सोमवार, 26 जनवरी 2026

यूजीसी अधिसूचना 2026 का विरोध क्यों?

बसंत कुमार

अभी हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देशभर में उच्च शिक्षा संस्थान में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम अनुसूचित किए हैं, इन नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान के परिसर ने समानता इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य कर दिया गया है, इनका न पालन करने पर संस्थान को डिग्री या कार्यक्रम प्रदान करने से रोकने और दंड का सामना पड़ सकता है। नए नियमावली के अनुसार प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र स्थापित करना और समावेशन सुनिश्चित करना है, इसके अंतर्गत एक इक्विटी कमेटी गठित होनी है जिसका जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। कमेटी में ओबीसी विकलांग एससी-एसटी और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। इक्विटी कमेटी को वर्ष में काम से कम दो बैठक करना अनिवार्य होग, प्रत्येक संस्थान को ईओसी के कार्य प्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी को प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

अब प्रश्न क्या उठना है कि इस नई नियमावली की आवश्यकता क्यों पड़ी संभवतः इसके निम्न कारण दिखाई देते हैं-

  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्च शिक्षा संस्थानों में क्षमता को बढ़ावा देना वन में 2026 को 13 जनवरी 2026 को अनुचित किया यह वर्ष 2012 से लागू भेदभाव रूपी नियमों का अध्यतन रूप है।
  • पिछले वर्ष फरवरी में यूजीसी ने इन नियमों का मसौदा संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग की जाति आधारित व भेदभाव के दायरे से बाहर रखा क्या गया था।
  • मसौदा न्यू मूवी यह भी प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हाथों उत्साहित करने के लिए जुर्माने का प्रावधान किया जाए।
  • अंतिम अधिवेशन नियमों में यूजीसी में ओबीसी को जाकर भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है साथ ही भेदभाव की परिभाषा को थोड़ा परिभाषित किया गया है ताकि इसमें वर्ष 2012 के भिन्नमालयों की निहित भाषा को भी शामिल किया जा सके।

-    अब भेदभाव अब की परिभाषा किसी भी हित कारक के खिलाफ चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष हो केवल धर्म चाहती लिंग जन्म स्थान विकलांगता या इसमें से किसी भी आधार पर किया गया, अनुचित क्या पक्षपात पूर्ण व्यवहार या कोई भी कार्य भेदभाव के अंतर्गत शामिल किया जाएगा।

यूजीसी के उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा को प्रोत्साहित करने के नियम 2026 पर विवाद काफी गहरा गया है उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों में सवर्ण समाज इसका विरोध कर रहा है। जबकि सरकार इसे सामान्य बढ़ाने की पहला बता रही है, विरोधियों का कहना है कि यह असमानता को बढ़ावा देगा समान समाज ने इस नियमावली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उत्तर प्रदेश के विधान परिषद के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को लिखे अपने पत्र में निमन बातें लिखी है -

-    पिछला वर्ग और दलित वर्ग के छात्रों के साथ किसी भी तरह का न्याय नहीं होना चाहिए लेकिन नए नियम बनाते समय सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए नया नियम सामान्य समाज के छात्रों के उत्पीड़न का कारण बन सकता है।

इस नए अधिनियम का विरोध करने के लिए सवर्ण समाज पूरी तैयारी के साथ बैठा हुआ है वही डासना धाम के महंत महामंडलेश्वर यदि नरसिंहानंद गिरि ने गंगा किनारे इस अधिनियम के विरोध के लिए धरने पर बैठने जा रहे थे पर पुलिस ने शांति व्यवस्था के गड़बड़ होने की आशंका से महामंडलेश्वर को वहां जाने से रोक दिया, परिणामस्वरूप महामंडलेश्वर की समर्थकों ने इसका घोर विरोध किया, कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के एक सिटी मजिस्ट्रेट ने इस अधिनियम और महामंडलेश्वर के साथ हुए व्यवहार के कारण अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है पर यह स्पष्ट नहीं है कि उस मजिस्ट्रेट कर त्यागपत्र कुछ और कारणों से है या यूजीसी के नए नियमावली के विरोध में है।

यूजीसी का कहना है कि नए नियम साल 2012 के उसे भेदभाव निरोधी ढांचे को मजबूत करने के लिए जारी किए गए हैं उनका तर्क है कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 2019 की तुलना में 2023 में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। हकीकत यह भी है कि यह निर्णय हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या और सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के निर्देश के बाद आया है। रोहित वेमुला केस में उसे वक्त देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालय के कैंपस का राजनीतिक कम तापमान बढ़ गया था। विपक्ष ने इस मामले को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। वामपंथी दलों के साथ साथ जवाहर लाल यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में महीना तक प्रोटेस्ट चला था।

इस यूजीसी ऐक्ट में अति पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को भी जोड़ दिया गया है लेकिन एक बात पर ध्यान नहीं दिया गया है कि अति पिछड़ों में वर्गीकृत जाट, यादव, कुर्मी जैसी डोमिनेंट जातियां भी अनुसूचित जातियों और जनजातीय के खिलाफ भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाते हैं। क्योंकि ये जातियां भी अपने आप को क्षत्रिय वंशियों के रूप में मनाती रही हैं। हम दलित और आदिवासियों के साथ भेदभावपूर्ण जातिगत भेदभाव के मामले में यह सवर्णों से पीछे नहीं रहती है। अगर एससी/एसटी एक्ट में दर्ज हुए मामलों की संख्या पर ध्यान दिया जाए तो ये जातियां दलित और आदिवासियों पर अत्याचार के मामले में बहुत आगे रही है इसलिए यूजीसी एक्ट के अधिनियम-2026 में ओबीसी वर्गों को शामिल करके सिर्फ सवर्ण जातियों को छोड़ दिया जाना भी विवाद का विषय है। ठीक है कि निम्न वर्ग की अधिक पिछड़ी जातियां नाई, कोहार, मल्लाह, लोहार, नोनिया, माली आदि दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार नहीं करती या भेदभाव नहीं करती पर जो ओबीसी में वर्गीकृत डोमिनेंट जातियां हैं वे इन पर भेदभाव करती हैं और इस बात को इनकार नहीं किया जा सकता इसलिए यह नियमन सूचित करते समय की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था।

यूजीसी के उच्च शिक्षण संस्थान में एससी -एसटी के साथ-साथ ओबीसी को भी शामिल किया गया है क्योंकि यूजीसी का मानना है कि अब तक के पिछले प्रावधान कैंपस में जांच के भेदभाव को कम करने में या रोकने में नाकाम रहे हैं। यूजीसी की अपनी रिपोर्ट के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतें कम होने के बजाय बढ़ी है, जब इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हो रही है तो इसे रोकने के लिए सशक्त समयबद्ध और जवाब देह प्रावधानो की जरूरत होती है, इसी कारण नए नियमों के अनुसार भेद भाव की शिकायत के 24 घंटे में समिति की बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्यवाही की समय सीमा तय की गई है। जब यह सवाल उठाए जा रहा है कि इस समिति में सवर्ण वर्ग या सामान्य वर्ग के लोगों को क्यों नहीं शामिल किया गया तो इस बारे में ध्यान देने की बात यह है कि इस मामले में जो भी कमेटी बनेगी, उसका अध्यक्ष संस्थान का प्रमुख होगा और यह भी बात किसी से छिपी नहीं है की उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रमुख ज्यादातर सवर्ण समाज के व्यक्ति होते हैं और उच्च शिक्षा के प्राइवेट संस्थान अधिकांशतः ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य समाज के लोगो के होते है, इसके अलावा समिति में एससी/एसटी या ओबीसी को रखने के बाद इसलिए की गई है कि स्वतंत्र भारत में पिछले 80 वर्षों से एक परिपाटी चली आ रही है कि सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री दलित ही होगा और आदिवासी मंत्रालय का मंत्री आदिवासी ही होगा और अल्पसंख्यक मंत्रालय का मंत्री मुस्लिम या ईसाई होता है और गृह मंत्रालय या शिक्षा मंत्रालय का मंत्री कोई दलित या पिछड़ा न होकर कोई सवर्ण या वैश्य ही होता है। जब तक हम सभी वर्गों एवं जातियों में आपसी विश्वास पैदा नहीं कर लेते तब तक इस तरह की हालत होते रहेंगे जिस दिन एक सवर्ण सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री बनेगा और जाति द्वेष और उत्पीड़न समाप्त हो जाएगा तो इस देश में इस तरह की कमेटी की आवश्यकता नहीं रहेगी।

वर्ष 1950 में तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर द्वारा सदन में हिंदू कोड बिल लाया गया जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज में महिलाओं को समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का देना था, पर उस समय काशी के धर्म गुरु स्वामी करपात्री महाराज के विरोध के कारण यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका और कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और उसके 77 वर्षों बाद भी महिलाएं अपने बराबरी के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसलिए धर्म गुरुओं को विधायिका के कार्यों से दूर रहना चाहिए। अभी भी यूजीसी अधिनियम का विरोध कुछ धर्मगुरुओं और शंकराचार्य द्वारा किया जा रहा है जो उचित नहीं है क्योंकि देश की विधायिका यानी संसद में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर लगभग 700 सांसद है और जिसमें से आधे से अधिक सांसद सवर्ण समाज के हैं तो उनका यह कर्तव्य बनता है कि विधायक का हिस्सा होने के कारण इस अधिनियम के गुण दोष का विश्लेषण करके उसे सदन के माध्यम से उठाएं, इस बिल का विरोध करने वाले संत महात्मा शंकराचार्य ने यह साबित कर दिया है कि वे पूरे हिंदू समाज के धर्मगुरु न होकर सिर्फ सवर्ण समाज के धर्म गुरु है यह स्थिति ठीक नहीं है इससे हिंदू समाज सवर्णों पिछड़ों और दलितों के बीच बट जाएगा और इससे हिंदू संस्कृति का नुकसान होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का लोकार्पण, कांस्टीट्यूशन क्लब में हुआ भव्य समारोह

संवाददाता 

नई दिल्ली। समसामयिक विषयों की अंतरराष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन व परिचर्चा एवं सहस्त्र-चंद्र-दर्शन कर चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मीनारायण भाला जी के जन्मदिवस पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आपको बता दे चाणक्य वार्ता ने अपने गौरवमय 10 वर्षों का सफर पूरा किया है। पत्रिका मौजूदा समय में भारत की लोकप्रिय पत्रिकाओं में एक मानी जाती है। इस कार्यक्रम में पत्रिका के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन किया गया। इस विशेषांक में 125 लेखकों ने बच्चों को केंद्र में बनाकर लेख, कहानियां, कविताओं के माध्यम से अपना योगदान दिया है। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्याम जाजू ने कहा कि चाणक्य वार्ता अपने आप में एक अद्भुत पत्रिका है। कोरोना काल के दौरान अनेक स्थापित पत्रिकाएं बंद हो गई मगर चाणक्य वार्ता इस कठिन समय में भी लगातार प्रकाशित होती रही। उन्होंने कहा कि इस पत्रिका ने कम संसाधनों में भी लंबा सफर तय किया है। यह दिखाता है कि जनहित से जुड़ी पत्रकारिता करने के लिए बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती है। श्री भाला के विषय में बोलते हुए श्याम जाजू ने कहा कि भाला जी 82 वर्ष की आयु में भी बहुत सक्रिय होकर कार्य कर रहें है।वें युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि भाला जी हमेशा लोगों की मदद करने के लिए आगे रहते हैं।

समारोह अध्यक्ष श्री ताई तागा, संरक्षक, विद्या भारती एवं पूर्व अध्यक्ष भाजपा, अरुणाचल प्रदेश ने इस मौके पर नॉर्थ ईस्ट के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाएं गए कदमों को लेकर कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ने नॉर्थ ईस्ट को बाकी राज्यों के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन राज्यों के लोगों को एक नई पहचान देने का काम किया है। इसके अलावा मोदी सरकार के प्रयासों से नॉर्थ ईस्ट में विकास की गंगा बह रही है। समारोह को संबोधित करते हुए डाॅ. विनोद बब्बर, वरिष्ठ साहित्यकार ने चाणक्य वार्ता को 10 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनाएं प्रदान की। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार एवं संविधान विशेषज्ञ लक्ष्मीनारायण भाला ने अपने संबोधन में कहा कि संघ की शाखा के माध्यम से उनको बच्चों से जुड़ने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि बच्चों से उन्होंने बहुत कुछ सिखा है वह कहते है कि उनको 10 से अधिक भाषाएं आती है यह सब उनको बच्चों के माध्यम से सीखने को मिली है। उन्होंने चाणक्य वार्ता को लेकर कहा कि वह इस पत्रिका के संरक्षक है और उनको गर्व है कि पत्रिका को देश के लाखों लोग अपना आशीर्वाद दे रहे है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि यह पत्रिका सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हो रही है। चाणक्य वार्ता आज जनसाधारण की आवाज बनकर सामने आई है। इस कार्यक्रम में डाॅ. बलराम अग्रवाल, बाल साहित्यकार, अलका सिन्हा, वरिष्ठ साहित्यकार ने भी अपने विचार साझा किए। वहीं इस कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत मृत्युंजय झा, मुख्य संयोजक द्वारा किया गया। स्वागत भाषण द्वारा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अजीत कुमार ने सभी का आभार जताया‌।कार्यक्रम का संचालन डाॅ. अमित जैन, संपादक-चाणक्य वार्ता द्वारा किया गया।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को सकारात्मक दृष्टि से देखें

अवधेश कुमार

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तीन दिवसीय कार्यक्रमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जैसी भी रही हो देश ने इससे सकारात्मक संदेश लिया है। कार्यक्रम के आकर्षक दृश्यों ने देश में अपने इतिहास -संस्कृति -सभ्यता -अध्यात्म को लेकर सुदृढ़ हो रही चेतना को और सामूहिक बल प्रदान किया है। स्पष्ट है पूरे कार्यक्रम की योजना अत्यंत गंभीर विवेचन के बाद बनी जिसमें अध्यात्म ,साधना व कर्मकांड सहित इतिहास और पराक्रम का समुच्चय उचित रूप में समाहित था। तीन दिनों के मंत्र जाप के कर्मकांडीय विधान के पीछे संपूर्ण वातावरण में सकारात्मक चेतना और ऊर्जा पैदा कर ब्रह्मांड के कल्याण में योगदान का भाव था तो 108 घोड़े के शास्त्रीय विधान के साथ शौर्य यात्रा न केवल सोमनाथ संघर्ष में बलिदान हुए लोगों को श्रद्धांजलि की ओर लक्षित था बल्कि आत्मविश्वास पैदा करने का भाव भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शौर्य यात्रा का नेतृत्व किया। पूजा और अभिषेक के बाद उपस्थित जन समुदाय का संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जिनने सोचा कि सोमनाथ मंदिर नष्ट हो गया वे कहीं समाप्त हो गए लेकिन आज भी सोमनाथ का यह पताखा लहराता हुआ बता रहा है कि हम पर चाहे जितने हमले हों हमें नष्ट नहीं कर सकते। अंत में उन्होंने कहा भी कि इसी विश्वास के साथ हमें भारत को आगे बढ़ाना है तथा दुनिया की ऐसी शक्ति बनानी है जो विश्व कल्याण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दे सके।


2026 गुजरात के सोमनाथ मंदिर के लिए दो कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक, 1026 में महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमला कर ध्वस्त कर दिया था, जिसके 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। दूसरे, 11 मई, 1951 को स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष हो गए हैं। वर्तमान राजनीति एवं अन्य बौद्धिक क्षेत्र में इसे जैसे भी देखा जाए अगर स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, विद्वान और नेता कन्हैयालाल मानणक लाल मुंशी सहित अनेक महापुरुषों ने इसके पुनर्निर्माण किया तो निश्चय ही इसके पीछे गंभीर विमर्श और चिंतन था। सोमनाथ का उल्लेख द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले आता है- "सौराष्ट्रे सोमनाथं च"।‌ इसका अर्थ है कि सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। सोमनाथ पहला ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती के संगम पर स्थित है। इस त्रिवेणी संगम पर स्नान करने का अपना अलग महत्व है। मंदिर परिसर के बाणस्तंभ पर संस्कृत (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग) और दूसरी तरफ इंग्लिश में एक अभिलेख है। इसमें लिखा है- इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई अवरोध नहीं है। यह वही स्थान माना जाता है जहां भगवान कृष्ण ने अपना शरीर त्याग कर वैकुंठ गमन किया था।


सोमनाथ: द श्राइन इटरनल पुस्तक में केएम मुंशी ने लिखा है कि गजनवी ने 18 अक्टूबर, 1025 को सोमनाथ की ओर बढ़ना शुरू किया और लगभग 80 दिन बाद, 6 जनवरी 1026 को किलेबंद मंदिर शहर पर हमला कर दिया।‌‌ सोमनाथ मंदिर में लूट और विध्वंस की घटना 8 जनवरी, 1026 की है। अनेक लोगों ने प्रश्न उठाया कि आखिर विध्वंस का उत्सव कैसे मनाया जा सकता है? प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। आक्रांता आते रहे, लेकिन हर युग में सोमनाथ फिर से खड़ा हुआ। इतना धैर्य, संघर्ष और पुनर्निर्माण का उदाहरण दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है। उनका यह वक्तव्य सबसे ज्यादा बहस का विषय बना है कि सोमनाथ को तोड़ने वाले आक्रांता आज इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं, लेकिन दुर्भाग्य से देश में आज भी ऐसी ताकतें मौजूद हैं, जो मंदिरों के पुनर्निर्माण का विरोध करती रही हैं। इसे राजनीतिक वक्तव्य मान सकते हैं। किंतु सोमनाथ के इतिहास को बार-बार विकृत करने की कोशिश हुई। कुछ का मानना है कि सोमनाथ सात बार लूटा गया जबकि कुछ 17 आक्रमण की बात करते हैं। सबसे पहला आक्रमण मोहम्मद बिन कासिम के सूबेदार जुनैद ने किया था और अंतिम हमला औरंगजेब द्वारा। यानी 980 ई से लेकर 1702 तक सोमनाथ पर लगातार हमला होता रहा तो इसके पीछे केवल धन लूटना कारण नहीं हो सकता इस पर 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने, 1394 में मुजफ़्फर खान ने और 1459 में ,महमूद बेगड़ा ने हमला किया था।‌ इसके बावजूद मंदिर रहा। वऔरंगजेब ने 1669 में इसे गिराने का आदेश दिया तथा 1702 में  इतना तोड़ दिया गया कि मरम्मत नहीं हो सकी और 1706 में इसे मस्जिद में बदल दिया गया। क्या इसे आप लूट का इतिहास कहेंगे ? नहीं तो इतिहासकारों ने सच्चाई का दमन क्यों किया?


रानी अहिल्याबाई होल्कर ने द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महत्वपूर्ण सोमनाथ की महत्ता को पहचानते हुए 1783 में पास में एक नया मंदिर बनवाया तथा विधिपूर्वक शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई। उनकी सोच थी कि जब वास्तविक जगह पर मंदिर बनेगा तो बनेगा किंतु द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में जाने वाले मस्जिद के पास से लौट जाएं यह अच्छा नहीं होगा, इसलिए वहां एक भव्य मंदिर होना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद पिछले लगभग 1000 वर्ष के काल में ध्वस्त प्रेरणा, चेतना और भारत की अंत:शक्ति के केन्द्रों के पुनरुद्धार की बात उठी और इनमें सबसे पहला स्थान सोमनाथ का ही था।  सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ गएऔर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। मंदिर के निर्माण और धन की व्यवस्था के लिए सोमनाध ट्रस्ट की स्थापना की गई।‌ 15 दिसंबर ,1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया तो मंदिर का दायित्व के एम मुंशी को दी गई। राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद यजमान बने, 1950 में आधारशिला रखी गई और 5 - 6 महीने में पहले चरण का काम पूरा हो गया। जनता द्वारा चंदे से लगभग 25 लाख रुपए इकट्ठे हुए थे। 11 मई, 1951 को राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने प्राण प्रतिष्ठा की। वैसे मंदिर संपूर्ण रूप में बनकर 1955 में तैयार हुआ। 


यहां इनमें विस्तार से जाना संभव नहीं है। किंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल , केएम मुंशी, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एवं अन्य नेताओं के बीच संबंधित पत्र व्यवहार देखेंगे तथा सार्वजनिक वक्तव्यों पर नजर दौड़ाएंगे तो पता चल जाएगा कि इसका कितना विरोध हुआ। पंडित नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन न वे सरदार पटेल को रोक सके न मुंशी को और न डॉ राजेंद्र प्रसाद को। इनके कारण अन्य नेता भी इसमें लगे। डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भूमिका निभाकर परंपरा स्थापित किया था कि गुलामी के कालखंड में ऐसे ध्वस्त स्थानों का स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण होना चाहिए और उसमें सरकार का शीर्ष नेतृत्व भी भूमिका निभा सकता है।  हां, निर्माणों में सरकारी पैसा न लगे इसका ध्यान रखा गया। महात्मा गांधी ने भी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से सहमति व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सरकारी खजाने से इसमें एक पैसा नहीं लगना चाहिए।


कहने का तात्पर्य कि सेक्यूलरवाद के नाम गलत सोच और व्यवहार तब से आज तक कायम है । इसीलिए समस्याएं आती हैं और ऐसे कार्यों को सांप्रदायिक, फासीवादी और न जाने क्या-क्या नाम दे दिया जाता है।


आखिर विदेशी आक्रमणकारियों से लेकर देश के अंदर मजहबी सोच वाले हमलावरों ने सोमनाथ और ऐसे दूसरे मंदिरों को निशाना क्यों बनाया?  मेहमूद गजनवी और उसकी फौज ने केवल संपत्ति लूटकर सोमनाथ मंदिर का विध्वंस नहीं किया था बल्कि उपस्थित व्यक्तियों को मार दिया या बंदी बनाकर अपने साथ ले गया । स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा गया। बलात्कार हुए ,क्रूरता पूर्वक हत्याएं हुईं या बंदी बनाकर ले जाईं गईं  जिन्हें गुलामों के बाजार में बेचा गया।‌ मंदिर परिसर में 50 हजार  लोगों के उपस्थित होने की बात है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का कत्लेआम इतिहास के क्रूरतम अध्यायों में से एक है। मिन्हाज सिराज के अनुसार गजनवी ने मूर्ति के चार टुकडे किये थे, एक गजनी की जमी मस्जिद में, दूसरा उसे शाही महल की सीढियों पर, तीसरा मक्का और चौथा मदीना भेज दिया। महमूद ने मूर्तियों को गलियों और मस्जिद की सीढियों पर डलवा दिया। उसने कहा नमाज के लिए जाने वाले नमाजी इन बूतों को पैरों तले रौंदेंगे। अलबरूनी गजनवी के साथ ही आया था और उसने अनेक बातें इसके संदर्भ में लिखी है। तो स्वाभिमान पर्व से इतिहास के सारे  सच देश के सामने आए जिसमें मजहबी सोच से हमलों‌ और उसके प्रतिरोध तथा पुनर्निर्माण के प्रयास शामिल है । इससे यह विश्वास और गहरा हुआ है कि हमारी शाश्वत अंत:शक्ति को कोई नष्ट नहीं कर सकता। वास्तव में ऐसे पर्व हमारे लिए प्रेरणा और स्थायी आत्मविश्वास के कारण बनते हैं।

 

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

गले की फांस बन रहे हैं दलितों आदिवासियों की सुरक्षा हेतु बनाए गए कानून

बसंत कुमार

भारत सरकार ने देश के दलित और आदिवासियों की सुरक्षा के लिए एससी/एसटी एक्ट के अलावा कुछ कानून बनाए थे जिसमें दलित आदिवासियों की शोषण के विरुद्ध उनकी सुरक्षा की जा सके परंतु देखने में यह आया है कि यह कानून जो उनकी सुरक्षा के लिए बने थे वह उनके गले की फांस बनते जा रहे हैं मसलन 1970 के दशक के दौरान एक कानून बनाया गया था कि कोई भी सवर्ण किसी दलित आदिवासी की जमीन ना लिखवा सके और इसके लिए यह प्रावधान किया गया कि यदि कोई किसी दलित या आदिवासी की जमीन जायदाद लिखवाता है तो उसके लिए जिलाधिकारी की अनुमति होनी चाहिए परंतु आज आर्थिक सुधार के युग में लोग खेती से भाग रहे हैं और उद्यमिता के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं परंतु कोई भी दलित/आदिवासी जिलाधिकारी की परमिशन न मिलने के कारण अपनी पुश्तैनी जमीन को बेचकर कोई उद्योग धंधा नहीं शुरू कर सकता क्योंकि यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कोई भी सवर्ण उसकी जमीन नहीं खरीदना चाहता और खरीदया भी है तो उसे बाजार के हिसाब से वाजिब भी नहीं मिलते इसलिए अब समय आ गया है कि दलितों के लिए की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून पर पुनः विचार किया जाए।

मेरे एक जानने वाले लखनऊ में रहते थे किसी नामी गिरामी कंपनी में काम कर रहे थे सब कुछ ठीक चल रहा था उन्होंने एलडीए से एक फ्लैट भी खरीद लिया था परंतु दुर्भाग्य से उनका एक्सीडेंट हो गया और वो काम करने लायक नहीं रह गए और नतीजा यह हुआ जिस कंपनी में काम करते थे उन्हें निकाल दिया गया और वह बेरोजगार हो गए क्योंकि एक्सीडेंट में उनका एक पैर टूट गया था तो अपने इलाज के लिए वह अपने फ्लैट को बेचना चाहते थे पर क्योंकि वह अनुसूचित जाति के थे इसलिए उनको जमीन या फ्लैट को बेचने के लिए उन्हें जिलाधिकारी की परमिशन मिलनी जरूरी थी और इसी जटिल प्रक्रिया से बचने के लिए उन्हें कोई खरीदार नहीं मिल रहा था और जो लोग खरीदने को तैयार भी थे उसका वाजिब दाम नहीं दे रहे थे परिणाम यह हुआ की वे परमिशन केलिए कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते स्वर्ग को प्यार हो गए, कहने का मतलब यह है की जो उनकी मेहनत की कमाई से बनाई गई थी। वह भी उनके मुसीबत में काम नहीं प्रॉपर्टी अगर सक्षम प्राधिकारी के परमिशन की अड़चन नहीं आती तो उन्हें अपनी जमीन का पूरा लाभ मिल जाता और वह अपना इलाज करा सकते थे पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि जो कानून उनकी सुरक्षा के लिए बनाया गया था वही कानून उनके गले की पास बन गया।

1970 के दशक में मैं अपने जनपद जौनपुर के प्रसिद्ध कॉलेज टीडी कॉलेज का छात्र था वहां पर अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की फीस एक आने हुआ करती थी और सामान्य श्रेणी के बच्चों की फीस सवा छह रुपए हुआ करती थी लेकिन जो दलित या आदिवासी छात्र क्लास टीचर को एक आने थी देने आया करते थे उसे क्लास टीचर के द्वारा व्यंग वाणी सुनने को मिलते थे। कई बार क्लास टीचर कहते थे कि भाई पूरे क्लास की इकट्ठी दे दिया करो यह कभी कहते कि साल भर की इकट्ठी दे दिया करो। अब उस समय के 13-14 वर्ष के दलित छात्रों के मन में क्या गुजरती थी वह स्वर्ण अध्यापक नहीं समझ सकते थे। मुझे इस बात की हैरानी होती थी कि जब इन छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और गरीब सवर्ण छात्रों के लिए विद्यालय मैनेजमेंट की ओर से पुअर फंड जैसी स्कीमें लागू थी, तो यह एक आने फीस का फंडा क्यों रखा गया था इससे दलित व आदिवासी वर्ग के छात्रों में इंफेरियारिटी कंपलेक्स के साथ-साथ उन्हें अपमानित भी होना पड़ता था। मुझे कक्षा 11 का एक किस्सा याद है हम लोग विज्ञान के छात्र थे और विज्ञान केमिस्ट्री के शिक्षक क्लास में आए और सभी बच्चे उनके सम्मान में खड़े हो गए पर एक दलित छात्रा जिसका ध्यान कहीं और था वह अपनी सीट से खड़ा नहीं हुआ तो अध्यापक महोदय ने यह कहकर उसे अपमानित किया की सवा छ रुपए फीस देने वाले सीट से खड़े हो सकते हैं तो तुम एक आने फीस देने वाली इतना भी नहीं कर सकते। कोई भी यह समझ सकता है कि एक पढ़े लिखे सवर्ण शिक्षक द्वारा किसी दलित छात्र का इस तरह से अपमान करना उसके मन में कितनी पीड़ा देता होगा।

यहां तक की देश की संसद और राज्यों की विधानसभा में जब कोई सांसद या विधायक जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आता है और सदन में बोलने के लिए खड़ा होता है तो उसके नाम के आगे उसे क्षेत्र का नाम और सुरक्षित लिख दिया जाता है जबकि सामान्य सीट से आए हुए विधायक या सांसदों के सामने इस प्रकार का जाति बोधक शब्द नहीं लिखा जाता तो क्या सांसद और विधानसभा में भी दलित और आदिवासियों का एक अलग समूह बनाए जाने की मंशा है कायदे से विविधता में अनेकता वाले भारत में यह प्रक्रिया बंद होनी चाहिए क्योंकि ऐसे सांसद जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आए हैं वह सब प्लीज दलित आदिवासियों का प्रतिदिन नहीं करते मैं अपने पूरे क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए किसी भी सुरक्षित सीट से आए सांसद या विधायक के सामने के नाम के आगे उसका क्षेत्र सुरक्षित लिखना की प्रणाली बंद की जानी चाहिए। यह तो कुछ ऐसा ही है जब 18वीं सदी में पुणे में पेशवा के राज में दलितों को अपनी पहचान के लिए कमर में झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था जैसे देश के सबसे सफल और सुलझे हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द जी को सदैव भारत गणराज्य के राष्ट्रपति की बजाय दलित राष्ट्रपति कहा गया।

सन 1989 में एससी/एसटी एक्ट (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक ऐसा कानून आया जो एससी/एसटी लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया ताकि उन्हें सामाजिक सुरक्षा और न्याय मिल सके और उन्हें अपमानित और प्रताड़ित ना किया जा सके। यह कानून विशेष न्यायालय के माध्यम से ऐसे मामलों की सुनवाई करता है और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास प्रदान करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता के उन्मूलन) के तहत एससी/एसटी समुदायों पर होने वाले अपराधों को रोकने और उनके मालिक मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए या कानून संसद द्वारा बनाया गया क्योंकि आईपीसी और अन्य कानून इस घृणित अपराधों के से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

यद्यपि यह अधिनियम दलितों और आदिवासियों को उत्पीड़न और शोषण से बचाने के लिए लाया गया था, पर क्या यह अपने उद्देश्य में सफल हुआ है या एक विचारणीय प्रश्न है। होता यह है कि जो गरीब या आदिवासी वास्तव में पीड़ित होता है और उसके साथ अमानवीय उत्पीड़न की घटना होती है वह सवर्णों के दबाव और भय से पुलिस में जाकर इसकी रिपोर्ट लिखने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि इस देश की पुलिस और प्रशासन दबंग और पैसे वालों की सुनती हैं इसके विपरीत इस अधिनियम का उपयोग सवर्णों की आपस की लड़ाई में अपने यहां नौकरी करने वाले दलित और आदिवासियों को एक दूसरे के विरोध में उपयोग करते देखा गया है, यहां तक की कुछ जमीदार अपने यहां कुछ दलित आदिवासियों को सिर्फ इसलिए नौकरी पर रखते हैं की वह अपने प्रतिद्वंद्वी सजातिय लोगो के विरुद्ध इन दलित और आदिवासियों का उपयोग कर सके। इसलिए जो दलित आदिवासी वास्तव में पीड़ित हैं और उन्हें इस अधिनियम की आवश्यकता है उन्हें उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए पर जो लोग इस अधिनियम का दुरुपयोग करते हुए पाए जाते हैं उन पर कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे यह अधिनियम जिस उद्देश्य के लिए बना था उसका निष्पक्ष रूप से पालन किया जा सके।

आज की परिस्थितियों में वंचितों और आदिवासियों को जहां एक तरफ सुरक्षा प्रदान करना व न्याय दिलाना है, साथ ही साथ उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाना है इसलिए सरकार को चाहिए कि जो कानूनी प्रावधान उन्हें मुख्य समाज से अलग करते है या उन पर दलित आदिवासी होने का ठप्पा लगाते है उन्हें समाप्त करके वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाए तभी एक समरस भारत का निर्माण किया जा सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गृह मंत्रालय नए कानूनों पर झांकी "दण्ड से न्याय की ओर"

संवाददाता

नई दिल्ली। गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत यह झांकी वर्ष 2023 में अधिनियमित एवं लागू किए गए तीन परिवर्तनकारी आपराधिक न्याय कानूनों-भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-कोप्रदर्शित करती है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। यह झांकी "दण्ड से न्याय की ओर" के सिद्धांत से प्रेरित होकर भारत की न्याय व्यवस्था में आए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को रेखांकित करती है।

झांकी का अग्र भागमें नए संसद भवन के ऊपर स्थापित तीन नई कानून पुस्तकों को दर्शाया गया है, जो भारत के संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं।

झांकी के मध्य भाग मेंवैज्ञानिक जांच पद्धतियों और डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग के माध्यम से प्रक्रियात्मक परिवर्तन को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक फॉरेंसिक विशेषज्ञ को अपराध स्थल की जांच करते हुए तथा एक पुलिस अधिकारी को ई-साक्ष्य ऐप के माध्यम से डिजिटल रूप से साक्ष्य एकत्र करते हुए दर्शाया गया है। LED डिस्प्ले पैनल नए कानूनों में निहित प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है, जिसमें ई-साक्ष्य के माध्यम से डिजिटल साक्ष्य संग्रह, नाफिस (NAFIS) द्वारा डिजिटल फिंगरप्रिंट विश्लेषण तथा न्याय श्रुति के माध्यम से वर्चुअल सुनवाई जैसे आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न पहलू शामिल हैं। मोबाइल फॉरेंसिक वैन अपराध स्थल तक त्वरित पहुंच और फॉरेंसिक साक्ष्य संग्रह की गतिशीलता का प्रतीक है। ये सभी तत्व आधुनिक तकनीक के व्यापक उपयोग द्वारा सटीकता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले नए कानूनों के सार को प्रदर्शित करते हैं।

झांकी के पीछे के भाग में एक महिला अधिकारी को एकीकृत नियंत्रण कक्ष प्रणाली संचालित करते हुए दर्शाया गया है, जो समयबद्ध न्याय, त्वरित प्रतिक्रिया, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण तथा सीसीटीवी कैमरों जैसे डिजिटल उपकरणों के प्रभावी उपयोग को प्रदर्शित करता है। झांकी का पिछला हिस्सा विभिन्न भाषाओं में पुस्तकों से सुसज्जित है, जो नए कानूनों की सभी नागरिकों तक पहुंच और उनमें निहित सामूहिक राष्ट्रीय भावना को दर्शाता है। झांकी के भूमि तत्व प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों, विशेष कमांडो इकाइयों में अधिक महिला अधिकारियों और बीट पेट्रोलिंग के माध्यम से जनता-केंद्रित कानूनों के प्रति सामूहिक संकल्प को प्रदर्शित करते हैं, जो समावेशिता, पेशेवर दक्षता, समर्पण और जन-केंद्रित दृष्टिकोण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अवैध कब्जा हटाने व दंगा आरोपियों को जमानत न मिलने पर ऐसा रवैया चिंताजनक

अवधेश कुमार

राजधानी दिल्ली का तुर्कमान गेट पूरे देश में चर्चा का विषय है। पाकिस्तान द्वारा इस पर दिए गए वक्तव्य को आधार बनाएं तो कह सकते हैं इसकी चर्चा सीमा पार भी चला गया है। चर्चा अगर सकारात्मक और उचित हो तो चिंता का कोई कारण नहीं। किंतु यहां तो एक ओर दिल्ली नगरपालिका परिषद द्वारा अवैध निर्माण को गिराने और उसकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस तथा सामने विरोध और पत्थरबाजों से टकराव। अगर इसके दो दिन पहले वापस लौटें तो फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज किया जाना सबसे ज्यादा चर्चा और बवंडर का विषय था। इन दोनों घटनाओं को एक साथ मिलकर देखिए तो कुछ समानताएं दिखेंगीं तथा निष्कर्ष चिंताजनक आएंगे। दोनों मामलों में न्यायपालिका विद्यमान है। जमानत खारिज करने और उनके साथ पांच अन्य आरोपियों को जमानत देने का आदेश हमारे शीर्ष न्यायपालिका का है तो अवैध निर्माण खाली करने का आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय का । इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं को न्यायालय ने तत्काल सुनवाई के योग्य नहीं माना तथा आगे की तिथि निर्धारित कर दी। बावजूद जिस तरह से इसका विरोध हुआ, हो रहा है और जैसी प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं उनको कैसे देखा जाए?

ध्यान रखिए, उमर खालिद और सर्जिल इमाम की जमानत याचिका छठी बार खारिज हुई है। दो बार ट्रायल न्यायालय में ,दो बार दिल्ली उच्च न्यायालय में और दूसरी बार उच्चतम न्यायालय ने। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि एक वर्ष तक अब आरोपी किसी भी न्यायालय में जमानत याचिका नहीं डाल सकते हैं। क्या हम मानते हैं कि उच्चतम न्यायालय बिना ठोस तथ्यों और सबूतों को देखे हुए ऐसा आदेश दे देगा ? उसने जिन पांच लोगों को जमानत दी उनके साथ भी 12 कठोर शर्तें लगाई है। उसमें स्पष्ट लिखा है अगर इन शर्तों का उल्लंघन हुआ तो निचला न्यायालय उनकी जमानत रद्द कर सकता है। इससे समझा जा सकता है कि न्यायालय के सामने किस तरह की सच्चाइयां प्रस्तुत हुईं हैं। ऐसा तो है नहीं कि इन दोनों के लिए मुकदमा लड़ने वाले वहां नहीं थे। सच यह है कि दिल्ली पुलिस की ओर से तो केवल सरकारी वकील थे , जबकि दूसरी तरफ प्रमुख नामी वकीलों की फौज थी। यही हाल दिल्ली तुर्कमान गेट इलाके के मुकदमों का भी था। फैज़ ए इलाही मस्जिद, जिसे लेकर दुष्प्रचार किया गया उसे वक्फ की संपत्ति कहा गया है। कहा जाता है कि उस मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के ही काल में हुआ था। शाही जामा मस्जिद जहां मुगल शासक परिवार से लेकर समाज के उच्च वर्गीय मुसलमानों के लिए थी वहीं सामान्य मुसलमानों के लिए फैज ए इलाही मस्जिद बनाई गई।

हम इसमें नहीं जाना चाहते कि सच क्या है। मुख्य बात है कि मस्जिद के आसपास चारों तरफ ताकत और संख्या बल की बदौलत सरकारी जमीनों पर कब्जे कर व्यावसायिक स्थल खड़े किए गए उनको हटाया जाना आवश्यक था। आम दिल्ली में रामलीला मैदान से दरियागंज की ओर के रास्ते में मुड़ेंगे तो सामने हज मंजिल दिखाई देगा। उसी के पीछे यानी बाएं से आगे बढ़िये तो पूरा तुर्कमान गेट का इलाका है। उसी रास्ते में फैज ए इलाही मस्जिद से लेकर जमा मस्जिद के बीच अनेक मस्जिदें हैं । हर कुछ दूरी पर आपको मस्जिदें दिखेगी। कभी किसी सरकारी विभाग ने उन मस्जिदों को तोड़ने की कोशिश तक नहीं की। फैज ए इलाही मस्जिद के इर्द-गिर्द बारात घर, डायग्नोस्टिक सेंटर , पुस्तकालय,  दूकानें सब बना लिए गए। रामलीला मैदान की जमीन कब्जाई गई। खाली करने की कोशिश करने वालों की हमेशा शामत आ जाती थी। उस रास्ते पर दिन में चलना तक मुश्किल हो चुका था।  स्थानीय लोगों की मांग खाली करने की थी। दिल्ली नगर पालिका परिषद में वर्षों से अनेक पत्र और आवेदन इसके लिए आते रहे हैं। थाने में वहां आपराधिक गतिविधियों की शिकायतें आम बात हैं। अब आप सोचिए क्या अवैध जमीन पर, भले वह मस्जिद से लगी हुई हो ,बारात घर, क्लीनिक या डायग्नोस्टिक सेंटर , व्यावसायिक लाइब्रेरी, दुकानें बनाना इस्लामी कृत्य है? क्या उसे तोड़ना इस्लाम या मुसलमान के विरुद्ध माना जाएगा? जिस मस्जिद को खरोंच तक नहीं आया उसको आधार बनाकर जिन लोगों ने पुलिस से टकराव की पहले से तैयारी की उनके बारे में क्या कहा जाए? भले यह विषय यहां नहीं है किंतु क्या किसी मजहब, पंथ का स्थल अगर सरकारी जमीन पर हो तब भी क्या उसे स्पर्श नहीं किया जाएगा?

कुछ लोगों का तर्क है कि कार्रवाई रात में क्यों की गई? उस क्षेत्र में दिन में कार्रवाई करने का मतलब चारों तरफ के ट्रैफिक को रोक देना होता और इसके परिणाम भयानक हो सकते थे। सामान्य स्थिति में वहां बुलडोजर, डिम्पल, गाड़ियां जा ही नहीं सकती थी। सोचिए, अगर रात में कार्रवाई के बाद इतनी पत्थरबाजी हुई तो दिन में कैसी तस्वीर होती? उमर खालिद, सर्जिल इमाम की जमानत न मिलने को भी इस्लाम और मुस्लिम मुद्दा बनाया गया तो तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे को मुक्त करने के अभियान को भी। आप बहुत बड़े वर्ग की देशभर की प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। टीवी चैनलों के डिबेट, समाचार पत्रों , सोशल मीडिया में आये वक्तव्यों पर नजर डाल दीजिए तथा जिस तरह के वीडियो सामने आए हैं वो देश के वर्तमान और भविष्य को लेकर किसी को भी भयभीत करने वाले हैं। तुर्कमान गेट मामले में बाजाब्ता यूट्यूब चैनलों पर फिल्मों के दृश्य की तरह लोगों को अल जिहाद , अल जिहाद गाने के साथ संघर्ष के लिए उत्तेजित किया गया। कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। इतनी भीड़ में पत्थर किन-किन ने चलाई सबकी पहचान असंभव है। उमर खालिद सर्जिल इमाम के रिहा होने पर अगर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के कब्र खोदने के नारे लग रहे हैं, भारत की संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक भगवा ध्वज तक की कब्र खोदने के नारों से पता चलता है कि समाज के अंदर किस तरह झूठ के आधार पर जहर और बारूद पैदा किया जा चुका है। दुर्भाग्य से राजनीतिक नेताओं में भाजपा विरोधियों ने भी अपराध को अपराध , अवैध कब्जे को अवैध कब्जा कहने की जगह इनको राजनीतिक मुद्दा बनाया है।

इसका लाभ पाकिस्तान जैसा देश उठाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने स्वयं अपने यहां अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों का समूल नाश किया है‌। मुस्लिम समुदाय के बहुत बड़े वर्ग में यह भावना घर करा दी गई है कि नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी है,  यह भारत में मुसलमानों को नष्ट करना चाहते हैं, मस्जिदें , मदरसे , दरगाह इस्लामी रीति-  रिवाज सब उनके निशाने पर हैं। एक वर्ग में यह भाव भी पैदा किया जा रहा है कि न्यायालय तक पर मोदी सरकार का नियंत्रण है और उनके मन के अनुसार मुसलमान और विरोधियों के विरुद्ध वो फैसला दे रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने जमानत रद्द करते हुए या तुर्कमान गेट के अवैध कब्जे पर न्यायालय ने जैसी टिप्पणियां की है वास्तव में चिंता उनसे होनी चाहिए। न्यायालय की दृष्टि में उमर खालिद , सर्जिल इमाम जैसे लोग नागरिकता संशोधन कानून या नेशनल नागरिकता रजिस्टर के विरुद्ध लोगों को भड़काने, हिंसा की योजना बनाने, उनके लिए सामग्रियां जुटाने आदि में सम्मिलित दिखते हैं। इस तरह सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा ,गैर कानूनी कमाई करना उसके आधार पर दादागिरी और धौंसपट्टी जैसी भूमिका अपराधियों की ही मानी जाएगी। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में ऐसा लगता है कि पूरा शहर और जिले का बहुत बड़ा भाग ही कब्जा लिया गया। मौलिक, उनसे जुड़े स्थल, तालाब, कुयें कब्जाए गए या ध्वस्त कर , जमींदोज कर उन पर र्निर्माण कर दिए गए। इनके विरुद्ध कार्रवाई और खाली कराने के आदेश या दंगे के आरोपियों की जमानत रद्द करना मुसलमान या इस्लाम की रक्षा लड़ाई कैसे हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर आप अवश्य तलाशिये क्योंकि यह भारत के अखंड राष्ट्र के रूप में बने रहने का प्रश्न भी है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-  110092 , मोबाइल - 98110 27208


गुरुवार, 15 जनवरी 2026

हिंदू धर्म में ही नहीं दलितों में भी है ऊंच-नीच का भाव

बसंत कुमार

कुछ दिन पूर्व एक दलित समाज के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने एक कार्यक्रम में यह कह दिया कि जाति पर आधारित आरक्षण तब जारी रहना चाहिए जब तक मेरे बेट से शादी के लिए एक ब्राह्मण पुत्री तैयार नहीं होती उनके इस बयान की आलोचना भी हुई और होनी भी चाहिए क्योंकि शादी-विवाह दो आत्माओं का मिलन है और न कि जातीय समझौदा, बल्कि इस बयान ने एक और विवाद को जन्म दे दिया कि क्या सिर्फ हिंदुओं में ही ऊंच नीच का भेद भाव है या दलित समाज में भी ऊंच-नीच का भेदभाव होता है, कुछ विद्वान यह कहते हैं कि ये जातियां सिर्फ आरक्षण के लिए एक है अन्यथा इनमें आपस मे जाति पात भेद भाव बहुत अधिक है।

वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की मछली शहर सुरक्षित सीट से भारतीय जनता पार्टी ने रामचरित्र निषाद को प्रत्याशी बनाया और मोदी लहर में जीत कर वे सांसद बन गए पर ऊंची महत्वकांक्षा के अनुरूप मोदी सरकार में मंत्री नहीं बन पाए। उन्हें कई बार यह कहते सुना गया कि मंत्री पद के लिए मैं ओबीसी से दलित (अछूत) बना पर कोई फायदा नहीं हुआ! रामचरित्र निषाद की ओबीसी से दलित बनने की टिश यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म के चतुर्वर्ण में आने वाली शूद्र जातियों में भी ऊंच नीच का भाव छिपा हुआ है। दरअसल निषाद, मल्लाह केवट आदि जातियां दिल्ली में तो अनुसूचित जाति वर्ग में वर्गीकृत हैं पर अन्य राज्यों में इन्हें ओबीसी में माना जाता है और इसी कानूनी स्थिति का फायदा उठाते हुए रामचरित्र निषाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर प्रश्न यह उठता है कि जब आप दलितों के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर दलितो के लिए सवर्णों जैसा पूर्वाग्रह क्यों? मजे की बात यह है कि निषाद मल्लाह व अन्य जातियां वर्षों से अनुसूचित जातियों में शामिल होने की मांग कर रही है पर वे स्वयं चमार व वाल्मीकिआदि जातियों को छूने से परहेज करते हैं फिर इसके लिए सवर्ण समाज को ही दोस्त क्यों दिया जाए।

उत्तर प्रदेश और बिहार में एक जाति मुसहर है जो जाति पदानुक्रम में सबसे नीचे आते हैं और उनका काम लोगों की शादियों में दोना और पत्तल बनाकर देना होता है और उनकी महिलाएं जब दोना पत्तल लेकर किसी सवर्ण के यहां जाती हैं तो एक कोने में बैठकर इस बात का इंतजार करती रहती हैं की बारात में आए मेहमानों का खाना समाप्त हो और उनके पत्तलों में बचे खुचे भोजन को इकट्ठा कर के अपने घर ले जाए पर यही मुसहर जब किसी चमार या वाल्मीकि के यहां पत्तल लेकर जाता है तो वह पका हुआ भजन खाने के बजाय सिद्धा मांगता है, सिद्धा का मतलब है कि कच्चा आटा दाल और आलू जिसे वह अपने घर पर बनाकर खा सके, कहने का तात्पर्य है कि मुसहर कितनी भी बुरी हालत में हो वह चमार के यहां खाना नहीं खाएगा। बड़े आश्चर्य की बात है सवर्णों के साथ रोटी बेटी का संबंध की बात करने वाले दलित समाज के लोग आपस में रोटी बेटी के रिश्ते की बात तो छोड़िए उनके साथ बैठकर खाना भी नहीं खाते।

देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले टॉयलेट मां के नाम से मशहूर पद्म भूषण दो बिंदेश्वर पाठक ने दलितों के बीच आपसी जातिवादी मतभेद का बड़ा मजेदार किस्सा सुनाया। बिंदेश्वर पाठक के पिताजी का स्वर्गवास हो गया और उनकी 13वीं में गांव के सभी वर्ग के लोगों को आमंत्रित किया गया। समस्या तब आई जब उनके गांव के दुसाध (पासवान) व चमार जाति के लोग एक साथ पंगत में बैठकर खाना खाने को तैयार नहीं हुए, तब डॉक्टर पाठक ने उनके लिए अलग-अलग पंगत में बैठा कर खाना खिलाया। भारत को आजाद हुए लगभग 8 दशक होने वाले हैं परंतु दलित समाज की दो डोमिनेंट जातियां चमार और बाल्मीकि में कभी भी एकता नहीं हुई, जातियों के आम नागरिक ही नहीं इन जातियों के बड़े-बड़े नेता भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते, यही कारण है कि बिहार के राजनीति में दुसाधों के नेता चिराग पासवान और मुसहरों का प्रतिनिधित्व करने वाले जीतन राम मांझी कभी भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते और दोनों ही पार्टियां राजनीतिक नेतृत्व करने के बजाय 15% सवर्ण नेतृत्व के आगे-पीछे घूमने को मजबूर हैं और इनकी राजनीति नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को के रहमो-करम पर टिकी हुई है। सन 1980 के दशक में कांशीराम का नेतृत्व दलित समाज के लिए चमत्कारिक घटना थी फिर भी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ चमार मतदाताओं को गोल बंद कर सकी। पासी समाज खटीक समाज एवं वाल्मीकि समाज बसपा के साथ नहीं जुड़े या तो ये समाजवादी पार्टी के साथ रहे या भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे। क्योंकि इन वर्गों को किसी एक दलित जाति का मजबूत होना मंजूर नहीं है।

दलितों में आपस में जातिवाद पाया जाता है जो मुख्य रूप से आंतरिक, सामाजिक पदानुक्रम वर्चस्व की लड़ाई आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय उप- जातिय पहचान के कारण होता है। जहां खुद दलित समूह अन्य पर हावी होने की कोशिश करते हैं जिससे आपसी भेदभाव और संघर्ष पैदा होता है जैसे उत्तर प्रदेश में पासी खटीक धोबी आज आरक्षण के लाभ के लिए बेशक अपने आप को अनुसूचित जाति या दलित कहते हैं पर यह सामाजिक रूप में चमार बाल्मीकियों के साथ कभी भी किसी प्रकार का हिस्सा नहीं रखना चाहती रोटी बेटी की बात तो दूर यहां तक कि एक दूसरे के यहां खाना भी नहीं खाते। एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार में चमारो और मुसहरों पर सबसे अधिक अत्याचार की घटनाएं दुसाध पासवान समाज के द्वारा की जाती हैं क्योंकि दोनों ही जातियां एससी/एसटी एक्ट की परिधि में आती है इसलिए एससी एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज नहीं होता। लेकिन दलितों में जातिगत भेदभाव के कुछ कारण है जो निम्नलिखित हैं-

इन दलित जातियों के व्यवसाय अलग-अलग थे जैसे सूअर पालना, मैला ढोना, मरे पशुओं को ढोना या जच्चा बच्चा करना, इस कारणसे इनको अलग-अलग जातियों में रखा गया पर जब पूना पैक्ट के पश्चात यह सभी जातियां आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति में सम्मिलित हो गई, पर उनके जातियां अहंकार अलग-अलग रहे इस कारण ये जातियां अनुसूचित जाति के रूप में बेशक एक हो पर जाति के रूप में बिल्कुल अलग-अलग है।

इस समय उच्च दलित वर्ग व निम्न दलित वर्ग के बीच में भेदभाव का जो सिलसिला चल निकला है वह इस समाज के लिए बहुत घातक होगा पहले दलित उच्च वर्ण यानि स्वर्ण समाज के शोषण से परेशान था पर अब दलितों के निम्न वर्ग का शोषण दलितों के उच्च वर्ग के लोग कर रहे हैं, यह निम्न श्रेणी के दलितों के लिए दोहरी समस्या बन गई है क्योंकि उनको दलितों के उच्च वर्ग के साथ-साथ सवर्ण उच्च वर्गों का शोषण झेलना पड़ रहा है दलितों के बीच आपस में भेदभाव का मुख्य कारण उनके आंतरिक जातिगत संरचना, अशिक्षा और गरीबी तथाप्रतिस्पर्धा है, जहां ऐतिहासिक भेदभाव और सामाजिक पदानुक्रम के कारण उप समूहों के बीच संसाधनों और सम्मान के लिए संघर्ष होता है जिससे सामूहिक पहचान के बजाय छोटे-छोटे समूह बनते हैं और वह एक दूसरे को अपने से हीन मानते हैं दलित जातियों में आपस में ऊंच-नीच और छुआछूत का भाव मुख्य रूप से ऐतिहासिक भेदभाव सामाजिक आर्थिक असमानता और वर्चस्व की मानसिकता के कारण होता है जब दलितों की उपजातियां द्वारा खुद को उच्च और दूसरे को निम्न मानने की प्रवृत्ति बनी रहती है तो बाहर की उच्च जातियों से मिली हीन भावना और भेदभाव स्वाभाविक है इसकेकारण सामाजिक भेद भाव और मानसिक दबाव बढ़ता है।

अतः यदि हिंदू समाज को जाति-पात व ऊंच-नीच के भाव से दूर रखना है तो हमे दो क्षेत्रों में एक साथ काम करना होगा एक ओर सवर्ण समाज को हिंदू दलित समाज के लोगो को ऊंच नीच का भाव त्याग कर अपनाना होगा वहीं दलित समाज को जातीय पदानुक्रम में अपने से नीचे के लोगो को अपनाना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

आखिर बिहारी कब तक गाली के रूप में इस्तेमाल होता रहेगा?

बसंत कुमार

मैं सन 1979 में रेलवे सेवा आयोग की परीक्षा पास करके उत्तर रेलवे प्रधान कार्यालय में 20 वर्ष की आयु में लिपिक के पद पर तैनात हुआ क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का रहने वाला था इसलिए मुझे कार्यालय के सहपाठियों द्वारा बिहारी संबोधित करके बुलाया जाता था, क्योंकि दिल्ली में पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत बिहार के लोगों को बिहारी कहके संबोधित किया जाता है। यद्यपि मैं वहां सबसे अधिक शिक्षित लोगों में था पर मेरे लिए बिहार संबोधन शायद प्रयोग होता था कि मैं जिस क्षेत्र से आया हूं उसे पिछड़ा और गंवारों का क्षेत्र माना जाता था। आज लगभग 50 वर्ष हो चुके हैं पर मैं यह नहीं समझ पाया हूं की कब तक बिहारी शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा। अभी कुछ दिन पूर्व उत्तराखंड के भाजपा के एक नेता ने उन लड़कों जिनकी शादियां नहीं हो रही थी को संबोधित करते हुए यह कह दिया की बिहार में 20-25 हजार रुपए में लड़कियां मिल जाती हैं। प्रश्न यह है कि लोग बिहारी शब्द को गाली के रूप में कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे।

उत्तराखंड के नेता का यह बयान न सिर्फ बिहार और बिहारी का अपमान है बल्कि यह महिला जाति का भी अपमान है जिस भारत में महिला को देवी के रूप में पूजा जाता था वहां एक व्यक्ति एक बिहारी महिला को 20-25 हजार रुपए में पत्नी बनाने का ख्वाब देख रहा है। आश्चर्य की बात है कि किसी भी बिहारी नेता, नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता ने इस बात का विरोध नहीं किया है। कैसी विडम्बना है कि जिस बिहार ने गौतम बुद्ध, चाणक्य, सम्राट अशोक जैसे महान विभूतियां पैदा की और आधुनिक भारत में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, टॉयलेट मैन के नाम से मशहूर पद्म विभूषण विंदेश्वर पाठक आदि न जाने कितनी महान हस्तियों को जन्म दिया और आज भी नई दिल्ली में नौकरशाह के रूप में सचिव, अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव, कमिश्नर स्तर के अधिकांश बिहारी मौजूद हैं लेकिन अभी भी बिहारी को पिछड़ा, बेवकूफ का पर्याय मानकर, मजाक का पात्र बनाया जाता है। यह भी सत्य है कि दिल्ली के व्यापारियों की दुकानें, औद्योगिक संस्थान, किरायेदारों से अपनी जीविका-आजीविका चलाने वाले जमीदारों की जिंदगी बिहारियों के बल पर चलती है पर हर जगह बिहारी का मजाक उड़ाना अनुचित है। जिस देश में पंजाबी मराठी कहना गौरव की बात होती है उसी देश में बिहारी एक गाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है आखिर ऐसा क्यों है। इस पर विस्तार से विचार किया जाना चाहिए और ऐसा हमारे बिहार के बड़े-बड़े नेता और नौकरशाह खुद तो बिहार से आकर दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, हौजखास, ग्रेटर कैलाश जैसे पाश इलाकों में राजसी ठाट बाट से रहते हैं पर बिहार और बिहारियों के बारे में कोई नहीं सोचता।

एक ओर देश के रेल मंत्री स्लीपर बंदे भारत ट्रेन का रोज-रोज प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उनको यह नहीं पता है कि बिहार से आने जाने वाली ट्रेनों में पूरे वर्ष भर आसानी से रिजर्वेशन नहीं मिलता है और होली, दीपावली और छठ पूजा के दौरान दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे शहरों में काम करने वाले बिहार के श्रमिकों को घर जाने के लिए अनारक्षित डिब्बों में भेड़ बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर जाना पड़ता है। आज तक भारतीय रेल ने कभी भी बिहार में आने-जाने वाली ट्रेनों में बढ़ती भीड़ और सीट की अनुपलब्धता पर कोई लॉन्ग टर्म योजना बनाने की कोशिश नहीं की, जबकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में नजर डालें तो ललित नारायण मिश्र, बाबू जगजीवन राम, राम विलास पासवान, नीतीश कुमार, अब्दुल ग़फुर, लालू प्रसाद यादव जैसे बड़े नाम वाले नेता भारत के रेल मंत्री रहे हैं। लेकिन कभी भी बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में जाने वाली रेलगाड़ियों के बारे में नहीं सोचा। देश के रेल मंत्री से आग्रह है कि बंदे भारत राजधानी आदि ट्रेनों की सुविधा के साथ-साथ बिहार में जाने वाली ट्रेनों पर भी ध्यान दें।

आज दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में 80 % से 90% किरायेएदार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग होते हैं यह जिन लोगों के मकान में किराये पर रहते हैं वहां पर उनकी महिलाओं को भी बड़ी उल्टी नजर से देखा जाता है मकान मालिक जहां अपनी आर्थिक आमदनी के लिए इन किरायेदारों पर निर्भर करते हैं वही उनकी महिलाओं पर इनकी कुदृष्टि रहती है जो कहीं से भी उचित नहीं है पर उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों के निकम्मेपन के कारण बिहार के युवक 10 - 15 हजार रूपए की नौकरी के लिए महानगरों में पड़े हुए हैं, जहां वे झुग्गी झोपड़ी या फिर किराये के मकान में नरकीय जिंदगी गुजारने को मजबूर रहती है देखना यह है कि बिहार वोटो के सहारे सरकारें तो बनती बिगड़ती रहती है लेकिन क्या बिहार की अस्मिता के लिए कोई सरकार या कोई राजनीतिक दल काम कर रहा है।

बिहार में प्राकृतिक संसाधनों का अ संतुलित वितरण बिहार के गरीबों के इस अपमान का कारण है, बिहार में दो तरह के वर्ग के लोग रहते हैं एक इतना गरीब है कि उसे दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता और एक इतना अमीर है कि उसको पता ही नहीं कि उसके पास कितनी जमीन या प्रॉपर्टी है इसी गरीबों के कारण बिहार के लोग गांव से पलायन करके शहरों में 10-20 हजार की नौकरी करते हैं यदि पूरे देश में नजर डालें तो पंजाब का व्यक्ति अपनी खेती के लिए मशहूर है, कर्नाटक और हैदराबाद के व्यक्ति आईटी इंजीनियरिंग के लिए मशहूर हैं, केरल के व्यक्ति की पहचान नर्सिंग इंडस्ट्री के लिए है लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की पहचान मजदूरी पल्लेदारी आदि के लिए है अब जहां दुनिया वैश्वीकरण में प्रतिस्पर्धा कर रही है वहां देखना यह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी मजदूर के ब्रांड से कब बाहर निकाल पाते हैं, इस विषय में एक किस्सा मशहूर है एक बिहार के व्यक्ति दिल्ली में यूपी पुलिस आयुक्त के रूप में तैनात थे गाड़ी में जाते समय उन्होंने अपने ड्राइवर से टूटी हुई सड़क के बारे में शिकायत की तो ड्राइवर ने बगल के दुकान वाले से कहा की भाई चार-पांच बिहारियों को भेज दे यह सड़क ठीक करवानी है तो कर में बैठे पुलिस उप आयुक्त ने कहा की पांच बिहारी नहीं चारही भेजना क्योंकि एक बिहारी इस गाड़ी में बैठा हुआ है तो यह है बिहारी की पहचान।

पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार व अन्य पिछले में राज्यों को उधमिता से जोड़ने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया गया जिससे वहां के लोग उधमिता से जुड़े और उन्हें महानगरों में जाकर मजदूरों के रूप में नौकरी न करनी पड़े कैसी विडंबना है कि महावीर प्रसाद, कलराज मिश्र, गिरिराज सिंह, भानु प्रताप सिंह वर्मा और जीतन नाम माझी जैसे बड़े नेता कई दशकों तक देश के एमएसएमई विभाग के मंत्री रहे और वे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले थे, यहां तक के एमएसएमई विभाग के सचिव भी उत्तर प्रदेश बिहार के निवासी रहे हैं पर दुर्भाग्य इस बात का है की बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उद्यमिता के क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ और वहां के पढ़े-लिखे युवा अपना उद्यम शुरू करने के बजाय महानगरों में श्रमिकों के रूप में काम कर रहे हैं और न ही इन लोगों के मन में उद्यमिता के क्षेत्र में काम करने के लिए इच्छा शक्ति जगाने का काम हुआ। इस विषय में मैं अपना स्वयं का अनुभव बताना चाहता हूं कि मैं एनडीए-1 में एमएसएमई सलाहकार के रूप में कार्यरत था और राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम में बैठा करता था वहां मेरे पास उत्तर प्रदेश व बिहार के अनेक लोग काम की तलाश में आते थे और मेरी कोशिश होती थी की इनक्यूबेशन आदि में प्रशिक्षण दिलाकर इनको उद्यमिता के क्षेत्र में डाला जाए पर होता यह था की सब कुछ देख लेने के बाद वह यही कहते थे की साहब हमें 10-12 हजार रुपए की नौकरी दिलवा दो, कहने का मतलब यह है की इन लोगों को कभी भी उद्यमिता के क्षेत्र में मानसिक रूप से तैयार नहीं किया गया और दूसरों की नौकरी करना इन्होंने अपना भाग्य मान लिया है। 

 बिहार की छठ पूजा के अवसर पर बिहार केवोटरों के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों घाट बनवाने से लेकर अन्य सुविधाये मुहैया करा ने के लिए जोर-जोर से दिखावा करती है और कुछ पार्टियों तो बिहारी वोटर को लुभाने के लिए बिहार से आकर दिल्ली में बसे हुए बिहारके लोगों को अपना प्रत्याशी भी बनाते हैं पर आज उत्तराखंड सरकार के एक मंत्री के पति द्वारा बिहार की महिलाओं के लिए इस तरह का अनुचित बात कहने पर कोई भी पार्टी इसका विरोध करने को तैयार नहीं है यह बिहार के अस्मिता का प्रश्न नहीं बल्कि देश की बेटियों का बेटियों की अस्मिता का प्रश्न है और और प्रधानमंत्री जी की बेटी बढ़ाओ बेटी बचाओ और बेटीपढ़ाओ नारी का अपमान है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

जी रामजी तथा इसके विरोध के मायने

अवधेश कुमार

भाजपा की राज्य सरकारें या प्रदेश इकाइयां हर जगह जी राम जी पर पत्रकार वार्तायें आयोजित कर रही हैं तथा पार्टी के स्तर पर इसे अभियान के रूप में लिया गया है। सरकारी कार्यक्रमों में ऐसा सामान्यतया कम होता है। विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने दृढ़ता के साथ संसद में पारित कराकर संदेश दे दिया था कि इसे हर हाल में क्रियान्वित किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। कई अन्य दल भी इसके विरुद्ध मोर्चाबंदी कर रहे हैं। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगीं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध और इसके समानांतर भाजपा के द्वारा इसके समर्थन का अभियान चलेगा। सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 2005 में नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परंपरा न पहले थी न आगे स्थापित हो सकती है। देश , काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होतीं हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नयी आरंभ भी होतीं हैं। विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यूपीए सरकार ने भी महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग सेविशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी इसलिए जारी योजना में नाम जोड़ा  गया। विपक्ष की ओर उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है? क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्युलर चरित्र समाप्त होता है?  कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि की सनातन और हिंदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम परिचित हैं। इसलिए यह भी जी राम जी के साथ महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो जाता है।

वर्तमान कार्यक्रम मनरेगा है ही नहीं। मनरेगा समाप्त कर जी राम जी नया कानून बना है। इसलिए यह आलोचना गलत है कि महात्मा गांधी का नाम हटाकर जी राम जी कर दिया गया है। नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के ऐसे कृतिमान बनाये जिनको रोक पाना मनरेगा ढांचे में संभव नहीं हो पाया। केंद्र से राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एनजीओ के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूर्ति हो रही है। जी राम जी में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण , डिजिटल मॉनिटरिंग,सशक्त सोशल ऑडिट साप्ताहिक पब्लिक डिस्क्लोजर आदि के प्रावधान से भ्रष्टाचार की संभावनाएं क्षीण होती हैं। किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता। यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ उनमें और आज में अनेक मायनों में बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होते समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आर्थिक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023 24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज के गांवों की स्थिति वैसी ही नहीं है। गांव की डिजिटल पहुंच बढ़ी है , बिजली आपूर्ति काफी हद तक सुनिश्चित है, यातायात संपर्क की सुविधा बेहतर हुई है और सामाजिक सुरक्षा आज ज्यादा सशक्त है।  भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिए।

 इसमें केवल 100 की जगह 125 दिनों के रोजगार की ही बात नहीं है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ग्रामीण क्षेत्र को ऐसे सशक्त और टिकाऊ आधारभूत ढांचा देना है जिनसे वे सक्षमता की ओर बढ़ें। इसमें बने निर्मित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना स्ट्रेट में शामिल किया जाएगा। इससे ग्रामीण विकास से जुड़े सारे काम एक ही व्यवस्था से जुड़ेंगे। जी राम जी में चार मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं। जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। बाढ़ और सुखार के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे शामिल है। जीरामजी का स्वरुप और संस्कार मनरेगा से अलग है। तब काम अलग-अलग श्रेणियों में फैले हुए थे। यहां रोजगार पर फोकस होते हुए भी गांव के लिए स्थिर उत्पादक क्षमता पैदा करने और बढ़ाने यानी आत्मनिर्भरता का भाव है। मनरेगा या पहले के ग्रामीण रोजगार योजनाओं का फोकस ऐसा नहीं था। इसमें ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। इन योजनाओं को प्रधानमंत्री गति शक्ति जैसे राष्ट्रीय प्रणालियों से भी संबद्ध किया जाएगा।

मिशन अमृत सरोवर के तहत 68, 000 से ज्यादा जल निकाय बने या पुनर्जीवित हुए हैं । इससे खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन , बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका सुरक्षित होगी। सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी।

जी राम जी के व्यय की 40% जिम्मेवारी राज्यों पर डालने का विरोध हो रहा है। जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है वहां के लिए विचार करना चाहिए। वैसे भारतीय स्टेट बैंक ने एक रिपोर्ट में इस आलोचना को निराधार बताते हुए कहा है कि राज्य इसमें नेट गेनर होंगे। केंद्र सरकार द्वारा राजस्व साझा करने की प्रणाली में राज्यों को 17,000 करोड रुपए का अतिरिक्त आवंटन होगा। आवंटन के आधार पर आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु को थोड़ा नुकसान दिख रहा है जबकि शेष राज्यों में ज्यादा आवंटन का आंकड़ा सामने आता है। राज्यों को भी अपनी वित्तीय स्थिति सशक्त करने की नीतियां अपनानी पड़ेगी। फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी की योजनाओं की जगह ऐसी योजना से लोगों का ज्यादा भला होगा। मुख्य बात है इस व्यवहारिक तथा गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने वाले कार्यों का कल्पना के अनुरूप क्रियान्वयन। यह जिम्मेवारी अंततः राज्यों , स्थानीय प्रशासन, पंचायत तथा सामाजिक -सांस्कृतिक -धार्मिक संगठनों के साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर आती है। इस कार्यक्रम में गांव के लोगों की रुचि बढ़ेगी क्योंकि मनरेगा सीमांत और सामान्य मध्यम किसानों के लिए अनर्थकारी बनकर सामने आया था। मुख्य कृषि कार्य के समय कृषि श्रमिकों की उपलब्धता अत्यंत कम हो गई थी। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों ने मूल अनाज उत्पादन वाली खेती छोड़ दी। बुवाई से कटाई तक किसानों के लिए कष्टकर स्थिति रही है। मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे या गुस्से में आ जाते थे। जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई ,कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं थी। अब काम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। हालांकि मनरेगा ने पूरी व्यवस्था में जैसा उथल-पुथल मचाया उसमें कृषि को पुनर्स्थापित करना आसान नहीं है फिर भी इसका सकारात्मक असर होगा।

कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन, परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन या  संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगी। किंतु अगर कुछ नेताओं, एक्टिविस्टों आदि को जी रामजी नाम रखने से समस्या है तो इसका उपचार नहीं। सभी देवी-देवता केवल मनुष्य से परे शक्ति संपन्नता के ही नहीं सात्विकता, नैतिकता ,समाज के लिए आत्मोत्सर्ग तथा सर्व कल्याणकारी चरित्र वाले हैं। उनके नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्यूलर चरित्र प्रभावित नहीं होता। इसमें आध्यात्मिकता एवं आम लोगों के लिए योजना की पवित्रता बनाए रखने की जो भावना पैदा हो सकती है उससे व्यापक सेक्यूलर भाव क्या हो सकता है?

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

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