मंत्री पद थे इस्तीफा दे दिया, पर उस समय कोई भी दलित आदिवासी सांसद बाबा साहब के समर्थन में न खड़ा हुआऔर न ही प्रधानमंत्री प जवाहर लाल नेहरू से उनका त्याग पत्र स्वीकार नकरने का आग्रह किया, दूसरी बारवर्ष 1980 में जब देश को बाबू जगजीवन राम के रूप में एक दलित प्रधानमंत्री बनाने का अवसर मिला तो श्रीमती इंदिरा गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की मिली भगत से बाबू जगजीवन राम को सरकार बनाने का निमंत्रण देने और लोक सभा में अपना बहुमत साबित करने का अवसर देने से पूर्व से पूर्व लोकसभा भंग कर दी गई, उस समय भी कोई भी दलित- आदिवासी सांसद इसका विरोध करने का साहस नहीं उठा सका। जब जब भी सरकारों द्वारा दलितों और आदिवासियों के हित के विरुद्ध कोई कदम उठाए जाते हैं तो विपक्षी तो सत्ता धारी पार्टी के दलित - आदिवासी सांसद भी चुप लगाकर बैठ जाते हैं। इससे प्रश्न उठता है की इन वर्ग के लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नाम पर सांसद और विधान विधानसभा मेंजो आरक्षण मिला हुआ है उसका लाभ क्या है।

बहुजन (दलित आदिवासी) के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को भाजपा के संस्थापक सदस्यों से एक प कलराज मिश्र जी से सबक लेने की आवश्यकता है जिन्होंने लगभग 60 वर्षों से अधिक समय तक भारतीत जनसंघ और भाजपा में संगठन, विधायक, सांसद, मंत्री राज्यपाल जैसे पदों का उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। पर यूजीसी ऐक्ट के कारण जब उनके अपने समाज (ब्राह्मण) के साथ अन्याय होने की आशंका हुई तो उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों की परवाह न करते हुए यूं जी सी एक्ट का खुला विरोध किया। और सक्रिय राजनीति की पारी खेलने के बाद अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण परिषद के अध्यक्ष के रूप में अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं पर दलित और आदिवासी के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी भी अपने समाज के हितों पर बोलने का साहस नहीं करते इसी कारण देश को आजाद हुए 7 दशक से अधिक हो चुके हैं पर वंचित समाज वही का वहीं खड़ा हुआ है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

गाँव की चौपाल: खुशहाली की मज़बूत नींव

डॉ. राजेश के पिलानिया

भारत के कई हिस्सों में गाँव की चौपाल एक पारंपरिक एकत्र होने का स्थान है, जो स्थानीय बैठक स्थल और सामाजिक केंद्र के रूप में काम करता है। यह केवल मिलने या सामाजिक जमावड़े की जगह नहीं है; बल्कि लंबे समय से गाँव के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा रही है। इसकी प्रासंगिकता और महत्त्व सर्वविदित हैं।

गाँव की चौपाल और खुशहाली - गाँव की चौपाल एक प्रभावशाली स्थान है और खुशहाली का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है, लेकिन दुर्भाग्य से इस भूमिका को उतनी पहचान नहीं मिलती। गाँवों की खुशहाली के लिए इसके इस पहलू को समझना ज़रूरी है, साथ ही इसकी कमियों और उभरती चुनौतियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। गाँव की चौपाल कई तरीकों से खुशहाली में योगदान देती है। इनमें से कुछ प्रमुख पहलू नीचे दिए गए हैं।

सामाजिक मेल-जोल और सामुदायिक भावना - पहला, यह वह स्थान है जहाँ पारंपरिक बैठकों का आयोजन होता है और यह सामाजिक केंद्र के रूप में कार्य करता है, जिससे समुदाय और आपसी जुड़ाव की भावना विकसित होती है। यह सामुदायिक भावना जीवन को अर्थ और उद्देश्य देती है, जिससे लोगों में खुशहाली बढ़ती है।

आपसी बातचीत से अकेलेपन में कमी - दूसरा, यह बैठक स्थल लोगों को आपस में बातचीत के अवसर देता है, जिससे अकेलेपन की समस्या कम होती है। आज के समय में अकेलापन दुनिया भर में खुशहाली के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। हालाँकि कुछ स्थानों पर इन चौपालों का उपयोग पुरुषों के लिए महिलाओं की तुलना में अधिक आसान होता है।

मजबूत रिश्तों का निर्माण - तीसरा, यह स्थान लोगों के बीच मजबूत संबंध और रिश्ते बनाने में मदद करता है। दुनिया भर में खुशहाली पर हुए विभिन्न शोधों के अनुसार, रिश्ते खुशहाली के प्रमुख स्रोतों में से एक हैं।

हास्य, हँसी और भावनात्मक स्वास्थ्य - चौथा, यह वह जगह है जहाँ लोग हास्य और हँसी का आनंद लेते हैं, जिससे एंडोर्फ़िन का स्राव होता है, जो चार प्रमुख खुशहाली हार्मोनों में से एक है, और यह खुशहाली को बढ़ावा देता है।

मनोरंजन और जीवन का आनंद - पाँचवाँ, लोग यहाँ खेलों और अन्य सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, जिससे जीवन का आनंद बढ़ता है और खुशहाली में वृद्धि होती है।

सहायता लेना और देना - छठा, लोग इस स्थान का उपयोग सहायता माँगने और सहायता देने के लिए करते हैं। दूसरों की मदद करना या ज़रूरत पड़ने पर मदद लेनादोनों ही खुशहाली में योगदान देते हैं।

भावनाओं की साझेदारी और तनाव में कमी - सातवाँ, लोग यहाँ केवल भौतिक स्थान ही साझा नहीं करते, बल्कि भावनाएँ, वस्तुएँ, और जीवन के सुख-दुख भी साझा करते हैं। इससे तनाव कम होता है, भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहतर होती है और भावनात्मक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

समग्र भलाई पर प्रभाव - ये कुछ प्रमुख पहलू हैं जो तनाव, पीड़ा और असंतोष को कम करने और खुशहाली समग्र कल्याण को बढ़ाने में मदद करते हैं। यह सच है कि चौपालों पर समस्याएँ, बहसें और मतभेद भी होते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में सहमति के माध्यम से इन्हें संभाल लिया जाता है, हालाँकि इसके विपरीत स्थितियाँ भी कई बार देखने को मिलती हैं।

बदलते समय में चौपाल की प्रासंगिकता - इस प्रकार, गाँव की चौपाल की अवधारणा एक खुशहाल जीवन के निर्माण के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। लेकिन समय के साथ, सोशल मीडिया पर बढ़ते ज़ोर और आमने-सामने के संपर्क में कमी के कारण यह अवधारणा कमजोर होती जा रही है। यदि गाँव की चौपालों का बेहतर प्रबंधन किया जाए और उभरती चुनौतियों तथा नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो गाँव चौपाल मॉडल के माध्यम से अधिक खुशहाल और संतोषजनक जीवन की ओर बढ़ सकते हैं। 

(लेखक मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर और भारत के हैप्पीनेस गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं।)

 

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