मंगलवार, 31 मार्च 2026

आखिर तरुण खटीक की मौत का जिम्मेदार कौन?

विकास खितौलिया 

किसी भी समाज की असली पहचान उसकी न्याय व्यवस्था, सामाजिक संतुलन और नागरिकों की सुरक्षा से होती है। जब किसी युवा की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह समाज और व्यवस्था दोनों की गंभीर विफलता का संकेत बन जाती है। यह केवल एक व्यक्ति या परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी होती है। दिल्ली के उत्तम नगर क्षेत्र में हुई तरुण खटीक की दर्दनाक मौत भी ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है “आखिर इस मौत का जिम्मेदार कौन है?” क्या यह सामाजिक असहिष्णुता का परिणाम है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर कहीं कोई चूक हुई? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि यह घटना कई परतों में उलझी हुई प्रतीत होती है। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि किसी भी प्रकार की हिंसा या व्यक्तिगत विवाद, चाहे वह धार्मिक हो, वैचारिक हो या सामाजिक हमेशा समाज के लिए घातक सिद्ध होता है। जब कोई विचारधारा अपने मूल मानवीय मूल्यों से हटकर हिंसा और नफरत का रूप ले लेती है, तो वह निर्दोष लोगों की जान तक ले सकती है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि यदि इस मामले में किसी प्रकार की हिंसक या आक्रामक प्रवृत्ति की भूमिका रही हो, तो यह न केवल कानून के लिए चुनौती है, बल्कि समाज के ताने-बाने के लिए भी खतरा है।

उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और पीड़ित पक्ष के बयानों के अनुसार, घटना की शुरुआत एक मामूली विवाद से हुई बताई जाती है। बताया जाता है कि होली के अवसर पर खेल-खेल में एक पानी का गुब्बारा फेंका गया, जिसकी कुछ पानी की छींटे एक महिला के कपड़ों पर गिरी। जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हो गई। पीड़ित परिवार द्वारा उस महिला से माफ़ी मांगने पर कुछ समय तक स्थिति शांत होने की बात भी सामने आती है। हालांकि, बाद में यह विवाद फिर से बढ़ गया। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि रात के समय कुछ लोगों ने कथित रूप से एकत्र होकर 26 वर्षीय तरुण खटीक पर हमला किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला गंभीर था, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई। इस पूरे घटनाक्रम की सत्यता और वास्तविक परिस्थितियों का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा किया जाना शेष है। यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि समाज में छोटे-छोटे विवाद भी कभी-कभी गंभीर रूप ले लेते हैं। समाज में कहीं न कहीं सहनशीलता की कमी, संवाद का अभाव और आक्रामकता की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसी परिस्थितियों को और अधिक जटिल बना देती है। 

आरोप है कि कुछ हिसंक कट्टर सोच रखने वाले लोगों ने इस विवाद को हिंसा में बदल दिया इसलिए किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह किसी भी कारण से उत्पन्न हुई हो, अंततः समाज के लिए हानिकारक ही सिद्ध होती है। जब किसी भी पक्ष में कट्टरता हावी हो जाती है, तो सामान्य घटनाएं भी असामान्य प्रतिक्रिया का कारण बन जाती हैं। कट्टरता व्यक्ति की सोच को सीमित कर देती है और उसे दूसरे की भावनाओं, परंपराओं और जीवन के अधिकार के प्रति असंवेदनशील बना देती है। यह कैसी मानसिकता है। यदि इस घटना में भी ऐसी मानसिकता का प्रभाव था, तो यह निश्चित रूप से एक चिंताजनक स्थिति है, जिस पर समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्या कारण है कि पचास वर्षों से रहे दो अलग अलग पक्षों के समुदाय में झगड़ा हो जाता है । हालांकि, किसी भी एक समुदाय या संस्था को समग्र रूप से दोषी ठहराना समस्या का समाधान नहीं है। हर समाज में कुछ असामाजिक तत्व होते हैं, जो अपने कृत्यों से पूरे समुदाय की छवि को प्रभावित करते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम इस घटना को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखें और यह समझें कि वास्तविक दोषी वे लोग हैं जिन्होंने हिंसा को अंजाम दिया, न कि पूरा समुदाय।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और प्रशासन का मूल कर्तव्य होता है । इस घटना में कानून-व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का मानना है और मीडिया रिपोर्ट्स में यह कहा गया है कि यदि समय पर प्रभावी हस्तक्षेप होता, तो संभवतः स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता था। क्योंकि धटना स्थल से पुलिस चौकी की दूरी मुश्किल से 500 मीटर की होगी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पुलिस और प्रशासन की भूमिका की समीक्षा तथ्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए। इसके अलावा, कानून का डर खत्म होना भी एक बड़ी समस्या है। जब अपराधियों को यह महसूस होने लगता है कि वे बिना किसी सख्त सजा के बच सकते हैं, तो उनके हौसले बुलंद हो जाते हैं। इस प्रकार की घटनाएं यह भी दर्शाती हैं कि क्या हमारे समाज में आपसी संवाद और विवाद समाधान की क्षमता कमजोर हो रही है। पहले जहां छोटे विवाद आपसी समझ से सुलझ जाते थे, वहीं अब वे कभी-कभी हिंसक रूप ले लेते हैं। यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, जिस पर सामूहिक रूप से विचार करने की आवश्यकता है। 

न्याय तभी संभव है जब जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित हो। कानूनी प्रक्रिया फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाई जाए, जिससे दोषियों की पहचान कर उन्हें कानून के अनुसार सख्त सजा मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से क्यों न हों। किसी भी व्यक्ति की असमय मृत्यु खासकर युवा हो। परिवार को गंभीर आर्थिक और मानसिक संकट में डाल देती है। ऐसे मामलों में सरकार द्वारा आर्थिक सहायता (कम से कम एक करोड़) देना पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत हो सकती है। साथ ही, यदि जांच में प्रशासनिक स्तर पर कोई लापरवाही सामने आती है, तो उसके लिए भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, यही लोकतंत्र की नींव है।

तरुण खटीक की मृत्यु हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में शांति और सुरक्षा केवल कानून के बल पर नहीं, बल्कि आपसी समझ, सहिष्णुता और जिम्मेदारी से भी सुनिश्चित होती है। यह आवश्यक है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और संवेदनशीलता के साथ कानून-व्यवस्था को मजबूत किया जाए। इसलिए पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और सक्रिय बनाना होगा। शिकायतों को गंभीरता से लेना और समय पर कार्रवाई करना अनिवार्य होना चाहिए। अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि तरुण खटीक की मौत केवल एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि यह कई कारकों का मिश्रण हो सकती है। 

व्यक्तिगत विवाद, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक असंतुलन। ये सभी मिलकर ऐसी दुखद घटनाओं को जन्म देते हैं। इसलिए, केवल एक पक्ष को दोषी ठहराने के बजाय, हमें पूरे सिस्टम की समीक्षा करनी होगी। यह समय है आत्ममंथन का प्रशासन के लिए भी और समाज के लिए भी। हम दोषारोपण से आगे बढ़कर समाधान की दिशा में सोचें ताकि आने वाले समय में किसी और परिवार को ऐसा दुख न सहना पड़े। तरुण खटीक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस घटना से सीख लेकर एक अधिक सुरक्षित, संतुलित और संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं। तरुण खटीक की मौत एक सवाल है और इसका जवाब हमें मिलकर ढूंढना होगा।

नोट : यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स, स्थानीय स्रोतों और पीड़ित पक्ष के बयानों पर आधारित है। मामले की जांच जारी है, और अंतिम सत्य का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों एवं न्यायालय द्वारा किया जाएगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

9818270202

गुरुवार, 26 मार्च 2026

धर्म बदलने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और क्रिप्टो क्रिश्चियन

बसंत कुमार

अनुसूचित जनजाति के स्टेटस पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया और कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाला अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति अगर कोई अन्य धर्म अपनाता है तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाएगा जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अगुवाई वाले बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, इस आदेश में हाईकोर्ट ने यह कहा था कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और उसका प्रचार प्रचार करता है तो उसे अनुसूचित जाति का नहीं माना जा सकता, और उल्लेख किया संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 इस बात को स्पष्ट करता है की 1950 के अधिनियम की धारा 3 में बताए गया है कि कुछ धर्म हिंदू, बौद्ध सिक्ख के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर उसका अनुसूचित अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि देश में लाखों की संख्या में रहने वाले क्रिप्टो क्रिश्चियन का क्या होगा गौरतला है कि भारत क्रिप्टो क्रिश्चियन वे लोग हैं जो ईसाई धर्म तो अपना लेते हैं पर अनुसूचित जाति के मिलने वाले लाभों को प्राप्त करने के लिए इस बात का खुलासा नहीं करते की उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है।

हम आगे देश में जाति से जुड़ा सवाल बहुत ही टेढ़ा है सामाजिक स्तर पर हमेशा से यह बहस का विषय रहा है कि क्या धर्म बदलने से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है ऐसे मामले सामने आते रहते हैं कि दलित समुदाय के लोगों को अपना धर्म बदलकर दूसरा धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ा है पिछले साल मार्च में तमिलनाडु के ईसाई परिवारों, जो पहले दलित थे, ने आरोप लगाया था कि उनके साथ समान व्यवहार नहीं हो रहा है यहां तक की कब्रिस्तान में उनके लोगो को शवों को दफनाने के लिए अलग जगह दी जाती है कहने का अभिप्राय यह है कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी उन्हें उसी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है जो हिंदू धर्म में दलित के रूप में उनके साथ होता था राजनीतिक नजरिया की बात करें तो इस फैसले के बाद धन परिवर्तन और आरक्षण से जुड़ी बहस और जोर पकड़ सकती है सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर तौर पर संविधान को ध्यान में रखकर यह फैसला दिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि कुछ मामले ऐसे होते हैं जहां कानून और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क होता है भारत में जाति एक वास्तविकता है जिसे नहीं बदला जा सकता लेकिन इसकी जुड़ी हुई बुराइयों को खत्म करने की कोशिश की जानी चाहिए।

सर्वप्रथम ईसाई और मुस्लिम धर्म में धन्मांतरण करने वाले हिंदू अनुसूचित जातियों के लोगों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए यूपीए के अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के चेहरे पर 2004 ने किया गया। वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में राष्ट्रीय एवं भाषा ए अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ जिसके अध्यक्ष जस्टिस रंगनाथ मिश्र बनाए गए इस आयोग के माध्यम सेधर्मांतरित ईसाइयों एवं मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक और अन्य स्थितियों का अध्ययन कराया गया। उसे समय के अनुसूचित अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष सरदार बूटा सिंह ने उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने की अनुशंसा कर दलितों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया, जबकि सरदार बूटा सिंह स्वयं अनुसूचित जाति के बहुत बड़े नेता थे और राजीव गांधी की सरकार में गृह मंत्री भी थे। शायद वह राजनीति के मुख्यधारा में लौटने की अपनी प्रबल इच्छा के चलते उन्हें सोनिया गांधी के दबाव में यह निर्णय देना पड़ा। और उन्होंने आयोग के अध्यक्ष के रूप में धर्मांतरण करने वाले ईसाइयों और मुसलमान को अनुसूचित जाति में शामिल करने की अनुशंसा कर दी जिसको सरकार ने मानना ही था। परंतु आयोग की तत्कालीन सचिव श्रुति श्रीमती आता दास आशा ने कमीशन की ओर से डीसेंट नोट भेज कर हर एक बिंदुओं के साथ स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कीमत पर धर्मांतरित ईसाइयों एवं धर्मांतरित मुसलमानों को अनुसूचित जाति की शामिल सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। इस संबंध में यह बताना आवश्यक है कि वर्ष 2004 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा था कि धर्मांतरित ईसाइयों एवंधर्मांतरित मुसलमानो को अनुसूचित जाति में शामिल करने का पक्ष क्या है यूपीए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में जाकर यह कह दिया था कि सरकार को कोई आपत्ति नहीं है सरकार के इसी जवाब पर उच्चतम न्यायालय ने कार्यवाही आगे बढ़ाई और रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन हुआ।

वास्तव में यूपी सरकार द्वारा धर्म मंत्री किसने और मुसलमान को अनुसूचित जाति में शामिल करने के पीछे धन्वंतरण के अलावा की अन्य उद्देश्यनही था। यदि इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया जाता तो करोड़ दलित वर्ग के लोग ईसाई मिशनरियों की प्रलोभन में फंस कर ईसाई बन जाते। वर्तमान समय में धर्मांतरण करने के पश्चात हम झूठित वर्ग के रूप में मिलने वाला लाभ समाप्त हो जाता है कांग्रेस के इस खड्यंत्र को असफल बनाने में स्वर्गीय अशोक सिंघल श्रीमती आशा दास और तत्कालीन भाजपा के अंजूषित मोर्चे के अध्यक्ष व पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ को भी का बहुत बड़ा हाथ रहा। इन सब के पीछे बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का विराज चिंता नहीं मूलाधार था जिसका वह पूना पैक्ट के समय से जीवन पर्यंत मूर्त रूप देने का प्रयास करते रहे वे कभी भी नहीं चाहते थे की अनुसूचित जाति के लोग चाहे सदियों तक मनुवादी विचारधारा के कारण अपेक्षा और शोषण का शिकार होते रहे पर हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति से अलग नहीं होना चाहिए।

सन 1947 में जब देश आजाद हुआ और संविधान निर्माण का उत्तरदायित्व डॉ अंबेडकर को सौपा गया तो उस समय दलितों का अधिकार छीनने की ताक में बैठी अनेक शक्तियों सक्रिय हो गई और ऐसे में बाबा साहब अंबेडकर की असली परीक्षा प्रारंभ हुई, उन्हें संविधान निर्माण के मुश्किल कार्य के साथ-साथ अनुसूचित जातियों का आरक्षण के पक्ष और विपक्ष के प्रश्नों का सामना करना एवं उत्तर देना था। धर्मांतरितमुसलमानो और ईसाइयों की तरफ से सैकड़ो प्रश्नों का सामना करते हुए अनेक अनर्गल तर्कों का उन्होंने मुंह तोड़ जवाब दिया। डॉ अंबेडकर ने धर्मांतरित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग को बड़ी कठोरता के साथ अस्वीकार कर दिया धर्मांतरित ईसाइयों और मुसलमानो को अनुसूचित सूची में डालने के पीछे डॉक्टर अंबेडकर के विचारों को जानकर उनके दलित समाज के उत्थान की प्रतिबद्धता एवं देश के प्रति उत्तरदायित्व के सम्मान की प्रतिबद्धता दिखाई देती है उनका मानना था कि यह लंबे समय से ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित मांग है के पीछे धर्मांतरण को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं था डॉक्टर अंबेडकर का मानना था कि अनुसूचित वर्ग में अपने धार्मिक आस्था को प्रलोभन में न बदले इसी कारण हिंदू का समाज में कुरीतियों की तंग आकर जब उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने का फैसला किया तो उन्हें ईसाई या मुस्लिम बनने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन मिले पर उन्होंने इसे स्वीकार कर दिया उन्होंने स्पष्ट किया कि ईसाई या इस्लाम का भाईचारा केवल उनके मानने वालों तक ही सीमित है गैर-मुस्लिम या गैर-ईसाई के साथ उनके भाईचारे का प्रश्न बहुत ही सीमित था।

कुछ रूढ़िवादी हिंदू सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश में एक कमी यह निकाल रहे हैं कि जो हिंदू बौद्ध धर्म को अपना चुके हैं उन्हें अनुसूचित जाति के मिलने वाले आरक्षण से वंचित क्यों नहीं किया जा रहा है। इस विषय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने अपनी पुस्तक "बाबा साहब व्यक्तित्व और विचार"में कहते हैं कि वास्तव में डॉक्टर अंबेडकर एक सुधारवादी हिंदू थे। इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया जो भारत में पल्लवित और पुष्पित हुआ। हिंदू धर्म छोड़ने से पहले उन्होंने खुले मंच कहा था "हिंदूधर्म के ठेकेदारों सुधर जाओ नहीं तो हम लाखों दलितों के साथ हिंदू धर्म का त्याग कर देंगे'!, अपनी मृत्यु के मंत्र एक माह 23 दिन पूर्व उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाते हुए यह तक दिया कि हमने कमरा बदला है मकान नहीं बदला है अर्थात उन्होंने वही धर्म अपनाया जिसके मूल में हिंदू संस्कृति बसती है डॉक्टर अंबेडकर ने यह स्पष्ट कर दिया कि ईसाइयत या इस्लाम के छलावे में न आए। दलित समाज को यदि हिंदू धर्म छोड़ना ही है तो बौद्ध धर्म को अपने। इसके अतिरिक्त एक और विभाग समस्या क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर है जो ईसाई मिशनरियों के प्रलोभन में आकर ईसाई तो बन गए हैं पर वे अनुसूचित जाति के रूप में मिलने वाले सुविधाओं को न छोड़ने के कारण, ईसाई धर्म अपनाने की बात को सार्वजनिक नहीं करते ऐसे लोगों को ईसाई मिशनरियों के छुपे हुए मनसूबों को समझा कर उन्हें हिंदू धर्म में सम्मान के साथ वापस लाने के प्रयास किए जाने चाहिए।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2004 से प्रारंभ हुई इस विवादित विषय का अपने फैसले द्वारा पटाक्षेप कर दिया है और यह सुनिश्चित कर दिया है की अनुसूचित जाति का कोई भी व्यक्ति धर्मांतरण कर लेता है तो धर्मांतरण करने के बाद अनुसूचित जाति को मिलने वाले लाभ का भागीदार नहीं होगा पर वही हिंदू धर्म के सामाजिक संगठनो और धार्मिक नेताओं को यह सोचना होगा किआखिर क्या कारण है की भारी संख्या में अनुसूचितजाति(दलित) लोग हिंदू धर्म छोड़ने पर विवश क्यों हो रहे हैं जिसके कारण हिंदुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है और जो लोग हिंदू धर्म छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं उनके घर वापसी का प्रयास किया जा रहा है जबकि होना यह चाहिए था की ऐसी परिस्थितिया न बने की लोग अपना धर्म छोड़कर किसी और धर्म की ओर जाए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

सीवर सफाई के दौरान कब तक मरते रहेंगे सफाई कर्मी

बसंत कुमार

देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान सफाई कर्मियों की मौत को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है राज्यसभा में दिए गए एक सरकारी जवाब के अनुसार वर्ष 2021 से वर्ष 2025 के सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई करते समय कुल 315 सफाई कर्मियों की मौत हुई परंतु यह संख्या सिर्फ सरकारी आंकड़ों में दर्ज है और कितनी मौतें ऐसी हुई है जिनके बारे में सरकार को पता ही नहीं है। आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 53 मौतें दर्ज हुई जबकि दिल्ली में यह संख्या 26 से अधिक रही इसके अतिरिक्त हरियाणा में 43 तमिलनाडु में 38 उत्तर प्रदेश में 35, गुजरात में 25 और राजस्थान में 24 सफाई कर्मियों की सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मौत हो गई।

यह बात भी सामने आई है कि कुल मौतों का सिर्फ 70% ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो पाता है, इन मामलों में हो रही मौतों की संख्या कही अधिक है, अब प्रश्न उठता है सरकार हर क्षेत्र में तकनीकी विकास की बात करती है रोबोट के माध्यम से बड़े-बड़े मेडिकल ऑपरेशन हो रहे हैं पर सीवर की सफाई और सेफ्टी टैंको की सफाई के दौरान मरने वाले सफाई कर्मियों की मौत पर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है।

देश में हर दो-तीन दिन में कहीं न कहीं से सीवर की सफाई करने गए सफाई कर्मियों की मौत की खबरें आती रहतीहै,

इसको लेकर संसद के अंदर कई बार सवाल उठाते रहे हैं पर सरकार इसके लिए भी कदम नहीं उठा रही है और 21वीं सदी के भारत में आज भी सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई का काम मैन्युअली ही हो रहा है जिसके परिणाम स्वरूप इसका में इस काम में लगे मजदूरों की मृत्यु का समाचार आता रहता है। यद्यपि विदेशों में यह काम मशीनों से हो रहा है पर हमारे यहां सफाई कर्मी तौर सफाई करते समय सीवर या सेप्टिक टैंकों के मैंने होल में नीचे उतरते हैं और कई बार उसमें फंस जाने या गैस द्वारा दम घुटने से उनकी मौत हो जाती है इसे लेकर लंबे समय से आवाज उठाई जा रही है, हैरानगी की बात यह है कि हमारे देश में सीवर और सीवर सिस्टम अभी भी पूरी तरह से पुराने तौर तरीकों से चल रहा है न्यायालय के आदेशों के बावजूद इसका मशीनीकरण और ऑटोमेशन नहीं हो पा रहा हैं सुप्रीम कोर्ट औरअन्य अदालतें सीवर की मैन्युअल यानी मानव आधारित सफाई को गैरकानूनी ठहरा चुके हैं।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में सीवर डेथ के मामले में एक बड़ा फैसला लिया उसने कहा कि अब सीवर की सफाई के दौरान किसी सफाई कर्मी की मृत्यु हो जाती है या दिव्यांग हो जाता है तो उनके आश्रितों को 30 लाख रुपए का मुआवजा देना पड़ेगा इससे पूर्व वर्ष 2014 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सी वर डेथ के मामले में मृतकों को के परिवारों को 10 लख रुपए मुआवजा देने का आदेश पारित किया था पर दुर्भाग्य वश इस आदेश का पालन केवल आधे मामलों में ही किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि हाथ से मैला ढोने ने की प्रथा पूरी तरह से समाप्त होनी चाहिए और भारत में इंसान द्वारा नालो और सेप्टिक टैंकों की सफाई एक बहुत बड़ी समस्या है। इससे निजात पाना आवश्यक है।

भारत में 70% सीवेज लाइन की सफाई आमतौर पर होती ही नहीं। वर्ष 2015 में एक सर्वे से पता लगा कि 2015 तक हमारे देश में 810 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट थे लेकिन इनमें से मात्र 522 की चालू हालत में थी बाकी सब बंद पड़े थे देश के सीवेज प्लांट्स की में हर तरह की गंदगी गिरती है इसमें सूखा गीला प्लास्टिक और मलवा सभी कुछ होता है जिससे जानलेवा जहरीली गैस बनने लगती है और जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर या सेप्टिक टैंक में सफाई के लिए घुसता है तो दम घुटने की स्थिति बन जाती है अब समय आ गया है कि इसे मशीनों से लैस किया जाए भारत में कुछ वर्ष पहले सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्म विभूषण डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने बाहर से आयात करके दिल्ली में एक सीवेज क्लीनिक मशीन पेश की थी जिसकी कीमत 43 लाख रुपए थी पर सरकार के उदासीन रवैये के कारण ऐसी मशीन है और नहीं आ पाई।

अमेरिका में सीवर की सफाई के लिए मशीन और उपकरणों का समुचित ढांचा है सीवेज टनल्स को हमेशा मशीनों के जरिए धोया और साफ किया जाता है, सीवर की सफाई में मानव का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है, यूरोप में भी यही सिस्टम लागू है वहां सीवर की सफाई पूरी तरह नई तकनीक पर आधारित मशीनों के जरिए होती है और नई तकनीक से इस प्रक्रिया को और भी बेहतर बनाया जा रहा है यूरोप और अमेरिका की बात तो छोड़ दें एशियाई देश मलेशिया जो वर्ष 1957 में आजाद हुआऔर उसके बाद से उन्होंने अपनी सीवर सफाई की व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू किया पहले वहां भी सीवर की सफाई का काम आदमी करते थे लेकिन धीरे-धीरे इसे मशीन और फिर चरणबद्ध ऑटोमेटेड सिस्टम में रिप्लेस कर दिया गया अब यहां सीवर से जुड़ी सफाई का पूरा काम मशीनों से ही किया जाता है वहां की सरकार ने सीवर कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को सब्सिडाइज किया है और सरकार द्वारा सेप्टिक टैंक की सफाई रखने के लिए अवेयरनेस कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं पर दुर्भाग्य बस हमारे देश में इस बात पर कोई जोर नहीं दिया जा रहा है।

कैसी विडम्बना है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवनी कोजन जन तक पहुंचाने वाले रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के वंशज आज के आधुनिक युग में भी सीवर की सफाई के दौरान हजारों की संख्या में मर रहे हैं इनके लिए बस दो ही चीजों पर विशेष अधिकार प्राप्त है। एक तो यह कि रामायण के रचयिता महर्षि बाल्मीकि जयंती का को मनाने का विकसित अधिकार इस विषय में आर एस एस के सर संघ चालक मोहन भागवत यह बात कह चुके है कि बाल्मीकि जयंती पूरा हिंदू समझ क्यों नहीं मनाता और दूसरा सफाई कर्मियों के रूप में होने वाली रिक्तियों में शत प्रतिशत आरक्षण, क्योंकि भारतीय समाज में आज भी लोगों में यह भावना व्याप्त है कि सरकारी दफ्तरों और प्राइवेट जगहों पर सफाई का काम सिर्फ वाल्मीकि परिवारों में पैदा होने वाले बच्चे ही करेंगे और होता भी यही है कि जो बच्चा इन परिवारों में पैदा होता है उसे अपने बाप की जगह सफाई कर्मी नौकरी पर रख लिया जाता है, इस विषय में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में सफाई कर्मियों की सेवाओं का एक कैडर बनाकरनियमित भर्ती की जिसमें सभी जातियां के लोग शामिल हुए और उन्होंने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया है कि सफाई कर्मी का काम सिर्फ वाल्मीकि समुदाय के लोग ही नहीं करेंगे।

टॉयलेट मैन के नाम से मशहूर पद्म विभूषण डॉ बिंदेश्वर पाठक ने देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के प्रेरणा स्रोत बने, यदि डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक थोड़े दिन और जिंदा रहते तो सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली महतो को रोकने के लिए कोई न कोई कदम अवश्य उठाते, अपनी मृत्यु से चंद मिनटों पहले 15 अगस्त 2023 के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह वादा किया था पर अकाल मृत्यु के कारण यह वादा पूरा न कर पाए डॉ बिंदेश्वर पाठक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सरकार सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को रोक लगाने के लिए कदम उठाए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 19 मार्च 2026

संवैधानिक मर्यादा का खुलेआम अतिक्रमण

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?

राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें।  उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति  मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।

 अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में  संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था।  क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते।  राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है।  उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं?  क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था।‌ पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी‌ भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 ,मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 17 मार्च 2026

श्री संतोषी माता मंदिर, हरि नगर में 108वां नवरात्रि मेला 19 से 27 मार्च तक

संवाददाता

नई दिल्ली। धर्मनगरी हरि नगर, जेल रोड, नई दिल्ली-110058 स्थित सिद्धपीठ श्री संतोषी माता मंदिर में इस वर्ष भव्य 108वां नवरात्रि मेला श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के साथ 19 मार्च 2026 से 27 मार्च 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मंदिर परिसर इन पावन दिनों में भक्ति, साधना और सेवा का अद्‌भुत संगम बन जाता है। माँ संतोषी की असीम कृपा से आयोजित यह नवरात्रि महोत्सव वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर में विराजमान माँ संतोषी की दिव्य प्रतिमा, भव्य सजावट, फूलों और विद्युत रोशनी से जगमगाता मंदिर तथा भजन-कीर्तन की गूंज श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देती है। नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन लगभग 15000 हजार श्र‌द्धालु माँ के दरबार में दर्शन करने पहुँचते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। नवरात्रि मेले के दौरान मंदिर परिसर में विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। तथा प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक संकीर्तन, तथा रात्रि में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता है। भक्तों की सेवा के लिए प्रतिदिन दोपहर 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक विशाल भंडारे की व्यवस्था भी है।

मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के सान्निध्य में आयोजित यह महोत्सव भक्तों को भक्ति, संतोष और शांति का संदेश देता है। उनके अनुसार माँ संतोषी कलियुग मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के अनुसार, माँ संतोषी कलियुग की तारिणी स्वरूपा हैं जो अपने भक्तों के समस्त कष्ट हर कर, उन्हें संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं। इस उथल-पुथल भरे युग में संतोष और शांति ही वे दिव्य सूत्र हैं, जो सम्पूर्ण मानवता को प्रेम और भाईचारे के बंधन में जोड़ते हैं। माँ श्री संतोषी जी की कृपा से माता जी की चौकी प्रति मंगलवार, शुक्रवार तथा रविवार को होती है। आयोजित माता चौकी के दिनों में भक्त माँ की चौकी में हाजरी देकर अपनी समस्त समस्याओं एवं व्यथाओं से छुटकारा प्राप्त करते है। चौकी के दौरान मातारानी स्वयं गुरु श्री अमित सक्सेना जी के स्वरुप में प्रकट होकर भक्तों को उनके संकटों एवं तकलीफों से छुटकारा पाने के उपाय बताती हैं जिससे भक्तगण लाभान्वित होते हैं व साक्षात् माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माँ संतोषी के दरबार में आने वाले भक्तों की झोली कभी खाली नहीं रहती है।

नवरात्रि मेले का मुख्य आकर्षण 26 मार्च 2026 को रात्रि 9 बजे से प्रातः 5 बजे तक होने वाला विशाल भगवती जागरण होगा, जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक एवं कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से भक्तों को मंत्रमुग्ध करेंगे। इसके अगले दिन 27 मार्च की प्रातः कन्या पूजन और हवन के साथ नवरात्रि महोत्सव का समापन होगा।

मंदिर परिसर में श्र‌द्धालुओं की सुविधा के लिए भंडारा, चिकित्सा सहायता, व्यवस्था एवं सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं। सैकड़ों सेवादार निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहते हैं, जो इस आयोजन को सामाजिक सेवा और आध्यात्मिक समर्पण का अ‌द्भुत उदाहरण बनाते हैं।

श्री संतोषी माता मंदिर परिवार की ओर से सभी श्रद्धालुओं को इस पावन नवरात्रि महोत्सव में सपरिवार पधारकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सादर आमंत्रित है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

टीबी मुक्त भारत' जागरूकता क्रिकेट मैच: दिल्ली पुलिस ने सांसद -11 को 12 रन से हराया

  • टीबी मुक्त भारत अभियान के समर्थन में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच मैत्री क्रिकेट मैच
  • कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया द्वारा 15 मार्च 2026 को मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में आयोजन
  • दिल्ली पुलिस-11 ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 225/8 का स्कोर बनाया
  • सांसद-11 की टीम 213 रन पर ऑलआउट, दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मैच जीता
  • जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और दिल्ली पुलिस की सहभागिता से जनस्वास्थ्य जागरूकता का संदेश
संवाददाता
नई दिल्ली। टीबी मुक्त भारत के राष्ट्रीय अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के तत्वावधान में 15 मार्च 2026 को नई दिल्ली के ऐतिहासिक मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच एक मैत्री क्रिकेट मैच का आयोजन किया गया। इस पहल का उद्देश्य खेल के माध्यम से जनस्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ावा देना और टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय संकल्प के प्रति समाज की सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना था।
मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए दिल्ली पुलिस 11 ने 20 ओवर में 8 विकेट पर 225 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया। सिकंदर सिंह ने 38 गेंदों में 77 रन की शानदार पारी खेली, जबकि राजीव अंबास्ता ने 13 गेंदों में नाबाद 45 रन बनाकर टीम को तेज़ फिनिश दिया। सतीश गोलचा (21) और वेद प्रकाश सूर्य (17) ने भी उपयोगी योगदान दिया। सांसद 11 की ओर से गेंदबाजी में मनोज तिवारी (3/23) और केसरिदेव सिंह झाला (3/40) ने प्रभावी प्रदर्शन किया, जबकि सौमित्र खान (1/25) और अनुराग ठाकुर (1/42) ने भी विकेट हासिल किए।
लक्ष्य का पीछा करते हुए सांसद 11 की टीम ने संघर्षपूर्ण प्रदर्शन किया, लेकिन 18.2 ओवर में 213 रन पर ऑलआउट हो गई और दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मुकाबला अपने नाम कर लिया। सांसद 11 की ओर से अनुराग ठाकुर (52), के. सुधाकर (46), गुरमीत सिंह हायर (41) और लघु कृष्णा (23) ने उल्लेखनीय पारियाँ खेली। दिल्ली पुलिस की ओर से रोहित सिंह ने 43 रन देकर 5 विकेट लेकर मैच का रुख पलट दिया। अनिल शुक्ला (2/19) और सिकंदर सिंह (2/47) ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि हरेश्वर स्वामी (1/26) ने एक अहम विकेट लिया।
इस अवसर पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने टीबी मुक्त भारत के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि खेल समाज को जोड़ने और जागरूकता फैलाने का सशक्त माध्यम है। सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि क्रिकेट लोगों को एक साथ लाने की अ‌द्भुत क्षमता रखता है और जब जनप्रतिनिधि तथा संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं तो उसका संदेश दूर-दूर तक पहुँचता है।
सारण सांसद राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि टीबी के खिलाफ लड़ाई में सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक है और इस प्रकार के आयोजन लोगों को जोड़कर राष्ट्रीय अभियान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांसद अनुराग ठाकुर ने भी कहा कि खेल समाज को प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है और यह आयोजन एक स्वस्थ भारत के निर्माण की दिशा में हमारी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने कहा कि दिल्ली पुलिस उन पहलों का समर्थन करने में गर्व महसूस करती है जो सामुदायिक सहभागिता को राष्ट्रीय अभियानों से जोड़ती हैं। वहीं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जब नेता और संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए मैदान में उतरते हैं तो यह समाज में एकता और जिम्मेदारी का सशक्त संदेश देता है।

नीतीश की विदाई के मायने

अवधेश कुमार

नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना ऐसी घटना है जिस पर लंबे समय तक चर्चा होगी। राजनीति के छात्र भविष्य में इस पर शोध भी करेंगे । भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सत्ता शीर्ष पर बने रहने के बाद जब भी कोई स्वयं निवृत होने का फैसला करेगा या नहीं करेगा तब - तब इसे उदाहरण के रूप में पेश किया जाएगा। हमारी राजनीति, मीडिया और बौद्धिक जगत में संदेह का मनोविज्ञान इतना हावी है कि ऐसे किसी कदम को सहज स्वाभाविक स्वीकार नहीं किया जा सकता। विरोधी इसमें षड्यंत्र देख रहे हैं तो इसका उत्तर राजनीति और समाज के चरित्र में है। अपने व्यक्तित्व या अभी तक की घटनाओं के संदर्भ में देखते हैं तो यही निष्कर्ष आएगा। चूंकि भारतीय राजनीति में इस तरह के उदाहरण नहीं है, इसलिए यह असामान्य घटना लगती है। लगभग दो दशक प्रदेश का प्रत्यक्ष नेतृत्व करने के बाद इस निर्णय को सहज स्वीकार करना आसान नहीं होता। उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक वर्ग में भावनात्मक उबाल भी है। कुछ समय बाद धीरे-धीरे यह समाप्त हो जाएगा। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना पाखंड है कि कल तक जो लोग नीतीश कुमार को मानसिक रूप से असंतुलित होने की बात कर वीडियो वायरल करा रहे थे , बयान दे रहे थे वे भी इसमें भाजपा का षड्यंत्र देख रहे हैं। याद करिए जब एक मुस्लिम लड़की को नियुक्ति पत्र सौंपते समय उन्होंने अभिभावकीय भाव में हिजाब पड़कर यह कहते हुए कि क्या लगाई हो हटाओ खींचने की कोशिश की तो कितना बड़ा मुद्दा बनाया गया? वे भी नीतीश के नाम पर छाती पीट रहे। क्या हम राजनीति में ऐसी ही प्रवृत्ति चाहते हैं जहां कोई कभी अपने तरीके से सत्ता शीर्ष से निवृत होने का कदम उठाये ही नहीं? या उन्हें इसके लिए सम्मानपूर्वक तैयार करने की कोशिश नहीं हो? आप चाहते हैं कि ऐसा हो तो इसे सकारात्मक दृष्टि से देखिए।

ऐसी घटना के पीछे निश्चित रूप से कुछ कारण और बड़े प्रयास भी होंगे। अंततः परिणति ही मुख्य अर्थ रखती है। यह कहना कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनना चाहती थी इसलिए उन्हें हटा दिया गया नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को देखते हुए स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी टिप्पणी करने वाले नीतीश कुमार को दुर्बल या खोखला व्यक्तित्व साबित कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा हो सकती है किंतु इसके लिए नीतीश को जबरन हटाकर गठबंधन में विपरीत संकेत देंगे यह मानने का कोई कारण नहीं है। लोकसभा में भाजपा को बहुमत नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार जदयू और तेलुगू देशम की बदौलत चल रही है।भाजपा नेतृत्व क्या किसी नेता, उनके सहयोगियों या पार्टी से दुर्व्यवहार करने का जोखिम उठायेगी? आम दुष्प्रचार के विपरीत भाजपा अपने गठबंधन के साथियों को सम्मान देती है। महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना उद्धव ठाकरे को नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने भाजपा को छोड़ा। नीतीश कुमार को कभी भाजपा ने नहीं छोड़ा उन्होंने ही पाला बदल किया लेकिन जब वापस आए तो सरकार चलाने एवं निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता रही। 2020 में भाजपा को जद यू से ज्यादा सीटें थीं फिर भी मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया। नीतीश पर दबाव डालकर ऐसा कराया जा सकता है यह उनके चरित्र के साथ मेल नहीं खाता। नीतीश कुमार ने जब चाहा भाजपा को छोड़ा और फिर अपनी इच्छा से राजद छोड़ भाजपा के साथ आये। तो फिर?

उन्होंने एक्स पर लिखा है कि संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूँ। कहां जा रहा है कि कारण कुछ और है, यह स्क्रिप्ट औरों ने लिखकर उनकी विदाई का झूठा आधार प्रस्तुत किया है। ऐसा क्या कारण हो सकता है जिसके लिए नीतीश को झूठ बोलना पड़े? प्रत्यक्ष कोई कारण नजर नहीं आता। क्या यह संभव है कि भाजपा नीतीश को दबाव में लाकर मुख्यमंत्री पद से हटने के लिए मजबूर करे और वे इसे सहन कर जाएं? किसी को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की इच्छा हो और उसे जबरन हटाने की कोशिश होगी तो वह सरकार गिरा देगा। जिस सरकार का मुखिया नहीं हो उसे बनाए रखने में क्या रुचि हो सकती है। तो यह तर्क गले नहीं उतरता। मान लीजिए उन्होंने राज्यसभा को विदाई का बहाना बनाया तो इससे साबित नहीं होता कि किसी दबाव में थे। पिछली बार जब वह राजद के साथ गए थे तो तेजस्वी यादव के सामने घोषणा किया था कि अब अब हम आगे बहुत दिन नहीं रहेंगे और यही लोग आगे बढ़ाएंगे। अपने साथियों से बोलते थे कि अब हम मुख्यमंत्री पद से अलग होना चाहते हैं।

यह बात सही है कि पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार के व्यवहार, वचन और भाव में अस्वाभाविकता, असहजता और असंतुलन प्रदर्शित होता था। इन कारणों सेसमस्याएं आतीं थीं और दोनों पार्टी के नेताओं को हैंडल करना पड़ता था। इसलिए संभव है उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने की कोशिश हुई होगी। मुख्य बात निर्णय और उसके समय का है

सही समय पर लिए गए या कराए गए निर्णय का भी महत्व होता है और यह कई बार इतिहास के लिए उदाहरण भी बन जाता है। नीतीश कुमार के लिए इससे उपयुक्त अवसर सत्ता शीर्ष से अलग होकर तत्काल सक्रिय रहने का क्या हो सकता है? उनके नेतृत्व में गठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता मे है, राजनीतिक स्थिरता है, उनके विरुद्ध असंतोष का भाव नहीं है, विकास की गाड़ी पटरी पर है और‌सक्रिय रहने के लिए राज्यसभाकी सदस्यता है। शायद वे सीधे निवृत्ति की घोषणा करते तो विरोध ज्यादा उग्र और हिंसक हो सकता था। तो समर्थकों को समझाने के लिए उनके पास राज्यसभा में जाने की इच्छा का एक आधार है।

सच कह तो यह अवसर नीतीश कुमार के संपूर्ण राजनीतिक जीवन,  उनके योगदान आदि का निष्पक्ष मूल्यांकन का है। बिहार का नेतृत्व भाजपा के समर्थन से उन्होंने तब संभाल जब प्रदेश गहरे निराशा, हताशा और अवसाद से ग्रस्त था। बिहार में कुछ हो सकता है इसकी कल्पना ही नहीं थी। भारत और उसके बाहर बिहार कुशासन, अविकास, सामाजिक जातीय तनाव, नेताओं के भ्रष्टाचार का शर्मनाक उदाहरण बन गया था। बिहार शब्द गाली हो गई थी और स्वयं को बिहारी कहने में लोग शर्म महसूस करते थे। नीतीश के नेतृत्व में जनता दल यू और भाजपा ने बिहार में न केवल आशा,  उम्मीद और उत्साह पैदा किया बल्कि कानून और व्यवस्था पुनर्स्थापित कर प्रदेश को विकास के रास्ते सरपट दौड़ा दिया। पिछले लंबे समय से इसका विकास दर शीर्ष राज्यों के समान या कई बार आगे रहा है। लेकिन ध्वस्त हो चुके प्रदेश को वहां तक ले जाना आसान नहीं है। हालांकि उन्होंने लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय विभाजन और टकराव बनाए रखना एवं सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम परस्त नीति की काट के लिए पिछड़ों में अति पिछड़े, दलित में महा दलित , मुसलमान में पसमांदा आदि समूह खड़े किए और इससे जातिवाद दूसरे रूप में मजबूत हुआ। 

किंतु उनके कल में किसी तरह का जाति संघर्ष नहीं होना भी सच्चाई है। दूसरे, लड़कियों और महिलाओं को मुख्य धारा में लाने के कदम उनके दूरदर्शी विजन और लैंगिक समानता के प्रति सच्ची प्रप्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। जहां लड़कियां डर से स्कूल कॉलेज जाने से बचती थी वहां सीमित संसाधनों में उनके लिए साइकिल, वस्त्र, पुस्तकों और प्रोत्साहित करने के लिए वजीफे आदि की व्यवस्था ने चमत्कार कर दिया। हालांकि इन सबके पीछे भाजपा की भी भूमिका थी किंतु आज जब हम उनका मूल्यांकन करते हैं तो ये सब उनके योगदान में जुड़ेंगे। महिलाओं को स्थानीय निकाय में 33% आरक्षण की सामाजिक वर्णक्रम बदलने में ऐतिहासिक भूमिका थी। अगर कुछ निहित स्वार्थी बुद्धिजीवियोंऔर समर्थकों के प्रभाव में आकर सेकुलरिज्म के नाम पर उन्होंने 2013 में तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्धअतिवादी रवैया अपनाते हुए गठबंधन नहीं तोड़ा होता, राजद के साथ नहीं गए होते तो उनके ऐतिहासिक योगदान निर्दोष होते। 2010 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव का संपूर्ण परिवार पराजित हो गया था, पार्टी न्यूनतम वोट और सीटों पर आ गई थी। इसके अंत के साथ बिहार में विपक्ष की नई राजनीति के उभरने की संभावना थी। उन्होंने 2015 में साथ चुनाव लड़कर राजद को जीवन दान दिया। इस भूल के लिए उन्हें पश्चाताप होगा।‌ पर उन पर किसी तरह के वित्तीय भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि का आरोप नहीं लगा और यही सच्चाई है। उनके पुत्र इतने समय बाद राजनीति में आ रहे हैं तो इसे परिवारवाद को बढ़ावा देना नहीं कह सकते। सत्ता शीर्ष से स्वयं को अलग करने के कदम पर ऐसे व्यक्ति का अभिनंदन होना चाहिए , इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भाजपा नेतृत्व एवं जदयू के वरिष्ठ नेताओं की भी सराहना होनी चाहिए कि उन्हें इसके लिए उचित व सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराया। इसे राजनीति मेंश्रएक प्रवृत्ति स्थापना मान लें तो लोकतंत्र की दृष्टि से इसका संदेश मंगलकारी होगा।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली - 110092,  मोबाइल- 98110 27208

गुरुवार, 12 मार्च 2026

खाड़ी युद्ध में के कारण देश में गैस की किल्लत आखिर क्यों?

बसंत कुमार

खाड़ी में ईरान व इजरायल के बीच चल रही युद्ध से देश में एलपीजी किल्लत से आमलोगों की मुश्किलें बढ़ गई है कई जगह गैस सिलेंडर की सप्लाई प्रभावित होने के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई कम होने से होटल और रेस्टोरेंट के बंद होने का खतरा बढ़ गया है रसोई का बजट भी बिगड़ रहा है और उपभोक्ताओं में नाराजगी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यद्यपि भारत सरकार के पेट्रोलियम मिनिस्टर हरदीप पुरी ने यह दावा किया है कि युद्ध की स्थिति के बावजूद घरेलू इस्तेमाल के लिए सीएनजी और पीएनजी की शत प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं पर वास्तविकता यह है कि गैस किल्लत के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है एक तरफ ररेस्तरां के मालिक यह कह रहे हैं कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं संभली तो कामकाज बंद हो जाएंगे और वे लोग जिनके घरों में शादियां हैं वह गैस सिलेंडर की कमी के कारण चिंता में बैठे हुए हैं। ऐसा क्या है कि हमने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह बना दिया की खादी के युद्ध के कारण हमारी अपनी दिनचर्या नष्ट होती जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघ संचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही स्वावलंबन आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें। इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। आत्म पूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन में किसी प्रकार की कमी ना हो। आज हम पाते हैं कि खाद्य उत्पादन में भारत आत्मनिर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से कम उत्पादक एवं बंजर हो गई है। गुरु जी ने उसमें चेतावनी दी थी कि हम अपनी आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व आत्मनिर्भरता क्यों बढ़ाने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकार प्रयास के रूप में पर्यावरण के उनको माध्यम से करनी चाहिए। पर आज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी की सरकार है पर हम खाड़ी के युद्ध के कारण बेबस लग रहे हैं आखिर इसके क्या कारण है।

आर्थिक सुधार युग के दौर से पूर्व तक तक हम लोग शादी विवाह या रेस्टोरेंट के संचालन में प्राकृतिक संसाधनोंवीजैसे लकड़ी कोयलेऔर गाय के गोबर से बने उपलेका प्रयोग करते थे, घर में जब भी शादी होती थी तो अपने उत्पादित पेड़ों से कटाई करके लकड़ी से काम कर लिया जाता था इस तरह से रेस्टोरेंट में कोयल के उपयोग से सारे पकवान बनाए जाते थे परंतु आर्थिक सुधार के प्रारंभ होने के बाद हमने इन प्राकृतिक संसाधनों को बंद करके बाहर से आयात गैस के ऊपर पूर्णतया निर्भर करना शुरू कर दिया है यहां तक की खाने का सामान गाड़ियां आज सभी आयातित गैस की पर ही चल रही है और जब खाड़ी में युद्ध हुआ तो हमारी दिनचर्या ही पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गई है लोगों को चिंता सताए जा रही है कि अगर यह युद्ध ज्यादा चला तो हमारे शादी विवाह जैसे आयोजन कैसे होंगे या खाना कैसे बनेगा।

अपने जीवन में खेती बाड़ी से लेकर जीवन की दिनचर्या में अत्यधिक निर्भरता की खतरे को हमारे विचारों ने पहले ही जान लिया था और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राष्ट्र वादी विचारक डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व व राष्ट्रीय पुनरुत्थान में लिखते हैं" आर्थिक सुधार युग के पूर्व तक लोग गाय और बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधिया चला रहे थे क्योंकि आधुनिकता की मजबूरियों के बावजूद ट्रैक्टर हमारे छोटे जोते के लिए उपयुक्त नहीं है। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 24 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है। ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ साथ प्रदूषण बढ़ाता है। इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सर सी वी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा"भारत के लोगो को बताये कि अगर वे जीवित रहना चाहते हैं और दुनियां को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो ट्रैक्टर को भूल जाए तथा अपनी प्राचीन परंपरा को अपनाए एवं जुताई बैलों से करे "। परंतु अल्बर्ट आइंस्टीन है इस चेतावनी के बावजूद भी भारतअपनी पारंपरिक जीवन शैली को छोड़कर पश्चिम से आयातित जीवनशैली को अपना रहा है और अपने जीवन की गतिविधियों को 90% खाड़ी देशों से आयातित तेल के लिए के ऊपर निर्भर कर दिया है यहां तक की अब हम 500 मी. की दूरी तय करने के लिए पैदल चलने के बजाय मोटरसाइकिल या कार का इस्तेमाल करते हैं जो डीजल या पेट्रोल से चलती है, ऐसे में खाड़ी युद्ध के कारण ईरान के रास्ते भारत में तेल न पहुंचना भारत के आर्थिक गतिविधियों को ठप कर सकता है।

देश में करीब 19.01 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस की प्रतिदिन खपत है और इसका 50% आयातित होता है और गुंजा का की खाड़ी से जहाज का आवागमन लगभग बंद हो जाने के कारण खाड़ी देशों से करीब 6 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस सप्लाई बाधित हुई है और इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार को विशेष मीटिंग बुलानी पड़ी और प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों को निपटने के लिए अलर्ट रहने के लिए कहा। देश के कई हिस्सों मेंकमर्शियल और घरेलू सामान के लिए एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई में हो रही दिक्कत की शिकायत के बीच सरकार ने तय किया है कि नेचुरल गैस के उपयोग केलिए म एलजी उत्पादन सीएनजी और पीएनजी को सभी अन्य सेक्टरों पर तरह ही दी जाएगी इन क्षेत्रों की 100% डिमांड पूरी करने का प्रयास किया जाएगा तथा सरकार ने गैजेट नोटिफिकेशन के माध्यम से नेचुरल गैस के इस्तेमाल के लिए प्राथमिकता वाले चार क्षेत्र तय किए है -पहली प्राथमिकता के क्षेत्र में घरेलू पीएनजी सप्लाई, ट्रांसपोर्ट के लिए सीएनजी एलजी उत्पादन की और पाइपलाइन कंप्रेस्ड फ्यूल और अन्य जरूरी पाइपलाइन को रखा गया है

इसके बावजूद भी देश के अंदर उपभोक्ताओं में गहरी चिंता व्याप्त है और सभी डरे हुए है कि यदि खाड़ी युद्ध लंबा चला तो हमारे उद्योग धंधे दैनिक जीवन चर्या बुरी तरह से प्रभावित हो जाएगी इसलिए सरकार को आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भरता को दूर करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों से निपटा जा सके।

पश्चिम एशिया जंग और इससे तेल की कीमत में भारत की अर्थव्यवस्था में प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत में 10 % की उछाल से भारत की जीडीपी ग्रोथ में 20 से 25 बीसी एस की गिरावट आ सकती है। भारत अपनी जरूर का 89% कच्चा तेल आयात करता है और हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी है जो विगत 4 साल के उच्चतम स्तर पर है। हॉर्मुज की

खाड़ी से जहाज की आवा जाही बंद होने के कारण ग्लोबल सप्लाई में 20 से 25 बी पी एस की गिरावट आई है। ईरान और अमेरिका की लंबी लड़ाई से भारत की मुश्किलें और बढ़ सकती है क्योंकि भारत में आयात होने वाला कच्चा तेल हॉर्मुज की खाड़ी से आता है, और कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से देसी महंगाई और भी बढ़ सकता है यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 90 डॉलर के आसपास भी रहता है तो महंगाई पांच तक बढ़ सकती है लेकिन वर्तमान स्थिति में तो कच्चा तेल 120 प्रति बैरल के हिसाब से चल रहा है जो चिंता का विषय है और ऐसी स्थिति में भारत का चालू खाते का घाटा और भी बढ़ सकता है जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

विगत कुछ वर्षों से खाड़ी देशों ईरान इराक और अमेरिका इजरायल के संबंधों में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है और जिसका असर तेल की कीमतों में पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करता है इस कारण हमें अपने पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों के विकास पर भी जोर देना चाहिए जिससे अधिक तेल पर हमारी निर्भरता और न बढ़े।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 10 मार्च 2026

घरेलू न्यूज़प्रिंट में कैपेसिटी के दावे और क्वालिटी में कमी

नई दिल्ली। द इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी (INS) की ओर से, श्री विवेक गुप्ता, प्रेसिडेंट-INS ने देश में घरेलू न्यूज़प्रिंट की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है।

डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) ने अपनी 2024-25 की रिपोर्ट में बताया है कि घरेलू न्यूज़प्रिंट इंडस्ट्री का दावा है कि उसके पास 123 न्यूज़प्रिंट मिलें हैं, जिनकी इंस्टॉल्ड कैपेसिटी लगभग 2.2 मिलियन टन सालाना है। हालांकि, असल प्रोडक्शन के आंकड़ों से पता चलता है कि कैपेसिटी का इस्तेमाल इन दावों से काफी कम है, जिससे न्यूज़प्रिंट की देश में काफी उपलब्धता के दावों को चुनौती मिलती है। क्वांटिटी के अलावा, प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री के लिए क्वालिटी भी एक बड़ी चिंता बनी हुई है।

ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS), दिसंबर 2022 में पब्लिश हुए न्यूज़प्रिंट स्पेसिफिकेशन (सेकंड रिविजन) के तहत, फिजिकल, ऑप्टिकल, मैकेनिकल और सरफेस पैरामीटर के आधार पर न्यूज़प्रिंट को ग्रेड 1 और ग्रेड 2 में बांटता है।  हालांकि दोनों ग्रेड BIS के हिसाब से हैं, फिर भी वे ऑपरेशन के हिसाब से एक जैसे नहीं हैं।

ग्रेड 1, ज़्यादातर इम्पोर्टेड न्यूज़प्रिंट के बराबर है, एक बेहतर क्वालिटी बेंचमार्क दिखाता है और मोटे तौर पर इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के हिसाब से है। इसकी खासियतों में ज़्यादा ब्राइटनेस (जिससे टेक्स्ट ज़्यादा शार्प और इमेज साफ़ बनती है), बेहतर सरफेस स्मूदनेस (एक जैसी इंक ले के लिए ज़रूरी), ज़्यादा टेंसाइल और टियर स्ट्रेंथ (हाई-स्पीड प्रिंटिंग प्रेस पर स्टेबिलिटी पक्का करना), और कंट्रोल्ड पोरोसिटी (इंक स्प्रेड और शो-थ्रू कम करना) शामिल हैं। ये खूबियां ग्रेड 1 न्यूज़प्रिंट को मॉडर्न हाई-स्पीड न्यूज़पेपर प्रिंटिंग ऑपरेशन के साथ ज़्यादा कम्पैटिबल बनाती हैं।

ग्रेड 2 न्यूज़प्रिंट मोटे तौर पर देश में बने न्यूज़प्रिंट जैसा ही है। टेक्निकली मिनिमम BIS थ्रेशहोल्ड के हिसाब से होने के बावजूद, इसमें ऑपरेशन की कुछ बड़ी कमियां हैं, जिनमें कम और एक जैसी ब्राइटनेस लेवल, खराब सरफेस स्मूदनेस (जिससे इंक फेदरिंग और डॉट गेन होता है), कम मैकेनिकल स्ट्रेंथ (जिससे बार-बार वेब टूटता है) और इर्रेगुलर पोरोसिटी (जिससे इंक की ज़्यादा खपत होती है और प्रिंट में एक जैसा नहीं दिखता) शामिल हैं।  इसलिए, ग्रेड 2 न्यूज़प्रिंट से कागज़ और स्याही की ज़्यादा बर्बादी होती है, बार-बार काम रुकने से प्रेस की स्पीड धीमी हो जाती है, जिससे डिलीवरी शेड्यूल में देरी होती है। इसलिए, यह मॉडर्न हाई-स्पीड प्रिंटिंग प्रेस की ज़रूरतों को भरोसेमंद तरीके से पूरा नहीं करता है।

बीआईएस मानकों की समीक्षा से यह भी पता चलता है कि ग्रेड 2 मानक प्रदर्शन-आधारित होने के बजाय न्यूनतम सीमा-उन्मुख बना हुआ है। दूसरे शब्दों में, यह मानक इस प्रश्न का उत्तर देता है कि "क्या कागज बुनियादी स्तर पर स्वीकार्य है?" लेकिन यह नहीं कि "क्या कागज आधुनिक समाचार पत्र मुद्रण कार्यों के लिए उपयुक्त है?"

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल जी ने कहा है कि "हमारे मानक वैश्विक मानकों से कम नहीं होने चाहिए और यदि वे उनसे नीचे हैं तो उन्हें उन्नत किया जाना चाहिए"। हाल ही में उन्होंने आगे कहा कि "वैश्विक मानकों का सामंजस्य स्थापित करने से न केवल उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ती है बल्कि मुक्त व्यापार, खुले बाजारों को भी बढ़ावा मिलता है और इस तरह की पहल से खुले बाजारों का विस्तार होगा और व्यवसायों के लिए समान अवसर उपलब्ध होंगे"।

ये बयान प्रिंट मीडिया उद्योग की उन चिंताओं की पुष्टि करते हैं, जो अब तक इस बात को लेकर बनी हुई हैं कि घरेलू समाचारपत्र की मौजूदा गुणवत्ता और मानक, कुल मिलाकर, भारतीय प्रकाशकों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं।

भारतीय प्रकाशकों के सामने केवल उत्पादन क्षमता की समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और प्रिंटिंग प्रेस के अनुकूल गुणवत्ता वाले समाचार पत्र की उपलब्धता की भी समस्या है। जब तक घरेलू उत्पादन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उन्नत नहीं किया जाता, तब तक भारत में गुणवत्तापूर्ण, कुशल और समय पर समाचार पत्र उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए समाचार पत्र का आयात अनिवार्य रहेगा।

शनिवार, 7 मार्च 2026

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अवधेश कुमार 

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्लाह अल खामेनेई का मारा जाना 21वीं सदी की ऐसी बड़ी घटना है जिसका प्रभाव कई रूपों में संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा। इस्लामी शासन होने के कारण वे व्यावहारिक रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भूमिका खामेनेई की नीतियों के क्रियान्वयन की रही है।अयातुल्लाह होने के कारण उन्हें विश्व भर के शिया मुसलमान अपने शीर्ष मजहबी नेता के रूप में देखते थे। पाकिस्तान ,ईरान ,भारत सहित कई देशों में शिया मुसलमानों का विरोध सामने है। किंतु यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एक भी पड़ोसी देश ने ईरान का पक्ष नहीं लिया है। हालांकि पिछले वर्ष खामेनेई ने संपूर्ण विश्व के मुसलमानों की एकता का आह्वान किया था। ईरान और उसके बाहर उनके समर्थकों की कल्पना में कभी उनके इस तरह की मौत की बात नहीं आई होगी। हालांकि पिछले वर्ष जून में पहले इजरायल और बाद में अमेरिका के हमले के समय अटकलें लगी थी कि शायद वे देश छोड़कर चले गए। ऐसा हुआ नहीं।

इस घटना की संपूर्ण परिणतियों का स्पष्ट पूर्वावलोकन अभी कठिन है। इतना स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईरान में 1979 से इस्लामी क्रांति का एक दौर तत्काल समाप्त हो गया है।

ऐसा नहीं है कि इस्लामी क्रांति के बाद हुए परिवर्तनों, स्थापित ढांचें, विचारधारायें समाप्त हो गईं हैं पर कम से कम उस रूप में आने वाले लंबे समय तक मुक्त और स्वतंत्र शिया इस्लामी शासन नहीं हो सकता। यह कथन सामान्य क्रांतियों के संदर्भ में है कि क्रांति के शिशु ही क्रांति को खा जाते हैं। ईरान के इस्लामी क्रांति के बारे में भी तत्काल यह निष्कर्ष सही दिखता है। सामान्यतः आम इस्लामी देशों से थोड़ा उदार और खुले जीवन जीने वाले ईरान में 1979 के इस्लामी क्रांति और अयातुल्लाह के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापना संपूर्ण विश्व की दृष्टि से एक नई घटना थी। इसमें केवल ईरान नहीं संपूर्ण अरब और कुछ मायनो में इससे बाहर भी गैर इस्लामी या इस्लाम विरोधी शासनों के अंत और इसके विस्तार का विचार प्रबल था। यहूदी देश इजरायल को इस्लाम का दुश्मन घोषित करते हुए ईरान राष्ट्र का लक्ष्य धरती से उसका नामोनिशान मिटाना हो गया। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को शैतान कहा गया। यह व्यावहारिक तौर पर विश्व में एक इस्लामी विद्रोह की सत्ता का स्वरूप था। सच कहें तो इसी अतिवादी भाव के व्यवहार ने ईरान को उस अवस्था में पहुंचा दिया जहां उसका शांत, स्थिर, सशक्त और सुरक्षित रहना असंभव था। जब आप किसी एक देश के धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करेंगे और उसके अनुसार देश का व्यवहार होगा, बाहर अलग-अलग हिंसक समूह पैदा कर उसकी मदद करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया आपको झेलनी पड़ेगी। आखिर कोई देश ऐसे शासन को कायम रहने देने के पक्ष में क्यों होगा जो उसके अंत को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रहा हो?

इस्लामी क्रांति के साथ 1979 में अमेरिकी दूतावास पर हमले और उसके बाद की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। अमेरिकी कर्मचारियों के हाथ बांध कर बाहर लाया गया, वे बंधक बनाये गये। तब से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की कामना होती थी ईरान से इस्लामी शासन का अंत हो। तत्कालीन ईरानी शासक राजा शाह पहलवी को अपने परिवार और समर्थकों के साथ अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। आज उनके पुत्र रेजा शाह पहलवी और  परिवार अमेरिका में ही है। पिछले लगभग 3 महीने से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों में हमने देखा कि लोग उनकी तस्वीरें लिए वापस आओ के नारे लगा रहे थे। ये लोग अमेरिका से भी हस्तक्षेप की भी मांग कर रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विरोधियों का समर्थन किया,  ईरान को चेतावनी दी पर तत्काल सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। कुछ वक्तव्यों और घटनाओं से लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप इस बार परिणामकारी सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने खामेनेई शासन को चेतावनी दी, न्यूक्लियर कार्यक्रमों को समाप्त करने की शर्तें रखी, ओमान में बातचीत भी आरंभ की किंतु सब रणनीति के तहत था। उसके साथ-ईरान के आसपास अब्राहम लिंकन जैसा सबसे बड़ा नौसैनिक बेरा और अन्य तैयारी होती रही।

दरअसल, 7 अक्टूबर ,2023 को हमास द्वारा उत्सव मना रहे निर्दोष निरपराध यहूदियों पर हमला कर लगभग 1200 लोगों का सरेआम कत्लेआम और बंधक बना लेने की घटना ने पश्चिम एशिया खासकर ईरान इजरायल ,ईरान अमेरिका संबंधों को ऐसे मोड़ पर ला दिया जिसे अयातुल्लाह सहित उनके परिवार के अनेक सदस्यों ,प्रमुख कमांडरों और रक्षा मंत्री आदि की मृत्यु की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। गाजा में हमास , लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुती अयातुल्लाह के ईरान के ही गैर राज्यीय आतंकवादी समूह हैं। उस घटना ने विश्व के हर विवेकशील व्यक्ति और संतुलित राष्ट्रों को अंदर से हिला दिया। हालांकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी मजहबी भाव को देखते हुए मुस्लिम देशों में आम भाव ऐसा नहीं था किंतु ईरान की तरह भूमिका दूसरे की नहीं थी।

इजरायल और अमेरिका का ऑपरेशन तभी से आगे बढ़ने लगा। लेबनान में हिजबुल्लाह  तथा गाजा में हमास को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कार्रवाई आरंभ की। हिजबुल्लाह प्रमुख नजीबुल्लाह और उसके ज्यादातर शीर्ष साथियों की मृत्यु ,उसके केंद्र काफी हद तक नष्ट होने आदि के साथ उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि पहले की तरह संघर्ष नहीं कर सकते थे। गाजा में भी संघर्ष जारी रहा और अपने लोगों को सुरक्षित लाने की विवशता रहते हुए भी इजरायल ने हमास के ढांचे को जितना संभव था अंत करने की कोशिश की। डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आने के बाद कुछ समय के लिए लगा कि शायद इजरायल की उनको लेकर अपेक्षाएं गलत साबित हो सकतीं हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका के शक्तिशाली जीबी 57ए/ बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमोपी  जिसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है, के हमलों में ईरान के तीन महत्वपूर्ण फोर्डो, नतांज और इस्फाहान न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट किया। वस्तुत: अमेरिका और इजराइल क्रमबद्ध तरीके से यहां तक पहुंचे हैं। ईरान पर पिछले एक दशक से ज्यादा के प्रतिबंधों ने उसके तेल व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया और आर्थिक संकट बढ़ता गया। डोनाल्ड ट्रंप ने उन प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के उपाय किए और उनके तेवर ऐसे थे जिसका असर हुआ। इस बीच ईरान रिवॉल्यूशनरी कोर्प्स गार्ड से लेकर प्रमुख रक्षा वैज्ञानिकों आदि की हत्यायें होती रहीं । इजरायल ने भी बीच-बीच में हमले किये। हालांकि पिछले वर्ष ईरान के मिसाइल हमले से इजरायल को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। उसके बाद ज्यादा सशक्त तैयारी का अहसास हुआ और वही किया गया।

आयतुल्लाह के मारे जाने के कुछ घंटे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा किया कि ईरान के बहादुर लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप अपने घरों में रहें ,चारों तरफ हमारे बम गिर रहे हैं और इस शासन से मुक्त कर आपको हम ईरान सौंप देंगे तब भी शायद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को विश्वास नहीं हुआ होगा कि वे जो बोल रहे हैं वही करने की तैयारी से इस बार ईरान में हस्ताक्षेप हुआ है। देख लीजिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीश में ज्यादातर मुस्लिम देश ही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका और इजरायल का पूरा साथ दिया है। ईरान जिस तरह सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत ,क़तर आदि सभी स्थानों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के नाम पर हमले कर रहा है उसके लगता है कि हर देश उसके विरुद्ध थे। वैसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे पहला और लंबा युद्ध इराक के साथ हुआ जो स्वयं शिया बहुल देश है।

अभी भविष्य की स्पष्ट तस्वीर नहीं प्रस्तुत की जा सकती। ईरान के बचे-खुचे कमांडर अपनी शक्ति से संघर्ष करेंगे,  दुनिया भर के शिया अतिवादी समूह अपने स्तर से हिंसा और विरोध करेंगे, लेकिन ईरान के शासन का लंबे समय तक समूचे देश पर नियंत्रण रहना कठिन होगा। ईरान पर कब्जा कर किसी को सत्ता पर बिठाना अमेरिका के लिए कठिन है। बड़ी संख्या में ईरानी भी किसी बाहरी हस्तक्षेप वाले शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खामेनेई की मृत्यु के बाद तत्काल उनके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुई है जो‌ लोगों की प्रतिक्रियाओ में दिख रही है।‌ ईरान में तुर्क, कुर्द, अज़रबैजानी  अलग-अलग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका हौसला बढ़ा है। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाला समूह भी बहुत बड़ी संख्या में है। इसलिए ईरान के एक निश्चित दिशा में पहुंचने के पहले वहां घटनाएं अनेक मोड़ लेंगी और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस्लामी शासन का ऐसा हस्र पूरी दुनिया के इस्लामवादियों के लिए सबक होना चाहिए। जो भी हो 1979 इस्लामी क्रांति के सिद्धांत वाली ऐसी शासन व्यवस्था वहां कायम नहीं रह सकती, जिसका संपूर्ण देश पर प्रभावी नियंत्रण हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

गुरुवार, 5 मार्च 2026

न्यायालय, पुलिस और जन प्रतिनिधियों (नेताओं) के प्रति भ्रष्ट होने का पूर्वाग्रह पालना अनुचित

बसंत कुमार

इधर कुछ दिनों से एन सी ई आर टी की कक्षा 8कीसमाज शास्त्र की पुस्तक के न्यायपालिका के भ्रष्टाचार नामक शीर्षक से एक चैप्टर प्रकाश जिसमे न्यायपालिका में व्यापत भ्रष्टाचार और न्यायलयों में दशकों से लंबित मामलों की जानकारी दी गई। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले का संज्ञान लेते हुए इस चैप्टर को बैन करने का आदेश दिया और इस प्रकार के चैप्टर के पुस्तक में शामिल होने पर नाराजगी यद्यपि एनसीईआरटी ने इस विषय में माफी मांग ली है, पर प्रश्न यह उठता है कि एन सी ई आर टी जैसी संस्था जो देश में शिक्षा और अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयो पर निर्णय लेती है और इसके लिए इस संस्थान में बड़े विद्वान लोगों की टीम रहती है वहां इस प्रकार की लापरवाही कैसे हुई और पाठयक्रम में एक ऐसा पथ जोड़ दिया गया जो देश की आने वाले युवा पीढ़ी के मन में देश की न्यायपालिका व न्यायालयों के विषय में किसी तरह का भ्रम पैदा करे।

यह सही है कि विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका अपने उच्च आदर्शो को बनाए रखने में नाकाम रही है, जस्टिस वर्मा जिनके सरकारी आवास पर से अनगिनत नोटों के बंडल पाए गए और कुछ अन्य जजों के कृत्य के कारण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है, कुछ वर्ष पूर्व तमिलनाडु उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज जस्टिस कर्णनन मैं पत्र लिख कर उच्च न्यायपालिका में कार्यरत कई जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए थे।

एक बार संसद में न्यायमूर्ति जस्टिस मुखर्जी पर भ्रष्टाचार केआरोप पर महाभियोग लाया गया पर संसद के उत्तर भारत व दक्षिण भारत की लाबी में बट जाने के कारण यह महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। कुछ माह पूर्व एक सिरफिरे वकील ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बी आर गवई के ऊपर भरी अदालत में जूता फेंकने का साहस किया। यह घटना है उस उच्च न्यायपालिका का अपमान है जहां देश का नागरिक पीड़ित होने पर सामने वाले को बड़े गर्व से कह देता है आई विल सी यू इन द कोर्ट उसका यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि देश की न्यायपालिका जाति धर्म लिंग भेद से परे रहकर ईमानदारी से काम करती है पर पाठ्य पुस्तक में इस तरह के चैप्टर का छपना सचमुच दुर्भाग्य पूर्ण है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए जस्टिस सुरेश कैत खुले आम यह आरोप लगाया कि देश की न्यायालय में वंचित यानी दलित समाज के लोगों के साथ न्याय नहीं हो पाता जबकि जस्टिस सुरेश कैत दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ अन्य न्यायालयों में सम्मानित न्यायाधीश रहे है पर हैरानी की बात यह है कि सेवा में रहते हुए उन्होंने कभी भी न्यायपालिका में दलितों व वंचितों के साथ अन्याय होने की बात नहीं उठाई, लेकिन जस्टिस सुरेश कैत ये बात सेवा में रहते हुए यह बात उठा देते तो सम्भव; इस विषय में कुछ हो सकता था, फिर भी आज भी इन सारे विवादों के प्रकाश में आने के बावजूद देश के नागरिकों में न्यायपालिका के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास है।

एनसीईआरटी की पुस्तक के विवादित पाठ में न्यायालय में दशकों से लंबित मुकदमों का भी वर्णन किया गया है जिनकी संख्या लाखों में हो गई है इन बातों को समय-समय पर समाचार पत्र सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों द्वारा उठाया जाता रहा है पर न्यायालय में इतनी संख्या में लंबित मुकदमों के लिए सिर्फ कोर्ट को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वकीलों द्वारा मामलों को लंबा लटकाना पुलिस द्वारा दोषपूर्ण तफ्तीश और सरकार द्वारा न्यायालय में खाली पदों को न भरना भी एक कारण है। हमारी पुलिस कानून व्यवस्था और शिकायतों को निपटाने में सफल नहीं रही है जहां कोर्ट केसेस में वकील डेट लेकर मामले को लटकाते है पुलिस और अन्य जांच एजेंसियांभी पीछे नहीं है चार्ज शीट समय पर फाइल न करना या प्रॉसिक्यूशन का समय पर उपस्थित न होना बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के कारण है। इसकाअन्य कारण पुलिस विभाग में स्टाफ की संख्या में भारी कमी है।

जो भी पुलिस बल हमारे पास उपलब्ध है वह कानून व्यवस्था और मुकदमों को निपटने के बजाय, भारी संख्या में वीआईपी सुरक्षा में तैनात रहती है क्योंकि सुरक्षा रखना अब नेताओं और बाहुबलियों के लिए आवश्यकता नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल बन गया है, मैंने स्वयंअनुभव किया है कि कुछ ऐसे नेता हैं जो उम्र 80 या 90 के पड़ाव में पहुंच चुके हैंऔर जिन्हें यमराज के अलावा किसी और से कोई डर नहीं है पर वह भी वाई प्लस और जेड प्लस कैटेगरी की सुरक्षा रखते हैं सरकार को चाहिए कि अब नेताओं और बाहुबलियों को दी जाने वाली सुरक्षा का रिव्यू करें और अनावश्यक सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को हटा कर पुलिस कर्मियों को कानून व्यवस्था अपराध रोकने और प्रॉसिक्यूशन जैसे कामों में लगाया जाए। जिससे न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सके।

चाहे चाहे फिल्म उद्योग हो या मीडिया का अन्य साधन हो न्यायपालिका के साथ-साथ पुलिस और जनप्रतिनिधियों को सदैव भ्रष्टाचार में लिप्त ही दिखाई जाता है परंतु कभी भी इस तरह की फिल्मों या साहित्य पर रोक नहीं लगाई जाती, सेंसर बोर्ड इन फ़िल्मों को कैसे पास कर देता है यह समझ से परे है। जहां तक पुलिस का सवाल है कोई भी सभ्य आदमी यह नहीं चाहता की कोई वर्दी धारी पुलिस वाला उनके घर आए, मेरे एक दोस्त जो पुलिस अधिकारी है वे मेरी एक पुस्तक के लोकार्पण के सिलसिले में मेरे पास आना चाहते थे, परंतु वे पहलेऑफिस से अपने घर गए और यूनिफार्म बदल करमेरे पास आएऔर पूछने पर कहने लगे कि आजकल हमारी इमेज इतनी खराब हो गई है की कोई भी शरीफ आदमी यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाली पुलिस वाला वर्दी पहनकर उनके घर आए। यह ठीक है कि जीवन के हर पक्ष से भ्रष्टाचार से मुक्ति होनी चाहिए परंतु किसी पक्ष विशेष चाहे वह पुलिस हो चाहे न्यायालय हो चाहे हमारे जनप्रतिनिधि हो उनकी इमेज को भ्रष्ट या अनैतिक दिखाना समाज के लिए ठीक नहीं है। जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में या अनाचार में लिप्त पाया जाए उसे पर तुरंत से तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए परंतु एक व्यक्ति के कारण उसे पूरे समाज को भ्रष्टाचार या अनाचार में लिप्त नहीं माना जाना चाहिए, इस तरह कीबनाई गई इमेज पूरे समाजको बर्बाद कर देती है इस कारण जो एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका को भ्रष्ट कह कर 12-14 साल के उम्र के बच्चों के दिमाग में यह बिठा देना कि देश की न्यायपालिका भ्रष्ट है बिल्कुल ही अनुचित है।

एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायालय के भ्रष्ट होने का जो पाठ छप गया था यदि वह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कीछवि खराब करने के लिए किया गया है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैक्यूंकि भारत की न्यायपालिका विश्व की गिनी चुनी न्यायपालिकाओं में से एक है जिसके विषय में यह माना जाता है कि राजनीति या अन्य शक्तियों से प्रभावित नहीं होती पर यह भी आवश्यक है कि न्यायालय को भ्रष्ट और सुस्त वाली छवि से उबारने के लिए स्टीरियोटाइप वर्किंग से मुक्ति पानी होगी न्यायालय को यह देखना होगा की वही लोग जेल में डाले जाएं जिनको जेल में डालना आवश्यक हो और न्यायालय में न्याय के आशा में आए लोगों को तारीख पर तारीख नहीं मिलनी चाहिए इससे लोगों में न्यायपालिका के प्रति आस्था में वृद्धि होगी और दशकों को सेलंबित मुकदमों संख्या में कमी आएगी।

कुछ वर्षों पूर्व एक फिल्म क्रांतिवीर आई थी जिसमें नेता, पुलिस, जज, भूमाफिया सभी को भ्रष्टाचार में लिप्त व गरीबों का अमानवीय शोषण करने वाला दिखाया गया था निश्चय ही जनमानस के बीच सभी की नकारात्मक छवि अनुचित है और हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों की छवि को धूमिल होने से बचाया जाए।

यह निर्विवाद सत्य है कि भ्रष्टाचार में लिप्त में कुछ लोगों के आ जाने से देश की न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है और 30 -40 साल तक न्याय न्याय के लिए भटकते लोगों। को न्याय न मिलने के कारण न्यायपालिका की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी लोग न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायालय का ही दरवाजा खटखटाना में विश्वास करते हैं और ऐसे में न्यायपालिका के बारे में जूनियर कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में भ्रामक बातें लिखना और स्कूल जाने वाले बच्चों के मन में न्यायपालिका व अन्य संस्थाओं के बारे में भ्रम पैदा करना अत्यंत गंभीर है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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