सुबह के सात बजे हैं। स्कूल की घंटी बजने वाली है। एक तरफ बस्ता उठाए बच्चे दौड़ते हुए कक्षा की ओर जा रहे हैं, दूसरी तरफ एक आठ साल का बच्चा किसी ढाबे पर जूठे बर्तनों का ढेर साफ कर रहा है। यह सिर्फ एक दृश्य नहीं है यह हमारे समाज का वह कड़वा सच है जिससे हम अक्सर आंखें चुरा लेते हैं। यह कोई मामूली समस्या नहीं है बल्कि यह अपराध पर चुनी हुई एक चुप्पी है समाज की, व्यवस्था की और हम सबकी। बाल श्रम को समझना हो तो पहले यह समझना होगा कि यह पनपता कहां से है? यह कहना सही है कि गरीबी बाल श्रम को बढ़ावा देती है, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि बाल श्रम गरीबी को बनाए रखता है। जब बच्चे पढ़ाई छोड़कर कम उम्र में काम करने लगते हैं, तो वे शिक्षा और बेहतर रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इससे उनका भविष्य सीमित हो जाता है और गरीबी का चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। इसके साथ ही अशिक्षा, सामाजिक असमानता, भेदभाव और कानूनों के कमजोर पालन जैसी समस्याएं भी बाल श्रम को बढ़ावा देती हैं। ईंट-भट्ठों, होटल-ढाबों, घरेलू कामकाज, बीड़ी उद्योग और खेत-खलिहानों में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे काम करते दिखाई देते हैं। चूंकि उत्तर प्रदेश में जनसंख्या अधिक है इसलिए यहां समस्या भी बड़े रूप में सामने आती है। ऐसे में राज्य सरकार का वर्ष 2027 तक प्रदेश को बाल श्रम मुक्त बनाने की प्रतिबद्धता सराहनीय है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह हजारों बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और बेहतर भविष्य का अवसर प्रदान कर सकता है।
हालांकि बाल श्रम रोकने के लिए कानूनी ढांचा मौजूद है। बाल एवं किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम और शिक्षा का अधिकार कानून जैसे कई और कानून पहले से हैं। बावजूद इसके कानून और जमीनी हकीकत के बीच की खाई आज भी चौड़ी है। श्रम विभाग की छापेमारी होती है, बच्चे छुड़ाए जाते हैं, नियोक्ताओं पर कड़ी कार्रवाई की बजाए मामूली खानापूर्ति के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है। जिससे वो फिर एक नई ऊर्जा के साथ किसी और मासूम को बाल श्रम के दलदल में फंसा देते हैं। लेकिन इस दुष्चक्र का अंत यहीं नहीं हो जाता क्योंकि अगर मुक्त कराए गए बच्चे को पुनर्वास नहीं मिला, तो वह दोबारा उसी दलदल में लौट जाता है। यही वह बिंदु है जहां कानूनी कार्रवाई नाकाफी साबित होती है। असली काम बच्चे को छुड़ाने के बाद शुरू होता है। उसे स्कूल में दाखिला दिलाना, परिवार को आर्थिक सहायता देना और समाज में उसकी सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित करना यह पूरी प्रक्रिया उतनी ही जरूरी है जितनी छापेमारी।
बाल श्रम के खात्मे का सबसे कारगर और टिकाउ इलाज है स्कूल, जो बच्चा नियमित रूप से स्कूल जाता है, वह बाल मजदूर नहीं बनता। इस क्रम में मध्याह्न भोजन योजना ने लाखों गरीब बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाई है। समग्र शिक्षा अभियान, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय और विशेष प्रशिक्षण केंद्र ये सब उन बच्चों के लिए उम्मीद की खिड़कियां हैं जो बाल मजदूरी के अंधेरे से बाहर निकल रहे हैं। अब जरूरत इस बात की है कि बारहवीं तक की शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण, अनिवार्य और निःशुल्क के आयामों को जमीन पर उतारा जाए। महज कागजी अनिवार्यता से काम नहीं चलेगा यह सुनिश्चित करना होगा कि हर बच्चा स्कूल में हो।
बाल श्रम में लड़कियों की स्थिति और भी दयनीय है। घरेलू काम और सामाजिक भेदभाव उन्हें शिक्षा से दूर रखते हैं। बेटी है तो पराया धन ही जैसी मानसिकता के चलते उन्हें पढ़ाई से दूर कर घर बैठाने वाली परिस्थितियां बाल श्रम के लिए मुफीद हैं। हालांकि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं समाज की सोच बदलने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन यह लड़ाई लंबी है। बाल श्रम और ट्रैफिकिंग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ट्रैफिकिंग के जरिए बच्चों को उनके घरों से दूर कहीं बाल श्रम के दलदल में फंसा दिया जाता है। इस जघन्य अपराध पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है बाल श्रम के लिए चिह्नित 543 हॉटस्पॉट पर एक मजबूत सक्रिय जमीनी नेटवर्क और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की चौबीसों घंटे प्रतिबद्धता जरूरी है। इस दिशा में नागरिक समाज की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।
बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) अपने 250 से अधिक सहयोगियों के साथ देश के 450 से ज्यादा जिलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर बच्चों को बाल मजदूरी और ट्रैफिकिंग से बचाने के लिए काम कर रहे है। जेआरसी अपने 25 सहयोगी संगठनों के साथ उत्तर प्रदेश के 41 जिलों में राज्य सरकार के बाल श्रम-मुक्त प्रदेश के लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा है। इसी क्रम में सरकार के सहयोग से वर्ष 2027 तक 20,000 से अधिक सुरक्षित बाल ग्राम विकसित किए जाएंगे। जेआरसी की यह पहल सरकार और समाज के साझा प्रयासों का एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करेगी।
सबसे जरूरी बात यह है कि यह लड़ाई सरकार अकेले नहीं जीत सकती। हम में से अधिकांश लोग ढाबे पर बर्तन धोते बच्चे को देखकर मुंह फेर लेते हैं। यह उदासीनता भी उतनी ही दोषी है जितना बाल मजदूरी करवाने वाला नियोक्ता। पंचायत स्तर पर जागरूकता, सामाजिक संगठनों की सक्रियता, जनभागीदारी और व्यापक जन जागरूकता के समन्वित प्रयासों से बाल मजदूरी के खिलाफ एक मजबूत दीवार खड़ी कर सकते हैं। इसलिए अगर आप कहीं, किसी भी बच्चे को मजदूरी करते देखें तो चुप मत रहिए। पहले तो उसका बहिष्कार करिए फिर फोन करिए, एक शिकायत किसी बच्चे की पूरी जिंदगी बदल सकती है। क्योंकि जब बच्चा खेलने की उम्र में काम करता है तो सिर्फ उसका बचपन ही नहीं छिनता बल्कि देश का एक उज्जवल भविष्य भी छिन जाता है।
एक पढ़ा-लिखा, स्वस्थ और आत्मविश्वासी बच्चा राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार 2027 तक राज्य को बाल श्रम मुक्त बनाने के लक्ष्य को कानूनों पर सख्त अमल, प्रभावी पुनर्वास, शिक्षा और जनभागीदारी के संयुक्त प्रयासों से साकार किया जा सकेगा। लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब सरकार के साथ समाज, परिवार और सामाजिक संगठन भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें, ताकि बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो।
(लेखक ग्राम स्वराज्य समिति के निदेशक हैं।)
