कुछ दिन
पूर्व एक दलित समाज के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने एक कार्यक्रम में यह कह दिया
कि जाति पर आधारित आरक्षण तब जारी रहना चाहिए जब तक मेरे बेटे से शादी के लिए एक ब्राह्मण पुत्री तैयार नहीं होती उनके
इस बयान की आलोचना भी हुई और होनी भी चाहिए क्योंकि शादी-विवाह दो आत्माओं का मिलन
है और न कि जातीय समझौदा, बल्कि इस बयान ने एक और
विवाद को जन्म दे दिया कि क्या सिर्फ हिंदुओं में ही ऊंच नीच का भेद भाव है या
दलित समाज में भी ऊंच-नीच का भेदभाव होता है,
कुछ
विद्वान यह कहते हैं कि ये जातियां सिर्फ आरक्षण के लिए एक है अन्यथा इनमें आपस मे
जाति पात भेद भाव बहुत अधिक है।
वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की मछली शहर सुरक्षित सीट से भारतीय जनता
पार्टी ने रामचरित्र निषाद को प्रत्याशी बनाया और मोदी लहर में जीत कर वे सांसद बन
गए पर ऊंची महत्वकांक्षा के अनुरूप मोदी सरकार में मंत्री नहीं बन पाए। उन्हें कई बार यह कहते सुना गया कि मंत्री पद के लिए
मैं ओबीसी से दलित (अछूत) बना पर कोई फायदा नहीं हुआ! रामचरित्र निषाद की ओबीसी से
दलित बनने की टिश यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म के चतुर्वर्ण में आने वाली शूद्र
जातियों में भी ऊंच नीच का भाव छिपा हुआ है। दरअसल निषाद, मल्लाह केवट आदि
जातियां दिल्ली में तो अनुसूचित जाति वर्ग में वर्गीकृत हैं पर अन्य राज्यों में
इन्हें ओबीसी में माना जाता है और इसी कानूनी स्थिति का फायदा उठाते हुए रामचरित्र
निषाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर प्रश्न यह
उठता है कि जब आप दलितों के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर दलितो
के लिए सवर्णों जैसा पूर्वाग्रह क्यों? मजे की बात यह है कि निषाद मल्लाह व अन्य जातियां वर्षों से अनुसूचित जातियों
में शामिल होने की मांग कर रही है पर वे स्वयं चमार व वाल्मीकिआदि जातियों को छूने
से परहेज करते हैं फिर इसके लिए सवर्ण समाज को ही दोस्त क्यों दिया जाए।
उत्तर
प्रदेश और बिहार में एक जाति मुसहर है जो जाति पदानुक्रम में सबसे नीचे आते हैं और
उनका काम लोगों की शादियों में दोना और पत्तल बनाकर देना होता है और उनकी महिलाएं
जब दोना पत्तल लेकर किसी सवर्ण के यहां जाती हैं तो एक कोने में बैठकर इस बात का
इंतजार करती रहती हैं की बारात में आए मेहमानों का खाना समाप्त हो और उनके पत्तलों
में बचे खुचे भोजन को इकट्ठा कर के अपने घर ले जाए पर यही मुसहर जब किसी चमार या
वाल्मीकि के यहां पत्तल लेकर जाता है तो वह पका हुआ भजन खाने के बजाय सिद्धा
मांगता है, सिद्धा का मतलब है कि कच्चा आटा दाल और आलू जिसे वह अपने घर पर बनाकर खा
सके, कहने का तात्पर्य है कि मुसहर
कितनी भी बुरी हालत में हो वह चमार के यहां खाना नहीं खाएगा। बड़े आश्चर्य की बात
है सवर्णों के साथ रोटी बेटी का संबंध की बात करने वाले दलित समाज के लोग आपस में
रोटी बेटी के रिश्ते की बात तो छोड़िए उनके साथ बैठकर खाना भी नहीं खाते।
देश को
स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले टॉयलेट मां के नाम से मशहूर पद्म भूषण दो बिंदेश्वर
पाठक ने दलितों के बीच आपसी जातिवादी मतभेद का बड़ा मजेदार किस्सा सुनाया। बिंदेश्वर
पाठक के पिताजी का स्वर्गवास हो गया और उनकी 13वीं में गांव के सभी वर्ग के लोगों को आमंत्रित किया गया। समस्या तब आई जब
उनके गांव के दुसाध (पासवान) व चमार जाति के लोग एक साथ पंगत में बैठकर खाना खाने
को तैयार नहीं हुए, तब डॉक्टर पाठक ने उनके
लिए अलग-अलग पंगत में बैठा कर खाना खिलाया। भारत को आजाद हुए लगभग 8 दशक होने वाले हैं परंतु दलित समाज की दो डोमिनेंट जातियां
चमार और बाल्मीकि में कभी भी एकता नहीं हुई,
जातियों के
आम नागरिक ही नहीं इन जातियों के बड़े-बड़े नेता भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते, यही कारण है कि बिहार के राजनीति में दुसाधों के नेता चिराग
पासवान और मुसहरों का प्रतिनिधित्व करने वाले जीतन राम मांझी कभी भी एक-दूसरे का
समर्थन नहीं करते और दोनों ही पार्टियां राजनीतिक नेतृत्व करने के बजाय 15% सवर्ण नेतृत्व के आगे-पीछे घूमने को मजबूर हैं और इनकी
राजनीति नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को के रहमो-करम पर टिकी हुई है। सन 1980 के दशक में कांशीराम का नेतृत्व दलित समाज के लिए
चमत्कारिक घटना थी फिर भी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ चमार मतदाताओं को गोल बंद कर
सकी। पासी समाज खटीक समाज एवं
वाल्मीकि समाज बसपा के साथ नहीं जुड़े या तो ये समाजवादी पार्टी के साथ रहे या
भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे। क्योंकि इन वर्गों को किसी एक दलित जाति का मजबूत
होना मंजूर नहीं है।
दलितों में
आपस में जातिवाद पाया जाता है जो मुख्य रूप से आंतरिक, सामाजिक पदानुक्रम वर्चस्व की लड़ाई आर्थिक असमानता और
क्षेत्रीय उप- जातिय पहचान के कारण होता है। जहां खुद दलित समूह अन्य पर हावी होने
की कोशिश करते हैं जिससे आपसी भेदभाव और संघर्ष पैदा होता है जैसे उत्तर प्रदेश
में पासी खटीक धोबी आज आरक्षण के लाभ के लिए बेशक अपने आप को अनुसूचित जाति या
दलित कहते हैं पर यह सामाजिक रूप में चमार बाल्मीकियों के साथ कभी भी किसी प्रकार
का हिस्सा नहीं रखना चाहती रोटी बेटी की बात तो दूर यहां तक कि एक दूसरे के यहां
खाना भी नहीं खाते। एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार में चमारो और मुसहरों पर सबसे अधिक
अत्याचार की घटनाएं दुसाध पासवान समाज के द्वारा की जाती हैं क्योंकि दोनों ही
जातियां एससी/एसटी एक्ट की परिधि में आती है इसलिए एससी एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज
नहीं होता। लेकिन दलितों में जातिगत भेदभाव के कुछ कारण है जो निम्नलिखित हैं-
इन दलित
जातियों के व्यवसाय अलग-अलग थे जैसे सूअर पालना, मैला ढोना, मरे पशुओं को ढोना या जच्चा
बच्चा करना, इस कारणसे इनको अलग-अलग जातियों
में रखा गया पर जब पूना पैक्ट के पश्चात यह सभी जातियां आरक्षण के लिए अनुसूचित
जाति में सम्मिलित हो गई, पर उनके जातियां अहंकार
अलग-अलग रहे इस कारण ये जातियां अनुसूचित जाति के रूप में बेशक एक हो पर जाति के
रूप में बिल्कुल अलग-अलग है।
इस समय उच्च
दलित वर्ग व निम्न दलित वर्ग के बीच में भेदभाव का जो सिलसिला चल निकला है वह इस
समाज के लिए बहुत घातक होगा पहले दलित उच्च वर्ण यानि स्वर्ण समाज के शोषण से
परेशान था पर अब दलितों के निम्न वर्ग का शोषण दलितों के उच्च वर्ग के लोग कर रहे
हैं, यह निम्न श्रेणी के दलितों के लिए दोहरी समस्या बन गई है क्योंकि उनको
दलितों के उच्च वर्ग के साथ-साथ सवर्ण उच्च वर्गों का शोषण झेलना पड़ रहा है
दलितों के बीच आपस में भेदभाव का मुख्य कारण उनके आंतरिक जातिगत संरचना, अशिक्षा और गरीबी तथाप्रतिस्पर्धा है, जहां ऐतिहासिक
भेदभाव और सामाजिक पदानुक्रम के कारण उप समूहों के बीच संसाधनों और सम्मान के लिए
संघर्ष होता है जिससे सामूहिक पहचान के बजाय छोटे-छोटे समूह बनते हैं और वह एक
दूसरे को अपने से हीन मानते हैं दलित जातियों में आपस में ऊंच-नीच और छुआछूत का
भाव मुख्य रूप से ऐतिहासिक भेदभाव सामाजिक आर्थिक असमानता और वर्चस्व की मानसिकता
के कारण होता है जब दलितों की उपजातियां द्वारा खुद को उच्च और दूसरे को निम्न
मानने की प्रवृत्ति बनी रहती है तो बाहर की उच्च जातियों से मिली हीन भावना और
भेदभाव स्वाभाविक है इसकेकारण सामाजिक भेद भाव और मानसिक दबाव बढ़ता है।
अतः यदि
हिंदू समाज को जाति-पात व ऊंच-नीच के भाव से दूर रखना है तो हमे दो क्षेत्रों में
एक साथ काम करना होगा एक ओर सवर्ण समाज को हिंदू दलित समाज के लोगो को ऊंच नीच का
भाव त्याग कर अपनाना होगा वहीं दलित समाज को जातीय पदानुक्रम में अपने से नीचे के
लोगो को अपनाना होगा।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव
हैं।)
