बुधवार, 31 दिसंबर 2025

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों के एक साथ जुटने पर आपत्ति क्यों?

बसंत कुमार

विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में जाति के नाम पर सम्मेलनों की बाढ़ सी आ गई है जो भी राजनीतिक दल किसी जाति के अंदर अपनी पैठ बनाना चाहता है वह उसे जाति के महापुरुषों के नाम पर जाति का सम्मेलन आयोजित कर देता है जबकि उनका मुख्य मकसद उस जाति का वोट लेना होता है न की उस महापुरुष का सम्मान करना। परंतु एक अनोखी घटना हुई जब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों के इकट्ठे मिलने पर उनकी पार्टी द्वारा आपत्ति जताई गई, हुआ यह की उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंकज चौधरी की ताजपोशी के कुछ ही दिन बाद ही प्रदेश के भाजपा के 50 ब्राह्मण विधायकों का भोजन के बहाने एक जगह इकट्ठा होना, यद्यपि कहा गया कि यह मीटिंग SIR पर पर विचार विमर्श के लिए बुलाई गई थी पर राजनीतिक हलके में इस बैठक को कुछ ऐसा माना गया की यह बैठक कोई जातिवादी व्यूह रचना के लिए बुलाई गई है। इसी कारण पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने लोगों को नकारात्मक राजनीति से बचने की सलाह दी। यद्यपि यह पहली बार नहीं है कि राज्य के विधायक और सांसद जाति के आधार पर एकत्रित न हुए हो, सबसे पहले राजपूत विधायक के कितने हुए उनकी बैठक हुई और उसके बाद सारे पूर्वी विधायक मिले अर्थात जाति के नाम पर नेताओं का इकट्ठा होना कोई नई बात नहीं है।

जाति के आधार पर राजनीति होना देश में नई बात नहीं है और विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार में हर राजनीतिक फैसला लोगों की जाति देखकर किए जाते हैं टिकटार्थियो को टिकट उनकी जाति के आधार पर दिया जाता है किसी को टिकट देते समय उसे योग्यता के बजाय उसकी जाति देखा जाता है मंत्रिमंडल बनाते समय जाति का ध्यान दिया जाता है तो फिर अगर एक जाति के विधायक इकट्ठे मिलकर कहीं पर चर्चा करते हैं तो इतना बड़ा बवाल क्यों? वैसे पूरे में कभी राजपूत के नाम पर, कभी पासी समाज के नाम पर, कभी यादव समाज के नाम पर कभी वाल्मीकि समाज के नाम पर आए रोज मीटिंग होती रहती हैं और लोग अपने समाजके हित की बातें करते रहते हैं जगह-जगह अपनी जाति के सम्मेलन किए जाते हैं और अपने जाति के लोगों के कारनामों का बखान किया जाता है, फिर यह समझ नहीं आ रहा कि ब्राह्मण विधायकों का एक जगह इकठ्ठा होना इतना आपत्तिजनक क्यों माना जा रहा है।

इस देश में जाति पर आधारित राजनीति इतनी प्रबल हो गई है इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता वर्ष 2017 में मैं तत्कालीन एमएसएमई मंत्री श्री कलराज मिश्रा का सलाहकार था, एक मेरे ब्राह्मण मित्र जो अत्यन्त अनुभवी व बहुत शिक्षित थे, ने किसी मंत्री के व्यक्तिगत स्टाफ में समायोजित करवाने की बात की। मैं उनको लेकर एनडीए सरकार की सहयोगी पार्टी के एक पिछड़ी जाति के मंत्री के यहां गया और अपने मित्र के समायोजन की बात की तो मंत्री जी ने कुछ दिन के बाद मेरे पास यह जवाब भिजवा दिया कि आपके मित्र काबिल तो है पर मैं उन्हें अपने यहां इसलिए नहीं रख सकती क्योंकि वह ब्राह्मण है। इसी तरह मुझे एक और अनुभव हुआ जब वर्ष 2023 में मोदी मंत्रिमंडल में एक ब्राह्मण जो मेरे अच्छी परिचित है राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त किए गए वहां भी मैंने किसी एक व्यक्ति का नाम रिकमेंड किया पर वहां से जवाब आया कि आप यदि किसी ब्राह्मण का नाम रिकमेंड कर दें तो उस पर विचार किया जा सकता है, अब जहां ऐसी स्थिति हो की मंत्री अपने स्टाफ में लोगों की जांच देखकर रखते हो, वहां पर किसी जाति विशेष के विधायकों का इकट्ठा होना आपत्तिजनक हो तो बड़ा हास्यास्पद लगता है। जबकि 21वीं सदी के इस आधुनिक युग में कोई भी नियुक्ति कुछ अपवादों को छोड़कर जाति की बजाय है मेरिट और योग्यता को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए पर भारत में ऐसा हो नहीं पा रहा है जो की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार जातियों के आधार पर इस प्रकार की बैठके पार्टी के हित में नहीं है, एक तरह से जाति की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों की बिछाई पिच पर खेलने जैसा है, लेकिन प्रश्न यह उठ ता है कि इससे पहले पार्टी नेतृत्व द्वारा जातियों के आधार पर विधायकों की गोलबंदी कोशिका सज्ञान क्यों नहीं लिया गया। क्या ब्राह्मण विधायकों की बैठक इससे पहले विभिन्न जातियों के विधायकों की बैठक के जवाब में हुई थी और प्रश्न यह भी है कि जब चुनाव से पहले पार्टी विभिन्न जातियों के सम्मेलन कर सकती है तो जाति के आधार पर विधायक इकट्ठे क्यों नहीं हो सकते। वैसे भी उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में जाति एक वास्तविकता है। चुनावी समीकरण में भी जातियों का मुख्य महत्व है फिर भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राज्य में सामाजिक न्याय, सर्व स्पर्शी और सर्व समावेशी राजनीति को स्थापित किया गया है और उनकी विकासवादी राजनीति के आगे जाति पर आधारित राजनीति का अंत हो रहा है।

भाजपा और कांग्रेस जैसी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में विभिन्न जाति और वर्गों के आधार पर मोर्चे बनाए जाते हैं जैसे दलितों के लिए अनुसूचित मोर्चा, आदिवासियों के लिए अनुसूचित जाति मोर्चा, मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यकों के लिए अल्पसंख्यक मोर्चा, पिछड़ी जातियों के लिए ओबीसी मोर्चा, जहां पर इन जातियों के सांसद विधायक और अन्य नेता एक साथ बैठकर अपने समाज के उत्थान के लिए नीतियां तय कर सकते हैं और उनका कार्यान्वयन हो सकता है। तो यदि ब्राह्मण विधायक एक साथ बैठकर अपने समाज के लिए आपस में विचार विमर्श करते हैं तो इसमें क्या बुराई है। वैसे भी भारतीय समाज में प्राचीन काल से जाति पर आधारित खाप पंचायतो की परंपरा रही है जहां बिरादरी से संबंधित विवादों का निपटारा आपसी समझ से किया जा सकता था ऐसे में सिर्फ जाति विशेष के विधायकों के इकट्ठा होने पर सवाल उठाना उचित नहीं लगता। जब देश में ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा, यादव महासभा, वैष्णो महासभा, दलित महासभा जैसे संगठन बनाए और चलाए जा सकते हैं तो फिर एक जाति के आधार पर जन प्रतिनिधियों को इकट्ठे होने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

देश में लोकतंत्र की स्थापना हुई लगभग 8 दशक का समय पूरा होने वाला है और कांग्रेस, भाजपा व तीसरे मोर्चे की सरकारे समय-समय पर बनती रही है लेकिन एक चीज बड़ी कॉमन है कि मंत्रिमंडल के गठन में अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए गठित समाज कल्याण व अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री किसी दलित को ही बनाया जाता है और आदिवासियों के कल्याण के लिए गठित मंत्रालय का मंत्री किसी आदिवासी को बनाया जा सकता है इस तरह से अल्प संख्यक मामलों के मंत्रालय का प्रभार किसी मुस्लिम या अल्प संख्यक समाज के व्यक्ति को ही दिया जा सकता है तो जब मंत्रिमंडल के गठन में जाति को आधार मानकर ही मंत्रियों को चार्ज दिया जाता है तो फिर जाति विशेष के विधायकों/सांसदों की एक जगह बैठने पर आपत्ति क्यों?आजादी की इतने वर्ष बाद भी अभी तक किसी सवर्ण को समाज कल्याण मंत्रालय या जनजाति कल्याण मंत्रालय का प्रभार नहीं दिया गया है जब तक विभिन्न जातियों में एक दूसरे के प्रति विश्वास नहीं जागेगा तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसलिए सभी पार्टियों को मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई बनानी होगी जहां विभिन्न जातियों का वर्गों में अपनी विश्वास हो और भाईचारा हो जहां एक सवर्ण दलित अल्पसंख्यकों के कल्याण के बारे में सोच सके और दलित और आदिवासी सवर्ण समाज के कल्याण के बारे में सोच सके तभी भारत एक आदर्श विकसित देश बन सकेगा।

कैसी विडंबना है कि 1990 के दशक में विश्व राजनीति में दो महान शक्तियों के बीच शीत युद्ध खत्म हो गया और सोवियत यूनियन ब्लाक बिखर गया। आज दुनिया ने लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन की आर्थिक नीति के ऊपर चल रहा और वैश्विक स्पर्धा सारी दुनिया को एक साथ ले आ रही है लेकिन भारत जो अपने आप को सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक व्यवस्था के रूप में साबित कर चुका है वहां आज भी राजनीति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, पिछड़े दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर चल रही है जो दुर्भाग्य पूर्ण है।

सरकार और भाजपा नेतृत्व वास्तव में समाज से जाति वाद की राजनीति को समाप्त ही करना चाहती है सोशल मीडिया पर जातिवाद का जहर उगल रहे अति भीम वादियों और मनु वादियों पर रोक लगाए और ऐसे स्वयंभू धर्म गुरुओं पर रोक लगाए जो हिंदू राष्ट्र की मांग के पीछे समाज में जातिवाद का जहर घोल रहे हैं तभी एक समरस स्वस्थ और सुदृढ़ हिंदुस्तान की स्थापना हो सकेगी।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

न्यायाधीश स्वामीनाथन पर महाभियोग की कोशिश भयभीत करने वाली

अवधेश कुमार 

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध विपक्ष द्वारा पिछले संसद सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने की पहल अभूतपूर्व और अचंभित करने वाली थी। किसी न्यायाधीश को उसके न्यायिक निर्णय या आदेश के विरुद्ध महाभियोग लाने के लिए हमारे माननीय सांसद इस तरह एकजुट हो जाएंगे इसकी कल्पना नहीं थी। हालांकि इसके विरुद्ध 56 पूर्व न्यायाधीश सामने आ गए जिन्होंने खुला पत्र में इसे न्यायालय पर राजनीतिक वैचारिक दबाव बनाने और डराने की कोशिश कहा। वास्तव में तमिलनाडु में आईएनडीआईए सरकार का नेतृत्व करने वाली द्रमुक के आह्वान पर एक साथ 107 सांसदों का लोकसभा अध्यक्ष के पास पहुंचकर महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने की घटना हर दृष्टि से असाधारण थी। अभी तक न्यायाधीशों को उनके आचरण, कदाचार आदि के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ा या उसकी कोशिशें हुईं। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा है कि सांसदों के आरोप मान लिए जाएं, तब भी किसी न्यायाधीश को उसके विचारों या फैसलों के आधार पर महाभियोग की धमकी देना न्यायपालिका की आजादी पर हमला है। अगर इस तरह किसी सरकार राजनीतिक दल या दलों के समूह को न्यायाधीश का फैसला स्वीकार नहीं हो और वह महाभियोग प्रस्ताव लाने लगे तो फिर हर न्यायाधीश डरने लगेगा। वास्तव में इस प्रकरण के तीन प्रमुख पहलू है। पहला, न्यायमूर्ति स्वामीनाथन द्वारा दिया गया फैसला और उसकी पृष्ठभूमि। दूसरा, संबंधित विवाद की सच्चाई। और तीसरा महाभियोग प्रस्ताव के पीछे की सोच या विचारधारा। 

न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने तिरुप्परनकुंद्रम मंदिर पर परंपरागत उत्सव के दीप जलाने का एक आदेश 1 दिसंबर को दिया तथा प्रशासन द्वारा उसका पालन न करने पर तीखे शब्दों में दूसरा आदेश 4 दिसंबर को दिया। न्यायालय ने 4 दिसंबर के आदेश में इसे न्यायपालिका की अवमानना करार देते हुए हर हाल में लागू करने की बात की। द्रमुक सरकार ने इसे सांप्रदायिक निर्णय माना और उनके विरुद्ध राजनीतिक अभियान चल निकला है। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। दरअसल,तिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर से संबंधित पत्थर स्तंभ- दीपथून पर दीपक जलाकर कार्तिगई दीपम त्योहार मनाने की परंपरा है। तमिल महीने कार्तिगई (नवंबर-दिसंबर) में मनाए जाने वाले ‘कार्तिगई दीपम’ उत्सव के तहत, हमेशा की तरह उच्ची पिल्लैयार मंदिर के मंडपम में दीप जलाने के लिए जब लोग जाने लगे तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया था। तिथि के अनुसार 3 दिसंबर को दीप जलाया जाना चाहिए था किंतु ऐसा नहीं हो सका। इसके बाद यह बड़ा मुद्दा बन गया और न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका डाली गई जिसके तहत यह आदेश आया। मंदिर और पहाड़ी की सुरक्षा में लगे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों के साथ जब श्रद्धालु दीपक जलाने जाने लगे तो पुलिस ने उन्हें फिर रोक दिया। तीरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी तमिलनाडु राज्य के मदुरै शहर से 10 किमी दूर है जिस पर यह मंदिर अवस्थित है। सनातन और हिंदू मान्यताओं में यह भगवान मुरूगन या कार्तिकेय के छ: निवास स्थानों में से एक है। मुरूगन भक्तों के लिए इसके महत्व को आसानी से समझा जा सकता है। विवाद का मुख्य कारण पहाड़ी के ऊपरी भाग पर स्थित सिकंदर वधुसाह का दरगाह है।  जैसा हम जानते हैं तमिलनाडु वैष्णव और शैव दोनों पंथों का आधार और मुख्य विस्तार भूमि रहा है। वैष्णव परंपरा के कवि और संत 12 अलवरों तथा 63 नयनारों यानी शैश परंपरा के कवियों और संतों में से अधिकांश तमिल क्षेत्र से आए थे। मंदिर समर्थकों की मान्यता है कि यह पूरी पहाड़ी शिवलिंग है जिसके बीच में भगवान मुरूगन का मंदिर है। यह सच है कि जब दिल्ली सल्तनत का साम्राज्य यहां तक फैला उसके बाद से समस्या शुरू हुई। सिकंदर वधुशाह का दरगाह 17वीं शताब्दी में बना था जबकि मंदिर का उल्लेख छठी शताब्दी तक मिलता है। विजयनगर साम्राज्य ने दिल्ली सल्तनत को पराजित कर मंदिर और वहां की परंपरा को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ पुनर्स्थापित किया। बाद में समस्या फिर बढ़ी और अंग्रेजों के काल में इसे लेकर लगातार विवाद होते रहे। न्यायालय के कुछ फैसले भी हैं जिनमें 1920 के एक आदेश का न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने उदाहरण भी दिया है।

द्रमुक के संस्थापक ईवी रामास्वामी नायकर यानी पेरियार की पूरी सोच सनातन या हिंदू धर्म के विरुद्ध थी। अपने पिछले कुछ सालों में  द्रमुक नेताओं द्वारा सनातन को वारस से लेकर डेंगू मलेरिया अधिक कहकर निंदा करने और इसके हर हाल में विरोध के जो स्वर सुने जा रहे हैं वो इसी विचारधारा से निकली है। द्रमुक की राजनीति इस हिंदू धर्म के विरोध पर टिकी है जिसे कुछ लोग नास्तिकतावाद भी कहते हैं। हालांकि विडंबना देखिए कि उसे नास्तिकतावाद में इस्लाम या ईसाइयत का विरोध नहीं है। जब पूरे भारत में स्वतंत्रता के बाद लंबे कालखंड से पड़े ऐसे अनेक विवाद अनसुलझे रह गए तो फिर तमिलनाडु में इसके सुलझाने की संभावना ही नहीं थी। द्रमुक सरकार हिंदू संगठनों के विरुद्ध कितना आक्रामक रहती है एवं उनके कार्यक्रमों तक को रोकने के कदम उठाए जाते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं।

किंतु धीरे-धीरे तमिलनाडु में इसके विरुद्ध संगठन और समूह खड़े हुए जो मुखर होकर सामने आने लगे हैं। तिरुप्परकुंदरम विवाद पिछले दिनों तब ज्यादा गहराया जब कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे सिकंदर मलाई पहाड़ी नाम देने की मांग कर आंदोलन शुरू किया। कुर्बानी की कोशिश हुई जिसका विरोध हुआ। इन कारणों से वहां तनाव की स्थिति बनी या जानबूझकर बनायी गयी और मंदिर के सामान्य पूजा पाठ को छोड़ अन्य गतिविधियों को प्रशासन ने लगभग रोक दिया। ऐसा नहीं होता तो कार्तिकेय दीपम के लिए न्यायालय जाने की आवश्यकता ही नहीं होती। दक्षिण में भगवान मुरूगन सर्वाधिक पूजे जाने वाले देवताओं में है और इनको मानने वाले में समाज के पिछड़े वर्ग की संख्या ज्यादा है।

पूरे विवाद को निष्पक्षता से देखने के बाद आप अपना निष्कर्ष निकालिए। किंतु मान लीजिए कोई सरकार या पार्टी न्यायाधीश के फैसले से असहमत है तो उसका रास्ता महाभियोग होगा? उच्च न्यायालय की एकल पीठ के विरुद्ध बड़ी पीठ में जाया जा सकता था। आपके लिए उच्चतम न्यायालय का रास्ता खुला है। ऐसा लगता है कि चूंकि तमिलनाडु सरकार को सच मालूम है इसलिए न्यायालय में पुनर्विचार याचिका डालने की जगह ऐसा दबाव बनाओ ताकि आगे इस तरह के फैसले देने से डरे। 56 न्यायाधीशों ने अपने पत्र में लिखा है कि आपातकाल में भी न्यायाधीश राजनीतिक आसहमति के कारण निशाने पर आए थे और तब भी न्यायपालिका ने स्वतंत्रता की रक्षा बनाए रखने के लिए लड़ाई लड़ी थी। वस्तुत: महाभियोग न्यायपालिका की ईमानदारी की रक्षा करने के लिए है, न कि जजों पर दबाव डालने या बदला लेने के लिए इस्तेमाल करने। हाल के वर्षों में कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों दीपक मिश्रा, रंजन गोगोई, एसए बोबडे और डीवाई चंद्रचूड़ साथ ही वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भी निशाना बनना पड़ा क्योंकि कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं को उनके फैसले पसंद नहीं आए। महाभियोग और सार्वजनिक आलोचना को दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। सेकुलरिज्म के नाम पर सरकार और प्रशासन के लंबे समय से जारी ऐसे रवैयों के विरुद्ध पूरे देश और देश के बाहर हिंदुओं के अंदर गुस्सा और प्रतिक्रिया का भाव चरम तक पहुंचा है जिसकी कई परिणति हम पिछले लंबे समय से देख रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग मानने लगे हैं कि सेक्युलरवाद के नाम पर हिंदू और सनातन विरोध तथा मुस्लिमपरस्ती राजनीतिक दलों और सरकारों का चरित्र है। भाजपा के अलावा कोई राजनीतिक दल समर्थन में नहीं आता इसलिए इस गुस्से का लाभ सीधे तौर पर उसे मिलता है। द्रमुक का संकीर्ण एकपक्षीय तमिलवाद व हिंदू धर्म विरोधवाद की अपनी राजनीति है लेकिन कांग्रेस, सपा , तृणमूल आदि का भाजपा विरोध के नाम पर उनके साथ आना आने वाले समय में राजनीतिक रूप से इनके लिए और प्रतिकूल साबित हो सकता है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092- मोबाइल 9811027208

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

सरल तकनीकों के साथ खुशियाँ अभ्यास करना

डॉ. राजेश के पिलानिया

तनाव दैनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन गया है और यह कई स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा कर रहा है। बढ़ती संख्या में लोग तनाव से अभिभूत हैं और उससे निपटने में संघर्ष कर रहे हैं। जीवन की ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्ति को खुशी का अभ्यास करना आवश्यक है।

खुश रहना एक व्यवस्थित तरीके से किया जाए तो बहुत आसान होता है। खुशी का अभ्यास करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरण उपलब्ध हैं। एक महत्वपूर्ण उपकरण है श्वास. इस लेख में हम तनाव कम करने की एक बहुत महत्वपूर्ण तकनीक पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जिसे फिज़ियोलॉजिकल साई कहा जाता है।

फिज़ियोलॉजिकल साई तनाव और घबराहट को रोकने के लिए सबसे शक्तिशाली श्वास तकनीक है। न्यूरोसाइंस में शोध से पता चलता है कि यह तनाव कम करने का सबसे तेज़ तरीका है। इसका पता 1930 के दशक में लगाया गया था। इसका नाम तकनीकी लग सकता है, पर यह ऐसी चीज है जिसका उपयोग केवल मनुष्य बल्कि जानवर भी करते हैं। इसे हम लोगों में तब देख सकते हैं जब वे रोने के बाद या चिंता के बाद शांत होते हैं।

फिज़ियोलॉजिकल साई की प्रक्रिया सरल है।

1. नाक से एक लंबी साँस लें।

2. तुरंत नाक से दूसरी तेज़ छोटी साँस लें।

3. फिर मुँह से धीरे-धीरे और लंबी साँस छोड़ें।

4. इसे एक से तीन बार दोहराएँ।

इस तकनीक के लिए किसी विशेष स्थान, ध्यान या दिन के किसी निश्चित समय की आवश्यकता नहीं होती। इसे घर, कार्यस्थल या किसी भी स्थान पर किया जा सकता है।

तनाव के दौरान हम तेज़ और उथली सांसें लेने लगते हैं। इससे शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड फँसी रह जाती है और हमारी चिंता बढ़ती है। डबल इनहेल फेफड़ों को पूरी तरह भरने में मदद करता है और उन छोटे-छोटे एयर पॉकेट्स को खोलता है जो गलत तरीके से साँस लेने पर बंद हो जाते हैं। लंबी साँस छोड़ना अतिरिक्त CO₂ को बाहर करता है और मस्तिष्क को संकेत देता है कि शरीर सुरक्षित है। इससे हमारा तंत्रिका तंत्र फाइट या फ़्लाइट मोड से रिलैक्स मोड में जाता है, जिससे हम अधिक स्पष्ट सोच पाते हैं।

यह एक महत्वपूर्ण तकनीक है और तनाव कम करने में मदद कर सकती है। यह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति ने हमें कई समाधान दिए हैं, जिनमें से कुछ हमारे शरीर के भीतर ही मौजूद हैंहमें बस उन्हें जानने और उपयोग करने की आवश्यकता है। इसे जीवन का हिस्सा बनाकर नियमित रूप से किया जा सकता है।

हालाँकि, फिज़ियोलॉजिकल साई हर समस्या का समाधान नहीं है। एक स्थायी समाधान के लिए व्यक्ति को स्वयं के भीतर झाँकना चाहिए, व्यक्तिगत समझ विकसित करनी चाहिए और दैनिक जीवन में खुशी का निर्माण करने तथा तनाव सहित जीवन की चुनौतियों से निपटने के लिए स्वयं पर कार्य करना चाहिए।

(लेखक मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर और भारत के हैप्पीनेस गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं।)

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