बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

क्या जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रशासन को निर्देश देना सही?

बसंत कुमार

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें श्री जितना मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के दलित विधायक लल्लन भुइया जो बिहार के जो कुटुंबा विधानसभा से विधायक हैं, को एक जनसभा में यह कहते हुए सुना गया कि मैंने अपने क्षेत्र के सभी थाना अध्यक्षों को यह निर्देश दिया है की वे एससी/एसटी एक्ट में कोई मुकदमा दर्ज न करें। उनके इस बयान ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है भारतीय संविधान, जो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है, में एक विधायक या सांसद पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश दे सकता है कि वे एससी एसटी एक्ट में कोई मुकदमा दर्ज न करें। यह बात एक विवाद का विषय हो सकती है कि देश में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है पर क्या दलित समाज का ही विधायक खुलेआम एससी एसटी एक्ट द्वारा दलित समाज को संविधान द्वारा दीसुरक्षा रोक सकता है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक विशेष कानून है जो दलित और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले और जाति आधारित भेदभाव हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए बनाया गया था, यह अधिनियम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने त्वरित न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतों के माध्यम से मामले को निपटाने और पीड़ितों को मुआवजा दिलाने एवं पुनर्वास की व्यवस्था करता है यह अधिनियम 30 जनवरी 19900 को लागू हुआ इसका मुख्य उद्देश्य दलित और आदिवासियों को अपमान और शोषण से मुक्ति दिलाने और संवैधानिक समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हुआ। पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की इक्विटी समिति के गठन के कानून का विरोध करने वाले सेवा से निलंबित बरेली के सिटी में स्टेट अलंकार अग्निहोत्री में यूजीसी एक्ट के साथ-साथ अब एससी एसटी एक्ट 1989 के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है उनको यह दिव्य दृष्टिकेदार धाम के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने के बाद मिली है तो क्या यह मान लिया जाए कि ये शंकराचार्य पूरे हिंदू धर्म के शंकराचार्य होने के बजाय किसी वर्ण विशेष विशेष के शंकराचार्य है। श्री अग्निहोत्री का यह मानना है कि एससी एसटी एक्ट के तहत 95% मुकदमे फर्जी होते हैं तो क्या ये महाशय यह साबित करना चाहते हैं कि इन मुकदमों को देखने वाले पुलिस अधिकारी और जज इतने अक्षम है कि उन्हें फर्जी मुकदमे और सही मुकदमे के बीच अंतर पता लगाने की क्षमता नहीं है।

प्रश्न क्या है कि एससी एसटी एक्ट से पहले महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न से उनको बचाने के लिए दहेज कानून सहित अनेक कानून सरकार द्वारा बनाए गए और दशकों तक इन कानून का दुरुपयोग भी होता रहा पर इन कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए ना तो कोई शंकराचार्य सामने आया और न ही अलंकार अग्निहोत्री जैसा महापुरुष सामने आया जो इनको महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने वाले कानूनों के दुरुपयोग को रोकता। पर ज्यों प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगतभेद भाव अत्याचार के मामले में यूजीसी एक्ट पारित किया तब से ये शंकराचार्य न सिर्फ यूजीसी एक्ट का विरोध कर रहे हैं बल्कि तीन दशक पुराने एससी- एसटी (अत्याचार निवारण)अधिनियम का भी विरोध कररहे है, ऐसा करके ये उन ईमानदार पुलिस अफसरो और जजों की निष्ठा पर भी सवाल उठा रहे हैं जो एस सी -एस टी एक्ट के तहत मुकदमों का निपटन कर रहे है।

संविधान निर्माताओ ने विधायिका में दलित व आदिवासी समुदाय के लोगों के प्रतिनिधित्व के लिए कुछ सीटें इसलिए आरक्षित की थी कि उनके अपने लोग विधायिका में जाकर दलित और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को रोक सके और इस प्रावधान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संज्ञा दी गई। पर अत्यंत उपेक्षित और शोषित मुसहर जाति का विधायक स्वयं दलितों पर के ऊपर हो रहे अत्याचारों से निपटने के लिए बनाए गए एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा न दर्ज करने के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे तो यह बड़ा आश्चर्यजनक लगता है।

जब वर्ष 2014 के चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने त्यागपत्र देकर मुसहर समाज के व्यक्ति जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया तो लोगों को उम्मीद बंधी की शायद सदियों से उपेक्षित और शोषित मुसहर समाज के कल्याण के लिए कुछ काम हो। और लेखक समेत अनेक बुद्धिजीवों को ऐसा लगने लगा की बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के बाद जितना मांझी के रूप में एक ऐसा नेता मिल गया है जो इन दलितों का कल्याण कर सके, पर जब तेरी मां जी केंद्र सरकार में मंत्री बने तो यह सपनादिवा स्वप्न बन कर ही रह गया। उनसे पूछकर सदियों से अपेक्षित शोषण अनुसार समाज की सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक पुस्तक" मुसहर समाज का इतिहास" मैंने लिखी और अपने खर्चसे इसका लोकार्पण कराया और यह उम्मीद थी कि श्री जीतन राम मांझी जी के सहयोग से यह पुस्तक अनुसार समाज के लोगों में पहुंचेगी, जिससे वे अपने समाज की शानदार परंपरा और अपने समाज के महापुरुषों तिलका मांझी, दशरथ मांझी, किराए मुसहर आदि के द्वारा राष्ट्र निर्माण में योगदान को जान सके। पर जितना मांझी जी समय देकर भी इस लोकार्पण में नहीं आए और न ही यह पुस्तक मुसहर समाज के लोगों तक पहुंचाने में कोई मदद की। इसकी विपरीत वे मुगल साम्राज्य के स्थापक बाबर पर लिखी पुस्तक" बाबरनामा"की तर्ज पर एक मुस्लिम द्वारा लिखी गई ले पुस्तक "मांझी नामा "को प्रमोट करने में लगे रहे !शायद उनके लिए मुसहर समुदाय के विकास से अधिक उनकी अपनी पापुलैरिटी ज्यादा मायने रखती है। उसके अलावा एक मंत्री के रूप में मोदी सरकार में रहकर कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे मुझे समुदाय का विकास हो सके। जबकि एमएसएमई मंत्री के रूप में वे केवीआईसी (khadi Village Industries Corporation) व राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड के माध्यम से मुसहर सहित अन्य दलित और आदिवासियों को विकास के माध्यम से मुख्य धारा में ला सकते थे पर अभी तक वह होता नहीं दिख रहा।

यह सही है कि राज परिवार के क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद बाबा साहब डॉ आंबेडकर को भारतीय रन से सम्मानित किया और अपने शासनकाल में दलित और अत्यधिक आदिवासियों पर अत्याचार रोकने के लिए एससी एसटी एक्ट 1989 पारित करवाया तथा अपनी कुर्सी की परवाह न करते हुए दशकों से लंबित पड़ी मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करवाया वहीं वैसे समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उच्च शिक्षा संस्थान में दलित और आदिवासी तथा पिछले वर्ग के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी एक्टमें इक्विटी समिति का प्राविधान करवाया पर दलित व आदिवासी समाज के सैकड़ो से अधिक संख्या में सांसद और विधायक कभी भी दलित समाज के साथ हुए अत्याचार पर एक साथ नहीं आए। इतिहास गवाह है कि डॉ आंबेडकर द्वारा पेश किए गए हिंदू कोड बिल के पास न होने के कारण उन्होंने मंत्री पद थे इस्तीफा दे दिया, पर उस समय कोई भी दलित आदिवासी सांसद बाबा साहब के समर्थन में न खड़ा हुआऔर न ही प्रधानमंत्री प जवाहर लाल नेहरू से उनका त्याग पत्र स्वीकार नकरने का आग्रह किया, दूसरी बारवर्ष 1980 में जब देश को बाबू जगजीवन राम के रूप में एक दलित प्रधानमंत्री बनाने का अवसर मिला तो श्रीमती इंदिरा गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की मिली भगत से बाबू जगजीवन राम को सरकार बनाने का निमंत्रण देने और लोक सभा में अपना बहुमत साबित करने का अवसर देने से पूर्व से पूर्व लोकसभा भंग कर दी गई, उस समय भी कोई भी दलित- आदिवासी सांसद इसका विरोध करने का साहस नहीं उठा सका। जब जब भी सरकारों द्वारा दलितों और आदिवासियों के हित के विरुद्ध कोई कदम उठाए जाते हैं तो विपक्षी तो सत्ता धारी पार्टी के दलित - आदिवासी सांसद भी चुप लगाकर बैठ जाते हैं। इससे प्रश्न उठता है की इन वर्ग के लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नाम पर सांसद और विधान विधानसभा मेंजो आरक्षण मिला हुआ है उसका लाभ क्या है।

बहुजन (दलित आदिवासी) के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को भाजपा के संस्थापक सदस्यों से एक प कलराज मिश्र जी से सबक लेने की आवश्यकता है जिन्होंने लगभग 60 वर्षों से अधिक समय तक भारतीत जनसंघ और भाजपा में संगठन, विधायक, सांसद, मंत्री राज्यपाल जैसे पदों का उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। पर यूजीसी ऐक्ट के कारण जब उनके अपने समाज (ब्राह्मण) के साथ अन्याय होने की आशंका हुई तो उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों की परवाह न करते हुए यूं जी सी एक्ट का खुला विरोध किया। और सक्रिय राजनीति की पारी खेलने के बाद अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण परिषद के अध्यक्ष के रूप में अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं पर दलित और आदिवासी के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी भी अपने समाज के हितों पर बोलने का साहस नहीं करते इसी कारण देश को आजाद हुए 7 दशक से अधिक हो चुके हैं पर वंचित समाज वही का वहीं खड़ा हुआ है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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