शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

आर्थिक आधार पर आरक्षण का सच

बसंत कुमार

एक दिन एक वीडियो वायरल हुई जिसमें एक गरीब ब्राह्मण का घर दिखाया गया और घर देखकर लग रहा था कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी अगर घर के मुखिया को मनरेगा के तहत रोजगार दे दिया गया होता तो उस घर में बच्चे अच्छे से पल जाते पर ऐसा नहीं हुआ। इस वीडियो के अंत में संचालक ने ब्राह्मण परिवार की इस दुर्दशा के कारण प्राकृतिक संसाधनों के असामान्य वितरण, गरीबी उन्मूलन और बेरोजगारी के लिए सरकारों की लापरवाही को जिम्मेदार न ठहराते हुए डॉ. आंबेडकर के संविधान और दलित और आदिवासियों के लिए आरक्षण को दोषी ठहरा दिया। ऐसा लगता है कि जब से देश आजाद हुआ और पूना पैक्ट के कारण देश में आरक्षण लागू हुआ तब से ही अनेक सवर्ण समाज के लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। मानो आरक्षण से पहले भारत सोने की चिड़िया था और यहां कोई गरीब नहीं था।

दलित और आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षण के विरोधी एक सुर से कहते है कि आरक्षण जाति के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए। जबकि आरक्षण शदियों से शोषित घृणित उपेक्षित समाज को मुख्य धारा में ले आने के उद्देश्य से किया गया। पर बार बात उठती आर्थिक आधार पर उठ रही मांगो को ध्यान रखते हुए केंद्र सरकार ने सवर्ण समाज के गरीब लोगो के लिये सरकारी नौकरियों में 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण की व्यवस्था कर दी, पर हो यह रहा है कि ईडब्ल्यूएस की पात्रता की आय सीमा 8 लाख रुपये की सीमा को धता बताकर सवर्ण समाज के करोड़पति और अरबपति लोग इस कोटे को लूट रहे हैं। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा 2025 के आधार पर एक खुलासा हुआ है कि कोठियों में रहने वाले 10-10 गाड़ियों के मालिकों के बच्चे जुगाड से ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र बनवा ले रहे हैं और गरीब सवर्णों का हक मार रहे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी जिसका शीर्षक था इंग्लिश मीडियम। इस फिल्म में नायक ईडब्ल्यूएस सीट पर एक नामी स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए अपनी कोठी छोड़कर एक झोपड़ पट्टी में रहने को मजबूर होता है और वह झोपड़ पट्टी में रहने वाले गरीब का हक मारकर अपने बच्चे का एडमिशन कराने में सफल हो जाता है, यह कहानी फिल्मों में नहीं हकीकत में होती है, जब से सरकार ने हर पब्लिक स्कूल में 25% सीटें ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के बच्चों द्वारा भरा जाना आवश्यक कर दिया है तब से दिल्ली में यह देखने में आया है कि ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के बच्चों की आरक्षित सीटों पर ग्रेटर कैलाश, साउथ एक्सटेंशन, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी जैसे पॉश इलाकों में रहने वाले लोगों के बच्चों को प्रवेश मिल जाता है। देश का रेवेन्यू कार्यालय इतना भ्रष्ट हो चुका है कि लेखपाल और कानूनगो की मुट्ठी गरम कर देने से एक करोड़पति ईडब्ल्यूएस का सर्टिफिकेट प्राप्त कर लेता है, गरीबों को आरक्षण की बात करने में बहुत अच्छा लगता है पर देश के भ्रष्ट सिस्टम में अमीरों को तो गरीब होने का प्रमाण पत्र तो मिल जाता है पर जो वास्तव में गरीब है उन्हें यह प्रमाण पत्र नहीं मिल पाता।

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विस परीक्षा 2025के बारे में एक रिपोर्ट आई की कैसे करोड़पतियों के बेटा बेटी ईडब्ल्यूएस कैटेगरी में आरक्षण का लाभ उठाकर आईएएस, आईपीएस या अन्य सेवा में चयनित हो जाते हैं। इस रिपोर्ट में ईडब्ल्यूएस कोटे में चयनित 104 उम्मीदवारों में से कई संपन्न विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि में से है। इस रिपोर्ट में सभी सफल 104 उम्मीदवारों की आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण किया गया है।

  • ईडब्ल्यूएस कोटे से चयनित 104 उम्मीदवारों में से 84 ने सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी के लिए औपचारिक कोचिंग की थी और 67 उम्मीदवारों ने दिल्ली के महंगे और जाने माने संस्थानों से पढ़ाई की।
  • इनमें से 46 उम्मीदवार प्रतिष्ठित निजी स्कूलों से पढ़े थे जहां पर लाखों रुपए में फीस जाती है।
  • 28 उम्मीदवारों के माता पिता का अपना अच्छा खासा बिजनेस था और 10 उम्मीदवार कॉर्पोरेट या मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर चुके हैं।
  • लगभग 11 उम्मीदवार आईआईटी या एनआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों से ग्रैजुएट है।
ईडब्ल्यूएस कोटा के तहत लाभ पाने के लिए परिवार की सकल वार्षिक आय 8 लाख वार्षिक से कम होनी चाहिए इसके अलावा कृषि भूमि 5 एकड़ से कम और आवासीय फ्लैट 1000 फीट से कम और संपत्ति के दायरे तय किए जाते हैं। पर आलोचकों और जानकारों का तर्क है कि 8 लाख रुपए की आय सीमा बहुत व्यापक है, जिससे उन परिवारों के बच्चे इसका लाभ ले पा रहे हैं जिनके पास महंगी शिक्षा और संसाधन जुटाने के पर्याप्त साधन है और जमीनी स्तर पर सबसे गरीब व्यक्ति तक इसका वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।
बड़ी विडंबना यह है कि सभी प्रकार के आरक्षण एससी/एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस जिन लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए बनाए गए थे उनको नहीं पहुंच पा रहे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण के मामले में यह देखा गया है कि कुछ लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं कुछ मामलों में शिकायत भी हुई पर हमारे देश की जांच प्रक्रिया और न्याय प्रक्रिया इतनी सुस्त है कि लोग फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर पाई हुई नौकरी पूरी कर लेते हैं पर उनके खिलाफ शिकायत की जांच पूरी नहीं हो पाती। इस विषय में पूर्व आई ए एस और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगा का उदाहरण ज्वलंत है उनके एस टी स्टेट्स के खिलाफ दशकों पहले शिकायत आई पर जांच प्रक्रिया इतनी सुस्त रहीं कि वे आई ए एस भी बन लिय और राजनेता के रूप में अच्छी पारी खेल ली पर उनके खिलाफ शिकायत की जांच नहीं हो पाई। दूसरा मामला वर्ष 2014 में जौनपुर मछली शहर लोक सभा सीट से सांसद चुने गए राम चरित्र निषाद का है वे बस्ती के निषाद ओबीसी थे पर दिल्ली से फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर मछली शहर सुरक्षित सीट से सांसद बने इसकी शिकायत हुई पर इसका निपटारा नहीं हो पाया और वे सांसद के रूप में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके थे। कहने का अभिप्राय यह है कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान उस वर्ग के लोगों को मुख्यधारा में लाया जाए पर इसका लाभ उस वर्ग के आम लोगों को न मिलकर उस वर्ग के धनाढ्य लोगों को मिल रहा है।
आजकल प्रायः यह देखने को मिलता है कि यदि किसी सवर्ण व्यक्ति की आर्थिक स्थिति दयनीय है तो इसके लिए दलित और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण को दोषी ठहराया जाता है जबकि गरीब हर समाज में पाए जाते हैं और इसके लिए सरकार का गरीबी उन्मूलन के लिए उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण है और प्राकृतिक संसाधनों और जमीन का अनुचित विवरण है। इसके लिए हजारों वर्षों से उपेक्षित और तिरष्कृत समाज की मुख्य धारा में लाने के उद्देश्य से दिया गया आरक्षण नहीं है। इसलिए लोगो की हर समस्या का निदान आरक्षण समाप्त किए जाने में नहीं खोजना चाहिए, वैसे भी आरक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी उन्मूलन नहीं बल्कि हजारों वर्षों से उपेक्षित लोगो के प्रतिनिधित्व का है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

नंदन नीलेकणी: इंफोसिस से आधार तक, और अब परीक्षा सुधार

विवेक शुक्ला

 नंदन नीलेकणी फिर राजधानी वापस लौट रहे हैं। फिर उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है। पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दी थी और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें परीक्षा व्यवस्था सुधारने वाले उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का अध्यक्ष बना दिया है। पेपर लीक, छात्रों की चिंता और परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच यह जिम्मेदारी उन पर आई है। लेकिन नीलेकणी के लिए यह कोई नई बात नहीं। वे पहले भी बड़े-बड़े काम हाथ में ले चुके हैं और हर बार सिस्टम को थोड़ा बेहतर छोड़ गए हैं।

ये बात करीब चार-पांच साल पहले की है। दिल्ली के बंगाली मार्केट में एक प्रमुख मिठाई की दुकान के बाहर 15-20 लोग किसी व्यक्ति को घेरे खड़े थे। सब ऑटोग्राफ मांग रहे थे। वो शख्स विनम्रता से मना कर रहा था। वो नंदन नीलेकणी ही थे। दुकान के मालिक आज भी कहते हैं कि सज्जनता और विनम्रता में उनका कोई सानी नहीं। शाम को जब शहर की भीड़ थोड़ी थमती, वे कभी-कभी पेंट-शर्ट में दोस्तों के साथ वहां दिख जाते। बिना सुरक्षा के।  दिल्ली के जायके उनके लिए कोई शौक नहीं, बल्कि पुरानी यादें थीं उस शहर की जहां उन्होंने एक बार पूरा भारत बदलने का फैसला किया था।

नीलेकणी का बचपन स्थिर नहीं रहा। पिता मोहन राव नीलेकणी मैसूर और मिनर्वा मिल्स के जनरल मैनेजर थे, फैबियन समाजवादी विचारों वाले। मां दुर्गा घर संभालती थीं। पिता की नौकरी में बार-बार तबादले होते रहे। बारह साल की उम्र में वे धारवाड़ में चाचा के पास चले गए। वहीं उन्होंने आत्मनिर्भर होना सीखा। पढ़ाई बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, सेंट जोसेफ हाई स्कूल धारवाड़ और कर्नाटक कॉलेज में हुई। फिर आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग। वहां वे औसत छात्र थे, लेकिन क्विज टीम के सितारे और सोशल लीडर। एक क्विज में ही रोहिणी से मुलाकात हुई। 1981 में शादी हो गई। उनके दो बच्चे हैं-निहार और जान्हवी।

करियर की शुरुआत 1978 में पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से हुई। वहीं एन.आर. नारायण मूर्ति से दोस्ती हुई। 1981 में सिर्फ 250 डॉलर की पूंजी लेकर नीलेकणी, मूर्ति और पांच और साथियों ने इंफोसिस खड़ा किया। कंपनी ने भारत को ग्लोबल आईटी हब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 2002 से 2007 तक नीलेकणी सीईओ रहे। उनके समय में इंफोसिस अरबों डॉलर का कारोबार छू गई। 2009 में उन्होंने कंपनी छोड़ दी और सार्वजनिक जीवन में कदम रखा।

सबसे बड़ा काम आधार था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें बुलाया। यूआईडीएआई के संस्थापक अध्यक्ष बने, कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। जुलाई 2009 में दिल्ली आए। पहले होटल या दोस्तों के घर, फिर कर्नाटक भवन, बाद में 2 सफदरजंग लेन का बंगला। औपनिवेशिक स्टाइल का सफेद बंगला, बगीचे में मोर घूमते। पास ही इंदिरा गांधी का घर। हफ्ते में तीन रात दिल्ली, बाकी बेंगलुरु में परिवार के साथ। ऑफिस में फाइलों का अंबार, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात, गृह मंत्रालय की आपत्तियां, प्राइवेसी के सवाल। फिर भी वे कहते“मैं प्लंबर हूं, सरकार की पाइपलाइन ठीक कर रहा हूं।” आधार ने एक अरब से ज्यादा भारतीयों को बायोमेट्रिक पहचान दी। फर्जी लाभार्थी हटे, सरकारी खजाने में हजारों करोड़ बचे, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर आसान हुआ। यूपीआई, डिजिलॉकर जैसी चीजें उसी सोच से निकलीं। आलोचनाएं आईं, लेकिन उन्होंने गोपनीयता और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए काम आगे बढ़ाया।

दानवीरता भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। 2017 में पत्नी रोहिणी के साथ बिल गेट्स की गिविंग प्लेज पर हस्ताक्षर किए। संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा समाज के लिए देने का वादा। आईआईटी बॉम्बे को सैकड़ों करोड़ दे चुके हैं। रोहिणी भी बड़े पैमाने पर परोपकार करती हैं। दोनों शिक्षा, जलवायु और सुशासन पर काम करते हैं।

नीलेकणी राजनीति में भी गए। 2014 में कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु साउथ से चुनाव लड़ा, हार गए। फिर तकनीक और सार्वजनिक सेवा पर लौट आए। 2017 में इंफोसिस के संकट में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष बनकर कंपनी को संभाला। जी-20 में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष भी रहे।

अब फिर दिल्ली लौट रहे हैं। जिम्मेदारी बदली है, शहर वही है। परीक्षा सुधार का टास्क फोर्स। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के विवाद, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य की चिंता के बीच। टास्क फोर्स में पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास निदेशक वी. कामाकोटी जैसे लोग हैं। नीलेकणी जानते हैं कि सिर्फ सजा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। सिस्टम डिजाइन मजबूत करना होगा।पारदर्शी, तकनीक-आधारित और भरोसेमंद।

दोनों सरकारों ने उन्हें चुना। मनमोहन सिंह के समय कांग्रेस थी, अब मोदी के समय एनडीए। लेकिन नीलेकणी हमेशा टेक्नोक्रेट ही रहे। विशेषज्ञ। वे कहते हैं कि असमानता बढ़ रही है, युवा चिंतित हैं। इसलिए दीर्घकालिक, रणनीतिक दान पर जोर देते हैं। उनकी जिंदगी मध्यवर्गीय घर से वैश्विक मंच तक की है, लेकिन जमीनी समस्याएं कभी नहीं छोड़ीं।

आज जब भारत डिजिटल महाशक्ति बनने की बात करता है, नीलेकणी उस रास्ते के पथप्रदर्शक हैं। इंफोसिस से आधार, दान से परीक्षा सुधार-हर जगह राष्ट्रहित को आगे रखा। उनका व्यक्तित्व विनम्र, गहरा सोचने वाला और समस्या सुलझाने वाला है। बड़े प्रोजेक्ट लेते हैं-एक अरब लोगों की पहचान हो या परीक्षा व्यवस्था लीक-प्रूफ बनाना। तकनीक और करुणा के मेल से बदलाव संभव है, यही उनका संदेश है।

राजधानी की शामों में जब बंगाली मार्केट की रोशनी जलती है, तो लगता है कुछ कहानियां शहर के साथ चलती रहती हैं। कभी आधार की, कभी परीक्षा सुधार की। और उनके बीच एक आदमी जो दोनों को जोड़ता है। नाम आप जानते ही हैं। उनकी कहानी अभी जारी है। और भारत उनका ऋणी है।

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