गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

घूसखोर पंडत फिल्म पर विवाद क्यों?

बसंत कुमार

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मनोज बाजपेई की फिल्म घुसखोर पंडित के शीर्षक पर विवाद हो रहा है यद्यपि उच्च न्यायालय में फिल्म निर्माताओं ने यह आश्वासन दे दिया है का शीर्षक बदल दिया जायेगा, इससे यह विवाद तो रूप गया है पर इसके पीछे कुछ प्रश्न छोड़ दिया गया है कि पंडत शब्द क्या किसी वर्ण विशेष की जागीर है और क्या इस फिल्म के माध्यम से उस वर्ण विशेष की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचा रहा है और फिल्म उद्योग द्वारा बन रही फिल्मों में किसी जाति पर और क्षेत्र के लोगो की विशेष छवि को पेश किया जाता रहा है पर आज तक इस पर विरोध नहीं हुआ तो क्या हजारों वर्ष प्राचीन वर्ण व्यवस्था इतनी इतनी हल्की सोच की हो गई है कि उससे मिलते जुलते नाम पर ही कोई फिल्म बनाने पर विवाद खड़ा हो गया और मामला सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट तक पहुंच गया।

सत्तर के दशक की फिल्मों में जब से फिल्मों में भ्रष्टाचार आदि विषयों पर फिल्में बनने लगी है या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर फिल्में बनने लगी तब से फिल्म केटाइटल पर विरोध होने लगा है। एक दशक पहले फिल्म पद्मावत के मूल शीर्षकों पर विवाद खड़ा हुआ और करणी सेना ने फिल्म के रिलीज पर ही अपनी आपत्ति खड़ी कर दी थी। जबकि रानी पद्मावती का यह चरित्र चित्रण प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने काव्य में कई सदियों पहले लिखा पर उस समय उस पर कोई आपत्ति नहीं उठाई पर अब हम इतने असहनशीन हो गए हैं कि किसी फिल्म के टाइटल मात्र से भड़क जाते है बगैर यही जाने की इसमें फिल्म में उस चरित्र की प्रशंसा है या आलोचना। मैने स्वयं फिल्म पद्मावत देखी और पाया कि रानी पद्मावती का जो व्यक्तित्व फिल्म में दर्शाया गया है उस पर न सिर्फ क्षत्रिय समाज नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज को गर्व होना चाहिए एक पतिव्रता जो सुंदर होने के साथ साथ अपने पति और राज्य की जनता के भले के लिए सोचता रहती है और ऐसे उच्च व्यक्तित्व वाली महारानी के बारे में हमारा पीढ़ियां जाने, बाकी इस ऐतिहासिक सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अलाउद्दीन खिलजी ने हिंदुस्तान में शासन किया और वह बहुत ही क्रूर था बाकी सुंदर स्त्रियों के लिएआकर्षण मानव की कमजोरी रही है और न जाने कितने युद्ध इसीलिय हुए पर हमारे इतिहास में महिला के व्यक्तित्व को लेकर जो अवधारणा रही है वो कभी नहीं बदली और न बदलेगी।

यदि हम अपने समाज में प्राचीन कहानियों को पढ़े तो हर कहानी इसी बात से शुरू होती थी कि गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था और एक धनी साहूकार रहता था जहां ब्राह्मण को लोगो से प्राप्त दान और दक्षिणा से ही गुजारा करता हुआ दिखाया जाता था वही साहूकार बनिया को सूदखोर लोगों की जमीन हड़पने वाला दिखाया जाता था तो क्या इन कहानियों ने सामाजिक सद्भाव को कभी बिगाड़ा, मुंशी प्रेम चंद की कहानी सबसेर गेहूं में गांव के जमींदार का जो चित्रण दिखाया गया है उस पर किसी जमीदार साहू कार ने कभी कोई अपत्ति नहीं की, लेकिन यह कहानी आज के युग में लिखूं गई होता तो मुंशी प्रेम चंद के पुतले जला दिए गए होते या फिर वे किसी कोर्ट में अपने बचाव में वकील के साथ खड़े हुए होते दिखाई देते। उनकी एक और कहानी में किसान की गाय खूंटे से बंधे बंधे मर जाती है और गो हत्या के दोष से किसान का ब्राह्मणों द्वारा जो शोषण दिखाया गया क्या उस पर कभी ब्राह्मण समाज ने क्या कभी आपत्ति की?शायद कभी नहीं बल्कि सभी उसको पढ़कर आनंद उठाते।

जहां तक हिंदी फिल्मों की बात है तो फिल्मों में किसी एक जाति विशेष और क्षेत्र विशेष के लोगों को एक विशेष रूप में दसको से दिखाया जाता रहा है लेकिन कभी इस पर कभीभी भी कोई आपत्ति नहीं हुई। फिल्मों में घर के नौकर क्या रसोईया पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों को दिखाया जाता रहा है और इन्हें महाराज कहके बुलाया जाता है, अब यह नहीं समझ में आता कि महाराज कोई जाति है या एक उपनाम बताया गया है इसी प्रकार पुजारी को किसकी जाति ब्राह्मण होती है उसको पाखंडी ढोंगी सदैव लालची दिखाया जाता रहा है। इस प्रकार बनिया को बेईमान सूद खोर अत्याचारी दिखाया जाता रहा है बात यहीं तक नहीं रुकती क्षत्रिय को ठाकुर जमीदार के रूप में दिखाई जाता है जो जनता पर अत्याचार करता रहता है और जनता उनके रहमों करम पर जीती है जैसे राजेंद्र कुमार और प्राणद्वारा अभिनीत फिल्म गवार में जो जमीदार राजपूत की छवि दिखाई गई है और कभी भी गले से नहीं उतरती पर किसी भी वर्ग ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई भारतीय फ़िल्म उद्योग की पहली फिल्म अछूत कन्या में अंतर्जातीय विवाह जैसी चीज दिखाइए और यह दर्शाया गया की एक दलित कन्या को समाज में किस तरह से ट्रीट किया जाता है पर इस पर किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं दिखाई, वही फिल्मों में पादरी को नेक और मुसलमान को आतंकी दिखाया जाता है और दलित को पूरी फिल्में हाथ जोड़ता हुआ और कोड़े खाते हुए दिखाया जाता है पर आज तक इस समाज में कभी आपत्ति नहीं हुई पर ऐसा क्या है कि अब लोग इन छोटी-छोटी बातों पर लोग सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं। और हमारे न्यायालय अपने बेशकीमती समय को लाखों की संख्या में पेंडिंग मामलों को निपटाने के बजाय इन फालतू बातों पर ध्यान देते है।

वैसे यह बात सर्वविदित है कि पंडित शब्द किसी जाति विशेष के लिए नहीं इस्तेमाल नहीं किया जाता क्योंकि हिंदू वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण एक वर्ण है ना कि जाति है और उसी तरह से पंडित सम्मान पूर्वक विद्वानों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला शब्द है इसको किसी भी रूप में ब्राह्मण का समानार्थी या पर्यायवाची नहीं माना जा सकता जैसेप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया आशीर्वाद जी को लीजिए इसीलिए उनको पंडित इसलिए कहा गया है कि अपने क्षेत्र की महान विभूति है जबकि उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है इसी प्रकारअनेक विभूतिया है जिनको हम पंडित कहते हैं लेकिन वह जाति से ब्राह्मण नहीं है। पंडित आनंद नारायण मुल्लाह एक ऐसी विभूति थे जिनके नाम के आगे पंडित और पीछे मुल्लाह दोनों सब लगे हैं। इसी प्रकार पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिसके नाम के आगे पंडित और पीछे बिस्मिल दोनों लगा हुआ था। पता नहीं कितने ऐसे लोग हैं जो नाम के आगे पंडित तो लगते हैं पर उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है फिर इस फिल्म में पंडित को ब्राह्मण का पर्यायवाची क्यों मान लिया गया और उसके रिलीज होने पर आपत्ति क्यों लगाई। पता लगा है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्म निर्माताओं जाता हूं भारत सरकार और फिल्म सेंसर बोर्ड को नोटिस जारी किया है कि इस टाइटल के साथ फिल्म कैसे पास की गई जबकि वास्तविकता यह है कि पंडित शब्द किसी भी रूप में ब्राह्मण का पर्यायवाची नहीं है।

नाम के आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने पर प्रसिद्ध राष्ट्रवादी विचारक व विद्वान डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी ने एक आपत्ति उठाई थी की डॉ. आंबेडकर जो जिनके पास 32 डिग्रियां थी कई भाषाओं का ज्ञान था वह कानून की अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और संविधान निर्माता के रूप में विभिन्न विषय पर पकड़ थी पर उनके आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय उन्होंने उन्हें बाबा साहब बना दिया गया और जवाहर लाल नेहरू नेहरू जो किसी भी दृष्टिकोण से विद्वान नहीं थे उनके नाम के आगे पंडित लगा दिया गया। इसी तरह देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले पद्म विभूषण से सम्मानित डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने भी कहा था कि हम डॉक्टर अंबेडकर को बाबा साहब आंबेडकर के बजाय पंडित आंबेडकर क्यों नहीं कह सकते और संभावित इन लोगो की यह बात मान ली गई होती तो आज हिंदू समाज में सवर्णों और दलितों के बीच जो शीत युद्ध चल रहा है वह नहीं हुआ होता और संभवत बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने धर्मांतरण नहीं किया होता इसलिए हमें यह मानना पड़ेगा की पंडित शब्द शब्द किसी जारी के लिए नहीं बल्कि विद्वता का सूचक है और यह विद्वानों के साथ ही लगाए जाना चाहिए।

कैसी विडम्बना है कि दुनियां की सबसे प्राचीन संस्कृतियों में से एक जिसने अपने देश में आने वाले विभिन्न संस्कृतियों को मानने वाले लोगों को अपने में समाहित कर लिया है और इस संस्कृति में प्राचीन काल से विभिन्न जातियों को लेकर अनेक कहावतें कही जाती रही हैं और कभी भी किसी जाति के लोगों ने बुरा नहीं माना, पर आज हमारी सोच इतनी संकीर्ण हो गई है कि एक फिल्म के टाइटिल पर ही इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया गया है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

लोकसभा अध्यक्ष कह रहे हैं प्रधानमंत्री को घेरने वाले थे

 

राहुल गांधी में बदलाव की संभावना नहीं

अवधेश कुमार 

शीर्ष स्तर की राजनीति में इस स्तर का टकराव ,जिसमें बीच कोई रास्ता नहीं, हर दृष्टि से चिंताजनक है। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नहीं बोल पायें यह सामान्य स्थिति नहीं थी। इसमें भी जिन कारणों से वे नहीं बोल पाये वह डर पैदा करने वाला है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला आसन से कह रहे थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि सदन में न आयें क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है। इसके पहले लोकसभा या राज्यसभा में यह स्थिति कभी देखी नहीं गई। शायद इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी। विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के भाषण में बाधा डालना, बहिर्गमन करना, यहां तक कि बेल में आकर हंगामा करना , संसद की कार्यवाही बाधित करना आदि दृश्य हम सबने देखा है। कांग्रेस के 7-  8 महिला सांसदों का प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच कर घेरा जैसी स्थिति बनाना बिल्कुल असामान्य स्थिति थी। हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री के आने पर वहां क्या दृश्य उत्पन्न होता! कांग्रेस ने घोषणा किया था कि अगर विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं बोल पायें तो प्रधानमंत्री को भी नहीं बोलते देंगे। तो क्या महिला सांसद उनके आसन तक जबरन रोकने गये थे? संसद के नेता को रोका जाएगा तो स्वाभाविक है पार्टी और गठबंधन के सांसद वहांप्रतिरोध करने आएंगे। उसमें संसद का दृश्य क्या होता इसकी कल्पना से भय पैदा होता है! प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अवश्य भाषण दिया लेकिन लोकसभा में कांग्रेस अपने रवैये पर कायम है।

संसद में अनेक अवसर आए हैं। बोफोर्स भ्रष्टाचार के आरोप में 24 जून, 1989 को लोकसभा में विपक्ष के 110 में से 106 सांसदों ने त्यागपत्र दे दिया था। लंबे समय तक इसके विरुद्ध संसद के दोनों सदनों में विरोध हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में अभियान चल रहे थे किंतु हमारे माननीय सांसद इतने विवेकशील थे कि कभी सदन में सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। महिला आरक्षण विधेयक के तीखे विरोध में विधेयक की कॉपी छीनकर अवश्य फाड़ी गई लेकिन इससे आगे लोकसभा अध्यक्ष या आसन को अपमानित करने या चिढ़ाने की स्थिति कभी नहीं थी।  यूपीए सरकार के कार्यकाल में कॉमनवेल्थ,  2जी  सभी मामलों पर हंगामा हुआ, कार्यवाही बाधित हुई , लेकिन सांसद प्रधानमंत्री की सीट को उनके आने के पहले से घेर लें या महिला सांसदों का इसके लिए उपयोग किया जाए यह अवस्था कभी नहीं आई। जब 2014 में संसद के दोनों सदनों में आंध्रप्रदेश के विभाजन और तेलंगाना राज्य के निर्माण का विधेयक पारित करना था तो भी समस्या आई थी। 14 फरवरी को लोकसभा में विधेयक पारित होने के दिन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बोलते समय ऐसी स्थिति पैदा हुई कि लोकसभा टीवी का प्रसारण रोकना पड़ा। हाथापाई और गाली गलौज की नौबत तक स्थिति पहुंची थी। 20 फरवरी 2014 को राज्यसभा में विधेयक पारित करने के लिए सारे दरवाजे बंद कर मार्शल को बुलाना पड़ा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बोलते समय विधायक छीनो विधायक फाड़ो  जोर-जोर से चिल्ला रहे थे और  तृणमूल सांसद सुखेन्दु राय ने प्रधानमंत्री के बोलते समय कागजात फाड़ दिए। उसके बाद फिर सभापति को कठोर निर्णय लेना पड़ा। संसद के अंदर कई सांसद हेलमेट पहन कर आने लगे थे। कई सांसद ने आरोप लगाया कि उनके साथी गाली दे रहे हैं और धमका रहे। एक सांसद ने मिर्च का स्प्रे भी छोड़ा लेकिन सदन के बाहर। किसी स्थिति में प्रधानमंत्री की सीट को पहले से घेर लिया जाए ऐसी घटना नहीं हुई।

  देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2016-17 से स्थिति ज्यादा बिगड़ी है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अध्यक्ष और सभापति के आसन की ओर कागज फेंकना, आगे टेबल पर खड़ा होकर मिमिक्री करना आदि संसदीय परंपरा के विपरीत व्यवहार सतत रूप में  देखा गया है।  वर्तमान लोकसभा में पहले दिन से विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तय होता है कि यही बोलना है, सदन में क्या विषय  है इससे उनका मतलब नहीं रहता। राष्ट्रपति अभिभाषण पर कई विषयों में सरकार की आलोचना हो सकती है, घेरा जा सकता है । लेकिन उनका विषय पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक थी जिसके बारे में अध्यक्ष ने एक नियमन दे दिया। पिछले कुछ वर्षों में संसद सत्र के आरंभ होने के पूर्व विदेश से कोई रिपोर्ट आ जाती है और हंगामा हो जाता है। पीगैसस, हिंडेनबर्ग रिपोर्ट से लेकर गुजरात दंगे पर बीबीसी डॉक्युमेंट्री आदि की एक लंबी कड़ी है। अंततः इसके परिणाम शून्य आते हैं। ज्यादातर मामले उच्चतम न्यायालय में गए और विपक्ष को कोई लाभ नहीं हुआ। इस बार विदेश में बैठे एक व्यक्ति की एक पत्रिका में प्रकाशित आलेख को राहुल गांधी ने आधार बनाया। हालांकि उसे लेख में ऐसा नहीं है कि जिससे लगे कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 में गलवान घटना के बाद चीन के विरुद्ध कार्रवाई में सेना के हाथ बांध दिए थे। इसलिए कुछ लोगों की टिप्पणी है कि उन्हें बोलने दिया जाता तो कोई अंतर नहीं आता। यह विषय विस्तार से चर्चा की है जो यहां संभव नहीं। इतना ध्यान रखना चाहिए कि चीन के साथ 1962 के बाद केवल 1967 में सीमा पर गोली चली उसके बाद कभी नहीं। गलवान संघर्ष में भी गोली नहीं चली थी। पूरा  गुत्थम-गुत्था लाठी, डंडे , पत्थर, रड , कंटीले ताड़ आदि से हुआ था। 

मुख्य बात यह है कि संसद में हमारा आचरण कैसा हो?  संसद के बाहर भी हम धरना-प्रदर्शन देते,मार्च करते हैं तो पुलिस प्रशासन की निश्चित जगह तक अनुभूति होती है। वहां तक जाने के बाद हम रुक जाते हैं या निर्धारित धरना स्थल पर धरना देते हैं। उसका उल्लंघन करते हैं तो पुलिस हमें हिरासत में लेती है या  गिरफ्तार करती है। यानी सड़क पर विरोध के भी नियम हैं। संसद को सड़क के आंदोलन से भी बुरी अवस्था में पहुंचा दिया जाए जहां अध्यक्ष के नियमन का कोई मूल्य न रहे इससे ज्यादा भयावह स्थिति कुछ नहीं हो सकती। यह भी नहीं कह सकते कि सब कुछ अनायास हो रहा है। राहुल गांधी इस समय लोकसभा में देश के सबसे बड़े नेता हैं। सबसे ज्यादा सांसद उनके हैं। तीन राज्यों में उनकी अपनी सरकार है तथा तमिलनाडु की सत्ता में उनकी भागीदारी है। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बाद किसी भी पार्टी से उनकी हैसियत बड़ी है। ऐसा नेता बगैर सोचे - समझे और रणनीति के इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकता। 

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आई तो संविधान समाप्त कर देगी, आरक्षण हटा देगी जैसे दुष्प्रचार का कुछ हद तक राजनीतिक लाभ कांग्रेस एवं विपक्ष को मिला। क्या यह रणनीति है कि कुछ दूसरे मुद्दे उठाकर उसको और आगे ले जाया जाए? नेपाल और बांग्लादेश में जेन जी के नाम से हिंसक और उग्र आंदोलन से उथल-पुथल का दृश्य हमारे सामने है। राहुल गांधी देश के संविधान व लोकतंत्र को बचाने के लिए जेन जी से हम आपके साथ हैं की घोषणा से कि पहले ही अपील कर चुके हैं। संसद के दोनों सदनों के आसनों को भी वे और उनकी पार्टी पक्षपाती करार दे रही है। कभी बोलते समय मेरा माइक बंद कर दिया जाता है , मुझे बोलते नहीं दिया जाता है जैसी अकल्पनीय स्थिति उनके सामान्य वक्तव्य हो चुके हैं। उच्चतम न्यायालय के कुछ फैसलों और टिप्पणियों के विरुद्ध सार्वजनिक वक्तव्य भी हम देख रहे हैं। चुनाव आयोग को भाजपा का एजेंट बताया ही जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की मुख्य यूएसपी रक्षा और सुरक्षा है। तो क्या इसी मुद्दे पर उसे कमजोर और झूठा साबित करने की रणनीति है? ये सारी संभावनाएं इसलिए सशक्त लगतीं हैं क्योंकि बयानों और व्यवहारों का पैटर्न इसके अनुरूप दिखाई देता है। इस लोकसभा की शुरुआत के दिन से राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दों पर उन्होंने कभी नहीं बोला। उनका अपना विषय होता है और अध्यक्ष के रोकने पर उनकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है कि हमें बोलते नहीं दिया जाता।

स्पष्ट है कि इसमें बदलाव की तत्काल संभावना नहीं। इस प्रश्न का किसी के पास उत्तर नहीं किया कहां जाकर समाप्त होगा। इसका हल ढूंढना ही होगा। राजनीति इस अवस्था में कतई नहीं जानी चाहिए जहां वापस लौटने की स्थिति न रहे।

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