शुक्रवार, 3 मार्च 2023

चुनाव परिणामों में चौंकाने वाले तत्व नहीं

अवधेश कुमार

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में चौंकाने वाला कोई तत्व नहीं है। वास्तव में परिणाम लगभग उम्मीदों के अनुरूप ही है। तीनों राज्यों त्रिपुरा,  नागालैंड और मेघालय के चुनाव परिणामों को एक साथ मिलाकर देखें तो कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक, भाजपा की सीटें किसी राज्य में थोड़े कम या ज्यादा हो, मत प्रतिशत में थोड़े बहुत अंतर आ जाएं लेकिन अब वह पूर्वोत्तर की प्रमुख स्थापित पार्टी हो गई है। दूसरे, एक समय पूर्वोत्तर पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की क्षरण प्रक्रिया लगातार जारी है। तीसरे, पूर्वोत्तर में तृणमूल के एक प्रमुख पार्टी के रूप में उभरने की उम्मीद भी धराशाई हुई है। चौथे, माकपा के नेतृत्व वाले वाम दलों की पुनर्वापसी की संभावना पहले से ज्यादा कमजोर हुई है। जरा सोचिए, अगर त्रिपुरा में वामदल और कांग्रेस मिलकर भी भाजपा को सत्ता से बाहर करने में सफल नहीं हुए तो इसके मायने क्या हैं? पिछले चुनाव में यद्यपि माकपा नेतृत्व वाला वाममोर्चा सत्ता से बाहर हुआ था लेकिन भाजपा और वाम मोर्चे के मतों में ज्यादा अंतर नहीं था। इस कारण भाजपा विरोधी और वाममोर्चा के समर्थक यह मान रहे थे कि भले जनता ने सत्ता विरोधी रुझान में माकपा को बाहर कर दिया लेकिन अगले चुनाव में इसकी वापसी हो सकती है। चुनाव परिणामों ने बता दिया कि वाम मोर्चे का उदय अब दूर की कौड़ी है। निश्चित रूप से इस परिणाम के क्षेत्र के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी विश्लेषण होगा। आखिर 2024 लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भाजपा विरोधी पार्टियां कई प्रकार के समीकरण बनाने की कवायदें कर रही है तो इस चुनाव का असर उस पर न पड़े ऐसा संभव नहीं। तो कैसे देखा जाए इन चुनाव परिणामों को?

यद्यपि तीनों राज्यों के चुनाव महत्वपूर्ण थे,देश का सबसे ज्यादा ध्यान त्रिपुरा की ओर था। यह पहला राज्य था जहां भाजपा ने अपने विपरीत विचारधारा वाले वाममोर्चा को पहली बार पराजित किया था। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लव देव के शासनकाल में स्वयं पार्टी के अंदर असंतोष के स्वर तथा सरकार की कुछ नीतियों के विरुद्ध जनता में भी विरोध देखा गया। भाजपा ने मई 2022 में उनकी जगह माणिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया। कहा जा सकता है कि चेहरा बदलने से दोनों स्तरों का असंतोष थोड़ा कम हुआ। भाजपा की सीटें और मत दोनों पिछले चुनाव से घटे हैं लेकिन वह अपनी बदौलत 60 सदस्य विधानसभा में बहुमत पा चुकी है। इंडीजीनस पीपल्स फ्रंट यानी आईपीएस के साथ गठजोड़ कर भाजपा ने चुनाव जीता था। इस बार भी दोनों के बीच गठबंधन था लेकिन आईपीएफ को केवल 5 सीटें भाजपा ने दी थी। इस कारण  कुछ स्थानों पर आईपीएफ भाजपा के विरुद्ध भी चुनाव लड़ रहा था। कांग्रेस और वाममोर्चा का गठबंधन नेताओं के स्तर पर हुआ लेकिन जमीन पर दोनों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच तालमेल न हो सका। भाजपा के उभार के पहले राज्य में कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच संघर्ष की स्थिति थी। इसमें बची-  खुची कांग्रेस के लोगों के लिए स्वीकार करना कठिन था कि वह उसी वाम मोर्चे के उम्मीदवार का साथ दे जिनसे उसकी लंबी लड़ाई रही है। यह इस बात को साबित करता है कि भाजपा विरोध के नाम पर भले पार्टियों का गठबंधन हो जाए ,जनता ही नहीं स्वयं उन पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थकों के बीच सहयोग होना आसान नहीं। इसका असर आगामी विधानसभा चुनावों से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव के समीकरणों पर भी पड़ेगा। चुनाव के कुछ समय पूर्व बनी टिपरा मोथा पार्टी ने एक दर्जन सीटें जीतकर भी कुछ संकेत दिया है। शाही परिवार से प्रद्योत विक्रम माणिक्य देबबर्मन ने पार्टी को अलग आदिवासियों के लिए ग्रेटर त्रिपुरालैंड की मांग के साथ सामने लाया था। हालांकि मतदान के पहले कुछ नेताओं के साथ छोड़कर जाने से दुखी होकर उन्होंने घोषणा किया था कि वे अब आगे बढ़ा नीति में नहीं रहेंगे। बावजूद जनता का उन्हें इतना समर्थन मिला। भाजपा ने भी अपने घोषणापत्र में आदिवासियों के लिए ज्यादा स्वायत्तता का वायदा किया था। इन दोनों पार्टियों के बीच तालमेल की पूरी संभावना है। ऐसा होता है तो यहां से त्रिपुरा की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत होगी।

नागालैंड की ओर देखें तो वहां भी भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के साथ गठबंधन में वह छोटा साझेदार थी। उसे 20 सीटें ही लड़ने के लिए मिली किंतु केंद्रीय नेतृत्व ने इसके कारण पार्टी की स्थानीय इकाई में विरोध और असंतोष उभरने नहीं दिया। छोटा साझेदार होकर भी उसने एनडीपीएस के साथ मिलकर उसी तन्मयता से चुनाव लड़ा जैसे वह अन्य राज्यों में लड़ रही थी।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे सभी नेता वहां चुनाव प्रचार करने गए और पूरा जोर लगाया। पिछले नागालैंड की विधानसभा में कोई विपक्ष रही नहीं गया था। नागा पीपुल्स फ्रंट के विधायक सरकार के साथ चले गए थे। आगे क्या होगा अभी कहना कठिन है लेकिन भाजपा ने वहां सभी दलों के नेताओं से अपना संपर्क संबंध बनाए रखा है। वैसे भी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, लोक जनशक्ति पार्टी आदि भाजपा की सहयोगी पार्टियां हैं। इस तरह नागालैंड में एक मजबूत सरकार की संभावना है जो वहां जारी शांति प्रक्रिया को और सुदृढ़ करेगी । निस्संदेह,  मेघालय का चुनाव परिणाम भाजपा के उम्मीदों के अनुरूप नहीं है। उसे स्वयं बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद थी।  पिछली बार उसे 2 सीटें आई थी और एनपीईपी,पीडीएफ और एचएसबीसी के साथ मिलकर उसने मेघालय डेमोक्रेटिक एलाइंस बनाया था। एनपीईपी के साथ उसका चुनावी गठबंधन नहीं था।  चुनाव के बाद असम के मुख्यमंत्री और पूर्वोत्तर जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक हेमंतो तो विश्वासरमा का कोनराड संगमा से मुलाकात बताता है कि साथ मिलकर काम करने की बातचीत परिणाम के पहले ही शुरू हो गई थी। तृणमूल कांग्रेस भी यहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी और कांग्रेस को लेकर तो बहुत उम्मीद ही नहीं थी। तृणमूल कांग्रेस ने मुकुल संगमा सहित कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर मेघालय की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनने की उम्मीद की थी। लगता है मेघालय के मतदाताओं को यह रास नहीं आया।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्वोत्तर पर विशेष फोकस किया है। वहां अपनी नीतियों, कार्यक्रमों और संवाद से अलगाववाद, क्षेत्रीय -जातीय विशेषता के भाव को भारतीय राष्ट्र भाव के साथ जोड़ने की लगातार कोशिश की। यातायात और संचार के क्षेत्र में पूर्वोत्तर में सच कहा जाए तो क्रांति हुई है। सड़कें और रेलमार्ग ही नहीं हवाई यात्राओं की दृष्टि से भी आधारभूत संरचनाएं सशक्त हुई है। पूर्वोत्तर में इस समय 17 हवाई अड्डे कार्य कर रहे हैं। मेघालय के लोगों ने पहली बार अपने हक के लिए रेल यात्राएं की है। बिजली की स्थिति में काफी सुधार हो चुका है। शिक्षा के क्षेत्र में 191 उच्च शिक्षा के नए संस्थान खोले गए। उच्च शिक्षा में नामांकन में 29% की वृद्धि हुई। उग्रवाद को काबू करने के लिए सुरक्षा सख्ती के साथ क्षेत्रीय विकास और संवाद तीनों रास्ते अपनाए गए। परिणामतः 8000 से ज्यादा उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया। आज पूर्वोत्तर उग्रवाद से लगभग मुक्त है। सबसे बड़ी बात कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम यानी अफस्पा को हटाने की बात अनेक पार्टियां और मानवाधिकार संगठन करते थे। उसे सही मायनों में भाजपा ने ही स्वीकार किया। आज असम, त्रिपुरा ,मणिपुर, मेघालय,मिजोरम आदि सभी राज्यों में ज्यादातर क्षेत्रों से अफस्पा हटाया जा चुका है। नागालैंड की सभा में प्रधानमंत्री ने इसे हटाने का वायदा किया। इस तरह वहां के लोगों ने लंबे समय बाद शांति, स्थिरता और आवागमन से लेकर सभी प्रकार की गतिविधियों में भयमुक्त स्वतंत्र वातावरण महसूस किया है। इन सबके साथ पूर्वोत्तर के अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृतियों, स्थानीय परंपराओं,  सोच और व्यवहार से लेकर स्थानीय विशेषताओं को भी प्रोत्साहित किया गया। पूर्वोत्तर के उन महापुरुषों को सामने लाकर महत्त्व दिया गया जिन्हें इतिहास के अध्याय में स्थान नहीं मिला था। इन सबका व्यापक असर हुआ है और आज पूर्वोत्तर सोच और व्यवहार की दृष्टि से समग्र रूप से भारत का बदला हुआ क्षेत्र है। इन सबकी प्रतिध्वनि चुनावों में दिखाई पड़ रही है। हालांकि अभी इन सारी दिशाओं में काफी कुछ किया जाना शेष है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208



बुधवार, 1 मार्च 2023

बसंत कुमार के लेख

सांसद निधि और अन्य फंड है राजनीति में बढ़ते अपराधों की जड़
चुनावों में धर्म और जाति का उपयोग गलत परंपरा
डॉ. आंबेडकर की विरासत के संवाहक नरेंद्र मोदी
आम चुनाव: सरकार किसी की बने पर लोकतंत्र और संविधान सुरक्षित रहना चाहिए
प्रधानमंत्री की देवालय से पहले शौचालय की पहल के प्रेरणास्रोत डॉ. बिंदेश्वर पाठक
इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में हेरा-फेरी की आशंका
नागरिकता संसोधन अधिनियम (सीएए) डॉ. अंबेडकर के सपनो को मूर्त रूप देने का प्रयास
वोट फार कैश मामले मे सुप्रीम कोर्ट का साराहनीय फैसला
युवाओं को बर्बाद करती शराब और नशीली दवाओं की लत
भर्ती परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार युवाओं के साथ घोर अत्याचार
क्यों बिखर रही है कांग्रेस और इंडिया गठबंधन
जाति का विचार करके मंत्रिमंडल में विभाग का बंटवारा आलोकतंत्रिक
चुनावी बजट मे आर्थिक चुनौतियां
क्या चुनावी वर्ष के बजट मे सार्वजनिक उपक्रमो को मिलेगी राहत
आगामी लोक सभा चुनावों में मायावती की डगर
हिट एंड रन के नये कानून के विरोध मे राजनीति
पूना पैक्ट देश के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी भूल
आनलाइन सेटबाजी से बर्बाद होते युवा
आधुनिक समाज में वरिष्ठ नागरिक तिरस्कृत क्यों
पिछड़ों और महादलितों के कल्याण की बात करना राजनीति है या कुछ और?
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आखिर एक आधुनिक भारत की स्थापना हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं
कुछ भ्रांतियों को तोड़ गए स्पिन के सरदार ‘बिशन सिंह बेदी’
जातीय जनगणना की राजनीति कितनी कारगर
आज की कलुसित राजनीतिक दौर में प. दीनदयाल उपाध्याय के मानव दर्शन के सार्थकता
देश के सामने असली परीक्षा - गरीबी दूर हो या जातिवादी क्लेश
लोकतंत्र के मन्दिर में अमर्यादित शब्दों की पार होती सीमा
 
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सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

कानपुर की घटना कानून की ताकत का दुरुपयोग है

अवधेश कुमार

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले की मड़ौली गांव में घाटी त्रासदी की दुःस्वप्न में भी कल्पना नहीं की जा सकती। सच नहीं हो तो इस पर विश्वास करना कठिन होता कि सामान्य झोपड़ी को गिराने के लिए पुलिस प्रशासन के साथ काफी संख्या में लोगों के रहते हुए मां बेटी अंदर जलकर खत्म हो गई। घटना इतनी बड़ी हो गई, इसलिए यह संपूर्ण देश की सुर्खियों में आ गया। कल्पना करिए, अगर मां बेटी के जलने की भयावह घटना नहीं होती तो क्या स्थिति होती? स्थानीय पुलिस और प्रशासन का एक ही लक्ष्य दिखता था –परिवार को बलपूर्वक उजाड़ दो और न माने तो कानूनी कार्रवाई करो। मां प्रमिला दीक्षित और बेटी नेहा दीक्षित की भयानक मौत के बावजूद प्रशासन का बयान था कि दोनों ने स्वयं को आग लगा लिया। तो पूरी घटना को किस तरह देखा जाए?

मां बेटी स्वयं को आग क्यों लगाएंगी इसका तार्किक उत्तर किसी के पास नहीं है। बावजूद मान लीजिए दोनों ने आग लगाया भी तो उसके लिए दोषी किसे माना जाएगा? क्या वहां उपस्थित पुलिस प्रशासन और लोगों का दायित्व नहीं था कि आग से उनको बचाने की कोशिश करें? किसी ने बचाने की कोशिश नहीं की। इसका केवल इतना अर्थ नहीं है कि पुलिस प्रशासन एवं उपस्थित लोगों को अनहोनी का आभास नहीं था। वास्तव में आग लगने के बावजूद बुलडोजर से झोपड़ी को गिराना साबित करता है कि  उपस्थित सरकारी महकमा हर हाल में मनमानी करने पर उतारू था। यानी उन्हें अपने विरुद्ध किसी तरह की कार्रवाई का डर नहीं था।

ये दोनों स्थितियां डरावनी हैं। अतिक्रमण हटाना प्रशासन की जिम्मेवारी है लेकिन उसका तरीका दादागिरी का नहीं हो सकता। साथ ही आम लोगों का भी दायित्व है कि वे ऐसी नौबत आने पर जान बचाने की कोशिश करें। आग लगने के बाद बुलडोजर से झोपड़ी को गिरा दिया गया। ऐसा न किया जाता तो आग इतना नहीं भड़कता। लोग आग बुझाने और मां बेटी को निकालने की जगह वीडियो बना रहे थे। हैरत की बात है कि किसी ने भी पुलिस से नहीं कहा कि आग लग गई है इसलिए बुलडोजर को रोका जाए। अगर आग लगने पर झोपड़ी न गिराई जाती और दरवाजा तोड़कर प्रमिला और नेहा को निकाला जाता तो संभवतः उनकी जान नहीं जाती। इस तरह वहां उपस्थित अधिकारी, पुलिसकर्मी तथा सारे लोग स्पष्ट तौर पर मां बेटी को जलाकर मारने के दोषी हैं।

जांच के लिए सरकार ने विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन कर दिया है। एसडीएम, लेखपाल, स्थानीय थाना प्रभारी सहित नामजद व अज्ञात कुल 42 लोगों पर हत्या सहित गंभीर धाराओं में मुकदमा किया जा चुका है। चौथा के एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद और लेखपाल अशोक चौहान निलंबित हुए तथा लेखपाल गिरफ्तार कर लिए गए हैं। मामला इस स्तर पर पहुंच गया है कि कार्रवाई में कोताही असंभव है।उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने वीडियो कॉलिंग पर परिवार से बात की और देश ने सुना है। इसी तरह पीड़ित परिवार को मुआवजा, सरकारी नौकरी, कृषि भूमि का पट्टा, पेंशन आदि की घोषणा हो गई है। क्या इससे सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो गई?

कानून के सामान्य राज में इस तरह की अविश्वसनीय त्रासदी होनी ही नहीं चाहिए । ठीक है कि वह जमीन ग्राम समाज की है। अगर प्रशासन के पास इसकी शिकायत आई तो जांच में उसे यह पता क्यों नहीं चला कि पीड़ित कृष्णगोपाल दिक्षित किस मजबूरी में वहां बसे हैं?  1 महीने पहले परिवार का पक्का मकान गिराया गया था। उसके बाद उन्होंने झोपड़ी बना ली थी। पानी पीने का हैंडपंप तक एसडीएम ने तुड़वा दिया था। वह वहां लंबे समय से रह रहे थे। वहां पुश्तैनी पेड़ थे जो गिर गया था और उसकी जगह दूसरे पेड़ लगे हुए थे। ग्रामीण बता रहे हैं कि दीक्षित परिवार के अंदर के ही आपसी तनाव की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूसरे पक्ष की पूरी कोशिश थी कि उन्हें बेघर किया जाए। लेखपाल एवं एसडीएम तक किसी तरीके से उनकी प्रभावी पहुंच नहीं होती तो इस तरह की कार्रवाई के लिए प्रशासन सामान्य तौर पर तत्पर नहीं होता। परिवार के पास दूसरी जमीन होती तो शायद वहां नहीं बसते। चबूतरे पर पूजा पाठ के लिए मंदिर भी बना रखा था। यानी परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का था। परिवार पर कभी किसी को तंग करने या गलत करने का आरोप सामने नहीं आया है।  केवल उत्तर प्रदेश नहीं देशभर के गांवों में सरकारी, धार्मिक संस्थानों और गैरमजरूआ जमीनों पर जगह-जगह कब्जे हैं। प्रशासन बहुत कम जगह इस तरह तत्पर दिखता होगा। अभी तक की जानकारी यह भी है कि मामला जिलाधिकारी तक भी पहुंचा था। गोपाल कृष्ण परिवार और मवेशी के साथ जिलाधिकारी तक पहुंच गए थे लेकिन उन्हें वहां से हटाया गया तथा उनके विरुद्ध धारा 144 से लेकर बलवा करने आदि में प्राथमिकी भी दर्ज हुई। एक सामान्य परिवार पर थाना में मुकदमा दर्ज हो जाए तो उसकी क्या दशा होती है इसकी कल्पना वही कर सकते हैं जिनको अनुभव हो।

जाहिर है , परिवार परेशान था। उसमें एसडीएम जैसे स्थानीय स्तर के लिए उच्च अधिकारी और लेखपाल पुलिस बल के साथ पहुंचकर बुलडोजर से घर गिराने लगे तो मां बेटी और परिवार की क्या मानसिकता होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। इसलिए घटना कि सही तरीके से जांच हो। उम्मीद की जा सकती है कि विशेष जांच दल पता लगाएगा कि नौबत यहां तक आने के पीछे वास्तविक कारण क्या है? यह इसलिए आवश्यक है ताकि भविष्य के लिए उत्तर प्रदेश ही नहीं देश की अन्य सरकारें भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कदम उठा सकें। कुछ घंटे पूर्व तक जो परिवार अतिक्रमणकारी दिख रहा था वह सरकारी जमीन पाने का पात्र हो गया। कैसी विडंबना है! उनके पास जमीन होती तो वह सरकारी जमीन पाने के हकदार नहीं होते। हालांकि घटना को जातीय एंगल देना गलत है क्योंकि दोनों पक्ष ब्राहण जाति के हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बेचारगी और प्रभावहीनता उनमें भी हैं जिन्हें हम सवर्ण जातियां कहते हैं। राजनीति से परे उठें तो योगी आदित्यनाथ सरकार की सबसे बड़ी यूएसपी कानून और व्यवस्था है। बुलडोजर भू माफियाओं, गुंडों, दादाओं के विरुद्ध एक प्रबल हथियार बना है जिसे दूसरी राज्य सरकारें भी अपना रहीं हैं। यह घटना बताती है कि अगर पुलिस प्रशासन की सोच और व्यवहार न बदले तो कानून व्यवस्था स्थापित करना सर्वसामान्य लोगों के लिए ट्रेजेडी बन जाती है। राज्य सरकार इसे अकेली घटना मानेगी तो दूसरे रूप में इसकी पुनरावृत्ति होगी। 

निश्चित मानिए कि स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्रवाइयों का  प्रदेश में कुछ लोग अवश्य शिकार हो रहे होंगे। उप्र पुलिस और प्रशासन के रवैये पर जगह -जगह सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ता ही नाराजगी प्रकट करते रहते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं - नेताओं की बड़ी नाराजगी यही थी कि पुलिस प्रशासन नियंत्रण से बाहर है, हमारी बात नहीं सुनता और विरोध करने पर मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करता है। उप्र पुलिस प्रशासन के विरुद्ध शिकायतें आम है। कई बार छोटे-छोटे मामलों में बेरहमी से पेश आती है और लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज देती है जिसकी आवश्यकता नहीं होती। जरा सोचिए, भारत के बाहर भारतवंशी जिस बुलडोजर को प्रतीक बनाकर कार्यक्रमों में प्रदर्शित कर महिमामंडित करते हैं वह प्रशासन के द्वारा ही अपराध का हथियार बन गया।

यह हमारे लोकतंत्र का विद्रूप चेहरा है कि पुलिस प्रशासन आम आदमी के प्रति उस तरह संवेदनशील और सहयोगी नहीं बना जैसा उसे होना चाहिए। किंतु योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली सरकार के अंदर प्रशासन का यह व्यवहार उद्वेलित करता है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की विजय का सर्वप्रमुख कारण यही था कि योगी जी के नेतृत्व में गुंडे, माफिया, बाहुबली कब्जे में होंगे तथा कानून व्यवस्था का पूर्ण राज्य होगा। इसलिए कानपुर की घटना को केंद्र बनाकर संपूर्ण प्रदेश में प्रशासन पुलिस की कार्रवाइयों और व्यवहारों की समीक्षा करने और आवश्यकतानुसार उनमें सुधार समय की मांग है। अपनी पार्टी और संगठन परिवार के कार्यकर्ताओं से भी इन मामलों में फीडबैक लेते रहने की व्यवस्था इस दिशा में बहुत बड़ा सहयोगी हो सकता है।

अवधेश कुमार, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 1100 92, मोबाइल 98110 27208

सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

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