शनिवार, 7 मार्च 2026

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अवधेश कुमार 

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्लाह अल खामेनेई का मारा जाना 21वीं सदी की ऐसी बड़ी घटना है जिसका प्रभाव कई रूपों में संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा। इस्लामी शासन होने के कारण वे व्यावहारिक रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भूमिका खामेनेई की नीतियों के क्रियान्वयन की रही है।अयातुल्लाह होने के कारण उन्हें विश्व भर के शिया मुसलमान अपने शीर्ष मजहबी नेता के रूप में देखते थे। पाकिस्तान ,ईरान ,भारत सहित कई देशों में शिया मुसलमानों का विरोध सामने है। किंतु यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के एक भी पड़ोसी देश ने ईरान का पक्ष नहीं लिया है। हालांकि पिछले वर्ष खामेनेई ने संपूर्ण विश्व के मुसलमानों की एकता का आह्वान किया था। ईरान और उसके बाहर उनके समर्थकों की कल्पना में कभी उनके इस तरह की मौत की बात नहीं आई होगी। हालांकि पिछले वर्ष जून में पहले इजरायल और बाद में अमेरिका के हमले के समय अटकलें लगी थी कि शायद वे देश छोड़कर चले गए। ऐसा हुआ नहीं।

इस घटना की संपूर्ण परिणतियों का स्पष्ट पूर्वावलोकन अभी कठिन है। इतना स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईरान में 1979 से इस्लामी क्रांति का एक दौर तत्काल समाप्त हो गया है।

ऐसा नहीं है कि इस्लामी क्रांति के बाद हुए परिवर्तनों, स्थापित ढांचें, विचारधारायें समाप्त हो गईं हैं पर कम से कम उस रूप में आने वाले लंबे समय तक मुक्त और स्वतंत्र शिया इस्लामी शासन नहीं हो सकता। यह कथन सामान्य क्रांतियों के संदर्भ में है कि क्रांति के शिशु ही क्रांति को खा जाते हैं। ईरान के इस्लामी क्रांति के बारे में भी तत्काल यह निष्कर्ष सही दिखता है। सामान्यतः आम इस्लामी देशों से थोड़ा उदार और खुले जीवन जीने वाले ईरान में 1979 के इस्लामी क्रांति और अयातुल्लाह के सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापना संपूर्ण विश्व की दृष्टि से एक नई घटना थी। इसमें केवल ईरान नहीं संपूर्ण अरब और कुछ मायनो में इससे बाहर भी गैर इस्लामी या इस्लाम विरोधी शासनों के अंत और इसके विस्तार का विचार प्रबल था। यहूदी देश इजरायल को इस्लाम का दुश्मन घोषित करते हुए ईरान राष्ट्र का लक्ष्य धरती से उसका नामोनिशान मिटाना हो गया। अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों को शैतान कहा गया। यह व्यावहारिक तौर पर विश्व में एक इस्लामी विद्रोह की सत्ता का स्वरूप था। सच कहें तो इसी अतिवादी भाव के व्यवहार ने ईरान को उस अवस्था में पहुंचा दिया जहां उसका शांत, स्थिर, सशक्त और सुरक्षित रहना असंभव था। जब आप किसी एक देश के धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करेंगे और उसके अनुसार देश का व्यवहार होगा, बाहर अलग-अलग हिंसक समूह पैदा कर उसकी मदद करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया आपको झेलनी पड़ेगी। आखिर कोई देश ऐसे शासन को कायम रहने देने के पक्ष में क्यों होगा जो उसके अंत को अपना लक्ष्य बनाकर काम कर रहा हो?

इस्लामी क्रांति के साथ 1979 में अमेरिकी दूतावास पर हमले और उसके बाद की तस्वीरें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। अमेरिकी कर्मचारियों के हाथ बांध कर बाहर लाया गया, वे बंधक बनाये गये। तब से हर अमेरिकी राष्ट्रपति की कामना होती थी ईरान से इस्लामी शासन का अंत हो। तत्कालीन ईरानी शासक राजा शाह पहलवी को अपने परिवार और समर्थकों के साथ अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। आज उनके पुत्र रेजा शाह पहलवी और  परिवार अमेरिका में ही है। पिछले लगभग 3 महीने से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों में हमने देखा कि लोग उनकी तस्वीरें लिए वापस आओ के नारे लगा रहे थे। ये लोग अमेरिका से भी हस्तक्षेप की भी मांग कर रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विरोधियों का समर्थन किया,  ईरान को चेतावनी दी पर तत्काल सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। कुछ वक्तव्यों और घटनाओं से लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप इस बार परिणामकारी सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने खामेनेई शासन को चेतावनी दी, न्यूक्लियर कार्यक्रमों को समाप्त करने की शर्तें रखी, ओमान में बातचीत भी आरंभ की किंतु सब रणनीति के तहत था। उसके साथ-ईरान के आसपास अब्राहम लिंकन जैसा सबसे बड़ा नौसैनिक बेरा और अन्य तैयारी होती रही।

दरअसल, 7 अक्टूबर ,2023 को हमास द्वारा उत्सव मना रहे निर्दोष निरपराध यहूदियों पर हमला कर लगभग 1200 लोगों का सरेआम कत्लेआम और बंधक बना लेने की घटना ने पश्चिम एशिया खासकर ईरान इजरायल ,ईरान अमेरिका संबंधों को ऐसे मोड़ पर ला दिया जिसे अयातुल्लाह सहित उनके परिवार के अनेक सदस्यों ,प्रमुख कमांडरों और रक्षा मंत्री आदि की मृत्यु की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। गाजा में हमास , लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुती अयातुल्लाह के ईरान के ही गैर राज्यीय आतंकवादी समूह हैं। उस घटना ने विश्व के हर विवेकशील व्यक्ति और संतुलित राष्ट्रों को अंदर से हिला दिया। हालांकि यहूदियों के विरुद्ध इस्लामी मजहबी भाव को देखते हुए मुस्लिम देशों में आम भाव ऐसा नहीं था किंतु ईरान की तरह भूमिका दूसरे की नहीं थी।

इजरायल और अमेरिका का ऑपरेशन तभी से आगे बढ़ने लगा। लेबनान में हिजबुल्लाह  तथा गाजा में हमास को पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य से इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कार्रवाई आरंभ की। हिजबुल्लाह प्रमुख नजीबुल्लाह और उसके ज्यादातर शीर्ष साथियों की मृत्यु ,उसके केंद्र काफी हद तक नष्ट होने आदि के साथ उसकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि पहले की तरह संघर्ष नहीं कर सकते थे। गाजा में भी संघर्ष जारी रहा और अपने लोगों को सुरक्षित लाने की विवशता रहते हुए भी इजरायल ने हमास के ढांचे को जितना संभव था अंत करने की कोशिश की। डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आने के बाद कुछ समय के लिए लगा कि शायद इजरायल की उनको लेकर अपेक्षाएं गलत साबित हो सकतीं हैं। लेकिन 22 जून 2025 को अमेरिका के शक्तिशाली जीबी 57ए/ बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमोपी  जिसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है, के हमलों में ईरान के तीन महत्वपूर्ण फोर्डो, नतांज और इस्फाहान न्यूक्लियर ठिकानों को नष्ट किया। वस्तुत: अमेरिका और इजराइल क्रमबद्ध तरीके से यहां तक पहुंचे हैं। ईरान पर पिछले एक दशक से ज्यादा के प्रतिबंधों ने उसके तेल व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया और आर्थिक संकट बढ़ता गया। डोनाल्ड ट्रंप ने उन प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के उपाय किए और उनके तेवर ऐसे थे जिसका असर हुआ। इस बीच ईरान रिवॉल्यूशनरी कोर्प्स गार्ड से लेकर प्रमुख रक्षा वैज्ञानिकों आदि की हत्यायें होती रहीं । इजरायल ने भी बीच-बीच में हमले किये। हालांकि पिछले वर्ष ईरान के मिसाइल हमले से इजरायल को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। उसके बाद ज्यादा सशक्त तैयारी का अहसास हुआ और वही किया गया।

आयतुल्लाह के मारे जाने के कुछ घंटे पहले जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा किया कि ईरान के बहादुर लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप अपने घरों में रहें ,चारों तरफ हमारे बम गिर रहे हैं और इस शासन से मुक्त कर आपको हम ईरान सौंप देंगे तब भी शायद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को विश्वास नहीं हुआ होगा कि वे जो बोल रहे हैं वही करने की तैयारी से इस बार ईरान में हस्ताक्षेप हुआ है। देख लीजिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीश में ज्यादातर मुस्लिम देश ही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका और इजरायल का पूरा साथ दिया है। ईरान जिस तरह सऊदी अरब, बहरीन, ओमान, कुवैत ,क़तर आदि सभी स्थानों के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने के नाम पर हमले कर रहा है उसके लगता है कि हर देश उसके विरुद्ध थे। वैसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे पहला और लंबा युद्ध इराक के साथ हुआ जो स्वयं शिया बहुल देश है।

अभी भविष्य की स्पष्ट तस्वीर नहीं प्रस्तुत की जा सकती। ईरान के बचे-खुचे कमांडर अपनी शक्ति से संघर्ष करेंगे,  दुनिया भर के शिया अतिवादी समूह अपने स्तर से हिंसा और विरोध करेंगे, लेकिन ईरान के शासन का लंबे समय तक समूचे देश पर नियंत्रण रहना कठिन होगा। ईरान पर कब्जा कर किसी को सत्ता पर बिठाना अमेरिका के लिए कठिन है। बड़ी संख्या में ईरानी भी किसी बाहरी हस्तक्षेप वाले शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खामेनेई की मृत्यु के बाद तत्काल उनके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुई है जो‌ लोगों की प्रतिक्रियाओ में दिख रही है।‌ ईरान में तुर्क, कुर्द, अज़रबैजानी  अलग-अलग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका हौसला बढ़ा है। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाला समूह भी बहुत बड़ी संख्या में है। इसलिए ईरान के एक निश्चित दिशा में पहुंचने के पहले वहां घटनाएं अनेक मोड़ लेंगी और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस्लामी शासन का ऐसा हस्र पूरी दुनिया के इस्लामवादियों के लिए सबक होना चाहिए। जो भी हो 1979 इस्लामी क्रांति के सिद्धांत वाली ऐसी शासन व्यवस्था वहां कायम नहीं रह सकती, जिसका संपूर्ण देश पर प्रभावी नियंत्रण हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

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