शनिवार, 11 अप्रैल 2026

आंबेडकर जयंती पर विशेष : बाबा साहब डॉ आंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माण के पथ प्रदर्शक

बसंत कुमार

14 अप्रैल 2026 को देशभर में भारत रत्न बाबा साहब डॉ आंबेडकर जी की 136वीं जयंती पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। बाबा साहब भारत की सांसदी इतिहास के इकलौते महापुरुष हैं जिनके 125 में जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा वर्ष  2015 में संसद का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया था और इस अधिवेशन में प्रधानमंत्री सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने देश के निर्माण में बाबा साहब के योगदान की चर्चा की थी। बाबा साहब के विषय में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण चालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा था कि जब हम विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्रियों की बात करते हैं तो उसे सूची में डॉ अंबेडकर को प्रमुखता से पाते हैं,जब हम प्रमुख कानून विद की बात करते हैं तो डॉक्टर अंबेडकर का नाम सामने आता है,जब हम देश के  संविधान निर्माण की बात करते हैं तोड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन के रूप में  डॉक्टर अंबेडकर की भूमिका प्रमुख रूप से नजर आती है। जब हम देश के वंचित समाज के उत्थान की बात करते हैं तो बाबा साहब आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, साहू जी महाराज आदि समाज सुधारको की श्रेणी में पाए जाते हैं।

मात्र 23 वर्ष की उम्र में डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और उसके पश्चात लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (डी एस सी) की उपाधि प्राप्त की। जिस उपाधि को प्राप्त करने में लोगों को 8 वर्ष का समय लग जाता है डॉक्टर अंबेडकर ने उसे उपाधि को मध्य ढाई वर्ष के परिश्रम से प्राप्त प्राप्त कर लिया था। उनकी शोध "प्रॉब्लम आप रूपी" ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया! उनकी आर्थिक शोधों और विचारों से प्रेरणा लेकर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों और वंचितों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए स्टार्टअप, स्टैंड अप इंडिया,मेक इन इंडिया, जनधन योजना आत्म निर्भर भारत जैसी योजनाओं को मूर्ति रूप दियाऔर आज भारत विश्व की पांचवी अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शीघ्र ही भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लेगा।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने ब्रिटिश काल में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डिप्रेस्ड क्लास के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की अपनी मांग मां वाली वे चाहते तो वंचित वर्ग के समुदाय के लिए एक अलग देश की मांग कर सकते थे पर वह दिल से पक्के राष्ट्रवादी थे और गांधी जी के साथ 1932 में पुणे पैक समझौते के माध्यम से वंचित समुदाय के लिए प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु आरक्षण का प्रावधान करवाया जिसके परिणाम स्वरूप वंचित समाज आज समाज के मुख्य धारा में सम्मिलित हो रहा है और संविधान निर्माण के समय उन्होंने आर्टिकल 3 40 को संविधान में सम्मिलित करवाया जो पिछले वर्गों की स्थित की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान करता है उन्होंने वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के सामने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की वकालत की थी और मंडल आयोग की सिफारिश के लिए एक मजबूत आधार दिया था इसलिए कोई क्या नहीं कर सकता की बाबा साहब अंबेडकर मात्र दलितों के नेता थे बल्कि उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के लिए भी मजबूत आधार दिया।

बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर की प्रतिभा का सम्मान करते हुए ब्रिटिश इंडिया काल में वायसराय काउंसिल के श्रम सदस्य (श्रम मंत्री) के रूप में उन्हें नियुक्त किया गया। वह इस पद पर 1946 42 से लेकर 1946 तक रहे और श्रमिकों का सुधार के लिए अनेक प्रावधान किया श्रमिकों कार्य की अवधि 12 घंटे से हटाकर 8 घंटे करवाई और काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का प्रावधान किया! देश की जल नीति के लिए 1942 में सेंट्रल वोल्टेज वॉटरवेज इरीगेशन और नेवीगेशन आयोग के चेयरमैन के रूप में सूखा मुक्त भारत की नींव रखी। नदियों को आपस में जोड़ने के उनके सुझाव का मध्य प्रदेश की केन और बेतवा नदी के को जोड़ने की परियोजना का वर्ष 2025 में उद्घाटन करके माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ आंबेडकर के सपनों को मूर्ति रूप देने का प्रयास किया।

देश के कानून मंत्री के रूप में डॉक्टर अंबेडकर ने 1931 में हिंदू कोड बिल पेश किया जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के सशक्तिकरण  के लिए पैतृक संपत्ति में उनका उत्तराधिकार था। पर जब कुछ रूढ़िवादी लोगों के कारण लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित न हो सका तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। भारत के इतिहास में डॉक्टर अंबेडकर इकलौते महापुरुष थे जिन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए अपना पद त्याग कर दिया दूसरे शब्दों में महिलाओं के अधिकार के लिए और उनकी शिक्षा के लिए ज्योति बा फुले और साबित्री बाई फूले के मिशन को आगे बढ़ाने का काम किया।

आज हमारा देश संप्रदायवाद की समस्या से जूझ रहा है देश में SIR की आलोचना हो रही हैऔर विपक्षी दलों ने इसको चुनावी मुद्दा बना दिया है जब कि मोदी सरकार अवैध घुसपैठ से देश को मुक्त करना चाहती हैं,पर 1940 की दशक मेंबाबा साहब की पुस्तक "पाकिस्तान एंड पार्टीशन आफ इंडिया" में लिखित बाबा साहब अंबेडकर की बात मान ली गई होती कि देश का  धार्मिक आधार विभाजन न होयदि यह विभाजन अवश्यंभावी ही है तो तो दोनों देशों में जनसंख्या का संपूर्ण स्थानांतरण अर्थात सारे हिंदू भारत में और सारे मुसलमान पाकिस्तान में चले गए होतेऔर यह हो जाता तो आज देश इस गंभीर स्थिति से नहीं गुजर रहा होता। इसके लिए देश के विभाजन की सूरत में जनसंख्या के स्थानांतरण के लिय एक विस्तृत योजना बना ली थी पर प नेहरूऔर जिन्ना ने इस पर अमल नहीं किया और 1947में दोनों ओर से भीषण नर संहार हुआ लेकिन विभाजन के पश्चातभी जो मुसलमान याअल्पसंख्यक भारत में रह गए उनके जीवनकी सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षण के लिए बाबा साहब ने संविधान में प्रावधान किए। जिसके कारण भारत को अपना देश मानने वाले मुसलमान व अल्प संख्यक सम्मान के साथ रह रहे हैं।

संविधान में विवादित अनुच्छेद 370 के पक्ष में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर नहीं थे संविधान निर्माता के रूप में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को डॉक्टर अंबेडकर के पास भेजो पर उनके डॉक्टर अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला को यह कह कर मना कर दिया कि आप चाहते हैं कि कश्मीर की रक्षा और देश की जनता की कल्याण का जिम्मा भारत उठाए और उन्हें विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए परंतु नेहरू जी ने डॉ आंबेडकर की असहमति को नजर अंदाज करते हुए इस विवादित अनुच्छेद को संविधान में जुड़वाया परंतु वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प के कारण यह विवादित अनुच्छेद संविधान से हटाया गया और आज कश्मीर देश का हिस्सा बना हुआ है और आज कश्मीर की क्रिकेट टीम रणजी ट्रॉफी चैंपियन है और कश्मीर के अनेक युवा सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होकर देश की मुख्य धारा में शामिल हो रहे है।

बाबा साहब के महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी 125वीं जयंती परवर्ष 2015में आयोजित संसद के विदेश विशेष अधिवेशन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कोई बात कहना चाहती है तो वह डॉक्टर अंबेडकर को कोट (उद्धरित)करती है और सरकार भी अपने समर्थन में कोई बात कहना चाहती है तो वह भी डॉ आंबेडकर की कहिए लिखी बातों को कोट करती है यानि डॉ आंबेडकर पक्ष विपक्ष दोनों को स्वीकार्य हैं और यही डॉ आंबेडकर की महानता और विद्वता का परिचायक है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

देश प्रमुख का सम्मान हम पाश्चात्य से क्यों नहीं सीखते

बसंत कुमार

वर्ष 2014 में एक किताब छपी थी जिसका टाइटल था मोदी नामा, यह पुस्तक मुगल काल में छपी पुस्तक बाबर नामा की तर्ज पर लिखी गई थी जिस प्रकार बाबर नामा में मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर की प्रशंसा की गई थी, उसी प्रकार मोदी नामा की लेखिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बड़ी तारीफ की थी और यहां तक की गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। परंतु कुछ दिन पूर्व उसी लेखिका ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी पर चरित्र हनन के अनेक आरोप लगाए। जबकि यह 2014 से पहले मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात के विकास में उनको कार्यों की बड़ी प्रशंसक रही है परंतु ऐसा क्या है कि मार्च 2026 से प्रधानमंत्री मोदी के चरित्र को लेकर सोशल मीडिया पर इतनी आक्रामक हो गई है।

इसके अतिरिक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता रहेपूर्व मंत्री व राज्यसभा सांसद डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र के बारे में अनाप समाप कहते रहते हैं। यही नहीं डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के बारे में ऐसी बातें कह देते हैं जिसके कल्पना नहीं की जा सकती हैजबकि अटल बिहारी वाजपाई के व्यक्तित्व की प्रशंसा भाजपा के लोग ही नहीं बल्कि विपक्ष में बैठे कांग्रेस के लोग भी करते हैं। अब प्रश्न यह उठना है की सोशल मीडिया पर इस समय देश के प्रधानमंत्री के चरित्र हनन की पुरजोर कोशिश की जा रही है परंतु न तो सरकार और न ही न्यायालय इस मामले में कोई सजान ले रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि देश का प्रधानमंत्री किसी पार्टी का प्रधानमंत्री नहीं है अपितु वह पूरे देश का प्रधानमंत्री है उनसे राजनीतिक विरोध हो सकता है हम उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं पर इस तरह से उनके चरित्र हनन की बात नही की जानी चाहिए।

कुछ वर्षों पूर्व मैंने पूर्व आईएएस अधिकारी और अटल जी की कैबिनेट में वित्त मंत्री का उत्तरदायित्व निभा चुके श्री यशवन्त सिन्हा का एक लेख पढ़ा था जो एक दैनिक में प्रकाशित हुआ था जिसमे उन्होंने लिखा था कि अमेरिका सहित अन्य

पश्चिमी देशों में कभी भी ऐसा नहीं होता कि वहां के लोग अपने देश के प्रधानमंत्रीया राष्ट्रपति कीइस तरह आलोचना करते हैं अपने इस लेख के सपोर्ट में उन्होंने दशकों पहले अमेरिका की इराक पर आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा था इराक द्वारा जैविक परमाणु हथियार रखने केआरोप के आधार पर अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन सरकार पर हमला किया पर वहां कुछ नहीं मिला, लेकिन किसी भी अमेरिकी ने उसे समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की आलोचना नहीं की। इसी प्रकार यूनाइटेड किंगडम में वहां की संसद में किसी सांसद ने महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक शब्द कहे थे तो उस सांसद को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी, पर आज हमारे देश में प नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरित्र हनन का फैशन सा चल पड़ा है।

राज गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में और 9 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में चर्चा आयोजित की गई है और सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक वंदे मातरम की याद में साल भर चलने वाले कार्यक्रम की घोषणा की। यह पूरे राज्य के लिए गौरव का विषय था क्योंकि वंदे मातरम सर्वप्रथम1886में कांग्रेस के अधिवेशन में गया गया, लेकिन भाजपा सही सभी पार्टियों ने इस राष्ट्रगीत को सदैव सम्मान दियाऔर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा संसद में विशेष चर्चा का आयोजन किया गया परंतु इस अवसर पर राज्यसभा सांसद निशिकांत दुबे विपक्ष पर आक्रमण करने में इतने उतावले थे कि इन्होंने इस अवसर पर भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बातें संसद मेंछेड़ दी,

माननीय सांसद यह भूल गए कि भारत के लोकतांत्रिक परंपरा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई के लिए एक दिन देश प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी की थी और वह भविष्य वाडी 4दशक बाद सत्य भी हुई और बांग्लादेश विजय पर अटल बिहारी वाजपेई ने इंदिरागांधी को दुर्गा की उपाधि दी थी और नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेई को जिनेवा में यूनाइटेड नेशन में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया था, इसलिए ऐसे पवित्र मौके पर जहां राष्ट्र की वंदे मातरमऔर बंकिम चंद्र चटर्जी को याद करने की बात हो रही थी वहां पर पंडित नेहरू या श्रीमती इंदिरा गांधी के चरित्र हनन की बात करना हमारे लोकतांत्रिक परंपरा के मर्यादा के अनुरूप नहीं है।

मधु किश्वर ने वर्ष 2014 में मोदी नामा पुस्तक लिखी और उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदीजी के कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा की यहां तक की गोधरा और अन्य घटनाओं पर उनका बचाव करती रही, ऐसा करते समय उनके मन में कोई न कोई महत्वाकांक्षा रही होगी और उसमें कोई बुराई भी नहीं थी क्योंकि लेखक भी इंसान होता हैऔर उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं और एक पुस्तक लिखने में उसे रात दिन एक करना पड़ता है। मैने भी एक राष्ट्रीय नेता के लिए राष्ट्रवादी कर्मयोगी और हिंदुत्व एक जीवन शैलीजैसी पुस्तके लिखी, जिसके लोकार्पण में भाजपा के शीर्ष पुरुष श्री लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथजी जैसे लोग आए। पर जब ये नेता मोदी सरकार में मंत्री बन गए तो मुझे दूध की मक्खी की तरह बाहर कर दिया गया हो, हो सकता है कि कुछ ऐसा भी मधु किश्वर जी के साथ हुआ हो उन्हें गुस्सा भी आया हो, पर इसके लिए उस नेता का इस तरह से चरित्र हनन करना मेरे विचार में बिल्कुल ही अनुचित है।

बेशक हम विश्व की सबसे बड़ी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के रूप में माने जाते रहे हैं, एक समय ऐसा भी आया जब 1975के आपातकाल के दौरान सभी विपक्ष नेता जेल में ठूंस दिए गए परन्तु तब भी पक्ष विपक्ष के नेताओं ने एक दूसरे के ऊपर अमर्यादित टिप्पणी नहीं कि। परंतु आज के समय में जिस तरह से नेताओं के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप और उनके चरित्र हनन की घटनाएं बढ़ रही है इन सबके लिए हमें अमेरिका सहित यूरोपीय देशों की परंपराओं को सिखना होगा जहां विरोध होते हुए भी अपने विरोधी नेताओं के ऊपर इस तरह के आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए जाते। हमारे यहां तो ऐसे लोग जो बड़े-बड़े उत्तरदायित्व के पदों का निर्वहन कर चुके हैं उनके द्वारा प्रधानमंत्री या अन्य पदों पर रह चुके व्यक्तियों के लिए चरित्र हनन जैसी चीज शुरू कर देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है इससे पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाई जा रही है। सोशल मीडिया पर बेरोक टोक चल रही इस तरह की पोस्ट पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 11वर्षों से देश में सरकार चला रहे हैं और इस कार्यकाल में उनकी सरकार की अनेक उपलब्धियां रही है और यह भी संभव है कि इतने लंबे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ अपेक्षाओं पर खरे न उतरे तो पर इन सब के लिए उनकी आलोचना यदि संसद के अंदर और बाहर हो तो वह स्वागत योग्य है परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के न पूरा होने के कारण डॉ सुब्रमण्यम स्वामी और मधु किश्वर जैसे लोगों द्वारा चरित्र हनन किया जाना न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री का अपमान है बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपमान है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

शिक्षा के नाम पर धंधा : कब तक चलेगी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी?

विकास खितौलिया

भारत में शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की रीढ़ माना गया है। “विद्या दान” को सबसे बड़ा दान कहा गया है, लेकिन आज के दौर में यही शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। खासकर महानगरों में प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी और फीस की बेतहाशा वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राजधानी दिल्ली में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है, जहां शिक्षा अब सेवा नहीं बल्कि मुनाफे का साधन बनती दिखाई दे रही है। हाल ही में कुछ न्यूज चैनलों ने खासकर जी न्यूज ने अपने कई कार्यक्रमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है और प्राइवेट स्कूलों की इस “कालाबाजारी” पर सवाल खड़े किए हैं। यह सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता का है जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाकर खर्च करने को मजबूर है। दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूल पिछले साल से फीस में भारी बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह बढ़ोतरी किसी एक या दो प्रतिशत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार 15% से 30% तक पहुंच जाती है। इससे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। समस्या सिर्फ फीस बढ़ने की नहीं है, बल्कि उसकी पारदर्शिता की भी है। स्कूल प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं करते कि आखिर किन आधारों पर फीस बढ़ाई जा रही है। कई मामलों में अभिभावकों को बिना किसी पूर्व सूचना के बढ़ी हुई फीस का नोटिस थमा दिया जाता है। अगर कोई विरोध करता है, तो बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।

फीस के अलावा स्पेशल एक्टिविटी, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भी खुली लूट चल रही है। कई प्राइवेट स्कूलों ने खास दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का नियम बना रखा है। इन दुकानों पर किताबों के दाम बाजार से कई गुना ज्यादा होते हैं। उदाहरण के तौर पर, जो किताबें  सामान्य बाजार में 2000 रुपये में मिल सकती हैं, वही स्कूल में उपस्थित दुकानों पर 7000-8000 रुपये में बेची जाती हैं। यही हाल यूनिफॉर्म का भी है। अन्य पब्लिशर द्वारा छपवाई गई किताबों में अक्सर प्रिंटिंग में बहुत सी त्रुटि भी पाई जाती है । यह एक तरह का “टाई-अप” होता है, जिसमें स्कूल और दुकानदार दोनों को फायदा होता है, लेकिन नुकसान सिर्फ अभिभावकों का होता है। स्कूल द्वारा जारी अनिवार्यता सर्कुलर के कारण मजबूरी में अभिभावकों को स्कूल में उपस्थित दुकानों से ही खरीदनी पड़ती है। स्पेशल एक्टिविटी की बात तो पूछो ही मत कोई बच्चा यदि स्पोर्ट्स एक्टिविटी में अच्छा है, सही मार्गदर्शन मिले तो देश, अपने माता-पिता का नाम रोशन तो करेगा ही साथ में स्कूल का नाम रोशन होता है। पर स्कूल इस कौशल, प्रतिभा को दरकिनार करते हुए स्पेशल एक्टिविटी के नाम 5000 से 10 हजार ले लेता है । अभिभावकों पर फीस, किताबों का आर्थिक बोझ तो पहले से ही होता है उसके बाद स्पेशल एक्टिविटी के नाम पर और फीस । इसलिए देश में लाखों बच्चे स्पोर्ट्स और अन्य एक्टिविटी से दूर हो जाते है और तो और देशभर में कई निजी स्कूलों द्वारा हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फंक्शन, कार्निवल, डांडिया डांस और अन्य अलग-अलग शुल्क के नाम पर हजारों रुपये वसूले किए जाते हैं, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। यह सवाल अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या प्राइवेट स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ एक व्यवसाय चला रहे हैं? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना, व्यक्तित्व निर्माण करना और समाज को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब मुनाफा प्राथमिकता बन जाता है, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। कई स्कूलों में एडमिशन के समय “डोनेशन” या “कैपिटेशन फीस” के नाम पर लाखों रुपये तक वसूले जाते हैं। यह पूरी तरह से अवैध होने के बावजूद खुलेआम चल रहा है। अभिभावक मजबूरी में इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है।

दिल्ली सरकार ने समय-समय पर प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने के लिए कई नियम बनाए हैं। लेकिन इन नियमों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाता। स्कूल प्रबंधन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी मनमानी जारी रखते हैं। फीस रेगुलेशन कमेटी जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी कार्यवाही अक्सर धीमी और सीमित होती है। जब तक कोई ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्कूलों पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसी वर्ष मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साकेत के एपीजे स्कूल ने फीस बढ़ोतरी के चलते कुछ बच्चों के बोर्ड परीक्षा के रोल नम्बर रोक दिए थे, जब यह नेशनल न्यूज बनी तो एग्जाम के एक दिन पूर्व रात्रि में बच्चों को रोल दिए थे । तो वहीं डीपीएस, सालवान आदि प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी के मामले उठ रहे है । शिक्षा क्षेत्र में दिल्ली की पिछली सरकार ने अच्छे कदम उठाए थे। कई वर्षों तक स्कूल अपनी मनमानी नहीं कर पाए थे । इस पूरे प्रकारण में सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों को झेलनी पड़ रही है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों को बच्चों की फीस भरने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसके अलावा, अगर कोई अभिभावक स्कूल के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं उसके बच्चे को नुकसान न उठाना पड़े। यह डर भी स्कूलों की मनमानी को बढ़ावा देता है।

इस पूरे मुद्दे को सामने लाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है। जब बड़े प्लेटफॉर्म इस विषय को उठाते हैं, तो सरकार और प्रशासन पर दबाव बनता है। हाल ही में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि शायद अब कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन सिर्फ खबर दिखाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को लगातार निगरानी और जन दबाव जरूरी है। वैसे इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं । पर सरकार की नीयत साफ हो । सरकार को फीस वृद्धि पर स्पष्ट और सख्त नियम बनाने होंगे और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। स्कूलों को अपनी आय और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में स्कूलों के एकाधिकार को खत्म करना होगा। स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए ताकि फैसलों में संतुलन बना रहे। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। इन्हीं विषयों पर पिछले साल दिल्ली सरकार एक बिल भी लाई थी, लोगों ने खूब मिटाई भी बाटी और खुशियां बनाई थी । बिल को ताक पर रखते हुए, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी चालू है। सरकार को इन प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कोर्ट में जाना चाहिए, और प्रमाणिता के साथ अभिभावकों का पक्ष रखे।

अंततः शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है, और अगर यही नींव कमजोर हो जाए या व्यापार का साधन बन जाए, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। यह सवाल आज हर अभिभावक के मन में है कि शिक्षा के नाम पर यह धंधा आखिर कब तक चलेगा? जब तक सरकार, समाज और अभिभावक मिलकर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक यह स्थिति बदलना मुश्किल है। शिक्षा को फिर से सेवा बनाना होगा, न कि मुनाफे का जरिया। तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

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स्कूलों में भाई भतीजा वाद समाप्त करने के लिय शिक्षा का राष्ट्रीयकरण आवश्यक

बसंत कुमार

सरकार द्वारा लाया गया यूजीसी एक्ट का विवाद यद्यपि न्यायालय में लंबित है और इसके सबजूडिस होने के कारण इस पर कोई तर्क वितर्क नहीं किया जाना चाहिए़। परंतु सोशल मीडिया में यूजीसी एक्ट की आड़ में आरक्षण सहित एससी एसटी एक्ट पर लोग मनमाने ढंग से अपने अपने विचार विशेषज्ञ के रूप में दे रहे हैं जो चीज भारत की संसद के द्वारा पारित की गई है उसपर अनभिज्ञ लोग अपनी राय बिना रोक-टोक के दे रहे हैं। प्राय यह कहा जाता है की विद्यालयों में 90% तक पाने वाले लोग बेरोजगार हैं और 40% अंक पाने वाले लोग उच्च पदों पर बैठे हुए हैं इसके पीछे लोग यह जानने का प्रयास नहीं करते कि देश में प्राइवेट स्कूलों के कारण धनाढ्य परिवारों से ताल्लुक रखने वाले छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में मानवाने अंक दिए जाते हैं जिसके कारण उनका अंक प्रतिशत गरीब वे वंचित समाज के बच्चों से बहुत ही ऊपर होता है इसके लिए यह जरूरी है कि देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण हो। जिससे शिक्षा में भाई भतीजा वाद समाप्त हो और सभी छात्रों को अपनी प्रतिभा साबित करने का अवसर समान रूप से मिले।

भारतीय संविधान का और यूजीसी एक्ट का विरोध करने वाले स्वामी आनंद स्वरूप जैसे लॉग डॉ आंबेडकर के बारे में कहते हैं कि स्कूल परीक्षा में 10वीं या 12वीं में कभी भी डॉक्टर अंबेडकर को 40% से ऊपर अंक प्राप्त नहीं हुए। पर आश्चर्यकी बात यह है कि 23 वर्ष की उम्र में ही डॉक्टर अंबेडकर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद लंदन स्कूल का इकोनॉमिक्स से डायरेक्टरेट आफ साइंस डीएससी की उपाधि प्राप्त की जिसे एक आम विद्यार्थी को पूरा करने में 8 वर्ष का समय लग जाता है जबकि डॉक्टर अंबेडकर ने यह उपाधि मात्र ढाई 3 साल के समय में पूरी कर लीऔर उनके शोधों ने भारत में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और फाइनेंस कमिशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस भारतीय स्कूल सिस्टम में डॉक्टर अंबेडकर जैसाप्रतिभा शाली विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी में रहा, वह विदेशी विश्वविद्यालय में पी एचडी और डी ससी जैसे उपाधियां प्राप्त करने में सफल कई हो गया। यूनिवर्सिटी में लिखी गई उनकी थीसिस आज भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है, कहने का तात्पर्य है कि डॉ आंबेडकर में प्रतिभा की कमी नहीं थी बल्कि उनको प्रतिभा को अपने में भारतीय शिक्षण संस्थाओं में द्रोणाचार्यो रवैया गलत था। डॉआंबेडकर जिस समाज से आते थे उसके लिए शिक्षकों का ऐसा ही पूर्वाग्रह था कि ऐसे समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% कैटेगरी के ऊपर के विद्यार्थी होही नहीं सकते। इसलिए पूरे समाज को इस पूर्वाग्रह को छोड़ना होगा की वंचित समाज से आने वाले विद्यार्थी 40% वाली कैटेगरी के होते हैं।

बात 1972 की है जब मैने कक्षा दसवीं की परीक्षा पास की और मेरा दाखिला अपने जिले के प्रतिष्ठित विद्यालय तिलकधारी सिंह क्षत्रिय इंटर कॉलेज जौनपुर में विज्ञान संकाय के छात्रों के रूप में हो गया हो गया। उस विद्यालय में 90%से अधिक शिक्षक क्षत्रिय समुदाय के थे, अपवाद के रूप में पिछड़े वर्ग गड़ेरिया समुदाय के एक शिक्षक फेरु राम पाल थेजो उस जमाने में गणित में पी एच डी थे और 11वी और 12वी कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थे, गणित में डॉक्टरेट होने के बावजूद उनका प्रमोशन डिग्री कॉलेज में नहीं हो पाया। वहां 12वीं की बोर्ड की परीक्षा में रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र व जीव विज्ञान के प्रश्न के पेपर सौ-सौ अंकों के होते थे इनमें से 80 अंक के लिखित परीक्षा के पेपर होते थे और 20-20 संख्या प्रैक्टिकल परीक्षा केलिए निर्धारित होते थे। जिसका कहने को तो परीक्षक बाहर आता था लेकिन वहां के स्थानीय शिक्षकों के मार्गदर्शन में सवर्ण व प्रतिष्ठित परिवारों से आए हुए छात्रों को बीस में से 17-18 से ऊपर ही अंक मिलते थे। मतलब यह है कि 500 अंक की परीक्षा में 60 अंकों में पुणे की प्रैक्टिकल परीक्षा में उन्हें इतनेअंक दे दिए जाते थे उनकी अच्छी खासी मेरिट हो जाती थी जबकि वहीं पर पिछड़े वर्गव वंचित समझाएं के छात्रों को प्रैक्टिकल परीक्षा में वह मुश्किल 10-12 अंक दिए जाते थे, इसका परिणाम यह होता था कि लिखित परीक्षा में वंचित समुदाय का विद्यार्थी कितना भी अच्छा कर ले फाइनल परीक्षा फल में वह काफी नीचे होताथा।

यूपीएससी सहित अन्य भर्ती आयोगों में उन परीक्षाओं में जहां साक्षात्कार परीक्षा के अंक परीक्षा के परिणाम का का हिस्सा होते हैं वहां पर सवर्ण और धनाढ्य परिवारों के बच्चों को अधिक नंबर मिलते हैं जिससे उनकी मेरिट काफी ऊपर चली जाती है जैसे सिविल सर्विस परीक्षा में साक्षात्कार परीक्षा 275 अंकों की होती है और लिखित परीक्षा 1750 अंकों में होती है इस तरह से फाइनल रिजल्ट 2025 में प्राप्त अंकों के आधार पर बनते है क्योंकि सवर्ण और धनाढ्य के बच्चे 275 अंकों साक्षात्कार परीक्षा में पिछड़े व वंचित समाज के बच्चों के मुकाबले अच्छे नंबर प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं क्योंकि इंटरव्यू परीक्षा में बैठे बोर्ड मेंबर्स के सामने परीक्षार्थी की पूरी फाइल उनके सामने होती है और ऐसे में जाति और रुतबे के असर से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए गरीब और वंचित समाज के बच्चे लिखित परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद फाइनल मेरिट में बहुत नीचे आ जाते है। प्राय या देखा गया है स्टाफ सिलेक्शन कमीशन की क्लर्क ग्रेड इग्जामिनेशन और अस्सिटेंट ग्रेड एग्जामिनेशन जिसमें इंटरव्यू नहीं होता उनमें जनरल ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातिऔर ईडब्लूएस के छात्रों की मेरिट में बहुत अंतर नहीं होता है। लेकिन जहां इंटरव्यू का प्रावधान होता है वहां पर मेरिट में बहुत बड़ा अंतर पाया जाता है इसका मतलब यह है कि आज भी साक्षात परीक्षाओं में उच्च जाति धनाढ्य का परिवार से होना बहुत अंतर लाता है।

जहां तक प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की बात है अधिकांश प्राइवेट शिक्षण संस्थान सवर्ण और धनाढ्य लोगों के द्वारा चलाए जाते है और प्रैक्टिकल परीक्षा में इंटरनल असेसमेंट के नाम पर बड़े परिवारों के छात्रों को अच्छे नंबर मिल जाते हैं और इसी के आधार पर यह नारेटिव गढ़लिया जाता है कि 90%वालों को नौकरी नहीं मिल रही और 40% वालों को आसानी से नौकरी मिल जा रही है क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में गरीब अमीर सवर्ण दलित सबको परफॉर्म करने के लिए एक स्तर का प्लेइंग ग्राउंड नहीं मिलता। इस विषय में मैं अपने कॉलेज मडियाहूं डिग्री कॉलेज का 1978का उदाहरण देना चाहता हूं-वहां आपातकाल के बाद छात्र संघ के चुनाव होने थे और प्रधानाचार्य ने यह घोषणा की की बीए प्रथम वर्ष में सर्वोच्च अंक लाने वाले तीन विद्यार्थियों को छात्र यूनियन की कमेटी में प्रतिनिधि प्रतिनिधि के रूप में रखा जाएगा। संभवतःप्रधानाचार्य को या उम्मीद रही होगी कि तीनों ही प्रतिनिधि सवर्ण समाज के होंगे पर क्योंकि वहां पर सिर्फ औरआर्ट्स फैकल्टी चलती थी इसलिएउसमें कोई प्रैक्टिकल परीक्षा नहीं थी और इस कारण 3 के तीनों प्रतिनिधि दलित वंचित और बैकवर्ड समाज से आगए, कहने का तात्पर्य है कि जब वहां पर साक्षात्कार परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था तो वहां पर पिछले वर्गों का 40% और सामानों का 90% पूर्वाग्रह फेल हो गया। और टॉपर विद्यार्थियों में एक भी सवर्ण नहीं मिला जिसे छात्र संघ में प्रतिनिधि के तौर पर रखा जा सकता।

इस समय पूरे हिंदू समाज में यह नारेटिव बड़े जोर शोर से चलाया जा रहा है कि 90% वाले बेकार बैठे हैं और 40% लोग लेकर लोग डॉक्टर बने हुए हैं और ऐसे डॉक्टर मरीज का कैसे इलाज करें ऐसा फैलाने वालों को शायद पता नहीं है कि किसी भी मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थियों को पास मार्क लाने के लिए 50% तक जाना पाना जरूरी होता है चाहे वह किसी भी जाति यां वर्ण के हो, इसीलिए कभी भी 40% और 90%वाली डॉक्टरों का भ्रम न फैलाए अपना आत्मा से पूछे जब कभी आप अस्पताल में बीमार होकर जाते हैं तो न तो डॉक्टर की जाति पूछते हैं और न खून देने वाले की जाति पूछते हैं फिर राजनीतिक स्वार्थ के लिय ऐसी अफवाहें फैलाकर डॉक्टरी पेशे को बदनाम क्यों करते हैं। आप जिस 90% के नम्बर की दुहाई देते हैं वह अपने दम पर नहीं अपने स्कूल में पैरवी पुत्र के रूप में पाई है इसलिए उस पर घमंड न करें जिस तरह से 90% और 40% के रूप में नारेटिव गढ़े जा रहे हैं और यह दलील दी जाती है कि 40% अंक प्राप्त करने वाला आरक्षित केटेगिरी वाला छात्र कभी अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता लेकिन वास्तविकता इसके उलट है, जो डा आंबेडकर भारत में स्कूल शिक्षा के दौरान लगातार 40%कैटेगरी वाले छात्र रहे वही विदेश में जाकर पी एच डी और डी एस सी डिग्रियां हसिल करने में कामयाब रहे, इसका अर्थ यह है कि दोष सवर्ण या वंचित समाज के विद्यार्थियों में है बल्कि सारा दोष यहां की शिक्षा व्यवस्था में है जो वर्ग विशेष के नियंत्रण में चल रही है, यदि सरकार आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना चाह रही है तो उसे स्कूल और कॉलेजों में वर्ण विशेष नियंत्रण को समाप्त करना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

हनुमान जन्मोत्सव पर रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सक्रिय भागीदारी

संवाददाता

नई दिल्ली। हनुमान जयंती के पावन अवसर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया। 

इस अवसर पर पार्टी के स्थानीय अध्यक्ष एवं समाजसेवी अधिवक्ता अनिल कुमार शुक्ला के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों, भंडारा एवं शोभायात्रा में शामिल होकर भगवान हनुमान जी के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया तथा क्षेत्र की सुख-समृद्धि एवं शांति के लिए प्रार्थना की गई।

अधिवक्ता अनिल कुमार शुक्ला ने कहा कि भगवान हनुमान जी हमें शक्ति, सेवा और समर्पण का संदेश देते हैं, जिसे अपनाकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी हमेशा सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेती रही है और आगे भी जनता के साथ इसी प्रकार जुड़ी रहेगी।

मंगलवार, 31 मार्च 2026

आखिर तरुण खटीक की मौत का जिम्मेदार कौन?

विकास खितौलिया 

किसी भी समाज की असली पहचान उसकी न्याय व्यवस्था, सामाजिक संतुलन और नागरिकों की सुरक्षा से होती है। जब किसी युवा की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह समाज और व्यवस्था दोनों की गंभीर विफलता का संकेत बन जाती है। यह केवल एक व्यक्ति या परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी होती है। दिल्ली के उत्तम नगर क्षेत्र में हुई तरुण खटीक की दर्दनाक मौत भी ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है “आखिर इस मौत का जिम्मेदार कौन है?” क्या यह सामाजिक असहिष्णुता का परिणाम है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर कहीं कोई चूक हुई? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि यह घटना कई परतों में उलझी हुई प्रतीत होती है। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि किसी भी प्रकार की हिंसा या व्यक्तिगत विवाद, चाहे वह धार्मिक हो, वैचारिक हो या सामाजिक हमेशा समाज के लिए घातक सिद्ध होता है। जब कोई विचारधारा अपने मूल मानवीय मूल्यों से हटकर हिंसा और नफरत का रूप ले लेती है, तो वह निर्दोष लोगों की जान तक ले सकती है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि यदि इस मामले में किसी प्रकार की हिंसक या आक्रामक प्रवृत्ति की भूमिका रही हो, तो यह न केवल कानून के लिए चुनौती है, बल्कि समाज के ताने-बाने के लिए भी खतरा है।

उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और पीड़ित पक्ष के बयानों के अनुसार, घटना की शुरुआत एक मामूली विवाद से हुई बताई जाती है। बताया जाता है कि होली के अवसर पर खेल-खेल में एक पानी का गुब्बारा फेंका गया, जिसकी कुछ पानी की छींटे एक महिला के कपड़ों पर गिरी। जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हो गई। पीड़ित परिवार द्वारा उस महिला से माफ़ी मांगने पर कुछ समय तक स्थिति शांत होने की बात भी सामने आती है। हालांकि, बाद में यह विवाद फिर से बढ़ गया। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि रात के समय कुछ लोगों ने कथित रूप से एकत्र होकर 26 वर्षीय तरुण खटीक पर हमला किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला गंभीर था, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई। इस पूरे घटनाक्रम की सत्यता और वास्तविक परिस्थितियों का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा किया जाना शेष है। यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि समाज में छोटे-छोटे विवाद भी कभी-कभी गंभीर रूप ले लेते हैं। समाज में कहीं न कहीं सहनशीलता की कमी, संवाद का अभाव और आक्रामकता की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसी परिस्थितियों को और अधिक जटिल बना देती है। 

आरोप है कि कुछ हिसंक कट्टर सोच रखने वाले लोगों ने इस विवाद को हिंसा में बदल दिया इसलिए किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह किसी भी कारण से उत्पन्न हुई हो, अंततः समाज के लिए हानिकारक ही सिद्ध होती है। जब किसी भी पक्ष में कट्टरता हावी हो जाती है, तो सामान्य घटनाएं भी असामान्य प्रतिक्रिया का कारण बन जाती हैं। कट्टरता व्यक्ति की सोच को सीमित कर देती है और उसे दूसरे की भावनाओं, परंपराओं और जीवन के अधिकार के प्रति असंवेदनशील बना देती है। यह कैसी मानसिकता है। यदि इस घटना में भी ऐसी मानसिकता का प्रभाव था, तो यह निश्चित रूप से एक चिंताजनक स्थिति है, जिस पर समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्या कारण है कि पचास वर्षों से रहे दो अलग अलग पक्षों के समुदाय में झगड़ा हो जाता है । हालांकि, किसी भी एक समुदाय या संस्था को समग्र रूप से दोषी ठहराना समस्या का समाधान नहीं है। हर समाज में कुछ असामाजिक तत्व होते हैं, जो अपने कृत्यों से पूरे समुदाय की छवि को प्रभावित करते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम इस घटना को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखें और यह समझें कि वास्तविक दोषी वे लोग हैं जिन्होंने हिंसा को अंजाम दिया, न कि पूरा समुदाय।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और प्रशासन का मूल कर्तव्य होता है । इस घटना में कानून-व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का मानना है और मीडिया रिपोर्ट्स में यह कहा गया है कि यदि समय पर प्रभावी हस्तक्षेप होता, तो संभवतः स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता था। क्योंकि धटना स्थल से पुलिस चौकी की दूरी मुश्किल से 500 मीटर की होगी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पुलिस और प्रशासन की भूमिका की समीक्षा तथ्यों के आधार पर ही की जानी चाहिए। इसके अलावा, कानून का डर खत्म होना भी एक बड़ी समस्या है। जब अपराधियों को यह महसूस होने लगता है कि वे बिना किसी सख्त सजा के बच सकते हैं, तो उनके हौसले बुलंद हो जाते हैं। इस प्रकार की घटनाएं यह भी दर्शाती हैं कि क्या हमारे समाज में आपसी संवाद और विवाद समाधान की क्षमता कमजोर हो रही है। पहले जहां छोटे विवाद आपसी समझ से सुलझ जाते थे, वहीं अब वे कभी-कभी हिंसक रूप ले लेते हैं। यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, जिस पर सामूहिक रूप से विचार करने की आवश्यकता है। 

न्याय तभी संभव है जब जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित हो। कानूनी प्रक्रिया फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाई जाए, जिससे दोषियों की पहचान कर उन्हें कानून के अनुसार सख्त सजा मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से क्यों न हों। किसी भी व्यक्ति की असमय मृत्यु खासकर युवा हो। परिवार को गंभीर आर्थिक और मानसिक संकट में डाल देती है। ऐसे मामलों में सरकार द्वारा आर्थिक सहायता (कम से कम एक करोड़) देना पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत हो सकती है। साथ ही, यदि जांच में प्रशासनिक स्तर पर कोई लापरवाही सामने आती है, तो उसके लिए भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, यही लोकतंत्र की नींव है।

तरुण खटीक की मृत्यु हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में शांति और सुरक्षा केवल कानून के बल पर नहीं, बल्कि आपसी समझ, सहिष्णुता और जिम्मेदारी से भी सुनिश्चित होती है। यह आवश्यक है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और संवेदनशीलता के साथ कानून-व्यवस्था को मजबूत किया जाए। इसलिए पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और सक्रिय बनाना होगा। शिकायतों को गंभीरता से लेना और समय पर कार्रवाई करना अनिवार्य होना चाहिए। अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि तरुण खटीक की मौत केवल एक कारण का परिणाम नहीं है, बल्कि यह कई कारकों का मिश्रण हो सकती है। 

व्यक्तिगत विवाद, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक असंतुलन। ये सभी मिलकर ऐसी दुखद घटनाओं को जन्म देते हैं। इसलिए, केवल एक पक्ष को दोषी ठहराने के बजाय, हमें पूरे सिस्टम की समीक्षा करनी होगी। यह समय है आत्ममंथन का प्रशासन के लिए भी और समाज के लिए भी। हम दोषारोपण से आगे बढ़कर समाधान की दिशा में सोचें ताकि आने वाले समय में किसी और परिवार को ऐसा दुख न सहना पड़े। तरुण खटीक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस घटना से सीख लेकर एक अधिक सुरक्षित, संतुलित और संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में प्रयास किए जाएं। तरुण खटीक की मौत एक सवाल है और इसका जवाब हमें मिलकर ढूंढना होगा।

नोट : यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स, स्थानीय स्रोतों और पीड़ित पक्ष के बयानों पर आधारित है। मामले की जांच जारी है, और अंतिम सत्य का निर्धारण संबंधित जांच एजेंसियों एवं न्यायालय द्वारा किया जाएगा।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं।)

9818270202

गुरुवार, 26 मार्च 2026

धर्म बदलने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और क्रिप्टो क्रिश्चियन

बसंत कुमार

अनुसूचित जनजाति के स्टेटस पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया और कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाला अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति अगर कोई अन्य धर्म अपनाता है तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाएगा जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अगुवाई वाले बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, इस आदेश में हाईकोर्ट ने यह कहा था कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और उसका प्रचार प्रचार करता है तो उसे अनुसूचित जाति का नहीं माना जा सकता, और उल्लेख किया संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 इस बात को स्पष्ट करता है की 1950 के अधिनियम की धारा 3 में बताए गया है कि कुछ धर्म हिंदू, बौद्ध सिक्ख के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करने पर उसका अनुसूचित अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि देश में लाखों की संख्या में रहने वाले क्रिप्टो क्रिश्चियन का क्या होगा गौरतला है कि भारत क्रिप्टो क्रिश्चियन वे लोग हैं जो ईसाई धर्म तो अपना लेते हैं पर अनुसूचित जाति के मिलने वाले लाभों को प्राप्त करने के लिए इस बात का खुलासा नहीं करते की उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है।

हम आगे देश में जाति से जुड़ा सवाल बहुत ही टेढ़ा है सामाजिक स्तर पर हमेशा से यह बहस का विषय रहा है कि क्या धर्म बदलने से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है ऐसे मामले सामने आते रहते हैं कि दलित समुदाय के लोगों को अपना धर्म बदलकर दूसरा धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ा है पिछले साल मार्च में तमिलनाडु के ईसाई परिवारों, जो पहले दलित थे, ने आरोप लगाया था कि उनके साथ समान व्यवहार नहीं हो रहा है यहां तक की कब्रिस्तान में उनके लोगो को शवों को दफनाने के लिए अलग जगह दी जाती है कहने का अभिप्राय यह है कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी उन्हें उसी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है जो हिंदू धर्म में दलित के रूप में उनके साथ होता था राजनीतिक नजरिया की बात करें तो इस फैसले के बाद धन परिवर्तन और आरक्षण से जुड़ी बहस और जोर पकड़ सकती है सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर तौर पर संविधान को ध्यान में रखकर यह फैसला दिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि कुछ मामले ऐसे होते हैं जहां कानून और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क होता है भारत में जाति एक वास्तविकता है जिसे नहीं बदला जा सकता लेकिन इसकी जुड़ी हुई बुराइयों को खत्म करने की कोशिश की जानी चाहिए।

सर्वप्रथम ईसाई और मुस्लिम धर्म में धन्मांतरण करने वाले हिंदू अनुसूचित जातियों के लोगों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए यूपीए के अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के चेहरे पर 2004 ने किया गया। वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में राष्ट्रीय एवं भाषा ए अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ जिसके अध्यक्ष जस्टिस रंगनाथ मिश्र बनाए गए इस आयोग के माध्यम सेधर्मांतरित ईसाइयों एवं मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक और अन्य स्थितियों का अध्ययन कराया गया। उसे समय के अनुसूचित अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष सरदार बूटा सिंह ने उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने की अनुशंसा कर दलितों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया, जबकि सरदार बूटा सिंह स्वयं अनुसूचित जाति के बहुत बड़े नेता थे और राजीव गांधी की सरकार में गृह मंत्री भी थे। शायद वह राजनीति के मुख्यधारा में लौटने की अपनी प्रबल इच्छा के चलते उन्हें सोनिया गांधी के दबाव में यह निर्णय देना पड़ा। और उन्होंने आयोग के अध्यक्ष के रूप में धर्मांतरण करने वाले ईसाइयों और मुसलमान को अनुसूचित जाति में शामिल करने की अनुशंसा कर दी जिसको सरकार ने मानना ही था। परंतु आयोग की तत्कालीन सचिव श्रुति श्रीमती आता दास आशा ने कमीशन की ओर से डीसेंट नोट भेज कर हर एक बिंदुओं के साथ स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कीमत पर धर्मांतरित ईसाइयों एवं धर्मांतरित मुसलमानों को अनुसूचित जाति की शामिल सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। इस संबंध में यह बताना आवश्यक है कि वर्ष 2004 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा था कि धर्मांतरित ईसाइयों एवंधर्मांतरित मुसलमानो को अनुसूचित जाति में शामिल करने का पक्ष क्या है यूपीए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में जाकर यह कह दिया था कि सरकार को कोई आपत्ति नहीं है सरकार के इसी जवाब पर उच्चतम न्यायालय ने कार्यवाही आगे बढ़ाई और रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन हुआ।

वास्तव में यूपी सरकार द्वारा धर्म मंत्री किसने और मुसलमान को अनुसूचित जाति में शामिल करने के पीछे धन्वंतरण के अलावा की अन्य उद्देश्यनही था। यदि इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया जाता तो करोड़ दलित वर्ग के लोग ईसाई मिशनरियों की प्रलोभन में फंस कर ईसाई बन जाते। वर्तमान समय में धर्मांतरण करने के पश्चात हम झूठित वर्ग के रूप में मिलने वाला लाभ समाप्त हो जाता है कांग्रेस के इस खड्यंत्र को असफल बनाने में स्वर्गीय अशोक सिंघल श्रीमती आशा दास और तत्कालीन भाजपा के अंजूषित मोर्चे के अध्यक्ष व पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ को भी का बहुत बड़ा हाथ रहा। इन सब के पीछे बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का विराज चिंता नहीं मूलाधार था जिसका वह पूना पैक्ट के समय से जीवन पर्यंत मूर्त रूप देने का प्रयास करते रहे वे कभी भी नहीं चाहते थे की अनुसूचित जाति के लोग चाहे सदियों तक मनुवादी विचारधारा के कारण अपेक्षा और शोषण का शिकार होते रहे पर हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति से अलग नहीं होना चाहिए।

सन 1947 में जब देश आजाद हुआ और संविधान निर्माण का उत्तरदायित्व डॉ अंबेडकर को सौपा गया तो उस समय दलितों का अधिकार छीनने की ताक में बैठी अनेक शक्तियों सक्रिय हो गई और ऐसे में बाबा साहब अंबेडकर की असली परीक्षा प्रारंभ हुई, उन्हें संविधान निर्माण के मुश्किल कार्य के साथ-साथ अनुसूचित जातियों का आरक्षण के पक्ष और विपक्ष के प्रश्नों का सामना करना एवं उत्तर देना था। धर्मांतरितमुसलमानो और ईसाइयों की तरफ से सैकड़ो प्रश्नों का सामना करते हुए अनेक अनर्गल तर्कों का उन्होंने मुंह तोड़ जवाब दिया। डॉ अंबेडकर ने धर्मांतरित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग को बड़ी कठोरता के साथ अस्वीकार कर दिया धर्मांतरित ईसाइयों और मुसलमानो को अनुसूचित सूची में डालने के पीछे डॉक्टर अंबेडकर के विचारों को जानकर उनके दलित समाज के उत्थान की प्रतिबद्धता एवं देश के प्रति उत्तरदायित्व के सम्मान की प्रतिबद्धता दिखाई देती है उनका मानना था कि यह लंबे समय से ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित मांग है के पीछे धर्मांतरण को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं था डॉक्टर अंबेडकर का मानना था कि अनुसूचित वर्ग में अपने धार्मिक आस्था को प्रलोभन में न बदले इसी कारण हिंदू का समाज में कुरीतियों की तंग आकर जब उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने का फैसला किया तो उन्हें ईसाई या मुस्लिम बनने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन मिले पर उन्होंने इसे स्वीकार कर दिया उन्होंने स्पष्ट किया कि ईसाई या इस्लाम का भाईचारा केवल उनके मानने वालों तक ही सीमित है गैर-मुस्लिम या गैर-ईसाई के साथ उनके भाईचारे का प्रश्न बहुत ही सीमित था।

कुछ रूढ़िवादी हिंदू सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश में एक कमी यह निकाल रहे हैं कि जो हिंदू बौद्ध धर्म को अपना चुके हैं उन्हें अनुसूचित जाति के मिलने वाले आरक्षण से वंचित क्यों नहीं किया जा रहा है। इस विषय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने अपनी पुस्तक "बाबा साहब व्यक्तित्व और विचार"में कहते हैं कि वास्तव में डॉक्टर अंबेडकर एक सुधारवादी हिंदू थे। इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया जो भारत में पल्लवित और पुष्पित हुआ। हिंदू धर्म छोड़ने से पहले उन्होंने खुले मंच कहा था "हिंदूधर्म के ठेकेदारों सुधर जाओ नहीं तो हम लाखों दलितों के साथ हिंदू धर्म का त्याग कर देंगे'!, अपनी मृत्यु के मंत्र एक माह 23 दिन पूर्व उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाते हुए यह तक दिया कि हमने कमरा बदला है मकान नहीं बदला है अर्थात उन्होंने वही धर्म अपनाया जिसके मूल में हिंदू संस्कृति बसती है डॉक्टर अंबेडकर ने यह स्पष्ट कर दिया कि ईसाइयत या इस्लाम के छलावे में न आए। दलित समाज को यदि हिंदू धर्म छोड़ना ही है तो बौद्ध धर्म को अपने। इसके अतिरिक्त एक और विभाग समस्या क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर है जो ईसाई मिशनरियों के प्रलोभन में आकर ईसाई तो बन गए हैं पर वे अनुसूचित जाति के रूप में मिलने वाले सुविधाओं को न छोड़ने के कारण, ईसाई धर्म अपनाने की बात को सार्वजनिक नहीं करते ऐसे लोगों को ईसाई मिशनरियों के छुपे हुए मनसूबों को समझा कर उन्हें हिंदू धर्म में सम्मान के साथ वापस लाने के प्रयास किए जाने चाहिए।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2004 से प्रारंभ हुई इस विवादित विषय का अपने फैसले द्वारा पटाक्षेप कर दिया है और यह सुनिश्चित कर दिया है की अनुसूचित जाति का कोई भी व्यक्ति धर्मांतरण कर लेता है तो धर्मांतरण करने के बाद अनुसूचित जाति को मिलने वाले लाभ का भागीदार नहीं होगा पर वही हिंदू धर्म के सामाजिक संगठनो और धार्मिक नेताओं को यह सोचना होगा किआखिर क्या कारण है की भारी संख्या में अनुसूचितजाति(दलित) लोग हिंदू धर्म छोड़ने पर विवश क्यों हो रहे हैं जिसके कारण हिंदुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है और जो लोग हिंदू धर्म छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं उनके घर वापसी का प्रयास किया जा रहा है जबकि होना यह चाहिए था की ऐसी परिस्थितिया न बने की लोग अपना धर्म छोड़कर किसी और धर्म की ओर जाए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

सीवर सफाई के दौरान कब तक मरते रहेंगे सफाई कर्मी

बसंत कुमार

देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान सफाई कर्मियों की मौत को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है राज्यसभा में दिए गए एक सरकारी जवाब के अनुसार वर्ष 2021 से वर्ष 2025 के सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई करते समय कुल 315 सफाई कर्मियों की मौत हुई परंतु यह संख्या सिर्फ सरकारी आंकड़ों में दर्ज है और कितनी मौतें ऐसी हुई है जिनके बारे में सरकार को पता ही नहीं है। आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 53 मौतें दर्ज हुई जबकि दिल्ली में यह संख्या 26 से अधिक रही इसके अतिरिक्त हरियाणा में 43 तमिलनाडु में 38 उत्तर प्रदेश में 35, गुजरात में 25 और राजस्थान में 24 सफाई कर्मियों की सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मौत हो गई।

यह बात भी सामने आई है कि कुल मौतों का सिर्फ 70% ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो पाता है, इन मामलों में हो रही मौतों की संख्या कही अधिक है, अब प्रश्न उठता है सरकार हर क्षेत्र में तकनीकी विकास की बात करती है रोबोट के माध्यम से बड़े-बड़े मेडिकल ऑपरेशन हो रहे हैं पर सीवर की सफाई और सेफ्टी टैंको की सफाई के दौरान मरने वाले सफाई कर्मियों की मौत पर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है।

देश में हर दो-तीन दिन में कहीं न कहीं से सीवर की सफाई करने गए सफाई कर्मियों की मौत की खबरें आती रहतीहै,

इसको लेकर संसद के अंदर कई बार सवाल उठाते रहे हैं पर सरकार इसके लिए भी कदम नहीं उठा रही है और 21वीं सदी के भारत में आज भी सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई का काम मैन्युअली ही हो रहा है जिसके परिणाम स्वरूप इसका में इस काम में लगे मजदूरों की मृत्यु का समाचार आता रहता है। यद्यपि विदेशों में यह काम मशीनों से हो रहा है पर हमारे यहां सफाई कर्मी तौर सफाई करते समय सीवर या सेप्टिक टैंकों के मैंने होल में नीचे उतरते हैं और कई बार उसमें फंस जाने या गैस द्वारा दम घुटने से उनकी मौत हो जाती है इसे लेकर लंबे समय से आवाज उठाई जा रही है, हैरानगी की बात यह है कि हमारे देश में सीवर और सीवर सिस्टम अभी भी पूरी तरह से पुराने तौर तरीकों से चल रहा है न्यायालय के आदेशों के बावजूद इसका मशीनीकरण और ऑटोमेशन नहीं हो पा रहा हैं सुप्रीम कोर्ट औरअन्य अदालतें सीवर की मैन्युअल यानी मानव आधारित सफाई को गैरकानूनी ठहरा चुके हैं।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में सीवर डेथ के मामले में एक बड़ा फैसला लिया उसने कहा कि अब सीवर की सफाई के दौरान किसी सफाई कर्मी की मृत्यु हो जाती है या दिव्यांग हो जाता है तो उनके आश्रितों को 30 लाख रुपए का मुआवजा देना पड़ेगा इससे पूर्व वर्ष 2014 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सी वर डेथ के मामले में मृतकों को के परिवारों को 10 लख रुपए मुआवजा देने का आदेश पारित किया था पर दुर्भाग्य वश इस आदेश का पालन केवल आधे मामलों में ही किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि हाथ से मैला ढोने ने की प्रथा पूरी तरह से समाप्त होनी चाहिए और भारत में इंसान द्वारा नालो और सेप्टिक टैंकों की सफाई एक बहुत बड़ी समस्या है। इससे निजात पाना आवश्यक है।

भारत में 70% सीवेज लाइन की सफाई आमतौर पर होती ही नहीं। वर्ष 2015 में एक सर्वे से पता लगा कि 2015 तक हमारे देश में 810 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट थे लेकिन इनमें से मात्र 522 की चालू हालत में थी बाकी सब बंद पड़े थे देश के सीवेज प्लांट्स की में हर तरह की गंदगी गिरती है इसमें सूखा गीला प्लास्टिक और मलवा सभी कुछ होता है जिससे जानलेवा जहरीली गैस बनने लगती है और जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर या सेप्टिक टैंक में सफाई के लिए घुसता है तो दम घुटने की स्थिति बन जाती है अब समय आ गया है कि इसे मशीनों से लैस किया जाए भारत में कुछ वर्ष पहले सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्म विभूषण डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने बाहर से आयात करके दिल्ली में एक सीवेज क्लीनिक मशीन पेश की थी जिसकी कीमत 43 लाख रुपए थी पर सरकार के उदासीन रवैये के कारण ऐसी मशीन है और नहीं आ पाई।

अमेरिका में सीवर की सफाई के लिए मशीन और उपकरणों का समुचित ढांचा है सीवेज टनल्स को हमेशा मशीनों के जरिए धोया और साफ किया जाता है, सीवर की सफाई में मानव का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है, यूरोप में भी यही सिस्टम लागू है वहां सीवर की सफाई पूरी तरह नई तकनीक पर आधारित मशीनों के जरिए होती है और नई तकनीक से इस प्रक्रिया को और भी बेहतर बनाया जा रहा है यूरोप और अमेरिका की बात तो छोड़ दें एशियाई देश मलेशिया जो वर्ष 1957 में आजाद हुआऔर उसके बाद से उन्होंने अपनी सीवर सफाई की व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू किया पहले वहां भी सीवर की सफाई का काम आदमी करते थे लेकिन धीरे-धीरे इसे मशीन और फिर चरणबद्ध ऑटोमेटेड सिस्टम में रिप्लेस कर दिया गया अब यहां सीवर से जुड़ी सफाई का पूरा काम मशीनों से ही किया जाता है वहां की सरकार ने सीवर कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को सब्सिडाइज किया है और सरकार द्वारा सेप्टिक टैंक की सफाई रखने के लिए अवेयरनेस कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं पर दुर्भाग्य बस हमारे देश में इस बात पर कोई जोर नहीं दिया जा रहा है।

कैसी विडम्बना है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवनी कोजन जन तक पहुंचाने वाले रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के वंशज आज के आधुनिक युग में भी सीवर की सफाई के दौरान हजारों की संख्या में मर रहे हैं इनके लिए बस दो ही चीजों पर विशेष अधिकार प्राप्त है। एक तो यह कि रामायण के रचयिता महर्षि बाल्मीकि जयंती का को मनाने का विकसित अधिकार इस विषय में आर एस एस के सर संघ चालक मोहन भागवत यह बात कह चुके है कि बाल्मीकि जयंती पूरा हिंदू समझ क्यों नहीं मनाता और दूसरा सफाई कर्मियों के रूप में होने वाली रिक्तियों में शत प्रतिशत आरक्षण, क्योंकि भारतीय समाज में आज भी लोगों में यह भावना व्याप्त है कि सरकारी दफ्तरों और प्राइवेट जगहों पर सफाई का काम सिर्फ वाल्मीकि परिवारों में पैदा होने वाले बच्चे ही करेंगे और होता भी यही है कि जो बच्चा इन परिवारों में पैदा होता है उसे अपने बाप की जगह सफाई कर्मी नौकरी पर रख लिया जाता है, इस विषय में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में सफाई कर्मियों की सेवाओं का एक कैडर बनाकरनियमित भर्ती की जिसमें सभी जातियां के लोग शामिल हुए और उन्होंने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया है कि सफाई कर्मी का काम सिर्फ वाल्मीकि समुदाय के लोग ही नहीं करेंगे।

टॉयलेट मैन के नाम से मशहूर पद्म विभूषण डॉ बिंदेश्वर पाठक ने देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के प्रेरणा स्रोत बने, यदि डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक थोड़े दिन और जिंदा रहते तो सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली महतो को रोकने के लिए कोई न कोई कदम अवश्य उठाते, अपनी मृत्यु से चंद मिनटों पहले 15 अगस्त 2023 के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह वादा किया था पर अकाल मृत्यु के कारण यह वादा पूरा न कर पाए डॉ बिंदेश्वर पाठक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सरकार सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को रोक लगाने के लिए कदम उठाए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 19 मार्च 2026

संवैधानिक मर्यादा का खुलेआम अतिक्रमण

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रशासन का अपने राज्य में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुआ व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य और डर पैदा करने वाला है। ममता बनर्जी ने कहा कि राष्ट्रपति भाजपा के एजेंडा में फंस गईं हैं। भाजपा उनसे अपना एजेंडा पूरा करवा रही है। ममता बनर्जी इसके राज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग केंद्रीय एजेंसियां और यहां तक की कई बार न्यायपालिका को भी इसी भाषा में आरोपित कर चुकी हैं। अभी तक राष्ट्रपति का पद उनके अपमान और दुर्व्यवहार से बचा हुआ था। राष्ट्रपति को आरोपित करना वास्तव में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है। आखिर हमारी राजनीति कहां पहुंच गई है जहां नेता यह भी नहीं समझ रहे कि किसी प्रतिस्पर्धी पार्टी या चुनाव के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं इसका कितना भयानक असर हो सकता है। राष्ट्रपति के पद को स्तरहीन दलीय राजनीति से बाहर रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि आप 50 बार आयें तो सभी कार्यक्रमों में उपस्थित होना संभव नहीं होगा। भाजपा की चिंता सत्ता होती है और मेरी चिंता मेरे राज्य की जनता होती है। यानी वह कह रहीं हैं कि आप भाजपा का एजेंडा पूरा करने के लिए बार-बार पश्चिम बंगाल आतीं हैं और उम्मीद करती हैं कि मैं आपके स्वागत के लिए रहूं तो ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बंगाल यात्रा के दौरान ममता बनर्जी एसआईआर को लेकर धरने में शामिल थीं। क्या ममता बनर्जी की इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य लोकतांत्रिक मर्यादा और संविधान की भावनाओं के अनुरूप भी माना जा सकता है?

राष्ट्रपति मुर्मू पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करने गईं थीं। 9वां अंतरराष्ट्रीय संथाल फिल्म महोत्सव व कॉन्फ्रेंस बागडोगरा हवाई अड्डा के पास सिलीगुड़ी महकमा परिषद के गोंसाईपुर में आयोजित किया गया। दरअसल, कार्यक्रम विधाननगर में आयोजित होना था लेकिन पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था एवं अन्य कारणों का हवाला देते हुए इसे स्थानांतरित कर दिया। कार्यक्रम के लिए प्राप्त स्थान तक पहुंचना कठिन था और इतना छोटा था कि ज्यादा लोग शामिल नहीं हो सकते थे। स्वाभाविक था कि राष्ट्रपति विधान नगर भी गईं, संथाल भाई-बहन वहां भी थे। वहां उन्हें अपना असंतोष प्रकट करने तथा सच्चाई अभिव्यक्त करने को बाध्य होना पड़ा। वस्तुत: बंगाल की धरती पर उतरने के समय से ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति की अवहेलना और अपमान की शुरुआत हो गई। हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल के अनुसार कोई उपस्थित नहीं था। सामान्य प्रोटोकॉल और परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए राज्यपाल रहते हैं , सामान्य तौर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री या अगर किसी कारणवश वह नहीं आ सकीं तो उनकी जगह कोई मंत्री रहते हैं। इसके साथ प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव भी उपस्थित रहते हैं। वहां कोई नहीं था । सिलीगुड़ी के मेयर ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय जनजाति मामलों के राज्यमंत्री दुर्गादास उइके इसलिए थे क्योंकि कार्यक्रम जनजाति समुदाय का था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह ऐसी पहली घटना है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई राज्य सरकार राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की अनुमति न दे , उनकी पूरी तरह अवहेलना करें और असंतोष व्यक्त करने पर प्रतिक्रिया ऐसी दे जैसे अपने किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धी से टकरा रही है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शांत स्वभाव की मानी जाती है और कभी भी अशांत या गुस्सैल प्रतिक्रिया देते देखा नहीं गया। द्रौपदी मुर्मू ने यही कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई समस्या नहीं है कि कोई रिसीव करने आए या ना आए किंतु राष्ट्रपति पद के प्रोटोकॉल का पालन होना चाहिए। राष्ट्रपति देश के संवैधानिक अभिभावक होते हैं। सभी का उस पद की गरिमा और स्थापित परंपरा के अनुरूप सम्मान देना है। दूसरी और राष्ट्रपति का भी दायित्व है कि परंपरा गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आगाह करें।  उन्हें सार्वजनिक रूप से ऐसा बोलने को विवश होना पड़ा तो निश्चित रूप से स्थिति अस्वीकार्य थी। क्या राष्ट्रपति  मौन रहकर इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करने की भूमिका निभातीं? आज एक राज्य में ऐसा हुआ कल दूसरे में होगा और जो एक राष्ट्रपति के साथ हो रहा है वह दूसरे के साथ भी हो सकता है। इसलिए राष्ट्रपति के नाते इस विषय को पूरी गंभीरता से सामने रखना उनका दायित्व है।

 अगर उन्हें इसकी जानकारी मिली कि यहां कार्यक्रम में  संथाल जनजाति के लोग इसलिए नहीं नहीं आ पाए क्योंकि कार्यक्रम पहले दूसरी जगह निर्धारित था तो प्रशासन के सहयोग की पूरी जानकारी मिलने के बाद उनके वहां जाना भी स्वाभाविक था।  क्या ममता मानती हैं कि उन्हें चुपचाप वापस आ जाना चाहिए था? उन्होंने यही कहा कि यह बड़ा मैदान था और मुझे जब मालूम हुआ कि आप लोग यहां हैं तो मैं सोची कि मुझे जाकर आपसे मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों किया गया क्योंकि यह मैदान दिया जाता तो सब लोग आ जाते।  राष्ट्रपति द्वारा इस तरह अपनी भावना व्यक्त करने को भी मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी को गंभीरता से लेना चाहिए था। उन्हें शांत और संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपने पद की भी गरिमा प्रदर्शित करनी थी। इसकी जगह वह राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा कर रहीं हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सम्मेलन के बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं थी, उसकी फंडिंग के बारे में , आयोजकों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। राष्ट्रपति के किसी प्रदेश में दौरा की सूचना राज्य सरकार के पास पहले जाती है।  उसमें उनके सारे कार्यक्रम वर्णित होते हैं। राष्ट्रपति भवन के अधिकारी प्रदेश सरकार के साथ संपर्क में रहते हैं और लगातार बातचीत होती रहती है। उसके अनुसार उनका प्रोटोकॉल , कार्यक्रम में सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाएं होती हैं?  क्या ममता बनर्जी के प्रशासन ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के बारे में उनको जानकारी ही नहीं दी? अगर ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए । किंतु ममता बनर्जी के व्यवहार से ऐसा लगता नहीं कि उन्हें कुछ पता नहीं था।‌ पश्चिम बंगाल की मीडिया ने राष्ट्रपति की यात्रा और कार्यक्रम के बारे में पूर्व समाचार दिया था। सब कुछ सामने होते हुए इस तरह का व्यवहार और वक्तव्य साबित करता है कि ममता बनर्जी की हनक के समक्ष भारत देश के शीर्ष पद का भी कोई सम्मान नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे शर्मनाक और ममता सरकार द्वारा सारी हदें पार करने घटना बताना बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री या ऐसे शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी मर्यादाएं सामने रहती हैं अन्यथा इसकी निंदा और विरोध के लिए कोई भी शब्द छोटे हैं। जनजाति समाज का कार्यक्रम और राष्ट्रपति की उपस्थिति के साथ जब ऐसा दर्दनाक व्यवहार है तो फिर सामान्य संगठन और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के साथ प्रशासन का कैसा व्यवहार होता होगा इसकी कल्पना करिए। पश्चिम बंगाल में जनजाति समुदाय की बड़ी संख्या है और उनकी परंपराओं ने केवल राज्य नहीं , भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं राष्ट्रपति जनजाति समुदाय से आती हैं। ममता बनर्जी स्वयं को आदिवासी समाज के लिए संघर्ष करने वाली और उनका हितैषी घोषित करतीं हैं। इस घटना के बाद क्या यह बताने की आवश्यकता है कि जनजाति समुदाय के प्रति उनके अंदर वाकई संवेदनशीलता और सम्मान है? वास्तविकता का साक्षात प्रमाण सामने है। विडंबना देखिए, सभी‌ भाजपा विरोधी दल इस पर मौन हैं। इन दलों का व्यवहार हतप्रभ करने वाला है। राष्ट्रपति कह रही हैं कि ऐसी स्थिति पैदा की गई ताकि कार्यक्रम न हो और उन्हें वापस पड़े। देश के सभी विवेकशील लोगों को विचार करना पड़ेगा कि क्या सत्ता की राजनीति इस सीमा तक चली जाएगी जहां प्रशासन द्वारा राष्ट्रपति के कार्यक्रम की व्यवस्था करने की जगह उसे हर स्तर पर विफल कर देने का व्यवहार हो? अगर आपका उत्तर नहीं है तो यह विचार करिए ऐसे व्यवहार का प्रतिकार कैसे हो ताकि आगे कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। ऐसा नहीं हुआ तो देश इस तरह की भयानक अराजकता में फंसेगा जहां किसी पद या विधान की मर्यादा नहीं बचेगी। ममता बनर्जी के कार्यकाल में तृणमूल सरकार ने बंगाल को ऐसे राज्य में बदल दिया है जहां कानून, संविधान, चुनाव, संवैधानिक संस्थायें सब कुछ दांव पर लग चुका है।

 अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 ,मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 17 मार्च 2026

श्री संतोषी माता मंदिर, हरि नगर में 108वां नवरात्रि मेला 19 से 27 मार्च तक

संवाददाता

नई दिल्ली। धर्मनगरी हरि नगर, जेल रोड, नई दिल्ली-110058 स्थित सिद्धपीठ श्री संतोषी माता मंदिर में इस वर्ष भव्य 108वां नवरात्रि मेला श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के साथ 19 मार्च 2026 से 27 मार्च 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। मंदिर परिसर इन पावन दिनों में भक्ति, साधना और सेवा का अद्‌भुत संगम बन जाता है। माँ संतोषी की असीम कृपा से आयोजित यह नवरात्रि महोत्सव वर्षों से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर में विराजमान माँ संतोषी की दिव्य प्रतिमा, भव्य सजावट, फूलों और विद्युत रोशनी से जगमगाता मंदिर तथा भजन-कीर्तन की गूंज श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देती है। नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन लगभग 15000 हजार श्र‌द्धालु माँ के दरबार में दर्शन करने पहुँचते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। नवरात्रि मेले के दौरान मंदिर परिसर में विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। तथा प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक संकीर्तन, तथा रात्रि में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता है। भक्तों की सेवा के लिए प्रतिदिन दोपहर 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक विशाल भंडारे की व्यवस्था भी है।

मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के सान्निध्य में आयोजित यह महोत्सव भक्तों को भक्ति, संतोष और शांति का संदेश देता है। उनके अनुसार माँ संतोषी कलियुग मंदिर के संरक्षक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरु श्री अमित सक्सेना जी के अनुसार, माँ संतोषी कलियुग की तारिणी स्वरूपा हैं जो अपने भक्तों के समस्त कष्ट हर कर, उन्हें संतोष, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं। इस उथल-पुथल भरे युग में संतोष और शांति ही वे दिव्य सूत्र हैं, जो सम्पूर्ण मानवता को प्रेम और भाईचारे के बंधन में जोड़ते हैं। माँ श्री संतोषी जी की कृपा से माता जी की चौकी प्रति मंगलवार, शुक्रवार तथा रविवार को होती है। आयोजित माता चौकी के दिनों में भक्त माँ की चौकी में हाजरी देकर अपनी समस्त समस्याओं एवं व्यथाओं से छुटकारा प्राप्त करते है। चौकी के दौरान मातारानी स्वयं गुरु श्री अमित सक्सेना जी के स्वरुप में प्रकट होकर भक्तों को उनके संकटों एवं तकलीफों से छुटकारा पाने के उपाय बताती हैं जिससे भक्तगण लाभान्वित होते हैं व साक्षात् माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माँ संतोषी के दरबार में आने वाले भक्तों की झोली कभी खाली नहीं रहती है।

नवरात्रि मेले का मुख्य आकर्षण 26 मार्च 2026 को रात्रि 9 बजे से प्रातः 5 बजे तक होने वाला विशाल भगवती जागरण होगा, जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक एवं कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से भक्तों को मंत्रमुग्ध करेंगे। इसके अगले दिन 27 मार्च की प्रातः कन्या पूजन और हवन के साथ नवरात्रि महोत्सव का समापन होगा।

मंदिर परिसर में श्र‌द्धालुओं की सुविधा के लिए भंडारा, चिकित्सा सहायता, व्यवस्था एवं सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं। सैकड़ों सेवादार निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहते हैं, जो इस आयोजन को सामाजिक सेवा और आध्यात्मिक समर्पण का अ‌द्भुत उदाहरण बनाते हैं।

श्री संतोषी माता मंदिर परिवार की ओर से सभी श्रद्धालुओं को इस पावन नवरात्रि महोत्सव में सपरिवार पधारकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सादर आमंत्रित है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

टीबी मुक्त भारत' जागरूकता क्रिकेट मैच: दिल्ली पुलिस ने सांसद -11 को 12 रन से हराया

  • टीबी मुक्त भारत अभियान के समर्थन में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच मैत्री क्रिकेट मैच
  • कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया द्वारा 15 मार्च 2026 को मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में आयोजन
  • दिल्ली पुलिस-11 ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 225/8 का स्कोर बनाया
  • सांसद-11 की टीम 213 रन पर ऑलआउट, दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मैच जीता
  • जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और दिल्ली पुलिस की सहभागिता से जनस्वास्थ्य जागरूकता का संदेश
संवाददाता
नई दिल्ली। टीबी मुक्त भारत के राष्ट्रीय अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के तत्वावधान में 15 मार्च 2026 को नई दिल्ली के ऐतिहासिक मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में सांसद-11 और दिल्ली पुलिस-11 के बीच एक मैत्री क्रिकेट मैच का आयोजन किया गया। इस पहल का उद्देश्य खेल के माध्यम से जनस्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ावा देना और टीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय संकल्प के प्रति समाज की सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना था।
मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए दिल्ली पुलिस 11 ने 20 ओवर में 8 विकेट पर 225 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया। सिकंदर सिंह ने 38 गेंदों में 77 रन की शानदार पारी खेली, जबकि राजीव अंबास्ता ने 13 गेंदों में नाबाद 45 रन बनाकर टीम को तेज़ फिनिश दिया। सतीश गोलचा (21) और वेद प्रकाश सूर्य (17) ने भी उपयोगी योगदान दिया। सांसद 11 की ओर से गेंदबाजी में मनोज तिवारी (3/23) और केसरिदेव सिंह झाला (3/40) ने प्रभावी प्रदर्शन किया, जबकि सौमित्र खान (1/25) और अनुराग ठाकुर (1/42) ने भी विकेट हासिल किए।
लक्ष्य का पीछा करते हुए सांसद 11 की टीम ने संघर्षपूर्ण प्रदर्शन किया, लेकिन 18.2 ओवर में 213 रन पर ऑलआउट हो गई और दिल्ली पुलिस-11 ने 12 रन से मुकाबला अपने नाम कर लिया। सांसद 11 की ओर से अनुराग ठाकुर (52), के. सुधाकर (46), गुरमीत सिंह हायर (41) और लघु कृष्णा (23) ने उल्लेखनीय पारियाँ खेली। दिल्ली पुलिस की ओर से रोहित सिंह ने 43 रन देकर 5 विकेट लेकर मैच का रुख पलट दिया। अनिल शुक्ला (2/19) और सिकंदर सिंह (2/47) ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि हरेश्वर स्वामी (1/26) ने एक अहम विकेट लिया।
इस अवसर पर उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने टीबी मुक्त भारत के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि खेल समाज को जोड़ने और जागरूकता फैलाने का सशक्त माध्यम है। सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि क्रिकेट लोगों को एक साथ लाने की अ‌द्भुत क्षमता रखता है और जब जनप्रतिनिधि तथा संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं तो उसका संदेश दूर-दूर तक पहुँचता है।
सारण सांसद राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि टीबी के खिलाफ लड़ाई में सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक है और इस प्रकार के आयोजन लोगों को जोड़कर राष्ट्रीय अभियान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांसद अनुराग ठाकुर ने भी कहा कि खेल समाज को प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है और यह आयोजन एक स्वस्थ भारत के निर्माण की दिशा में हमारी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने कहा कि दिल्ली पुलिस उन पहलों का समर्थन करने में गर्व महसूस करती है जो सामुदायिक सहभागिता को राष्ट्रीय अभियानों से जोड़ती हैं। वहीं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जब नेता और संस्थाएँ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए मैदान में उतरते हैं तो यह समाज में एकता और जिम्मेदारी का सशक्त संदेश देता है।
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