सोमवार, 20 अप्रैल 2026

सपा की ’पीडीए’ राजनीति और सियासी यथार्थ


संतोष यादव 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के बुलावे पर उनके गृह जिले सुल्तानपुर आए तो नेताओं बीच उन्हें चेहरे दिखाने की होड़ मच गई।
कहने को तो यह उनका निजी कार्यक्रम था, लेकिन महज़ एक निजी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने स्थानीय राजनीति की कई परतों को उजागर कर दिया। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर दौरे के दौरान उनके आसपास दिखाई पड़े कुछ ऐसे चेहरे, जिनकी छवि पर वर्षों से सामंती वर्चस्व और कमजोर वर्गों के दमन के आरोप लगते रहे हैं, ने इस पूरी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विरोधाभास केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक द्वंद्व का प्रतीक है, जिसमें एक ओर वैचारिक प्रतिबद्धता है और दूसरी ओर चुनावी यथार्थ। अखिलेश यादव के लिए यह सिर्फ रणनीति का नहीं, बल्कि भरोसे का भी सवाल है। आने वाले समय में उनकी राजनीति की दिशा इस बात से तय होगी कि वे इस कथनी-करनी के अंतर को कैसे पाटते हैं। 
सपा सुप्रीमो के साथ विवादित चेहरों की मौजूदगी, उनकी सक्रिय उपस्थिति ने इस पूरे दौरे को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया। जिन पर पहले से ही दंबगई दिखाने एवं दूसरों की हत्या कराने जैसे गंभीर आरोप लग चुके हैं, उनका पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब दिखना सपा कार्यकर्ताओं के एक वर्ग को असहज कर रहा है। राजनीति में दागी छवि हमेशा एक चुनौती होती है। खासतौर पर तब, जब पार्टी खुद को वैकल्पिक और साफ-सुथरी राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हो। समाजवादी पार्टी की पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति का दावा ज़मीन पर कई बार अपने ही कसौटी पर खरा नहीं उतरता। सिद्धांत और व्यवहार के बीच का यही अंतर विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। सियासी दलों का कार्यकर्ता सिर्फ जमीन पर नहीं, डिजिटल मंचों पर भी सक्रिय है। 
सपा सुप्रीमो के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही नाराजगी संकेत देती है कि पार्टी का एक वर्ग नेतृत्व से  स्पष्टता चाहता है। आज के दौर में आंतरिक असहमति अब दबती नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है। अखिलेश यादव एक बार फिर अपनी स्थापित राजनीतिक लाइन ’पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ मैदान में नजर आए। यह अवधारणा कुछ समय से उनकी राजनीति का केंद्रीय आधार बनी हुई है, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय की नई धुरी तैयार करना है। पीडीए की राजनीति का मूल दर्शन भी यही है कि, सत्ता और संगठन में उन तबकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे हैं। यह सिर्फ सामाजिक समीकरण नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और सम्मान की राजनीति है। लेकिन जब इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ने वाला नेतृत्व उन चेहरों के साथ खड़ा दिखाई देता है, जिन्हें पारंपरिक प्रभुत्वशाली राजनीति का प्रतीक माना जाता रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलाव वास्तविक है या सिर्फ नारेबाजी तक सीमित है।
राजनीति में संदेश केवल भाषणों से नहीं, बल्कि प्रतीकों और साथ खड़े लोगों से जाता है। एक तस्वीर, एक मंच, एक साथ खड़ा व्यक्ति, ये सभी जनता के बीच गहरे अर्थ रखते हैं। ऐसे में यदि पीडीए की बात करने वाला नेतृत्व उन्हीं पुराने सामंती सत्ता-ढांचे के प्रतिनिधियों के साथ नजर आता है, तो यह संदेश जाता है कि बदलाव की प्रक्रिया अधूरी है अथवा समझौते के रास्ते पर है।
हालांकि, इस स्थिति को पूरी तरह एकतरफा नजरिए से देखना भी उचित नहीं होगा। चुनावी मजबूरियां अक्सर ऐसे फैसले करवाती हैं, जहां प्रभावशाली स्थानीय चेहरों को साथ रखना जरूरी हो जाता है, भले ही उनकी छवि विवादित क्यों न हो। यह ’विजय की अनिवार्यता’ और ’विचार की शुद्धता’ के बीच का संतुलन है, जिसे हर राजनीतिक दल अपने तरीके से साधने की कोशिश करता है। समाजवादी पार्टी भी वही कर रही है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा जोखिम भी छिपा होता है। यदि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए वैचारिक स्पष्टता से समझौता किया जाता है, तो दीर्घकाल में इसका असर  उसकी विश्वसनीयता पर पड़ता है। 
समाजवादी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का वह वर्ग, जो पीडीए की अवधारणा को सामाजिक बदलाव के रूप में देखता है, वह ऐसे विरोधाभासों से निराश हो सकता है। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही प्रतिक्रियाएं इसी असहजता की ओर इशारा करती हैं। समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती स्पष्ट है, क्या वह पीडीए को सिर्फ एक प्रभावी चुनावी नारा बनाए रखेगी, या उसे अपने संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व के चयन और राजनीतिक व्यवहार में भी उतारेगी? आने वाले समय में समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह ऊर्जा से भरे कार्यकर्ताओं, महत्वाकांक्षी नेताओं और सामंती, विवादित छवियों के बीच संतुलन कैसे बनाती है। 2027 की लड़ाई सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता नहीं होगी, बल्कि पार्टी के भीतर भी एक ’अदृश्य संघर्ष’ चल रहा है, जहां छवि, अवसर और स्वीकार्यता की परीक्षा साथ-साथ हो रही है।

महिला आरक्षण की फिर वही परिणति क्यों

अवधेश कुमार 

लगभग 12 वर्षों के शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह पहला अवसर है जब कोई विधेयक पारित होने से लोकसभा में वंचित रह गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने घोषणा किया कि विधेयक के पक्ष में 298 तथा विरोध में 230 मत पड़े। हालांकि सदन के बहुमत में विधायक के पक्ष में वोट डाला किंतु संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण दो तिहाई बहुमत यानी चाहिए था और इसलिए यह पारित नहीं हो सका। यानी कुल 528 लोकसभा सदस्य उपस्थित थे तो 352 सदस्यों का समर्थन चाहिए था वैसे उपस्थिति से 34 ज्यादा सांसदों ने सरकार के पक्ष में वोट डाला। अगर सामान्य विधेयक होता तो पारित हो गया होता। 1996 से महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभा में आरक्षण देने का मामला लटका हुआ है और विरोधी किसी न किसी बहाने इसमें अड़चन डालते आ रहे हैं। किसी का तर्क कुछ भी हो निष्कर्ष यही है वही प्रक्रिया फिर दोहराई गई है। अब इसमें गुणात्मक अंतर यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से 33% महिलाओं के आरक्षण का कानून संसद द्वारा पारित करवा लिया है। इसलिए उसको लागू तो होना है। किंतु अब विधेयक के गिर जाने से 2029 लोकसभा चुनाव में यह लागू नहीं हो सकता। इसके लिए हमें 2034 की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

दरअसल, 2023 के अधिनियम में यह प्रावधान था कि अगली जनगणना और फिर परिसीमन हो जाने के बाद इसे लागू किया जाएगा। तब अनुमान यह था कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 तक पूरी हो चुकी होगी इसलिए  इसे लागू करने में समस्या नहीं होगी। चूंकि यह पूरी नहीं हुई तो नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे संविधान संशोधन के जरिए तत्काल लागू करने का रास्ता चुना। पूरे प्रकरण का कठोर सच यह है कि इन तीनों विधेयकों में ऐसा कुछ नहीं था जिसको आशंका की दृष्टि से देखा जाए और जिसका इस सीमा तक विरोध हो कि काले झंडे और काले बिल्ले तक पार्टियां व सांसद लगा लें।  इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की सीटों की अधिकतम संख्या को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान करता था जिनमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें थीं। दूसरा,परिसीमन विधेयक, 2026 नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान करता था। और तीसरा,केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में महिला आरक्षण लागू करने के लिए था। विपक्ष का मुख्य विरोध पहले विधेयक से था। वस्तुत: संसद का विशेष सत्र आरंभ होने के पहले ही विपक्ष ने अविश्वसनीय रूप से विरोधी रख अपनाकर अपने संसदीय व्यवहार का संकेत दे दिया था। विपक्ष के सभी नेताओं ने, जिनमें महिला सांसद भी शामिल हैं नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन संबंधी विधेयकों का जैसा विरोध किया उसमें साफ हो गया कि इनका पारित होना संभव नहीं है। भाजपा के मंत्रियों ने विपक्ष के नेताओं से बात करनी शुरू की। स्वयं प्रधानमंत्री ने दो पोस्ट से अपील की। इसके पहले वे अपने भाषण में अपील कर चुके थे कि श्रेय आप लोग ले लीजिए लेकिन महिला आरक्षण में बाधा मत बनिए। उन्होंने यहां तक कहा कि मैं इसके लिए तैयार हूं कि कल आप सबकी तस्वीर समाचार पत्रों में छपवाकर श्रेय दूंगा। लेकिन विपक्ष पहले से मन बनकर बैठा था। उन्होंने अपनी अपील में लिखा कि अपने घर में मां-बहन- बेटी -पत्नी सबको देखिए और उनके अधिकार के लिए विचार कर मतदान करिए।

 निष्पक्ष होकर विवेक, तथ्य और तर्क के साथ विचार करनेवालों का निष्कर्ष है कि पूरा विरोध एकपक्षीय अतिवाद से ग्रस्त रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तो इसे देश विरोधी और देश को बांटने वाला विधायक तक करार दिया। उन्होंने कहा कि ये देश का भूगोल बदलना चाहते हैं जो हम कभी नहीं होने देंगे। इससे अधिक अतिवादी वक्तव्य और कुछ नहीं हो सकता। उनका भाषण भाजपा के वरिष्ठ सांसदों को भी इतना आपत्तिजनक लगा कि राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को लोकसभा अध्यक्ष से अपील करनी पड़ी कि इन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए। राहुल गांधी के भाषण के एक बड़े अंश को असंसदीय करार देकर हटा दिया गया। सदन में विपक्ष के नेता के भाषण के अंशों को असंसदीय श्रेणी में ला दिया जाए इससे दुखद स्थिति कुछ नहीं हो सकती। अगर इरादा विधेयक पर बहस कर इसमें उचित संशोधन करना हो तो  आपके भाषण में उससे संबंधित सुझाव होते हैं। सरकार की राजनीतिक आलोचना में समस्या नहीं है। किंतु पूरी बहस सामान्य आलोचना ही नहीं विधेयक के विषय वस्तु से भी काफी दूर चला गया था। प्रश्न उठाया जा रहा था कि आखिर 850 सीटों का आपका आधार क्या है? इसी तरह के दक्षिण के राज्यों को इसमें नजरअंदाज किया जा रहा ? बजट सत्र में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के नेताओं से बातचीत शुरू की तो बताया होगा कि हर राज्य की 50% लोकसभा एवं विधानसभा की सीटें बढ़ाने का फार्मूला तय हुआ है। सोचा गया कि आज परिसीमन हो तो लोकसभा एवं विधानसभाओं की कितनी सीटें बढ़ सकतीं हैं। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर उत्तर प्रदेश की सीट 80 से 120 हो रही है तो तमिलनाडु की 39 से 59। इसी तरह अन्य राज्यों के भी विवरण दिए गए। हंगामा इस पर भी था कि 2011 की जनगणना को आधार क्यों बनाया गया? गृह मंत्री का उत्तर था कि 2011 की जनगणना का आधार बनाते तो तमिलनाडु की सुट केवल 49 होती। यही सच है।

यहां दो बातें समझने की है।  एक, वर्तमान 543 सीटों में 33% आरक्षण क्यों नहीं दिया गया? 2023 में जब विधेयक पारित हुआ तभी उसमें जनगणना और परिसीमन का प्रावधान था। विपक्ष ने विरोध नहीं किया? 1996 से उसके विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि आपसी बातचीत में नेता बोलते थे कि 543 में से 33% महिलाओं को मिल गया तो अनेक पुरुष नेताओं को घर बैठ जाना पड़ेगा और राजनीति का नाश हो जाएगा। पिछड़ों के आरक्षण आदि का बहाना बनाया गया। तो पुराने अनुभवों का ध्यान रखते हुए मोदी सरकार ने रास्ता निकाला कि 543 सीटें जस की तस रहें और बढ़ी 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होश   सहमति हुई तभी 2023 में कानून बन सका। आज यह तर्क देने वाले अपनी सरकारों में इसके लिए तैयार नहीं थे। 1996 में विरोध करने वाले उस संयुक्त मोर्चा सरकार के साथी थे तो 2008 से 2010 तक विरोध करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथी। इनमें समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और कुछ समय तक जनता दल यूनाइटेड अग्रणी रहे। दूसरे दलों के सांसद भी साथ देते रहे। 

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में महिला आरक्षण विधेयक चलाया किंतु आम सभमति नहीं बन सकी। 2010 में राज्यसभा में भाजपा के समर्थन से विधेयक पारित हुआ किंतु उनके साथी दलों ने विरोध किया और लोकसभा में पारित करना मुश्किल था। इस पृष्ठभूमि को जानने वाले यह प्रश्न नहीं उठाएंगे। दूसरे, हर 10 वर्ष पर संविधान लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों के जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रावधान करता है। 1971 तक नियमित होता रहा। 1976 में आपातकाल के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संशोधन कर 2001 तक लोकसभा एवं विधानसभाओं की सीटें न बढ़ाने का प्रावधान कर दिया। इस कारण 1981 और 91 में परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ। 1976 में लगभग 57.5 करोड़ आबादी थी और आज 140 करोड़ से ऊपर। क्या उस आधार पर आज लोकसभा या विधानसभाओं की सीटें होनी चाहिए? 2001 में वाजपेयी सरकार ने भी परिसीमन आयोग तो बनाया लेकिन केवल क्षेत्र का समायोजन हुआ संख्या नहीं बढ़ाई। हर सरकार इस विषय को स्पर्श करने से घबराती रही, क्योंकि दक्षिणी राज्यों की आबादी उत्तर के अनुपात में कम होने के कारण उनको सीटें कम मिलती और विरोध होता।

मोदी सरकार ने उसी का रास्ता निकाला। थोड़े शब्दों में कहें तो अगर दल वाकई महिला आरक्षण के पक्ष में होते तो विरोध जताते हुए कुछ संशोधन डालकर पारित कर देते। सीटों की संख्या की लिखित गारंटी के प्रश्न पर गृह मंत्री ने कहा कि आप विधेयक पारित करते हैं तो हम नया संशोधन सीटों की संख्या डालकर पेश करने को तैयार हैं। वास्तव में यह कहीं पे निशाना कहीं पे निगाहें वाली बात थी। कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों को दिखाना था कि हम संसद में नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित कर सकते हैं। किसी नेता ने महिलाओं को आरक्षण न मिलने पर अफसोस प्रकट नहीं किया। श इसे लोकतंत्र की विजय बताते हुए नए दौर की शुरुआत बताया जा रहा है। प्रियंका वाड्रा ने इसे ऐतिहासिक दिन जताया। थोड़े शब्दों में कहें तो महिलाओं के आरक्षण पर विरोधियों का जो रुख हमने 1996 से देखा लगभग वही अलग रूपों में फिर संसद में था और इसी की परिणति विधेयक के गिरने के रूप में सामने आई।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल-9811027208


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