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शुक्रवार, 5 जून 2026

तेजी से बदल रहा है बंगाल

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के अल्पकाल में ही स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। ऐसा लगता है कि केवल ममता सरकार की विचारधारा और दिशा के बिल्कुल उलट शुभेंदु सरकार ने यू टर्न ही नहीं किया बल्कि सारे कील कांटों को उखाड़ते, ध्वस्त करते तीव्र गति से शासन की गाड़ी वहां पहुंच रही है जहां से  बंगाल शांत और स्थिर हो सामान्य राज्य के रूप में गतिविधियों का निर्धारण करे। शुभेंदु सरकार ने कुछ फैसले किए तथा कुछ प्रभाव में ही परिवर्तन आ गया। इनमें केवल केंद्रीय योजनाओं को लागू करना ही नहीं है। आप चाहे भाजपा के जितने आलोचक हों क्या किसी ने कल्पना की थी कि सरकार आने के हफ्ते भर के अंदर ही राज्य से टीएमसी द्वारा लगाए अवैध टोल बूथ हट जाएंगे ,बैरिकेड समाप्त हो जाएंगे, हफ्ते वसूली का धंधा खत्म हो जाएगा…? यह हो गया।  ममता ने स्वयं महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता प्रकट करते हुए रात में न निकलने का आग्रह किया था। सरकार बदलते ही बंगाल अपने स्वभाव,संस्कृति और चहल-पहल में वापस दिख रहा है। महिलाएं देर रात आती- जाती दिखाई दे सकती है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। कोलकाता समेत कई जिलों में रात की पुलिस पेट्रोलिंग काफी बढ़ा दी गई है। आम प्रतिक्रिया देख लीजिए सोशल मीडिया से लेकर मुख्य मीडिया में लोग लिख रहे हैं कि अब सरकार बदली है ऐसा महसूस हो रहा है। बकरीद के दिन वर्षों बाद सडकों की बजाय मैदानों और मस्जिदों में नमाज पढे गये।

किसी सरकार की दिशा का संकेत होता है और अगर वैचारिक और प्रशासनिक दिशा स्पष्ट हो, उनके प्रति प्रतिबद्धता और व्यवहार में प्रखरता हो तो उसका इकबाल  कायम होता है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था मानो बंगाल को संभालना कठिन होगा। कुछ ही दिनों में ऐसा लगने लगा मानो यह वो बंगाल है ही नहीं जिसे हम 4 मई के चुनाव परिणाम के पूर्व या उसके दो चार दिनों बाद तक देख रहे थे। कोलकाता से आसनसोल तक अवैध निर्माण के विरुद्ध बुलडोजर करवाई का आक्रामक हिंसक विरोध पूर्व सरकार की तस्वीर पेश कर रहा था। पत्थरबाजी भी हुई। उसके बाद क्या हुआ यह महत्वपूर्ण है। फुटेज से पत्थरबाजों और दंगाइयों के चेहरे पहचान कर कार्रवाई हो रही है तथा पुलिस ने लाउडस्पीकर में ऐलान कर दिया कि जिन लोगों ने हिंसा और तोड़फोड़ की है उनकी संपत्ति से इसकी वसूली की जाएगी। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों के विरुद्ध यही नियम अपनाया और उसके परिणाम काफी हद तक आए। बंगाल में इसकी कल्पना ही नहीं थी जो सामने है। 

भाजपा ने चुनाव अभियान में कानून और व्यवस्था कायम करने, महिला सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने, घुसपैठियों को बाहर निकालने, सीमा सुरक्षा एवं अंतरिक्ष सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करने, तुष्टिकरण की समाप्ति एवं हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का परिमार्जन, भ्रष्टाचार का अंत ,प्रदेश को विकास एवं सांस्कृतिक गरिमा की पटरी पर वापस लाने आदि वायदे किए थे। मुख्यमंत्री का पदभार संभालते ही शुभेन्दु ने बांग्लादेश की सीमा पर घेराबंदी के लिए सीमा सुरक्षा बल को भूमि सौंपने का आदेश दिया जिसे 45 दिनों में पूरा हो जाना है। 450 किलोमीटर ऐसे क्षेत्र हैं जहां घेरा लगाना बाकी है उसकी जमीन मिली नहीं। मिनट में यह काम हो गया। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला नेशनल हाईवे 10 और नेशनल हाईवे 110 के सात हिस्से केंद्र सरकार को सौंपना है। इनमें से पांच चिकन नेक या सिलीगुड़ी गलियारा से गुजरते हैं। चिकन नेक का 120 किलोमीटर इलाका पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत के साथ जमीन से जोड़ता है। यह बांग्लादेश, नेपाल , भूटान तीन देशों से लगता है और चीन भी यहां से निकट है। चिकन नेक कट जाए तो पूर्वोत्तर से भारत का सीधा जमीनी संपर्क खत्म हो जाएगा। दिल्ली दंगों के आरोपी सरजिल इमाम को उच्चतम न्यायालय ने आज तक जमानत इसीलिए नहीं दी कि उसने मुसलमानों के द्वारा चिकन नेट काट कर भारत को खंडित करने की बात की थी। संयोग से उस पूरे क्षेत्र में भारत के अंदर बंगाल और बिहार दोनों और मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत से अधिक है तथा दूसरी और बांग्लादेश है।  मुस्लिम आबादी को भड़का कर चिकन नेक काट कर शेष पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने का विचार बांग्लादेश के पूर्व शासक मोहम्मद यूनुस से लेकर वहां जेन जी आंदोलन तथा जमात ए इस्लामी के नेताओं के सामने आए । ममता सरकार ने केंद्र के आग्रह को स्वीकार नहीं किया और इस कारण वहां रक्षा और नागरिक दोनों प्रकार के आधारभूत संरचनाओं की कमी रही। अवैध घुसपैठ के साथ अनेक भारत विरोधी गतिविधियां ,अवैध पशुओं एवं सामग्रियों की तस्करी आदि को पूरी तरह रोक पाना कठिन था।  नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया तथा नेशनल हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड मिलकर इसका विकास करेगा। यानी आंतरिक और सीमा सुरक्षा और दूसरे रूप में कहें तो घुसपैठियों को रोकने के लिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबद्धता दिखाई है।

कट मनी और भ्रष्टाचार तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराध की व्यापक छानबीन और कार्रवाई के लिए दो उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त आयोगों का गठन किया जा चुका है। सरकार ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व सुपरिटेंडेंट संदीप घोष के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी को मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। ऐसे ही आदेश अन्य मामलों में दिए जा रहे हैं जिन्हें पूर्व सरकार ने रोक कर रखा था। आप जानते हैं कि संदेशखाली से लेकर आईजी कर और यहां तक कि मुर्शिदाबाद के दंगों में महिलाओं के साथ व्यवहार बंगाल में प्रमुख मुद्दा रहा है। कट मानी और भ्रष्टाचार का अनुभव ऐसा था मानो यह सरकारी प्रक्रिया का ही अंग हो। आप देख लीजिए वही पुलिस प्रशासन और माहौल कितना बदला है।अवैध कब्जों से मुक्ति बंगाल की ऐसी चुनौती है जिससे निपटना यानी इतिहास की धारा बदल देना होगा। एक पार्टी के लोगों का ही पूरे प्रदेश में कब्जा है। तृणमूल ने सत्ता में आते ही कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के दफ्तरों व अन्य स्थान कब्जाये, इसके साथ नेताओं ने प्रशासन की मिली भगत से सरकारी व निजी जमीन, मकान सब पर भयानक रूप से कब्जे किए। माफिया तंत्र भूमि का उत्पन्न हुआ जिसने न जाने कितने लोगों को स्थान छोड़ने को विवश कर दिया। इसी तरह धर्म स्थलों पर कब्जे हुए या उन्हें जबरन बंद रखने को भी विवश किया गया।  लगातार उन अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई हो रही है। कांग्रेस और वामपंथी दलों तक के दफ्तर मुक्त कर भाजपा के लोगों ने कई जगह सौंप दिया। कुछ डर से ही छोड़ कर भाग गए। कई धर्मस्थल तो जनता ने हीं मुक्त करा लिए।

वास्तव में शुभेंदु सरकार ने भाजपा की विचारधारा को सत्ता नीति में अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। सड़कों पर नमाज पढ़ने का अंत करने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है। वंदे मातरम गायन अनिवार्य कर दिया गया। राज्य के इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिया जाने वाला सरकारी भत्ता (मानदेय) 1 जून से समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है। सरकार का एक बड़ा‌ फैसला अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को 17% से घटाकर 7% करना तथा इसे केवल 66 हिंदू जातियों तक ही सीमित रखना है । पिछड़ी जाति की सूची में से मुसलमान की जातियों को पूरी तरह हटा दिया। ममता बनर्जी ने 2024 में 71 जातियों को पिछड़ी जाति में शामिल किया था जिनमें 65 मुस्लिम समुदाय के थे। ममता बनर्जी ने मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा पिछड़ी जाति का आरक्षण देने के लिए ही श्रेणी ए बनाकर 10% आरक्षण घोषित किया था। इसके पहले  पिछड़े वर्ग के लिए 7% आरक्षण था। साफ था कि केवल वोट बैंक की दृष्टि से मुसलमानों को पिछड़ी जाति में शामिल कर अतिरिक्त आरक्षण का अनुपात लाया गया। इस तरह शुभेंदु सरकार ने कम समय में ही त्वरित गति से अपने कदमों द्वारा यह स्थापित कर दिया कि राज्य किसी मजहब या पंथ विशेष या पार्टी नेताओं या समर्थकों लिए नहीं बल्कि सबके हित में काम करेगा, खजाने का धन किसी पंथ के तुष्टिकरण के लिए नहीं बल्कि उपयुक्त पात्रों के कल्याण पर खर्च होगा, शासन कानून और विधान के अनुसार चलेगा,  प्राथमिकता आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा विकास होगा एवं पहले जो निहित स्वार्थी तत्व इसके रास्ते में आए, सत्ता का दुरुपयोग किया उन सबके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।

पता-अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -9811027208

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बुधवार, 27 मई 2026

शरद पवार का यह सुझाव देश के हित में है

अवधेश कुमार

शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश के सम्मान की बात आती है तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन , नीदरलैंड ,ज्नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्रा की तथा नार्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए। प्रधानमंत्री के समक्ष अपने राष्ट्रीय हित को साधने का उद्देश्य था और इन यात्राओं पर विशेषज्ञों का मत यही है कि उसमें उन्हें अधिकतम सफलता मिली। किंतु राजनीतिक और गैर राजनीतिक एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनके विदेश में रहते हुए ही हमले शुरू हो गए। सारे हमलों‌ व‌ आलोचनाओं के हल्ला बोल में ऐसा एक तथ्य नहीं आया जिसमें बताया गया हो कि अमुक बिंदु पर प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्रीय हित के अनुकूल काम नहीं किया। जाहिर है कि विरोध केवल राजनीतिक मतभेदों और असहमतियों के इर्द-गिर्द था। यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर की राजनीतिक असहमतियां और मतभेद सीमाओं से बाहर चला जाए तो राष्ट्रीय हित प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि हम देश हित को प्राथमिकता देने की जगह अपने राजनीतिक, व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता दे रहे हैं या फिर हमारा वैचारिक दुराग्रह हावी है।


ऐसा नहीं है कि पवार की मोदी से पूरी तरह सहमति है। महाराष्ट्र में आज शरद पवार की राकांपा शक्तिहीन है तो इसी कारण क्योंकि स्वर्गीय अजीत पवार ने विद्रोह कर भाजपा से हाथ मिला लिया। बावजूद हमारी पारंपरिक राजनीति ,जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने नेता रह गए हैं, में यही व्यवहार लंबे समय तक रहा है। देश में हमारी असहमति होती है, आरोप - प्रत्यारोप करते हैं लेकिन जब विदेशों की , अंतरराष्ट्रीय मंच की बात आती है तो देश साथ खड़ा होता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर या विदेश में प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहां केवल राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। पत्रकारिता में भी अनेक बार प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के विदेश में दिए बयानों से असहमति होती थी लेकिन वरिष्ठ लोग बताते थे कि विदेश नीति पर हमारी आलोचना का स्वर ऐसा नहीं हो सकता। अपवाद हर समय रहे हैं पर पर वह कभी मुख्य धारा नहीं बना। इसलिए ज्यादातर विदेशी यात्राओं या विदेशी मेहमानों के भारत आगमन पर हुए समझौते आदि पर राजनीतिक दलों व मीडिया की ध्वनि एक समान होती थी। जैसे-जैसे राजनीतिक मतभेद बढ़े, भारत और वैश्विक स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं, निहित स्वार्थी संगठनों, समूहों के बीच संपर्क संबंध बढ़ा इस स्वाभाविक व्यवहार में अंतर आता गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता शीर्ष पर आने के बाद यह अतिवाद तक चला गया है। इसी का प्रकटिकरण इस समय दिखा है।


एक भारतवासी के नाते इस समय हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए? पश्चिम एशिया संकट यानी ईरान अमेरिका इजरायल टकराव और तनाव ने ईंधन आपूर्ति में उथल-पुथल पैदा कर दिया है। हार्मूज जलडमरूमध्य की खतरनाक नाकेबंदी से निपटना विश्व के लिए मुश्किल हो रहा है। इसमें पेट्रोल डीजल आदि के लिए आयात पर निर्भर भारत या अन्य देशों के लिए दूरगामी दृष्टि से आपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था करना , देशों के संबंधों में हो रहे बदलावों के साथ सामंजस्य स्थापित करना या अस्थिरता के काल में उसका आधार बनाते रहना तथा भविष्य में बनने वाले अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऐसी स्थिति में होना ताकि देश के रूप में हम कहीं अलग-थलग न पड़ें। मोटा - मोटी प्रधानमंत्री की यात्रा में यही लक्ष्य समाहित होंगे। इन सबमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। आप चाहे भाजपा के सरकार के विरोधी हों या समर्थक दृष्टि एक ही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान उन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत, संयुक्त घोषणाओं तथा संपन्न समझौतों में क्या-क्या हुआ? जब आप गहराई से उन सबको देखेंगे तो आपका विचार अपने आप बदल जाएगा। दुर्भाग्य से हम उन पर सरसरी दृष्टि भी डालना नहीं चाहते।


किसी पत्रकार ने नॉर्वे में दोनों प्रधानमंत्रियों के स्वागत वक्तव्य में निर्धारित प्रोटोकॉल के विपरीत जबरन कैमरे घूमाकर भारत के प्रधानमंत्री से मानवाधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न पूछे और वह हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। नॉर्वे के साथ हमारे समझौते, हमारे यहां पेंशन फंड से 28 अरब डॉलर के निवेश की योजना, ब्लू इकोनामी साझेदारी, हरित साझेदारी आदि पर हमने चर्चा नहीं की। यही नहीं नॉर्दिक भारत शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से ट्रस्टेड ग्रीन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप यानी विश्वसनीय हरित तकनीक एवं अन्वेषण रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिलना और कातिक परिषद में भी पर्यवेक्षक की हैसियत हासिल करना इनके लिए हास्य पर चला गया। इसी तरह इटली की यात्रा में प्रधानमंत्री ने पार्ले कंपनी के सामान्य मेलोडी ट्रॉफी वहां की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी को भेंट करते हुए एक रोचक वीडियो पोस्ट किया। इटली के साथ हमारी ठोस विशेष रणनीतिक साझेदारी कायम हुई, भारत और इटली में निर्माण करो तथा विश्व को आपूर्ति करो का ढांचा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के स्थान की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, अनेक मुद्दों पर हमारे साथ सहमति बनी जिनमें आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष भी है। इस यात्रा में स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया और काम करने वाली पत्रकार और कार्टून छापने वाले अखबार के देश नार्वे ने भी। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संगठन ने प्रधानमंत्री को विशेष रूप से सम्मानित किया। इन सब पर चर्चा की जगह हमारे यहां टौफी वीडियो को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही है जिनमें कई को देखने सुनने या पढ़ने में शर्म आए। भारत जैसे देश में विमर्श का यह स्तर किसी को भी अंदर से परेशान कर देगा।


क्या हम ऐसा करते समय विचार भी नहीं करते कि एक देश के रूप में विदेश में हमारी कैसी छवि बनेगी? यहीं पर शरद पवार का यह कथन प्रासंगिक हो जाता है कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए सामूहिक रूप से काम करने का मौका मिले तो सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ जुड़ना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा मजबूत करने में मदद करनी चाहिए। कोई भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री देश के बाहर होते हैं तो अपने दृष्टिकोण से वह देश के भविष्य और सम्मान को ही केंद्र में रखते हैं। कई बार इनमें गलतियां भी हुई है। आज के दौर के अनुसार उनकी आलोचना भी अस्वाभाविक नहीं है किंतु आलोचना तथ्यों के आधार पर होगी। अखिर जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी ट्रॉफी भेंट करने से हमारी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा?इटली प्राचीन सभ्यता संस्कृति वाला यूरोप का महत्वपूर्ण और मजबूत देश है। वर्तमान तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में दो प्रधानमंत्रियों के बीच इस तरह के सहज संबंध,  मुस्कान और ठहाके कूटनीति की दुनिया में बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक बार दो नेताओं के बीच सहज सामान्य संवाद निर्मित हो गए तो जटिल से जटिल मुद्दों पर भी सहमति बनती है तथा रास्ता निकल जाता है। दूसरे, इससे हमारे देश के एक सामान्य ब्रांड का भी जबरदस्त विपणन हुआ। इस विषय पर स्थापित अंतरराष्ट्रीय मीडिया की टिप्पणियां देखेंगे तो सकारात्मक भाव पैदा होगा।


कूटनीति में एक सामान्य वस्तु का उपयोग कर माहौल बदल देना, दुनिया को संदेश देना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर व्यवहार का रास्ता दिखा देना सामान्य बात नहीं है। अभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा हुआ और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए। इसके बाद रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की चीन यात्रा हुई।  दोनों नेताओं के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए। पुतिन और शी जिनपिंग के  बीच सामान्य संबंध हैं। बावजूद उनके व्यवहार में  सहज मुस्कान नहीं दिखेगा। तनावपूर्ण और अनिश्चितताओं की दुनिया में दो महत्वपूर्ण देश के नेताओं के बीच सरल सहज मुस्कान और संबंध कूटनीति के लिए नया मानक है। कायदे से देश में इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत ने अपने लक्ष्य के अनुरूप यात्रा से सारी उपलब्धियां हासिल की जिसकी ओर तत्काल दृष्टि थी। दूसरे देश भी अपने हित के अनुसार काम कर रहे थे और उन्हें भी प्राप्त हुआ। पर मूल बात यह है कि हम एक राष्ट्र के रुप में कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता अब ज्यादा उपलब्ध नहीं है कि सामने आकर रास्ता दिखाएं। ज्यादातर जा चुके हैं। हमें ही अपने हर व्यवहार पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर स्वयं को बदलना होगा।


अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 9811027208 

प्रस्तुतकर्ता Musarrat Times Hindi News pepar पर 11:07 pm कोई टिप्पणी नहीं:

बुधवार, 20 मई 2026

बंगाल में राजनीतिक हिंसा रोकना भाजपा सरकार की सबसे बड़ी चुनौती

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार गठन के बाद उम्मीद बंधी है कि चुनाव उपरांत हिंसा नियंत्रित होगी। चार राज्यों एवं एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हुए जिनमें तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल एवं तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी एवं घटकों की पराजय हुई। किंतु जैसा डरावना दृश्य पश्चिम बंगाल में दिखा वैसा कहीं नहीं। चुनाव परिणाम के बाद पश्चिम बंगाल से चार तरह की नकारात्मक और चिंताजनक तस्वीरें सामने आयीं। एक, चुनाव के बाद समस्त कोशिशें के बावजूद हिंसा की घटनाएं सामने आती रही। दूसरे, तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेत्री ममता बनर्जी विनम्रता से जनादेश स्वीकारने की जगह कह रहीं हैं कि हमारी 100 सीटें चुनाव आयोग ने लूट लिया। तीन, विपक्षी नेताओं ने सबसे ज्यादा समर्थन और सहानुभूति तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को दिया है। केरल से माकपा नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सत्ता चली गई लेकिन कोई उनके लिए छाती नहीं पीट रहा है। एमके स्टालिन और द्रमुक विपक्ष के साथ भाजपा विरोधी अभियान और आक्रामकता में लगातार शामिल रहा है लेकिन उनके साथ भी यह व्यवहार नहीं। इन दोनों राज्यों के नेताओं ने न चुनाव आयोग पर कोई आरोप लगाया और न  कहा कि हम हारे नहीं। दोनों राज्यों की स्थिति बिलकुल सामान्य है। ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि मैं चुनाव हारी नहीं हूं इसलिए इस्तीफा नहीं दूंगी। अंततः राज्यपाल ने संवैधानिक शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उन्हें बर्खास्त किया। यह भारतीय राजनीति के इतिहास की असामान्य घटना थी। हालांकि बंगाल में इनसे अलग चौथी तस्वीर है जो हम सबको बहुत कुछ सोचने को विवश करती है। प्रदेश से आई तस्वीरों और वीडियो में लोग जगह-जगह चुनाव परिणाम का विजय उत्सव मनाते दिख रहे हैं। कहीं विजय जुलूस निकल रहे हैं, कहीं होली खेली जा रही है ,कहीं कीर्तन हो रहे हैं,  मानो उन्हें मुक्ति मिली हो। इनमें महिला, पुरुष, दलित, जनजाति, युवा, किशोर सब शामिल दिखाई देते हैं। अगर इन तस्वीरों को नजरअंदाज कर देंगे तो पश्चिम बंगाल के सत्य तक नहीं पहुंच सकते। ये सारे विजय उत्सव भाजपा द्वारा ही आयोजित नहीं थे। स्वत:स्फूर्त तरीके से लोग ऐसा कर रहे हैं। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनका भाजपा से किसी तरह का संबंध नहीं।

चौथी तस्वीर बताती है कि 15 वर्षों के तृणमूल कांग्रेस शासन के विरुद्ध बड़े वर्ग में व्यापक असंतोष था जिससे  वे मुक्ति चाहते थे। दूसरी ओर इसका अर्थ यह भी है कि हिंसा की तस्वीरों से ज्यादा सकारात्मक लोक मानस पूरे प्रदेश में है। यह  लोक व्यवहार आश्वस्त करता है कि बंगाल हिंसा के दौर से बाहर निकलेगा तथा शांति‌ व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। किंतु यह यूं ही नहीं हो सकता। हालांकि प्रदेश में जगह-जगह कुछ हिंसा तो तृणमूल नेताओं द्वारा मकानों ,जमीनों, कार्यालयों पर कब्जे के संदर्भ में हुई जब लोग स्वयं निकलकर इसे मुक्त कराने लगे। इसी तरह हिंदुओं के कई धर्मस्थलों या धर्म स्थानों की मुक्ति के दृश्य भी सामने आए। कई जगह हमने देखा कि चुनाव परिणाम के बाद गांवों में कुछ लोग नारा लगाते हुए निकले और गुस्से में कोई तृणमूल का दिखा तो उसकी हल्की पिटाई कर दिया, उसके घर पर दो-चार डंडों का प्रहार कर फिर नारा लगाते चलते बने। ये दृश्य भी हिंसा के ही है और रुकने चाहिए पर ये डरावने नहीं हैं। यह बताता है कि तृणमूल शासन में दादागिरी और माफियागिरी का साम्राज्य हो गया था। इसके विरुद्ध लोगों में गुस्सा होना स्वाभाविक है। 

दूसरी ओर अगर विजय जुलूसों पर बमों से हमला हो या खींचकर मार दिया जाए या सरकार बदल गई इसके नाम पर लोगों की पिटाई हो, हत्या हो तो साफ है प्रदेश में स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण नहीं है। सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी जो तब मुख्यमंत्री नहीं थे के सहयोगी देवनाथ रथ की हत्या की हो रही है। उन्हें उत्तर 24 परगना के मध्यग्राम में सड़क पर ढेर करअंदर गोली मारी गई। हत्यारे इतने दुस्साहसी थे कि उन्होंने सड़क पर ओवरटेक कर गाड़ी आगे से घेरा, मोटरसाइकिल से उतरकर छाती में प्रोफेशनल हत्यारे की तरह से गोली मारी और देखा कि उनके मृत्यु हुई कि नहीं। इसमें गिरफ्तारियां बता रही है कि यह पूर्व नियोजित था जिसमें भाड़े के हत्यारों का उपयोग हुआ था। इसे राजनीतिक हिंसा से अलग करके नहीं देख सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम की संध्या भाजपा केंद्रीय कार्यालय में भाषण देते हुए कहा कि राजनीतिक हिंसा रुकनी चाहिए और हमें बदले की नहीं बदलाव की राजनीति करनी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने चुनाव परिणाम के बाद ही बयान दिया था जो भी पार्टी से जुड़ा व्यक्ति हिंसा करेगा उसे निष्कासित कर दिया जाएगा। फिर इस पर पत्रकार वार्ता करके स्पष्ट अपील की गई एवं चेतावनी दी गई। सत्ता संभालते हैं शिवेंदु अधिकारी ने सबसे ज्यादा फोकस कानून व्यवस्था पर किया और धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी है।

चुनाव से जुड़ी हिंसा चाहे वह पूर्व हो या बाद में इस बात का प्रमाण होता है कि कोई दल या नेता हर हाल में केवल अपनी जीत देखना चाहता है। यानी कोई मतदाता उससे खुश है या नाखुश, उसका समर्थक है या नहीं यह मायने नहीं रखता बल्कि हर हाल में उसका मत उसे चाहिए। यानी अगर वह दूसरे को मत देना चाहता है तो या तो मतदान केंद्र तक न जाए या अगर दे दिया तो उसे हर हाल में सबक सिखाना है ताकि भविष्य में कोई ऐसा न कर सके। पश्चिम बंगाल में 1970 के दशक में कांग्रेस ने इसकी शुरुआत की, बाद में वाम मोर्चा इसके विरुद्ध आवाज उठाकर सत्ता में आया लेकिन राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध हिंसा,  हत्या, दमन उत्पीड़न, उनकी संपत्तियों पर कब्जा, आगजनी आदि को सत्ता का संपूर्ण संरक्षण प्राप्त हुआ। ममता बनर्जी ने इसके विरुद्ध जबरदस्त संघर्ष किया, स्वयं अपने कार्यकर्ताओं के साथ वह भी सत्ता संरक्षित हिंसा का शिकार हुई। विडंबना देखिए कि सत्ता में आने के बाद ममता और तृणमूल वाम मोर्चा से ज्यादा खतरनाक तरीके से राजनीतिक हिंसा को आगे बढ़ा दिया। देश के सामने तृणमूल सत्ता संरक्षित हिंसा की भयानक घटनाएं 2018 पंचायत चुनाव के समय और उसके बाद सामने आए। जगह-जगह लूट, आगजनी, बलात्कार, हत्या की घटनाएं हुई तथा भारी संख्या में लोगों को अपने स्थान से दूर या राज्य से बाहर पलायन करना पड़ा। 2022 विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1900 से ज्यादा हिंसा की घटनाएं दर्ज की। इनमें से लगभग ढाई दर्जन हत्या के मामले की जांच सीबीआई के जिम्मे है और मुकदमा चल रहा है। 

2026 के विधानसभा चुनाव बिल्कुल भिन्न था। चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व सवा दो लाख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवान तैनात किए और गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा किया कि ये चुनाव के बाद दो महीने तक तैनात रहेंगे। जितना संभव हुआ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण , चुनाव तक कार्य मुक्ति तथा उनकी जगह प्रदेश या बाहर से अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई। इन सबके कारण सुरक्षा का माहौल बना और हर हाल में जीतने की लालसा वाले न आतंक का माहौल बना सके और न हिंसा कर सके। पिछले 6 दशक में बंगाल का पहला चुनाव था जिसमें कोई हत्या नहीं हुई और जो हिंसारहित था। किंतु तृणमूल कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में सत्ता के साथ ऐसे निहित स्वार्थी तत्व खड़े कर दिए हैं जो पराजय पचा नहीं सकते क्योंकि इससे उनका जीवन सीधे प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए अगर बंगाल की सड़कों पर तृणमूल के लोग टोल नाका बना वसूली कर रहे थे और एक दिन में सारे बंद हो गये तो उससे कितने लोगों की अवैध आय का अंत हो गया। ऐसे लोग उनके विरुद्ध प्रतिशोध लेने की हर संभव कोशिश करेंगे तो जिन्होंने पार्टी उम्मीदवारों को हराने में भूमिका निभाई। इसी तरह हर स्तर पर कट मनी और सिंडिकेट सत्ता का स्वाभाविक अंग बन चुका था। जो लोग इन सबसे प्रभावित हुए या जिनका इनसे संघर्ष हुआ उनके अंदर भी गुस्सा होगा। सामान्य प्रशासन, पुलिस प्रशासन सबका अति तृणमूलीकरण हो चुका है। तृणमूल से जुड़े किसी नेता के भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का हिंसक विरोध और यहां तक कि केंद्रीय एजेंसियों पर हमले और खदेड़े जाने के दृश्य हम सबने देखे। जब उनकी नेत्री ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों ने मिलकर उन्हें हराया और भाजपा को जिताया तो इसका संदेश इन सबके बीच क्या गया है यह बताने की आवश्यकता नहीं। यह एक प्रकार से अपने लोगों को उकसाना है कि आप शक्ति प्रदर्शित करो और इस चुनाव परिणाम को स्वीकार मत करो। ध्ममता बनर्जी ने किसी बयान में नहीं कहा कि हमें हिंसा नहीं करनी है और हमारा विरोध लोकतांत्रिक तरीके से हो। इस तरह देखें तो निष्कर्ष है कि राजनीतिक हिंसा को पूरी तरह नियंत्रित करना बंगाल के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि दंगाइयों अपराधी यो आदि के विरुद्ध कि तेजी से कारवाइयां हो रही है उनसे उम्मीद जगाती है कि राजनीतिक हिंसा का अंत होगा।

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गुरुवार, 7 मई 2026

शास्त्री पार्क इलाके में 50 वर्षीय युवक की चाकू मारकर की हत्या, आरोपी मोहसीन कबीर नगर से गिरफ्तार

संवाददाता

दिल्ली। उत्तर पूर्वी दिल्ली के शास्त्री पार्क इलाके में चाकूबाजी का एक मामला सामने आया है। यह घटना उत्तर पूर्वी दिल्ली के शास्त्री पार्क इलाके की हैं। जहां जहां बुलंद मस्जिद के पास स्थित मछली मार्केट के सामने देर रात खूनी वारदात को अंजाम दिया गया। बताया जा रहा है कि करीब रात 1:30 बजे फखरुद्दीन नाम के 50 वर्षीय युवक पर किसी अज्ञात हमलावर ने चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। हमला इतना खतरनाक था कि फखरुद्दीन गंभीर रूप से घायल होकर मौके पर गिर पड़े।

पुलिस के मुताबिक, बुधवार तड़के करीब 1:30 बजे थाना शास्त्री पार्क को चाकूबाजी की सूचना मिली। सूचना मिलते ही पुलिस टीम बुलंद मस्जिद स्थित फिश मार्केट के पास पहुंची, जहां फखरुद्दीन नामक व्यक्ति गंभीर अवस्था में घायल मिला। जिसके शरीर पर चाकू के घाव थे। परिजन उसे तुरंत जग प्रवेश चंद्र अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। वारदात के बाद पुलिस ने तेजी से कार्रवाई करते हुए हत्या के आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।


दिल्ली पुलिस 
ने मामले में थाना शास्त्री पार्क में धारा 103(1) BNS के तहत एक FIR संख्या 135/2026 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल का मुआयना किया और ज़रूरी सबूत इकट्ठा किए। जांच के दौरान इंस्पेक्टर मनजीत तोमर, एसएचओ शास्त्री पार्क के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम ने तकनीकी जांच और स्थानीय जानकारी के आधार पर आरोपी मोहसिन (34) निवासी कबीर नगर, बाबरपुर को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि लगातार पूछताछ के दौरान, आरोपी ने खुलासा किया कि मृतक के साथ उसका पहले से ही कोई विवाद चल रहा था। इसी रंजिश के चलते उसने वारदात को अंजाम दिया। पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी पहले से मारपीट, चोरी और लूट जैसे सात आपराधिक मामलों में शामिल रह चुका है। फिलहाल पुलिस हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार और अन्य पहलुओं की जांच कर रही है। इलाके में वारदात के बाद लोगों में डर और आक्रोश का माहौल है।

हत्या का क्या कारण क्यों किया हमाला हर किसी की अपनी कहानी? - परिजनों के अनुसार, वो रात में खाना खाने के बाद घर के पास टहलने निकले थे। इसी दौरान एक युवक ने उनसे नशा करने के लिए 200 रुपये मांगे. जब इन्होंने पैसे देने से मना कर दिया तो आरोपी ने उन पर चाकू से हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि आरोपी ने लगातार दो से तीन वार किए, जिससे फखरू गंभीर रूप से घायल हो गए। 

वहीं डीसीपी नॉर्थ ईस्ट आशीष मिश्रा ने बताया कि 6-7 मई की रात करीब 1:30 बने शास्त्री पार्क थाना पुलिस को बुलंद मस्जिद स्थित मछली मार्केट के पास एक व्यक्ति को चाकू मारने की सूचना मिली। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची। वहां फखरुद्दीन घायल मिले। उन्हें तुरंत इलाज के लिए जग प्रवेश चंद्र अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

जांच में पता चला कि फखरुद्दीन बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क इलाके में रहते थे। वह अपने भाई के साथ रेहड़ी पर अंडा बेचते थे। बुधवार रात मोहसिन अंडा लेने आया था। वह उधार में अंडा मांग रहा था। उन्होंने देने से इंकार कर दिया। इस बात पर झगड़ा शुरू हो गया। झगड़े के दौरान मोहसिन ने चाकू से हमला किया और मौके से भाग गया। एसएचओ मनजीत तोमर के नेतृत्व में बनी टीम ने आरोपी को पकड़ा।

अस्तपताल में डाॅक्टरों ने मृत घोषित किया - घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। परिजन और स्थानीय लोग घायल फखरुद्दीन को तुरंत जग प्रवेश चंद्र अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। वहीं घटना के बाद इलाके में दहशत फैल गई और लोग कानून व्यवस्था को लेकर चिंता जताने लगे। अस्पताल प्रशासन की सूचना मिलते ही शास्त्री पार्क थाना पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी। पुलिस ने घटनास्थल से अहम सबूत जुटाए हैं और आरोपी की तलाश के लिए कई टीमों का गठन किया गया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए दिलशाद गार्डन स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल की मोर्चरी में भेज दिया। फिलहाल लगातार बढ़ रही चाकूबाजी की घटनाओं ने इलाके में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दबी जुबान में लोग पुलिस की लापरवाही को दोष दे रहे हैं।

पुलिस ने सबूत जुटा लिए हैं - सूचना मिलते ही शास्त्री पार्क थाना पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच के लिए क्राइम टीम और फॉरेंसिक टीम को भी बुलाया गया। पुलिस ने घटना वाली जगह से जरूरी सबूत जुटाए और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाल कर युवक की पहचान मोहसीन के रूप में की है।  आरोपी मोहसिन (34) निवासी कबीर नगर, बाबरपुर को गिरफ्तार कर लिया।








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बुधवार, 6 मई 2026

आखिर कैसे आए ये चुनाव परिणाम

अवधेश कुमार

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर कोई एक सुसंबद्ध टिप्पणी संपूर्ण स्थितियों का विश्लेषण नहीं कर सकता। सारे राज्यों के राजनीतिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे अलग-अलग थे तथा मतदाताओं ने उसी अनुसार मतदान किया। किंतु सबको मिलाकर एक तस्वीर बनाएं तो इसमें दो ऐतिहासिक युगांतरकारी परिणतियां हैं। एक , पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐसी विजय जो एक समय अकल्पनीय थी तथा तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी टीवीके का चमत्कारिक प्रदर्शन। वैसे तो असम में भी भाजपा की तीसरी बार लगातार विजय महत्वपूर्ण है पर ये दोनों घटनाएं ऐतिहासिक और युगांतरकारी हैं। बंगाल में एक तिहाई मुस्लिम मतदाताओं के बहुमत का खतरनाक तरीके से हर हाल में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने और तृणमूल के समर्थन में आक्रामकता से काम करने के बावजूद भाजपा की इतनी बढ़त सामान्य घटना नहीं है। आम सोच यही थी कि ममता की शुरुआत ही 30 प्रतिशत मत और लगभग 65-70 सीटों से होती है जबकि भाजपा को शून्य से शुरुआत करनी होगी। वैसे असम में इससे ज्यादा मुस्लिम आबादी के बावजूद भाजपा ने जीत हासिल कर कई मिथकों को तोड़ा। पर असम और बंगाल की राजनीति और सत्ता के चरित्र में मौलिक अंतर है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी राजनीति और सत्ता का चरित्र ऐसा बना दिया था जिसमें किसी भी पार्टी के लिए उसको भेजना असंभव सी चुनौती थी। 

पिछले एक दशक से ज्यादा समय के चुनावों का एक पहलू हर जगह लागू होता है वह यह कि हिंदुत्व व अपनी संस्कृति‌, धर्म के प्रति हिंदुओं के पुनर्जागरण के कारण एक निश्चित वोट का आधार हर राज्य में निर्मित हो गया है और यह मत भाजपा से संतुष्ट असंतुष्ट या कुछ मायनो में नाराज होने के बावजूद वह हारे या जीते उसे या साथी दलों या उसकी अनुपस्थिति में दूसरे दलों को जाता है। स्वाभाविक ही इसके समानांतर प्रतिक्रिया में भाजपा विरोधी मतों का एक अंश भी उसे चुनौती देने वाले प्रमुख दल या उसके साथियों के खाते चला जाता है। यह प्रवृत्ति पांचो राज्यों में रही है। आप देखेंगे कि पांचो राज्यों के परिणाम निर्धारण में इनकी भूमिका है। भाजपा स्थानीय -क्षेत्रिय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए भी चुनावों को मतदाताओं को सीधे अपील करने वाले राष्ट्रीय विषयों के साथ संबद्ध करती है। भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकी को बंगाल एवं असम दोनों जगह प्रमुख मुद्दे के रुप स्थापित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान संबंधी कार्यों तथा नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण को लागू करने की संसदीय पहल ने भी चुनावी माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

 वस्तुत: बंगाल के परिणाम ने उन सबको चौंकाया है जो जमीनी वास्तविकता और 2018 से मतदाताओं मुख्यतः हिन्दुओं के बड़े वर्ग के अंदर बदलाव की छटपटाहट को महसूस नहीं कर रहे थे। बंगाल में सुरक्षित वातावरण में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करा पाना चुनाव आयोग, न्यायिक संस्थाएं और पूरे देश के लिए चुनौती बन गई थी। तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता और पूरी राजनीति को निहित स्वार्थी तत्वों की गिरफ्त में दिए जाने से बंगाल की संस्कृति चुनावों को हर हाल में अपने पक्ष में करने की हो चुकी है। कट्टरपंथी तत्वों को प्रत्यक्ष- परोक्ष संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण पूरा प्रदेश हमेशा सांप्रदायिक भय और तनाव की स्थिति में रहा। मतदाताओं की इच्छा नहीं तृणमूल नेताओं की चाहत से आप मतदान करिए या चुपचाप घर बैठिये अन्यथा  हिंसा, आगजनी, दमन, उत्पीड़न और संबंधित स्थान या प्रदेश से पलायन का दंश झेलिये। साइलेंट रीगिंग बंगाल की मुख्य चुनावी प्रवृत्ति रह रही है। पहले इसी रास्ते वाम मोर्चा ने लगातार जीत सुनिश्चित किया और उसके विरुद्ध लंबा संघर्ष करते-करते ममता बनर्जी ने भी अपनी पूरी पार्टी को उससे ज्यादा हिंसक और दमनकारी तत्वों में परिणत कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद तृणमूल की सत्ता और राजनीति विरोधियों के विरुद्ध ज्यादा खूंखार हुई अन्यथा 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम वैसे नहीं आते। पलायन या हिंसा की सर्वाधिक शिकार महिलाएं होतीं हैं। पुरुषों के मुकाबले 1.5 महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया महिला होने के बावजूद ममता बनर्जी के विरुद्ध इनका बहुत बड़ा मत भाजपा को गया है। भाजपा पर ध्रुवीकरण का आरोप लगाकर सतही विश्लेषण करने वाले विचार करें कि भद्र लोक माने जाने वाले बंगाल के हिंदुओं ने ममता बनर्जी की सत्ता संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह कर भाजपा को मत दिया तो क्या इसे केवल ध्रुवीकरण कहेंगे और ऐसा हुआ भी तो क्यों?

 बंगाल में राजनीतिक संघर्ष वास्तविक लोकतंत्र की पुनर्स्थापना तथा सत्ता संस्कृति को सर्वसमावेशी बनाने का था। यह जिम्मेवारी मुख्यत: प्रदेश के गैर मुस्लिमों यानी हिंदुओं को ही लेना था। धीरे-धीरे हिंदुओं के बहुमत के अंदर अगर यह भाव पैदा हुआ कि इस सरकार के रहते हमारा अस्तित्व संकट में है तो इसके कारण अत्यंत गहरे हैं। बांग्लादेश की घटनाओं ने इस मनोविज्ञान को सशक्त किया कि हमें कुछ हद तक जान की बाजी लगानी होगी। हिंदू आबादी में लगभग 75 प्रतिशत ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया। यह बहुत बड़ी बात है।

तमाम विरोधों के बावजूद एसआईआर में 90 लाख से ज्यादा मृत, संदिग्ध और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने के कारण फर्जी मतदाताओं का खेल खत्म हो गया। सवा 2 लाख केंद्रीय बलों की उपस्थिति , चुनाव के बाद भी सुरक्षा बलों के बने रहने की घोषणा, दूसरे राज्यों के अधिकारियों को चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्ति, प्रदेश के अधिकारियों का व्यापक पैमाने पर स्थानांतरण या चुनाव प्रक्रिया तक कार्य मुक्ति तथा चुनावी हिंसा वाले चिन्हित व्यक्तित्वों के विरुद्ध कार्रवाई व सतर्क दृष्टि आदि ने भय व संशयग्रस्त मतदाताओं के अंदर सुरक्षा को लेकर आश्वस्त किया जिससे चुनावी वातावरण में आमूल परिवर्तन आया। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पहले दिन से यह विश्वास दिलाने की रणनीति अपनाई कि हम सत्ता में आ रहे हैं तथा किसी के साथ अन्याय हुआ तो पूरी पार्टी खड़ी रहेगी। इन सबका सम्मिलित परिणाम है असंभव सा लगने वाला सत्ता परिवर्तन।

असम में पहले दिन से स्पष्ट था कि  वह भाजपा को बड़ी चुनौती नहीं है। किंतु गौरव गोगोई भी जोरहाट से हार जाएंगे इसकी कल्पना कांग्रेस को नहीं रही होगी। कांग्रेस ने शुरुआत देर से की तथा राहुल गांधी एवं प्रियंका वाड्रा व उनके रणनीतिकारों के कारण टिकट बंटवारे तक नेता पार्टी छोड़कर जाते रहे। हिमंतो विस्वासरमा के पूर्व कांग्रेसी होने के कारण उन नेताओं का सीधा संपर्क भी रहा इसलिए उन्हें भाजपा में शामिल होने में समस्या नहीं आई। दूसरे, भाजपा ने पिछले लंबे समय से असम अस्मिता व आसामी संस्कृति को भारत के व्यापक हिंदुत्व संस्कृति और राष्ट्रभाव से जोड़ने में सफलता पाई है। मुगलों से युद्ध करने वाले लचित बरफ़ुकन से लेकर महाराज शंकर देव को जिस तरह भाजपा ने प्रस्तुत किया एवं जनजाति गौरव को निचले स्तर तक ले गए उन सबसे सामाजिक सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ है। सरकार की आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा नीति ने उसे बल दिया है। हिमांतो की छवि देश में भले घुसपैठी और मुस्लिम विरोधी बनाई गई किंतु इसके साथ असम में उन्होंने बच्चों व युवाओं के मामा और महिलाओं के भाई के रूप में भी छवि बनई है। गौरव गोगोई के प्रति अहोम समुदाय का आकर्षण तो था किंतु राज्यव्यापी लोकप्रियता हिंमातों की ही थी। जमीनी कार्यों उदाहरण के लिए तीन लाख चाय बागान मजदूरों के परिवारों को जमीन का पट्टा मिलना महत्वपूर्ण घटना थी। अंग्रेज उन्हें काम पर ले गए, उन्हें जमीन का पट्टा नहीं दिया। असम में घुसपैठ लंबे समय से मुद्दा रहा है और इसके आधार पर वहां 80 के दशक में छात्र नेताओं की सरकार बनी। तो यह मुद्दा समाप्त नहीं हो सकता और बाकी पार्टियों ने इसका उपहास उड़ाया और भाजपा आज भी इस पर कायम है। इन सबका असर हुआ है और भाजपा तीसरी बार सत्ता बनाए रखने में कामयाब रही।

तमिलनाडु के परिणामों की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। थलापति विजय की टीवीके या तमिलगा वेत्री कझगम दोनों मुख्य गठबंधन द्रमुक नेतृत्व वाला आईडिया तथा अन्य धार्मिक भाजपा गठबंधन नंबर एक की पार्टी बन जाएगी इसकी भी कल्पना किसी को नहीं थी। दरअसल, द्रमुक के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान जमीन पर दिख रहा था। इसी कारण एमके स्टालिन ने एक तिहाई विधायकों का टिकट काटा। वहां जहरीली शराब पीने से मृत्यु की घटनाएं लगातार हुई और पिछले चुनाव में उन्होंने महिलाओं के समक्ष शराबबंदी लागू करने का वादा किया था। लागू नहीं करने से महिलाओं में नाराजगी थी। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी थे और दो मंत्री जेल जा चुके थे। उन्होंने तमिलवाद और तमिल भाषा को लेकर आक्रामक राजनीति की। पूरी पार्टी और कांग्रेस को छोड़कर गठबंधन सनातन और हिंदुत्व के विरुद्ध जहर उगलने लगी। विधानसभा में अलग से तमिल राष्ट्रगान तक की परंपरा शुरू कर दी। सब अपनी सत्ता बचाने की ही कवायदें थीं। आम लोगों को इस तरह का अतिवाद स्वीकार नहीं था और द्रमुक को इसका आभास हुआ। चुनाव आते-आते सनातन विरोधी वक्तव्य बंद हो गए और उदयनिधि स्टालिन जो एक समय सनातन के समूल नाश की बत करते थे मंदिर -मंदिर घूमने लगे। अन्नाद्रमुख और भाजपा गठबंधन यद्यपि बेहतर चुनाव लड़ी और मटन एवं सीट और सीटों में हुए प्रमुख गठबंधन से आगे हैं पर सत्ता विरोधी जन असंतोष और लोगों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने में सफल नहीं रहे और इसका लाभ विजय को मिला। वैसे भी भाजपा वहां केवल 27 सीटों पर लड़ रही थी। विजय फिल्मी करियर छोड़कर तमिलनाडु की राजनीति बदलने की घोषणा के साथ आए और 2024 में पार्टी बनाने के बाद लगातार सक्रिय रहे। यद्यपि उन्होंने दोनों पक्षों का मत काटा किंतु प्रमुख को ज्यादा क्षति पहुंचाई। ईसाई होने के कारण लगभग चार प्रतिशत ईसाइयों के मत का बड़ा हिस्सा उनके खाते आया और मुस्लिम मतों का भी। यहां से तमिलनाडु की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो रही है और एमजी रामचंद्रन के बाद विजय दूसरे बड़े फिल्म स्टार होंगे जिनके राजनीति में लंबे समय तक रहने की संभावना है।

 केरल में प्रति पांछ वर्ष पर सरकार बदलती रही है। किंतु राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के दुर्बल व दिशाहीन होने के कारण प्रदेश में भी पार्टी प्रभावित हुई और माकपा के बुजुर्ग पी विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा 2021 में भी दूसरी बार सत्ता कायम रखने में कामयाब हुई थी। भाजपा ने वहां खूब काम किया,  जमीनी मुद्दे उठाए, धार्मिक प्रवृत्ति को देखते हुए लोगों की इच्छा को वाणी भी दी। इन सबके परिणामस्वरूप उसके जनाधार में उछाल आया, 2024 में त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत तथा तिरुवनंतपुरम के नगर निगम पर आधिपत्य इसका प्रमाण है। कुछ वर्ष पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। किंतु अभी प्रदेश में व्यापक जनाधार और चुनावी सफलता की दृष्टि से यह कम है। हालांकि भाजपा के कारण मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा या यूडीएफ के पक्ष में हुआ।

तो कुल मिलाकर इन परिणामों का भी निष्कर्ष यही है कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से काफी बदल चुका है। भारत के लोगों के लिए भाजपा अभी भी व्यक्तिगत - आंतरिक व राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंदुत्व अभिप्रेरित व्यापक राष्ट्रवाद तथा, क्षेत्रीय अस्मिता को सकारात्मक महत्व देने वाली, आर्थिक विकास के प्रति प्रतिबद्ध, विरासत के संरक्षण तथा  सामाजिक न्याय व लैंगिक समानता को सही परिप्रेक्ष्य में जमीन पर उतरने वाली पार्टी के रूप में मुख्य विकल्प बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्वमें 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम से यह मिथक टूटा था कि बगैर मुस्लिम मत के केंद्र में किसी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिल सकता। बंगाल के चुनाव परिणाम ने इस मिथक को अंतिम बार ध्वस्त कर दिया।




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मंगलवार, 5 मई 2026

LNJP कॉलोनी में 20 मिनट में मिली दूसरी लाश, छत से बरामद हुई सड़ी हालत में डेडबॉडी; गर्मी से मौत की आशंका, पुलिस जांच में जुटी

असलम अल्वी

नई दिल्ली, 5 मई 2026। LNJP कॉलोनी में मंगलवार देर रात *20 मिनट के अंदर दूसरी लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। पहली लाश राम लीला मैदान के सामने मिली, जबकि दूसरी लाश एक मकान की छत से सड़ी-गली हालत में बरामद हुई। भीषण गर्मी के बीच हुई इन मौतों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या है पूरा मामला:
1. पहली लाश: देर रात LNJP कॉलोनी स्थित राम लीला मैदान के सामने एक व्यक्ति का शव मिला। स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।
2. दूसरी लाश - छत पर: पहली घटना के सिर्फ 20 मिनट बाद एक मकान की छत से सड़ी हालत में लाश बरामद हुई। शव कई दिन पुराना बताया जा रहा है। 
3. पड़ोसी का बयान: छत से लाश मिलने के बाद एक पड़ोसी के मुंह से "हैरान करने वाली बात" निकली, जिससे पुलिस को शक है कि मामला सिर्फ गर्मी से मौत का नहीं है। पुलिस पड़ोसी से पूछताछ कर रही है।

गर्मी बनी वजह या कुछ और? - दिल्ली में पारा 45°C पार कर चुका है। शुरुआती आशंका है कि दोनों मौतें *हीट स्ट्रोक* से हुई हों। लेकिन छत से मिली लाश की हालत और पड़ोसी के बयान के बाद *हत्या या अन्य एंगल* से भी जांच की जा रही है। 

दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया: "दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। छत वाली लाश 4-5 दिन पुरानी लग रही है। PM रिपोर्ट के बाद ही मौत की असली वजह पता चलेगी। फिलहाल इलाके में पूछताछ जारी है।"

इलाके में दहशत: LNJP कॉलोनी में 20 मिनट में 2 लाश मिलने से लोग दहशत में हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि गर्मी में बेघर-लावारिस लोगों की मौत का खतरा बढ़ गया है। 

नोट:  पुलिस जांच जारी है। मौत की असली वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद साफ होगी। अफवाहों से बचें।_
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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

रिकार्ड मतदान के मायने

अवधेश कुमार 

भारतीय चुनाव में जो कभी नहीं हुआ वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अभी तक 92.86 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड हुआ है। तमिलनाडु का भी लगभग 85% मतदान एक रिकॉर्ड है।अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि होगी। पूर्वोत्तर राज्यों में मतदान प्रतिशत औसत से अधिक रहा है किंतु वहां भी केवल 2018 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 91.4% मतदान हुआ था। बंगाल में 2011 से मतदान औसत से ज्यादा रहा। 2011 में 84.5%, 2016 में 82.56% और 2021 में 81.56% मतदान हुआ। वैसे 2010 के बाद से मतदान में वृद्धि देशव्यापी प्रवृत्ति रही है। मतदान अंकगणित का विषय है लेकिन इसकी परिणति राजनीतिक होती है और उनके मायने राजनीति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम तक जाते हैं। बंगाल का दूसरा चरण अभी बाकी है इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने हुए माहौल का संकेत यही है की मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला और यहीं संकेत भी छिपा हुआ है। 2010 के पहले सामान्य मतदान में वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी या घटकों की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में यह प्रवृत्ति बदल गई। मतदान बढ़ाने के बावजूद सरकारें वापस आती रही और मतदान घटना पर भी कई सरकारें गईं। इसलिए सामान्यत: मतदान का प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने या इसके विपरीत राजनीति परिणाम का निश्चयात्मक संकेत नहीं माना जा सकता।

बंगाल में 2011 में 84.5 प्रतिशत का रिकार्ड मतदान हुआ और वामपंथी मोर्चे की 34 वर्षों की स्थापित सरकार चली गई। उसके बाद मतदान प्रतिशत थोड़ा-थोड़ा घटा किंतु ममता वापस आती रहीं। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान या एसआईआर की प्रक्रिया के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत संतोषजनक होगा। पिछले वर्ष बिहार के चुनाव में 67.25% मतदान हुआ जो 2020 के 57.29 प्रतिशत से 9.96% ज्यादा था। बिहार में लगभग 65 लाख नाम एसआईआर की प्रक्रिया में हटाए गए थे। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं का नाम सूची से हटा।  कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई हुई है और न्यायिक प्राधिकरणों को फैसला करना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ रह गई। यह सच नहीं है कि प्रतिशत ज्यादा होते हुए भी कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढी। पिछले चुनाव से लगभग 26 लाख ज्यादा मतदाताओं ने मतदान किया। भारी संख्या में मृतक, दूसरे जगह चले गए या दो जगह नाम वाले या कुछ फर्जी नाम मतदाता सूची में थे और उनके नाम मतदान होते थे जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी। इनके नाम पर कितने वोट डाले गए इसकी गणना कोई नहीं कर सकता। अगर 6.77 करोड़ मतदाताओं के आधार पर पिछला मतदान होता तो मतदाताओं की संख्या कम होती और इस बार वृद्धि बहुत ज्यादा होती। इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

2011 में ममता बनर्जी ने लगभग 5 वर्षों के अनवरत संघर्ष और आक्रामकता से मतदाताओं में वाममोर्चा सरकार के विरुद्ध गुस्सा एवं आलोड़न पैदा किया था। वाम मोर्चा समर्थक भी उनके साथ आये और तृणमूल का अपना भी आधार खड़ा हुआ। जब से भाजपा ने बंगाल में अपनी विचारधारा और राजनीति को जमीन पर उतारने का अभियान चलाया ममता के विरुद्ध समाज के निचले स्तरों पर जबरदस्त आलोड़न है और कुछ महीनो में 2011 पूर्व की स्थिति ममता एवं भाजपा के संदर्भ में उल्टी है। ममता समर्थक और विरोधी तथा भाजपा समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में स्वयं और अपने मतदाताओं को ज्यादा संख्या में मतदान केन्द्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। 2019 लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम दिखा जब भाजपा ने 40% मत के साथ राज्य 18 सीटें जीत ली। 2018 पंचायत चुनाव में भी जबरदस्त आलोड़न था और संकेत मिल गया कि भाजपा जमीन पर नीचे तक पहुंची है तथा राज्य से कांग्रेस और वाम दलों का लगभग सफाया हो चुका है। भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की लहर  भारत में देखा गया है। 2021 में भी भाजपा ने वातावरण बनाने की कोशिश की पर तब तीन सीटों से बहुमत के 148 तक पहुंचना बंगाल के सामाजिक - सांप्रदायिक समीकरणों में कठिन था। इसलिए लगभग 38% मत के साथ हुआ 77 सीटों तक पहुंच पाये। कोरोना महामारी के कारण बनाए गए सरकार विरोधी माहौल का भी थोड़ा असर हुआ। बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा आम लोगों के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। चुनावी रैगिंग या धांधली प्रदेश का स्वाभाविक चरित्र पिछले 60 सालों में बना रहा है। कांग्रेस फिर वाम दल और  तृणमूल कांग्रेस ने भी इस प्रवृत्ति को ज्यादा निष्ठुरता से कायम रखा।

इस बार मतदाताओं का बड़ी संख्या में निकलने का एक प्रमुख कारण मतदान और बाद में के लिए दिखता सुरक्षा आश्वासन था। पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 2407 कंपनी, 2193 क्विक रिस्पांस टीम व 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां कुछ कुछ समस्या हो रही थी मतदान के पहले से ही केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे। मतदान के दौरान जहां भी समस्या आई सुरक्षा बल ज्यादातर पहुंचे। इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर के एक भाजपा उम्मीदवार को लोगों द्वारा खदेड़ने और पकड़ कर पिटाई करते वीडियो देखने से अनुमान लग जाता है कि मतदान कैसे भय और आतंक के वातावरण में होता रहा। सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही हिंसा में भी रिकार्ड कमी आई। मतदान बाद निश्चित समय तक केंद्रीय बलों की उपस्थिति के निर्णय ने भी मतदाताओं में सुरक्षा भाव पैदा किया। 2021 उसके पहले 2019 और 2018 तीनों चुनावों में मतदान बाद की हिंसा और लोगों के पलायन से भय का माहौल बना था। चुनाव अभियान के बीच प्रदेश की यात्रा करने वालों को 2026 में माहौल में बदलाव दिख रहा था। मतदाता धीरे -धीरे खुलकर अपना मत प्रकट करने लगे थे। लंबे समय बाद मतदान हत्याविहीन, न्यूनतम हिंसा और निर्भयता के वातावरण में संपन्न हुआ है। निस्संदेह, परिणाम में भी यह दिखाई देगा।

 ममता और समर्थकों की आक्रामकता का जवाब भाजपा ने भी प्रति आक्रामकता से दिया। गृह मंत्री अमित शाह तक के भाषणों में भी आक्रामकता थी ताकि उनके समर्थक मतदाता भयरहित होकर मतदान के लिए निकलें और आक्रमण होतो उसका प्रतिकार करें या सुरक्षा बलों तक सूचना पहुंचाएं। ममता ने अपनी शैली में हमलावर प्रचार किया और यहां तक कहा कि किसी कार्यकर्ता के साथ कार्रवाई होगी तो सरकार उसके साथ खड़ी ही नहीं रहेगी बल्कि कुछ संस्थाओं के मामले में यहां तक कहा कि उसको हम सरकारी नौकरी दे देंगे। पहले भी ममता उन सबकी रक्षा में सामने दिखीं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार या अपराध के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों ने कार्रवाई की। इसका असर उनके घोर समर्थकों पर था। देश भर में आम मुसलमान भाजपा के विरुद्ध मतदान करता है और उनकी संख्या कहीं कहीं शत-प्रतिशत तक चली जाती है। बंगाल में उनकी आबादी 29  से 30 प्रतिशत के बीच होगी। वे भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मतदान करने निकले ही होंगे। उसकी प्रतिक्रिया में गैर मुस्लिम समुदाय भी निकले हैं जो टीवी कैमरों पर दिख रहे थे। मुर्शिदाबाद , मालदा, दक्षिण दिनाजपुर आदि जिलों में निकले मतदाता गवाही दे रहे थे कि दोनों पक्षों में करो या मरो का भाव पैदा हो चुका है। जिलों के हिसाब से देखें तो दक्षिण दिनाजपुर में 95.4% , मालदा में 94.43%, मुर्शिदाबाद में 93.58%, उत्तर दिनाजपुर में 94.15%, अलीपुरद्वार में 92.69% , झारग्राम में 92.5%, पश्चिम मेदिनीपुर में 92.118% , बांकुरा में 92.5 0%, पूर्वी मेदिनीपुर में 91.20 प्रतिशत, तथा कूच बिहार में सबसे अधिक 96% मतदान हुआ है। इस दौर में सबसे कम कालिमपोंग में 83.07 प्रतिशत , दार्जिलिंग में 88.80 प्रतिशत, पश्चिम वर्धमान में 90.33% तथा पुरुलिया में 90.91% मतदान हुआ। साफज् है कि जहां एक पक्ष कम रहा वहां मतदान प्रतिशत कम हुआ और दार्जिलिंग, कालिमपोंग आदि इसके उदाहरण हैं।

बंगाल को समझने वाले स्वीकार करेंगे कि तीन लगातार कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान का भी वोट है तथा बदलाव के लिए निकलने वाले मतदाताओं के भी  संख्या है। यह बताने की आवश्यकता नहीं की इन मतदाताओं ने किसके चुनाव चिन्ह पर बटन दबाया होगा। ममता और तृणमूल के राज में सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थी तत्व तथा विरोधियों के विरुद्ध सत्ता व प्रशासन के भयानक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अपराध खासकर संदेशखाली व आरजी कर जैसी महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराध घटनाएं भी सामने है,  दंगों के दौरान प्रशासन की भूमिका, एक समय का संपन्न और उद्योगों तथा कारोबार के मामले में देश के अगुआ राज्य का पीछे होना और संपूर्ण आर्थिक स्थिति पर इसके नकारात्मक असर के कारण भी असंतोष दिखाई दे रहा है। भाजपा ने इन सबको मुद्दा बनाया। इस तरह रिकार्ड मतदान के पीछे इन समस्त कारकों की सामूहिक भूमिका रही।

वैसे इन 152 सीटों का पिछला अंकगणित देखें तो तृणमूल ने 92 में से 83 पर सीधे भाजपा, पांच पर कांग्रेस और तीन पर माकपा  तथा एक पर भाजपा की सहयोगी और झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आशु को हराया था। ‌इनमें से तीन दांतन,तमलुक और जलपाईगुडी में जीत का अंतर एक हजार से कम और नौ पर एक से पांच हजार का था।‌ कुल मिलाकर इनमें से 23 पर जीत का अंतर 10 हजार से कम था। इनसे ज्यादा एस आई आर में नाम कट गये। एसएआर में औसत प्रतिशत 28, 055 नाम हटे हैं । इस तरह मतदान में वृद्धि का चुनाव परिणाम के संदर्भ में पूर्व आकलन किया जा सकता है।

प्रस्तुतकर्ता Musarrat Times Hindi News pepar पर 1:47 am कोई टिप्पणी नहीं:
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