बुधवार, 28 जनवरी 2026

UGC एक्ट 2026 : न्याय की ओर एक कदम

विकास खितौलिया 
भारत का उच्च शिक्षण तंत्र लंबे समय से दो विरोधाभासी दावों के बीच खड़ा रहा है। एक ओर इसे ज्ञान, विवेक और मेरिट का केंद्र कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएँ यह याद दिलाती हैं कि जाति आधारित भेदभाव आज भी एक जीवित सच्चाई है। रोहित वेमुला, डॉ पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे मामलों ने यह प्रश्न बार-बार उठाया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय सभी के लिए समान रूप से सुरक्षित और न्यायपूर्ण हैं। आलोचक अक्सर कहते हैं कि भेदभाव की बात बढ़ा चढ़ाकर कही जाती है। लेकिन UGC और संसदीय समितियों के समक्ष प्रस्तुत आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं कि ये समस्या काल्पनिक नहीं है । वर्ष 2019-20 में जहाँ 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। 
पिछले पाँच वर्षों में 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से 1160 शिकायतें UGC को प्राप्त हुईं। यह वृद्धि 118.4 प्रतिशत है। "जाति है, और जाती नहीं" । यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी इसलिए यह कहना असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन सच यही है कि भारत में जाति है, और वह सिर्फ़ समाज में ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, फैकल्टी रूम और हॉस्टलों में भी मौजूद है। आज विश्वविद्यालयों में "नोट फाउंड सूटेबल" (NFS) जैसी प्रक्रियाएँ स्वयं सवालों के घेरे में हैं। जब किसी मानसिक रूप से असंतुलित या पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति द्वारा बार-बार किसी शिक्षक या पद को एनएफ़एस किया जाता है, तो उसका असर सिर्फ़ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे प्रतिनिधित्व तंत्र पर पड़ता है। ऐसे में सरकार द्वारा यह सुनिश्चित करना कि पद चाहे कितनी बार खाली किया जाए, वह उसी आरक्षित श्रेणी से भरा जाएगा, न तो अन्याय है और न ही तुष्टीकरण, यह संवैधानिक संतुलन है।
इसी पृष्ठभूमि में "विश्वविद्यालय अनुदान आयोग" द्वारा जनवरी 2026 में "UGC एक्ट 2026" और इसके अंतर्गत लागू किए गए "प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हॉयर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026" एक ठोस प्रयास हैं। यह क़ानून किसी वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि हर वर्ग के सम्मान और समान अवसर की रक्षा के लिए लाया गया है। यह कानून न तो अचानक लाया गया है और न ही सामाजिक यथार्थ से कटा हुआ है। बल्कि यह उन सवालों का उत्तर खोजने का प्रयास है, जो पिछले एक दशक से न्यायालयों, संसदीय समितियों और सार्वजनिक विमर्श में उठते रहे हैं। 
UGC के नए नियम 2012 की एंटी-डिस्क्रिमिनेशन गाइडलाइंस का स्थान लेते हैं। इनका उद्देश्य स्पष्ट है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता, जन्म स्थान या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकना। महत्वपूर्ण यह भी है कि भेदभाव की परिभाषा को सीमित नहीं रखा गया है। अब केवल प्रत्यक्ष अपमान ही नहीं, बल्कि अवसरों से वंचित करना, बहिष्कार और अनुचित व्यवहार भी भेदभाव के दायरे में आएंगे। इन नियमों के तहत अब हर उच्च शिक्षण संस्थान में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC) बनाना अनिवार्य होगा। यह केंद्र शिकायतों की जांच करेगा, 24X7 हेल्पलाइन संचालित करेगा और शिकायत मिलने पर इक्विटी कमेटी  को तत्काल बैठक कर रिपोर्ट तैयार करेगी। समिति की रिपोर्ट सीधे संस्थान प्रमुख को सौंपी जाएगी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नियमों के पालन की सीधी जिम्मेदारी अब संस्थान प्रमुख पर होगी, न कि किसी औपचारिक समिति पर। इससे जवाबदेही तय होती है। जिस प्रकार देश में अधिकांश शिक्षण संस्थानों में कुलपति तथा प्रोफेसर स्वर्ण समाज के है तो क्या वह इस कानून द्वारा किसी निर्दोष की कोई हानि होने देंगे इसलिए यह बेकार में विरोध कर रहे हैं।
यह संयोग ही है जब मंडल कमीशन आया तो उसकी अगुवाई बतौर प्रधानमंत्री वीपी सिंह कर रहे थे। विश्विद्यालय में ओबीसी आरक्षण लागू हुआ तो उसकी अगुवाई बतौर शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह कर रहे थे, जो चुरहट रियासत से जुड़े थे और वहीं आज इस स्टैंडिंग कमेटी की समीक्षा और सिफारिश वहीं कमेटी कर रही थी जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह कर रहे थे, जोकि राघोगढ़ रियासत से जुड़े है। इन तीनों नेताओं की जाति राजपूत है, ये तीनों राजघराने के वारिस रहे हैं। उसके बावजूद तीनों ने बेहद ईमानदारी से जनहित के ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। आखिर क्या कारण है कि आरक्षण, जाति जनगणना एवं बहुजनों के हित में बने किसी क़ानून का शेख, सैय्यद एवं पठान नहीं विरोध करते हैं, सिर्फ चार जाति के लोग ही विरोध क्यों करते हैं और यही लोग चुनाव में धर्म के नाम पर एक होने की बात भी करते हैं। यह सभी सूक्ष्मता व गंभीरता से सोचने-विचारने की जरूरत है। जब इकोनॉमिकली बीकर सेक्शन (EWS) के तहत आरक्षण लागू हुआ तब किसी दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग के किसी भी व्यक्ति ने विरोध नहीं किया था। उसके बावजूद सबसे ज्यादा धांधली इसी कोटे में पाई जाती है।
दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में जिस कमिटी ने इस रेगुलेशन में जिन प्रस्तावों की सिफारिश की है। उसे पढ़ना चाहिए। बड़ी ईमानदारी से अपना काम किया है। हम कृतघ्न नहीं हो सकते हैं। उस स्टेंडिंग कमिटी में जो सदस्य हैं, उनमें सिर्फ दलित, आदिवासी और ओबीसी ही नहीं है, बड़ी संख्या में सवर्ण भी है। UGC एक्ट 2026 के लागू होने के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों और समूहों द्वारा विरोध भी सामने आया है। जयपुर में सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4) का गठन हो या उत्तर प्रदेश और सोशल मीडिया पर चल रही बहस, इन सभी के पीछे एक साझा चिंता है कि कहीं यह कानून दुरुपयोग का माध्यम न बन जाए और संस्थानों पर अनावश्यक दबाव न बढ़े। आलोचकों का तर्क है कि शिकायतों की जांच की प्रक्रिया, झूठी शिकायतों से बचाव और अपील की व्यवस्था को और स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यह भी सच है कि इस क़ानून में सुधार की गुंजाइश हो सकती है। दुरुपयोग से बचाव के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएँ, अपील की व्यवस्था और समयबद्ध जांच जैसे बिंदुओं पर सरकार को और काम करना चाहिए। और यह भरोसा इसलिए किया जा सकता है, क्योंकि वर्तमान में मोदी सरकार ने स्वयं को समता, समरसता और सर्वकल्याण के सिद्धांतों से जोड़कर प्रस्तुत किया है। प्रधानमंत्री के भाषणों में “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का उल्लेख बार-बार आता है। इसी दृष्टि से यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि यदि नियमों के क्रियान्वयन में व्यावहारिक कठिनाइयाँ या दुरुपयोग की संभावनाएँ सामने आती हैं, तो सरकार उनमें आवश्यक सुधार करेगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि चाहे सचिवालय हो, मंत्रालय हो, देवालय हो या विद्यालय इन सभी संस्थानों में समान अवसर और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना उसकी पहली प्राथमिकता है। 
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने साफ कर दिया है कि मामला सुप्रीम कोर्ट के अधीन है और किसी भी छात्र का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा। यह कानून किसी के खिलाफ नहीं है। यह उस छात्र के पक्ष में है जो हॉस्टल में अपमानित होता है, उस शोधार्थी के पक्ष में है जिसकी थीसिस को पूर्वाग्रह से देखा जाता है, और उस शिक्षक के पक्ष में है जिसे सिर्फ़ उसकी पहचान के कारण बार-बार रोका जाता है। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपना दिल बड़ा करें। हाथ आगे बढ़ाकर उन्हें साथ लेकर चलें, जिन्हें अब तक पीछे रखा गया। विरोध नहीं, न्याय चाहिए। UGC एक्ट 2026 को न तो केवल दमनकारी कानून के रूप में देखा जाना चाहिए और न ही इसे अंतिम समाधान मान लेना चाहिए। यह एक प्रयास है सिर्फ उन खामियों को ठीक करने का, जिनकी ओर वर्षों से ध्यान दिलाया जा रहा है। विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन उतना ही ज़रूरी है यह स्वीकार करना कि न्याय की मांग को केवल आशंकाओं के आधार पर टाला नहीं जा सकता।
(लेखक शोधकर्ता एवं विचारक हैं।) 9818270202
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