बसंत कुमार
अभी हाल में
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देशभर में उच्च
शिक्षा संस्थान में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम अनुसूचित किए हैं, इन नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान के परिसर ने समानता इक्विटी
कमेटी का गठन अनिवार्य कर दिया गया है, इनका न पालन करने पर
संस्थान को डिग्री या कार्यक्रम प्रदान करने से रोकने और दंड का सामना पड़ सकता है।
नए नियमावली के अनुसार प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र स्थापित करना और
समावेशन सुनिश्चित करना है, इसके अंतर्गत एक इक्विटी
कमेटी गठित होनी है जिसका जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। कमेटी में
ओबीसी विकलांग एससी-एसटी और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। इक्विटी कमेटी
को वर्ष में काम से कम दो बैठक करना अनिवार्य होग, प्रत्येक संस्थान को ईओसी के कार्य प्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी को
प्रस्तुत करनी पड़ेगी।
अब प्रश्न
क्या उठना है कि इस नई नियमावली की आवश्यकता क्यों पड़ी संभवतः इसके निम्न कारण
दिखाई देते हैं-
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्च शिक्षा संस्थानों में क्षमता को बढ़ावा देना वन में 2026 को 13 जनवरी 2026 को अनुचित किया यह वर्ष 2012 से लागू भेदभाव रूपी नियमों का अध्यतन रूप है।
- पिछले वर्ष फरवरी में यूजीसी ने इन नियमों का मसौदा संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग की जाति आधारित व भेदभाव के दायरे से बाहर रखा क्या गया था।
- मसौदा न्यू मूवी यह भी प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हाथों उत्साहित करने के लिए जुर्माने का प्रावधान किया जाए।
- अंतिम अधिवेशन नियमों में यूजीसी में ओबीसी को जाकर भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है साथ ही भेदभाव की परिभाषा को थोड़ा परिभाषित किया गया है ताकि इसमें वर्ष 2012 के भिन्नमालयों की निहित भाषा को भी शामिल किया जा सके।
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अब भेदभाव अब की परिभाषा किसी भी हित कारक के खिलाफ चाहे वह
प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष हो केवल धर्म चाहती लिंग जन्म स्थान विकलांगता या
इसमें से किसी भी आधार पर किया गया, अनुचित क्या पक्षपात
पूर्ण व्यवहार या कोई भी कार्य भेदभाव के अंतर्गत शामिल किया जाएगा।
यूजीसी के
उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा को प्रोत्साहित करने के नियम 2026 पर विवाद काफी गहरा गया है उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों
में सवर्ण समाज इसका विरोध कर रहा है। जबकि सरकार इसे सामान्य बढ़ाने की पहला बता
रही है, विरोधियों का कहना है कि यह
असमानता को बढ़ावा देगा समान समाज ने इस नियमावली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और
उत्तर प्रदेश के विधान परिषद के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को लिखे
अपने पत्र में निमन बातें लिखी है -
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पिछला वर्ग और दलित वर्ग के छात्रों के साथ किसी भी तरह का
न्याय नहीं होना चाहिए लेकिन नए नियम बनाते समय सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा जाना
चाहिए नया नियम सामान्य समाज के छात्रों के उत्पीड़न का कारण बन सकता है।
इस नए
अधिनियम का विरोध करने के लिए सवर्ण समाज पूरी तैयारी के साथ बैठा हुआ है वहीं डासना धाम के महंत महामंडलेश्वर यदि नरसिंहानंद गिरि ने
गंगा किनारे इस अधिनियम के विरोध के लिए धरने पर बैठने जा रहे थे पर पुलिस ने
शांति व्यवस्था के गड़बड़ होने की आशंका से महामंडलेश्वर को वहां जाने से रोक दिया, परिणामस्वरूप महामंडलेश्वर की समर्थकों ने इसका घोर विरोध
किया, कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश
के एक सिटी मजिस्ट्रेट ने इस अधिनियम और महामंडलेश्वर के साथ हुए व्यवहार के कारण
अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है पर यह स्पष्ट नहीं है कि उस मजिस्ट्रेट कर
त्यागपत्र कुछ और कारणों से है या यूजीसी के नए नियमावली के विरोध में है।
यूजीसी का
कहना है कि नए नियम साल 2012 के उसे भेदभाव निरोधी
ढांचे को मजबूत करने के लिए जारी किए गए हैं उनका तर्क है कि उच्च शिक्षा में
जातिगत भेदभाव की शिकायतें 2019 की तुलना में 2023 में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हो
चुकी है। हकीकत यह भी है कि यह निर्णय हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की
आत्महत्या और सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के निर्देश के बाद आया
है। रोहित वेमुला केस में उसे वक्त देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालय के कैंपस
का राजनीतिक कम तापमान बढ़ गया था। विपक्ष ने इस मामले को सरकार के खिलाफ राजनीतिक
हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। वामपंथी दलों के साथ साथ जवाहर लाल
यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में महीना तक प्रोटेस्ट चला था।
इस यूजीसी
ऐक्ट में अति पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को भी जोड़ दिया गया है लेकिन एक बात पर ध्यान
नहीं दिया गया है कि अति पिछड़ों में वर्गीकृत जाट, यादव, कुर्मी जैसी डोमिनेंट जातियां भी
अनुसूचित जातियों और जनजातीय के खिलाफ भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाते हैं। क्योंकि ये
जातियां भी अपने आप को क्षत्रिय वंशियों के रूप में मनाती रही हैं। हम दलित और
आदिवासियों के साथ भेदभावपूर्ण जातिगत भेदभाव के मामले में यह सवर्णों से पीछे
नहीं रहती है। अगर एससी/एसटी एक्ट में दर्ज हुए मामलों की संख्या पर ध्यान दिया
जाए तो ये जातियां दलित और आदिवासियों पर अत्याचार के मामले में बहुत आगे रही है
इसलिए यूजीसी एक्ट के अधिनियम-2026 में ओबीसी वर्गों को
शामिल करके सिर्फ सवर्ण जातियों को छोड़ दिया जाना भी विवाद का विषय है। ठीक है कि
निम्न वर्ग की अधिक पिछड़ी जातियां नाई, कोहार, मल्लाह, लोहार, नोनिया, माली आदि दलितों
और आदिवासियों पर अत्याचार नहीं करती या भेदभाव नहीं करती पर जो ओबीसी में
वर्गीकृत डोमिनेंट जातियां हैं वे इन पर भेदभाव करती हैं और इस बात को इनकार नहीं
किया जा सकता इसलिए यह नियमन सूचित करते समय की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था।
यूजीसी के
उच्च शिक्षण संस्थान में एससी -एसटी के साथ-साथ ओबीसी को भी शामिल किया गया है
क्योंकि यूजीसी का मानना है कि अब तक के पिछले प्रावधान कैंपस में जांच के भेदभाव
को कम करने में या रोकने में नाकाम रहे हैं। यूजीसी की अपनी रिपोर्ट के अनुसार
उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतें कम होने के बजाय बढ़ी है, जब इस तरह की
घटनाओं में वृद्धि हो रही है तो इसे रोकने के लिए सशक्त समयबद्ध और जवाब देह
प्रावधानो की जरूरत होती है, इसी कारण नए नियमों के अनुसार
भेद भाव की शिकायत के 24 घंटे में समिति की बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्यवाही की
समय सीमा तय की गई है। जब यह सवाल उठाए जा रहा है कि इस समिति में सवर्ण वर्ग या
सामान्य वर्ग के लोगों को क्यों नहीं शामिल किया गया तो इस बारे में ध्यान देने की
बात यह है कि इस मामले में जो भी कमेटी बनेगी, उसका अध्यक्ष संस्थान का प्रमुख
होगा और यह भी बात किसी से छिपी नहीं है की उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रमुख
ज्यादातर सवर्ण समाज के व्यक्ति होते हैं और उच्च शिक्षा के प्राइवेट संस्थान
अधिकांशतः ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य समाज के लोगो के होते है, इसके अलावा समिति में एससी/एसटी या ओबीसी को रखने के बाद
इसलिए की गई है कि स्वतंत्र भारत में पिछले 80 वर्षों से एक परिपाटी
चली आ रही है कि सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री दलित ही होगा और
आदिवासी मंत्रालय का मंत्री आदिवासी ही होगा और अल्पसंख्यक मंत्रालय का मंत्री
मुस्लिम या ईसाई होता है और गृह मंत्रालय या शिक्षा मंत्रालय का मंत्री कोई दलित
या पिछड़ा न होकर कोई सवर्ण या वैश्य ही होता है। जब तक हम सभी वर्गों एवं जातियों
में आपसी विश्वास पैदा नहीं कर लेते तब तक इस तरह की हालत होते रहेंगे जिस दिन एक
सवर्ण सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री बनेगा और जाति द्वेष और
उत्पीड़न समाप्त हो जाएगा तो इस देश में इस तरह की कमेटी की आवश्यकता नहीं रहेगी।
वर्ष 1950 में तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर द्वारा सदन में
हिंदू कोड बिल लाया गया जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज में महिलाओं को समानता का
अधिकार, शिक्षा का अधिकार, पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का देना था, पर उस समय काशी के धर्म गुरु स्वामी करपात्री महाराज के
विरोध के कारण यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका और कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर को
अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और उसके 77 वर्षों बाद भी महिलाएं
अपने बराबरी के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसलिए धर्म गुरुओं को विधायिका
के कार्यों से दूर रहना चाहिए। अभी भी यूजीसी अधिनियम
का विरोध कुछ धर्मगुरुओं और शंकराचार्य द्वारा किया जा रहा है जो उचित नहीं है
क्योंकि देश की विधायिका यानी संसद में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर लगभग 700 सांसद है और जिसमें से आधे से अधिक सांसद सवर्ण समाज के
हैं तो उनका यह कर्तव्य बनता है कि विधायक का हिस्सा होने के कारण इस अधिनियम के
गुण दोष का विश्लेषण करके उसे सदन के माध्यम से उठाएं, इस बिल का विरोध करने वाले संत महात्मा शंकराचार्य ने यह
साबित कर दिया है कि वे पूरे हिंदू समाज के धर्मगुरु न होकर सिर्फ सवर्ण समाज के
धर्म गुरु है यह स्थिति ठीक नहीं है इससे हिंदू समाज सवर्णों पिछड़ों और दलितों के
बीच बट जाएगा और इससे हिंदू संस्कृति का नुकसान होगा।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव
हैं।)
