मंगलवार, 28 जुलाई 2026

बाढ़ का कैसे मुकाबला करता भारत

विवेक शुक्ला

एक बार फिर से देश के कई राज्य इस वक्त बाढ़ की चपेट में हैं। जान-माल का नुकसान भी हुआ है। लोग अपने घरों से बाहर निकलकर राहत शिविरों में आश्रय लिए हुए हैं। लेकिन अच्छी बात यह रही कि बचाव और राहत कार्यों में बड़ी ही तत्परता से सेना, नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ), स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एसडीआरएफ), फायर और इमरजेंसी सर्विस के जवान तैनात हो गए और बाढ़ प्रभावित इलाकों में नुकसान न्यूनतम हुआ।

असम में बाढ़: एक नियमित चुनौती -  वैसे असम में बाढ़ की यह स्थिति हर साल बनती है। लाखों लोग प्रभावित होते हैं। बाढ़ यहां के जीवन का एक नियमित हिस्सा बन गई है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बाढ़-संभावित क्षेत्र में आता है, क्योंकि यह ब्रह्मपुत्र नदी की जद में है और हिमालय से निकलने वाली 50 से ज्यादा सहायक नदियां इसमें आकर मिलती हैं। हालांकि यह एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन इससे बचने का या न्यूनतम नुकसान की एक मजबूत व्यवस्था देश में उपलब्ध है।

आपदा प्रबंधन का मजबूत इकोसिस्टम - आप इतना तो मानिए कि इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिन्होंने आपदा प्रबंधन का एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है, जो वैश्विक मानदंडों पर न सिर्फ खड़ा उतरता है, बल्कि दुनिया के कई देशों को नेतृत्व भी प्रदान कर रहा है। आज भारत आपदा प्रबंधन की ग्लोबल रैंकिंग में विश्व के श्रेष्ठ 6 देशों में शामिल हो गया है। भारत में प्राकृतिक आपदा से नुकसान कुल जीडीपी का केवल 0.45 प्रतिशत होता है।

पिछले दो दशकों के आंकड़े: सुधार की कहानी - पिछले दो दशकों के आंकड़े देखें तो स्पष्ट होता है कि हर साल देश के आपदा प्रबंधन में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है। 2013-14 में जहां प्राकृतिक आपदा से 5,677 लोगों की मौतें हुई थीं, वहीं 2024-25 में 3,080 लोगों की मौतें हुईं। इसी तरह से मवेशियों का सबसे ज्यादा नुकसान 2006-07 में हुआ जब यह आंकड़ा 4.55 लाख तक पहुँच गया। 2023-24 में यह आंकड़ा 1.19 लाख रहा। 2007-08 में प्राकृतिक आपदा से 35 लाख से ज्यादा घर प्रभावित हुए, जबकि 2023-24 में 1.4 लाख घरों को इन्हीं आपदाओं से नुकसान हुआ। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि तैयारी, समन्वय और त्वरित प्रतिक्रिया की क्षमता में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

देश में आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की है, और वह लगातार कह रहे हैं कि भारत प्राकृतिक आपदाओं से शून्य मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है। वह केवल भौतिक उपायों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के उपायों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।

वैश्विक नेतृत्व और संस्थागत ढांचा - भारत को इस समय आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन में क्षमता निर्माण, गति, दक्षता और सटीकता के कई मानदंड स्थापित किये हैं। इस समय राज्यों के हर जिले में आपदा प्रबंधन योजना तैयार की जा रही है। हर प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कार्य योजना तैयार की जा रही है। इसी का परिणाम है कि भारत कई आपदाओं में शून्य मानवीय जान के नुकसान की उपलब्धि हासिल कर पाया है। चक्रवातों से न्यूनतम नुकसान से निपटने का रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि किस तरह केंद्र, राज्य और स्थानीय इकाइयां मिलकर बड़ी सफलताएं हासिल कर सकते हैं। मोदी सरकार ने नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए), नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) के बेहतरीन ढांचे खड़े कर दिए हैं।

नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) की तत्परता और कार्यकुशलता का प्रमाण हमने कई बार देख लिया है। इस बल ने अब तक खतरे में फंसे 1,68,000 से ज्यादा लोगों की जान बचाई। फंसे हुए 8,50,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया और 2024 में रिकॉर्ड 1,038 ऑपरेशन किए। मानसून आने से पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों को किसी भी संभावित आपदा से निपटने की व्यवस्था मजबूत करने का दिशा निर्देश दे दिया था। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाली एक एकीकृत प्रणाली भी एक्टिव कर दी गई थी। अर्ली वार्निंग सिस्टम से जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को विशेष कर जोड़ा गया।

उत्तर प्रदेश और बिहार में सतर्कता - केवल मानसून की बात करें तो असम के साथ-साथ भारत में बाढ़ की सबसे ज्यादा आशंका वाले क्षेत्र उत्तर प्रदेश को माना जाता है। बिहार भी सबसे ज्यादा जोखिम वाला राज्य माना जाता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 7.34 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आती है तो बिहार के कुल 73 प्रतिशत हिस्से पर बाढ़ का खतरा बना रहता है। यहाँ भी गृह मंत्री ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) की टीमों को बिहार और उत्तर प्रदेश भेज दिया गया है। अतिरिक्त बचाव कर्मियों को भी तैनात किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार भी उच्च जोखिम वाले राज्य हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग 7.34 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आती है तो बिहार के कुल 73 प्रतिशत हिस्से पर बाढ़ का खतरा बना रहता है। यहां भी एनडीआरएफ की टीमें भेज दी गई हैं।

भारत को  नदी तल की नियमित सफाई व ड्रेजिंग, जलग्रहण क्षेत्रों में व्यापक वृक्षारोपण पर और अधिक जोर देना चाहिए। गांव स्तर पर सामुदायिक प्रशिक्षण तथा जागरूकता बढ़ाकर स्थानीय क्षमता को और मजबूत करना होगा।  इन ठोस कदमों से शून्य मृत्यु का लक्ष्य और करीब आएगा।प्राकृतिक आपदाओं को रोकने का कोई उपक्रम संभव नहीं है पर उनसे बचने और नुकसान को टालना हमारी जिम्मेदारी है।

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