सोमवार, 2 मार्च 2026

ईरान पर अमरीकी हमलों पर OIC की चुप्पी तो देखो

विवेक शुक्ला
मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर रमजान की रौनक अपने चरम पर थी। मीनारा मस्जिद के आसपास की गलियों में खरीददारों की भीड़ उमड़ रही थी। इसी हलचल के बीच एक होटल में बैठे कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार और कारोबारी गहरी चिंता के साथ मुस्लिम देशों के संगठन, Organisation of Islamic Cooperation (ओआईसी), की निष्क्रियता पर चर्चा कर रहे थे। उनका सवाल सीधा था—अमरीका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भी ओआईसी की आवाज़ इतनी धीमी क्यों है?
57 मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने वाला यह संगठन अक्सर फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर मुखर रहता है, प्रस्ताव पारित करता है और कड़े बयान जारी करता है। लेकिन जब मामला ईरान जैसा प्रभावशाली और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में अहम देश हो, तब उसकी प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत नरम क्यों दिखाई देती है? यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक जटिलताओं से जुड़ा है।
अमरीका और ईरान के बीच तनाव कोई नया अध्याय नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंधों में अविश्वास और टकराव बना हुआ है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगाए गए प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में उसकी बढ़ती भूमिका ने इस तनाव को और गहरा किया है। जब भी हालात बिगड़ते हैं, पूरी दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिक जाती हैं। ऐसे समय में उम्मीद की जाती है कि इस्लामिक देश एकजुट होकर शांति, संवाद और न्याय की वकालत करेंगे। पर व्यवहार में तस्वीर अधिक जटिल दिखती है।
ओआईसी का गठन मुस्लिम देशों के बीच सहयोग, एकता और साझा हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था। सिद्धांततः यदि किसी सदस्य देश पर संकट आए तो बाकी देश उसका समर्थन करें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी आवाज़ बनें। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह संगठन अक्सर औपचारिक बयानों तक सीमित रह जाता है। ईरान के मामले में भी कई देशों ने सावधानी भरे वक्तव्य दिए, कुछ ने चुप्पी साध ली, और कुछ ने अप्रत्यक्ष रूप से अमरीकी रुख के प्रति सहमति जताई।
इस विभाजन के पीछे सबसे बड़ी वजह मुस्लिम दुनिया के भीतर मौजूद वैचारिक और रणनीतिक मतभेद हैं। पश्चिम एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रभाव की प्रतिस्पर्धा रही है। एक ओर शिया नेतृत्व वाला ईरान है, तो दूसरी ओर सुन्नी बहुल खाड़ी देश। यह प्रतिस्पर्धा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व, सुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव से भी जुड़ी है। परिणामस्वरूप, किसी भी सामूहिक मंच पर सर्वसम्मति बनाना कठिन हो जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण कई मुस्लिम देशों के अमरीका के साथ गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। खाड़ी देशों की सुरक्षा संरचना काफी हद तक अमरीकी सैन्य सहयोग पर आधारित है। ऊर्जा व्यापार, हथियार सौदे और निवेश संबंध भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में वे खुलकर अमरीका की आलोचना करने से बचते हैं। उनकी प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों और आंतरिक स्थिरता की रक्षा करना होती है। इस यथार्थवादी दृष्टिकोण के कारण वे ईरान के समर्थन में आक्रामक रुख अपनाने से हिचकते हैं।
इसके अलावा, कुछ अरब देशों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव के लिए ईरान की नीतियाँ भी जिम्मेदार रही हैं। यमन, सीरिया और इराक में उसकी सक्रियता को लेकर कई देशों में असंतोष है। इसलिए वे इस टकराव को केवल “मुस्लिम देश बनाम अमरीका” के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में आंकते हैं। यही सोच ओआईसी के भीतर साझा बयानबाज़ी को सीमित कर देती है।
ओआईसी की कार्यप्रणाली भी एक बाधा है। संगठन अक्सर सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाता है। जब सदस्य देशों के हित, गठबंधन और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हों, तब कठोर और स्पष्ट निर्णय लेना कठिन हो जाता है। कई बार तीखे शब्दों वाले प्रस्ताव पारित तो हो जाते हैं, लेकिन उनके अनुपालन या ठोस कूटनीतिक कदमों का अभाव रहता है। इससे संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
दूसरी ओर, आम मुस्लिम समाज की अपेक्षाएँ अलग हैं। वे चाहते हैं कि इस्लामिक देश अन्याय या बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ एकजुट स्वर में बोलें। सोशल मीडिया पर भी यह भावना दिखाई देती है कि कम से कम कूटनीतिक स्तर पर मजबूत और स्पष्ट रुख अपनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकारें भावनात्मक आवेगों की बजाय रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा गणनाओं के आधार पर निर्णय लेती हैं।
इस स्थिति का व्यापक प्रभाव भी है। यदि 57 देश सचमुच एक मंच पर संगठित होकर बोलें, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव काफी बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर वे एक मजबूत दबाव समूह बन सकते हैं। पर आपसी अविश्वास और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण यह संभावना अक्सर साकार नहीं हो पाती।
यह भी सच है कि केवल धार्मिक या भावनात्मक एकता से जटिल अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान नहीं होता। मुस्लिम देशों के बीच आर्थिक असमानताएँ, शासन प्रणालियों में अंतर, सुरक्षा चुनौतियाँ और बाहरी शक्तियों के साथ अलग-अलग रिश्ते हैं। जब तक इन अंतर्विरोधों को स्वीकार कर संवाद और सहयोग की दिशा में ठोस प्रयास नहीं होंगे, तब तक किसी भी बड़े संकट पर एकजुट प्रतिक्रिया की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।
अमरीका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने एक बार फिर इस्लामिक दुनिया की आंतरिक सीमाओं को उजागर किया है। Organisation of Islamic Cooperation के सामने चुनौती यही है कि वह केवल औपचारिक वक्तव्यों तक सीमित न रहे, बल्कि सदस्य देशों के बीच भरोसा, पारदर्शिता और साझा रणनीति विकसित करे। यदि इस्लामिक देश वैश्विक मंच पर प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मतभेद कम कर व्यापक सामूहिक हितों को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा हर बड़े संकट में उनकी बंटी हुई प्रतिक्रिया निराशा को ही जन्म देती रहेगी।

जब कश्मीर के मसले पर ईरान भारत के साथ खड़ा था

विवेक शुक्ला
अब जब अमरीका ने ईरान के खिलाफा जंग छेड़ी हुई है और इस मौके पर भारत साफ तौर पर अमरीका के साथ खड़ा नजर आ रहा तब 1994 की एक घटना को याद करना जरूरी है। उस समय भारत के प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने अपने विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजने का फैसला किया — जबकि दिनेश सिंह एम्स में भर्ती थे और स्ट्रोक के बाद बेहद कमजोर हालत में थे। सवाल उठता है, आखिर इतनी क्या मजबूरी थी कि बीमार मंत्री को अस्पताल से सीधा ईरान भेजा गया?
मामला क्या था? - मार्च 1994 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही थी। पाकिस्तान, इस्लामी देशों के संगठन OIC के कई देशों के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाना चाहता था। अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता, तो मामला आगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक जा सकता था — जो भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक मुश्किल बन सकता था।
ईरान क्यों अहम था? विदेश मामलों के जानकार और हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में कूटनीति पर लिखते रहे अरुण कुमार उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि OIC में आमतौर पर फैसले सहमति (कंसेंसस) से होते हैं। अगर कोई बड़ा देश जैसे ईरान साथ न दे, तो सहमति टूट जाती है और प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाता।
यहीं पर ईरान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई। भारत चाहता था कि ईरान इस प्रस्ताव का समर्थन न करे।

बीमार दिनेश सिंह को ही क्यों भेजा गया? - दिनेश सिंह उस समय स्ट्रोक से उबर रहे थे और दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा था। फिर भी राव ने उन्हें ही भेजने का फैसला किया, क्योंकि वे खुद विदेश मंत्री थे, उनका कद और साख ज्यादा थी। ईरान को यह दिखाना जरूरी था कि भारत इस मुद्दे को कितना गंभीर मान रहा है। अगर कोई जूनियर मंत्री जाता, तो उतना असर शायद नहीं होता। एक बीमार, व्हीलचेयर पर आए वरिष्ठ मंत्री का जाना अपने आप में एक मजबूत संदेश था। 

ईरान में क्या हुआ? - दिनेश सिंह का काम था प्रधानमंत्री राव का निजी संदेश ईरान के राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफ़संजानी तक पहुँचाना। उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर वेलायती से भी सीधे बात की। बताया जाता है कि ईरानी नेतृत्व उनके स्वास्थ्य की हालत देखकर हैरान रह गया — और इससे भारत की गंभीरता का अंदाज़ा उन्हें साफ हो गया। मिशन कुछ घंटों का ही था। दिनेश सिंह सीधे वापस भारत लौटे और फिर अस्पताल चले गए।

नतीजा क्या निकला? - आखिरकार ईरान ने उस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। OIC में सहमति नहीं बन पाई और पाकिस्तान की कोशिश कमजोर पड़ गई। जिनेवा में भारत एक बड़ी कूटनीतिक हार से बच गया। इस तरह, राव का यह फैसला — भले ही जोखिम भरा था — लेकिन उस समय की परिस्थितियों में बेहद अहम और सफल साबित हुआ।

सीधी भाषा में कहें तो, राव ने दिनेश सिंह को इसलिए भेजा क्योंकि दांव बहुत बड़ा था। भारत को हर हाल में उस प्रस्ताव को रुकवाना था, और इसके लिए सबसे मजबूत संदेश भेजना जरूरी था — चाहे उसके लिए बीमार विदेश मंत्री को ही क्यों न जाना पड़े। जाने माने आई सर्जन डॉक्टर राजवर्धन आजाद बताते हैं कि वे तब एम्स में ही थे जब दिनेश सिंह अस्पताल से एक खास मिशन के चलते ईरान गए थे। उन्हें इस मामले की जानकारी दिनेश सिंह के फिर अस्पताल में लौटने पर मिली थी।
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